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तिहास सोसवालवंश स्थापक 14g
श्राद्याचार्य श्रीरत्नप्रभसूरीश्वरजी AC का
जयन्ति-महोत्सव
उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है। गाते हमी गुण हैं नहीं उनके गा रहे संसार है॥ वे धर्म पर करते निछावर तृण समान शरीर थे । उनसे वही गम्भीर थे वर वीर थे ध्रव धीर थे।
नन
140
लेखक
-मुनि श्रीज्ञानसुन्दजी
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CSSC SCA
SSSSSSSSSSSSSSS
नम्र निवेदन
प्यारे सज्जनो !
यह जयन्ती महोत्सव नामक किताब श्रापकी सेवामें इस शर्त पर भेंट भेजी जारही है कि आप माघ शुक्ल पूर्णिमा को एक विराट् सभा कर जनता को आचार्य श्री रत्नप्रभसूरीश्वरजी का पवित्र जीवन और ओसवाल समाज की उत्पत्ति विषक हाल इस किताब को पढ़कर सुनावें । और आचार्य श्री ने जिस उद्देश्य को लक्ष में रखकर उन आचार पतित क्षत्रीयों को शुद्धि द्वारा जैन धर्म में दिक्षीत कर महाजन संघ (जैन क्षत्रीय) की स्थापना की और उन महाजन संघ ने अपनी वीरता एवं उदारता से देश समाज और धर्म की बड़ी बड़ी सेवाएँ कर अपनी धवल कीर्ति को अमर बनाई उनका अनुकरण स्वयं करे और अन्य सज्जनों से करवाकर जयन्ति के उद्देश्य को सफल बनावे किमधिकम् ।
वि० जयन्ति महोत्सव के समाचार प्रसिद्ध पत्रों में प्रकाशित भी करवा दे कि दूसरों का भी उत्साह बढ़े ।
'प्रकाशक'
9999999999999999999999) आदर्श प्रेस केसरगंज अजमेर में छपा—सञ्चालक जीतमल लूणिया
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Frilastrichaimidi.
1911
शुभ-भावना श्रीमान् श्रोसवालों ! पोरवालों ! और श्रीमालों !
आज आप अपनी आँखों से देख रहे हैं कि भारत के अन्यान्य सम्प्रदाय अपने-अपने प्राचीन एवं अर्वाचीन परम-उपकारी पुरुषों के गुण स्मरणार्थ किस उत्साह से जयन्तिएँ मना रहे हैं, परन्तु आप अपने परम-उपकारी महापुरुषों को कैसे भूल गये हो ? क्या आपकी पतनाऽवस्था का यही तो मुख्य कारण नहीं है । ? कारण आपके पूर्वजों को जिन महापुरुषों ने मांस, मदिरादि कुव्यसनों का त्याग कराकर, जैन-धर्म में दीक्षित कर, उन्हें स्वर्ग मोक्ष का अधिकारी बनाया, आप उनकी सन्तान कहाते हुए भी उन महात्माओं के नाम तक को भी एकदम से भूल बैठे, क्या यह कम दुःख की बात है ? ।
महाशयों! चाहे आप सैंकड़ों मण्डल स्थापित करें, सहस्रों सभा-समितिएँ भरें एवं अनेकों सम्मेलन-महा-सम्मेलन इकडे करें, परन्तु आप जब तक अपने उपकारी पुरुषों के साथ किये गए कृतघ्नता के वनपाप से अपने आपको मुक्त नहीं करेंगे तब तक आपके किसी भी प्रयत्न में सफलता मिलना नितान्त असंभव है।
जैन समाज के नर-रत्नों! अतः अब भी आपके लिए समय है। आप उठो, जागो और कर्त्तव्यक्षेत्र में श्राओ, मतभेद एवं विचार-भेद भूलकर, अपने परमोपकारी, ओसवाल समाज के संस्थापक आद्याचार्य
श्री रत्नप्रभसूरीश्वरजी महाराज
जयन्ति-महोत्सव
का
मनाकर भिन्न-भिन्न विभागों में विभक्त शक्ति तन्तुओं का पुनः
संगठन कर कर्मक्षेत्र में कूद पड़ो, विश्वास रक्खो आपकी उन्नति सापही के हाथों से होना संभव है। 'ज्ञानसुन्दर'
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क्या ग्राफ प्रासकाल है ! क्या आपको ओसवाल जाति का गौरव है ?क्या आपकी नसों में ओसवाल जाति काखून है?क्या आप कृतघ्नता के पाप से बचना चाहते हैं?क्या आप कृतज्ञता प्राप्त करने के इच्छुक हैं ?क्या आप अपनी पतन दशा कोरोकना चाहते हैं?क्या आप अपनी उन्नति के अभिलाषी हैं ?यदि इन सब प्रश्नों का उत्तर "हाँ" में है तो
ओसवाल वंश के आद्य-प्रवर्तक
जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरि उपकार स्मरणार्थ उनकी स्वर्गवास होने की तिाथे । माघ शुक्ला पूर्णिमा
" कोविराट् सभा एवं बड़े ही समारोह के साथ जयन्ति महोत्सव
मनाकर देखिये
आपकी आत्मा में वीरता एवं विशालता की
कैसी नई विद्युत् धारा पैदा होती है !
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परोपकाराय सतां विभूतयः
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उपकेशवंश अर्थातू प्रोसकाल समाज
अाद्य संस्थापक श्रीमद्जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरीश्वरजी महाराज
जयन्ति-महोत्सव
मंगलाचरण अर्हन्तो भगवन्त इन्द्रमहिताः सिद्धाश्च सिद्धिस्थिताः प्राचायो जिनशासनोन्नतिकराः पूज्याउपाध्यायकाः । श्री सिद्धान्त सुपाठका मुनिवराः रत्नत्रयाराधकाः
पञ्चैते परमेष्ठिनः प्रतिदिनं कुर्वन्तु वो मंगलम् ॥ उपस्थित पूज्यवर्ग, महिला समाज, एवं प्रात्म बन्धुओं !
अहा ! आज के सुवर्णमय अवसर के साथ ही भाप सजनों की उपस्थिति देख मेरा हृदय श्राह्लाद से परम उल्लसित होरहा है। आज के सुवर्णमय अवसर पर जिस महान् मंगल भावना से प्रेरित हो
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[ २ ] हम यहां एकत्रित हुए हैं वह आपको भली प्रकार विदित ही है।
हमें अाज एक महान् प्रतिभाशाली, विश्वोपकारी अहिंसापरमधर्म के प्रचुर प्रचारक अद्वितीय महाभाग जो ओसवाल वंश के प्राद्य संस्थापक हैं, की जयन्ति उत्सव मनाकर उनके महान् उपकारों का विवेचन युक्त स्मरण करना है।
आधुनिक कृतज्ञता के युग में, साधारण कार्य करने वालों का भी जयन्ति उत्सव महान् समारोह से मनाया जाता है, इतना ही नहीं किन्तु कई अन्ध श्रद्धालु तो इस पवित्र भूमि के भार स्वरूप प्रात्मात्रों का भी यश गान करते हुए दृष्टि गोचर होते हैं, ऐसी दशा में उन विश्वोपकारी महान् पुरुषों का, कि जिनका हम पर असीम उपकार है यदि जयन्ति उत्सव नहीं मनावें तथा उनके कृत उपकारों का स्मरण नहीं करें तो हमारे जैसा इस विश्व में कौन कृतघ्न सिद्ध होगा। ____ यद्यपि आज उन महा भाग्य, महा पुरुष की स्थूल अात्मा हमारे समक्ष नहीं है, किन्तु उनका अमरयश तथा हम पर कृत अलौकिक उपकार ही उन के सूक्ष्म आत्म प्रतिबिम्ब का स्वरूप है जो सदैव हमारे हृदय पटल पर अपना अद्वितीय प्रकाश डाल रहा है यही हेतु है कि वे हमारे पूज्य स्थल हैं, अतः हमें प्रति वर्ष इसी भांति अनुपम उत्साह से उनका जयन्ति उत्सव बड़े समारोह से मनाते रहना आवश्यक है। ___ जयन्ति उत्सव उन्हीं महाभाग्य, महापुरुषों का Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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मनाना आवश्यक है जिन्होंने अनेक विपदनद तैर कर देश, जाति, समाज, धर्म और विश्व का महान् कल्याण किया हो, विश्वसागर में पतित जीवों के जो मार्ग प्रदर्शक बने हों, नाना अत्याचारों तथा अनाचारों से पीडित विश्व को अपने अलौकिक उपदेश और तपोबल से अपूर्व सुख शांति का प्रास्वादन कराया हो इत्यादि। हमारे चरित्र नायक में यह सब गुण विद्यमान थे। __ यहां यह कथन भी अतिशयोक्ति पूर्ण न होगा कि स्वनामधन्य राष्ट्र-भक्त देश नेता लोकमान्य तिलक, गोखले, महात्मा गांधी, माननीय मालवीयजी, देश बन्धुदास, पंडित मोतीलाल, जवाहरलाल नेहरू आदि जो देश की सेवा कर रहे हैं अथवा जिन्होंने की है, इनसे कई सहस्र गुणी अधिक सेवा उस समय इन महापुरुष द्वारा हुई। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि उस समय में वर्तमान काल की भांति समुन्नत साधन नहीं थे। उस समय कुमार्गी मतों तथा पंथों की प्राबल्यता थी कि जिनके विरुद्ध कोई भी कार्य उठाना टेढी खीर याने बड़ा ही कठिन काम समझा जाता था।
जिस समय का हम वर्णन कर रहे हैं, उस समय क्या सामाजिक, क्या राजनैतिक और क्या धार्मिक इन तीनों व्यवस्थाओं में इतना घोर पतन हो चुका था कि जिनका उद्धार करना साधारण कार्य नहीं था, उस समय इस प्रकार के कुकृत्यों के सुधार के लिये किसी महान् आत्मा की आवश्यकता थी।
इतिहास के संशोधन से यह स्पष्ट होचुका है कि भाज से २५०० सौ वर्ष पूर्व भारत का विशेष भाग
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वाममार्गियों के हस्तगत था। सम्पूर्ण राजसत्ता उनके हाथ की कठपुतली बनी हुई थी। यज्ञ होमादि कार्यों में लाखों मूक पशुओं की बलि दीजाती थी। इस जघन्य पाशविक घोर हिंसात्मक आन्दोलन से जहां तहां रक्त की नदियां बहती थीं। इस भांति उस पापाचार के साथ ही साथ मांस मदिरा तथा अनाचार, अत्याचार, और व्यभिचार का प्रचुर प्रचार अपनी चरम सीमा तक पहुँच चुका था। इस प्रकार जनता, वर्ण, जाति-पांति के कीचड़ में अपना सर्वथा नाश कर रही थी, अतएव वाममार्गियों के विपुल प्रचार से भारत में करुणनाद की चीत्कारसेसर्वत्र त्राहि त्राहि की दुंदुभि अपना शब्द करने लगी, तथा जनता एवं विश्व को ऐसे विकट अवसर पर एक महान् शक्ति की आवश्यकता पड़ी, जिससे विश्व में अपूर्व शांति का प्रचार हो, उसी समय हमारे चरित्र नायकजी का पदार्पण इस मरुभूमि में हुआ उनका शुभ नाम था
"जैनाचार्य श्री रत्नप्रभसूरीश्वरजी" जिस महत्व पूर्ण घटना का हम यहां वर्णन कर रहे हैं, उस समय इसी मरुधरभूमि में व्यापार का विशाल केन्द्र स्थल उपकेशपुर नाम का एक सुन्दर मनोहर नगर था। वहां के शासनकर्ता महाराजाधिराज उत्पलदेव थे जो श्रीमालनगर के राजा भीमसेन के लघु पुत्र थे। उन्हीं के बाहुबल एवं परमपुरुषार्थ से यह नगर जन, धन, धान्य-पूर्ण हुआ था अर्थात् इस नृपति ने इस नगर को प्राबाद किया था । जैसा कि कहा हैShree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ५ "ततो भीन्नमालात् अष्टादशसहस्र कुटुम्ब अगात् । द्वादश योजना नगरी जाता” ।
अठारह हजार कुटुम्ब भिन्नमाल (श्रीमाल ) नगर से आए और भी अन्य नगरों से आये हुए लोगों से वह नगर बारह योजन लम्बा नौ योजन चौड़ा बस गया।
इसके अलावा उपकेश गच्छ चारित्र में भी इसका उल्लेख इस प्रकार मिलता है।। अष्टादश सहस्राणि, कुलानां वणिज तथा । तद नि द्विजातीनामसंख्याप्रकृतिरपि ॥३२॥
अर्थात् अठारह हजार व्यापार करने वाले महाजन, नौ हजार ब्राह्मण और अनगिनती के अन्य वर्ण वाले लोगों ने श्रीमाल नगर का त्याग करके नूतन बसे हुए उपकेश नगर में वास किया। फिर भी इसके अलावा "नाभिनन्दनजिनोद्धार" नामक ग्रन्थ में इस नगर का विस्तृत वर्णन किया है और किसी ऐतिहासिक भाषा कवि की कविता भी इस बात को सिद्ध करती है तथा:गाड़ी सहस गुण तीस,
भल्ला रथ सहस इग्यारा । अठारा सहस असवार,
पाला पायक नहीं पारा ॥ मोठी सहस अठार,
तीस हस्ती मद भरता ।
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दश
[ ६ ]
दूकान, कोड व्यापार करेतां ॥
सहस
पांच सहस विप्र भिन्नमाल से, मणिधर साधे मांडिया ।
शाह ऊहड़ ने उपलदे सहित, घरबार साथे छांडिया ॥ १ ॥
इसी ही नगर में नहीं अपितु सारे प्रांत में वाममार्गियों का पूर्ण अधिपत्य था, प्रत्येक शुभ कार्य में यज्ञ होम करना तो उनकी साधारण चर्य्या थी, मद्य मांस तो उनकी दैनिक खुराक ( आहार ) थी । उन दुराचारी पाखण्डियों ने अपने मत पोषण के लिये स्वार्थान्ध हो ऐसे अश्लील ग्रन्थों का निर्माण किया तथा उनका प्रचुर प्रचार कर भद्र जनता को पूर्ण पतन के गहरे गहर में गिराकर उनके साथ धर्म के नाम पर अत्याचार कर पूर्ण विश्वासघात किया ।
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* कुछ नमूना - मांस विषयक:
" मद्यं मांसं च मीनं च मुद्रा मैथुन मैव च । इति पंच मकाराश्च मोक्षदाहि युगे युगे” ॥ मदिराविषयक :
" पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले । उत्थितः सन् पुनः पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते " ॥ व्यभिचार विषयकः
" रजस्वला पुष्कर तीर्थ, चाँडाली तु स्वयं काशी । चर्मकारी प्रयाग तीर्थ, स्याद् रजकी मथुरा मता" ॥
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[ ७ ] उपरोक्त सूक्तियों से पूर्णतया पुष्ट होता है कि वाममार्गियों ने कैसे अश्लील सिद्धान्तों की पुष्टि की। दुराचारों को मोक्ष का मार्ग बतलाकर किस भांति अधर्म और दुराचार का प्रचार किया, इस प्रकार के घातक सिद्धांतों का प्रचार कर सम्पूर्ण समाज को ऐसा रंग दिया कि कोई व्यक्ति उन विचारों के परिवर्तन में समर्थ नहीं हो सकता था।
इस भांति राजा और प्रजा सम्पूर्ण जन समाज देवी के उपासक थे। देवी की प्रसन्नता के कारण सहस्रों मूक पशुओं के रक्त से यज्ञ वेदियाँ रक्त रंजित रहती थीं। आगे चल कर इनके मुख्य दो विभाग प्रचलित हुए (-१) कुंडापंथी (२) काँचलिया पंथ । इन विभागों के नाना मत बने हुए थे, जिनके अखाड़े प्रत्येक ग्राम और नगर में विद्यमान थे। धर्म के नाम पर इस भांति जनता का द्रव्य, समय और शक्तियाँ बलात्कार पूर्वक नष्ट की जाती थीं।
प्रकृति का यह अटूट नियम है कि उन्नति के अंत में अवनति का चक्र पाता है। जव अवनति पूर्ण सीमा पर पहुंच जाती है तब पुनः दूसरे समय में महान परिवर्तन और उन्नति का सूर्य उदय होता है। हमारे मरुधर की भी यही स्थिति हुई, उस समय प्रकृति ने एक महान पुरुष रत्न को जन्म दिया जो इस प्रकार की घोर विषम परिस्थिति को सुधारने में सर्वप्रकार समर्थ थे।
हम यहां हमारी जयन्ति के नायक प्राचार्य प्रवर श्री मदरत्नप्रभसूरीश्वरजी के विषय में, वे कौन थे, किस समुदाय के थे आदि संक्षिप्त परिचय करा देना परम पुनीत कर्त्तव्य समझते हैं। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ८ ] तेवीसवें तीर्थकर भगवान पार्श्वनाथ एक ऐतिहासिक महान् दिव्य पुरुष हो गये हैं। जिनके निर्वाण बाद उनके पद पर शुभदत्त गणधर हुए जिन्होंने जैनधर्म का महान् प्रचार किया। पश्चात् उनके पद पर प्राचार्य श्री हरिदत्तसूरि हुए जिन्होंने स्वस्ति नगर में वेदान्ती लोहिताचार्य और उनके १००० (एक सहस्र) शिष्यों को जैन दीक्षा दी पश्चात् ज्ञान का सम्पूर्ण अभ्यास करवा कर पूर्ण योग्य बनाया, प्राचार्य पद प्रदान कर महाराष्ट्र प्रान्त में धर्मप्रचारार्थ भेजा। उन्होंने तथा उनके उत्तराधिकारियों ने उस प्रान्त में चिरकाल तक भ्रमण कर स्याद्वाद, ज्ञान और अहिंसा धर्म का खूब झंडा फहराया। प्राचार्य हरिदत्त सूरि के पद पर आचार्य आर्य समुद्रसूरि हुए, आप भी जैन धर्म के कट्टर प्रचारक थे।
आपके शासन काल में विदेशी नामक प्राचार्य ने उज्जैन नगर के जयसेन राजा और अनंग सुन्दरी रानी तथा उनके एकाकी पुत्र केशीकुमार को दीक्षा दी, पश्चात् अापने उस केशीकुमार श्रमण को अपने पद पर प्राचार्य पद से विभूषित कर स्वर्ग को प्रस्थान किया।
प्राचार्य केशी श्रमण ने अपनी अद्वितीय विद्वत्ता वचन लब्धि और दिव्य आत्मशक्ति द्वारा जैन धर्म का खूब प्रचार किया।
श्वेताम्बिका नगरी का राजा प्रदेशी पूर्ण नास्तिक शिरोमणि था, वह कहर अधर्मी और पाखंडीथा। ऐसी
आत्माओं को भी आपने प्रतिबोध देकर सच्चा प्रास्तिक जैन धर्मावलम्बी बनाया। ऐसी स्थिति में उन प्राचार्य श्री ने सुलभ प्रान्तों में परिभ्रमण कर जैन धर्म का
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[ ९ ]
कितना अतुल प्रचार किया होगा ? अर्थात् उन्होंने अनेक राजा महाराजाओं को अहिंसा परम धर्म के उपा सक बनाये ।
तथापि इस विशाल भारत के कई प्रान्तों में यज्ञवादियों की हिंसामय प्रवृत्ति का निरोध सर्वथा नहीं हो सका इसका मुख्य हेतु यही था कि यज्ञवादियों ने इस विषय के नाना ग्रन्थ निर्माण कर उन पर ईश्वर कथित वाणी को मोहर अंकित कर दी थी । अवसर मिलते ही उन शास्त्रों द्वारा बड़े बड़े राजा महाराजा तथा जनसाधारण को विश्वास दिलाया जाता था कि यज्ञ करना नवीन प्रथा नहीं किन्तु स्वयं परमात्माकथित वेदों का हो इसमें प्रमाण है इत्यादि, किन्तु ऐसी विकट स्थिति में भी केशी श्रमणाचार्य का प्रयास निष्फल नहीं हुआ आपने सतत प्रयत्न कर अनेक राजाओं को अहिंसा धर्म के उपासक बनाये ।
विश्व की अशांति को नष्ट करने के लिये इसी - प्रकार विश्वकल्याणार्थं समय समय पर महाभाग महापुरुष अवतीर्ण हो पृथ्वी का उद्धार करते हैं । प्रकृति ऐसी स्थिति में एक अलौकिक आत्मा की प्रतीक्षा कर रही थी, ठीक उसी समय चरमतीर्थकर परम पिता महावीर प्रभु ने अवतार धारण कर गृहवास के पश्चात् प्रव्रज्या धारण कर घोर तप किया, वीर प्रभु ने घाती कर्मों का नाश कर कैवल्यज्ञान प्राप्त किया, पश्चात् अपना शासन प्रचलित किया। भगवान वीर लोकोत्तर पुरुषरत्न थे उनका अनुपम साहस, अलौकिक वीरता, आदर्श सहनशीलता, विश्वकल्याण तथा जनता के उद्धार की उत्कृष्ट भावना ने विश्व को
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[ १० ] अनुपम शांति प्रदान की, अपने अतिशय प्रभाव और अपार शक्ति से "अहिंसा परमोधर्मः" का संदेश भारत के कोने कोने में पहुंचा दिया, समाज जो वर्ण, जाति, उपजाति, ऊँच, नीच के विषैले कांटो से पूर्णतया ग्रसित था, अपने कल्याणकारी उपदेश एवं महामन्त्र द्वारा जनता को समभावी बनाके उस विष को अमृतमय बना दिया, याने उस काल को भिन्नभावरूपी बाड़ाबन्धी का नाश कर प्राणीमात्र को धर्म व मोक्ष का अधिकारी बनाया, उसके फलस्वरूप थोड़े ही काल में भगवान वीर के शांतिप्रद झंडे के नीचे लाखों करोड़ों ही नहीं किन्तु असंख्य भावुक सुख पूर्वक अपनी जीवन यात्रा बिताने लगे।
भगवान् वीर प्रभु के समकालीन अहिंसाधर्म के प्रचारक एक और व्यक्ति थे जिनका नाम था महात्मा बुद्ध । प्रसंगानुसार महात्मा बुद्ध का भी संक्षिप्त उल्लेख करना हम यहाँ समुचित समझते हैं। __ कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन के पुत्र गौतमबुद्ध नामक राजकुमार ने जैनाचार्य पेहित मुनि के पास जैनदीक्षा ली। चिर अवधि तक तप करने के पश्चात् उनका दिल तपस्या से हट गया और एकाकी विहार करने लगे। पश्चात् अपने नाम पर "बौद्ध" नामक धर्म चलाया। यद्यपि बौद्ध ग्रन्थों में यह स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता कि बुद्ध ने जैन दीक्षा ली थी तथापि इस बात को सिद्ध करने में थोड़े बहुत प्रमाण अवश्य मिल सकते हैं।
(१) श्वेताम्बर समुदाय का आचारांगनामक सूत्र
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को शिलांगाचार्य कृत टीका में लिखा है कि बुद्ध ने पूर्व जैन दीक्षा ली थी।
(२) दिगम्बर समुदाय के दर्शनसार नामक ग्रन्थ में भी यही लिखा है।
(३) बौद्ध धर्म के महावग्गा नामक ग्रन्थ के १-२२-२३ में वुद्ध के भ्रमण समय का उल्लेख है कि एक समय वुद्ध सुपासवस्ति में ठहरा था। इससे यही सिद्ध होता है कि वुद्ध प्रारम्भ समय में जैन थे
और जैनों के सातवें तीर्थकर सुपार्श्वनाथ के मन्दिर में ठहरे थे।
(५) बौद्ध ग्रन्थ ललित विस्तार से भो यही सिद्ध होता है कि राजा शुद्धोदन जैन श्रमणोपासक थे अर्थात् पार्श्वनाथ सन्तानियों के उपासक थे ।
(६) डा० स्टीवेन्सन साहब के मत से भी यही सिद्ध होता है कि राजा शुद्धोदन का घराना जैन धर्म का उपासक था।
(७) डा० भाण्डारकर ने भी महात्मा बुद्ध का जैन मुनि होना स्वीकार किया है ( देखो जैन हितैषी भाग ७ वाँ अंक १२ पृ० १)।
(८) बुद्ध ने अपने धर्म में जो अहिंसा को प्रधान स्थान दिया है यह भी जैन धर्म के संसर्ग का ही परिणाम है।
(8) बुद्ध ने आत्मा को क्षणिक स्वभाव माना है जो जैन सिद्धान्त में "द्रव्य पर्याय' द्रव्य नित्य और पर्याय अनित्य अर्थात् पयोय समय समय पर बदलते रहते हैं, बुद्ध ने द्रव्य को पर्याय समझ आत्मा को
"क्षणिक" प्रतिक्षण नाश होनेवाला माना है। इत्यादि Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ १२ ]
प्रमाणों से सिद्ध होता है कि बुद्ध का घराना जैन था और बुद्ध ने प्रारम्भ में जैन दीक्षा स्वीकार की थी।
बुद्ध का समय ठीक केशी श्रमणाचार्य के शासन का ही समय था, बुद्ध, भगवान् महावीर के समकालीन हुए थे / भगवान् महावीर की आयु ७२ वर्ष की थी, जब महात्मा बुद्ध की आयु ८० वर्ष की थी । महावीर से दो वर्ष पूर्व बुद्ध का जन्म हुआ और महावीर के निर्वाण बाद छः वर्ष पश्चात् बुद्ध का देहान्त हुआ । इस भांति वीर की तरह बुद्ध का भी अहिंसात्मक उपदेश और यज्ञहिंसा के प्रति घोर विरोध था ।
इस प्रकार के प्रमाणों में सब को एक ही ध्वनि में स्वीकार करना पड़ेगा कि यदि भगवान् महावीर का हिंसा के विषय में इतना प्रयत्न नहीं होता तो न जाने संसार की क्या दशा होती - प्रसंगवश इतना कह कर अब हम मूल विषय पर आते हैं ।
आचार्य केशी श्रमण के पट्ट पर आचार्य स्वयंप्रभसूरि हुए, जिन्होंने मरुधर में शुभ पदार्पण किया और श्रीमाल नगर के राजा, क्षत्रियों, एवं नागरिकों के ६०,००० कुटम्बों को जैन धर्मोपासक बनाया वे आज भी श्रीमाल नाम से प्रसिद्ध हैं । पूर्वकाल में महर्षियों की अन्तरात्मा में धर्मप्रचार की कैसी उत्कट भावना रहती थी । वे एकआध कार्य करके ही मौन नहीं बैठ जाते
* " तच्छिष्याः समजायन्त, श्री स्वयंप्रभसूरयः । विहरन्तः क्रमेणैयुः श्रीश्रीमालं कदापि ते ॥
तस्थुस्ते तत्पुरोद्याने मासकल्पं उपास्यमानाः सततं भव्यै
मुनीश्वराः । र्भवतरुच्छिदे ||
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[ १३ ] थे किन्तु सतत धर्मकायों में प्रवृत्त रहते थे। उन्होंने पद्मावती नगरी में होतेहुए यज्ञबलिदान को रोका
और महाराजा पद्मसेनादिकों को उपदेश देकर ४५००० सद्गृहस्थों को जैनी बनाया वे आज भी प्राग्वट ( पोरवालों) के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस भांति मरुधर में जैन धर्म की नींव डालने का सबसे पहला अर्थात् शुद्धि और संगठन करने का यशः आप ही ने उपार्जन किया।
प्राचार्य स्वयंप्रभसूरि एक ऐसे मिशिनसंचालक की शोध में थे जो इस मिशिन को अति वेग से प्रगतिशील बनावें। यह शोध स्वार्थ के लिए नहीं किन्तु परमार्थ के लिए ही थी। वह आडम्बर मात्र की नहीं किन्तु शुद्ध और सच्चे हृदय की थी -- "यादृशी भावना यस्यसिद्धिर्भवति, तादृशी" इसी युक्ति के अनुसार ऐसे होनहार संचालक का शीघ्र ही संयोग मिल गया।
"अन्यदा स्वयंप्रभसरोणांः देशनां ददतां उपरिरत्नचूड़ विद्याधरो नंदीश्वरद्वीपं गच्छन् तत्र विमानं स्तम्भितवान्' .. प्राचार्य स्वयंप्रभसूरि एक समय जंगल में कई देवी देवताओं को धर्मोपदेश दे रहे थे उस समय रत्नचूड़ विद्याधर अपने कुटुम्ब (साथियों) सहित नंदीश्वर द्वीप की यात्रार्थ जा रहे थे। जैसे उस विद्याधर का विमान,सूरीश्वरजी के ऊपर पाया उसकी गति रुक गई। रत्रचूड़ ने विमान के अवरोध का कारण एक महान
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[ १४ ] प्राचार्य की श्राशातना हुई है। यह जान वह भूमि पर आया, और अपने अविनयपूर्ण अपराध की प्राचार्य श्री से क्षमा याचना की। सूरिजी ने उसे योग्य समझ देशना दी, जिसको श्रवण (पान) कर रत्नचूड़ ने संसार को असार समझ, वैराग्य भावना से प्रेरित हो राज्य वैभव त्याग अर्थात् अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज भार समर्पित कर ५०० विद्याधरों के साथ सूरिजी के चरण कमलों में भगवती जैन दीक्षा स्वीकार की और विनय, भक्ति पूर्वक ज्ञानाभ्यास करने लग गये। ( कई पहावलियो में आपका नाम मणिचड़ भी पाया जाता है)।
“क्रमेण द्वादशाङ्गी चतुर्दशपूर्वी बभूव गुरुणा स्वपदेस्थावीतः श्रीमद्वारजिनेश्वरात् द्विपंचाशत्वर्षे प्राचार्यपदे स्थापितः पंचशतसाधुभिः सह धरां विचरति ।”
क्रमशः द्वादशांगी ( चतुदर्श पूर्वादि ) का अध्ययन किया, गुरु महाराज ने रत्नचूड़ मुनि को सर्व प्रकार योग्य समझ वीर निर्वाण से आगे ५२ वें वर्ष में अपने पद पर स्थापित कर श्रापका नाम रत्नप्रभसूरि रक्खा । तत् पश्चात् रत्नप्रभसूरि ५०० मुनियों के साथ पृथ्वी मण्डल पर विहार कर अनेक भव्य जीवों का उद्धार करने लगे।
* निवेश्याथ सुतं राज्येऽनुज्ञाप्य च निजम् जनम् । विद्याधरपञ्चशतीयुक्तो व्रतमुपाददे ॥ २७ ॥
"उ० ग० च."
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[ १५ ] जिस समय आचार्य रत्नप्रभसूरि अाबू तीर्थ से बिहार करने का विचार कर रहे थे उस समय वहां की अधिष्ठात्री देवी ने आकर सविनय प्रार्थना की कि भगवन् ! आप मरुधर में बिहार कर वहां की भद्र जनता को धर्मोपदेश प्रदान कर महान् लाभ के भागी बनें। आपश्री के गुरुवर्य ने मरुधर में विहार किया किन्तु वे श्रीमालनगर से आगे नहीं बढ़ सके। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप मरुधर में पदार्पण करें तो माशातीत सफलता प्राप्त होगी। सूरिजी ने देवी की प्रार्थना को सुनकर अपने अतज्ञान में उपयोग दिया तो ज्ञात हुआ कि मेरा विहार मरुधर में ही लाभकारी होगा क्योंकि आप चतुर्दश पूर्वधर थे और धर्म प्रचार की पद्धति आपके गुरु परम्परा की चलाई हुई एक धारा थी। जैसे प्राचार्य हरिदत्तसूरि की आज्ञा से लोहिताचार्य ने महाराष्ट्र में, केशीश्रमणाचार्य ने कई प्रान्तों में, स्वयंप्रभसूरि ने श्रीमाल व पद्मावती में अजैनों को जैन बनाकर अहिंसा का झण्डा फहराया था कहा भी है कि "वीरों की सन्तान वीर ही
होती है।"
प्राचार्य रत्नप्रभसूरि अपने ५०० शिष्यों को साथ लेकर मरुधर में विहार कर रहे थे, आपने मार्ग में किसभांति परिषह, उपसर्ग और कठिनाइयों का सामना किया वह तो उनकी प्रात्मा वा त्रिकालदर्शी ज्ञानी ही जान सकते हैं। प्रथम संकट तो यह था कि वह क्षेत्र मिथ्यात्वियों से सम्पन्न था, वाममार्गियों की प्राचल्यता थी, दूसरा सत्य धर्म के प्रति विद्वेष, तीसरा हेतु जैनधर्म के प्राचार विचारों की अनभिज्ञता, ऐसी
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[ १६ ] विषम परिस्थितियों में कहाँ चाय दूध, अन्न, जल और कहाँ सुन्दर उपाश्रय कहाँ स्वागत सम्मेलन ? इत्यादि किन्तु जिन महाभाग आत्माओं का विमल उद्देश्य केवल परोपकार और सद्धर्म प्रचार का ही हो वहां सद्मार्ग में आई हुई कठिनाइयों से उन्हें दुःख नहीं अपितु अपार हर्ष होता है। इसी प्रकार प्राचार्यदेव अपने धवल उद्देश्य को लक्ष्य में रखकर क्रमशः विहार करते हुए उपकेशपुर नगर के निकट पधार गए। . .. ___ "तत्रश्रीमान् रत्नप्रभसूरिः पंचशतशिष्यसमेतः लूणाद्रहीं समायाति. मासकल्पं पारण्यं स्थितः” - उन्होंने पारण्य अर्थात् लूणाद्रही पहाड़ी पर ध्यान लगा दिया। कई साधुओं के तप का पारणा होने से भिक्षा निमित्त कई मुनि नगर में गए पर उस नगर में मांस मदिरा वर्जित ऐसा कोई घर प्राप्त नहीं हुआ कि जहाँ से साधु भिक्षा अंगीकार कर सकें। ___ "गौचयाँ मुनीश्वराःवजन्ति परं भिक्षां न लभन्ते लोकाः मिथ्यात्व वासिनः यादृशाःगता तादृशा आगता मुनीश्वराः पात्राणि प्रतिलेख्य मासं यावत् संतोषिणः स्थिताः।" __मुनीश्वर जैसे गए थे वैसे ही पीछे लौट आए, पात्रों का प्रतिलेखन कर संतोष किया और तपो वृद्धि की भावना से ज्ञान ध्यान में संलग्न हो गए किन्तु इस भांति औदारिक शरीर वालों का कार्य कहां तक चलसक्ता है। मुनियों के पुनः पुनः विनय करने पर
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[ १७ ]
सूरिजी ने अन्यत्र विहार किया किन्तु वहाँ भी पूर्ववत् हो स्थिति रही, इस भांति मुनियों की भी उत्तरोत्तर तप वृद्धि होती रही ।
आचार्य श्री ने इधर उधर परिभ्रमण कर पुनः उपकेशपुर में पदार्पण किया, क्योंकि सूरीश्वरजी इस बात से भली प्रकार परिचित थे कि उपकेशपुर वाम मार्गियों का केन्द्र स्थल है अतः सबसे पहिले वहां की जनता को बोध दिया जाय, और ऐसा करने से निकटतर वासियों के लिये भी मार्ग निष्कंटक बनजायगा किन्तु मुनियों के लिए भिक्षा का प्रश्न तो उत्तरोत्तर जटिल बनता गया । मुख्य २ मुनियों ने विनय पूर्वक अर्ज की कि पूज्यवर ! सब साधु समान नहीं होते । बहुत समय से वे अपना काल बिना आहार के व्यतीत कर रहे हैं, भविष्य में बिना आहार के निर्वाह होना शक्य है, मुनियों की रक्षा के लिए श्राचार्य देव ने फरमाया कि यदि ऐसी ही दशा है तो यहां से विहार करो। इस आदेश के मिलते ही मुनीश्वर विहार करने को उद्यत हो गये ।
यह वृत्तान्त वहाँ की अधिष्ठात्री देवी चामुण्डा को ज्ञात हुआ, उसने विचारा कि आबू की अधिष्ठात्री ने ऐसे परम पुनीत महात्मा को हमारे क्षेत्र में भेजा है, ऐसी दशा में यदि मुनिगण भूखे प्यासे यहाँ से विहार कर चले गये तो उसमें मेरी क्या शोभा होगी ? अतः ऐसा यत्न करना आवश्यक है कि आचार्य श्री यहां से बिहार न करें, इसी प्रयोजन से देवी ने सूरिजी से यह विनय की ।
३
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[ १८ ] "शासनदेव्या कथितं भो श्राचार्य ? अत्र चतुर्मासं कुरु महालाभो भविष्यति'।
हे भगवन् ! आप यहां चतुर्मास करें आपको बड़ा लाभ होगा। देवी की विनती सुनकर प्राचार्य देव ने श्रुत ज्ञान द्वारा उपयोग लगाया, और भविष्य की स्थिति को भली प्रकार समझ ली कि यहां का चतुर्मास वास्तव में परम लाभदायक है, अतः साधुओं को आदेश दिया कि जिसकी शक्ति तप करने की है वह मेरे निकट रहे, शेष अनुकूल स्थल पर जाकर चतुर्मास करें। इस पर ४६५ मुनि तो सूरिजी की प्राज्ञा लेकर विहार कर गये और शेष ३५ मुनि रहे।
___ "गुरुः पंचत्रिंशनमुनिभिः सह स्थितः मासी, द्विमासी, त्रिमासी, चतुर्मासी उपोषिता कृता
इस प्रकार ३५ मुनियों के साथ प्राचार्य श्री ने वहां चतुर्मास करने का निश्चय कर लिया। पश्चात् पर्वतों की कन्दराओं तथा वृक्षों की शीतल छाया में स्थित ध्यान में मग्न हो गए।
ऐसे महान् परोपकारी महापुरुषों को धन्य है कि जिन्होंने धर्म प्रचारार्थ इतना बलिदान किया, निराहारी बन शरीर की रक्षा के लिए भी पूर्ण उपेक्षी बन गए । क्या वर्तमान युग के उपाधिधारी मुनि तथा आचार्य इस भाँति बलिदान कर आचार्य देव का अनुकरण करने को उद्यत हैं ? . ___ सज्जनो! आगे आपको भली प्रकार विदित हो जायगा कि तपस्वी मुनियों के तप का प्रभाव जनता
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[ १९ ] पर किस प्रकार पड़ता है ? यह तप बाह्याडम्बरी तप नहीं था किन्तु अन्तरात्माप्रेरित स्वपरकल्याण की भावना से ओतप्रोत, शुद्ध, पवित्र एवं निर्मल तप था । वाममार्गियों को इस बात का भय तो पहले से ही था कि यह जैन सेवडा यहाँ आये हैं कहीं हमारी पोलें न खोलदें। इस कारण वे अपनी दलबन्दी करने में खूब प्रयत्न कर रहे थे,साथ में जैनधर्म व जैन साधुओं की बुराइयां करने में भी कसर नहीं रखते थे फिर भी समय तो अपना काम किया ही करता है।
उत्पलदेव महाराज की महिषी जालपादेवी रानी की सौभाग्य सुन्दरी नामक राजकुमारी पाणिग्रहण के योग्य हो जाने के कारण, राजा ने महिषी की सम्मति लेकर मंत्री उहड़देव के पुत्र त्रिलोक्यसिंह के साथ कन्या का पाणिग्रहण कर दिया। कुछ काल पश्चात् एकदिवस निशा में जब दम्पती आनन्दपूर्वक सुखशय्या में निद्रा देवी के आश्रित थे, अकस्मात् एक विषधर सर्प ने आकर मंत्रीपुत्र को डस लिया ।
"मंत्रीश्वर-ऊहड़-सुतः भुजंगेन दष्ट": शीघ्र ही उसके सम्पूर्ण शरीर में विष व्याप्त हो गया। जब प्रातः काल राजकन्या जागृत हुई और अपने पतिदेवके शरीर को अवलोकन किया तो सहसा हाहाकार और चीत्कारपूर्ण करुण नाद कर रुदन करने लगो। इस दशा में वहां जनसमुदाय दास दासी एकत्रित हो गये । जैसे ही यह समाचार राजा और प्रधान को मिला तो वे भी शीघ्र वहां आकर उपस्थित हुए। क्रमशः यह शोकमय वृत्तान्त सम्पूर्ण नगर में फैल गया, नगरवासी
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[ २० ] खाना पीना छोड़ कर वैद्य, हकीम, यंत्र, मन्त्र, तंत्रवादियों की शोध में परिभ्रमण करने लगे।*
"अनेके मंत्रवादिनः अाहता परं न कोऽपि समर्थस्तत्र"
आगन्तुक मंत्र तंत्र वादियों ने नाना उपचार किए किन्तु सब के सब उस कार्य में असफल हुए। अन्त में उन्होंने यही कहा कि
"अयं मृत: दाहो दीयता" मन्त्रवादियों के कथनानुसार कि राजजामाता मर गये हैं, इनका अग्नि संस्कार करने में अब बिलम्ब नहीं करना चाहिए, यह सुनकर राजकन्या
"तस्य स्त्री काष्टभक्षणे स्मशाने अायाता"
पति वियोग के घोर दुःख से दुःखी हो विकराल एवं करुणाजनक रूप धारण कर अश्वारूढ़ हो अपने पतिदेव के साथ सती होने को उद्यत होगई यह उस काल की एक प्रथा थी कि मृत पति के साथ अपने सतीत्व की रक्षा के लिए उसी के साथ चिता में भस्म होजाना।
मन्त्रीपुत्र त्रिलोक्यसिंह की मृत्युसमझ,लाश को एक विशाल विमान में प्रारुढ करवा के राजा, मन्त्री और
के कितनेक अज्ञलोग यह कह देते हैं कि आचार्य श्री ने रुई का सर्प बनाकर राजपुत्र को कटवाया था, किन्तु यह सर्वथा असत्य भ्रम है। चतुर्दश पूर्वधर आचार्य का ऐसा करना सर्वथा असंभव है और न किसी प्राचीन ग्रन्थ व पट्टावलि में ऐसा लिखा है। इसलिए ऐसी गप्पों को भाट भोजकों की मन कल्पना ही सममनी चाहिये ।
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[ २१ ]
लाखों नागरिक साथ ही साथ श्मशान की ओर प्रयाण करुणापूर्ण मोह दशा का उपाय भी तो क्या हो
करने लगे । उस समय उस पार नहीं था किन्तु इसका
सकता था ?
देवी चामुण्डाने अपने ज्ञान बल से जाना कि मन्त्री पुत्र मरा तो नहीं है, पर विषव्याप्त मूर्छित हुआ है, इस दशा को अवलोकन कर देवी ने सोचा कि यह मूर्ख जनता कहीं इस जीवित कुमार को जला न देवे, इधर उसने यह भी विचार किया कि मैंने महात्माओं को भी बचन दे रक्खा है कि आपको यहां चतुर्मास करने में बड़ा भारी लाभ होगा । ऐसी स्थिति में यह अवसर ठीक आया है, पश्चात् देवी ने एक छोटे साधु का रूप बनाया और श्मशान के मार्ग पर जाकर मनुष्यों से इस प्रकार कहा कि,
" जीवितं कथं ज्वालयत
अरे ? अज्ञ लोगों ? मन्त्री पुत्र तो जीवित है, तुम इसे जलाने के लिए कैसे ले जा रहे हो ? इतना प्रवचन कर देवी तो लुप्त होगई। जिन मनुष्यों ने यह सुना उन्होंने शीघ्र ही राजा और मन्त्री को कहा कि एक साधु कह रहा है कि कुमार जीवित है । यह सुन कर सब को खुशी हुई और राजा की आज्ञा से उस साधु की शोध भी हुई, किन्तु वह साधु न मिल सका, पश्चात् सवों की सम्मति से उस मन्त्री पुत्र का विमान आचार्य देव के पास ले गये । यहां राजा और मन्त्री ने
""
कई पट्टावजियों में इस लघु साधु को सूरिजी का शिष्य भी लिखा है।
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[ २२ ] सूरीश्वरजी के चरणों में मस्तक नवा दीनतापूर्ण भावों से प्रार्थना की। ___"श्रेष्टी गुरुचरस्मे शिरो निवेश्य एवं कथयति, भो दयालो ! मम देवो रुष्टः मम गृह: शून्यो भवति, तेन कारणेन मह्यं पुत्रभिक्षां देहि"
हे भगवन् ! आप समर्थ हैं रेख में भी मेख मार सकते हैं, हम पामर प्राणियों पर दया करो आज हमारा सूर्य अस्त हो रहा है, सम्पूर्ण राजगृह शून्य हो रहा है, हमारे पर किसी दुष्ट देव ने कोप किया है, अब हम आप ही की शरण के आश्रित हैं। आप कृपा कर मुझे पुत्ररूपी भिक्षा प्रदान करें। इस पर देवी के कथनानुसार प्रांसुक पानी मंगवाया और तत्पश्चात् गुरु महाराज के चरणांगुष्ठ का प्रक्षालन कर
"गुरुमा प्रांशुक जलमानीय चरणौ प्रक्षाल्य तस्य उपरि छांटितं" वह प्रक्षालन का जल मन्त्रीपुत्र पर छिड़कते ही वह सावधान हो शीघ्र उठ बैठा हुआ । कहा है कि
"सहसोत्कारणंसज्जो बभूव” फिर तो क्या देर थी दारुण दुःख और महान् शोक का समय हर्ष और आनन्द मंगल में परिवर्तित होगया।
"हर्षवादित्राणि बभूवुः" चारों ओर हर्ष के बाजे बजने लगे। सब के मुख मुद्रा पर खुशी के नूर बरसने लगे, कुम्हलाए हुए
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[२३]
कमल मुख प्रफुल्लित होगए, लोगों की अन्तरात्मा से सहसा यही ध्वनि निकलने लगी कि,
'लोकैः कथितं श्रेोष्टसुतो नूतने जन्माने श्रागत:
1
धन्य है परोपकारी गुरुदेवको और धन्य है आपकी अपार शक्ति को । श्रेष्टिपुत्र के जीवित होने के चमत्कार को देखकर राजा, मंत्री और सब जनता जैन धर्म एवम् आचार्य श्री की मुक्तकंठ से भूरि भूरि प्रशंसा करती हुई कोटिशः धन्यवाद देने लगी और अपने मनहीमन अपनी निष्ठुरता पर पश्चात्ताप करती हुई कहने लगी कि धिक्कार है अपनी अज्ञानता को, कि ऐसे महान् चमत्कारी, विश्वोपकारी, शान्तमूर्त्ति महात्मा के जो अपने यहाँ चिरकाल से विराजमान होने पर भी इनके परम पूजनीय चरणकमलों की सेवा का लाभ नहीं ले सके । अहो ! खेद है कि अपने जैसे अभागे कौन होंगे ? इत्यादि । फिर उस समूह से किसी व्यक्ति ने मधुर शब्दों से कहा कि भाई यह तो संसार की स्वार्थवृत्ति है एवं चमत्कार को नमस्कार हुआ ही करता है पर अपने को इनके आत्मिक गुणों की ओर विशेष लक्ष्य देना चाहिए ।
राजा और सचित्र ने आचार्यदेव के अतुलित उपकार से प्रेरित हो मन ही मन अपने हृदयतंत्री के तारों की झनकार में महात्मा श्री के गुणों की प्रशंसा करने में कुछ भी कमी न रक्खी और अपनी कृतज्ञता का परिचय देते हुए खजाँचियों से द्रव्य मंगवाकर - श्रनेकमणिमुक्ताफलसुवर्णवस्त्रादि श्रानीय,
' गुरोर भगवन् ! गृह्णातु "
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[ २४ ]
आचार्य श्री के परम पूजनीय चरणकमलों में अनेक बहुमूल्य रत्न, मणि, मुक्ताफलादि अर्पण किये इतना ही नहीं पर राजा उत्पलदेव ने नम्र शब्दों में यहां तक कहा कि हे प्रभो ! आपके उपकार से तो हम किसी भव में मुक्त हो ही नहीं सकते हैं पर यह हमारा राज्य है इसको आप स्वीकार कर हमको कृतार्थ करने की कृपा अवश्य कीजिए । बात भी ठीक है कि आचार्य श्री के उपकार के सामने राज्य या धनमाल क्या वस्तु है ?
सूरीश्वरजी उन राजा और मंत्री के भक्ति पूर्वक नम्र शब्दों को सुन कर मन ही मन राजादि की बुद्धि की आलोचना करने लगे और लगे सोचने कि अहो आश्चर्य ! इन लोगों ने धनमाल और राज 'जो मोक्ष साधन में एक कंटक रूप हैं उनको ही अपना सर्वस्व समझ रखा है । अहो ! यह कितनी अज्ञान दशा कि ये मोह एवं माया को पाश में पड़ कर वास्तव में अपने पथ से च्युत हो रहे हैं ऐसे अज्ञानी लोगों को सदुपदेश देना महान लाभ और अपना खास कर्त्तव्य समझ कर सूरीश्वरजी ने निषेधवाचक शब्दों में प्रत्युत्तर दिया कि
" गुरुणा कथितं मम न कार्यं”
2
हे राजन् ! हम त्यागियों को इस अनर्थकारी राज्य ब धनमाल से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि मैं इस नाशवान राज्य का ही इच्छुक होता तो हमारे स्वाधीन राज्य को तिलाञ्जलि देकर इस त्यागमय योग को क्यों धारण करता । हे धराधिप ! राज्य ऋद्धि आत्म कल्याण
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[ २५ ] के लिए साधक नहीं पर एक प्रकार का बाधक है। यदि गृहस्थ लोग इनका शुभक्षेत्र में उपयोग करें तो वे निश्चय से शुभ कर्मोपार्जन कर सकते हैं, पर निस्पृही त्यागियों के लिए तो यह एक कलंक स्वरूप ही है।
राजा मंत्री और नागरिक जन सूरीश्वरजी के ऐसे परम निस्पृहता सूचक शब्द श्रवण कर मन ही मन में आलोचना करने लगे। अहो! कहाँ तो अपने मठधारी लोभानन्दों की माया, ममता, तृष्णा और लोभ दशा ? कि द्रव्य प्राप्ति के हेतु अनेक प्रपंच और कुकृत्य करते रहते हैं और कहां! ये परम निस्पृही महात्मा कि द्रव्य का स्पर्श करने में भी महान् पाप समझते हैं इतना ही नहीं पर इस विशाल राज्य ऋद्धि पर भी इन्होंने लात मार दी है। धन्य है इनके त्याग और वैराग्य को।
प्राचार्य देव के त्याग, वैराग्य, तप और निस्पृहता ने जनता पर खूब ही प्रभाव जमाया । राजा एवं मंत्री ने पुनः नम्रता पूर्वक अरज की कि हे प्रभो ! हम अज्ञा. नियों को आप ठीक रास्ता बतलाइए कि हम आपके इस महान् उपकार से किस प्रकार उऋण हो सक्त हैं।
"भवद्भि जैन धर्मो गृहीतव्यः;" सूरिजी ने फरमाया कि हे राजन् ? हमने जो कुछ किया है वह तो हमारा कर्तव्य ही था, यदि आप इस भव व परभव में सुखी होना चाहते हैं तो आपके लिए सब से उत्तम मार्ग यही है कि आप सब लोग परम पुनीत जैन धर्म को स्वीकार कर इसका ही रुचि पूर्वक पालन करें उससे हम संतुष्ट हैं।
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[ २६ ] मंत्रीश्वर ने पुनः निवेदन किया कि हे भगवन् ! हम नहीं जानते कि जैन धर्म किस पदार्थ का नाम है ? इस धर्म में क्या विशेषताएं हैं ? क्या कृपा कर आप हम लोगों को समझायेंगे ?
मंत्री के प्रेरित वचनों को सुन कर सूरीश्वरजी ने अपने दिव्य ज्ञान रूपी अमृत वारि का वर्षण करते हुए अपनी मधुर, रोचक एवं प्रोजस्वी भाषा द्वारा इस प्रकार जैनतत्वज्ञान का विस्तृत विवेचन कर समझाया कि राजा प्रजा के हृदय में चिरकाल से जो मिथ्यात्व एवं प्रज्ञान के संस्कार थे वे सब एक दम ध्वस्त होगये जैसे सूर्य के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है। यदि उस उपदेशामृत का संक्षिप्त सार उपस्थित श्रोता. गण के कानों तक पहुँचा दिया जाय तो भी असंगत न होगा।
"इस अपार संसार में जीवों को परिभ्रमण करते हुए मनुष्यजन्म, आर्यक्षेत्र, उत्तमकुल, शरीर आरोग्यता, इन्द्रियपरिपूर्णता, दीर्घायुष्यादि उत्तम सामग्री का मिलना अति दुर्लभ है। यदि किसी जन्म के पुख्योदय से पूर्वोक्त सामग्री का सहयोग मिल भी गया तो भी सत्संग के लिए निस्पृही महात्माओं का साक्षात्कार होना तो अति दुष्कर है यदि ऐसा भी हो जाय तो भी सदुपदेश का श्रवण करना तो विशेष कठिन है। पर महानुभावों ! जिस सामग्री का दुर्लभपना ज्ञानियों ने बतलाया है वह सब सामग्री आज आप लोगों को सरलता से प्राप्त हो गई है अब आप लोगों का खास कर्तव्य है कि आत्म कल्याणार्थ सद्धर्म की परीक्षा करें जैसे कि कनक की परीक्षा की जाती है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ २७ ) “यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते, निघर्षणच्छेदन ताप ताड़नः । तथैवधर्मो विदुषां परीक्ष्यते, श्रुतन शीलेन तपो दया गुणैः ॥
उपरोक्त महावाक्याऽनुसार जिस भांति स्वर्ण की परीक्षा कसौटी से, छेदन करने से, तपाने से. और कूटने से इस तरह चार प्रकार से होती है उसी भांतिधर्म की परीक्षा के साधन भी चार है यथा शास्त्र, शील (सदा. चार ) तप और दया । जिस धर्म में इन चारों अमूल्य रत्नों का स्थान है वही धर्म शुद्ध सनातन कहलाने का दावा कर सकता है वही धर्म सर्व माननीय और जीवों का कल्याण करने में समर्थ हो सकता है।
__ खेद और महाखेद है कि कितने ही लोग धर्म के नामपर बड़ा ही अन्याय कर रहे हैं जिनको सुन और देख के हृदय एक दम कांप उठता है, दिल पर वज्र सा घात होने लग जाता है, आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है कि धर्म के पाखण्डियों ने अपना मतलब सिद्ध करने को और अपनी विषय वासना और विलासिता पूर्ण सामग्री को प्राप्त करने के हेतु बिचारे भोले भाले भद्र जीवों पर अन्याय करके मदिरापान मांसाहार और व्यभिचार करने में भी धर्म बतलाया है पर वास्तव में यह धर्म नहीं किन्तु सरासर अधर्म है। यह हित नहीं पर अहित का कारण है। इससे स्वर्ग, मोक्ष नहीं पर नरक प्राप्त होता है। Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ २८ ] महानुभावों! यों तो इस भूमण्डल के वक्षःस्थल पर अनेकानेक धर्म विद्यमान है, पर यह बात हम दावे के साथ कह सक्ते हैं कि सर्वोत्तम सब से प्राचीन और स्वर्ग मोक्ष प्रदान करने वाला कोई एक धर्म है तो जैन धर्म ही है। जैन धर्म का आत्मज्ञान, अध्यात्मज्ञान, तत्त्वज्ञान, आत्मवाद, ईश्वरवाद, कर्मवाद, परमाणुवाद
और सृष्टिवाद बड़ी ही उच्चकोटि का है। साधारण व्यक्ति के तो एकदम समझ में आना ही मुश्किल है। यदि ज्ञानियों की उपासना कर इनको ठीक समझ लिया जाय, तो फिर इतर धर्म तो बच्चों के खेल के सदृश ही मालुम होते हैं। जैसे जैनों का तत्त्वज्ञान उच्च दर्जे का है वैसे ही प्राचार, व्यवहार, रहन, सहन, खान पान और उदारता तथा परोपकारशीलता भी उच्च कोटि की है। तत्त्वज्ञान में स्यावाद और प्राचार ज्ञान में अहिंसापरमोधर्मः जैनियों का मुख्य सिद्धान्त है । हे राजन् ! आत्म कल्याण करने में सब से पहिले इन्द्रियों का दमन और कषायों पर विजय प्राप्त करना ही मुख्य बतलाया गया है। इस कठिन वृत्ति को वही पाल सकता है कि जिसको अपना कल्याण करना हो किन्तु संसारलुब्ध पामर प्राणी इसको धारण नहीं कर सकते हैं।
सज्जनों ! जैन धर्म किसी सामान्य व्यक्ति का चलाया धर्म नहीं है पर स्वयं परमात्मा-ईश्वर-सर्वज्ञ भगवान का फरमाया हुआ धर्म है। जैनधर्मानुयायी को मांसाहार, मदिरापान, मृगया (शिकार खेलना ) पर स्त्री संग जुआ चोरी और वेश्यागमन एवं सप्त
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[ २९ ] कुव्यसनों के लिए हर तरह से निषेध किया हुआ है। वासी भोजन, रात्रिभक्षण कन्द मूलादि अभक्ष्य पदार्थों को भी सर्वथा त्याज्य बतलाया गया है। सुवा, सूतक और ऋतुधर्म का बड़ा भारी परहेज रखना बत. लाया है यदि कोई धर्म पूर्वोक्त बातों के लिए छूट देता हो तो जैन धर्म इनका बहुत विरोध करता है। जैन धर्म के उपदेशकों का खास कर्त्तव्य है कि ऐसे अधर्म कार्यों को उपदेश द्वारा शीघ्र रोके और जनता में सदाचार का जोरों से प्रचार करे। यदि कोई अज्ञानता के वशीभूत हो पतन दशा को पहुँच गया हो तो उसका पुनरुद्धार करना भी जैनियों का खास कर्त्तव्य है।
नरेन्द्र ! कितनेक अज्ञ लोग जैन सिद्धान्तों से अनभिज्ञ होते हुए भी जैन धर्म पर कई प्रकार के व्यर्थ आक्षेप किया करते हैं, वे कहते हैं कि जैन नास्तिक हैं ? जैन ईश्वर को नहीं मानते ? जैन ईश्वर को सृष्टि का कर्ता भी नहीं मानते हैं ? जीवों के शुभाशुभ कर्मों का फल ईश्वर देता है उसको भी जैन लोग नहीं मानते हैं ? जैन नग्न देव की मूर्तियों को पूजते हैं ? जैनों ने अहिंसा का उपदेश देकर जनता को कायर और कमजोर बना दिया ? जैनों ने शास्त्रश्रवणादिक का अधिकार शूद्रों तक को भी देदिया है इत्यादि अनेक कपोल कल्पित बातें कह कर जनता को भ्रम में डाल जैन धर्म से घृणा पैदा कर उनको सत्य सनातन और पवित्र जैन धर्म से दूर रखने की कोशिश करते हैं।
हे नरेन्द्र ? जैन धर्म न तो नास्तिक है और न ईश्वर को मानने में इन्कार ही करता है। पर दुःख है
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[ ३० ] कि ऐसे मिथ्याक्षेप करने वाले जैन सिद्धान्तों को न तो कभी ध्यान लगा के सुनते पढ़ते हैं और न कभी विद्वानों के पास जाकर इस बात का निर्णय ही करते हैं इस लिये मैं आज आप लोगों को यह बतलाना चाहता हूँ कि पूर्वोक्त दलीलों के विषयों में जैनों की क्या मान्यता है:
(१) स्वर्ग, नरक, पुण्य, पाप, इहलोक, परलोक अर्थात् भव भवान्तर और शुभ क्रिया का शुभ फल, अशुभक्रिया का अशुभ फल इन बातों को नहीं मानने वाला ही नास्तिक होता है परन्तु जैन सिद्धान्त तो इन बातों को स्वीकार ही नहीं बल्कि जोर देकर प्रतिपादन करता है फिर नास्तिक कहना यह द्वेष नहीं तो और क्या है ? अर्थात् जैन धर्म आस्तिकों का ही धर्म है।
(२) ईश्वर-निरंजन निराकार सच्चिदानन्द, सर्वज्ञ अजर अमर अक्षय परमब्रह्म और सर्व कर्मोपाधि मुक्त को ही जैन ईश्वर मानते हैं पर जो लीला क्रीडा विलास संयुक्त हो पुनः पुनः अवतार धारण करते हों ऐसों को जैन कदापि ईश्वर नहीं मानते हैं ईश्वर वही है जो सच्चिदानन्द हो अर्थात् स्वगुण में रमण कर रहा हो और ऐसे ईश्वर को ही जैन ईश्वर मानते हैं।
(३) ईश्वर सृष्टि का कर्त्ता नहीं है । भला सोचो तो सही सांसारिक बंधनों और इस माया जाल से छूटने के लिए ईश्वर से प्रार्थना की जाती है और जब वे स्वयं हो आत्मज्ञान में सुखो नहीं रहकर इस गोरखधन्धे में अपने समय को पूरा करते हैं तो वे हमें इस संसार सागर से कैसे पार उतार सकते हैं।
जब यह प्राणी अपने ही कर्मानुसार चोर कोतवाल Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ३१ ]
गरीब साहूकार बनता है तब बीच में ईश्वर को इस मेले में पड़ने की क्या आवश्यक्ता है ? यदि ईश्वर सृष्टि का कर्ता ही है तो बतलाईये ईश्वर व्यापक है या अव्यापक ? साकार है या निराकार ? स्वयम्भू है या अन्यभू ? मायी है या अमायी ? इच्छावाला है या अनिच्छावाला ? लीला क्रीड़ा वाला है या अलोला क्रीड़ा बाला ? शरीरो है या अशरीरी ? यदि ईश्वर व्यापक निराकार स्वयंभू अमायो-अनिच्छा वाला, लीला क्रीड़ा रहित, अशरीरी है तो वह सृष्टिकर्ता कैसे हो सकता है कारण सृष्टि का निर्माण वह ही कर सकता है कि जिसके आकारादि पूर्वोक्त लक्षण हो वे तो ईश्वर में एक ही नहीं है वास्तव में विचार किया जाय तो ईश्वर को सृष्टिकर्ता मानने वाले ईश्वर के असली स्वरूप से बिलकुल अनभिज्ञ हैं । इसलिए उनको नास्तिक कहना भी अनुचित नहीं है कारण ईश्वर की स्वतन्त्रता स्वगुण रमएता, निराबाध और परम शांति सुखका अनुभव करना एवं अनंत ज्ञान दर्शनादि गुणों का विच्छेद करते हैं परमात्मा के परम-पद को सत्यरूप में स्वीकार नहीं कर यद्वातद्वा कह देना ही नास्तिकता के लक्षण है सृष्टि अनादि अनंत है इसका कर्ता हर्ता कोई नहीं है द्रव्यापेक्षा यह नित्य शाश्वत और वर्णादि पर्यायापेक्षा अशाश्वत हैं यह मानना यथार्थ आस्तिक का सच्चा निशान है ।
(४) आत्मा जीव स्वयं कर्मों का कर्ता भोक्ता हैं इसमें निराकार ईश्वर को निमित्त बतलाना एक अल्पज्ञता है जब ईश्वर के मुखादि शरोर ही नहीं तो वे सम्पूर्ण विश्व के जीवों को कर्मों का फल कैसे भुक्ता सकते हैं यदि सम्पूर्ण विश्व के जीवों का इन्साफ देने
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[ ३२ ] की उपाधि ईश्वर अपने शिर लेता है तो वे ईश्वर ही किस बात के और उनमें ईश्वरता का ही क्या लक्षण रहा ? मानो.वे तो सब से अधिक दुःखी और प्रपंची ठहरते हैं पर वास्तव में यह कथन ज्ञानियों का नहीं पर अज्ञानियों का है सच्चिन्दानन्द परब्रह्म ईश्वर ऐसी झंझटों में कदापि निमित्त नहीं है । संसारी-जीव स्वयं कर्म करते हैं और उसके फल को स्वयं भोगते हैं जैसे किसी ने भांग पी है तो क्या उसका नशा ईश्वर द्वारा प्राता है ? नहीं, भांग के परमाणु ही उस नशा के कारण हैं इस भांति कर्म परमाणु ही जीवों को सुख दुःख प्रदान करते हैं।। - (५) जैन-जिन मूर्तियों को पूजते हैं वे परमत्याग मय परमध्यानमय संसार के बंधन मोचन की अन्तिमावस्था और वीतरागदशा की हैं। ऐसे परम वीतरागा. वस्था की उपासना करने से ही वीतरागदशा प्राप्त होती है न कि राग-द्वेष मोह विकार और क्रूरता-पूर्वक मूर्तियों की उपासना करने से । क्योंकि वे स्वयं रामद्वेषादि से निवृति नहीं पा सकी तो उपासकों को तो वह मिलेगी ही कहां से ? वास्तव में मूर्तियों की उपासना
आत्म-विकास के लिये हो की जाती है। प्रात्म-विकास उन्हीं मूर्तियों द्वारा हो सकता है कि जिनकी आकृति में सम्पूर्ण विकासता का भाव लबालब भरा हो।
(६) जैन-धर्म कायरों का धर्म नहीं है पर बहादुर वीरों का धर्म है। जैन-धर्म के उपदेशक एवं प्रचारक तीर्थकर चक्रवर्ती बलदेव वासुदेव और बड़े २ राजा महाराजा वीर हुए हैं और उन्होंने वीरता से ही अभ्यन्तर शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर संसार की जंजीरों को
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[ ३३ ] तोड़ परम पद प्राप्त किया है क्या कायरों ने पूर्वोक्त कार्य किये हैं ? कदापि नहीं।।
भूपते ! जैनों की अहिंसा ने जनता को कायर नहीं बनाया पर वीरता का हो पाठ पढ़ाया अल्पज्ञ लोगों को अभी तक यह मालूम नहीं है कि अहिंसा में एक बड़ी भारी बिजली सो शक्ति रहो हुई है। जितना काम अहिंसा कर सकती है उतना हिंसा नहीं कर सकती है। अहिंसा के कहर उपासक होते हुए भी वे वीर और प्रतापी हैं। वे बाह्य शत्रुओं की अपेक्षा प्रात्मा के अनादि काल के प्राभ्यन्तर शत्रुओं का ध्वंस कर शुभ गति प्राप्त करने में ही अपनी शक्ति का विशेष उपयोग किया करते हैं। इसलिए जैन धर्म की अहिंसा कायरता का उद्योतक नहीं पर वीरता को पराकाष्टा है।
(७) जैन धर्म ने धर्म साधन का अधिकार शूद्रों तक को दे दिया। यह कोई नई बात नहीं है । परन्तु प्राणी मात्र को अपना कल्याण करने का अनादि से हक्क है। धर्म का ठेका किसी व्यक्ति ने नहीं ले रखा है यह तो करे उसका ही धर्म है। जव यह कहा जाता है कि चराचर प्राणी ईश्वर की संतति है तो फिर धर्माराधन में यह कुत्सित विचार क्यों ? संक्षिप्त में सारांश यह है कि
जैन-नास्तिक नहीं पर कहर आस्तिक है। जैन-ईश्वर को मानते हैं और उपासना भी
करते हैं। जैन-मृष्टि को ईश्वर कृत नहीं पर अनादि अनंत
मानते हैं।
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[ ३४ ]
जैन - जीवों को सुख दुःख भुगताने को ईश्वर नहीं पर कर्मी को मानते हैं ।
जैन - की हिंसा में कायरता नहीं पर बड़ी भारी वीरता रही हुई है ।
जैन - वीतराग दशा की मूर्तियों की उपासना करते हैं ।
जैन-धर्म आत्मकल्याण करने का अधिकार प्रत्येक प्राणी को देता है ।
धराधिप ! जैनधर्मावलम्बी किन देव, गुरु, धर्म, और आगम को मानते हैं उनका भी संक्षिप्त से परिचय करा देता हूँ ।
(१) देव - अर्हन्त - वीतराग- सर्वज्ञ विश्वोपकारी जिनके पवित्र जीवन और शांत मुद्रा में इतनी उत्तमता, उदारता, विशालता और परोपकारता उस २ के भरी हुई है कि जिसको पढ़ने सुनने से तो क्या पर दर्शन मात्र से ही जनता का कल्याण हो जाता है । उनका धर्म इतना विशाल है कि चराचर प्राणी उपासक बन सद्गति के अधिकारी बन सक्ते हैं । ऐसे देव को हम जैन लोग देव मानते हैं ।
(२) गुरु - जो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और निस्पृहता एवं पंच महाव्रत को सम्यक् प्रकार से पालन कर, कनक कामिनो और सांसारिक सर्व उपाधियों से और सर्व प्रकार के कुव्यसन और विलासिता से विरक्त हैं इतना ही नहीं पर अपना जीवन ही जनोपकार के लिए अर्पण कर चुके हैं वे ही गुरुपद के आसन को सुशोभित कर सक्ते हैं । अर्थात् ऐसे महात्माओं को ही गुरु समझ कर उपासना करनी चाहिए ।
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[३५]
(३) धर्म- जैन तीर्थकरों ने सम्पूर्ण ज्ञान द्वारा सकल प्राणियों के कल्याणके हेतु "अहिंसा परमो धर्मः” सत्य, शील, क्षमा, दया विवेक, संवर, इन्द्रियों का दमन, कषायों पर विजय, देव पूजा, गुरु उपासना, स्वधर्मी भाईयों से वात्सल्यता और परोपकारादि धर्म के साधन बतलाये हैं उन्हीं परमात्मा के चलाये हुए धर्म को ही हम धर्म मानते हैं ।
(४) आगम - जिन आगमों में परस्पर विरोध भाव नहीं है। आत्म ज्ञान, अध्यात्मज्ञान, तत्त्वज्ञान, आसन, योग; समाधि, आत्मवाद, ईश्वरवाद, परमाणुवाद, कर्मवाद, क्रियावाद, साधु और श्रावक धर्म की मर्यादा इत्यादि जनता को सद्मार्ग बतलाया गया है वे ही सत्य शास्त्र हैं ।
नरपते ! इन चारों तत्त्वों पर पूर्ण श्रद्धा रखने मात्र से जीव सद्गति का अधिकारी बन सकता है। अब जैन धर्म पालन करने वाले महानुभावों का संक्षिप्त में परिचय करा देता हूँ ।
जैन धर्म पालन करने वालों के मुख्य तीन दर्जे हैं । (१) सम्यग् दृष्टि, (२) देशव्रती (३) सर्व व्रती (१) सम्यग् दृष्टि - पूर्वोक्त देव, गुरु, धर्म और शास्त्रों पर अटल श्रद्धा रखता हुआ इनको ही उपासना करता रहे पर उससे किसी प्रकार का नियम, व्रत पालन न हो सके । तथापि वह श्रद्धा मात्र से सद्गति का अधिकारी हो सक्ता है ।
(२) देशव्रती : - यह गृहस्थ धर्म है । पूर्वोक्त पार तत्त्वों पर श्रद्धा रखता हुआ, जीवादि पदार्थों का अच्छी
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[ ३६ ] तरह से ज्ञाता हो, संसार के प्रांरभादिक कितनेक कार्यों से निवृत्ति (त्याग) और इच्छानुसार व्रत नियम ग्रहण कर, उनका पूर्णतया पालन करना अहिंसा, सत्य अचौर्य, स्वदारा-संतोष, परिग्रह,-दिशापरिमाण, उपभोग परिभोग की मर्यादा, अनर्थ दंड का त्याग, समायिक, देशावकाशक पौषध, और अतिथि संविभाग इस प्रकार द्वादशव्रत की मर्यादा करे और तन, मन, धन से जैन शासन का प्रचार एवं प्रभावना करे। संघ, स्वधर्मियों से वात्सल्यता, पजा प्रभावना, तीर्थ यात्रा, जीर्ण मन्दिरों का उद्धार और आवश्यक्ता होने पर नये मन्दिरों का निर्माण करना इत्यादि । राजन् ! गृहस्थ धर्म ऐसा धर्म है कि इसको राजा महाराजा और चक्रवर्ती जैसे भाग्यशाली और साधारण व्यक्तिभीपालन कर सक्त हैं क्योंकि इन के नियम व्रत इच्छानुसार ही होते हैं
(३) सर्व व्रती-यह साधु धर्म है इसमें संसारी कार्योका किसी प्रकार का अपवाद एवंछट नहीं है। यह सर्व प्रकार से त्यागियों का मार्ग है। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और निस्पृहता का सर्व प्रकार पालन करना ही मुनिव्रत है। इतना ही नहीं पर जन कल्याण के निमित्त अपना जीवन अर्पण करने में भी पीछे नहीं हटते हैं अर्थात् स्व-कल्याण के साथ पर-कल्याण करने में वे सदैव प्रयत्न किया करते हैं।
हे भूपति ? पूर्वोक्त तीन रास्तों में से किसी एक को स्वीकार कर उसका ठीक और पूर्ण पालन करने से ही जीवों का कल्याण होता है इत्यादि सूरिश्वरजी ने भिन्न भिन्न प्रकार से एक ही दृष्टि बिन्दु-लक्ष्य में रख
कर धर्म देशना दी जिनका प्रभाव जनता पर काफी Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ३७ ]
पड़ा। ठीक ही है भावुक और भद्रपरिणामी जीवों पर थोडा उपदेश भी विशेष असर कर देता है ।
अब उन्हों की आत्मा का उद्गार भी सुन लीजिये इस प्रकार उस विशाल समाज पर सूरिजी के उपदेशामृत का छिटकाव होने से क्या राजा और क्या प्रजा सब के सब निस्तब्ध एक दूसरे की ओर पुतलिएँ फेरने लगे । उनके मुखों पर आश्चर्य की एक बड़ी झलक थी । उनके अधरों पर मुस्कराहट का एक सुन्दर झोंका था । उनका हृदय कमल विकसित हो उठा । उस समय हर्ष का पार नहीं था । तदन्तर राजा ने हाथ जोड़ कर विनीत शब्दों में आचार्य श्री से कहा हे भगवन् ? हम एक ओर तो विराट् विषाद सागर के मगर हो रहे हैं और साथ ही साथ दूसरी ओर हम हर्षोन्मत्त हो असीम आनन्द का अनुभव कर रहे हैं इस हर्ष और विषाद को यह कारण है कि इस अमूल्य मनुष्य जीवन रत्न को प्राप्त करके हम लोगों ने इसका 'कुछ सदुपयोग न किया हमने इस अनमोल हीरे को पत्थर समझा. हमने धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के अत्याचार कर मिथ्यात्वरूपी पाप की गहन गठरी शिर पर रख अपने आपका सर्वनाश किया है । हमने सत्य धर्म की अवज्ञा करके अपने आपको दूषित बना दियाइससे और अधिक दुःख हमें इस बात का है कि आप जैसे योगीश्वरों के इस वज्र भूमि में होने पर भी हमने सेवा उपासना का लाभ नहीं लिया । आपके चरणों की रज का स्पर्श कर कृतार्थ न हुए । अधिक शोक तो हमें इस बात का है कि हमने आपके दर्शन तक न किये इत्यादि । पर आचार्य महाराज ? हम इस दोष
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[ ३८ ] के इतने भागी नहीं है जितने हमारे पूर्वज कि उन्होंने हमारे हृदय में प्रारम्भ से ही ऐसे कुत्सित विचारों का समावेश कर दिया था; कि जैन निराशावादी एवं नास्तिक हैं।
पर आज हमारे लिए स्वर्ण दिवस का उदय होना प्रतीत हुआ है। अापके श्रीमुख से अमृत मय देशना के श्रवण करने मात्र से ही हमारे जगजंजाल टूटने की सम्भावना हुई है। आज आपने हमारे ज्ञान चतुओं को उन्मीलित कर दिये-हृदय में एक प्रकार की ज्योति प्रज्वलित हो गई जिससे हमारे सब भ्रम नष्ट हो गये। गुरुदेव ! जैन न तो नास्तिक हैं और न जैन धर्म जीवों को कायरता का पाठ पढ़ाता है-न जैन धर्म ईश्वरो. पासना का निषेध करता है-जैन धर्म एक उच्चकोटिका प्रादर्श है। प्रभो ? इतने दिनों तक हम अज्ञानता तथा मिथ्यात्व रूप नशे में मदोन्मत्त हो असंज्ञावस्था में पड़े हुए थे-हम इतने बेभान बन गए थे कि अधर्म को ही धर्म मान लिया । ठोक और बिल्कुल ठीक बिना परीचा मनुष्य स्वर्ण को पीतल एवं पीतल को स्वर्ण समझ धोखा खा बैठा है। ठीक यह कहावत हमारे लिये चरितार्थ होती है। हम आपके ऋण से उऋण हो ही नहीं सके क्योंकि आपने केवल हमारे जामात को ही जीवनदान नहीं दिया पर हम सब अज्ञानता के पुतलों को ज्ञान मार्ग का दिगदर्शन करा दिया-हमें भवोभव के लिए सुखी बना दिया-कर्त्तव्य च्युत होते हुए हमको कर्तव्य पथ दिखा दिया-इत्यादि अनेक उच्च शब्दों में राजा ने सरिजी के गुणों का गान किया और अन्त में नत मस्तक हो राजा ने प्राचार्य श्री से प्रार्थना की "हे भगShree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ३९ ] वन् ! हम सब लोग जैन धर्म स्वीकार करने को तैयार हैं कृपाकर हमको जैनी बनाकर हमारा उद्धार कीजिए"।
प्राचार्य देव ने कहा“जहां सुख्खम्" इस सुअवसर पर निभ्रान्त व्योम भांति भांति की ध्वनि करने लगा। विमानों से विद्याधर एवं नर नारिये अपने सुकोमल कण्ठ से गुण गान करते हुए गुरुदेव के पादपद्मों में पुष्प वृष्टि करने लगे-तत्तण आकाश मण्डल देव दुन्दुभिनाद से प्रानन्दालाप करने लगा और रटने लगा प्राचार्य के अनुपम गुण। देखते देखते ही अंबिका, चक्रेश्वरी, पद्मावती और सिद्धायिकादि देवियों ने सूरिजी के शुभ वन्दनार्थ पाकर श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया। इन अलौकिक दृश्यों के अवलोकन मात्र से ही राजा मंत्री तथा दर्शक गण पाषाणमूर्तिवत् होगए और मनहीमन सोचने लगे "अहो हम कितने अभागे हैं कि ऐसे मुनि रत्न को कंकर समझ कर उनकी अवज्ञा की इस प्रकार की हमारी निष्ठुरता • कितनी निन्दनीय है-हम इस घोर पाप से कब मुक्त
हो सक्त हैं ? इस प्रकार के अनेकानेक क्षण भंगुर से विचार उनके हृदयों में उत्पन्न होते और मन ही मन विलीन हो जाते-क्षमा याचना के लिए प्रयास करने पर लज्जास्पद बालक की भांति बोलते २ उनके प्रोष्ठ बन्द होजाते थे।
राजा, मन्त्री, और सब जन, जैन धर्म को स्वीकार करने के लिए अति आतुर हो रहे थे-उनकी इतनी उत्कट उत्कण्ठा थी कि लोगों ने अपने गलों से जनेऊ को तोड़ तोड़ कर आचार्य श्री के चरणों पर न्योछावर
कर दी और हाथ जोड़ कर नम्र भाव से प्रार्थना करने Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ४० ] लगे कि हे भगवन् ? हम अनाथों को आपने सनाथ बना दिया-हमारी इस डूबती हुई नाव के खेवैये बन कर हमारा उद्धार किया है आप ही हमारे देव और आप ही हमारे गुरु हैं। आप ही हमारे धर्मदाता और आपके वचन ही हमारे लिए शास्त्र हैं-भगवन् ? हम हमारी अन्तरात्मा से प्रण करते हैं कि आज से हम आपके अनुयायियों के सच्चे उपासक बन गये हैंयावत् सूर्योदय, प्राची के निरभ्र कोने से होगा और चन्द्रमा प्राकाश में स्थित रहेगा पृथ्वी सहनशीलता की देवी बनी रहेगी-नभोमण्डल सत्य के सहारे स्थिर रहेगा; तावत् हमारो सन्तान जैन धर्म की उपा. सना करेगी और आप जैसे प्राचार्यों की सेवा करती
रहेगी।
इसी समय चक्रेश्वरी देवी रत्न जडित सुवर्ण थाल के अन्दर वासक्षेप लेकर आचार्य रत्नप्रभ सूरि के समक्ष उपस्थित हुई। प्राचार्य देव ने, उपस्थित राजा मन्त्री और नागरिक अर्थात् राजपुत्र, ब्राह्मण वैश्य आदि सवा लक्ष *
सपादलक्ष श्रावकाणां प्रतिबोधः कृतः । भावुकों को पूर्व सेवित मिथ्यात्व की आलोचना करा
केपटावल्यान्तरों में श्रावकों की संख्या ३८४००० की भी बतलाई है शायद इसका कारण यह हो कि प्रारम्भ में १२५००० ही हो और पश्चात उपकेशपुर के आस पास भ्रमण कर और भी अजैनों को जैन बनाया हो उन सबकी संख्या ३८४००० की हो तो यह बात सम्भव
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[ ४१ ] के तथा समकित गृहण योग क्रियाकरवा के महाऋद्धि सिद्धि संयुक्त विधि पूर्वक वासक्षेप द्वारा शुद्धि कर उन भिन्न भिन्न जाति और वर्षों के अन्दर टूटे हुए शक्ति तंतुओं को एकत्र कर भेद भावों को मिटा कर "महाजन संघ की स्थापना की अर्थात् प्रेमरूपी सूत्र में शामिल कर समभावी बनाए । उस समय अन्य देवियों के साथ चामुण्डा देवी भी उपस्थित थी और उस पवित्र कार्य के समय वह सहसा बोल उठी कि हे भगवन् ? माप इन सब लोगों को जैन बनाते हैं यह तो बहुत अच्छा है पर यह ध्यान में रहे कि इनके जरिये जो मुझको कड्डका मड्डका मिलते हैं वह न छुड़ावेंगे तो मैं आपकी बड़ी कृपा समझूगी । इस पर प्राचार्यदेवने बड़े ही कोमल शब्दों में कहा कि तथास्तु, देवि ।
तदनन्तर आये हुए विद्याधरों ने राजा उत्पलदेवादि को उत्साह पूर्वक अनेकों धन्यवाद दिया और उस स्वर्ण समय की शोभा बढाने का और भी भरसक प्रयत्न 'किया। विद्याधरों ने राजादिको कहा कि हे राजन् ? आप अपने को धन्य भाग समझिए आपका प्रबल पुण्योदय है कि ऐसे पवित्र महात्माओं का साक्षात्कार हो पाया है। अब हमें पूर्ण विश्वास है कि आप लोग अपने स्वी. कृत अमूल्य धर्म के साधनों का पालन करते हुए आत्मकल्याण करेंगे और अधर्म पाखण्ड का मोह सर्वथा नष्ट करेंगे। तब राजा ने उन महानुभावों के शब्दों की सराहना कर धन्यवाद दिया और अपने वहां रहने के लिये बहुत आग्रह किया। इस पर नूतन स्वधर्मी भाइयों का उत्साह वृद्धि के लिये उन्होंने स्वीकार कर मापस में वात्सल्यता बतला कर सूरीश्वरजी के चरण कमलों में
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[ ४२ ] वन्दन कर विद्याधर व देव देवो वहां से विसर्जन हो अपने स्थान पर पहुंच गये।
हमारे चरित्र नायक आचार्य श्री रत्नप्रभसूरिने उपकेशपुरमें अनेक अजैनों को जैन बनाकर महाजनवंश' की स्थापना की आगे चल कर उपकेशपुर से अन्य स्थान में जाने के कारण वे उपकेशवंशी कहलाये और उपकेशपुर नगर का अपभ्रंस नाम अोशिया होने से वे उपकेशवंशी ओसवालों के नाम से प्रख्यात हुए उपकेश वंश अर्थात् प्रोसवालवंश पर प्राचार्य श्री का कितना उपकार है वह न तो मुह से कहा जाता है और न इस लोहा की तुच्छ लेखनी से लिखा भी जाता है। जो मांस मदिरा और व्यभिचार सेवन कर नरक के रास्ते जा रहे थे उनको सद्धर्म में स्थिर कर स्वर्ग मोक्ष के अधिकारी बनाया वह भी एक ही आदमी को नहीं पर वंश परम्परा के लोगों के लिये। अहो! यह कितना उपकार है। यदि हम उस प्रातः स्मरणिय महात्मा का स्मरण न करें तो हम कितने कृतघ्नी हैं। हमारी इस विभिन्नता का दूसरा नाम है अधम्मता । यही हमारे हृदय की दूषित वायु जैनधर्म अथवा ओसवाल जाति का पतन को कारण मात्र हुई है।
सज्जनों ! हताश न होइए यह सव काल चक्र का ही प्रभाव है। खैर ! परन्तु अभी भी तुम्हारे लिये समय है यदि तुम उस घोर अज्ञानता के मद मतंग न होकर शुद्ध सनातन धर्म के प्रवर्तकों के बतलाये हुए साधनों से अपने हृदय की दुषित वायु को एक सच्चा स्वरूप देकर अापना महोदय कोजिये।
आप जानते हो कि संसार में कृतघ्नता के बराबर
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[ ४३ ] कोई पाप नहीं है कृत उपकार को भूल जाना ही कृतघ्नता है मेरा खयाल से आज इस ज्ञाति की छिन्न भिन्न दशा का मुख्य कारण कतघ्नता ही हैं। अतएव ओसवालों का ही नहीं पर जैन समाज के एक एक बच्चे का कर्तव्य है कि वे अपने परोपकारी गुरु वर्य का प्रत्येक वर्ष बडा ही समारोह से जयन्ति महोत्सव मना के अपने को कृतार्थ बनावें ।
क्या उन महात्माओं के हृदय में कभी ऐसे विद्रोहत्मक भावों का आविष्कार हुआ होगा-कि जैसे आज आप लोग धर्म के नाम पर वाडावन्धी पक्षापक्षी और संकुचित विचारादि अनेकानेक अत्याचार कर रहे हैं ? क्या उन्होंने स्वप्न में भी ऐसा विचार किया होगा? कि जो हम भिन्न २ जाति अथवावर्गों को एक प्रेम सूत्र में गठित कर रहे हैं वह पुनः कालान्तर में विभिन्न एवं छिन्न भिन्न हो कर खण्डित हो जायगा ? कदापि नहीं। सज्जनो! इस विभिन्नता के कारण अन्य लोगों ने आपका प्रेम ऐक्यता व सम्पत्ति को खूब लूटा । फिर भी आप तो कुम्भकर्ण की भांति अचेतावस्था में निद्रा देवी की गोद में पड़े हुए हैं। अतएव अब समय व्यर्थ खोने का नहीं है समय पुकार पुकार कर कहता है कि सावधान हो कर धर्म के नाम की बलिवेदी पर बलिदान हो जाइये।
प्राचार्यश्री ने उन अजैनों को जैन बना कर ही वहां से प्रस्थान न कर दिया था पर उस नवीन स्थापित समाज को दृढता के सूत्र सम्बद्ध करने के हेतु रत्नप्रभसूरिजी ने अनेक ग्रन्थों का निर्माण किया। उन नवीन कृत श्रावकों को धर्म के तत्वों का भली भांति परिचय दे कर उनके विधि विधानों को बतलाया।
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[ ४४ ] उस समय वाममार्गियों के अखाड़े टूट जाने से उन्होंने बहुत उत्पात मचाया। बहुत लोगों को बहम में डाल कर बहकाया परन्तु जहां सूर्य का प्रचण्ड प्रकाश होता है वहां बिचारा आगिया कौन गिनती में गिना जाता है। जो शूद्र लोग अपठित और मांस मदिरा, व्यभिचारादि के कीचड़ में पड़े हुए थे वे ही लोग वाममार्गियों के पंजे में फंसे रहे।
प्राचार्य देव उन नूतन श्रावकों को तात्विकज्ञान और धर्म क्रिया का अभ्यास करवाने में संलग्न थे और श्राद्ध वर्ग भी प्राचार्य देव की उत्साह पूर्वक सेवाभक्ति करने में अपने जीवन की सफलता समझने लगे।
पाठकों ? अब मैं महावीर मन्दिर का भी थोडासा हाल सुना देना समुचित समझता हूँ। आप जानते ही हैं कि जहां विशाल समाज हो वहां उनके सेवा पूजा अर्थात् आत्म कल्याणार्थ मन्दिर की भी परमावश्यक्ता रहा करती है। अस्तु उपकेशपुर में महावीर मन्दिर की पाश्चर्य पूर्वक घटना इस प्रकार से हुई कि___ "पूर्व प्रेष्टिना नारायण प्रासादं कारयितुमारब्धं, स दिवसे करोति रात्रौ पतति"
प्राचार्य श्री के आगमन के पूर्व उपकेशपुर में जहड़ मन्त्री नारायण का एक मन्दिर बनवा रहा था। पर वह दिन में बनावे और रात्रि में गिर जावे। इसका कारण ऊहड़ श्रेष्टिने कई दर्शनियों से पूछा परन्तु ठीक उत्तर किसी ने भी न दिया उस हालत में श्रेष्टि ने
“रत्नप्रमाचार्य प्रष्टवान् भगवन् ! मम प्रासादो रात्रौ पतति । गुरुणा पोक्तं कस्य नामन कारयतः ?
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[ ४५ 1 नारायण नामेन । एवं नहि महावीर नामेन कुरू मंगलं भविष्यति ।"
सूरीश्वरजी से अर्ज की कि हे विभो ? मेरा मन्दिर दिन में बनाया जाय वह रात्री में क्यों गिर जाता है ? आचार्यश्री ने पूछा कि तुम मन्दिर किस के नाम का बनाते हो । मन्त्री ने उत्तर दिया कि नारायण के नाम का । सूरिजी ने अपने ज्ञानबल से सब हाल जान कर कहा कि यदि तुम महावीर के नाम का मन्दिर बनाओ तो इस में किसी प्रकार का उपद्रव न होगा और यह मंगलमय कार्य पूर्ण हो जायगा। मंत्री ने सूरिजी के वचनों पर विश्वास रख महावीर के नाम से मन्दिर बनाना प्रारम्भ किया और गुरू कृपा से किसी प्रकार का उपद्रव नहीं हुआ । मन्दिर को शीघ्र ही तय्यार करवाने का प्रयत्न होने लगा ।
आचार्य श्री के उपदेश से महाराजा उत्पलदेव ने भी पास की एक पहाड़ी पर भगवान् पार्श्वनाथ का विशाल मन्दिर बनाना प्रारम्भ किया । ( जो आज देवी का मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है ) ।
अन्यदा चामुण्डा देवी ने आचार्य श्री के चरणों में अर्ज करी कि हे भगवन् ! इस मन्दिर के योग्य मैं पहिले से ही लूपाद्रि पहाड़ी के पास मन्त्री की गाय का दूध और वेलू रेती से महावीर प्रभु की प्रतिमा बना रही हूँ और वह छः मास साढे सात दिन में सर्वांग सुन्दर तय्यार हो जाय तब ही उन्हें निकाले पहले नहीं । मन्त्रोश्वर ने अपनी गाय का दूध कम होने का कारण गोपाल से पूछा उसने तलाश कर के कहा
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ने लाने भीत से लोग
[ ४६ ] कि एक कैर का झाड़ के पास गाय जाती है तव द्ध स्वयं भर जाता है। मंत्री ने बहुत से लोगों से इसका कारण पूछा पर किसी ने भी ठीक उत्तर नहीं दिया तब मन्त्रीश्वर ने सूरीश्वरजी के पास प्राकर अर्ज की। सूरिजो ने सब हाल जो कि देवी ने कहा था कह सुनाया इस पर तो मंत्रीश्वर को महावीर प्रभु के दर्शन की बड़ी उत्कण्ठा हुई और आचार्यश्री से अर्ज की कि आप पधारिये और हम सबको महावीर भगवान के दर्शन कराइये। प्राचार्यश्री ने कहा कि अभी सात दिन की देरी है इसलिये जरा धैर्य रखो । परन्तु जनता के लिये सात दिन तो क्या पर सात घड़ी भी निकालना असह्य हो गया । राजा एवं प्रजा सब लोग इतने तो उत्सुक बन गये कि वे अपनी ओर से असंख्य नर, नारियों, हस्ती अश्व, रथ, पैदल और गाजे बाजे आदि वरघोड़े की सब सामग्री तैयार कर प्राचार्यश्री के पास आकर श्रामन्त्रण किया कि हे प्रभो ! पधारिये और हम सब लोगों को प्रभु महावीर का दर्शन कराइये? इस पर सूरिजी ने फरमाया कि"प्राचार्यैःप्रोक्तंअद्यापिकिंचित्प्रसंपूर्ण बिंब विलम्बस्व।" ___ अभी कुछ धैर्य रखो बिंब तैयार नहीं हुआ है। "श्रोष्टनापोक्तंगुरुणांकरप्रसादात्संपूर्णं भविष्यति' ___ श्रेष्टि ने कहा कि आपकी कृपा से सब कुछ अच्छा और कल्याणकारी होगा। श्रीसंघ की तीव्र अभिलाषा है और सब सामग्री भी तैयार है अब वीर प्रभु के दर्शन करवाने में देरी न हो इत्यादि अत्याग्रह और उन खोगों का उत्साह देख कर इस बात को सूरिजी ने
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[ ४७ ]
भवितव्यता पर छोड़ दी और आप अपने शिष्य समुदाय को साथ ले उस श्रीसंघ में शामिल होगये और क्रमशः चल कर घटना स्थल पर आये । बड़े ही उत्साह और भक्ति पूर्वक प्रभु महावीर के बिम्ब को भूमि से निकाला जिस के दर्शन करते ही जनता का हर्ष और उत्साह का पार न रहा । सुवर्णाक्षत का स्वस्तिक किया और नाना रत्न मणि मुक्ताफल से प्रभु को वधाया आकाश से पंचवर्ण पुष्पों की वृष्टि हुई मन्द मन्द सुगन्ध वायु चलने लगा दिशांए प्रसन्नता प्रकट करने लगी जय जय शब्द से आकाश गूंज उठा चारों ओर से बाजों का गगन भेदी नाद होने लगा । प्रभु के बिम्ब को गजारूढ करवा के बडी निजर न्योछारावल पूर्वक बड़े ही समारोह के साथ महा महोत्सव करते हुये भगवान् को नगर एवं मन्दिर में प्रवेश
करवाया ।
महावीर मूर्ति यों तो सर्वांग सुन्दर ही थी परन्तु लोगों की आतुरता से सात दिन पूर्व भूमि से निकाल लेने के कारण उन के हृदय स्थल पर निंबुफल प्रमाण दो गांठें रह गई कहा भी है
.
" किंचिदुनैर्दिने निष्कासितः निम्बुफल प्रमाण हृदयस्य ग्रन्थीद्वय सहितं ।”
ठीक ही है भवितव्यता किसीके टाले नही टलती । अब तो लोगों के मन मन्दिर में प्रतिष्ठा शीघ्र करवाने की उत्कण्ठा ने खूब ही जोर पकड़ा मुख्य मुख्य लोगों ने आचार्य श्री के समीप जाकर नम्रता पूर्वक अरज की कि हे प्रभो ? कृपा कर इस मन्दिर की प्रतिष्ठा का
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[ ४८ ] शुभ मुहुर्त नज़दीक निकालिये कि हमारे मनोरथ शीघ्र सिद्ध हो।
सूरिजी ने भी शुभ कार्य में विलम्ब न करने को युक्ति को सोच कर अपने ज्ञान बल से " माघ शुक्ल पंचमी" का सर्वांग शुद्ध और निर्दोष मुहुर्त बतलाया । श्राद्धवर्ग ने "तथास्तु" कह कर शिरोधार्य किया।
फिर तो देरी ही क्या थी लगे लोग प्रतिष्ठा की सामग्री एकत्र करने को। इधर उपकेशपुर में घर घर तो क्या पर प्रत्येक मनुष्य के हृदय में उत्साह की अजब लहरे पैदा होती दृष्टी गोचर होने लगी। उधर आचार्य श्रीकी आज्ञा लेकर जो ४६५ मुनियों ने विहार किया था उन्होंने कोरंटपुरनगर में चतुर्मास कर जनता पर बड़ा भारी उपकार किया और कोरंटपुर में श्रीसंघ की ओर से एक महावीर का नूतन विशाल मन्दिर बनवाया जिसकी प्रतिष्ठा का मुहुर्त भी माघ शुक्ल पंचमी का मुकर्रर हुआ।
"तेनावसरे कोरंटकस्य श्राद्वानां श्राह्वानं आगताः भगवन् प्रतिष्ठार्थमागच्छ”
कोरंटनगर के मुख्य मुख्य लोग सूरिजी को आमन्त्रण करने के लिए इस गरज से आये कि प्रतिष्ठा के सुअवसर पर आप हमारे यहां पधार कर प्रतिष्ठा करावें और उन्होंने विनय के साथ यही सूरिजी से अर्ज करी? इस पर प्राचार्यश्री ने फरमाया कि इसी मुहूर्त में यहां प्रतिष्ठाहै फिर इस हालत में मैं कैसे प्रासकूँगा । इस पर श्रावकों ने कहा कि खैर ! हम लोग तो आपके गुरुवर्य केबनाये हुए श्रावक हैं और यहां के श्रावक आपके बनाए हुए हैं।
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[.४९ ] इसलिए हम आशा ही क्यों रखें कि आप इन श्रावकों को छोड़ हमारे यहाँ पधारे।
“गुरुणा कथितं मुहूर्तवेलायां श्रागच्छामि'
गुरुदेव ने फरमाया कि तुम नाराज़ क्यों होते हो मैं मुहूर्त के समय वहां आकर प्रतिष्ठा करवा दूंगा, तुम सब सामग्री तैयार रखना। यह सुनके कोरंट के श्रावकों को बड़ी खुशी हुई और अपने अविनय की क्षमा मांग कर सूरिजी को वन्दन कर पुनः कोरंट नगर आये और सब तरह की सामग्री तैयार करने में जुट गये । क्रमशः माघशुक्ला पंचमी के शुभमुहूर्त में
"निज रूपेण उपकेशपुरे प्रतिष्ठा कृता वैक्रिय रूपेण कोरंटके प्रतिष्ठा कृता, श्राद्धैः द्रव्यव्ययः कृतः "
प्राचार्य श्री ने निज रूप से उपकेशपुर में और वैक्रिय रूप से उसी लग्न में कोरंटपुर में भी प्रतिष्ठा करवाई। (ऐसा क्यों न हो क्योंकि आपने विद्याधर कुल में जन्म लिया और आप अनेक विद्याओं के पारगामी भी थे) और दोनों महोत्सवों में श्रावक वर्ग ने बड़े ही उत्साह पूर्वक पुष्कल द्रव्य व्यय कर जिन शासन की प्रभावना के साथ स्वात्मकल्याण किया । धन्य है ऐसे लब्धि सम्पन्नाचार्यों को कि जिन्होंने मरुभूमि में जैनधर्म का एक कल्पवृक्ष लगा दिया कि जिन के मधुर फल आज पर्यन्त जैन समाज आखादन कर रहा है। इस युगल प्रतिष्ठा के समय के विषय में प्राचीन पहावलियों में उल्लेख मिलता है कि वीरात् ७० वर्ष में यह प्रतिष्ठाएँ हुई थीं यथा
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[ ५० ] “सप्तत्या (७०) वत्सराणं चरमजिनपतेर्मुक्तजातस्य वर्षे । पञ्चम्यां शुक्लपक्षे सुरगुरु दिवसे ब्रह्मणः सन्मुहूर्ते ॥ रत्नाचार्यैः सकल गुणयुतैः सर्वसंघानुज्ञातैः। श्रीमद्वीरस्य बिम्बे भवशतमथने निर्मितेयंप्रतिष्ठा ॥१॥"
उपकेशे च कोरंटे तुल्यं श्री वीर बिंबयोः । प्रतिष्ठा निर्मिता शक्त्या श्रीरत्नप्रभसूरिभिः ॥१॥
इस प्राचीन लेख से स्पष्ट होता है कि वीर प्रभु के निर्वाण के बाद ७० वर्ष में यह प्रतिष्ठा हुई थी बात भी ठीक है कि रत्नप्रभसूरि श्रीपार्श्वनाथ के छठे पट्टधर थे उनका समय ठीक मिलता ही है। इन मन्दिरों की प्रतिष्ठा होने से उन नूतन श्रावकोंकी श्रद्धा दृढ़ (मजबूत) हो आई और धर्म करने में वे लोग खूब आगे बढ़ने लगे। श्री संघ में अन्न धन तन सुख शान्ति तप तेजादि की सब तरह से वृद्धि होने लगी, क्यों न हो जब कि ऐसे प्रभावशाली प्राचार्य के कर कमलों से शुभ लग्न में प्रतिष्ठा हुई थी। फिरभी समर्थ पुरुषोंके सामने जितने जटिल प्रश्न उपस्थित होते हैं उतने ही अच्छे हैं क्योंकि वे उन प्रश्नों को आसानीसे हल कर सकते हैं। प्राचार्य रत्नप्रभसूरी के सामने भी एक ऐसा जटिल प्रश्न प्रा पड़ा कि जिसको हल करने में आपको बड़ा भारी परिश्रम उठाना पड़ा । पर उनका मधुर फल आज भी हम परम्परा से अानन्द पूर्वक आखादन कर शुभगति के अधिकारी बन रहे हैं।
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[ ५१ ] बात यह बनी कि वीरं निर्वाण पश्चात् ७० के श्रावण मास में उपकेशपुर के क्षत्रियादि अजैनों को जैन बनाया, यह बात वाममार्गियों को तो खूब ही खटक रही थी पर प्राचार्य श्री के सामने उनका कुछ भी जोर नहीं चला; राजा और प्रजा अहिंसा धर्म के कट्टर अनुयायी बन गए थे।
दिन निकलते आश्विन मास का दसहरा (नौरात्री) नज़दीक आने लगा। उपकेशपुर में परम्परा से यह कुप्रथा चली आ रही थी कि घर पीछे भैंसा और मनुष्य पीछे बकरे का बलिदान चामुंडादेवी को दिया जाता था। जब दसहरा ( नौरात्रि) नज़दीक आने लगा तो वाममार्गियों ने हल्ला मचाया कि अहिंसा के उपासक देवी को बलिदान देंगे या नहीं ? इस पर श्रावक लोग भी बड़े ही विचार में पड़े कि अब क्या करना ? वे सब मिल के प्राचार्य श्री के पास आये और अर्ज करने लगे कि यदि चामुन्डा देवो को बलिदान न दिया जाय तो
“सा कुटुम्बान् मारयति" देवी हमारे सब कुटुम्ब को मारदेगी। इस पर प्राचार्य श्री ने फरमाया कि तुम क्यों घबराते हो?
"पुनराचार्यैः प्रोक्तं अहं रक्षां करिष्यामि" __ मैं आपकी रक्षा करूँगा। भला इतना तो आप स्वयं समझ सकते हो कि मनुष्य भी उन घृणित पदार्थों (मांसादि) से नफरत करते हैं तो फिर देव देवी उनको कैसे स्वीकार करेंगे? यह तो मांसाहारी लोगों ने निज स्वार्थ के लिए कुप्रथा चलाई है और व्यन्तरादि देवों के. Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ५२ ] कुतूहल मात्र करने में असंख्य मूक प्राणियों के जीवन को नष्ट कर देते हैं इत्यादि सूरिजी के वचन सुन कर उनको विश्वास तो हुआ परन्तु चिरकाल के संस्कार होने से उनके दिल से घबराहट निकल नहीं सकी। इस पर सूरीश्वरजी ने कहा कि यदि आपको देवी का पूजन ही करना हो तो सात्त्विक पदार्थ जैसे लड्डू खाजे गुलरसादि फल फूल वगैरः बहुत पदार्थ हैं कि जिनसे पूजा कर सकते हो। श्राद्ध वर्ग ने वे ही पदार्थ बनवाकर सूरिजी से अर्ज की कि भगवान् !ापहमारेसाथ पधारिये। इस पर स्याद्वाद के समुद्र और उत्सर्गोपवाद के परमज्ञाता श्रावकों के साथ देवी के मन्दिर में पधारे । श्रावकों ने वह पूजा सामग्री देवी के सन्मुख रख दी। देवी उसे देखते ही आग बबूला हो उठी और खड़ग लेकर श्रावकों के सामने देखने लगा, इतने में तो सूरीश्वरजी दीख पड़े और प्राचार्य श्री ने कहा"प्राचार्यैः प्रोक्तं देवि ? कडडकं मड्डकं दत्तमस्ति"
हे देवी? यह श्राद्ध वर्ग आपको कड़के मड़के दे रहे हैं आप इसको खीकार करें। इस पर देवी ने कहा, भगवन् !
__ "ततः प्रोक्तं प्रभो ? मया अन्यं कड़कं मड़क याचितं, अन्यं दत्तं"
हे विभो? मैंने कुछ अन्य याचना की (मांस मदिरा) और आपने कुछ और ही दिया है। मैं इनसे सन्तुष्ट नहीं हूँ। इस पर प्राचार्य देव ने फरमाया कि हे देवी! पूर्व जन्म में तो तुमने बहुत जीवों की रक्षा प्रादि सुकृत किया है जिससे तुमको देवयोनि मिली है परन्तु केवल
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[ ५३ ] कुतूहल के लिए अनेक प्राणियों के प्यारे प्राणों का नाश करवाती हो तो न जाने भविष्य में तुमको कैसी गति मिलेगी परन्तु यह निश्चय समझ लेना कि इस घोर पातक का फल परम्परा नरक ही है इत्यादि बोध वचनों के कहने से देवी वापिस कुछ भी उत्तर नहीं दे सकी पर उसके अन्तर का रोष नहीं गया। श्रावक लोग तो देवी की पूजन कर वहाँ से चले आए तत्पश्चात् सूरिजी भी अपने निवासस्थान पर पधार गये।
देवी चामुण्डा ने सोचा कि कलिकाल के प्रारम्भ में ही यह बात ? जिन महात्मा को मैंने विनती कर यहाँ रखा इतना उपकार कराया परन्तु उन्होंने तो मेरा भक्ष्य ही छुड़वा दिया खैर ! इसका बदला तो अवश्य लेना चाहिए।
"एकदा छलं लब्ध्वा देव्या प्राचार्यस्य काल वेलायां किंचित् स्वाध्यायादि रहितस्य वामनेत्र भूरधिष्टिता वेदना च संजाता"
किसो अकाल के समय सूरिजी स्वाध्यायध्यान रहित थे, देवी ने उस अवसर को देख आचार्य श्री के नेत्र में वेदना करदी वह भी असह्य परम दारुण कि साधारण मनुष्य उसको सहन भी नहीं कर सकता, पर प्राचार्य देव ने तो उसे अपना पूर्व संचित कर्म समझ सम्यक प्रकारेण सहन किया।
जब चक्रेश्वरी अंबिका पद्मावती और सिद्धायकादि देवियां सूरिजी को बन्दन करने को आई तो सूरिजी के नेत्र में अतुल वेदना देखी उन्होंने अपने अतिशय ज्ञान द्वारा जाना कि यह बेदनाचामुंडा ने की है तो शीघ्र
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[ ५४ ] उसको बुलवा कर तिरस्कार शब्दों से इस कदर ललकारी -फटकारी कि हे पापिनी! ऐसे महान् उपकारी गुरुदेव ने तुझपर बड़ा भारी उपकार किया । जो तूं घोर हिंसा से नरक के कर्म बान्ध रही थी उससे बचाने का क्या यही फल है ? इत्यादि वचन श्रवण कर चामुंडा ने लज्जित हो कर प्राचार्यदेव के चरण कमलों में शिर झुकाकर अपने अपराध को माफी मांगी।प्राचार्यश्री ने प्रसन्नचित्त होकर चामुंडा देवी को मधुर और रोचक शब्दों में ऐसा प्रभावशाली उपदेश दिया कि देवी के हृदय से चिरकालीन मलीनता रफ्फूचक्कर हो गई जैसे सूर्य के प्रकाश से चोर भाग छुटत हैं । देवी अपने कुकृत्य का मन ही में पश्चाताप करने लगी तत्पश्चात् देवी ने मिथ्यात्व का त्याग कर आचार्यदेव के समीप सम्यक्त्व रत्न को धारण कर लिया।
"श्रीसच्चिकादेवी सर्वलोक प्रत्यक्ष श्रीरत्नप्रभाचार्य प्रतिबोधिता श्रीउपकेशपुरस्थित श्रीमहावीर भक्ता कृता सम्यक्त्व धारिणी संजाता" ___ सर्व देवी देवता और मनुष्यों के सामने आचार्य श्री ने चामुंडादेवी कोउपकेशपुर स्थित भगवान महावीर की भक्ता बनाई और देवी अपने वचन पर सत्य रहने से सूरिजी ने इसका नाम सच्चिया रक्खा तत्पश्चात् देवी ने सूरिजी से कहा भगवन् ?
"प्रास्तां मांसं कुसुमम पि रक्तं न इच्छामि" हे दयालो ? आज पीछे मांस तो क्या पर लालरंग के फूल तक को भी मैं नहीं चाहूँगी । देवी ने जन समूह Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ५५ ]
के सामने यह भी विश्वास दिलाया कि यदि महावीर देव का पूजन और आचार्य श्री या इनकी वंश परम्परा सन्तान की सेवा उपासना जो लोग करते रहेंगे मैं कुमारी कन्या के शरीरमें अवतीर्ण हो उन भक्तों के दुःख दारिद्र को चकनाचूर कर मनोकामना पूर्ण करूंगी. कहा है कि
"कुमारिका शरीरे श्रवतीर्णासती इति वक्ति भो मम सेवकाः ! श्रत्र उपकेशपुरस्थं स्वयंभू महावीर विम्बं पूजयति श्रीरत्नप्रभाचार्यं उपसेवति भगवतः शिष्यं प्रशिष्यं वा सेवति तस्याहं वशं गच्छामि तस्य दुरितं दलयामि तस्य पूजां चित्ते धारयामि एतानि शरीरे अवतीर्णा सा कुमारी कथयति श्री सच्चिका देव्या वचनात् क्रमेण श्रुत्वा प्रचुरः जनाः श्रावकत्वं प्रतिपन्नाः”
देवी के पूर्वोक्त वचन श्रवण करके और भी बहुत से लोग जैन धर्म स्वीकार कर श्रावक बन गये ।
हो ! यह कैसा श्रात्मिक बल एवं पुरुषार्थ ? हो ! यह कैसा दिव्य चमत्कार एवं शक्ति ? श्रहो ! यह कैसी उपकार की पराकाष्ठा ? श्रहो ! यह कैसी धर्म प्रचार की उत्कण्ठा ?
आचार्य श्री रत्नप्रभसूरि और उनके शिष्य समुदाय ने उसी प्रान्त में भ्रमण कर मिथ्यात्व प्रवृत्ति को समूल नष्ट कर जैन धर्म का प्रचुरता से प्रचार किया ।
इधर महाराजा उत्पलदेव पहाड़ी पर प्रभु पार्श्वनाथ का मन्दिर बना रहे थे वह भी तैयार हो गया
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[ ५६ ] जिसकी प्रतिष्ठा भी प्राचार्य श्रीके करकमलों से बड़ेही समारोह के साथ करवाई गई। वह मन्दिर आज पर्यन्त विद्यमान है पर कई असौ से इस नगर में जैनों के न होने के कारण अन्य लोगों ने पार्श्वनाथ की मूर्ति उठाकर उसके स्थान में देवी की मूर्ति स्थापन करदी है इस विषय में मेरा लिखा “जैन जाति महोदय" नामक ग्रन्थ अवश्य देखना चाहिये।
प्राचार्य रत्नप्रभसूरिने अपने जीवनका अधिक भाग अजैनों को जैन बनाने में ही व्यतीत किया पहावलियों से ज्ञात होता है कि प्राचार्य श्री ने अपनी जिन्दगी में चौदह लक्ष अजैनों को जैन धर्म का परमोपासक बना के"अहिंसा परमोधर्म:" का प्रचुरतासे प्रचार किया और अनेक मन्दिर मूर्तियों की प्रतिष्ठा करवा के मरुस्थल प्रदेश में जनता के कल्याण के लिये कल्पवृक्ष लगा दिया । धन्य है ऐसे लोकोत्तर महापुरुषों को।
महाराजा उत्पलदेव ने प्राचार्य श्री की अध्यक्षता में मरुधर प्रान्तसे शāजय गिरनारादि तीर्थोकी यात्रार्थ एक विराट संघ निकाला जिसमें मनुष्यों की संख्या पञ्चलक्ष की कही जाती है और ऐसा होना असंभव भी नहींहै कारण यहपहले पहलही पवित्र धर्मकार्य था और उस समय जनता का उत्साह भी ऐसा ही था तीर्थयात्रा करने की सब के दिल में एक सी लगनथी भला ऐसी हालत में यात्रा से वंचित रहना कौन चाहता ? इस संघका वंशावलियों में विस्तृत वर्णन किया गया है यहां तक कि यात्रार्थ पधारने वाले स्वधर्मि भाइयों को सुवर्ण के थालों की प्रभावना देना भी लिखा है बात भी ठीक है उस समय भारत बड़ा ही समृद्ध था Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ५७ ] और धर्म की प्रबल भावना सब के दिल में असाधारण थी।
सज्जनों ! प्राचार्य रत्न प्रभसूरि ने उपकेशपुर नगर में जो महाजनवंश की स्थापना की वह बहुत अरसेतक तोउसी नामसे चलता रहा पर बाद कई कारणोंसे उपकेशपुर के लोगोंने अन्य स्थानों में जाकर वास किया । तब लोग उनको उपकेशी कहने लगे-जैसे महेश्वरी नगरी से महेश्वरी, आगरा से अगरवाले खंडवा से खण्डेलवाल इत्यादि अनेक नगरों के नाम से जातियों के नाम उत्पन्न हुए । उपकेशपुर और उसके आस पास विहार करने वाले मुनियों को भी लोग उपकेशगच्छ के नाम से संबोधन करने लगे जैसे वल्लभी से वल्लभीगच्छ, नाणकपुर से नाणावलगच्छ, सांडेराव से सांडरागच्छ, वायटनगर से वायटगच्छ, इत्यादि।।
विक्रम की बारहवीं शताब्दी के आस पास उपके. शपुर का अपभ्रंश नाम श्रोसियाँ हुआ तब से वहाँ रहने वालों का नाम “ोसवंश-ओसवाल" हुआ, तथापि शिलालेखों और ग्रन्थों में तो आजपर्यन्त उपकेशपुर और उपकेशवंश ही लिखा जा रहा है जोकि मूल नाम था। सारांश यह है कि जिस नगर को आज हम प्रोसियाँ कहते हैं उसका मूल नाम उपकेशपुर था
और जिस जाति को वर्तमान में हम ओसवाल कहते हैं उसका मूल नाम उपकेशवंश था।
उपकेशवंश (ोसवाल) की उत्पत्ति स्थान उपकेशपुर (ोसियों) और प्रतिबोधक श्राद्याचार्य श्री रनप्रभसूरि इसमें तो पुराने विचार और नये विचार वाले सब सहमत हैं अब रहा इस घटना का समय इसमें
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[ ५८ ] मतभेद जरूर है जैनाचार्य, जैन ग्रंथ, जैन पहावलियों वगैरह की मान्यता है कि वीरात् ७० वर्ष में यह घटना घटित हुई और इस समयके आस पास के कई प्राचीन ग्रन्थोंके प्रमाण भी मिलते हैं पर नई रोशनी वाले इससे सहमत नहीं हैं उनकी मान्यता इस जाति का उत्पत्ति समय विक्रम की पांचवी शताब्दी से नौवीं दशवीं शताब्दी का है और इस विषय को प्रमाणित करने को आजपर्यन्त कोई ऐतिहासिक साधन भी उपलब्ध हुए फिर भी इस विषय में मैं आपका अधिक समय लेना नहीं चाहता हूँ क्योंकि “ोसवालोत्पति विषय-शंकाओं कासमाधान” नाम की पुस्तक मैंने हाल ही में लिखी है उसको पढ़ने से आप स्वयं समझ के निर्णय कर सकेंगे।
प्राचार्य रत्न प्रभसूरिने इस भूमण्डल पर विहारकर केवल जैन समाज पर ही उपकार नहीं किया पर जैनेतरों पर भी बड़ा भारी उपकार किया है श्राज जैनेतरों में मांसमदिरा भक्षण तक का अभाव है यह प्राचार्य श्रीके उपदेशका ही फल हैं इसलिये जहाँ तक सूर्य चन्द्र आकाश में प्रकाश करे, पृथ्वी सहनशीलता धारण करे, वहाँ तक हम इन महापुरुषों के परमोपकार को किसी हालत में भूल नहीं सकते। यदि भूल जावें तो हमारे जैसा कृतघ्नी संसार भर में कोई न होगा।
प्राचार्य रत्नप्रभसूरिने अपना सर्व श्रायुः८४वर्षों का पूर्ण कर कर्म शत्रुओं को पराजय करने में कारण भूत परम पवित्र शत्रुन्जय तीर्थ पर वीरनिर्वाण सं०८४ के माघ शुक्ल पूर्णिमा के दिन अनेक साधु साध्वी श्रावक और श्राविका के समूह के बीच आलोचना पूर्वक
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[ ५९ ] अनशन व्रत सहित नाशवान शरीर का त्याग कर समाधि पूर्वक स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया। बाद चतुर्विध श्रोसंघ शोक सहित परिनिर्वाण काउस्सग्ग कर आपके पवित्र कार्यों का अनुमोदन किया गया ।
ऐसे धर्म प्रचारक महान् महात्मा का एकाएक चलाजाना जैन समाज को असह्य दु.ख का हेतु था पर निर्दय काल की कुटिल गति के सामने किसका क्या चल सकता है।
प्राचार्य रत्नप्रभसूरि के पट्ट पर महान् प्रभाविक प्राचार्य यक्षदेव सूरि हुए जिन्होंने सिंध जैसी हिन्सक भूमिमें विहार कर वहाँके राजा रूद्राट् एवं उनके कुमार कक और नागरिकोंको उपदेश देकर जैनधर्म का उपासक बनाया । आपके पद पर प्राचार्य ककसूरि हुए आप राजा रूद्राट के पुत्र एवं बड़े हो धर्म प्रचारक वीर थे। आपने कच्छ और सौराष्ट्र देश में जैन धर्म की नींवडाली एवं आपके पट्टपर प्राचार्य देवगुप्त सूरि महाप्रभाविक हुए आपने पांचाल (पंजाब) प्रान्त में पदार्पण कर जैनधर्म का झन्डा फहराया। आपके पट्टपर प्राचार्यसिद्ध सूरि हुए आपका विहार पूर्व बंगाल तक हुआ । आप धर्म प्रचार करने में सिद्ध हस्त थे । जैनधर्म का प्रचार करने में आपने भरसक प्रयत्न किया और इस अलौकिक कार्य में आपको अाशातीत सफलता भी मिली-प्राचार्यरत्नप्रभसूरि, यक्षदेवमूरि, कक सूरि-देवगुप्त सूरि-और सिद्धसूरि इन पांच नाम से आज पर्यन्त उपकेश गच्छ की. वंश परम्परा चली आरही है।
__ जैनियों ओसवालों, पोरवालों, एवं श्रीमालों, ! Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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[ ६० ] यदि आप अपने पतन के कारण को अन्तर्दृष्टि से देखोगे तोश्रापकोस्वयंज्ञात होगा कि हमारे पतन दशा का खास कारण उपकारी पुरुषों के उपकार को भूल जाना अर्थात् कृतघ्नता ही है । अब भी समय है यदि आप अपने पतन को रोक कर उन्नति करना चाहो तो श्रापका सब से पहिला यही कर्तव्य है कि अपने पर असीम उपकार करने वाले प्राचार्य रत्नप्रभसूरि के उपकार स्मरणार्थ प्रति वर्ष माघ शुक्ल पूर्णिमा को इसी भाँति सब लोग एकत्र हो उन महात्मा की जयन्ति मनाकर अपनी प्रात्मा को कृतार्थ होना समझे।।
वर्तमान कृतज्ञता का युग है साधारण व्यक्तियों के अनुयायी आज उनकी जयन्तियों कैसे उत्साह पूर्वक मना रहे हैं जिसको आप आँखों से देख रहे हैं परन्तु उनसे कई हजारों गुणा उपकार करने वाले महापुरुषों के लिये आप उपेक्षा कर रहे हैं क्या यह महान् दुःख की बात नहीं है ? क्या आपके अन्दर धर्म का गौरव नहीं है ? नसों में खून नहीं है ? हृदय में हिम्मत नहीं है ? मगज में बुद्धि नहीं है ? जीव में उत्साह नहीं है ? शरीर में शक्ति नहीं है ? यदि है तो इस वक्त परमेश्वर की साक्षी से प्रतिज्ञा करलो कि हम प्रत्येक वर्ष उन महात्मा के गुण स्मरणार्थ बड़े ही समारोह से जयन्ति मनावेंगे इसको चिर स्थायी रखने को कुछ कोष भी तैयार करना आवश्यक है।
प्राचार्यरत्नप्रभसूरि किसी मत पंथ समुदाय गच्छ और व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं है पर वे सम्पूर्ण विश्व का कल्याण चाहने वाले विशेषकर जैनियों का और खास कर पोसवाल पोरवाल और श्रीमाल जातियों के परमो
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[ ६१ ] पकारी थे अतएव जैनियों के बच्चे बच्चे का कर्तव्य है कि वे अपने हृदय स्थल में उन आचार्यों को उच्च स्थान देकर उनके उपकार को सदैव स्मरण किया करें। यह ही महोदय और उन्नतिका सच्चा साधन है। बस इतना कहकर मैं अपने स्थान को स्वीकार करता हूँ। अल्पज्ञता के कारण किसी प्रकार की त्रुटि हुई हो तो आप सज्जन अपनी उदारता पूर्वक क्षमा करें। ॐ शान्ति
बोलो। भगवान् पार्श्वनाथ की जय। फिर बोलो। प्राचार्य स्वयंप्रभसूरि की जय ॥
और बोलो। प्राचार्य रत्नप्रभ सूरि की जय। जय ओसवाल वंश स्थापक महात्माओं की जय॥ जय बोलो । सत्य धर्म बतलाने वालों की जय ।
1
.ne८..
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सम्वाद
क्या--आपने जयन्ती का व्याख्यान सुना है ? जी हाँ ! कहो--ओसवालों की उत्पत्ति किस प्रकार से हुई ?
महरवान ! यह तो मैं क्या, मेरे बाप-दादा भी नहीं जानते, इस महत्वपूर्ण प्रश्नका उत्तर तो शायद ही किसीने सोचा हो । धन्य है उन महात्माओं को जिन्होंने चार चार मास बिना अन्न-जल सैकड़ों कठिनाइयों का सामना करके भी धर्मवेदी पर आत्म-बलिदानकर उन मांस मदिरा और व्यभिचार सेवित पतित श्राचार वाले क्षत्रियों की शुद्धि द्वारा संगठन कर और उन्हें जैनधर्म में दीक्षितकर आज पर्यन्त हम लोगों पर जो महान् उपकार किया है उससे हम कभी उऋण हो ही नहीं सकेंगे। परन्तु दुःखतो इस बात का है कि हम उल्टा उनके उपकारों को मुला कृतघ्नी बन गए हैं। हमारे पतन का सच पूछा जाय तो यही मुख्य कारण है। --
खैर ! बताइये अब आप क्या करेंगे ? --
हम प्रति वर्ष इसी भाँति जयन्ती महोत्सव मनाकर उन महोपकारी महात्माओं का गुण गान करते रहेंगे।
क्या--यह सत्य कहते हो ? --यदि हाँ तो करो प्रतिज्ञा
मैं परमेश्वर की साक्षी लेकर यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मेरी नसों में जहाँ तक खून का दौरा चलता रहेगा वहाँ तक प्रति दिन एक माला आचार्य श्री रत्नप्रभसूरि के नाम की भी गिनता रहूँगा, और प्रति वर्ष चाहे घर में हो चाहे परदेश में हो, अकेला हो चाहे समुदाय वेष्ठित हो, पर माघ शुक्ल पूर्णिमा को आद्याचार्य की जयन्ती अवश्य मनाऊँगा,
और यही प्रेरणा मेरे सज्जन और कुटुम्बियों से भी करता रहूँगा । __शाबाश ! मित्र ! शाबाश !! श्राप जैसे कृतज्ञ महानुभावों के तुल्य ही यदि सारा श्रोसवाल समाज अपना कर्तव्य समझ ले तो हमारी उन्नति होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है ।
अन्ततः हे ओसवाल सभाओं! सोसाइटियों! मण्डलों: ।
पंचायतिओं ! सम्मेलनों एवं महासम्मेलनों ! आप अपने कार्यों में यदि सफलता चाहते हो, एवं उन्नति के इच्छुक हों तो सबसे पहिले महापुरुषोंके महोपकारों को स्मरण रखने को उनकी जयन्ती मनाने का अपना
एकान्त कर्त्तव्य बनालो-ओं शान्तिः ! ओं शान्तिः !! श्रओं शान्तिः !!! Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat
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ग्रोसवालोत्पत्ति विषयक
शंकाओं का समाधान ।
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ओसवाल जाति की उत्पत्ति - उपकेशपुर (ओशियो ) नगर में आचार्य रत्नप्रभसूरि द्वारा हुई इसमें तो पुराने और नये विचार वाले सब सहमत है पर इस घटना का समय के विषय में थोड़ा बहुत मतभेद अवश्य है कारण जैनाचार्य जैनग्रन्थ जैन पट्टावलियों और जैन वंशावलियों का मत है कि ओसवालों की उत्पत्ति का समय वि० सं० पूर्व ४०० वर्षों का है जब नये विचार वालों का मत है कि इस घटना का समय विक्रम की पञ्चमी शताब्दी के आस पास का है इसी मत भेद का निर्णय प्राचीन एवं अर्वाचीन प्रमाणों द्वारा खूब शोध खोज के साथ किया गया है साथ में आधुनिक कई लोग शंकाएँ करते हैं उनका समाधान भी प्रमाणिक प्रमाणों द्वारा किया गया है आशा है कि पाठक वर्ग इस किताब को एक बार आद्योपान्त पढ़ के अवश्य लाभ उठावेंगे ।
केवल खर्चा का दो आना आने पर पुस्तक भेंट भेजी जायगी
पुस्तक मंगाने के पते
(१) श्री रत्नप्रभाकर ज्ञान पुष्पमाला मु० फलोदी (मारवाड़ )
(२) श्री जैन श्वेताम्बर सभा
मु० पीपाड़ सीटी ( मारवाड़ ) (३) आदर्श प्रेस केसरगंज, अजमेर
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________________ जैन जाति महोदय प्रथम [सचित्र [पृष्ट संख्या 1000 से अधिक चित्र संख्या इस महान् ग्रन्थ में जैन धर्म एवं जैन जातियों पोरवाड, श्रीमाल ) का इतिहास बड़े ही परिश्रम एवं के साथ जैन ग्रन्थों और ऐतिहासिक प्रमाणों से संक गया है / साथ में मगध नरेशों एवं कलिंगाधिपतियों क पार्श्वनाथ तथा भगवान महावीर की परंपरा के महान जैनाचार्यों का इतिहास तथा किस 2 प्रान्तों में किस / किन 2 आचार्यों द्वारा जैन धर्म की नौव डाली गई के नरपुंगवों की वीरता, उदारता और हृदय की विशाल किस प्रकार जैन जातियों का महोदय हुआ इन सब विस्तृत वर्णन किया गया है / इसके अलावा आधुनिक जै की पतन दशा का भी संक्षिप्त से परिचय करवाया गया ग्रन्थ की विशेष प्रशंसा न करके हम पाठकों पर ही छ कि एक वार इस ग्रन्थ को आद्योपान्त पढ़ें / सुन्दर छपा कागज, पक्की रेशमी कपड़े की जिल्द, शोभनीय भावव चित्र और 1000 से अधिक पृष्ट होने पर भी प्रचा मात्र रु०४) स्टोक में प्रतियाँ बहुत कम रही हैं खलास 20) में भी मिलनी मुश्किल है शीव मंगवालें / पता-श्री जैन श्वेताम्बर समें मु० पीपाड़-सिटि (मारवाड़) नथमल लूणिया द्वारा आदर्श प्रेस केसरगञ्ज अजमेर में छ इस जातीय प्रेस में छपाई का काम उमदा, सस्ता और जल्दी ओसवाल बन्धुओं से निवेदन है कि वे अपनी छपाई का काम यहीं भेजने के। सञ्चालक-जीतमल लुणिया Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat 'www.umaragyanbhandar.com