Book Title: Anusandhan 1993 00 SrNo 02 Author(s): Shilchandrasuri Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad View full book textPage 8
________________ कृषि गोप्यो जिम कृषि गोख्यो (६) दूहा : मले ढाल ७ : -५ 0 m उत्पति तिम सहुं हुं छु जलहरे पुण्य भव० देखता वीचि खंपे ठामनो दाधे धन वृष्टि रे मलई ऊपति मनि सहूं छु हूं जल हरई पुण्य ए भव० देखतो वीचि पंखइं ठामना दाधी घननुं वृष्टिं रे 5 ६-४ ८-१ ८-२ दृष्टि रे दृष्टिं रे दृष्टिं (७) दूहा : ५-४ दृष्टि माननी साथ तूं मानिनि साचलं ७-४ ढाल ८: उव संगी रे बिंदु उचसंगी रे रहतइ (८) दूहा : २-१ सणाजा जातिनो सणीजा नातिनो जे पणि पणि जे दिवसे दिवस (९) दूहा : ४-२ ढाल १० : ४-४ निश्रूक निशूक सरमोहता सरडोहता ऊधांण वलियां ऊधाण बलियां मेळवी भेळवी निशितशिर धार निशितशर धुर [३] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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