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riepjapah teteje
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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।। ॐ ह्रीं श्रीं अहँ कलिकुण्डदण्डाय नमः ।। ।। श्रीजित-हीर-बुद्धि-तिलक-शान्ति-सोम-राजेन्द्रसूरीश्वरेभ्यो नमः ।।
मञ्जुलाभिधस्वोपज्ञवृत्तिसंकलितम् जिनेन्द्रस्तोत्रम्
अर्हत्स्तोत्रम् च
कर्ता
कलिकुण्डतीर्थोद्धारकपूज्याचार्यविजयश्रीराजेन्द्रसूरीश्वराणाम् शिष्यरत्नानां तपस्विमुनीनां श्रीराजपुण्यविजयानां शिष्य:
मुनिराजसुन्दरविजयः
FG
द्रव्यसहयोगी सत्यपुरतीर्थनिवासी संङ्घवीश्रीवच्छराजजीमावाजीबोथरा-परिवार:
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JINENDRASTOTRAM
V
WITH THE MANJULA COMMENTARY
MUNI RAJSUNDAR VIJAY
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मुनिश्री की आगामी ग्रंथरचना
एकाक्षरकोशः
स्वोपज्ञवृत्तिसहितः
'अ' कितने अर्थों में प्रयुक्त होता है - १-२-३ ?
जी नहीं... ५० से भी अधिक अर्थों में..... 'ख' कितने अर्थों में प्रयुक्त होता है - २-४-६ ?
जी नहीं... ६० से भी अधिक अर्थों में..... 'द' कितने अर्थों में प्रयुक्त होता है - ५-१०-१५ ?
जी नहीं... ७० से भी अधिक अर्थों में..
प्रस्तुत ग्रंथ को देखने के लिए - पढने के लिए मन लालायित हुआ...? यदि हुआ तो बस अल्प समय की प्रतीक्षा कीजिए।
- प्रकाशक
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मूल्य
: अध्ययन - अध्यापन
प्रत
: १०००
आवृत्ति
: प्रथम
प्रकाशन : २०६७-पोष श्यामा त्रयोदशी (द्वितीय)
कलिकुंडतीर्थोद्धारक प.पू.आ.वि. श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की प्रथम वार्षिक पुण्यतिथि
स्थल
: डीसा (गुजरात) मुनिश्री की जन्मभूमि
प्रकाशक :
श्रुतज्ञान संस्कार पीठ सेलर, विमलनाथ फ्लेट, २ श्रीमाली सोसायटी, नवरंगपुरा, अमदावाद, गुजरात-३८०००९.
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भाषा
ग्रंथ परिचय मूल ग्रंथ का नाम : जिनेन्द्रस्तोत्रम् ग्रंथ का श्लोकमान : २७
: संस्कृत पद्य ग्रंथ गत विषय : श्री तीर्थंकरपरमात्मा की स्तवना वैशिष्ट्य : २५ श्लोक के प्रथम तीन चरण
एकाक्षरी (एक स्वरमय एवं एक व्यंजनमय)
तथा अन्त्य श्लोक वसंततिलकावृत्त में । ग्रंथकार
पू.मुनि श्री राजसुंदर वि.जी म. रचना प्रारंभ माघ श्यामा पंचमी, वि.सं.-२०६५
मवाना (हस्तिनापुर समीप) वैशाख कृष्णा तृतीया, वि.सं.-२०६५
श्री सम्मेतशिखरजी महातीर्थ विशेष
सत्यपुरतीर्थ से श्री सम्मेतशिखरजी महातीर्थ के छ’री पालक महासंघ अन्तर्गत प्रस्तुत
ग्रंथ की रचना। वृत्ति का नाम : मञ्जुला वृत्ति का श्लोकमान : १४००.१० वृत्ति की भाषा : संस्कृत गद्य वृत्ति : स्वोपज्ञ अनुवाद : रुचिरा (गुजराती एवं हिन्दी में) पृथक् कृति : अर्हत्स्तोत्रम्
: २२ + १८६ + ४ + १०४
रचना समापन
पृष्ठ
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ग्रंथकार परिचय
नाम : दीक्षादाता :
गुरुदेव जन्म
:
दीक्षा
:
वडीदीक्षा
:
पू. मुनि श्री राजसुंदरविजयजी म.सा. कलिकुंड तीर्थोद्धारक प.पू.आ.भ.श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. पू.मुनि श्री राजपुण्यविजयजी म.सा.
चैत्री पूनम, वि.सं.२०४२ २४-४-१९८६, गुरुवार डीसा माघ श्यामा पंचमी, वि.सं.२०५८ ३-३-२००२, रविवार कलिकुंड तीर्थ चैत्र उज्ज्वला चतुर्थी (दि.) वि.सं. २०५८ १७-४-२००२, बुधवार, सत्यपुर तीर्थ सौम्यवदनाकाव्यम् (पुण्यवल्लभाभिधस्वोपज्ञवृत्तिसमलकृतम्) वच्छराजविहारप्रशस्ति: (राजजयाभिधस्वोपज्ञवृत्तिसंवलिता) जिनराजस्तोत्रम् (राजहंसाभिधस्वोपज्ञवृत्तिसमन्वितम्) एकाक्षरकोशः (मुद्रणालयस्थः)
अन्य रचना :
★★★
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प्राप्तिस्थान
: चंपकभाई के. शेठ - राजेन्द्र ट्रेडींग को.
105, आनंद शोपींग सेन्टर, रतनपोल, अमदावाद. फोन : 25352341, मो. 94260 10323 सुबोधभाई एल. शाह आई-7, स्वस्तीक एपार्टमेन्ट, बेरेज रोड, वासणा, अमदावाद-7. मो. 94273 33170 चिंतन चंद्रकान्तभाई संघवी 508, कालिंदी एपार्टमेन्ट, सोरठीया वाडी सामे, कैलासनगर, मजुरागेट, सुरत. मो. 9925715960
मुद्रक
श्रेणिक समरथमलजी शाह 109/117, सी.पी.टेंक रोड, शेठ मोतीशा जैन बिल्डींग, उजा माळे, रुम नं. 34, मुंबई-4. मो. 98695 06920 जय जिनेन्द्र ग्राफिक्स (नीतिन शाह) 30, स्वाति सोसायटी, सेन्ट झेवियर्स हाईस्कूल रोड, नवरंगपुरा, अमदावाद-14. (मो.) 98250 24204 फोन : (ओ.) 25621623 (घर) 26562795 E-mail-jayjinendra90@yahoo.com
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अनुक्रमणिका
श्री ऋषभजिनस्तुतिः श्री अजितनाथजिनस्तुतिः श्रीशम्भवनाथ जिनस्तुतिः श्री अभिनन्दनजिनस्तुतिः श्री सुमतिनाथजिनस्तुतिः श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुतिः श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुतिः श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः
श्री सुविधिनाथजिनस्तुतिः श्रीशीतलनाथजिनस्तुतिः श्री श्रेयांसनाथजिनस्तुतिः श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुतिः श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः श्री अनन्तनाथजिनस्तुतिः श्रीधर्मनाथजिनस्तुतिः श्री शान्तिनाथजिनस्तुतिः श्री कुन्थुनाथजिनस्तुतिः श्री अरनाथजिनस्तुतिः श्रीमल्लिनाथजिनस्तुतिः
श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुतिः श्रीनमिनाथजिनस्तुतिः श्रीनेमिनाथजिनस्तुतिः श्री पार्श्वनाथजिनस्तुतिः श्रीवीरजिनस्तुतिः प्रशस्तिः
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वंदना अस्तु सदा गुरूणां मे क्रमयोर्वन्दना मम । मेरे गुरु के चरणों में मेरी सदा हो वंदना
कच्छवागड देशोद्धारक प.पू.मुनिराज श्री जितविजयजी दादा के चरणों में... ध्यानमग्न प.पू.मुनिराज श्री हीरविजयजी दादा के चरणों में... व्यवहारकुशल प.पू.मुनिराज श्री बुद्धिविजयजी दादा के चरणों में... आत्मैकलक्षी प.पू.पन्यासप्रवर श्री तिलकविजयजी दादा के चरणों में... प्रशांततपोमूर्ति प.पू.आ.देव श्री शांतिचंद्रसूरीश्वरजी महाराजा के चरणों में... जीवदयाप्रेमी प.पू.आ.देव श्री कनकप्रभसूरीश्वरजी महाराजा के चरणों में... ज्ञानपिपासु प.पू.आ देव श्री भुवनशेखरसूरीश्वरजी महाराजा के चरणों में... ज्योतिर्विद् प.पू.आ.देव श्री सोमचंद्रसूरीश्वरजी महाराजा के चरणों में... समतानिधि प.पू.आ.देव श्री रत्नशेखरसूरीश्वरजी महाराजा के चरणों में...
राजसुंदर विजय
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વંદના
કલિકુંડ તીર્થોદ્ધારક પ.પૂ.આ.વિ. રાજેન્દ્રસૂરીશ્વરજી મ.સા.
મનુષ્કુપ ] ગષ્યન્ત નો છારાસ્તે
વારવિવારવિન્ડવત્ | મનોમિ ગુૉ તત્વો
વહેવભં સૌનપૂર્વવત્ // સિન્ધનાં બિન્દુની જેમ
ઉપાશે ગણાય ના | વંદન કરું છું માત્ર
સનથી ગુરે ! તને
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સમર્પણમ
પૂમુનિશ્રી રાજપુણ્યવિજયજી મ.સા.
પૂ.સા.શ્રી સૌમ્યવદનાશ્રીજી મ.સા.
મનુષ્કુ...] સસ સર્ણનcoડૂમ્યાં
સબંનસ્વાર્પાસ્ય સે | મસ વિમધOારોઉસ્ત
| નવેત હવયે દ્વિધા / સર્જન મારું ડરનારને હું
| સર્જન મારે, ક્ર, અર્પણ શું ? | છે તેની મને તો આંધકાર છે કે
નથી જ-એવી હૃદયે દ્વિધા છે ||
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પત્ર
સાદર અનુવંદના સુખશાતા પૃછા ચોમાસી ક્ષમાપના. દેવગુરુકૃપયા
કુશળ છીએ.
તમારી કાવ્યકૃતિ ખરેખર વિદ્ધશ્ર્ચિત્ત માટે ચમત્કૃતિ છે
૨૪ તીર્થંકર દેવોને નમસ્કૃતિ છે. સ્વયં ઊભા કરેલા પડકારની સ્વીકૃતિ છે
તમારા કવિત્વની આવિષ્કૃતિ છે. ભક્ત વિશ્વ પર ઉપકૃતિ છે તો મોહરાજાના અંતરંગ વિશ્વ પર અપકૃતિ છે.
પાઠકના દોષોની અપાકૃતિ છે અને દુઃખોની તિરસ્કૃતિ છે. કાવ્યના શ્લોકે શ્લોકે વ્યક્ત થાય છે પ્રભુની ગુણમય પ્રકૃતિ... અને નષ્ટ થાય છે આપણી દોષજન્ય વિકૃતિ.
તમારી કલ્પનાશક્તિને સાક્ષાત્ આકૃતિ આપતી તમારી આકૃતિની કયા શબ્દો દ્વારા કરું સસ્કૃતિ ? કાવ્યસૃષ્ટિની અલંકૃતિ સમાન તમારી આ ભવ્ય નવ્ય કાવ્યકૃતિની પ્રસ્તુતિ (પ્રસ્તાવના) ચીલાચાલુ હોય તો થોડી શોભે ? દિવસોના દિવસો વીતાવ્યા...આશા હતી કંઇક સ્ફુરણા થશે પણ... ક્ષમસ્વ. કોઈ વિશિષ્ટ સ્ફુરણા દિલમાં સ્ફુરતી નથી ને સામાન્ય પ્રસ્તાવના લખીને મોકલી દેવામાં મનને
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સમાધાન થતું નથી. કોઈ અપૂર્વ ફુરણા માટે પ્રતીક્ષા કરવામાં ક્યારેક વધારે કાળ વિલંબ થઈ જાય. તથા રોજના બે પ્રવચન - પાઠ- સંઘની અન્ય જવાબદારીઓ વિશેષ સમય પણ ફાળવી શકાતો નથી. એટલે તમે અન્ય વિદ્વાન દ્વારા પ્રસ્તાવનાના પ્રસ્તાવને સાકાર કરી શકો એ માટે આ સાથે બધું મેટર પરત કર્યું છે એમાં મારી દિલગીરી તમે સમજી શકશો, સુજ્ઞ છો...
બંને આચાર્ય ભગવંતો સાહેબ સહિત સર્વેને વંદનાદિ+ ચોમાસી
ક્ષમાપના.
આરાધનામાં યાદ કરશો. પહોંચ જણાવશો. ફીથી, મિચ્છામિ દુક્ક.
અભયશેખરની વંદના.
અ.વ.૩/ગોરેગામાં
(મુંબઈ)
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मनोकामना
Íન રાખસુંદર છે.
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मनोकामना
'दीक्षातिथि समीप में आ रही है । प्रतिवर्ष की तरह इस दीक्षातिथि के उपलक्ष में भी कुछ न कुछ प्रगतिसाधक संकल्प अवश्य करना है । क्या करूं...? फिलहाल छह दिन शेष है फिर भी निर्णय तो शीघ्र करना होगा।'
माघ धवला द्वादशी, वि.सं.-२०६५
७-८-'०९ शनिवार
चांदनी चौक - दील्ली. शैशव से जन्मदिन पर कोई विशेष संकल्प होता था । दीक्षा के पश्चात् यह पद्धति का अनुकरण प्रत्येक दीक्षातिथि पर भी होता रहा । कलिकुंड चातुर्मास के बाद वि.सं. २०६५ की विहारयात्रा श्री सत्यपुर तीर्थ से श्री शिखरजी महातीर्थ के छ’री पालक संघ अंतर्गत थी । दीक्षातिथि करीब थी तब यह विचारणा हुई एवं डायरी में लिखी ।
चतुर्दशी के दिन विहार में यही विषय पर विचारणा हो रही थी तब एक विचार आया कि शिखरजी प्रति हमारा विहार है। दीक्षा के बाद प्रथमबार शिखरजी महातीर्थ की संस्पर्शना होगी । बीस-बीस तीर्थंकर परमात्मा की पावन भूमि में खाली हाथ जाना उचित नहीं है । लेकिन क्या करूं...?।।
बहुत चिंतन करने के बाद यह विचार आया कि एक ही उपाय है - स्तुतिरचना ! स्तुतिसुमन हि प्रभुजी के चरणों में अर्पित करूं ।
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दीक्षातिथि पर संकल्प स्वरूप यही स्तुतिरचना का निर्धार किया ।
स्थान में आकर मेरे परमोपकारी पू. गुरुदेव श्री राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा को यह मनोकामना कही । गुरुदेव अत्यन्त आनन्दित हुए । लेकिन गुरुदेव ने कहा : “सामान्य स्तुति नहीं, विशिष्ट स्तुति की रचना करना ।”
'विशिष्ट' शब्द का तात्पर्य मैं समझ नही पाया । “विशिष्ट' मतलब क्या ? कुछ स्पष्ट नही हुआ । रात्रि को निन्द नहीं आई । यही 'विशिष्ट' की विचारणा में मेरा मन अतीव त्वरित गति से दौड रहा था - पूर्व में ‘सौम्यवदना' नामक ढ्यक्षरी काव्य की रचना हुई । तत्पश्चात् कलिकुंड चातुर्मास में 'जिनराजस्तोत्र' नामक एकाक्षरी काव्य की भी रचना हुई । अब एकाक्षर से भी 'विशिष्ट' क्या हो सकता है ? ।
लेकिन वचनसिद्ध पुरुष के मुख से जो उच्चारण होता है वह अन्यथा कैसे हो सकता है ?
गहराई से मनन करने के बाद यह विचार आया - ‘जिनराज' एकाक्षर काव्य में व्यंजन का बंधन अर्थात् 'क' के श्लोक में 'क' से अतिरिक्त अन्य कोई व्यंजन का उपयोग नहीं करना यह नियमन था किन्तु स्वरों की तो पूर्णतया स्वतन्त्रता थी न ? अब स्वर का भी बंधन हो तो...? जैसे एक व्यंजन से अतिरिक्त अन्य व्यंजनों का अनुपयोग तथैव एक स्वर से अतिरिक्त अपर स्वरों का भी अप्रयोग...ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?।
द्वितीय दिन गुरुदेव से इस विषय में वार्तालाप हुआ । गुरुदेव ने स्तोत्र रचना में सानंद आशिष एवं संमति दी । मेरा मन बहुत हर्षित हुआ।
माघ श्यामा पंचमी, १४-२-०९, शनिवार को ‘मवाना' गांव में प्रभु को प्रार्थना करके एवं वासक्षेप के माध्यम से गुरुदेव की आंतरिक आशिष के साथ मंगलाचरण का श्रीगणेश किया।
जिनराजस्तोत्र' के मंगलाचरण में 'क' से प्रारंभ करके क्रमश: वर्णमाला थी । यहाँ व्यत्यय से अर्थात् वर्णमाला का चरम वर्ण 'ह' से प्रारंभ करके पश्चानुपूर्वी से क्रमश: वर्णमाला रखी । एक स्वर का काव्य होने के कारण
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मंगलाचरण में भी मात्र 'अ' (एक स्वर) ही प्रयुक्त किया ।
'अनुष्टुभ्' छंदमें ३२ अक्षरों का ही समावेश शक्य है तथा वर्णमाला में ३३ व्यंजनों है अत: प्रथम स्तुति उपान्त्य अक्षर 'ख' पर समाप्त हो जाती थी। फिर भी ‘क्रमश: ३३ व्यंजनों का दर्शन हो सके' इस आशय को ध्यान में रखकर द्वितीय श्लोक का प्रारंभ मेरे इष्टदेव श्री कलिकुंड पार्श्वनाथ प्रभु का नामोल्लेख करके किया है जिससे ३३ व्यंजनों व्यत्यय से क्रमश: दृश्यमान हो सकते है।
मंगलाचरण का प्रथम श्लोक भी कलिकुंड पार्श्वनाथ प्रभु का विशेषण स्वरूप होते हुए भी स्वतंत्रतया श्री सामान्य जिनवर स्तुति स्वरूप भी है ।
गुरुदेव के आशीर्वाद का साक्षात् चमत्कार तो देखो - दीक्षातिथि (पंचमी) के दिन ‘मवाना' गांव में मंगलाचरण का प्रारंभ किया तो दुसरे ही (षष्ठी के) दिन हस्तिनापुर तीर्थ में शीघ्रतया समापन भी हो गया ।
विहार के साथ साथ क्रमश: स्तुति एवं वृत्ति की रचना होती रही। श्री सुपार्श्वनाथ भगवान की स्तुति रचना के पश्चात् कुछ दिनों के लिए STONE (पथरी) की वेदना के कारण रचना नहीं हुई । क्षणार्ध यह विचार भी आया कि निर्धारित समय में ग्रंथ रचना पूर्ण होगी या नहीं ? किन्तु गुरुदेव के आशीर्वाद के पूर्ण विश्वास ने यह विचार पिशाच को भगा दिया ।
दृढ निश्चय था कि प्रभु की कृपा का बल एवं पूज्यश्री की प्रेरणा का बल मेरे साथ है अत: शिखरजी यात्रा के पूर्व ग्रंथपरिसमाप्ति अवश्य हो जाएगी।
अर्ध निर्माण के बाद तो एकदम 'मूडी' जैसा हो गया | कभी-कभी दोतीन दिन में ही एक स्तुति की रचना हो जाती तो कभी-कभी एक स्तुति की रचना में छह-सात दिन भी व्यतीत हो जाते - जैसे श्री सुमतिनाथ भगवान की स्तुति का दो दिन में तो श्री धर्मनाथ भगवान की स्तुति का तीन दिन में तो श्री चन्द्रप्रभस्वामी की स्तुति का छह दिन में निर्माण हुआ।
कभी योगानुयोग जैसा भी हो गया - जैसे श्री चंद्रप्रभस्वामीजी की स्तुति प्रभुजी के ही च्यवन कल्याणक तिथि के दिन तो श्री अनन्तनाथ भगवान की
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स्तुति प्रभुजी के निर्वाण कल्याणक दिन पे समाप्त हुई।
कभी समय एवं क्षेत्र को ध्यान में रखकर स्तुति का समापन आदि किया - जैसे श्री महावीरस्वामी भगवान की स्तुति प्रभुजी के केवलज्ञान कल्याणक के दिन प्रारंभ करने की भावना थी अत: एक दिन आराम करके वैशाख शुक्ला दशमी के दिन स्तुति का प्रारंभ किया तथा ऋजुवालुका तीर्थ (श्री महावीर स्वामी भ. केवलज्ञान कल्याणक स्थल) में समापन करने की ख्वाहिश थी अत: स्तुति को धीरे धीरे (७) दिन में पूर्ण की तथा श्री मुनिसुव्रतस्वामी की स्तुति श्री मुनिसुव्रतस्वामी के ही जन्मादि कल्याणकों से पावन राजगृही तीर्थ में समापन करने की अभीप्सा थी अत: स्तुति को धीरे धीरे (८) दिन में समाप्त की।
अंत में गिरियात्रा के पूर्व दिन प्रथम ग्रंथ 'सौम्यवदनाकाव्यम्' के विमोचन के पश्चात् श्री शिखरजी तीर्थ में नूतन भोमियाभवन में प्रशस्ति की पूर्णाहूति हुई।
द्वितीय दिन श्रीसंघ के साथ यात्रा की ।
प्रत्येक स्तुति पुष्प को प्रत्येक परमात्मा के चरणों में समर्पित किया । अत एव ‘वृत्तिप्रशस्ति' में कहा है।
तद्वितीयदिने यात्रां ससङ्घ: कृतवानहम् । अर्हद्भ्य: स्तुतिसूनानि समर्पितानि भावत: ।।५।। (पृ.-१७९)
"भावत:”- स्तुतिपुष्पसमर्पण अत्यंत भाव से हुआ । उस समय का आनन्द अनन्य एवं अकथ्य है अत: उस अभिव्यक्ति का अधिक शाब्दिक स्वरूप देना नहीं चाहता।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
चतुर्विंशति अर्हत्परमात्मा की स्तुति स्वरूप स्तोत्र होने के कारण प्रस्तुत स्तोत्र के नामांकन में 'जिन' शब्द को पूर्वपद में रखा है । तथा मेरे परमोपकारी गुरुदेव कलिकुंड तीर्थोद्धारक पू. राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा के पावन अभिधान को ध्यान में रखकर उत्तरपद में 'इन्द्र' शब्द रखा है।
वस्तुत: प्रस्तुत स्तोत्र का नाम पूर्व में 'जिनेश्वरस्तोत्रम्' रखा था । किन्तु
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एक दिन मन में यह विचार उपस्थित हुआ कि 'जिनेश्वरस्तोत्रम् ' के स्थान पर ‘जिनेन्द्रस्तोत्रम्’ रखुं तो ग्रन्थ के नामांकन में गुरुदेवश्री का नाम (उत्तरपद-इन्द्र) का भी अंतर्भाव हो सकता है । पूर्व में 'जिनराजस्तोत्रम्' के अन्तर्गत गुरुदेवश्री का पूर्वपद 'राज' रखा था अब उत्तरपद 'इन्द्र' को क्यों शेष रखुं ? अतः प्रस्तुत स्तोत्र का नामान्तर करके ‘जिनेन्द्रस्तोत्रम्' रखा।
शायद इस बालचेष्टा से अंशत: - यत्किंचित् अनृणी होने का प्रयास लेश किया है । गुरुदेवश्री का अनंत उपकार मेरे पर था । न केवल 'था' - 'है' भी एवं ‘होगा’ भी । यद्यपि आज गुरुदेवश्री की उपस्थिति नहीं है तथापि `गुरुदेवश्री की अनुपस्थिति की अनुभूति कभी नहीं हुई । अध्ययनादि प्रत्येक कार्यों में प्रतिक्षण पूज्यपादश्री की प्रतीति का एहसास होता रहा है । यह कहने कि नहीं किन्तु अनुभूति की चीज है अत: अधिक क्या कहूं ? |
स्तोत्र रचना में विकटता
प्रस्तुत स्तोत्र की श्लोक रचना में चतुर्थ चरण की स्वतंत्रता होते हुए भी प्रथम तीन चरणों में एक व्यंजन एवं एक स्वर का नियमन होने के कारण रचना बहुत विकटता उपस्थित हुई ।
में
(1) भगवान का नामोल्लेख प्रथमा विभक्ति, द्वितीया वि. एवं सम्बोधन से ही हो सकता है अन्यथा प्रत्येक विशेषणों में तृतीया वि. होने से 'ए' एवं 'न' की बाधा हो जाती । यदि स्वर की स्वतंत्रता हो तब तो 'न' की स्तुति में भी तृतीया वि. प्रयुक्त कर सकते किन्तु स्वर का नियमन होने के कारण 'न' की स्तुति भी पूर्वोक्त बाधा के कारण तृतीया विभक्ति युक्त नहीं कर सकते ।
तथैव चतुर्थी वि. का प्रयोग करने में 'आ' एवं 'य' से युक्त रूप होता है । 'य' की स्तुति में भी 'आ' की बाधा के कारण चतुर्थी वि. का प्रयोग शक्य नहीं है ।
पंचमी वि. में 'आ' एवं 'त' अथवा 'द', षष्ठी वि. में 'स' एवं 'य' तथा सप्तमी वि. में 'ए' की बाधा उपस्थित हो सकती है अतः सम्बोधन एवं प्रथमा तथा द्वितीया विभक्ति ही स्वीकरणीय रही ।
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(2) सर्वथा सम्बोधन का भी प्रयोग अशक्य है, क्युंकि उसमें “कक ! कक ! कक ! कक !” ऐसा स्वरूप होने से गुरुवर्ण के अभाव से छन्दोभंग की भी स्थिति हो सकती है अत: क्वचित् सम्बोधन के साथ प्रथमा वि. एवं द्वितीया वि. का मिश्र प्रयोग किया है (स्तुति क्रमांक-१४)।
(3-a) सर्व विशेषणों को प्रथमा वि. में भी रखना उचित नहीं है क्युंकि ऐसा करने से 'च-त-थ' आदि (अघोषवर्णों की) स्तुति में 'चच: चच:' की श्लोक रचना में “चटते सद्वितीये” (सि.है.-१-३-७) नियमानुसार 'चचश्चच:' - 'तततस्ततत:' होने से 'श्' एवं 'स्' आदि अनिष्ट वर्णों की उपस्थिति हो सकती है, तथापि 'क', 'श', 'स' (स्तुति क्रमांक ३, २३, २५) में सर्व विशेषणों केवल प्रथमा वि. में प्रयुक्त है।
(3-b) तथा घोषवान् (ग-घ-ज-द) आदि वर्गों की रचना में 'गग: गग:' होने से “घोषवति” (सि.है.-१-३-२१) नियमानुसार 'गगो गग:' होने के कारण अनिष्ट 'ओ' भी उपस्थित हो सकता है।
(4) सर्व विशेषणों का यदि द्वितीया वि. में प्रयोग होता तो द्वितीय चरण की समाप्ति में 'गगं गगम् ।' होने से अन्त्य अनिष्ट 'म्' की उपस्थिति हो जाती । विराम के कारण 'म्' का अनुस्वार भी नही हो सकता । अत: सर्व विशेषणों का द्वितीया वि. में भी प्रयोग करना शक्य नहीं है । तथापि 'म' (स्तुति क्रमांक-१८) में तो सर्व विशेषणों को द्वितीया वि. में ही प्रयुक्त किये है । हालांकि अपवादाश्रय से दोष स्वरूप नहीं है फिर भी अपवाद आचरण की भावना नहीं थी अत: निश्चित पद्धति से ही श्लोक रचना की।
(5) श्लोक रचना में 'अ' से अतिरिक्त अन्य स्वरों का प्रतिबंध होने के कारण ‘नञ्बहुव्रीहि' आदि समास करना भी शक्य नहीं है । जैसे 'कः = दक्षः, कः = क्रोध: - नास्ति को यस्य स अक: - कोऽक: अथवा कश्चासावकश्चेति काउकः = दक्षा-क्रोध:' यह नहीं हो सकता । पूर्व रचित ‘सौम्यवदनाकाव्यम्' एवं 'जिनराजस्तोत्रम्' में स्वरों का नियमन न होने के कारण ‘कोऽक:' शक्य था किन्तु यहाँ तो वैसा करने से 'ओ' अथवा 'आ' आदि अनिष्ट स्वरों की उपस्थिति हो जाती अत: पूर्वोक्त समासादि भी नहीं हो सकते ।
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(6) तथैव स्वरों के नियमन के कारण 'आम - ओकस् - इरा - इला' आदि भिन्नस्वरीय एवं अनेकवर्णीय शब्दों के प्रयोग का भी द्वार बंध हो गया । तथापि 'अम-तत' आदि अलभ्य शब्दों के प्रयोग का सपरिश्रम प्रयास भी किया है ।
इतनी विकटता के बावजूद जब हताशा एवं निष्फलता की प्रतीति नहीं हुई तब यह मंतव्य दृढतम हुआ कि परमात्मा एवं परमगुरु की निकटता अवश्य फलदायिनी एवं शीघ्र विघ्नविनाशिनी है
मञ्जुला
श्लोकों के स्पष्टीकरणादि के लिए साथ में 'मञ्जुला' नामक वृत्ति भी प्रस्तुत है । सुगमता से अर्थावबोध हो इस लिए वृत्ति को यथाशक्य सरल की है । प्राय: प्रत्येक समासों का विग्रह करने का प्रयास किया है । श्लेषादि से कृत अर्थान्तर को समझने के लिए वृत्ति में ' अथवा ' को Dark दिखाया है । तत् तत् शब्दों के अर्थ करने में अप्रामाण्य की भ्रान्ति न हो जाए इस लिए वृत्ति में प्राय: प्रत्येक शब्दों का सन्दर्भग्रन्थ (साक्षिपाठ) भी दिया है ।
प्रत्येक श्लोकों की वृत्ति के अंत में समाप्तिस्थल का निर्देश विशेष स्मृति के लिए किया है ।
रुचिरा
प्रत्येक श्लोकों का 'रुचिरा' नामक अनुवाद - सामान्य भावार्थ भी साथ में प्रस्तुत है । वृत्ति में श्लेषादि से किए गए पृथगर्थ का अनुवाद में पृथगुल्लेख नहीं किया है ।
वस्तुत: ग्रंथरचना के समय में अनुवाद गुर्जरभाषा में ही किया था किन्तु शिखरजी, सिंहपुरी, वाराणसी, चित्रकूट, मउरानीपुर आदि के अनेक विद्वानों की स्नेहभरी सूचना थी कि 'ग्रंथ की व्यापकता को ध्यान में रखकर प्रस्तावना अनुवाद आदि हिन्दी भाषा में रखना आवश्यक है' अत: प्रस्तावना का तथा अनुवाद का पुनः हिन्दी भाषा में आलेखन किया ।
गुजराती प्रभुभक्तों की प्रभुप्रीति को ध्यान में रखकर गुज्जु अनुवाद को भी गौण नहीं किया ।
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प्रस्तावना
प्रस्तुत प्रबंध की प्रस्तावना के लिए शासन प्रभावक पू.आ.भ. श्री अभयशेखर सू. जी महाराजा को विज्ञप्ति की थी । किन्तु शासन प्रभावना के कार्यों की अत्यंत व्यस्तता के कारण पूज्यश्री प्रस्तावना नहीं लिख पाए । तथापि पूज्यश्री का गुर्जर काव्यात्मक पत्र अतीव उत्साहवर्धक मेहसूस हुआ । वह पत्र का पूर्व में यथावत् प्रकाशन किया है ।
पू. सा. श्री सूर्यप्रभाश्री जी की विदुषी प्रशिष्याऐं सा. श्री नयनिपुणाश्री जी एवं सा. श्री शीलभद्राश्री जी, तथा सा. श्री योगिरत्नाश्री जी ने Proof reading करके सराहनीय सहयोग दिया है ।
प्रान्ते
प्रस्तुत प्रबंध में क्षति शक्य है ।
'आरोहणे हिमाद्रेः किं न क्वचित् स्खलनं शिशोः ?”
एक छोटे से बालक के लिए हिमालय - गिरिराज का आरोहण सरल है क्या ? आरोहण में कभी बालक स्खलित नहीं हो सकता क्या ?
ग्रंथ निर्माण में जिनाज्ञा विरुद्ध आलेखन हुआ हो तो त्रिविध
क्षमायाचना ।
पुनश्च
परमात्मा एवं पूज्यपादश्री की अपरंपार कृपा से प्रभुभक्ति के ऐसे ही आलम्बनों की मुझे सतत उपलब्धि हो यही मनोकामना ।
ને રાખસુંવર વિ.
अषाढ़ श्यामा त्रयोदशी, वि.सं. २०६६
(पूज्यपादश्री की सातवीं मासिक पुण्यतिथि)
८- ८-१०, रविवार
सत्यपुर तीर्थ
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जिनराजस्तोत्रम् एवं जिनेन्द्रस्तोत्रम् में भिन्नता
जैसे जिनराजस्तोत्रम् एक व्यंजनमय था तथैव जिनेन्द्रस्तोत्रम् भी एक व्यंजनमय है तथापि उभय में बडा अन्तर है ।
जिनराजस्तोत्रम् एक व्यंजनमय होते हुए भी अनेक स्वरमय था किन्तु जिनेन्द्रस्तोत्रम् एक वंयजनमय होते हुए मात्र (अ) एक स्वरमय ही है।
• सौम्यवदनाकाव्यम् : दो व्यंजनमय एवं अनेक स्वरमय
• जिनराजस्तोत्रम् : एक व्यंजनमय एवं अनेक स्वरमय
• जिनेन्द्रस्तोत्रम् : एक व्यंजनमय एवं एक स्वरमय
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जिनेन्द्रस्तोत्रम्
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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कोरुं
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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।। नमः कलिकुण्डाय ।।
मञ्जुला
दीक्षाया अष्टमे वर्षे प्रारब्धे प्रस्तवीम्यहम् पूजितं पद्मिना पौः कलिकुण्डेश्वरं जिनम्
॥ १ ॥ वीरो वै वररो वरो विविवरो वीरं वरा वविरे वीरेण वतवर्मनी विविहिता वीराय वन्दामहे वीराद् वैरिवधो व्यधायि विरलैर्वीरस्य वेरं वरं वीरे वारि विभाति वा विमलता वीर ! व्यथां वारय ॥ २ ॥
__[शार्दूलविक्रीडितम् निष्कलङ्क तमोमालामेघाल्यनपवारणम् दिवाप्युद्योतकर्तारं चन्द्रप्रभं प्रभुं स्तुवे यस्याशिषा सुमन्दोऽपि नूनं शीघ्र पटूयते गुरवे मेऽस्तु तस्मै श्रीराजेन्द्रसूरये नमः ॥ ४ ॥ सुशीघ्रं येन लब्धा सद्गुरुकृपा सुदुर्लभा श्रीराजशेखराचार्यं तं प्रणौमि सुभावतः ‘मवाना'पुरि स्वोपज्ञा माघेऽहिन श्यामपञ्चमे । व्याख्या जिनेन्द्रस्तोत्रस्यारभ्यते मञ्जुलाभिधा ॥ ६ ॥ १. प्रथमपादेऽा ‘वकार-रकाराविति द्वावेवाक्षौ प्रयुक्तौ । २. विशेषेण विहितेत्यर्थस्तद्वाचि तस्यैव प्राधान्यात् ।।
॥
३
॥
३. वा इवार्थ - उपमायामित्यर्थः, तोरे वारि ता = इव विमलता विभातीत्याशयः ।
मङ्गलाचरणम्
ow
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॥ श्रीजिनेन्द्रस्तोत्रम् ॥
ह सषं शवलं रं य
मभं बं फप नं धद । थतं ण ढं डठं टं जं
झजं छचं डचं गख || १ || कलिकुण्डेश ! नुत्वा त्वां
श्रीराजेन्द्र गुरुं तथा । स्तोत्रं कुर्वे जिनेन्द्राणामात्मकर्मविमुक्तये ।। २ ।।
[युग्मम्]
४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
किरणकिरणकमलकमलकमलकषायकरीषकरीषाग्निकाऽकलकलकलकोकिलकलकल्पकल्पकल्पकल्पकल्पकर्मकर्मा रकठोरकुठ - कुठाराकालकालककालकालाकालकीलालकीनकलाकेलिकुण्डलिकलापकलापकलुषकलुषकलुषकलम्बकिणालातकिङ्करकालकर्णिकाकान्दिशीककीकटकृपकामाङ्कुशकामरूपकिणालातकान्तिकलिकाकान्तिकान्ताकान्ताकान्तारकान्ताराकातरकाश्यपीकालिन्दीसूकाञ्चनाकम्पनकष्टकाष्ठकाष्ठतक्षकर्णेजपकरुणकरुणाकाकरकुशलकरकुशलाऽकुहकाऽकुहकाऽकुहनाऽकुहरकामकरिकण्ठीरवकल्मषाकल्मषककल्याणकृत्कलधौतकलधौतकुनाभिकामनाकामनाकाण्डकाण्डीरकविकुमुदकुमुदबान्धवकपटकविकेसरिकार्पण्यकुण्डलिकामायुकुसृतिकुधरकुलिशक्रोधिक्रोधकृशानुकुशकुपतिकुलक्लेदुक्रूरकृपकविकदम्बकोटीरक्रतुभुक्कूटक्रमणाकोषकोशकोलककोलकोलकुणकरुणकृतिकृतिकृतिकृपालुकुपूयकुपूयताकरकृपाणकृपणकृपाकश्मलकूपणकुहनकोककृपीटयोनिकुसृतिकृपीटयोनिकृपीटाकुसूलङ्करक्रूरताकुरङ्गकेसरिकोरककोमलकुन्तलकुमतिकुकुद्दालकृतकृतान्तान्तकुण्डलिकल्मषकलिकालकल्पकारस्करश्रीकलिकुण्डपार्श्वनाथमभिष्टुवन् मङ्गलं ग्रन्थयति ग्रन्थादौ
ग्रन्थकार: ।
मङ्गलाचरणम्
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अन्वयः - ह ! [वीर !] फप ! [शोभनभाग्यवन् !] धद ! [धर्मदायक !] ण !
[निर्गुण !] गख ! [गलितकर्मन् !] कलिकुण्डेश ! [हे कलिकुण्डपार्श्वनाथ !] सषम् [श्वेतहृदयम्] शवलम् [स्वर्गशर्मदायकम्] रम् [ईश्वरम् यमभम् [संसारशिखिसलिलदम्] बम् [श्रेष्ठम् नम्
नेतारम्] थतम् [पुष्कलपुण्यम्] ढम् [मात्सर्यरहितम्] डठम् [रागरहितम्] टम् [स्थिरम्] अम् [प्राज्ञम्] झजम् [तपनतेजसम्] छचम् [नलिनाननम्] ङ्यम् [सुखसमुद्रम्] त्वाम् गुरुञ्च नुत्वा [त्वां राजेन्द्रसूरीश्वरञ्च प्रणम्य] आत्मकर्मविमुक्तये [आत्मदुरितविध्वंसनार्थम्] श्रीजिनेन्द्राणां स्तोत्रम् [श्रीतीर्थकरपरमात्मस्तवनास्वरूपं जिनेन्द्राभिधं स्तोत्रम् कुर्वे [विदधामि ।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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ह सषमिति ।
हे कलिकुण्डेश ! = हे कलिकुण्डपार्श्वनाथ ! त्वां तथा श्रीराजेन्द्र गुरुम् = कलिकुण्डतीर्थोद्धारकाचार्यविजयराजेन्द्रसूरीश्वरं च नुत्वा = स्तुत्वा आत्मकर्मविमुक्तये = आत्मदुरितविध्वंसनाय श्रीजिनेन्द्राणां स्तोत्रम् = श्रीजिनेश्वराणां स्तोत्रम् क्रियते = वितन्यते ।
अत्र ‘कलिकुण्डेश ! त्वां नुत्वा' इत्यनेन मङ्गलाचरणं समसूचि ।
‘श्रीराजेन्द्र गुरुम्' इत्यनेन स्वकीयसद्गुरुस्मृतिमाधाय सम्बन्ध: समदर्शि यदिह न हि स्वीयमेव शेमुषीकल्पनमपितु स्वसद्गुरुपरम्परया श्रुतं यत्तदेव न्यासि नान्यदिति ।
_ 'जिनेन्द्राणां स्तोत्रम्' इत्यनेन विषयो व्याख्यायि यतोऽत्र जिनेशितृस्तुतीनामेव विवरणमभ्यधायि ।
'आत्मकर्मविमुक्तये' इत्यनेन प्रयोजनमप्यभाषि यतो जिनेशभक्त्याऽवश्यमेव महानन्दानन्दावाप्तिस्तदुक्तं द्वात्रिंशद्वात्रिंशिकायाम् → भक्तिर्भागवती बीजं परमानन्दसम्पदाम् - [४-३२] इति सा च कृत्स्नकर्मक्षेण्यादेवातस्तस्यास्तद्धेतुत्वात्तदिति ।
अधिकार्यप्यवाच्यस्मादेवास्य भव्य एवेति तस्यैव तत्त्वात् । अथ श्रीकलिकुण्डपार्श्वनाथप्रभोर्विशेषणान्याह ।
वैशिष्ट्यञ्चात्र हकारादीनां खकारपर्यन्तानां मातृकापाठान्तर्गतानां सर्वव्यजनानामनुक्रमतो व्यत्ययत: समावेश: स्वरश्च - अकार एवेति ।
छन्दस्यस्मिन् द्वात्रिंशद्वर्णानामेव समावेशस्य सम्भवान्न ककारस्य समावेशस्तदर्शनस्याप्याग्रहश्चेद् द्वितीयश्लोकप्रारम्भतो गृह्यताम्, एतेन व्यत्ययत: सर्वव्यञ्जनानामनुक्रमतोऽपि निदर्शनम् ।
अथ कलिकुण्डपार्श्वनाथजिनेशितुर्विशेषणान्याह ।।
अत्रानुस्वारविरहितान्यख्रिलान्यपि 'कलिकुण्डेश !' इत्यमुष्य तथा चानुस्वारान्तानि 'त्वाम्' इत्यस्य विशेषणानि ।
कीदृश भो: कलिकुण्डपावेश ! ? ह ! हः = वीर: → होऽथ वीरे मङ्गलाचरणम्
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रुचिरा
वीर, सौभाग्यशाली, धर्मदाता, निर्गुण, कर्मरहित हे कलिकुंड पार्श्वनाथ भगवान ! श्वेतहृदयी, स्वर्ग सुख के दाता, ईश्वर, संसार स्वरूप अग्नि को उपशांत करने के लिए मेघ तुल्य, श्रेष्ठ, चतुर्विध संघ के नायक, अतीव पुण्यशाली, मात्सर्य रहित, वीतराग, स्थिर, बुद्धिशाली, सूर्य सम तेजस्वी, कमलमुखी, सुख के समुद्र आपकी (तेरी) एवं कलिकुंड तीर्थोद्धारक प.पू. आ.भ. श्री राजेन्द्र सूरीश्वरजी म.सा. की स्तुति करके आत्मा के कर्मों के विनाश के लिए 'जिनेन्द्र स्तोत्र' की रचना करतां हुं ॥ | १ ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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[४१] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्डः परमानन्दनन्दनप्रणीतः, कर्मक्षेपकत्वाद् शिवङ्गमयितृत्वाच्छिवं वा गन्तृत्वाच्च तदुक्तम् → ईरेइ विसेसेणं ख्रिवेइ कम्माई गमयइ शिवं वा गच्छड् य तेण वीरो ← इति [ १०६०] विशेषावश्यकभाष्ये, तस्य सम्बोधने |
पुनः कीदृश ! ? फप ! - फम् = चारु फं फल्गु चारु वा स्मृतम् ← [७२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, पम् = दैवम् भाग्यमित्यर्थः → पं कनके विपन्ने वाच्यलिङ्गवत् आप्ये चापे च दैवे स्यात् ← [८० / ८१ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, पं फं यस्य स पफः = सुदैवः दैवस्य सानुकूलत्वस्यार्हतो वैशिष्ट्यात्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? धद ! धः = धर्मः धो धर्मे च ← [ १६ ] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकविहितः, धं ददातीति 'डा'न्तो धदः = धर्मदाता श्रुतचारित्रात्मकधर्मदयत्वात् तदुक्तम् → धर्मं श्रुतचारित्रात्मकं दुर्गतिप्रपतज्जन्तुधरणस्वभावं दयते ददातीति धर्मदयः ← [१] इति समवायाङ्गसूत्रवृत्तौ, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? ण ! णः = निर्गुणः अर्हन्नित्यर्थः निर्गुणे णः प्रकीर्तितः ← [२२] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिविद्वत्कृता, अर्हतो निर्गुणत्वेन सह पर्यायवाचित्वमुक्तमर्हत्सहस्रनामसमुच्चये निर्गुणो नीरसो निर्भी: ← [२-१०] इति तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? गख ! गम् = गलितम् गत्योरपि गा स्मृता नपुंसके च गलिते ← [३५/३६] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवग्रथिता, खम् = कर्म → खः..... कर्मेन्द्रिये सुखे क्षेत्रे क्लीबलिड्गे ← [ ३२/३३] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवगुम्फिता, गानि खानि यस्य स गखः = गलितकर्मा सर्वथा निष्कर्मेत्यर्थः, मुक्तिप्राप्तेः, तस्यैव तदुपलब्धेस्तदुक्तं तत्त्वार्थसूत्रे कृत्स्नकर्मक्षयो मोक्षः ← [ १०- ३] इति तथा च योगशास्त्रे मोक्षः कर्मक्षयादेव ← [४-११३] इति, तत्सम्बोधने । अवस्था भिदाश्रयणान्नापरेण सह विरोध: 1 अथ कीदृशं त्वाम् ? सषम् ! सम् = श्वेतम् → सकारं भारतीबीजं मङ्गलाचरणम्
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રુચિરા વીર, સૌભાગ્યશાલી, ધર્મદાતા, નિર્ગુણ અને કર્મરહિત હે કલિડપાર્શ્વનાથ ભગવાન ! શ્વેતહૃદયી, સ્વર્ગનાં સુખને આપનારા, ઈશ્વર, સંસાર રૂપી અગ્નિને ઉપશાંત કરવામાં મેઘ સમાન, શ્રેષ્ઠ, ચતુર્વિધ સંઘનાં નાયક, અત્યંત પુણ્યશાળી, માત્સર્યરહિત, વીતરાગ, સ્થિર, બુદ્ધિશાળી, સૂર્ય સમ તેજસ્વી, કમલ સમ મુખવાળા, સુખના સમુદ્ર તમારી અને કલિકુંડ તીર્થોદ્ધારક પ.પૂ. આ. ભ. શ્રી રાજેન્દ્રસૂરીશ્વરજી મ. સા.ની સ્તુતિ કરીને આત્માનાં કર્મોનો નાશ કરવા માટે “જિનેન્દ્ર સ્તોત્ર કરું છું.
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जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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श्वेतम् ← [४७] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातभणिता, ष: = हृद् → हृद् वामबाहुगः षडानन: षकारश्च ← [४९] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातप्रोक्तः, सं षो यस्य स सषः = शारदसलिलवत् शुद्धान्तःकरण इत्यर्थस्तथा चार्षम् → सारदसलिलं वसुद्धहियया ← त [२-२-६४] सूत्रकृताङ्गे, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? शवलम् शम् = स्वर्गः स्वर्गेश: ← [ ६८ ] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथप्ररूपितः, वम् = सुखम् वं सुखम् ← [ ८८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, शस्य वमिति शवं तद् लाति = ददाति इति शवलः = स्वः शर्मराता स्वर्गसुखदायक इत्यर्थः ननु कृतमनेन जीवस्यैव सुखदुःखहेतुभूतशुभाशुभकर्मकृत्त्वात् → शुभाशुभानि कर्माणि स्वयं कुर्वन्ति देहिनः स्वयमेवोपकुर्वन्ति दुःखानि च सुखानि च ← [ ९०] इति लोकतत्त्वनिर्णयवचनादिति चेत्... ? न तत्प्रणतेस्तत्प्राप्तेः ये त्वां नमस्यन्ति मुनीन्द्रचन्द्र ! तेऽप्यामरीं संपदमाप्नुवन्ति ← [३५] इत्यपि लोकतत्त्वनिर्णयस्यैवोक्तेरर्हन्नतेस्तदवाप्तेस्तेनैव तत्प्रदत्तमित्यस्यैवोच्यमानत्वादित्यलमधिकेन,
तम् ।
पुनः कीदृशम् ? रम् रः = ईश्वरः रश्च प्रकीर्तित: - ईश्वरे ← [२६/२७] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकनिर्मितः, ऐश्वर्यसमेतत्वात् तदुक्तं योगबिन्दौ → यदैश्वर्येण समन्वितः तदीश्वरः ← [३-२] इति तथा च [१६-१८] इति द्वात्रिंशद्वात्रिंशिकायाम् [ १५-१९] इत्यध्यात्मसारेऽपि, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? यमभम् • यम् = संसारः → यं संसारे ← [ १०० ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, मः = हुतभुक् म ? (मो) भवेदिह मेधायां निवारणे साक्षिसत्यवादे च हुतभुक् ← [३९] इत्यजिरादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, भः = जलद: भः शम्भौ भ्रमरे भावे शुक्रेऽशौ जलदे पुमान् ← [५९] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवग्रथितः, यमेव म इति यमस्तत्र भ इव य: स यमभः = संसारशिखिसलिलद: विनष्टसंसार इत्यर्थः, दुःखरहितत्वात् तस्य च तद्रूपत्वात् तदुक्तं योगदृष्टिसमुच्चये दुःखरूपो भवः ← [ ४७ ] इति, तम् ।
मङ्गलाचरणम्
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अथासंसारिण एव तत्त्वाच्छ्रेष्ठत्वं तदाह ।
पुनः कीदृशम् ? बम् - ब: = वर: श्रेष्ठ इत्यर्थः → बो दन्त्यौष्ठ्यस्तथौष्ठ्योऽपि वरुणे वारुणे वरे - [८७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नम् = न: = नेता → नेता नश्च समाख्यात: [२२] इत्येकाक्षरकोश: पुरुषोत्तमदेवभर्णित: चतुर्धासङ्घनायकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थतम् - थम् = बहुलम् → थं विषं कर्म बहुलम् - [६१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, तम् = पुण्यम् → तश्चौरामृतपुच्छेषु म्लेच्छे च कुत्रचिद् अपुमास्तरणे पुण्ये - [१३/१४] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरप्ररूपित:, थं तं यस्य स थत: = पुष्कलपुण्य: आर्हन्त्यात् तस्य पुण्यातिशायित्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ढम् - ढः = विमत्सर: मात्सर्यरहित इत्यर्थः → ढः स्वभावे विमत्सरे - [५७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, द्वेषशून्यत्वाद् तस्य तत्पर्यायवाचित्वात् तदुक्तं प्रशमरतिप्रकरणे → परिवादमत्सरासूया: वैरप्रचण्डनाद्या नैके द्वेषस्य पर्याया: 6 [१९] इति, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? डठम् - ड: = राग: → डशब्द: पुंसि डिण्डीरे हस्ते चापि भगन्दरे पिशाले पथिके काले रागे च परिकीर्त्यते - [६०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, ठः = क्षय: → ठ: पुमान् वृषभे शून्ये हासे त्रासे क्षये - [६७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, डस्य ठो यस्य स डठः = रागक्षय: रागरहित इत्यर्थ: संक्लेशशून्यत्वात् तस्य तज्जनित्वात् तच्च अष्टकप्रकरणप्रारम्भे ध्वनितम्, तम् ।
उभयविशेषणाभ्यामर्हतो राग-द्वेषारिहन्तृत्वमुक्तमेतेन → रागद्दोसारीणं हन्ता * [१३] इति चतुःशरणप्रकीर्णकवचनमपि व्याख्यातम् । ___पुन: कीदृशम् ? टम् - ट: = स्थिर: स्थिरैकस्वभाव इत्यर्थ: → ट: स्थिरे 6 [४३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, मेरुवदप्रकम्पत्वात्तदुक्तम् → मंदरो इव अप्पकंपे - [११९] इति कल्पसूत्रे, तम् ।
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पुन: कीदृशम् ? ञम् - ञ: = प्राज्ञः ञः प्राज्ञपटगायने ← [ ९ ] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, विशिष्टबुद्धिरित्यर्थः संसारपारगत्वान्मन्दमतेः संसारोक्तत्वात् तथा चार्षम् → एस संसारे त्ति पवुच्चति मंदस्स अवियाणओ ← [ ४९ ] इत्याचाराङ्गसूत्रे, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? झजम् झः = रविः झो रवावपि निर्दिष्टः ← [१०] इत्येकाक्षरकोशो महाक्षपणककृतः, जम् = तेज: जं कटीभूषणे पन्यां तेजस्यम्बुनि ← [३३] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवग्रथितः, झ इव जं यस्य स झजः = तपनतेजाः सूर्यवद् दीप्ततेजा इत्यर्थस्तथा च पारमर्षम् → सूरो इव दित्ततेया ← [२-२-६४] इति द्वितीयाङ्गे तथा सूरो इव दित्तते ← [११९] इति कल्पसूत्रे च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? छचम् छः = अब्जम् कमलमित्यर्थः → छो भान्वाच्छादनाब्जेषु ← [२५] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथगुम्फितः, चः = मुखम् → चश्चञ्चुश्चारणोऽर्चिर्मूखो ? (मुखं) रवि: ← [३३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिभणिता, छ इव चो यस्य स छचः = नलिनाननः परमसौम्यत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? ङघम् डंम् = सुखम् ङं वितानं सुखम् ← [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, घः = अम्बुधिः समुद्र इत्यर्थः घो वाद्याम्बुधराम्बुधौ ← [८] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्ररूपिता, डस्य घ इति ङघः = सुखसमुद्रः अनन्तसुखवानित्याशयः अपवर्गोपलब्धेस्तत्रैव तस्य सत्त्वात् तदुक्तं शास्त्रवार्तासमुच्चये सुखाय तु परं मोक्षो जन्मक्लेशादिवर्जितः ← [८/२२] इति, तम् ।
अथ प्रथमा स्तुतिर्न केवलं श्रीकलिकुण्डपार्श्वस्यैवापितु सामान्यजिनवरस्यापि तदित्थम् - ‘धद !' अत्र श्लेषः कर्तव्यः, 'ध द' इति ।
धः पुंसि धर्मिके ? ( धार्मिके) ← [ ८६ ]
ध ! ं धः = धार्मिकः इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, तस्य सम्बोधने ।
मङ्गलाचरणम्
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नम् + नः = जिन: → नकारो जिनपूज्ययो: - [१३] इति विश्वलोचनकोश:, तम् ।
'शवलम्' अत्रापि श्लेष: कृत्य: ‘शव लम्' इति ।
शव = गच्छ → शव गतौ - [हैमधातुपाठः-४५९] पञ्चम्यां मध्यमपुरुषैकवचने प्रयोग:, हे ध ! = हे धार्मिक ! त्वं नम् = जिनम् शव = गच्छ तीर्थकृतां शरणं याहीत्याशय:, यद्वा गत्यर्थकानां प्राप्त्यर्थकत्वाज्जिनेश्वरमवाप्नुहीत्याशयः।
कीदृशं नम् ? लम् - ल: = विमल: → विमलो लघुः ...लकारक: - [५२] इति प्रकारान्तरवर्णनिघण्टुः, द्रव्यभावाभ्यां नैर्मल्यं विज्ञेयम्, तम् ।
कीदृश हे ध ! ? ह ! • हः = शूरः → ह: कामशूरगमने [१५] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातरचिता, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ! ? फप ! • फ: = न्याय: → फोऽपारदर्शने देवे न्याये - [८४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, पम् = हेम सुवर्णमित्यर्थः → पं क्लीबे हेम्नि + [५४] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविहितः, फस्य पं यस्य स फप: = न्यायनिष्कः न्यायोपार्जितकाञ्चनवानित्यर्थः, धार्मिकस्य न्यायनिष्ठत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ! ? द ! - द: = दाता → दो दाता - [६२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? ण ! - णः = योग्य: → णो निर्गुणे जपे योग्ये 6 [५८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, धर्मायार्हत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ! ? गख ! + गम् = वरम् श्रेष्ठमित्यर्थः → गं च वादित्रं शरणं वरम् - [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, खम् = पुण्यम् → खकारं जाह्नवीबीजं स्फटिकं पापनाशनं भोगमोक्षप्रदं पुण्यम् - [१७] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातभणिता, गं खं यस्य स गवः = प्रशस्यपुण्य: अन्यथा धर्मानुपलब्धेः, तस्य सम्बोधने । फलितार्थः, हे ध ! ह-फपादिविशेषणैर्विशिष्ट ! त्वं नं सपादिविशेषणे
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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विशिष्टं शवेति स्वतन्त्रमपीदं सामान्यजिनवरस्तवनं विज्ञेयम्, श्रीकलिकुण्डपार्श्वनाथस्य तु स्पष्टमेव ।
श्रीहस्तिनापुरे तीर्थे बर्हत्परिपावने माघस्य श्यामषष्ठ्यां च दिनयोरेव हि द्वयोः ॥१॥ व्यत्ययाद् वर्णमालाया: सर्ववर्णप्रदर्शकौ । मङ्गलाचरणश्लोकौ संप्राप्तौ परिपूर्णताम् ॥२॥ युग्मम् ।।
इति मङ्गलाचरणम् ।। १ - २ ।।
★★★
मङ्गलाचरणम्
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[क: ] श्रीऋषभजिनस्तुतिः
ककक ककक: क: क
क: कक: ककक: ककः । कक-कक: कक: क: क:
श्रीआदीशः श्रियेऽस्तु नः ।। ३ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मजुला
अथ प्रथमं श्रीप्रथमजिनेश्वरस्तुति: कथ्यते । ककक: ककक इति ।
श्रीआदीश: = श्रीआदिनाथ ऋषभजिन इत्यर्थः नः = अस्माकं श्रिये = लक्ष्म्यै अस्तु = भवतु → असल् भावे - [३३०] इति कविकल्पद्रुमः वोपदेवप्ररूपितः, इति कियाकारकयोजना ।
अत्र ‘अस्तु' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'श्रीआदीश:', कस्यै ? ‘श्रियै' केषाम् ? 'न:', सर्वाण्यपराणि श्रीआदीशस्य विशेषणानि ।
कीदृश: स श्रीआदीश: ? कककः कम् = दुःखम् → कं सुखं तोयं पयो दुःखम् [२०] इत्येकाक्षरनाममाला विश्वशम्भुरचिता, कः = जलद: → कः स्याद्रुते महे बुने मारुते शमने वने सितवणे मयूरे च हठे चाटुनि वारिदे * [२५] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, कः = समीर: → को यमाग्निदिवाकरे द्योतात्मब्रह्मवातेषु - [६/७] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, कमेव क इति ककः = दु:खजलदः तत्र कः = समीर: इवेति कककः = दु:खजलदसमीर: दूरीकृतदुःख इत्याशय:, रागरहितत्वाद् रागानुरक्तस्यातीवदुःखत्वाद्, तदुक्तम् → रागाणुरत्तस्स अईवदुक्खम् + [६] इत्युपदेशसप्ततिकायाम् (नव्यायाम्) ।
पुन: कीदृश: ? कककः - कः = आत्मा → को ब्रह्मण्यात्मनि - [१५] इत्यनेकार्थसङ्ग्रहः श्रीहेमचन्द्राचार्यरचितः, कः = चामीकरम् काञ्चनमित्यर्थः → निगदित: ककार: चामीकरेऽपि - [१७] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, कः = वह्निः → कः सूर्यमित्रवाय्वग्नि- [९] [क:] श्रीऋषभजिनस्तुति:
१७
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अन्वयः - कककः [दुःखजलदसमीरः] ककक: [आत्महेमहुताशन:] कः [भूपाल:]
कक: [शुक्लशोणित:] ककः [सुखसागरः] ककक: [मनोजज्वलनजीमूतः] ककः [सुरालयसौख्यप्रदाता] कक-कक: [आदित्यवदनसर्वासुमत्सखा] कक: [सुविशुद्धचेतन:] क: [चक्री] क: [दक्षः] श्रीआदीश: [श्रीयुगादिदेव:] न: [अस्माकम् श्रिये [लक्ष्म्यै] अस्तु [भवतात् ।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिप्रणीता, क एव क इति ककः = आत्मसुवर्णम् तस्मिन् - तस्य विशुद्धौ क इव य इति कककः = आत्महेमहुताशनः ।
पुन: कीदृश: ? कः = कः = भूपाल: → को ब्रह्मणि समीरात्मयमदक्षेषु भास्करे कामग्रन्थौ चक्रिणि च पतत्रिपार्थिवे - [१-१] इत्यभिधानरत्नमाला मेदिनीकरनिर्मिता (मेदिनीकोश:), अयोध्यानगर्या अधिपतित्वात् ।
पुनः कीदृश: ? कक: • कः = सितवर्ण: → को ब्रह्मा अनिलार्काग्निचित्तधीयमके किषु विष्णा(ष्ण्वा)वाहनशब्देऽब्धौ सितवणे . [१७] इति नानार्थ रत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथरचिता, कम् = रुधिरम् → कं शुक्रे रुधिरे - [३६] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रथिता, कः कं यस्य स कक: = शुक्लशोणित: तीर्थकृतामतिशयविशेषात् । __पुन: कीदृशः ? कक: - कम् = सुखम् → कं सुखञ्च प्रकीर्तितम् - [२] इत्येकाक्षरकोशोऽज्ञातविद्वत्कृत:, कः = सागर: → को ब्रह्मा अनिलार्काग्निचित्तधीयमकेकिषु विष्णा(वा)वाहनशब्देऽब्धौ - [१७] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथरचिता, कस्य क इति ककः = सुखसागर: आत्मसौख्यनीरधिनिमग्नत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? कककः = कः = कन्दर्पः → क: स्वर्गे स्मरसूर्ययो: . [९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनविरचित:, कः = अग्नि: → को ब्रह्मात्मप्रकाशार्ककेकिवायुयमाग्निषु - [२१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, क: = पर्जन्य: → कः स्याद्रुते महे बुझे मारुते शमने वने सितवर्णे मयूरे च हठे चाटुनि वारिदे - [२५] इति पूर्वोक्तामात्यमाधववचनाद्, क एव क इति कक: = कन्दर्पकृशानुः तत्र-तदुपशमने क इव य इति ककक: = मनोजज्वलनजीमूत: मदनदमनत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? कक: - कः = स्वर्ग: → को ब्रह्मण्यर्कवाय्वग्निशमनस्वर्गकेकिषु — [२०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवरचितः, कम् = सुखम् → कं सुखेऽपि प्रकीर्तितम् - [३] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकरचितः, कस्य कं स्याद् यस्मात् स ककः = सुरालयसौख्यप्रदाता ।
पुन: कीदृश: ? कक-ककः । [कः] श्रीऋषभजिनस्तुति:
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रुचिरा दु:ख रूपी मेघ को दूर करने के लिए वायु तुल्य, आत्मा रूपी सुवर्ण को प्रदीप्त करने के लिए अग्नि तुल्य, राजा, श्वेतरक्तवाले, सुख के समुन्द्र, काम रूपी अग्नि का उपशमन करने के लिए मेघ तुल्य, स्वर्ग सुख के दाता, सूर्य सम तेजस्वी मुखवाले, सर्व जीवों के मित्र, सुविशुद्ध आत्मावाले, धर्मचक्रवर्ती एवं दक्ष श्री आदिनाथ भगवान हमारी लक्ष्मी के लिए हो ॥३।।
રુચિરા દુ:ખરૂપી મેઘને દૂર કરવામાં વાયુ સમાન, આત્મારૂપી સુવર્ણને પ્રદીપ્ત કરવામાં અગ્નિ સમાન, રાજા, સફેદ રક્ત છે જેને એવા, સુખના સમુદ્ર, કામરૂપી અગ્નિને ઉપશાંત કરવામાં મેઘ સમાન, સ્વર્ગનાં સુખને આપનારા, સૂર્યસમ તેજસ્વી મુખવાળા, સર્વ જીવોનાં મિત્ર, સુવિશુદ્ધ છે આત્મા જેનો એવા, ધર્મચક્રવર્તી અને દક્ષ શ્રી આદિનાથ ભગવાન અમારી तभी भाटे थामो ।। 3 ।।
२०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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कक: - कः = सहस्ररश्मिः सूर्येऽपि कः स्मृतः ← [७] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिविरचिता, कम् = वदनम् → शिरोऽम्बुवदनेषु कम् ← [७] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, क इव कं यस्य स ककः = आदित्यवदनः अतिशयतेजस्वित्वात्,
कक: ं कम् = जीवः कं स्तब्धनिर्जले जीवे ← [४४] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, कः = सखा क: सूर्यमित्र - ← [९] इति पूर्वोक्तसुधाकलशमुनिवचनाद्, कानां क इति ककः सर्वेषां जीवानां परिग्रहार्थं बहुवचनं ज्ञेयम् कक: = सर्वासुमत्सखा, अथवा कानि = सर्वे जीवा : का: = मित्राणि यस्य स ककः = सकलजन्तुसुहृत् अजातशत्रुत्वाद् द्वेषविषरहितत्वाच्च, ककश्चासौ ककश्चेति कककक: = आदित्यवदन-सर्वासुमत्सखा । पुनः कीदृश: ? ककः कः = शुद्धः कलहे को विजानीयात् प्रश्नेऽर्थेऽपि क्वचिन्मतं स्वर्गे चक्रे तथा मित्रे शुद्धे ← [३५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, कः = आत्मा को वायुशमनार्केषु ब्रह्मण्यात्मनि पावके ← [१-१] इति शब्दरत्नसमन्वय: शाहराजमहाराजनिर्मित, कः को यस्य स कक: = सुविशुद्धचेतनः कर्ममालिन्येनामलिनत्वात् ।
पुनः कीदृश: ? कः कः = चक्री को ब्रह्मणि समीरात्मयमदक्षेषु भास्करे कामग्रन्थौ चक्रिणि च ← [ १ - १] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरविनिर्मितः, धर्मचक्रित्वात् ।
पुनः कीदृश: ? कः कः = दक्षः इति पूर्वोक्तमेदिनीवचनात्, अनन्यचातुर्यात् ।
बीजनोराभिधे ग्रामे माघासिताष्टमीदिने प्रणीतेयं ककारेण श्रीप्रथमेश्वरस्तुतिः
[क] श्रीऋषभजिनस्तुतिः
इति श्रीऋषभजिनस्तुतिः ॥ ३ ॥
✰✰
को ब्रह्मणि... दक्षेषु ← [ १ - १ ]
२१
11811
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[ खः] श्रीअजितनाथस्तुतिः
खखखं खं खखं खं ख
खं खखखं खखं खख ! | खखखं खखखं खं खं
स्तुष्व त्वमजितं जिनम् ।। ४ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
य: प्रथम: = विस्तृतश्री: (प्रथा = विस्तीर्णा मा = लक्ष्मी: यस्य) स कर्मभिरजितो भवति, अल्पश्रीणां तु कर्मभि: परास्तत्वाद्, अनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीअजितनाथजिनस्य स्तुति: प्रोच्यते ।
खवखमिति ।
खख ! - खः = कृपण: → ख: पुंलिने कृशे... ने ? स्वर्गशून्यदराग्निषु कृपणे [३२/३३] इत्येकाक्षरनाममालाडमात्यमाधवविरचिता, खः = पार्थिवः → खः शून्यखड्गनृपतौ - [७] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, खश्चासौ खश्चेति खखः = कृपणनृपः, तस्य सम्बोधने, हे खख ! त्वम् अजितं जिनम् = श्रीअजितनाथजिनेश्वरं स्तुष्प = स्तवनविषयीकुरुष्व → ष्टुंग्क् स्तुतौ - [११२४] इति धातुपाठ: श्रीहेमचन्द्राचार्यरचितः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः । ___ अत्र ‘स्तुष्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'अजितं जिनम्', किं सम्बोधनम् ? 'ख', अन्यानि श्रीअजितनाथस्य विशेषणानि । ___ कीदृशं श्रीअजितनाथम् ? खनखम् - खम् = चन्द्रबिम्बम् → खमित्युक्तमिन्द्रियाकाशयोपे चन्द्रबिम्बे - [११/१२] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनविरचितः, खः = स्फटिक: → खकारं जाह्नवीबीजं स्फटिकम् ? (क:) - [१७] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, खम् = वर्ण: → खं सैन्ये गगने बिन्दाविन्द्रिये चन्द्रमण्डले वर्ण- 6 [१३/१४] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपप्रणीत:, खञ्च खश्चेति खखौ तद्वद् खं यस्य स खनन: = चन्द्रबिम्ब
ख :] श्रीअजितनाथस्तुति:
२३
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अन्वयः - (हे) खख ! त्वम् [कृपणनृप ! त्वम्] खणखम् [चन्द्रबिम्बस्फटिक
वर्णम् खम् [शान्तम् खखम् [शून्यकर्माणम् खम् [मुक्तिदायकम्] खखम् [स्वर्गसुखदातारम्] खणखम् [शिवशर्मसंवेदनकारकम्] खखम् [सत्यसंपत्स्वामिनम्] खणखम् [नृपतिनक्षत्रनभोमणिम्] खवखम् [रङ्कदीनयोरपि कृपावर्षकम्] खम् [भुक्तिदायकम्] खम् [समर्थम्] अजितं जिनम् [श्रीअजितनाथजिनेश्वरम्] स्तुष्व [स्तवनविषयीकुरुष्व] ।
२४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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स्फटिकवर्णः, आत्मनो विशुद्धस्वरूपप्राप्तेः, तम्, चन्द्रबिम्बस्य धवलतमत्वेऽपि कलकितत्वात् पुन: स्फटिकशब्दस्योपन्यास: ।
नन्वात्मनो विशुद्धस्वरूपप्राप्तावात्मनि क: परिणाम: ? इत्याशङ्कामुपस्थाप्य तदुत्तरमाह ।
पुन: कीदृशम् ? खम् - खः = शान्त: → खः पुंलिङ्गे कृशे...ने (?) स्वर्गशून्यदराग्निषु कृपणे निश्चये शान्ते - [३२/३३] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविहिता, शान्तिरेव तन्निर्वाणस्वरूपत्वात् तदुक्तम् → संति णिव्वाणमाहियं + त्ति [१-३-८०] सूत्रकृताङ्गे, तम् ।
कस्माच्च परमशान्त्युपलब्धि: ? इति प्रश्नस्योत्तरं व्याचिख्यासुराह ।
पुन: कीदृशम् ? ख्रनम् - खम् = शून्यम् → खमिन्द्रिये पुरे क्षेत्रे शून्ये - [१६९५] इति वाङ्मयार्णव: श्रीरामावतारशर्मरचितः, खम् = कर्म → खमिन्द्रिये पुरे क्षेत्रे शून्ये बिन्दौ विहायसि संवेदने देवलोके कर्मण्यपि नपुंसकम् * [२-१] इत्यभिधानरत्नमाला मेदिनीकरनिर्मिता, खं खं यस्य स खखः = शून्यकर्मा कर्मावलिरहित इत्यर्थ: दु:खरहितत्वात्, तम् ।।
ननु कर्मपङ्क्तिनिवृत्तावसुमतां किं स्थानम् ? मोक्ष एवात: जिनेशस्य मोक्षदायकत्वमाह ।
पुन: कीदृशम् ? खम् - खः = मुक्तिदायक: → खकारं जाह्नवीबीजं स्फटिकं ? (क:) पापनाशनं भोग-मोक्षप्रदं पुण्यं भुक्ति-मुक्तिप्रदायकम् . [१७] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, पूर्वं शान्तत्वेन स्वस्य मुक्तत्वमुक्तमत्र परान् मोचयतीत्याशय:, तम् ।
न च तीर्थेश: केवलं मुक्तिसुखमेव ददाति स्वर्गसुखस्यापि दायकत्वात् तदेवाह ।
पुन: कीदृशम् ? ख्रखम् - खः = स्वर्ग: → स्वर्गेऽपि ख उदाहृतः . [९] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिविरचिता, खम् = सुखम् → खमिन्द्रिये सुखे * [४५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, स्यात् खस्य खं यस्मात् स खखः = स्वर्गसुखप्रदाता सर्वं रातुमीशत्वात्, तम् ।
अन्येषां सुरालयसुखानुभूति: स्वस्य च शिवसुखप्रतीतिरित्येवाह । [ख :] श्रीअजितनाथस्तुति: २५
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रुचिरा हे कृपण राजा ! तुं चंद्र एवं स्फटिक सम उज्ज्वल, शांत, कर्म रहित, मोक्ष के दाता, स्वर्ग सुख के दाता, मोक्ष सुख के संवेदक, सत्य रूपी संपत्ति के स्वामी, राजा रूपी नक्षत्रों में सूर्य समान, रंक एवं दीन जीवों पर कृपावृष्टि करनेवाले, भुक्ति के प्रदाता, एवं समर्थ श्री अजितनाथ . भगवान की स्तुति कर ॥४॥
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पुनः कीदृशम् ? खखखम् • खः = अपवर्गः खशब्दोऽर्के वितर्के व्योम्नि वेदने प्रश्ननिन्दानृपक्षेपसुखशून्येन्द्रिये दिवि अवसानेऽपवर्गे ← [ २४/२५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, खम् सुखम् खं सुखं च प्रकीर्तितम् ← [८] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहरकृतः, खम् = संवेदनम् → खमिन्द्रिये व्योम्नि पुरे शर्मणि त्रिदशालये क्षेत्रे संवेदने ← [ २- १] इति शब्दरत्नसमन्वय: शाहराजमहाराजरचितः, खस्य खमिति खखम्, खखस्य खं यस्य स खखखः = शिवशर्मसंवेदनकर्ता परमानन्दनीरधिनिमग्नत्वात्, तम् ।
मुक्तौ शिवशर्मानुभूत्याऽवबुध्यते सत्यमेव कैवल्यात् तदेवाह ।
पुनः कीदृशम् ? खखम् - खम् = सत्यम् खम् = संपत् → खमिन्द्रिये सुखे व्योम्नि नक्षत्रे क्षेत्रपालने कृपाफलकयोः शून्यबिन्दौ संवेशरङ्कयोः सूर्ये वर्णे नृत्ये सत्ये वन संपदि ← [ ४५/४६ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, खमेव खं यस्य स खखः = सत्यस्वरूपसंपत्स्वामी सर्वज्ञत्वात्, तम् ।
=
पुनः कीदृशम् ? खखखम् खः नृपतिः खशब्दोऽर्के वितर्के व्योम्नि वेदने प्रश्ननिन्दानृप ← [२४] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, खम् = नक्षत्रम् → खमिन्द्रियसुखव्योमनक्षत्र ← [२०] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथविहितः, खः = नभोमणिः सूर्य इत्यर्थः वर्तते खश्च भास्करे ← [१२] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिनिर्मिता, खा एव खानीति खखानि तत्र ख इव यः स खखखः = नृपतिनक्षत्रनभोमणिः अतिशयतेजस्वित्वाद्, तम् ।
--
पुनः कीदृशम् ? खखखम् - खम् = रङ्कः निर्धन इत्यर्थः → खमिन्द्रिये सुखे व्योम्नि नक्षत्रे क्षेत्रपालने कृपा- फलकयोः शून्यबिन्दौ संवेशरङ्कयोः ← [ ४५] इति पूर्वोक्तैकाक्षरीनाममालोक्तेः, ख: दीनः खः स्यादिह खगराजो नभोगतौ निश्चये तथा दीने ← [१८] इत्यजिरादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, खम् = कृपा → खमिन्द्रियसुखव्योमनक्षत्रक्षेत्रपट्टणे कृपाफलकयोः ← [ २०/२१] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथरचितः, खञ्च खश्चेति खखौ तयोरुपर्यपि खम् = कृपा यस्य स खखखः = रङ्कदीनयोः कृपावर्षक: परमकृपालुत्वात्ं सर्वेष्वपि जीवेषु समान दृष्टित्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? खम् - खः = भुक्तिदायकः, तम् → खकारं जाह्नवीबीजं
[ : ] श्रीअजितनाथस्तुतिः
२७
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રુચિરા હે કૃપણ રાજા ! તું ચંદ્ર અને સ્ફટિક જેવા ઉજ્વલ, શાંત, કર્મરહિત, મોક્ષને આપનારા, સ્વર્ગનાં સુખને આપનારા, મોક્ષ સુખનાં સંવેદક, સત્યરૂપી સંપત્તિનાં સ્વામી, રાજા રૂપી નક્ષત્રોને વિશે સૂર્યસમાન, રંક અને દીન જીવો ઉપર પણ કૃપા વરસાવનારા, ભુક્તિને આપનારા અને સમર્થ શ્રીઅજિતનાથ ભગવાનની સ્તવના કર. || ૪ ||.
૨૮
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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स्फटिकं ? (क:) पापनाशनं भोग-मोक्षप्रदं पुण्यं भुक्ति-मुक्तिप्रदायकम् + [१७] इति पूर्वोक्तैकाक्षरनाममालावचनाद्, मुक्तिदातृत्वं तु पूर्वमुक्तमत्र भुक्तिदायकत्वम्, भव्येभ्यो यथायोग्यं ददातीत्याशयः ।
पुन: कीदृशम् ? खम् - ख: = क्षम: समर्थ इत्यर्थस्तम् → ख: स्यादिह खगराजो नभोगतौ निश्चये तथा (क्षमे) + [१८] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, अचिन्त्यसामर्थ्यवानित्याशय: सिद्धत्वात्, तस्य तत्त्वात्, तदुक्तम् → अचिंतसामत्था मङ्गलसिद्धपयत्था सिद्धा — [२५] इति चतुःशरणप्रकीर्णके।
दशम्यां कृष्णमाघस्य नूरपुरे पुरे मया । खकारेण जिनेन्द्रस्याजितस्य रचिता स्तुतिः ॥१॥
इति श्रीअजितनाथजिनस्तुति: ।। ४ ॥
★★★
[ख :] श्रीअजितनाथस्तुतिः
२९
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[ गः] श्रीशम्भवनाथस्तुतिः
गगं गगं गगं गं गं
गगगं गगगं गगः । गगं गगं गगं गं गं
भजेऽहं शम्भवं जिनम् || ५ ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यः कर्मभिरजितो भवति स शम्भव: (सर्वसौख्यकारकः) भवति कर्मभिर्जितस्य दरिद्रत्वात्, स्वस्य च दरिद्रत्वे परपरमसुखजनकत्वाभावादिति सम्बन्धेनायातस्य श्रीशम्भवस्वामिनः स्तुतिमाचष्टे ।
गगं गगमिति ।
शम्भवं जिनम् = श्रीशम्भवं स्वामिनं तृतीयतीर्थकृतम् अहं भजे = अहं सेवे → भज भागे सेवायाञ्च ← [पृ. ७९९ ] इति शब्दस्तोममहानिधिः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः, कीदृशोऽहम् ? गग: गः = भव: संसार इत्यर्थः, गः = प्रीतः अनुराग इत्यर्थ: गः प्रीतो भवः ← [२३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, गे गो यस्य स गगः = संसारानुरक्तः ।
अत्र ‘भजे' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' अहम्', कीदृशोऽहम् ? 'गगः', कं कर्मतापन्नम् ? ‘शम्भवम्', अन्यानि श्रीशम्भवजिनस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीशम्भवजिनम् ? गगम् ग = सहस्रांशुः → गो गन्धर्वे गणेशेऽर्के ← [३ - १] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यप्रणीतः, गः = उपमा → गशब्दः पुंसि गान्धारे गन्धर्वे गणनायके उपमार्थे ← [ ३४ / ३५] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवकृता, गस्य गो यस्य स गगः = : सहस्रांशूपमः अतिशयतेजस्वित्वाद् यद्वा भानुर्यथा स्वकीयैर्भानुभिश्चकास्ति तथैव जिनेशो निजानेकगुणमयूखै राजत इति, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? गगम् • गम् = वरं प्रशस्यमित्यर्थः → गं च वादित्रं शरणं वरम् ← [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, गम् = गात्रम् शरीरमित्यर्थः → गं गिरागात्रगाथासु ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदास[ग: ] श्रीशम्भवनाथस्तुति:
३१
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अन्वयः - गगम् [सहस्रांशूपमम्] गगम् [श्रेष्ठशरीरम् गगम् [परमार्थवक्तारम्
गम् [विघ्नविनाशकम् गम् [श्रेष्ठम् गगगम् [उत्तमशब्दवन्तमुत्तमस्वरवन्तञ्च] गगगम् [संसारस्तम्बेरमसिंहम्] गगम् [श्रेष्ठशरणम् गगम् [रागरहितम् गगम् [नागगमनम्] गम् [शुभम् गम् [उत्तमम् शम्भवं जिनम् [श्रीशम्भवजिनेश्वरम् गग: संसारानुरक्तः] अहं भजे [अहं सेवे]।
३२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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व्यासविहिता, गं गं यस्य स गग: = श्रेष्ठशरीर: समचतुरस्रसंस्थानवत्त्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? गगम् + ग: = परमार्थ: सत्यमित्यर्थः, ग: = वाचा → परमार्थे सुरसिद्ध्यां च इव (?) निगदित: ? (तो) गकार: गत्याक्षेपे वस्तुनि गान्धारेऽप्यथ वाचायाम् - [१९] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, गो गे यस्य स गग: = परमार्थवक्ता महासत्त्ववत्त्वात्, महासत्त्वस्यान्यथावक्तुमशक्यत्वात्, तदुक्तम् → जंपंति न अन्नहा महासत्ता 6 [१४९] इति पुष्पमालायाम्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? गम् + गम् = विघ्नविनष्टा → गकारं तु गणेश: स्यात् पीताभं विघ्ननाशनम् [१८] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, मङ्गलरूपत्वात्, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? गम् + गम् = वरम् → गं च वादिनं शरणं वरम् . [२७] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, प्रशस्यतमत्वात्, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? गगगम् + ग: = उत्तम: → ग: प्रीतो भव: श्रीपतिरुत्तम: * [२३] इत्येकाक्षरनाममालिका सौभरिप्रणीता, ग: = शब्द: → गस्तु गातरि गन्धर्वे शब्दसङ्गीतयोरपि - [२५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, ग: = स्वरः → गो गणेश्वरे (गणे स्वरे) - [8] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, गश्च गश्चेति गगौ, गौ गगौ यस्य स गगग: = उत्तमशब्दवानुत्तमस्वरवांश्च उत्तमाधिपते: सर्वस्य प्रावर्यात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? गगगम् + ग: = भव: → ग: प्रीतो भव: - [२३] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, गम् = नाग: हस्तीत्यर्थः → -गत्योरपि गा स्मृता नपुंसके गलिते नागे च - [३५/३६] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवरचिता, ग: = सिंहः → गकारः सिंहसंज्ञक: [२१] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातरचित:, ग एव गमिति गगम् तत्र ग इवेति गगग: = संसारस्तम्बरमसिंहः संसारपारग इत्यर्थः निष्कषायत्वात् कषायस्य संसारमूलकर्ममूलत्वात्, तथैतदार्षम् → संसारस्स उ मूलं कम्मं तस्स वि य होंति य कसाया [९०] इत्याचाराङ्गनिर्युक्तौ, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? गगम् + गम् = वरम् गम् = शरणम् → गं च वादित्रं शरणं वरम् [२७] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, गं गं यस्य स गग: = [ग:] श्रीशम्भवनाथस्तुतिः
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रुचिरा सूर्य की उपमा वाले, श्रेष्ठ शरीरी, परमार्थ के वक्ता, विघ्नों के विनाशक, प्रशस्य, श्रेष्ठ शब्दवाले एवं उत्तम स्वरवाले, संसार रूपी हाथी के लिए सिंह तुल्य, श्रेष्ठ शरणवाले, राग रहित, हस्तिवद् गमनवाले, शुभ एवं उत्तम श्री शंभवनाथ भगवान का संसार में अनुरक्त मैं भजन करता हूं ॥५॥
રુચિરા સૂર્યની ઉપમા વાળા, શ્રેષ્ઠ શરીરી, પરમાર્થને કહેનારા, વિક્નોનો વિનાશ કરનારા, પ્રશસ્ય, શ્રેષ્ઠ શબ્દવાળા અને ઉત્તમ સ્વરવાળા, સંસાર રૂપી હાથીને વિશે સિંહસમાન, શ્રેષ્ઠ છે શરણ જેનું એવા, રાગરહિત, હાથી જેવું ગમન છે જેનું એવા, શુભ અને ઉત્તમ શ્રી શંભવનાથ ભગવાનને સંસારમાં અનુરક્ત હું ભજુ છું. / ૫ ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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श्रेष्ठशरण: समस्तदुःखार्तसत्त्वशरण इत्यर्थः → समत्तदुक्रवत्तसत्तसरणाणं . [२२] इति चतु:शरणप्रकीर्णकवचनात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? गगम् + गम् = गलित: → गत्योरपि गा स्मृता गं नपुंसके गलिते [३६] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, ग: = प्रीत: अनुराग इत्यर्थ: → ग: प्रीतो भव: - [२३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, गं गो यस्य स गग: = रागरहित: निष्कषायत्वात्, तम् ।।
पुन: कीदृशम् ? गगम् + गम् = नाग: → गत्योरपि गा स्मृता गं नपुंसके गलिते नागे च परिकीर्तित: + [३५/३६] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकृता, गम् = गमनम् → गं गमनगीतयो: - [२६] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्मित:, गवद् गं यस्य स गग: = नागगमन: शुभविहायोगतित्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? गम् + गम् = शुभ: → गकारं तु गणेश: स्यात् पीताभं विघ्ननाशनं पूर्वापरस्थितिज्ञानं भूलोकविजयं शुभम् + [१८] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, विघ्नवारवारकत्वात्, तद् ।
___ पुन: कीदृशम् ? गम् + ग: = उत्तम: → ग: प्रीतो भव: श्रीपतिरुत्तमः * [२३] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, पुरुषोत्तमत्वात्, तम् ।
।
॥१॥
माघमासि त्रयोदश्यां श्यामलायां प्रकीर्तिता स्तुति: फल्गुतिथौ क्षेमकारणा सुन्दरीकरा तृतीयतीर्थकारस्य श्रीशम्भवजिनेशितु: गकारेण बृहद्ग्रामे मुरादाबादनामके
।
॥२॥
इति श्रीशम्भवनाथजिनस्तुतिः ।। ५ ।।
[ग:] श्रीशम्भवनाथस्तुति:
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[ घः] श्रीअभिनन्दनस्वामिस्तुतिः
घघघं घघघं घं घ
घं घघं घघघं घघ !। घघघघं घघं घं घं
त्वं वन्दस्वाभिनन्दनम् || ६ ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
य: सर्वासुमतां शंभव: (सुखस्य जनक:) स सर्वदेहिनामभिनन्दनो भवत्येव सुखानुभूतेरानन्दानुभूतिजत्वादिति सम्बन्धेनायातस्य श्रीअभिनन्दनस्वामिनः स्तुतिरुद्यते ।
घघघमिति ।
घघ ! - घम् = पापम् → घं पापमुच्यते - [३०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, घा = आर्तिः पीडेत्यर्थः → घा चार्ति: किङ्किणी च स्यात् । [४०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकृता, घस्य घा यस्य स घघ: तस्य सम्बोधने घघ ! = पापपीडावन् हे मनुष्य ! त्वम् अभिनन्दनम् = श्रीअभिनन्दनस्वामिनं चतुर्थजिनेश्वरं वन्दस्व = प्रणम → वदुङ् स्तुत्यभिवादनयो: * [२६३] इति कविकल्पद्रुम: श्रीहर्षकुशलगणिप्रणीतः, इति क्रियाकारकसण्टङ्कः ।
अत्र 'वन्दस्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'अभिनन्दनम्', किं सम्बोधनम् ? 'घघ', इतराणि श्रीअभिनन्दनजिनेश्वरस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीअभिनन्दनजिनम् ? घघघम् • घम् = पुण्यम् → पुण्ये प्रवाहे पाषण्डे घम् - [२९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, घम् = अमृतम् → घं वाद्यामृतयो: - [२३] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथरचितः, घ: = अम्बुधि: → घो वाद्याम्बुधराम्बुधौ - [८] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, घमेव घमिति घघम् तस्य घ इति घघघ: = पुण्यपीयूषपारावार: पुष्कलपुण्यवत्त्वात्, तम् ।
वैयर्थ्यमेव पुष्कलपुण्यानामपि पापमिश्रितत्वेनातो जगत्प्रभोः पापपावक[घ:] श्रीअभिनन्दनस्वामिस्तुति: ३७
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अन्वयः
(हे) घघ ! त्वम् [ हे पापपीडावन् मनुष्य ! त्वम् ] घघघम् [पुण्यपीयूषपारावारम्] घघघम् [पापपावकपर्जन्यम् ] घम् [ शत्रुनाशनम् ] घघम् [ पार्थिवपुत्रम् ] घघम् [ धराधरध्वनिम् ] घघघम् [ संवेगसुधाकलसम्] घघघघम् [ वास्तोष्पतिविशेषविक्रमम् ] घघम् [ पृथ्वीपूषाणम् ] घम् [शिवोत्तमम्] घम् [विनीतानगर्या राजानम् ] अभिनन्दनम् [ श्रीअभिनन्दनस्वामिनम् ] वन्दस्व [ प्रणम ] |
૨૮
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पर्जन्यत्वेन पापशून्यत्वमाह ।
पुनः कीदृशम् ? घघघम् • घम् = पापम् → घं पापमुच्यते ← [३०] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, घः = वह्निः घः सूनुर्वह्निः ← [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, घः = मेघ: घश्च मेघः समाख्यातः ← [१०] इत्यभिधानादि - एकाक्षरीनाममाला, घमेव घ इति घघस्तत्र घ इव यः स घघघः = पापपावकपर्जन्यः,
तम् ।
पुनः कीदृशम् ? घम् - घ: = शत्रुनाशक: → घकारं भैरवं विद्याद् रक्ताभं शत्रुनाशनम् ← [१९] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविहिता, सर्वारिजेतृत्वात्, तम्, शत्रुश्चात्राभ्यन्तरबाह्यभावाभ्यामवसेयः कामक्रोधाद्याभ्यन्तरशत्रुः विद्वेषिमिथ्यादर्थ्यादिश्च बायशत्रुस्तयोश्च जेतेत्याशयः ।
पुनः कीदृशम् ? घघम् घः = पार्थिवः घः = सूनुः पुत्र इत्यर्थः → घः सूनुर्वह्निः पूषा नृपः ← [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, घस्य घ इति घघ: = पार्थिवपुत्रः संवरराज्ञः पुत्रत्वात्, तम् अथवा घम् = पुण्यम् घम् = प्रवाहः → पुण्ये प्रवाहे पाषण्डे घम् ← [२९] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, स्याद् घस्य घो यस्माद् स घघः = पुण्यप्रवाहकारकः, तम्, स्वस्य पुण्यप्रकृष्टता तु पूर्वं प्रोक्ता, अत्र जिनेश्वरात् स्यादन्येषामपि पुण्यप्रकर्षतेत्याशयः ।
पुनः कीदृशम् ? घघम् घः = मेघः घो मेघश्च समाख्यातः [६] इत्येकाक्षरकोशो महाक्षपणककृतः, घम् = खः ध्वनिरित्यर्थः → घं च घोरे धुरो रवे ← [ २९ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, घवद् घं यस्य स घघः = धराधरध्वनिः गाम्भीर्यसमेतत्वात्, तम् ।
• →
पुनः कीदृशम् ? घघघम् घः = संवेग संवेगवाद्यभूमिश्च विशिखश्विगवेतस्याभोगीने (?) स्याच्च घः शब्दः ← [२०] इत्यजिरादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, घम् = अमृतम् →घं नादामृतयोर्भवेत् ← [४०] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, घः = कुम्भ: घो घने हनने रुद्रे घोषान्तर्भावकुम्भयोः ← [ ५० ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, घ एव घमिति इति घघम् = : संवेगसुधा तस्य घ इव य: स घघघः = संवेगसुधाकलस:, तम् ।
[घ] श्रीअभिनन्दनस्वामिस्तुति: ३९
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रुचिरा हे पाप से पीडित मनुष्य ! तुं पुण्य रूपी अमृत के समुद्र स्वरूप, पाप रूपी अग्नि को उपशांत करने के लिए मेघ तुल्य, शत्रु का नाश करनेवाले, संवर राजा के पुत्र, मेघ सम गंभीर ध्वनिवाले, संवेग रूपी सुधा के कुंभ स्वरूप, इन्द्र से अधिक विक्रमी, पृथ्वी में प्रभाकर तुल्य, शिव से भी उत्तम, विनीता नगरी के महाराजा श्री अभिनंदन स्वामी को नमन कर ।।६।।
રુચિરા હે પાપથી પીડિત મનુષ્ય ! તું પુણ્યરૂપી અમૃતનાં સમુદ્ર સ્વરૂપ, પાપરૂપી અગ્નિનું ઉપશમન કરવામાં મેઘસમાન, શત્રુનો નાશ કરનારા, સંવર રાજાનાં પુત્ર, મેઘ જેવી ગંભીર ધ્વનિવાળા, સંવેગરૂપી સુધાનાં કુંભ સ્વરૂપ, ઇંદ્રથી પણ વિશિષ્ટ વિક્રમવાળા, પૃથ્વીમાં સૂર્યસમાન, શિવથી પણ ઉત્તમ, વિનીતાનગરીનાં મહારાજા શ્રીઅભિનંદન સ્વામીને નમન કરી ||६||
४०
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=
पुनः कीदृशम् ? घघघघम् घः = देव : → देवे घो मन्त्रेऽन्यार्थवाचक: ← [ २८ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, घः विशेषः → घस्तन्मात्रे निश्चयेऽपि परमार्थविशेषयोः ← [ १९९६ ] इति वाङ्मयार्णवः पण्डितरामावतारशर्मरचितः, घः = पराक्रमः घशब्दः पुंसि वै नागे पराक्रमनिदाघयोः ← [३९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, घानां घ इति घघः = देवाधिदेवः शतक्रतुरित्यर्थः घश्चासौ घश्चेति घघः = विशेषविक्रमः, घघाद् घघो यस्य स घघघघः = वास्तोष्पतिविशेषविक्रमः अनुत्तरपराक्रमत्वात् तदुक्तम् भगवतां क्षीणनि:शेषवीर्यान्तरायत्वात् सर्वामरनरेन्द्र निवहपराक्रमादनन्तगुणत्वादनुत्तर एव [ १०४९ ] इति विशेषावश्यकभाष्यवृत्ती, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? घघम् ← घः = भूः पृथ्वीत्यर्थः → भूवार्ताघोरेषु घः ← [ ५१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, घः = पूषा सूर्य इत्यर्थः घः सूनुर्वह्निः पूषा ← [२७] इति पूर्वोक्तसौ भरिवचनाद्, घे घ इवेति घघः = पृथ्वीपूषा अज्ञानान्धकारनिवारकत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? घम् ← घ: = शिवोत्तम: शिव: शङ्कर इत्यर्थस्तस्मादप्युत्तम इत्याशयः → खड्गी शिवोत्तमो मेधा दक्षिणाङ्गुलिमूलग:, घनो घनस्वरश्चैव घकारः ← [२२] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातरचितः, विगतरागद्वेषत्वादधिकं लोकतत्त्वनिर्णयतो विज्ञेयम्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? घम् घः = पार्थिवः घः सूनुर्वह्निः पूषा नृपो गज: ← [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरि प्रणीता, विनीतानगर्या अधिपतित्वात्, तम्, पूर्वं पार्थिवपुत्रत्वेन परमेश्वरस्य प्रकुलत्वं प्रख्यातमधुना प्रजापतित्वेन निजौज इति ।
माघरामचतुर्दश्यां विहितेयं मया मुदा 1 शाहबादे घकारेण श्रीअभिनन्दनस्तुतिः
।। १।।
इति श्रीअभिनन्दनस्वामिस्तुतिः ।। ६ ।।
[घ] श्रीअभिनन्दनस्वामिस्तुति: ४१
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[चः] श्रीसुमतिनाथजिनस्तुतिः
चचचं चचचं चं च
चचचचं चचं च ! च ! । चचं चचं चचं चं चं
सुमतिं सुमतिं स्तुहि ।। ७ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मज्जुला
यः सर्वजनाभिनन्दनः स सुमति: ( शोभनमतिः) सर्वजीवनन्दनदाने शोभनमतेरपि परमकारणत्वादिति सम्बन्धेनायातस्य श्रीसुमतिनाथजिनस्य स्तुतिरुद्गीर्यते ।
चचचमिति ।
हे च ! - चः = भृत्यः चः स्याद् भृत्येन्दुतस्करे ← [C] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्ररूपिता, तस्य सम्बोधने, त्वम् सुमतिम् = श्रीसुमतिनाथजिनम् स्तुहि = स्तवनविषयीकुरुष्व स्टुञ् स्तुतौ ← [ भा. १, पृ.९८-३४] इति माधवीयाधातुवृत्ति:, इति क्रियाकारकसण्टङ्कः ।
→
कीदृश हे च ! ? च ङ च: = चञ्चल: → चञ्चलश्च चकारः स्मृतो बुधैः ← [२४] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातप्रोक्तः, तस्य सम्बोधने, स्वाभीप्सापूर्त्यर्थं सर्वत्राटाट्यते चाञ्चल्यादतस्तमाह यज्जिनस्यैव स्तवनादिकं कुरु नान्यस्येति ।
अत्र 'स्तुहि' इति क्रियापदम् कः कर्ता ? ' त्वम्' अध्याहृतमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? ‘सुमतिम्', किं सम्बोधनम् ? ' च !', 'च' तु तस्य विशेषणम्, अन्यानि श्री सुमतीशस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीसुमतिनाथम् ? सुमतिम् = शोभना मतिः यस्य स सुमतिस्तम्।
पुनः कीदृशम् ? चचचम् चः = चन्द्रमा: → चन्द्र (मा:) चः समाख्यातः ← [८] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकप्रणीतः, चः = अर्चि: अंशुरित्यर्थः → चश्चञ्चुश्चारणोऽर्चिः ← [ ३३ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, चम् = रुधिरम् → चा शोभायां स्त्रियामुक्ता रुधिरे चं नपुंसके ← [ ४३ ] इत्येकाक्षरशब्द
[चः] श्रीसुमतिनाथजिनस्तुतिः
४३
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अन्वयः छ (हे) च च ! [भो चञ्चल सेवक !] (त्वम्) चचचम् [शशिशोचि:
शोणितम्] चचचम् [चतुरचकोरचन्द्रम् चम् [ईश्वरम्] चचचचम् [सुखशाख्रिसवितृशुचिम्] चचम् [आत्मनो नैर्मल्यस्य कारकम्] चचम् [विधुवदनम्] चचम् [सुन्दरस्वरम्] चचम् [दिव्यसुखदातारम्] चम् [विमलम्] चम् [विरसम्] सुमतिम् [प्रकृष्टप्रज्ञम्] सुमतिम् [श्रीसुमतिनाथस्वामिनम्] स्तुहि [स्तवनविषयीकुरुष्व] च (पादपूरणे)।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मालाडमात्यमाधवकृता, चस्य च इति चच: = शशिशोचि: तद्वद् चं यस्य स चचच: = शशिशोचि:शोणित: आर्हतातिशयात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? चचचम् - च: = सूरि: प्रबुद्ध इत्यर्थः → च: सूरौ . [१५] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनविरचितः, च: = चकोर: → चस्तुरुष्के स्वरे चौरे चकोरे - [२४] इति नानार्थ रत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथकथिता, च: = चन्द्रः → चस्तु तस्करचन्द्रयोः - [५] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यनिर्मित:, चा एव चा इति चचा: = चतुरचकोरा: तत्र-तदानन्ददाने च इव य इति चचच: = चतुरचकोरचन्द्र: विद्वद्वरेण्यत्वात् सर्वदर्शित्वाच्च, चन्द्रदर्शनात् स्याद्यथा चकोराणां चित्तप्रसन्नता तथैव प्रभुदर्शनादपि प्रबुद्धानामित्याशय:, तम् ।
___ पुन: कीदृशम् ? चम् + च: = ईश्वर: → चस्तुलुष्केश्वरे - [२९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृतः, अनन्तैश्वर्योपभोक्तृत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? चचचचम् - चम् = सुखम् → चं चरित्रं सुखम् . [३६] इत्येकाक्षरशब्दमाला सौभरिविहिता, च: = शाखी वृक्ष इत्यर्थ: → चस्तरौ - [१४] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिनिर्मिता, च: = सविता सूर्य इत्यर्थः → चश्चन्द्रमा: समाख्यातस्तरणिश्चापि कीर्तित: 6 [६] इति शब्दरत्नसमन्वय: शाहराजमहाराजकृत:, च: = शुचि: किरण इत्यर्थ: → चश्चञ्चुश्चारणोऽर्चि: 6 [३३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, चमेव च इति चच: = सुखशाखी चस्य च इति चच: = सवितृशुचि: चचे = सुखशाखिनो विस्तृतीकरणे चच: = सवितृशुचि: इव य इति चचचच: = सुखशाखिसवितृशुचि:, तम्, यथान्तरेणार्कप्रकाशान्न द्रुमस्याभिवर्धनं तथैव सुखस्यापि विना जिनवरान्नहीत्याशयस्तदवोचाम वयं जिनराजस्तोत्रस्य स्वोपज़राजहंसाभिधानायां वृत्तौ → अर्हता विना न सुखोत्पत्ति: * [श्लो. २४, पृ.-१४३] ।
पुन: कीदृशम् ? चचम् च: = विमल: निर्मल इत्यर्थः → चं क्लीबे विमले त्रिषु - [२९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृतः, च: = चेतन: → च: पुंसि चेतने [३१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, स्यात् चश्चो यस्मात् स चच: = आत्मनैर्मल्यकृत् कर्ममालिन्यापनेतृत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? चचम् - च: = चन्द्रः → च: पुंलिङ्गे निशानाथे . [च:] श्रीसुमतिनाथजिनस्तुति: ४५
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रुचिरा हे चंचल सेवक ! तु चन्द्र के किरण (चांदनी) सम श्वेत रक्तवाले, विद्वान रूपी चकोर के लिए चन्द्रमा तुल्य, ईश्वर, सुख रूपी वृक्ष की अभिवृद्धि करने के लिए सूर्यकिरण तुल्य, आत्मा की निर्मलता के कर्ता, चन्द्रमुखी, सुंदर स्वरवान्, दिव्य सुख के दाता, निर्मल, विरस एवं श्रेष्ठमति श्री सुमतिनाथ भगवान की स्तुति कर ।।७।।
રુચિરા હે ચંચળ સેવક !તુ ચંદ્રના કિરણ સમ ધવલ રક્તવાળા, વિદ્વાનરૂપી ચકોરને આનંદિત કરવામાં ચંદ્ર સમાન, ઇશ્વર, સુખરૂપી વૃક્ષની અભિવૃદ્ધિ કરવામાં સૂર્યનાં કિરણ સમાન, આત્માની નિર્મળતાને કરનારા, ચંદ્ર સમ મુખવાળા, સુંદર સ્વરવાળા, દિવ્ય સુખને આપનારા, નિર્મળ, વિરસ અને શ્રેષ્ઠ મતિવાળા શ્રીસુમતિનાથ ભગવાનની સ્તુતિ કર. | 9 ||
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[४३] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवरचिता, च: = मुखम् → चश्चञ्चुश्चारणोऽचिर्मूखो (?) मुखं रवि: 6 [३३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, च इव चो यस्य स चच: = विधुवदन: आह्लादोत्पादकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? चचम् - चम् = शोभनम् → चकारं भद्रकालीयं रक्ताभं शोभनं भवेत् - [२१] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, च: = स्वर: → चस्तुरुष्के स्वरे - [२४] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथविरचिता, चञ्चो यस्य स चच: = सुन्दरस्वर: सुस्वरनामकर्मोदयात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? चचम् - च: = दिव्यम् → दिव्ये केपये (?) पराभागे विप्रकनिष्ठाङ्गुल्यां भरहररेखासु च चकार: - [२१] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, चम् = सुखम् → चं चरित्रं सुखम् - [३६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, चश्चं यस्मात् स चच: = दिव्यसुखराता स्वर्गसुखप्रदातृत्वाद्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? चम् - च: = विमल: → चं क्लीबे विमले त्रिषु . [२९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः, कर्मकलङ्कविशुद्धत्वात्, तम्, सन्ति बहवोऽत्रावनितले मोहतिमिरसमेताः परमोहध्वान्तदूरीकरणपरा: प्रदीपवन्न च श्रीसुमतिनाथजिनेश्वर एतादृशः, अतोऽन्यात्मनिर्मलीकरणं पूर्वं प्रोक्तमत्र तु स्वयमपि विमल एवेत्याशयः ।
पुन: कीदृशम् ? चम् + च: = विरस: रस: = राग: विगतो रसो यस्मात् स विरस: = वीतराग इत्यर्थः → विरसे स्याद् दिव्ये केपये (?) पराभागे विप्रकनिष्ठाङगुल्यां भरहररेखासु च चकार: + [२१] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, कैवल्योपलब्धेः, तम् ।
च पादपूरणे → चकार: पुनरव्यय: अन्योन्यार्थे विकल्पार्थे समासे पादपूरणे + [१५] इत्येकाक्षरनाममाला श्रीसुधाकलशमुनिरचिता । स्तुत्वा पार्श्वमहिच्छत्रातीर्थे फाल्गुनपक्षतौ । ग्रथितेयं चकारेण श्रीसुमतीश्वरस्तुतिः ॥१॥
इति श्रीसुमतिनाथजिनस्तुति: ।। ७ ।।
[च:] श्रीसुमतिनाथजिनस्तुति:
४७
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[ जः ] श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुतिः
जजजजं जजं जं ज
जजजं ज ! जजं जज ! |
जजं जजं जजं जं ञं
पद्मप्रभं प्रभुं भज || ८ ॥
४८
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मञ्जुला
य: सुमतिर्भवति स पद्मप्रभ:(स्फुटितपद्मवन्मुखप्रभः) भवति, यतो न मनीषिणां मुखं हृदयगतचिन्ताग्निना दग्धमयं तु सर्वदा निश्चिन्त एवेत्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीपद्मप्रभस्वामिन: स्तुतिर्भाष्यते ।
जजजजमिति ।
हे ज ! = हे जीव ! स्वकीयात्मानमेव वक्ति → जो जिष्णौ विगते जीवे - [१९] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपरचितः, तस्य सम्बोधने, त्वं पद्मप्रभं प्रभुम् = श्रीपद्मप्रभस्वामिनं षष्ठं तीर्थकरं भज = सेवस्व → भजी सेवायाम् [८९५] इति हैमधातुपाठः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः ।
कीदृश हे ज ! ? जज ! • ज: = निशाकर: → जा स्त्रियां देववाहिन्यां योनिसागरवेलयोः (जो निशाकरवेलयोः) - [२७] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथप्रणीत:, जम् = निर्मलम् → जं वृत्ते निर्मलं प्रोक्तम् [१७] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दननिर्मित:, ज इव जमिति जजम् = निशाकरनिर्मलः, तस्य सम्बोधने, यत: कर्मकलङ्कमालिन्येऽपि जीवस्तु स्वभावतो विमल एवातस्तस्य तत्त्वमुक्तम् ।।
अत्र ‘भज' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहार्यमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? पद्मप्रभं प्रभुम्', किं सम्बोधनम् ? 'ज', 'जज' तु तस्य विशेषणम्, अन्यानि श्रीपद्मप्रभस्वामिनो विशेषणानि ।।
कीदृशं श्रीपद्मप्रभं प्रभुम् ? जजजजम् - जा: = जैना: → ज: स्याज्जननजैनयो: 6 [५०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकृता, जा: = मत्सरिजना:
→ ज: पुमान् विजले मुक्ताविस्तारे मत्सरी?(रि)जने - [४८] इत्येकाक्षरशब्द[ज:] श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुति: ४९
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अन्वयः - (हे) जज ज ! [हे निशाकरनिर्मल ! आत्मन् !] (त्वम्) जजजजम्
[जैनवैरिवैरविच्छेदकम् जजम् [विगतविद्वेषम्] जम् [जेतारम्] जजजजम् [चतुराननपङ्कजप्रद्योतनम्] जजम् [जीवरक्षकम्] जजम् [जन्मच्छेदकम् जजम् [तपनतेजसम्] जजम् [मेघराज्ञ: पुत्रम्] जम् [श्रेष्ठम्] जम् [निर्मलम्] पद्मप्रभं प्रभुं [श्रीपद्मप्रभस्वामिनम्] भज [सेवस्व ।
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मालाडमात्यमाधवविहिता, जः = मत्सर: → जो जवे विषमे मेरौ स्वर्गे पातरि मत्सरे - [५८] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रोक्ता, ज: छेदक: → जश्चारे छेदके - [१७] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनकथितः, जानां जा इति जजास्तेषां ज इति जजजस्तस्य ज इति जजजज: = जैनवैरिवरच्छेदक:, तम् ।
न केवलं परवैरच्छेदक: किन्तु स्वयमपि च तद्रहितस्तदाह ।
पुन: कीदृशम् ? जजम् ज: = विगत: → जश्च जेतरि जनने विगते 6 [१८] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिकथिता, ज: = मत्सर: → जो जवे विषये मेरौ शब्दे जेतरि मत्सरे * [२६] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथविरचित:, जो जो यस्मात् स जज: = विगतविद्वेष: निष्कषायत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? जम् - ज: = जेता → जेता जश्च समाख्यात: सूरिभिः शब्दशासने - [१३] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहरप्रणीतः, जेतृत्वञ्चार्हतो वेधा विज्ञेयं सर्वक्षितिपतिस्वामित्वाद् बाह्यत्वेन प्रथममपरञ्च क्षीणकामक्रोधमोहादिरिपुत्वादाभ्यन्तरत्वेनेति, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? जजजजम् + जः = चतुरानन: → चतुरानन:, मणिबन्धगतो वामे जकार: * [२६] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकृतः, जम् = जलम् → जं कटीभूषणे पत्न्यां तेजस्यम्बुनि - [२७] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथनिर्मित:, ज: = जननम् → जनने ज: प्रकीर्तित: 6 [१७] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिरचिता, ज: = प्रद्योतन: सूर्य इत्यर्थः → जो जेतृरविपद्मजे - [९] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, जे = जले ज: = जननम् यस्य तत् जजम् = जलजम् पङ्कजमित्यर्थः, ज एव जजमिति जजजम् = चतुराननपङ्कजम् तस्य प्रबोधने ज इव य इति जजजज: = चतुराननपङ्कजप्रद्योतन:, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? जजम् = जा: = जीवा: → जोऽथ केशवजीवयोः * [१७] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्रोक्तः, ज: = पाता रक्षक इत्यर्थः → जो जवे विषमे मेरौ स्वर्गे पातरि + [५८] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, जानां ज इति जज: = जीवरक्षक: अधर्मादेरिति शेष: [ज:] श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुति:
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रुचिरा
हे चन्द्र सम निर्मल जीव ! तुं जैनों के विद्वेषीओं के वेर के विच्छेदक, द्वेष रहित, जेता, चतुर व्यक्तिओं के मुख रूपी कमल को विकसित करने में सूर्य तुल्य, जीवों के रक्षक, जन्म के निवारक, सूर्य सम तेजस्वी, मेघराजा के पुत्र, श्रेष्ठ एवं निर्मल श्री पद्मप्रभ स्वामी भगवान की सेवा कर ||८||
રુચિરા
હે ચંદ્ર સમ નિર્મલ જીવ ! તું જૈનોનાં વિદ્વેષીઓનાં વેરનું વિચ્છેદન કરનારા, દ્વેષરહિત, જેતા, ચતુર વ્યક્તિઓનાં મુખરૂપી કમળને વિકસિત કરવામાં સૂર્યસમાન, જીવોની રક્ષા કરનારા, જન્મનું નિવારણ કરનારા, સૂર્ય સમ તેજસ્વી, મેઘ રાજાનાં પુત્ર, શ્રેષ્ઠ અને નિર્મલ શ્રીપદ્મપ્રભસ્વામીની
सेवा S२. ॥ ८ ॥
५२
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सद्धर्मप्ररुपकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? जजम् - ज: = जन्म → जनने ज: प्रकीर्तित: - [8] इत्येकाक्षरकोशो महाक्षपणकनिर्मित:, ज: = छेदक: → जश्चारे छेदके - [१७] इति पूर्वोक्तपरमानन्दनन्दनवचनाद्, जस्य ज इति जज: = जन्मच्छेदक: स्वस्य पक्षे चरमभवित्वादन्येषां पक्षे च मुक्तिं गमयितृत्वात्, तम् ।
___पुन: कीदृशम् ? जजम् ज: = तपन: → जश्चारे छेदके रवौ - [१७] इत्येकाक्षरीप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दननिर्मित:, ज: = तेज: → तेजस्यपि स्याज्ज: - [१४] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकथिता, ज इव जो यस्य स जज: = तपनतेजा: देदीप्यमानत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? जजम् - ज: = अम्बुद: मेघ इत्यर्थः → जा स्त्रियां देहविदा (वा) हिनी योनौ समुद्रवेलायां पुनपुंसकमम्बुदे - [४९] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकथिता, जम् = अपत्यम् आत्मज इत्यर्थ: → स्यादपत्ये जम् * [३७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, जस्य = मेघराज्ञ: जम् = अपत्यम् इति जजम् = मेघनृपतेः सूनुः, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? जम् - जम् = वरम् → जं तूक्तो वरशब्दे - [४९] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविरचिता, पुरुषश्रेष्ठत्वात्, तद् ।
पुनः कीदृशम् ? जम् • जम् = निर्मलम् → जं वृत्ते निर्मलं प्रोक्तम् - [१७] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दननिर्मित:, पापपङ्केनामलिनत्वात्, तद् ।
जकारेण तृतीयायां तिथावुज्ज्वलफाल्गुने पद्मप्रभस्तुति: प्रोक्ता सरदारपुरा-पुरि
।.. ॥१॥
इति श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुति: ।। ८ ।।
★★★
[ज:] श्रीपद्मप्रभस्वामिस्तुति:
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[तः] श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
तततं तततं तं त
___ तततं तततं तत !। ततं ततं ततं तं तं
सुपार्श्व ! त्वामुपास्महे ।। ९ ।।
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मञ्जुला
य: पद्माभ: स सुपार्श्व: (शोभनं पार्श्व यस्य स) इति सम्बन्धादायातस्य श्रीसुपार्श्वनाथस्य स्तुति: शस्यते ।
तततमिति ।
हे सुपार्श्व ! = भोः श्रीसुपार्श्वनाथस्वामिन् ! वयं त्वाम् उपास्महे = तवोपासनां कुर्महे उपपूर्वक ‘आस्'धातुः → आसिक् उपवेशने - [१११९] इति हैमधातुपाठः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः, कीदृश भोः सुपार्श्व ! ? तत ! - त: = तत्त्वम् → तत्त्वकरुणासु धातुर्वादविधावपि त: स्याद् - [३०] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, त: = अमृतम् → तश्चौरामृतपुच्छेषु - [१६१] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकररचितः, स्यात् त एव तो यस्मात् स तत: = तत्त्वामृतदायक: तस्य सम्बोधने ।
___ अत्र ‘उपास्महे' इति क्रियापदम्, के कर्तार: ? 'वयम्' अध्याहार्यपदमिदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'त्वाम्', किं सम्बोधनम् ‘सुपार्श्व', 'तत' सम्बोधनस्य विशेषणम्, अन्यानि ‘त्वाम्' इत्यस्य विशेषणानि ।
कीदृशं त्वाम् ? तततम् - ततम् = विस्तृतम् → ततम् - विस्तृते . [भा.-२,पृ.१०४७] इति शब्दार्थचिन्तामणि: सुखानन्दनाथनिर्मितः, तम् = पुण्यम् → तश्चौरामृतपुच्छेषु क्रोडे म्लेच्छे च कुत्रचित् अपुमांस्तरणे पुण्ये कथितः शब्दवेदिभि: + [१३/१४] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरप्रणीतः, ततं तं यस्य स ततत: = विस्तृतपुण्य: अनन्तैश्वर्योपभोक्तृत्वात्, तम् । ____ अस्त्वर्हत: पुण्यशालित्वम् किञ्च तेनान्येषाम् ? यथा कोट्यधिपतितोऽपरेषां धनादिकं न स्यात्तदा वैयर्थ्यमेव तस्यार्थस्य प्रोच्यते च प्रजाभिर्लोभी [त:] श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुति: ५५
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अन्वयः छ (हे) तत सुपार्श्व ! [भोस्तत्त्वामृतदायक सुपार्श्वनाथ !] तततम्
[विस्तृतपुण्यम्] तततम् [पुष्कलपुण्यप्रदायकम् तम् [शान्तम्] ततततम् [कोपकृशकम्पाकम्] तततम् [कर्मणा दग्धस्योपशान्तौ पीयूषतुल्यम् ततम् [करुणाचित्तम्] ततम् [जलवन्निर्मलमनसम्] ततम् [कुलहीनेऽपि कृपावर्षकम् तम् [महाबुद्धम् तम् [पालकम्] (वयम्) त्वाम् उपास्महे [वयं तवोपासनां कुर्महे ।
५६
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स्वार्थी चेति न च तीर्थकृत् स्वार्थी किन्तु परमार्थ्येव प्राप्यते च प्रजाभिस्ततः पुण्यप्रकर्षत्वमित्येव व्याचिख्यासुराह ।
पुनः कीदृशम् ? तततम् P स्यात् ततम् = विस्तृतम् तम् = पुण्यम् यस्मात् स ततत: = विस्तृतपुण्यप्रदायकः महादानेश्वरत्वात्, तम्
1
पुनः कीदृशम् ? तम् त: = शान्तः तः प्रेते निष्फले शाते (शान्ते) ← [६०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, क्षमाशीलत्वात्, तम् । पुनः कीदृशम् ? ततततम् '' तः = कोप: → तः पुंसि कोपे ← [ ४४ ] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवरचित:, तम् = तृणम् तं तृणम् ← [ ५९ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, ततः = वायुः ततः त्रिषु वायौ ← [भा. २, पृ.१०४०] इति शब्दार्थचिन्तामणिः सुखानन्दनाथप्रणीत:, त एव तमिति ततम् तत्र तत इव य इति तततत: = कोपकृशकम्पाकः क्षमावर्षित्वात्, तम्, स्वकीयस्य तु निष्क्रोधित्वं पूर्वं शान्तत्वेनोक्तमत्रान्यदेहिनां कोपमनयतीति व्याख्यातम्, प्रभञ्जनप्रभावाद् यथा तृणं दूरं याति तथैव जिनवरप्रभावाज्जीवानां क्रोधोऽपि दूरातिदूरं याति शून्यतामवाप्नोतीति भाव: ।
पुनः कीदृशम् ? तततम् तम् = कर्म नपुंसके तु तं तूणे कर्मार्थसूचकार्थयोः ← [७५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, त: = ताप: तस्तापामर्षदस्युषु ← [११] इति नत्वादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, तः = अमृतम् → तश्चौरामृतपुच्छेषु ← [ २३५८ ] इति वाङ्मयार्णवः रामावतारशर्मप्रणीतः, तस्य तो यस्य स ततस्तत्र त इव य इति तततः = कर्मणा दग्धस्योपशान्ती पीयूषतुल्यः, तम् ।
-
पुनः कीदृशम् ? ततम् त: करुणा करुणासु धातुर्वादविधावपि तः स्याद् ← [३०] इत्यजिरादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रोक्ता, तः = चेतः → तकारः कथितचौर: (चेतः) ← [२०] इत्यभिधानादि एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, तस्ते यस्य स ततः करुणाचित्तः परमकृपालुत्वात्, तम् । करुणायुक्तस्यैव चेतसो नीरवन्नैर्मल्यम्, तदाह ।
पुनः कीदृशम् ? ततम् ं तम् = जलम् इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, तः = चेतः
[तः ] श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
५७
तं तृणं जलमेव च ← [ ५९ ] तकारः कथितश्चौर : ( चेतः)
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रुचिरा
तत्त्व रूपी अमृत के प्रदाता हे श्री सुपार्श्वनाथ भगवान ! विस्तृत पुण्यवाले, पुष्कल पुण्य के प्रदाता, शांत, कोप रूपी तृण को दूर करने के लिए वायु तुल्य, कर्म से प्रज्वलित जीवों को शांति प्रदान करने के लिए अमृत तुल्य, करुणा युक्त चित्तवाले, नीर सम निर्मल मनवाले, हीन कुलवाले जीवों पे भी कृपा बरसानेवाले, महाबुद्ध, पालक, आपकी (तेरी) હમ ઉપાસના રતે હૈ IIII
રુચિરા
તત્ત્વરૂપી અમૃતને આપનારા હે સુપાર્શ્વનાથ ભગવાન ! વિસ્તૃત પુણ્યવાળા, પુષ્કલ પુણ્યને અર્પનારા, શાંત, કોપ રૂપી તૃણને દૂર કરવામાં વાયુ સમાન, કર્મથી પ્રજ્વલિત જીવોને શાંતિ આપવા માટે અમૃત સમાન, કરુણા યુક્ત મનવાળા, નીર સમ નિર્મળ ચિત્તવાળા, હીન કુલવાળા જીવો ઉપર પણ કૃપા વરસાવનારા, મહાબુદ્ધ અને પાલક એવા તમારી અમે ઉપાસના કરીએ છીએ. ।। ૯ ।।
५८
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← [२०] इति पूर्वोक्तैकाक्षरीनाममालावचनाद्, तवत् तो यस्य स ततः = जलवन्निर्मलमना: कर्मकालुष्यशून्यत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? ततम् • त: = म्लेच्छ: निम्नजातिमान् →तश्चौरामृतपुच्छेषु क्रोडे म्लेच्छे च कुत्रचित् ← [ १६ - १ ] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकररचित:, ता = कृपा → ता कृपायां स्त्रियां मता ← [ ६४ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्रणीता, ते ता यस्य स ततः = हीनजातावपि कृपावान् ममत्वरहितत्वात् समत्वसहितत्वाच्च, तम्, तुहीनदीधितिर्यथा निष्पक्षपाततया पृथ्वीपतिप्रासादे निःस्वनिशान्ते च ज्योत्स्नां वर्षयति तथैवार्हन्नपि समदृष्ट्यैव कुलीने कुलहीने च स्वकृपावर्षर्णं कुरुत इति तात्पर्यम् ।
पुन: कीदृशम् ? तम् ৺- त: = महाबुद्धः प्रप्रबुद्ध इत्यर्थः → महाबुद्धे तु तः प्रोक्तः ← [ १६ - १] इति शब्दरत्नसमन्वयः शाहराजमहाराजविरचित:, सर्वज्ञत्वात्, तम्, प्रबुद्धः - विद्वानित्यर्थ: श्रीजिनवरस्तु विदुषामपि विद्वानतः प्रप्रबुद्ध इति प्रोक्तम् ।
पुनः कीदृशम् ? तम् ← तः = पालकः → पालके तः स्यात् ← [११] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यनिर्मितः, सर्वजीवपातृत्वात् तम् ।
फाल्गुन शुभ्रषष्ठ्यां हि तकारेण प्ररूपिता स्तुतिः सुपार्श्वनाथस्य श्रीफरीदपुरे पुरे
इति श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुतिः ॥ ९ ॥
तः ] श्रीसुपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
★★
1
।।१।।
५९
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[ थः] श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः
थथं थथथथं थं थ
थं थथं थथथं थथः । थथं थथं थथं थं थं
चन्द्रप्रभ नमाम्यहम् || १० ||
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मञ्जुला
यः सुपार्श्व: स चन्द्रप्रभ: (चन्द्रा = सुन्दरा प्रभा यस्य स) इति सम्बन्धादायातस्य श्रीचन्द्रप्रभस्वामिनः स्तुतिरुच्यते ।
थथं थथथथमिति ।
अहं चन्द्रप्रभम् = श्रीचन्द्रप्रभस्वामिनम् नमामि = वन्दे प्रह्वत्वे तु णमं स्यात् ← [२-८३] इति कविकल्पद्रुमः श्रीहर्षकुशलगणिप्रणीत:, इति क्रियाकारकयोजना, कीदृशोऽहम् ? थथ: - थम् = कर्म → थं विषं कर्म ← [ ६९ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, थः = श्रान्त: → थो मिथ्यावाचके श्रान्ते ← [ ६४ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, थेन थ इति थथः = कर्मणा श्रान्तः कर्मफलोपभुञ्जन्नतीवदुःखीत्यर्थः ।
अत्र ‘नमामि' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' अहम्', कं कर्मतापन्नम् ? ‘चन्द्रप्रभम्’, ‘थथः’ कर्तुर्विशेषणम्, अन्यानि श्रीचन्द्रप्रभस्वामिनो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीचन्द्रप्रभम् ? थथम् थः = स्मरः स्मरः शौरी चापि विशालाक्ष: थकारः परिकीर्तितः ← [३५] इत्येकाक्षरीमातृकाकोषोऽज्ञातनिर्मितः, थः = : सित: श्वेतवर्ण इत्यर्थः त्रिलिङ्ग्यां तु थकारोऽसौ सिताऽसि पृथुष्वपि ← [ ६९ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवकृता, थ इव थ इति थथः = स्मरवत् श्वेतः अत्यन्तस्वरूपवानित्यर्थः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? थथथथम् - थम् = बहुलम् थम् = कर्म → थं विषं कर्म बहुलम् ← [६१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, थः = गिरि: थः पुंस्यूर्मिगिरीन्दुषु ← [४०] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथनिर्मित:, थः = भङ्गः → थः पुंसि भङ्गे ← [ ४६ ] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवप्रणीतः, थञ्चेदं [थ: ] श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः
६१
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अन्वयः - थथम् [स्मरवत् श्वेतवर्णवन्तम्] थथथथम् [भूरिकर्मभूधरभङ्गकारकम्]
थम् [विमलम्] थथम् [कृशकर्माणम्] थथम् [शोकरक्षकम् थथथम् [स्मरस्तम्बेरमसिंहम्] थथम् [शुक्लशोणितम् थथम् [शैलवत् शब्दवन्तम् थथम् [चन्द्रप्रभम्] थम् [वरदम्] थम् [भयरक्षकम्] चन्द्रप्रभम् [श्रीचन्द्रप्रभस्वामिनम् थथ: [कर्मणा श्रान्त:] अहम् नमामि [अहम् वन्दनविषयीकुर्वे]।
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थञ्चेति थथम् = बहुलकर्म तदेव थ इति थथथस्तस्य थो यस्मात् स थथथथ: = भूरिकर्मभूधरभङ्गकारक: जिनस्य वज्रायमाणत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? थम् - थ: = विमल: → थोऽव्यये कुञ्जरे काले क्लीबे भयनिवारणे वाच्यलिङ्गस्तु विमले - [७९/८०] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, विकारविचारमलविरहितत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थथम् - थम् = स्तोकम् → थं स्तोकार्थे नपुंसकम् * [६४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, थम् = कर्म → थं विषं कर्म - [६१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, थं थं यस्य स थथ: = कृशका अल्पकर्मेत्यर्थः, आसन्नसिद्धेः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? थथम् + थ: = शोक: → थो मिथ्यावाचके श्रान्ते शोके - [६४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, थम् = रक्षणम् → थम्-नपुंसके रक्षणे - [भा.२,पृ.११४३] इति शब्दार्थचिन्तामणि: सुखानन्दनाथकृत:, थात् थं यस्मात् स थथ: = शोकरक्षकः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थथथम् - थ: = २.र: → स्मर: शौरी चापि विशालाक्ष: थकार: परिकीर्तित: - [३५] इत्येकाक्षरीमातृकाकोषोऽज्ञातकृतः, थः = कुञ्जर: हस्तीत्यर्थ: → थोऽव्यये कुञ्जरे - [७९] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, थ: = सिंहः → थ: पुमान् सिंहकल्लोलबिरामेषु - [६७] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविरचिता, थ एव थ इति थथस्तत्र थ इव य: स थथथ: = स्मरस्तम्बरमसिंहः कामारिजेतृत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थथम् - थम् = सितम् → त्रिलिङ्ग्यां तु थकारोऽसौ सिताऽसितपृथुष्वपि - [६९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, थम् = रक्तम् शोणितमित्यर्थः → थंकारं तु परा शक्ति: रक्तम् + [३२] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, थं थं यस्य स थथम् = शुक्लशोणित: आर्हतातिशयात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थथम् ® थ: = गिरिः → थो भीत्राणगिरिव्योम्नि . [११] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, थ: = शब्द: → चारनाल
शब्देषु सन्मिषया परिमार्जनकल्पविरामेषु च थकार: 6 [३१] इत्यजिरादि[थः] श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः ६३
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रुचिरा कामदेव सम अतीव स्वरूपवान, अनेक कर्म रूप पर्वत का भंग करनेवाले, निर्मल, अल्पकर्मी, शोक से रक्षण करनेवाले, कंदर्प रूपी हस्ति के लिए सिंह समान, श्वेत रक्तवाले, पर्वत सम दृढ शब्दवान, चंद्र सम प्रभावाले, वरदान के दाता, भय से रक्षा करनेवाले श्री चन्द्रप्रभस्वामी को कर्म से श्रान्त मैं नमन करता हूं ॥१०॥
રુચિરા કામદેવની જેમ અત્યંત રૂપાળા (સ્વરૂપવાન), અનેક કર્મરૂપી પર્વતનો ભંગ કરનારા, નિર્મળ, અલા છે કર્મો જેને એવા, શોકથી રક્ષણ કરનારા, કંદર્પરૂપી હાથીને વિશે સિંહ સમાન, શ્વેત રક્તવાળા, પર્વત જેવા ટૂટ શબ્દવાળા, ચંદ્રસમાન પ્રભાવાળા, શ્રેષ્ઠદાન આપનારા અને ભયથી રક્ષા કરનારા શ્રીચંદ્રપ્રભસ્વામીને કર્મથી શ્રાંત હું નમન કરું છું. || १० ॥
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, थ इव था यस्य स थथः = गिरिवच्छब्दवान् जिनवरस्य शब्दा: पवर्तवन्निश्चलाः इत्याशयस्तदवदाम वयं सौम्यवदनाख्यकाव्यस्य पुण्यवल्लभाभिधानायां स्वोपज्ञवृत्तौ तीर्थकृतो वाच्यचापल्यमेव सर्वज्ञत्वाद् ← [ श्लो. - १४, पृ. ७३ ] जिनवचसां सर्वथा सत्यपरिपूर्णत्वान्न यथातथमिति, तम् । पुनः कीदृशम् ? थथम् थ: = चन्द्रः थः पुंस्यूर्मिगिरीन्दुषु ← [४०] नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता, था = प्रभा था धरित्री प्रभा ← [ ६०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, थ इव था यस्य स थथः = चन्द्रप्रभः परमसौम्यत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? थम् • थः = वरदः → वरदः कृष्णो वामजानुगतः स्मरः शौरी चापि विशालाक्ष: थकारः परिकीर्तितः ← [३५] इत्येकाक्षरीमातृका - कोषोऽज्ञातरचितः, प्रकृष्टप्रदातृत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? थम् थः = भयरक्षक: थः पुंसि क्वचिद् भयरक्षके ← [२५६० ] इति वाङ्मयार्णवो रामावतारशर्मनिर्मितः, अभयदानकर्तृत्वात् तम् ।
लखनौनगरे नत्वा प्रभुं चन्द्रप्रभं जिनम् च्यवनाभिधकल्याणपर्वणि तज्जिनेशितुः फाल्गुनकृष्णपञ्चम्यां विधाय केशलुञ्चनम् पूर्णीकृता थकारेण स्तुतिश्चन्द्रप्रभार्हतः
इति श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः ।। १० ।।
[थ: ] श्रीचन्द्रप्रभस्वामिस्तुतिः
1
।।१।।
1
||२|| युग्मम् ॥
६५
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[द:] श्रीसुविधिजिनस्तुतिः
ददं ददददं दं द
दं ददं दददं द ! द ! । ददददं ददं दं द !
सेवस्व सुविधिं सदा ।। ११ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यश्चन्द्रप्रभ: (चन्द्र इव प्रभावान्) स सुविधि: (शोभनो विधिर्यस्य स) तनुमनउज्ज्वलस्य दुर्विधित्वविरहादित्यमुना सम्बन्धेनागतस्य श्रीसुविधिनाथजिनस्य स्तुति: कथ्यते । ___ ददमिति ।
द ! • दः = बाल: → द: स्मृत: बन्धे च बन्धने बोधे बाले - [६८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, तस्य सम्बोधने, हे द ! त्वं सुविधिम् = श्रीसुविधितीर्थेशम् सदा = अहर्निशम् सेवस्व = भज इति क्रियाकारकयोग: → षेवृङ् सेवने - [८१८] इति हैमधातुपाठः।
कीदृश हे द ! ? द ! • द: = दीन: → दीने दन्दशूकेऽपि द: स्मृत: 6 [६८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, धर्मधनरहितत्वात्, तस्य सम्बोधने, पुन: कीदृश हे द ! ? द ! द: = मूढ: → दं क्लीबे दानवैराग्यकलत्रेष्ववलोकने भेद्यलिङ्गस्त्वयं मूढे + [४८/४९] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवविरचितः, कार्याकार्याज्ञत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
अत्र ‘सेवस्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहृतं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? ‘सुविधिम्', किं सम्बोधनम् ? 'द', 'द ! द !' तस्य विशेषणे, अन्यानि सर्वाणि श्रीसुविधिनाथस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीसुविधिम् ? ददम् + द: = भाव: → भवति दकारो दाने भावे - [३२] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, दः = शुद्धिः → द: शुद्धौ [१८-१] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यनिर्मित:, दस्य दो यस्य यस्माद्वा स दद: = भावविशुद्धिकारक: शुक्लध्यानवत्त्वात् सर्वजीवहितकाक्षित्वाच्च, तम् ।
[दः] श्रीसुविधिजिनस्तुतिः
६७
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अन्वयः - (हे) द ! द ! द! [हे मूढ ! दीन ! बाल !] (त्वम्) ददम् [भावविशुद्धि
कारकम् ददददम् [सत्यज्ञानदातारम् दम् [दानशौण्डम् ददम् [पावनदानम् ददम् [पूजितैः पूजितम् दददम् [संसारस्त्र्यनासक्तम्] ददददम् [देवदत्तदिव्यवसनम्] ददम् [संसारोच्छेदकम्] दम् [निश्चलम् सुविधिम् [श्रीसुविधिनाथम् सदा अहर्निशम्] सेवस्व [भज] ।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पुन: कीदृशम् ? ददददम् दः = सत्यम् → सत्योऽ(?)त्रीशो ह्लादिनी च वामगुल्फगतस्तया शूली कुबेरो दाता च दकार: [३६] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिरूपित:, दम् = ज्ञानम् → दं क्लीबे पानवैराग्यकलत्रेष्ववलोकने भेद्यमूलस्त्वयं मूके दुहिते द्रावके शुचौ दर्शनज्ञाननेत्रेषु - [८३/८४] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, दश्च तद् दञ्चेति ददम्, तद् ददते = प्रयच्छति इति क्विप् दददद् = सत्यज्ञानदाता क्रोधलोभभयहास्यशून्यत्वात् → ददि दाने - [७२७] इति हैमधातुपाठः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? दम् + द: = दानशौण्ड: अतीवोदार इत्यर्थ: → दो दाने पूजने क्षीणे दानशौण्डे - [६७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, संवत्सरं यावत् सुवर्णादिदातृत्वात्, तम् ।
__न च हिरण्यादीनां दाने स्याद् रक्तस्यानुरक्तेरभिवर्धनमिति वाच्यम् तदानस्य पूततमत्वात् विरक्तिजनकत्वाच्च, अनीतिजन्यदानादेवाऽनर्थोत्पत्तिरिदं तु नैतादृक् किन्तु शुच्येवेति बिभणिषुराह ।
पुन: कीदृशम् ? ददम् + दम् = शुचि → दं क्लीबे दानवैराग्यकलत्रेष्ववलोकने भेद्यलिङ्गस्त्वयं मूढे ग्रहान्तरे द्रावके शुचौ - [४८/४९] इति पूर्वोक्तकविराघवोक्तेः, दम् = दानम् , दं कलत्रं बुधैः प्रोक्तं दानच्छेदनदातृषु । [१४] इत्येकाक्षरकोषोऽज्ञातविद्वन्निर्मित:, दं दं यस्य स दद: = पावनदान: विरक्तिवर्धकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ददम् - दा: = देवा: द: = पूजनम् → दो दाने पूजने क्षीणे दानशौण्डे च पालके देवे - [६७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, दानां दो यस्य स दद: = देवपूजन: देवैरर्चित इत्यर्थ: महेन्द्रर्महितत्वात्, तम्, शतक्रतवोऽप्यर्चयन्ति यं शुभ्रभावादथान्यसुमनसां का कथा ?।
पुन: कीदृशम् ? दददम् न् द: = भव: संसार इत्यर्थः → दो वधे भववालयो: * [८१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, दम् = कलत्रम् पत्नीत्यर्थ: → दंपल्याम् - [२५] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपकथित:, दम् = वैराग्यम् → दं क्लीबे दानवैराग्य- [४८] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रणीत:, दश्च दञ्चेति ददे तयोर्दै यस्य स दददः = संसारस्त्यनासक्तः आजन्मविरक्तत्वात् कामभोगैर्निविण्णत्वात्, तम् । [द:] श्रीसुविधिजिनस्तुतिः ६९
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रुचिरा
हे मूढ एवं दीन बालक ! तुं भाव की विशुद्धि के कर्ता, सत्य ज्ञान के दाता, परम दानेश्वरी, पुनित दानवाले, देवों द्वारा पूज्य, संसार एवं स्त्री से अनासक्त, देव के दिव्य वस्त्रवाले, संसार के उच्छेदक, निश्चल ऐसे श्री सुविधिनाथ भगवान की सर्वदा सेवा कर || ११||
રુચિરા
હે મૂઢ અને દીન બાળક ! તું ભાવની વિશુદ્ધિને કરનારા, સત્ય જ્ઞાનને આપનારા, પરમ દાનેશ્વરી, પુનિત છે દાન જેનું એવા, દેવો દ્વારા પૂજિત, સંસાર અને સ્ત્રીથી અનાસક્ત, દેવ પ્રદત્ત દિવ્ય વસ્ત્રવાળા, સંસારનું ઉચ્છેદન કરનારા, નિશ્ચલ શ્રીસુવિધિનાથ ભગવાનની સદા માટે સેવા કર. II ૧૧ ||
७०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पुनः कीदृशम् ? ददददम् + दा: = देवा: → दो दाने पूजने क्षीणे दानशौण्डे च पालके देवे - [६७] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, दः = दत्तम् → द: पुमानचले दत्ते - [१८-१] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरनिर्मित:, दम् = भव्यम् दिव्यमित्यर्थः → दं दानं शरणं कर्म भव्यम् + [६४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, द: = चीवरम् → द: स्मृत: बन्धे च बन्धने बोधे बाले बीजे बलोदिते विदोषेऽपि पुमानेष चालने चीवरे - [६८-६९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, दञ्चासौ दश्चेति दद: = दिव्यवस्त्रम्, दैः = देवै: दः = दत्तम् ददः = दिव्यवस्त्रं यस्मै स ददददः = देवदत्तदिव्यवसन: आर्हतातिशयात, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ददम् = द= भव: → दो वधे भववालयो: - [८१] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, द: = छेद: → द: पुंसि दातरिच्छेदे + [४७] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवरचित:, दस्य दो यस्मात् स दद: = संसोरोच्छेदक: परमसुखित्वात् संसारस्य दुःखप्रचुरत्वात् तथैतदार्षम् → संसारम्मि दुक्खपउराए + [८-१] इति उत्तराध्ययनसूत्रे, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? दम् दः = अचल: निश्चल इत्यर्थ: → दः पुमानचले [१८-१] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरविरचितः, काञ्चनगिरिवत् स्थिरत्वात्, भीष्मपरीषहादेरागमनेऽप्यचलेशवदचल इत्याशयः, तम् ।
दकारेण कृता राजारामगञ्ज पुरे स्तुतिः । फाल्गुनश्यामसप्तम्यां सुखं श्रीसुविधेर्विभोः ।।१।।
इति श्रीसुविधिजिनस्तुतिः ।। ११ ।।
★★★
[दः] श्रीसुविधिजिनस्तुति:
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[ धः ] श्रीशीतलनाथस्तुतिः
धधधध ध ध ध -
धं धं धं ध ! ध ! |
धधधधं धं धं ध !
शेवस्व शीतलं जिनम् ॥ १२ ॥
७२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यः सुविधिः स स्वभावेन हीमवच्छीतलः अशीतलस्य शोभनविधित्वाभावादिति सम्बन्धादायातस्य श्रीशीतलनाथस्वामिनः स्तुतिर्जल्प्यते ।
धधधमिति ।
ध ं धः = इन्द्रः → धः पुंसीन्द्रे ← [ ४३ ] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथरचिता, तस्य सम्बोधने, हे ध ! त्वं शीतलम् = श्रीशीतलस्वामिस्वामिनम् जिनम् = तीर्थकरम् शेवस्व = सेवस्व सेवते जुषते चापि शेवते ← [क्षत्रियचेष्टावर्ग:-१३] इत्याख्यातचन्द्रिका भट्टमल्लप्रणीता, इति क्रियाकारक
सण्टङ्कः ।
कीदृश भोध ? ध ! धः = : धार्मिकः धः पुंसि धार्मिके ← [ ८६ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, सम्यग्दृष्टित्वात् श्रद्धासंपन्नत्वाच्च, तस्य सम्बोधने, पुनः कीदृश भो ध ! ? ध ! धः = धीरः धो धीर: ← [२७] इत्यनेकार्थतिलकः सचिवमहीपविरचित:, सुरगुरुत्वात्, तस्य सम्बोधने । अत्र ‘शेवस्व’ इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' त्वम्' अध्याहृतमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? ' शीतलम्', कीदृशं शीतलम् ? 'जिनम्', किं सम्बोधनम् ? 'ध', 'ध ! ध !' इति तु तस्य विशेषणे, अपराणि सर्वाणि श्रीशीतलनाथजिनस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीशीतलं जिनेश्वरम् ? धधधधम् धाः = सानव: विद्वांस इत्यर्थः → धकारः पुंसि कथित: सानौ ← [ ७३] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवकृता, धः = वादः विवाद इत्याशयः, धः = वह्निः धश्चाश्वाधारभूतेऽपि वह्नौ वादे ← [७१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, धः = घनः [ध: ] श्रीशीतलनाथस्तुति:
७३
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_ (हे) ध ! ध ! ध ! [हे धार्मिक ! धीर ! मघवन् !] (त्वम्) धधधधम् [विद्वद्विवाद वह्निवारिदम् ] धधम् [धवलध्यानम् ] धम् [ धराधिपतिम् ] धधम् [धर्मधनम्] धधम् [ धराधरध्वनिम् ] धधधम् [ शिवसुखसागरे निमग्नम् ] धधधधम् [धनधान्यभूतभवनम् ] धधम् [ धीरेभ्यो धर्मरतिदायकम्] धम् [विबुधम्] शीतलं जिनम् [ श्रीशीतलस्वामिजिनेश्वरम् ] शेवस्व [सेवस्व ] |
अन्वयः -
७४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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वारिद इत्यर्थ: → धः पुंसीन्द्रे ध्वनौ ध्याने श्रीदे धन्वन्तरे घने [४३] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता, धानां ध इति धधः = विद्वद्विवाद: स एव ध इति धधधः = विद्वद्विवादवह्निः तत्र-तदुपशमने ध इव यः स धधधध: = विद्वद्विवादवह्निवारिद: यथा घनाघनागमने वढेरुपशमनं स्यात् तथैव तीर्थेशप्रभावाद् विवादोपशान्ति: सुनृतस्य संप्राप्तेः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? धधम् • धम् = श्वेतम् → धकारं धर्मबीजं स्यात् श्वेतम् - [३४] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, धः = ध्यानम् → ध: पुं शिलीन्धेन्द्रोाने - [५०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः, धं धो यस्य स धधः = धवलध्यान: विषयविरक्तमतित्वात् सर्वाश्रवविनिवृत्तत्वादकिञ्चनत्वाच्च, तेषामेव धर्मशुक्लध्यानोपपत्तेस्तदुक्तम् → विसयविरत्तमईणं तम्हा सव्वासवा णियत्ताणं झाणं अकिंचणाणं णिसग्गओ होइ णायव् [६४] इति गुरुतत्त्वविनिश्चये, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? धम् - ध: = धरणीश: → धरणीशश्च धकार: 6 [३७] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिर्मित:, भद्दिलपुरनगर्या अधिपतित्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? धधम् धः = धर्म: → धो ना धर्मे - [१९-१] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरप्रणीतः, धः = धनम् → धो विधाता धनम् - [१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, ध एव धो यस्य स धधः = धर्मधन: धर्मधनस्य प्रदायकत्वात् सुवर्णादिधनत्यक्तृत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? धधम् - ध: = घन: धराधर इत्यर्थः ध: = ध्वनि: → ध: पुंसीन्द्रे ध्वनौ ध्याने श्रीदे धन्वन्तरे घने + [४३] इति पूर्वोक्तेरुगपदण्डाधिनाथवचनाद्, ध इव धो यस्य स धधः = धराधरध्वनि: तदतीवगम्भीरत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? धधधम् - धः = शाश्वत: → धो धनार्थो (ख्यो) रुचि: स्थाणुः शाश्वत: - [११३] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधानम्, धम् = सुखम् → धं धनं धूननं दानं धारणं करणं सुखम् - [६६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, धम् = सागर: → धं धने च धनेशेऽब्धौ - [१९] इत्येकाक्षरकोश: [ध:] श्रीशीतलनाथस्तुतिः
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रुचिरा
हे धार्मिक धीर इन्द्र ! तुं विद्वानों के विवाद रूपी अग्नि को उपशांत करने के लिए मेघ तुल्य, शुक्लध्यानी, भद्दिलपुर नगरीके महाराजा, धर्म रूपी धनवाले, मेघ सम गंभीर ध्वनिवाले, मोक्ष के सुख रूपी समुद्र में निमग्न, धन एवं धान्य से परिपूर्ण घरवाले, धीर व्यक्तिओं को धर्म में त करानेवाले, विबुध श्री शीतलनाथ भगवान की सेवा कर || १२ ||
રુચિરા
હે ધાર્મિક ધીર ઇંદ્ર ! તું વિદ્વાનોનાં વિવાદરૂપી અગ્નિને ઉપશાંત કરવામાં મેઘ સમાન, શુક્લધ્યાની, ભદ્દિલપુરનગરીનાં મહારાજા, ધર્મરૂપી ધનવાળા, મેઘ સમ ગંભીર ધ્વનિવાળા, મોક્ષનાં સુખરૂપી સમુદ્રમાં નિમગ્ન, ધન અને ધાન્યથી ભરેલું છે ઘર જેનું એવા, ધીર વ્યક્તિઓને ધર્મમાં रति डरावनारा, विणुध श्री शीतलनाथ भगवाननी सेवा ९२ ॥ १२ ॥
७६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पण्डितमनोहरनिर्मित:, धश्चासौ धमिति धधम् = शिवशर्म तस्य धं य: स धधधम् = शिवसुखसागर: महानन्दमहानन्दमयत्वात्, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? धधधधम् + ध: = धनम् धः = धान्यम् → धने धान्ये च धः स्मृत: [२१] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, धः = भृतम् → भृते भीते ध: 6 [७२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, धम् = वेश्म → धं क्लीबे धनदे धीरे ध्याने स्याद् धन-वेश्मयो: ? (नो:) 6 [८६] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, धश्च धश्चेति धधौ, ताभ्यां ध: = भृतम् धम् = वेश्म यस्य स धधधधः = धनधान्यभृतभवन: जिनराजजन्मप्रभावाद् वेश्मनि धनधान्यादीनामभिवृद्धिरेव तत्पुण्यप्रभावातिशयात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? धधम् + धः = धीर: → धः पुंसि धार्मिके धीरे . [८६] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविरचिता, धा = धर्मरति: → धा च धर्मरतिर्मता — [१४] इत्येकाक्षरकोषोऽज्ञातविद्वत्कृतः, धानां धा यस्मात् स धध: = धीरेभ्यो धर्मरतिदायक: वचनप्रभावविशेषात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? धम् + धम् = बुध: विबुध इत्यर्थ: → धं वेश्मनि धने धान्ये बुधे 6 [५०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः, सर्वज्ञत्वात्, तद् ।
पुरेजामसीहे ग्रामे दशम्यां शितिफाल्गुने प्रणीतेयं धकारेण स्तुति: श्रीशीतलप्रभोः
। ॥१॥
इति श्रीशीतलनाथजिनस्तुतिः ।। १२ ।।
★★★
[ध:] श्रीशीतलनाथस्तुतिः
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[नः ] श्रीश्रेयांसनाथस्तुतिः
ननं ननं ननं नं न
ननननं ननं न नः ! । न ! ननं नननं नं न
श्रेयांसं श्रेयसे श्रय ॥ १३ ॥
(७८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यः स्वभावेन शीतलः स श्रेयांसः (सर्वेषां हितकारी) सक्रोधस्य हिताहितादर्शनादित्यस्मात् सम्बन्धादायातस्य श्री श्रेयांसनाथस्य स्तुतिर्गद्यते । सर्वस्यैव हितकर इति वा श्रेयांसः ← [२७] इति व्युत्पत्तिरत्नाकरः श्रीदेवसागरगणिकृतः । ननं ननमिति ।
हे न: ! = मनुष्य ! ‘नृ’शब्दस्य सम्बोधने प्रयोग:, त्वं श्रेयसे = धर्मार्थम् श्रेयांसम् = श्रीश्रेयांसनाथजिनेश्वरम् न श्रय = न भज इति न श्रयैवेत्यर्थः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः → श्रिग् सेवायाम् ← [ ८८३] इति है मधातुपाठ: ।
कीदृश हे न: ! ? न नः = अनाथ: नोऽनर्थेऽपि (अनाथेऽपि) प्रदर्श्यते ← [७६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, तस्य सम्बोधने । अत्र 'श्रय' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' त्वम्' अध्याहृतं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? ‘श्रेयांसम्', कस्मै ? 'श्रेयसे', किं सम्बोधनम् ? 'न:', 'न' इति तस्य विशेषणम्, अन्यानि सर्वाणि श्री श्रेयांसनाथस्य विशेषणानि, 'न' निषेधार्थे, द्वितीयो 'न' तस्यापि निषेधार्थे ।
कीदृशं श्रीश्रेयांसनाथम् ? ननम् नः = मनुष्यः → नकारः पुंसि हेरम्बे ना भवेत् पुरुषे तथा ← [ ७४] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्रणीता, नः = बन्धुः नः पुनर्बन्ध (बन्धु) बुद्धयोः ← [१२] इत्येकाक्षरनाममालिकाऽमरचन्द्रकविविरचिता, नानां न इति ननः = मनुष्याणां बन्धुः सर्वेषां स्वजनत्वात् जगज्जीवबान्धवत्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? ननम् नम् = अनन्तम् →नं ब्रह्मणि तथानन्ते ←
[न] श्रीश्रेयांसनाथस्तुतिः
७९
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अन्वयः - (हे) न ! न: ! [हे अनाथ ! मनुष्य !] (त्वम्) श्रेयसे [धर्मार्थम्] ननम्
[मनुष्याणां बन्धुम्] ननम् [अनन्तानन्दम्] ननम् [सूक्ष्मज्ञानवन्तम्] नम् [जिनम्] नननननम् [मनुष्यमनीषालोचने ज्ञानाञ्जनकर्तारम्] ननम् [अनन्यानन्ददायकम् ननम् [प्रकृष्टप्रजम्] नननम् [कविकलापकीर्तितम्] नम् [पूज्यम्] श्रेयांसम् [श्रीश्रेयांसनाथम् न श्रय [न भज] (इति) न (श्रयैवेत्याशयः)।
जिनेन्द्रस्तोत्रम
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[७९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, नम् = सुखम् → नं नेत्रमजनं श्रोत्रं करणं कारणं सुखम् - [६८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, नं नं यस्य स नन: = अनन्तानन्द: सुखसागरस्नातृत्वादशातवेदनीयोदयरहितत्वाच्च,
तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ननम् नम् = सूक्ष्मम् नम् = ज्ञानम् → नं ज्ञानसंज्ञयो: वर्मसूक्ष्म- 6 [४५] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता, नं नं यस्य स नन: = सूक्ष्मज्ञानवान् केवलज्ञानित्वात् केवलज्ञानस्यैव सर्वद्रव्यपरिणामविज्ञप्तिकारणत्वात्, तदुक्तम् → अह सव्वदव्वपरिणामभावविन्नत्तिकारणमणंतं सासयमप्पडिवाई एगविहं केवलन्नाणं त्ति [७७] आवश्यकनिर्युक्त्तौ [८२३] विशेषावश्यकभाष्ये [४३] नन्दीसूत्रे च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नम् - न: = जिन: → नकारो जिन- - [१३] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्य विरचितः, वीतरागत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नननननम् + ना: = नरा: मनुष्या इत्यर्थः → नो नरे च - [७६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, न: = बुद्धिः → नो बुद्धौ ‘ [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिप्रणीता, नम् = नेत्रम् → नं नेत्रम् - [६८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, नम् = ज्ञानम् → नं ज्ञानवाद्ययो: 6 [५२] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्दिष्टः, नम् = अञ्जनम् → स्यान्नेत्रमञ्जनञ्च नम् - [१४] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यकथितः, नानां न इति नन: = मनुष्याणां बुद्धिः, नन एव नमिति नननम् = मनुष्यमनीषालोचनम्, नमेव नमिति ननम् = ज्ञानाञ्जनम् ननने ननं यस्मात् स ननननन: = मनुष्यमनीषालोचने ज्ञानाञ्जनकारक: अज्ञानतमोवारकत्वात् सज्ज्ञानप्ररूपकत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ननम् + न: = अपर: अनन्य इत्यर्थ: → न: शब्द: प्रतिषेधे स्थिरनिश्चयशुष्कवादशून्येषु स्यादपर(रे) परिश्लिष्टे - [३४] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, नम् = आनन्द: → सानन्दे नं च नन्दने [७९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, नो नं यस्मात् स नन: = अनन्यानन्ददायक: आत्मानन्दानुभूतिकारयितृत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ननम् ॐ नम् = अनन्तम् → नं ब्रह्मणि तथानन्ते - [न:] श्रीश्रेयांसनाथस्तुति: ८१
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रुचिरा हे अनाथ मनुष्य ! तुं मनुष्यों के बंधु, अनंत आनंदमय, सूक्ष्मज्ञानी, जिनेश्वर, मनुष्यों की बुद्धि रूपी दृष्टि में ज्ञानांजन के कर्ता, अनन्य आनंद के प्रदाता, प्रकृष्ट प्रज्ञा के स्वामी, कविओं के समूह द्वारा संस्तुत, पूज्य श्री श्रेयांसनाथ भगवान को धर्म के लिए आश्रित न हो ऐसा नहीं (अर्थात् आश्रित ही हो) ॥१३॥
રુચિરા હે અનાથ મનુષ્ય ! તું ધર્મ માટે મનુષ્યોનાં બંધુ, અનંત આનંદમય, સૂક્ષ્મ જ્ઞાનવાળા, જિનેશ્વર, મનુષ્યોની બુદ્ધિરૂપી દૃષ્ટિમાં જ્ઞાનનું અંજના કરનારા, અનન્ય આનંદને આપનારા, પ્રકૃષ્ટ પ્રજ્ઞાનાં સ્વામી, કવિઓનાં સમૂહ દ્વારા સંસ્તુત, પૂજ્ય શ્રીશ્રેયાંસનાથ ભગવાનને આશ્રિત ન થા એમ नहीं (मर्थात् मायनो स्वीहार मवश्य 5२). || १3 ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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[७९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, न: = बुद्धिः , नो बुद्धौ [२७] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिप्रणीता, नं नो यस्य स नन: = अनन्तमति: प्रकृष्टप्रज्ञ इत्यर्थः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नननम् = ना: = कवयः → नो रक्षाकविवारिदे - [१२] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽजातप्रणीता, न: = वृन्दम् → नकार: सुगते वृन्दे * [२०] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहररचितः, न: = स्तुति: → स्तुतौ नस्तु प्रकीर्तित: 6 [२२] इत्येकाक्षरकोश: पुरुषोत्तमदेवनिर्मित:, नानां न इति नन: = कविकलाप: ननस्य नो यस्य स ननन: = कविकलापकीर्तित: कविकोविदत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नम् • न: = पूज्य: → नकारो जिनपूज्ययो: * [१३] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यविरचित:, पूजातिशयसमेतत्वात्, तम्, सर्वैरपि पूज्यत्वादत्र न व्यक्तिविशेषस्य कस्याप्युल्लेखः ।
फाल्गुनस्य त्रयोदश्यां श्यामायां रचिता स्तुतिः । बाबुगजे नकारेण श्रीश्रेयांसजिनेशितुः ।।१।।
इति श्रीश्रेयांसनाथजिनस्तुतिः ।। १३ ।।
*
*
*
[नः] श्रीश्रेयांसनाथस्तुतिः
८३
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[पः] श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुतिः
पपपः पपपः प: पः
पपपप: पपः प ! पः | पपः पपः पपः पः पं
त्वं वासुपूज्य ! दर्शय ।। १४ ।।
.
C
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मजुला
य: श्रेयांस: (सर्वेषां हितकरः) स वासुपूज्य: (वसूनां = देवविशेषाणां पूज्य: = अर्चनीय:) सर्वहितकृत: परमपूजनीयत्वादित्यनेन सम्बन्धेनागतस्य श्रीवासुपूज्यस्वामिन: स्तुतिरभिधीयते । वसुपूज्य एव वासुपूज्य: → प्रज्ञादिभ्योऽण् - [सि.है.-७-२-१६५] इत्यनेन ‘अण्’प्रत्यय: ।
पपप इति ।
हे वासुपूज्य ! = भोः श्रीवासुपूज्यस्वामिन् ! त्वं पम् = मार्गम् मोक्षमार्गमित्यर्थः दर्शय = आलोकय इति क्रियाकारकयोजना → पोऽम्भ: पाने च पातरि समीरमार्गयो: - [३०] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्रणीतः, इति क्रियाकारकसंयोजना, → दृशुं प्रेक्षणे [४९५] इति हैमधातुपाठः, ण्यन्तप्रयोगश्च ।
कीदृश हे श्रीवासुपूज्य ! ? प ! • पः = शूर: → शूरो दक्षपार्श्वश्च पार्थिव: पद्मेशो नान्तिम: फादि: पकारोऽपि प्रकीर्तित: - [३९] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिर्मितः, तस्य सम्बोधने प्रयोग:, हे प ! इति ।
अत्र 'दर्शय' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'पम्', किं सम्बोधनम् ? 'वासुपूज्य', 'प!' इति सम्बोधनपदस्य विशेषणमन्यानि सर्वाण्यपि कर्तुर्विशेषणानि ।
कीदृशस्त्वम् ? पपप: छ प: = शास्त्रम् → पकारस्तु भवेल्लग्ने पत्रे शास्त्रार्चयोरपि - [७९] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवनिर्मिता, प: = अमृतम् → प: शब्द: स्यादमृते - [३५] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, प: = पानम् → पो वायौ च तथा पाने - [१४] इति शब्दरत्नसमन्वय: शाहराज[प:] श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुति: ८५
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अन्वयः
(हे ) प ! वासुपूज्य ! [ भो: शूर ! श्रीवासुपूज्यस्वामिन् ! ] पपप: [शास्त्रामृत-पायक: ] पपप: [ पीडापावकपय: ] प [पावन: ] प [शुभः ] पपपप: [ पापिपयः शोषणसूर्य: ] पपः [पापिषूपकारकारकः ] प [प्रौढ : ] पप: [सुधाशोणित: ] पप: [ पूषप्रकाश: ] पप: [ पार्थिवपूजन: ] प: [ पाता ] त्वं पं दर्शय [त्वम् मोक्षमार्गमालोकय] ।
८६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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महाराजकृतः, प एव प इति पपस्तस्य पो यस्मात् स पपपः = शास्त्रामृतपायक: शास्त्रीयपदार्थप्ररूपकत्वात् जिनेश्वरादेव शास्त्रस्योद्गमत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? पपप: - प: = आति: पीडेत्यर्थः → पस्त्रिष्वातौ [४८] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथप्रणीता, प: = वह्निः → प: सूर्ये शोषणे वह्नौ - [८०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, प: = अम्भ: जलमित्यर्थः → पोऽम्भ: 6 [३०] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनग्रथित:, प एव प इति पप: = पीडापावकः उभयोर्दाहकत्वादुपमोपमेयत्वम्, तत्र प इव य: स पपप: = पीडापावकपय: प्रशमपीयूषवर्षित्वाद् दु:खदूरीकर्तृत्वाच्च ।
पुन: कीदृश: ? प: = पावन: → (पकार: पवमाने स्यात् पावने) * [३०] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिविरचिता, परमपूतत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? पः = शुभ: कल्याणकारीत्यर्थ: → प: पुमान् पवने शैले प्रकाशे कौस्तुभे क्षणे शुभे - [९५/९६] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, मङ्गलस्वरूपत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? पपपप: - प: = पापी → प: पापी - [६९] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, पम् = पय: जलमित्यर्थ: → पं प्रीणनमृणं पय: [७०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, प: = शोषणम् प: = सूर्यः → प: सूर्ये शोषणे - [८०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, प एव पमिति पपम् तस्य पे = शोषणे प इव य: स पपपप: = पापिपय:शोषणसूर्यः, मिथ्यात्वपापप्रध्वंसकत्वात् पापिशब्देनात्र मिथ्यात्विन एव ज्ञेयास्तेषां मिथ्यात्वाज्ञानादिपापानां दूरीकर्तृत्वात्, पापिपय इत्यत्र पापिपापपय इत्याशयस्तस्य शोषकत्वात् पापिनां पापानां विच्छेदकत्वात्, एतेन जिनेशित्रा पापिनामुपर्यप्युपकारो व्यधायीति व्याख्यानाह ।
पुन: कीदृश: ? पप: प: = पापी → प: पापी - [६९] इति पूर्वोक्तैकाक्षरनाममालोक्तेः, पः = उपकार: → पुंलिङ्गे चोपकारे स्याद् वपने पर्वते क्षणे पकार: - [७९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्रोक्ता, पेषु पो यस्य स पप: = पापिषूपकारकारक: परमकारुणिकत्वात् ।
पुनः कीदृश: ? प: = प्रौढ: → प: पातरि पय:पाने प्रौढे - [३१] इत्य
[प:] श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुति:
८७
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रुचिरा हे शूरवीर श्री वासुपूज्यस्वामी ! शास्त्र रूपी अमृत का पान करानेवाले, पीडा रूपी अग्नि को उपशांत करने के लिए नीर समान, पावन, शुभ, पापी के (पाप रूप) नीर का बाष्पीभवन करने के लिए सूर्य तुल्य, पापी जीवों के उपर भी उपकार करनेवाले, प्रौढ, अमृत सम श्वेत रक्तवान, सूर्य सम प्रकाशमान, राजाओं द्वारा पूज्य एवं रक्षक आप (तुम) मोक्षमार्ग बताइए
||१४||
રુચિરા હે શૂરવીર વાસુપૂજ્યસ્વામી ! શાસ્ત્રરૂપી અમૃતનું પાન કરાવનારા, પીડારૂપી અગ્નિને ઉપશાંત કરવામાં પાણી સમાન, પાવન, શુભ, પાપીના (પાપરૂપી) પાણીને શોષવામાં (બાષ્પીભવન કરવામાં) સૂર્યસમાન, પાપી જીવો ઉપર પણ ઉપકાર કરનારા, પ્રોટ, અમૃત જેવા શ્વેત રક્તવાળા, સૂર્ય સમ પ્રકાશમાન, રાજાઓ દ્વારા પણ પૂજ્ય અને રક્ષણહાર તમે मोक्षमानि तावी. || १४ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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नेकार्थतिलक: सचिवमहीपप्रणीत:, ज्ञानादिना वृद्धत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? पप: - प: = अमृतम् → पः शब्दः स्यादमृते - [३५] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातरचिता, पम् = रक्तम् → पकारमग्निबीजं स्याद् रक्तम् - [३६] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, प इव पं यस्य स पप: = सुधाशोणित: तीर्थकरातिशयात् ।
पुन: कीदृश: ? पप: - प: = पूषा सूर्य इत्यर्थः → प: पापी पूषा - [६९] इत्येकाक्षरशब्दमाला सौभरिविरचिता, प: = प्रकाश: → प: पुमान् पवने शैले प्रकाशे - [९५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, प इव पो यस्य स पप: = पूषप्रकाश: अतिशयतेजस्वित्वादन्तरेण भामण्डलमर्हतामाननमीक्षितुमशक्यत्वाच्च तदुक्तमस्माभि: सौम्यवदनाख्यकाव्यस्य स्वोपज़पुण्यवल्लभाभिधानायां वृत्तौ → सूर्यवद् दीप्तिमानत एव जिनमुखदर्शनाय अनुजिनं भामण्डलं विरच्यते सुमनोभि: - [श्लो.-४, पृ.-१९] ।
पुनः कीदृश: ? पप: प: = पार्थिव: → पार्थिव: पद्मेशो नान्तिम: फादि: पकारोऽपि प्रकीर्तित: - [३९] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिर्मित:, प: = अर्चा → पकारस्तु भवेल्लग्ने पत्रे शास्त्रार्चयोरपि [७९] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, पानां पो यस्य स पप: = पार्थिवैरर्चनीय: परमपूज्यत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? प: ॐ पाता → प: स्यात् पाने च पातरि [२४] इत्येकाक्षरकोश: पुरुषोत्तमदेवप्रणीत:, कर्मशत्रोर्देहिनां रक्षकत्वात् ।
श्रीप्रथमेशकैवल्यज्ञानकल्याणकस्थले । अल्हाबादे पुरे भक्त्या संस्तुत्य प्रथमेश्वरम् ।।१।। निर्मिता चैत्रमासस्य शुक्लायां प्रतिपत्तिथौ । पूज्यश्रीवासुपूज्यस्य पकारेण स्तुतिर्मया ।।२।। युग्मम् ।।
इति श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुतिः ।। १४ ।।
[प:] श्रीवासुपूज्यस्वामिस्तुति:
८९
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[ फः ] श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः
फफफफफफं फं फ
फं फफं फफफं फफ ! |
फ ! फफं फफफं फं फं
विमलं विमलं नुहि ॥ १५ ॥
So
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यो वासुपूज्य: (देवै: मनसा पूजनीय:) स विमल एव समलस्यापूज्यत्वात् इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीविमलनाथजिनस्य स्तुतिर्वर्ण्यते ।
फफफमिति ।
हे फ ! • फ: = देव: → फोडपारदर्शने देवे - [८४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, तस्य सम्बोधने, हे फ ! = भो देव ! त्वं विमलम् = श्रीविमलनाथस्वामिनं नुहि = स्तुहि, इति क्रियाकारकयोजना → णु स्तुतौ - [भा.१, पृ.८८-२६] इति माधवीयाधातुवृत्तिः ।
कीदश भोः फ ! ? फफ ! • फम् = चारु → फं फल्गु चारु वा स्मृतम् + [७२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, फ: = प्रासाद: → फकार: स्यात् प्रासादे - [८३] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवग्रथिता, फं फो यस्य स फफः = कमनीयप्रासादवान्, तस्य सम्बोधने ।
अत्र ‘नुहि' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहार्यमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'विमलम्', किं सम्बोधनम् ? ‘फ !', 'फफ !' इति सम्बोधनपदस्य विशेषणम्, अन्यानि कर्मणो विशेषणानि |
कीदृशं श्रीविमलम् ? विमलम् - विमल: = निर्मल: विगतं पापमेव मलं यस्मात् स विमल: कर्मरजोरहितत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? फफफम् ७ फ: = कोप: → कोपेऽपि फ: समाख्यात: - [२२] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहररचित:, फः = शिखी वह्निरित्यर्थः → शिखी रौद्री वामपार्श्वकृतालय: फटकार: प्रोच्यते सद्भिः फकार: 6 [४०] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिर्मित:, फः = अनिल: → फ: कलानिलशाखिनि [फः] श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः ९१ .
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अन्वयः - (हे) फफ ! फ ! [हे कमनीयप्रासादवन् ! देव !] (त्वम्) विमलम्
[निर्मलम्] फफफम् [कोपकृशानुकम्पाकम्] फफफम् [लाभतरो: सर्जने बीजसमानम्] फम् [हितम्] फफम् [न्यायनिरूपकम्] फफम् [मधुरध्वनिम्] फफफम् [लोभलोहानलम्] फफम् [ज्ञानवारिधिम् फफफम् [चक्रवर्तिमाहेन्द्रज्ञानदायकम्] फम् [सर्वरोगनाशकम्] फम् [विजयप्रदम्] विमलम् [श्रीविमलनाथस्वामिनम्] नुहि [स्तुष्व] ।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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← [१२] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, फ एव फ इति फफः पशमने फइव यः स फफफ: = कोपकृशानुकम्पाक: प्रशमपीयूषवर्षकत्वात्, तम्, समीरस्तु वह्निमुपशमयत्यभिवर्धयति च न चात्राभिवर्धनं भाव्यमनौचित्यात् ।
पुनः कीदृशम् ? फफफम् फम् = लाभ: → फं क्लीबे लाभे ← [८५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, फः = शाखी तरुरित्यर्थः → फः कलानिलशाखिनि ← [१२] इति नत्वादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातरचिता, फम् = बीजम् → फं चायतनबीजे ← [ ८४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, बीजशब्दस्य कारणमित्यप्यर्थ: क्रियते, फमेव फ इति फफ:, तस्मिन् फवद् य: स फफफम् = लाभतरो: सर्जने बीजसमानः कारणस्वरूप इत्यर्थो वा, प्रमोदप्रदायकत्वात् लाभोपलब्धौ मुदनुभूते:, जिनेशितुस्सर्वलाभो - पलब्धौ न कस्यचिल्लाभविशेषस्योल्लेख:, तद् ।
पुनः कीदृशम् ? फम् फः = हितः → फशब्द: परोक्षेऽपि हिते तथा ← [ ८४] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, हितशब्दस्य हितकारीत्यप्यर्थः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? फफम् - फः = न्यायः → फोsपारदर्शने देवे न्याये ← [८४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, फः = जल्पः वचनमित्यर्थः ‘जल्प’धातोर्भावार्थक-‘घञ्' प्रत्ययः फकारो निष्फले जल्पे ← [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिप्रोक्ता, फो फे यस्य स फफः = न्यायनिरूपकः सत्यभाषित्वात् तम् ।
पुनः कीदृशम् ? फफम् फम् = चारु फं फल्गु चारु वा स्मृतम् ← [७२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, फम् = ध्वनिः → फं निष्फले ध्वनौ ← [ ८४ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, फं फं यस्य स फफ: मधुरध्वनि: सुस्वरनामकर्मोदयात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? फफफम् फम् = लोभ: फं क्लीबे लाभे लोभे ← [८५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकथिता, फः = लोहः → फो जल्पे निष्फले
[फ: ] श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः
=
९३
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रुचिरा
सुंदर महलवाले हे देव ! तुं निर्मल, कोप रूपी अग्नि को उपशांत करने में वायु तुल्य, लाभ रूपी वृक्ष के सर्जन में बीज तुल्य, हितकारी, न्याय के प्ररूपक, मधुर ध्वनिवाले, लोभ रूप लोह को आर्द्र (शिथिल) करने में अग्नि तुल्य, ज्ञान के समुद्र, चक्रवर्ती एवं माहेन्द्र देवों को ज्ञान देनेवाले, सर्व रोग के नाशक, विजय प्रदाता श्री विमलनाथ स्वामी की स्तवना कर ।। १५ ।।
રુચિરા
સુંદર મહેલવાળા હે દેવ ! તું નિર્મળ, કોપરૂપી અગ્નિનાં ઉપશમનમાં વાયુસમાન, લાભરૂપી વૃક્ષનાં સર્જનમાં બીજસમાન, હિતકારી, ન્યાયની પ્રરૂપણા કરનારા, મધુર ધ્વનિવાળા, લોભરૂપી લોખંડને પીગાળવામાં અગ્નિસમાન, જ્ઞાનનાં સમુદ્ર, ચક્રવર્તી અને માહેન્દ્ર દેવોને જ્ઞાન આપનારા, સર્વ રોગનાં નાશક, વિજયને આપનારા શ્રીવિમલનાથસ્વામીની સ્તવના ÷२. ॥ १५ ॥
९४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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लोहे * [९९] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविरचिता, फ: = शिखी अग्निरित्यर्थः → शिखी रौद्री वामपार्श्वकृतालय: फट्कार: प्रोच्यते सद्भिः फकार: * [४०] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातप्रणीत:, फमेव फ इति फफ: तत्रतशिथिलीकरणे फ इव य: स फफफः = लोभलोहानल: लोभरहित इत्यर्थः, तम् आर्तरौद्रध्यानरहितत्वात्, लोभस्य तन्मूलबीजत्वात् तदुक्तम् → अट्टरुद्दाणं मूलबीयं निरंभिउं लोभं त्ति [५१४] हितोपदेशे ।
पुन: कीदृशम् ? फफम् फः = ज्ञानम् फः = नीरधि: समुद्र इत्यर्थः → फोऽपारदर्शने देवे न्याये जाने च नीरधौ - [८४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, फस्य फ इति फफः = ज्ञानवारिधि: तदानन्त्याद् परमज्ञानित्वाच्च, तम् ।
अथ परमज्ञानितो लभ्यते ज्ञानं माहेन्द्रादिदेव-चक्रवादिभिरपीत्याशयादाह ।
पुन: कीदृशम् ? फफफम् - फम् = चक्रवर्ती फम् = माहेन्द्र: देवविशेष: → चक्रवर्तिनि फं क्लीबे - [८५] तथा → फं चार्के माहेन्द्रे - [८६] इत्युभयत्रैकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, फः = ज्ञानम् → फोऽपारे दर्शने देवे न्याये ज्ञाने - [८४] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, फञ्च फञ्चेति फफे, स्यात् फफयोः फं यस्मात् स फफफः = चक्रवर्तिमाहेन्द्रज्ञानदायक: सर्वज्ञत्वात्, सुरादीनां संशयनिवृत्तेश्च, तम् ।
__ पुन: कीदृशम् ? फम् = सर्वरोगविनाशक: → फंकारं भैरवं विद्याद् रक्ताभं विजयप्रदं महाग्रहहरं सर्वज्वररोगविनाशनम् - [३७] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातकृता, अतिशयविशेषात्, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? फम् = विजयप्रदम् → फंकारं भैरवं विद्याद् रक्ताभं विजयप्रदम् - [३७] इति पूर्वोक्तनाममालोक्तेः, तद् ।
चैत्रोज्ज्वलतृतीयायां फकारेण स्तुतिह्यसौ । सद्भक्त्या विहिता वासुपुरे श्रीविमलार्हतः ।।१।।
इति श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः ।। १५ ।।
[फ:] श्रीविमलनाथजिनस्तुतिः
९५
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[बः ]
श्रीअनन्तनाथजिनस्तुतिः
নুনু নুনুনু নুনু
बब बबं बब बब ! | बबं बबबबं बं ब
मर्चानन्तजिनेश्वरम् ।। १६ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यो विमल: (विगतपापमल:) स अनन्तज्ञानवान इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीअनन्तनाथजिनस्य स्तुति: प्रकाश्यते ।
बबमिति ।
हे बब ! ब: = मूर्खः ब: = बाल: → ब: कुम्भे वरुणे बिन्दौ विकल्पे भे गुरौ मदे विभूतिकारे कलहे पक्षिगर्भे च पर्वणि मूर्खे बाले — [१०१/१०२] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, बश्चासौ बश्चेति बब: = मूर्खबाल:, तस्य सम्बोधने हे बब ! = हे मूर्खबाल ! त्वम् अनन्तजिनेश्वरम् = श्रीअनन्तनाथस्वामिनम् अर्च = पूजय इति क्रियाकारकयोजना → अर्च पूजायाम् 6 [१०८] इति हैमधातुपाठः।
अत्र ‘अर्च' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहृतमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'अनन्तजिनेश्वरम्', किं सम्बोधनम् ? 'बब !', अपराणि श्रीअनन्तनाथस्य विशेषणानि । | ____ कीदृशं श्रीअनन्तजिनेश्वरम् ? बबम् - ब: = गुरु: → ब: कुम्भे वरुणे बिन्दौ विकल्पे खे गुरौ - [५०] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता, बानां ब इति बब: = गुरूणामपि गुरु: अनन्तज्ञानवत्त्वाद्विद्वन्मूर्धन्यगणधराणां गुरुत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? बबबबम् ब: = वर: → बो दन्त्यौष्ठ्यस्तथौष्ठ्योऽपि वरुणे वारुणे वरे - [८७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, ब: = पुरुष: → ब: पुमान् पुरुषे - [८५] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवनिर्मिता, ब: = वृन्दम् → बो दन्त्यौष्ठ्यस्तथौष्ठ्योऽपि वरुणे वारुणे वरे शोषणे पवने [ब:] श्रीअनन्तनाथजिनस्तुतिः ९७
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अन्वयः
(हे) बब ! [भो मूर्खबाल !] (त्वम्) बबम् [गुरूणामपि गुरुम्] बबबबम् [प्रकृष्टपुरुषप्रकरैः प्रणम्यम्] बम् [विमलम् ] बबबम् [मदमहीधरभेदकम्] बबम् [जगत्त्रयीरक्षकम् ] बबम् [बहुलबलम् ] बबम् [ सरोजवत् सुगन्धिनम्] बबबबम् [मानवमृधमेघमरुतम्] बम् [वरम् ] बम् [रोगहरम् ] अनन्तजिनेश्वरम् [श्रीअनन्तनाथस्वामिनम् ] अर्च [पूजय ] ।
९८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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गन्धे वासे वृन्दे च ६ [८६/८७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, बा = वन्दनम् → वन्दने वदने वादे वेदनायां च बा स्त्रियाम् - [८८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, बाश्चामी बाश्चेति बबास्तेषां ब इति बबबस्तस्यबा यस्य स बबबब: = प्रकृष्टपुरुषप्रकरैः प्रणम्य: नरेन्द्रसुरेन्द्रासुरेन्द्रादिभिः वन्दनीयत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? बम् ® ब: = विमल: → ब: शब्द: स्याद् विमले . [३७] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, तनुमनसोनॆर्मल्यात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? बबबम् + ब: = मद: → ब: कुम्भे वरुणे बिन्दौ विकल्पे भे गुरौ मदे - [१०१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविरचिता, ब: = भूधर: → भूधरश्च भयपृष्ठगतस्तथा सुरसो वज्रमुष्टिश्च बकार: - [४१] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकर्तृकः, ब: = भेद: → ब: पुमान् पुरुषे...भेदे * [८५] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवरचिता, ब एव ब इति बबस्तस्य बो यस्मात् स बबब: = मदमहीधरभेदक: कषायरहितत्वात् कषायनिवारकत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? बबम् • बम् = जगद् बम् = रक्षक: → बं शम्भौ च सुवायौ च जले जगति रक्षके - [१०३] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, बानां बमिति बबम् = जगत्त्रयीरक्षकः, तद् ।
ननु जगत्त्रय्या रक्षणेऽपेक्ष्यते बहुलं बलं किमस्ति जिनेशितरीदम् ? इति जिज्ञासायामाह।
पुनः कीदृशम् ? बबम् + बम् = बहुलम् बम् = बलम् → बं बलं बहुलं स्मृतम् + [७४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, बं बं यस्य स बब: = बहुलबल: अनन्तवीर्यवत्त्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? बबम् - ब: = पद्मम् → ब: कुम्भे वरुणे पद्मे [३३] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिप्रणीता, ब: = गन्ध: → बो दन्त्यौष्ठ्यस्तथौष्ठ्योऽपि वरुणे वारुणे वरे शोषणे पवने गन्धे [८७] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, ब इव बो यस्य स बब: = सरोजवत् सुगन्धी प्रकृष्टपुण्यवत्त्वादतिशयविशेषाच्च, तम् । [ब:] श्रीअनन्तनाथजिनस्तुति: ९९
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रुचिरा हे मूर्ख बालक ! तुं गुरुओं के भी गुरु, उत्तम पुरुषों के समूह से नमस्करणीय, विमल, अभिमान रूपी पर्वत के विच्छेदक, जगत्त्रयी के रक्षक, अतीव बलवान, कमल सम सुगंधी, मानवों के कलह रूपी मेघ को दूर करने में वायु तुल्य, श्रेष्ठ, रोग के अपहर्ता, श्री अनंतनाथ स्वामी की अर्चना कर ॥१६॥
રુચિરા. હે મૂર્ખ બાળક ! તું ગુરુઓનાં પણ ગુરુ, ઉત્તમ પુરુષોનાં સમૂહ દ્વારા નમસ્કરણીય, વિમલ, અભિમાનરૂપી પર્વતને ભેદનારા, ત્રણેય જગતનું રક્ષણ કરનારા, અત્યંત બળવાન, કમળ જેવા સુગંધી, માનવોનાં કલહ રૂપી મેઘને દૂર કરવામાં વાયુ સમાન, શ્રેષ્ઠ, રોગને હરનારા श्रीमनंतनाथस्वामीनी मर्यना २. ||१६ ॥
१००
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पुनः कीदृशम् ? बबबबम् - ब: = पुरुष: मानव इत्यर्थः → ब: पुमान् पुरुषे - [८५] इत्येकाक्षरनाममालाडमात्यमाधवनिर्मिता, बः = कलह: → कलहे ब उदाहृत: - [३२] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिविरचिता, ब: = अम्बुभृद् ब: = वायुः → बोऽम्बुभृद्वायुकुम्भेषु [१३] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, बानां ब इति बब: स एव ब इति बबबस्तदूरीकरणे ब इव य: स बबबब: = मानवमृधमेघमरुद् अतिशयविशेषान्यायनिष्ठत्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? बम् - ब: = वर: → बो दन्त्यौष्ठ्यस्तथौंष्ठ्योऽपि वरुणे वारुणे बरे - [८७] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनात्, श्रेष्ठतमत्वात्, उपमाऽनुपमेयत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? बम् • बम् = रोगहरम् → बकारमश्विनीबीजं पीतं रोगहरम् - [३८] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, आर्हतातिशयात्, तद् ।
आरब्धा छतमीग्रामे स्वबृहद्विरतेर्दिने । चतुर्थ्यां सितचैत्रस्य बकारेण तिथौ मुदा ।।१।। पञ्चम्यां च समाप्तेयं कुछवाडे पुरे स्तुतिः । श्रीअनन्तार्हतस्तस्य मोक्षकल्याणकाहनि ।।२।। युग्मम् ।।
इति श्रीअनन्तनाथजिनस्तुतिः ।। १६ ।।
[बः] श्रीअनन्तनाथजिनस्तुति:
१०१
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[भः] श्रीधर्मनाथजिनस्तुतिः
भभ भभ भभं भं भ|
!! ਮ ਮਸਮ ਮਾਂ ।
धर्मं त्वं हृदये धर ।। १७ ॥
१०२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
योऽनन्तज्ञानवान् स एव धर्मप्ररूपकः सत्यवक्तृत्वाद् वीतरागत्वाच्चेत्यनेन सम्बन्धेनागतस्य श्रीधर्मनाथस्य स्तुतिर्दर्श्यते ।
भभं भभमिति ।
भो भभ ! भः = भ्रमाकुलः भोऽतिभीते भ आकुले (भ्रमाकुले) ← [ ९९ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, भः = भूपतिः भ शुक्लगिरिभूपतौ ← [१३] इति नत्वादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातरचिता, भश्चासौ भश्चेति भभस्तस्य सम्बोधने भो भभ ! = हे भ्रमाकुलभूपते ! त्वम् धर्मम् श्रीधर्मनाथस्वामिनं हृदये = अन्तःकरणे धर = धत्स्व धंग् धारणे ← [ ८८७] इति है मधातुपाठ:, इति क्रियाकारकान्वयः ।
=
अत्र ‘धर' इति क्रियापदम् कः कर्ता ? ' त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? ‘धर्मम्’, कुत्र ? ‘हृदये', किं सम्बोधनम् ? 'भभ !’, अपराण्यखिलानि श्रीधर्मनाथस्वामिनो विशेषणानि ।
ननु श्रीधर्मनाथस्वामिनं हृदि धारणाद् भ्रमाकुलभूपतेः को लाभ: ? स्वभ्रमनिवृत्तिः सत्यज्ञानप्राप्तेस्तदेवाह ।
कीदृशं श्रीधर्मनाथस्वामिनम् ? भभम् भः = सत्यवाद: → भकारः श्रीकण्ठे चन्द्रे वह्नौ विभावसौ सत्यवादे ← [ ९९ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, भः = शब्द: भः शोभा भ्रमरे भावे शुक्रेऽशौ जलदे पुमान् आकाशे च मयूरे च प्रभावे सूर्यशब्दयोः ← [ १०४] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासग्रथिता, भो भे यस्य स भभः = सत्यशब्दवान् सत्यप्ररूपक इत्यर्थः सर्वज्ञत्वाद् भयरागद्वेषमोहाभावात् तदुक्तम् → भयरागदोसमोहाभावाओ [भ] श्रीधर्मनाथजिनस्तुतिः
ܕ
१०३
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अन्चयः - (भो) भभ ! [हे भ्रमाकुलभूपते !] भभम् [सत्यप्ररूपकम् भभम्
[पर्जन्यवद् गम्भीरध्वनिम्] भभम् [शुक्लध्यानवन्तम्] भम् [अनामयम् भभभभभम् [भौमगगनसुधीनक्षत्रसूर्योपमम्] भभम् [श्रेष्ठमन्त्रम् भभभम् [चन्द्रशोभावद्वक्त्रवन्तम्] भभभम् [महीपतिमयूरमेघम्] भम् [आरोग्यप्रदम् भम् [श्रेष्ठम् धर्मम् [श्रीधर्मनाथस्वामिनम्] त्वं हृदये [त्वमन्त:करणे] धर [धेहि] ।
१०४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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सच्चमणवाइं च ← [ १५७८ ] इति विशेषावश्यकभाष्ये, तम् I
अलं केवलं सत्यप्ररूपकत्वेन, सार्थक्यञ्च तस्य सह गाम्भीर्येणैवास्त्येवार्हतां शब्दानां गाम्भीर्यं पर्जन्यवत्, तदेवाह ।
पुनः कीदृशम् ? भभम् - भः = जलद: मेघ इत्यर्थः भः शम्भौ भ्रमरे भावे शुक्रेऽशौ जलदे पुमान् ← [ ५२] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथप्रणीता, भः = शब्द: भ... सूर्यशब्दयोः ← [ १०४] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासोक्तेः, भ इव भा यस्य स भभः = पर्जन्यवद् गम्भीरध्वनिः, वचनातिशयादर्हतः पञ्चत्रिंशद्वाग्गुणमध्येऽस्योक्तत्वात्, तम् ।
"
पुनः कीदृशम् ? भभम् भः = शुक्लः भः शुक्लगिरिभूपतौ ← [१३] इति पूर्वोक्तनत्वादि- एकाक्षरीनाममालावचनाद्, भः = भावः भः शम्भो भ्रमरे भावे ← [ ५९ ] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः भो भो यस्य स भभः = शुक्लभाव: शुक्लध्यानवानित्यर्थः क्षपकश्रेणिसंप्राप्तेः तम् । पुनः कीदृशम् ? भम् भम् = अनामयः आमयो रोग:, न विद्यते आमयो यस्य स अनामयो निरामय इत्यर्थः भकारं भार्गवं ज्ञेयं ज्योतिषाभमनामयम् ← [३८] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, असातस्यानुदयात्, तद् । पुनः कीदृशम् ? भभभभभम् भः = भौम: भौमे भः शब्दः ← [३८] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, भम् = गगनम् → भं क्लीबे गगने ← [६०] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवविरचित:, भः = सुधीः → भकारः पुंसि जलभे(दे) छादे शम्भौ शिलीमुखे सुधीः ← [८८/८९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, भम् = नक्षत्रम्भं नक्षत्रं बुधैरुक्तम् ← [२३] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकरचितः, भः = सूर्य: भः शोभा भ्रमरे भावे शुक्रेऽशौ जलदे पुमान् आकाशे च मयूरे च प्रभावे सूर्यशब्दयोः ← [१०४] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, भ एव भमिति भभम् = भौमगगनम् भा एव भानीति भानि = सुधीनक्षत्राणि, भभे भभानीति भभभभानि तत्र भ इव यः स भभभभभः = भौमगगनसुधीनक्षत्रसूर्यसमानः अवन्यज्ञानतिमिरनिवारकत्वात् सर्वदर्शित्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? भभम् भम् = श्रेष्ठम्भकारं भार्गवं ज्ञेयं [भ] श्रीधर्मनाथजिनस्तुतिः
१०५
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रुचिरा भ्रम से व्याकुल हे राजन् ! सत्य के प्ररूपक, मेघ सम गंभीर ध्वनिवाले, शुक्ल ध्यानी, निरामय, पृथ्वी रूप गगन में रहनेवाले बुद्धिमान जीवों रूप नक्षत्रों में सूर्य तुल्य, श्रेष्ठ मंत्र स्वरूप, चंद्र की शोभा सम मुखवाले (आलादक), राजा रूपी मयूर को हर्षित करने में मेघ समान, आरोग्य प्रदाता एवं श्रेष्ठ श्री धर्मनाथ भगवान को तुं तेरे हृदय में धारण कर ॥१७॥
રુચિરા. ભ્રમથી વ્યાકુળ થયેલા હે રાજા !સત્યનાં પ્રરૂપક, મેઘ સમ ગંભીર ધ્વનિવાળા, શુક્લધ્યાની, નિરામય, પૃથ્વીરૂપી ગગનમાં રહેલા બુદ્ધિશાળી જીવોરૂપી નક્ષત્રોને વિશે સૂર્યસમાન, શ્રેષ્ઠ મંત્ર સ્વરૂપ, ચંદ્રની શોભા સમ મુખવાળા (આલ્હાદક), રાજા રૂપી મયૂરને હર્ષિત કરવામાં મેઘ સમાન, આરોગ્યને આપનારા અને શ્રેષ્ઠ શ્રીધર્મનાથ ભગવાનને તું તારા ध्यमांधार। 5२. || १७ ॥
१०६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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ज्योतिषाभमनामयम् आयुरारोग्यदं श्रेष्ठम् - [३९] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, भम् = मन्त्रम् → नपुंसके भं नक्षत्रे गगने मन्त्रचक्रयोः - [८९] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, भं भं यस्य स भभः = श्रेष्ठमन्त्रस्वरूप: मिथ्यात्वविषनिवारकत्वात्, विषप्रतिकारे मन्त्रस्योपायस्वरूपत्वात्, तदुक्तम् → विसम्मि मंतो त्ति [४७] इति योगशतके, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? भभभम् - भ: = चन्द्रः → पुमान भकार: श्रीकण्ठे चन्द्रे - [९१] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवगुम्फिता, भः = शोभा → भ: शोभा + [१०४] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, भम् = वक्त्रम् मुखमित्यर्थः → भा: किरणे द्युतौ क्लीबे तु गगने राशौ तारायां पुण्ड्रवक्त्रयोः * [५२/५३] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता:, भस्य भ इति भभस्तद्वद् भं यस्य स भभभः = चन्द्रशोभावद्वक्त्रवान् आह्लादोत्पादकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? भभभम् भः = भूपति: → भ: शुक्लगिरिभूपतौ . [१३] इति पूर्वोक्तनत्वादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, भ: = मयूर: भः = मेघ: → भ: शोभा भ्रमरे भावे शुक्रेऽशौ जलदे पुमान् आकाशे च मयूरे च . [१०४] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, भा एव भा इति भभास्तत्र भ इव य: स भभभ: = महीपतिमयूरमेघ: प्रमोदप्रदायकत्वात्, तम् ।
___ पुन: कीदृशम् ? भम् - भम् = आरोग्यप्रदम् → भकारं भार्गवं ज्ञेयं ज्योतिषाभमनामयम् आयुरारोग्यदं श्रेष्ठम् + [३९] इति पूर्वोक्तैकाक्षरनाममालावचनाद्, पूर्वं स्वस्य रोगरहितत्वमुक्तमत्र पररोगनिवारकत्वमपि, तद् ।
पुनः कीदृशम् ? भम् = श्रेष्ठम् पूर्वोक्तैकाक्षरनाममालावचनात्, पुरुषोत्तमत्वात्, तद् ।
प्रणम्य प्रभुपावेशं वाराणसीविभूषणम् । वाराणस्यां भकारेण भक्त्येयं भणिता स्तुतिः ।।१।। अष्टम्यां चैत्रमासस्य पाण्डुरायां तिथौ मुदा । अधर्मनाशसद्धर्मदश्रीधर्मजिनेशितुः ।।२।। युग्मम् ।। इति श्रीधर्मनाथजिनस्तुति: ।। १७ ।।
★★★ [भ:] श्रीधर्मनाथजिनस्तुति: १०७
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[ मः] श्रीशान्तिनाथजिनस्तुतिः
ममममममं मं म
मममममम मम । ममममममं गं मं
शान्तीशं पूजयाम्यहम् ।। १८ ।।
१०८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मजुला
य: सद्धर्मप्रदायकः स परमशान्तिदाता मिथ्यात्वस्याशान्तिजननहेतुत्वादित्यनेन सम्बन्धन प्राप्तस्य श्रीशान्तिनाथजिनस्य स्तुतिर्जल्प्यते ।
मममिति ।
अहं मम शान्तीशम् = श्रीशान्तिनाथतीर्थकरम् पूजयामि = अर्चयामि → पूजण् पूजायाम् - [१५८६] इति हैमधातुपाठः, इति क्रियाकारकसण्टङ्कः।
अत्र ‘पूजयामि' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'अहम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'शान्तीशम्', कस्य 'मम', अन्यानि श्रीशान्तीशस्य विशेषणानि । ___कीदृशं श्रीशान्तीशम् ? ममम् - मम् = शुभम् → क्लीबे मं मूलके शुभे [१०७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविरचिता, म: = विधि: भाग्यमित्यर्थः → मो मन्त्रे मन्दिरे माने सूर्ये चन्द्रे शिवे विधौ - [९४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, मं मो यस्य स मम: = वरविधि: श्रेष्ठभाग्यवानित्यर्थ: विघ्नवारविरहितत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? अमममम् + म: = मद: → म ? (म:) स्त्रियां मञ्जुकायां च लक्ष्म्यां माने च मातरि मदिरामदयो: - [९२/९३] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, मम् = मौलि: → मं मौलौ - [९५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, म: = शिर: → म: शिवे विधौ चन्द्रे शिरसि 6 [१५] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रकविकृता, म एव ममिति ममम्, ममं मे यस्य स ममम: न ममम इति अममम: = अमदमौलिमूर्धा निष्कषायत्वात्, तम् । [म:] श्रीशान्तिनाथजिनस्तुतिः १०९
१०९
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अन्वयः - ममम् [वरविधिम्] अमममम् [अमदमौलिमूर्धानम्] मम् [ईश्वरम्] मममम्
[सूर्यसमूहविभावन्तम् अमममम् [रोगवह्निवारि] ममम् [पुरन्दरपूजनीयम्] अमम् [मानरहितम्] अमम् [सरलम्] मम् [नायकम् मम् [शुभम्] मम [मदीयम्] शान्तीशम् [श्रीशान्तिनाथजिनेश्वरम्] अहम् पूजयामि [अहमर्चामि]।
११०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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पुनः कीदृशम् ? मम् - म: = ईश्वर: → मकारमीश्वरम् - [४०] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविहिता, परमैश्वर्यवत्त्वात् तदुक्तम् → स्वाभाविककर्मक्षयजन्यसुरनिर्वर्तितचतुस्त्रिंशदतिशयलक्षणं तेषां परमैश्वर्यम् - [१०४८] इति विशेषावश्यकभाष्यवृत्तौ, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? मममम् " म: = सूर्यः → मो मन्त्रे मन्दिरे माने सूर्ये - [९४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, म: = मण्डलम् → मण्डलो ? (लं) मानी विष: सूर्यो मकारक: - [४३] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातविरचितः, मा = प्रभा » मा प्रभा + [४०७७] इति वाङ्मयार्णव: श्रीरामावतारशर्मप्रणीत:, मानां म इति ममः, मम इव मा यस्य स ममम: = भास्वन्मण्डलभा: अतीवतेजस्वित्वादन्तरेण भामण्डलमाननमीक्षितुमशक्यत्वाच्च,प्रभाधिक्यान्मण्डलशब्दस्योपन्यासः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? अमममम् + अम: = रोग: → अम: पुंसि रोगे [भा.१-पृ.१४७] इति शब्दार्थचिन्तामणि: सुखानन्दनाथरचितः, म: = हुतभुक् अग्निरित्यर्थ: → म ? (मो) भवेदिह मेधायां निवारणे साक्षिसत्यवादे च हुतभुक् - [३९] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातगुम्फिता, म: = अम्बु नीरमित्यर्थः → म: शिवामाम्बु- [१३] इति पूर्वोक्तनत्वादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, अम एव म इति अममस्तत्र-तदुपशमने म इव य: स अममम: = रोगवह्निवारि दुःखार्तिदाहकत्वाद् रोगज्वलनयोरुपमोपमेयत्वमुक्तम्, तदतिशयविशेषात्, तम्।
पुन: कीदृशम् ? ममम् = म: = इन्द्रः → म: शम्भौ धातरीन्द्रे च . [६१] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचित:, मा = अर्चा → माबन्त: स्त्री रमार्चयो: “ [९५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, मानां मा यस्य स मम: = पुरन्दरपूजनीय: पुण्यातिप्रकर्षात्, पूजातिशयवत्त्वाच्च तम् ।
नन्वाखण्डलार्चनीयत्वेन स्यादन्तःकरणे मानं यदहं मघवमहनीय इत्यतोऽर्हन्नमान: समानो वेत्याशङ्कामपाकुर्वन्नाह ।
पुन: कीदृशम् ? अमम् ॐ मः = मान: → म ? (म:) स्त्रियां मञ्जुकायां [म:] श्रीशान्तिनाथजिनस्तुति: १११
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रुचिरा श्रेष्ठ भाग्यवाले, शीर्ष पे मद के मुकुट का अभाववाले (मदशून्य), ईश्वर, सूर्य मंडल सम प्रभावाले, रोग रूपी अग्नि को उपशांत करने में नीर तुल्य, इन्द्र द्वारा पूज्य, अभिमान रहित, सरल, नायक, शुभ मेरे श्री शांतिनाथ भगवान की में पूजा करता हूँ ॥१८।।
११२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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च लक्ष्म्यां माने - [९२] इति पूर्वोक्तामात्यमाधववचनाद्, न विद्यते मो यस्य स अम: = मानरहितः, तम्, अथवाऽयमेवार्थोऽनया रीत्या-म: = मानी → मानी विष: सूर्यो मकारक: - [४३] इति पूर्वोक्तैकाक्षरीमातृकाकोशवचनाद्, न म इति अम: = अमानी मानशून्य इत्यर्थ: विगतरागद्वेषत्वात्, तम् । ____ ननु पूर्वम् ‘अमममम्' इत्यनेन विशेषणेनैव भावोऽयं प्रदर्शित: किं पुनर्व्यर्थेनैतद्विशेषणेनेति चेत्..... न पूर्वममदत्वं प्रोक्तमधुनाउमानित्वस्योच्यमानत्वात्, न च कृतमनेनापि मदमानयोस्तुल्यार्थित्वादिति वाच्यम् ‘आनन्दमोहयो: सङ्गमो मदः' - 'मत्समोऽन्यो नास्तीति मननं मान:' [(३१२)-(३१७)] इति श्रीदेवसागर-गणिकृतव्युत्पत्तिरत्नाकरोक्तेः पार्थक्याद् ।
नन्वस्तु जिनेशितरि मानरहितत्वमथ मायाया रहितत्वं सहितत्वं वा ? इति जिज्ञासायामाह ।
पुनः कीदृशम् ? अमम् छ म: = मायावी → मो मन्त्रे मन्दिरे माने सूर्ये चन्द्रे शिवे विधौ मायाविनि - [९४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, न म इति अम: = निर्माय: सरल इत्यर्थः सूनृतप्रदर्शित्वात् विश्वसनीयत्वाच्च मायाया असूनृतजननीत्वान्मायायुक्तस्य चाविश्वास्यत्वात् तदुक्तम् → असूनृतस्य जननी परशुः शीलशाख्रिन: जन्मभूमिरविद्यानां माया दुर्गतिकारणम् - [४१५] इति योगशास्त्रे → मायाशील: पुरुषो न करोति किञ्चिदपराधं सर्प इवाविश्वास्यो भवति तथाप्यात्मदोषहत: 6 [२८] इति प्रशमरतिप्रकरणे, तम्, मानमायोपलक्षणात् सर्वकषायरहितत्वमवगन्तव्यम् । ____ पुनः कीदृशम् ? मम् - म: = विभुः नायक इत्यर्थः → मो विधौ (विभौ) — [३४] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपप्रणीत:, विश्वत्रयीनेतृत्वात्,
तम् ।
पुन: कीदृशम् ? मम् " मम् = शुभम् → क्लीवे मं मूलके शुभे . [१०७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासगुम्फिता, कल्याणकारित्वात्, तद् ।
[म:] श्रीशान्तिनाथजिनस्तुति:
११३
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રુચિરા
શ્રેષ્ઠભાગ્યવાળા, શીર્ષ ઉપર મદનો મુકુટ નથી જેને એવા (નિરભિમાની), ઈશ્વર, સૂર્યમંડલ સમ પ્રભાવાળા, રોગ રૂપી અગ્નિને ઉપશાંત કરવામાં નીર સમાન, ઇંદ્ર વડે પૂજ્ય, અભિમાન રહિત, સરળ, નાયક, શુભ । એવા મારા શ્રીશાંતિનાથ ભગવાનની હું પૂજા કરુ છું. [૧૮]
११४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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शान्तिदः शान्तिनाथस्य मकारेणाथ संस्तुतिम् । विरच्य चैत्रमासस्य धवलैकादशीदिने ।।१।। सन्ध्यायां चन्द्रपुर्यां श्री-चन्द्रप्रभजिनेशितुः । भवभ्रमणभिद्भक्तिर्भागीरथीतटे कृता ।।२।। युग्मम् ।।
इति श्रीशान्तिनाथजिनस्तुतिः ।। १८ ।।
[म:] श्रीशान्तिनाथजिनस्तुति:
११५
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[ यः] श्रीकुन्थुनाथजिनस्तुतिः
यययं यययं यं य
यं ययं य ! ययं यय ! । ययं यं यययं यं यं
कुन्थुनाथं समर्चय ।। १९ ॥
___११६ .
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मजुला
य: शान्तिदाता स कुन्थुः (कौ = पृथ्व्यां सर्वजीवानां पाता) इत्यनेन सम्बन्धेनागतस्य श्रीकुन्थुनाथजिनस्य स्तुतिरुच्यते ।
यययमिति ।
हे य ! • य: = याचक: → याचके योऽतिकुत्सने — [१८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, तस्य सम्बोधने हे य ! = भो याचक ! त्वं कुन्थुनाथम् = श्रीकुन्थुनाथजिनेश्वरम् समर्चय = पूजय ‘सम्’-उपसर्गपूर्वक: 'अ'धातु: → अर्चिण पूजायाम् + [१९५४] इति हैमधातुपाठः, इति क्रियाकारकसम्बन्धः, कीदृश भो य ! ? यय - य: = विनय: य: = भाव: → यकार: पुंसि पवने यमे धातरि यातरि त्यागे भावे चये लिप्ये विनये - [९४] इत्येकाक्षरशब्दमालामात्यमाधवप्रणीता, यस्य यो यस्य स यय: = विनयभाववान् विनम्रत्वादत एवार्हत्क्रमयो: समागतिस्तस्य, तस्य संबोधने ।
अत्र ‘समर्चय' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहारि पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'कुन्थुनाथम्', किं सम्बोधनम् ? 'य', 'यय' तस्य विशेषणमपराणि श्रीकुन्थुनाथस्वामिनो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीकुन्थुनाथम् ? यययम् • यः = त्याग: → यस्त्यागे [६३] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्मित:, यम् = जलम् → यमम्भसि + [३६] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपविरचितः, यम् = सरित्पति: समुद्र इत्यर्थ: → यं संसारे सरित्पतौ — [१००] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, य एव यमिति ययम्, ययस्य यमिति यययम् = त्यागसलिलसागर: सिन्धौ यथा जलबिन्दूनां
[य:) श्रीकुन्थुनाथजिनस्तुतिः
११७
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अन्वयः " (हे) यय ! य ! [भो विनयभाववन् ! याचक !] (त्वम्) यययम्
[त्यागसलिलसागरम्] यययम् [त्यागभावदातारम्] यम् [श्रेष्ठम्] ययम् [संसारकल्पपादपम्] ययम् [वायुवत् सर्वदिग्वर्तियशसम्] ययम् [चन्द्राभम् ययम् [प्रशस्यदानकर्तारम्] यम् [पातारम्] यययम् [संसारसागरतारकम्] यम् [ईश्वरम्यम् [दातारम्] कुन्थुनाथम् [श्रीकुन्थुनाथस्वामिनम्] समर्चय [पूजय] ।
११८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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राशिस्तथैवार्हतोऽपि पृथक्पृथगनेकाभिग्रहत्यागादिकर्तृत्वादियमुक्ति:, तद् ।
ननूक्तमर्हत: परमत्यागित्वं न स्याद् यदि लोकानां तेन त्यागभावाभिवर्धनम् तर्हि किं तेनेत्याशङ्कायामाह।
पुनः कीदृशम् ? यययम् - य: = त्याग: → त्यागे च यकार: कथितो बुधैः * [२६] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहरविहितः, य: = भाव: → यकार: पुंसि पवने यमे धातरि यातरि त्यागे भावे - [९४] इति पूर्वोक्तामात्यमाधववचनाद्, य: = दाता → यस्त्यागे निलये वायौ यामे दातरि + [६३] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवगुम्फितः, यस्य य इति ययः, ययस्य य इति ययय: = त्यागभावदाता, न स्वयमेव त्यक्ताऽपि तु जीवानामपि त्यागभावोत्पत्तिकृदित्याशयः, त्यागधर्मप्ररुपकत्वात् विरतिधर्मोपदेशकत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? यम् - य: = श्रेष्ठ: → य: कथित: श्रेष्ठ: 6 [२९] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, पुरुषोत्तमत्वाद् गुणरत्नैरलङ्कृतत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ययम् - यम् = संसार: → यं संसारे - [१००] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, य: = कल्पपादप: → यकार: पुंसि पवने यमे धातरि यातरि त्यागे भावे चये लिप्ये विनये कल्पपादपे - [९४] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, ये य इव य: स यय: = संसारकल्पतरु: सर्वेषणापूरकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ययम् • य: = वायु: → यस्त्यागे निलये वायौ - [५६] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथप्रणीता, य: = यश: → यो वातयशसो: * [१९] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यनिर्मित:, य इव यो यस्य स यय: = वायुवद् यशस्वी ननु यथा वायोरस्थैर्यं तथैव तीर्थकरयशसोऽपि चलत्वमिति चेत्.... मैवम् अनौचित्याद् वायोर्यथा सर्वदिग्वर्तित्वं तथैव तद्यशसोऽत्रापेक्षणात्, उपमोपमेयभावे उपमानस्य सर्वधर्माणामुपमेयेऽवतारणेन भवितव्यमेवेति न नियम: किन्त्वेकादिधर्मसाम्येनाऽपि उपमोपमेयभावस्य ग्रहप्रसिद्धेरौचित्यस्यैवोपमाया: सर्वत्र
[य:] श्रीकुन्थुनाथजिनस्तुति:
११९
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रुचिरा
हे विनयभाववान याचक ! तुं भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेकानेक अभिग्रह के कर्ता (त्याग के समुद्र ), त्याग भाव के प्रदाता श्रेष्ठ, संसार में कल्पतरु तुल्य, वायु सम सर्वत्र यशवाले, चंद्र सम प्रभावाले, प्रशस्य दान के प्रदाता, रक्षक, संसार सागर से तारनेवाले, ऐश्वर्यवान, दाता श्री कुंथुनाथ भगवान की अर्चना कर ||१९||
१२०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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परिग्रहात्, भुवनत्रयव्यापकयशा इत्यर्थस्तदुक्तम् → भुवनत्रयव्यापकं यशस्तेषाम् * [१०४८] इति विशेषावश्यकभाष्यवृत्तौ, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ययम् " य: = चन्द्रः → य: सूर्ये तारके चन्द्रे - [९८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, या = शोभा आभेत्यर्थ: → या स्त्रियां यानमञ्जयो: शोभालक्ष्म्योश्च 6 [६३] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृतः, य इव या यस्य स यय: = शशिशोभ: चन्द्राभ इत्यर्थ: परमाह्लादकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ययम् = यः = श्रेष्ठ: → य: कथित: श्रेष्ठ: - [२९] इति पूर्वोक्ताभिधानादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, य: = दानम् → याने (दाने) यातरि यश्छागे - [२५] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकगुम्फितः, यो यो यस्य स यय: = प्रशस्यदानकर्ता मुक्तिप्रदायकत्वात्, तस्यैव प्रशस्यतमत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? यम् - य: = पाता दुःखदौर्भाग्यदारिद्र्यदुर्गत्यादिभ्यो रक्षक इत्यर्थः → य: स्त्र्यङ्गे निलये वायौ यमे धातरि पातरि + [१११] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासगुम्फिता, सन्मार्गोपदेशकत्वाद्, सन्मार्गोपदेशाद् दु:खादीनां निवृत्तेः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? यययम् • यम् = संसार: यम् = सागर: → यं संसारे सरित्पतौ - [१००] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, य: = तारक: → य: सूर्ये तारके - [९८] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, यमेव यमिति ययम् = संसारसागरः तस्माद् य इति ययय: = संसारसागरात् तारक: परमकृपालुत्वात् संसारदुःखार्ति द्रष्टुमप्रभुत्वाच्च, तम्।
___ पुन: कीदृशम् ? यम् - य: = ईश्वर: → य: पुञ्जोऽसु देवी सूनुरीश्वर: 6 [७९] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, अनन्तैश्वर्योपभोक्तृत्वात्, तम् ।
____पुन: कीदृशम् ? यम् , य: = दाता → यस्त्यागे निलये वायौ यमे दातरि * [५६] इति पूर्वोक्तेरुगपदण्डाधिनाथवचनाद्, परमौदार्यात्, तम् । ननु प्रशस्यतमदानदातृत्वं पूर्वं प्रतिपादितमत: पुन: कथने पुनरुक्तिरिति चेत्.... न आशयपार्थक्यात्, पूर्वं तु मुक्तिदानेन भावदानमेव निगदितमत्र तु द्रव्यदानस्यैवाशयात्, द्रव्यादिद्रव्यदानमपि जिनादेव प्राप्तव्यमपरस्मान्नेत्याशय: । यः] श्रीकुन्थुनाथजिनस्तुति: . १२१
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રુચિરા
હે વિનયભાવવાન યાચક ! તું ભિન્ન-ભિન્ન પ્રકારનાં અનેકાનેક અભિગ્રહોને કરનારા (ત્યાગનાં સમુદ્ર), ત્યાગનાં ભાવને આપનારા, શ્રેષ્ઠ, સંસારમાં કલ્પવૃક્ષસમાન, વાયુની જેમ સર્વત્ર જેઓને યશ ફેલાયેલો છે તેવા, ચંદ્રસમાન પ્રભાવાળા, પ્રશસ્ય દાનને આપનારા, રક્ષક, સંસારરૂપી સાગરથી તારનારા, ઐશ્વર્યવાન, દાતા શ્રીકુંથુનાથ ભગવાનની અર્ચના
કર. || ૧૯ ||
१२२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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आरब्धा मम जन्माह्नि चैत्रीयपूर्णिमातिथौ । श्रीमत्कुन्थोर्यकारेण स्तुतिः कर्णपुरा - पुरे ।। १ ।। जिनेशकृपया पूर्णा मोहनिया - पुरे मुदा । गुर्वाशीर्जनना चैत्रे श्यामलप्रतिपत्तिथौ || २ || युग्मम् ।।
इति श्री कुन्थुनाथजिनस्तुतिः ।। १९ ।।
[य] श्रीकुन्थुनाथजिनस्तुतिः
★★
१२३
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[ रः] श्रीअरनाथजिनस्तुतिः
ररररररं रं र
रं ररं ररररर !। ररं रं ररं रं र
मरमीडिष्व सर्वदा ।। २० ।।
१२४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मजुला
य: कुन्थुः (कौ = अवन्याम् सर्वजीवत्राता) स तु अरम् = शीघ्रम् संसारसागरस्य अरम् = तटम् अवाप्नोति सर्वदेहिनामापयति च परमकारुण्यादित्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीअरनाथजिनस्य स्तुति: कथ्यते ।
रररमिति ।
हे रर ! र: = अनाथ: → र: स्यात् पुमान् शिवे वह्नौ वजे कामे रवौ गुरौ, अनाथे - [९७] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, र: = नर: → अथ र: स्मरे तीव्र वैश्वानरे शब्दे रामे वजे नरे - [३६/३७] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपप्रणीत:, रश्चासौ रश्चेति रर: = अनाथनर: तस्य सम्बोधने हे रर ! त्वम् सर्वदा अरम् = श्रीअरनाथजिनेश्वरम् ईडिष्व = स्तुष्व इति क्रियाकारकयोजना → ईड स्तुतौ - [१६६७] इति बृहद्धातुकुसुमाकर: ।
अत्र 'ईडिष्व' इति क्रियापदम् ? क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहृतमिदं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'अरम्', कदा ? 'सर्वदा', किं सम्बोधनम् ? ‘रर', अन्यानि निखिलानि श्रीअरनाथस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीअरस्वामिनम् ? रररम् = रम् = धनम् → रं रत्नं रोदनं धनम् * [८३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, रम् = धान्यम् → नपुंसके रशब्दस्तु धान्यरोमाञ्चकुक्षिषु + [९८] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवविरचिता, रा = समृद्धिः → रा समृद्धिः स्यात् + [८२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, रञ्च रञ्चेति ररे तयो रा यस्य स ररर: = धनधान्याभ्यां समृद्धः
अनेकजीवपालयितृत्वाच्चक्रित्वाच्च, तम् । [रः] श्रीअरनाथजिनस्तुतिः १२५
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अन्वयः - (हे) रर ! [भोऽनाथनर !] (त्वम्) रररम् [धनधान्यसमृद्धम्] रररम्
[दीनेभ्यो द्रविणस्य दातारम् रम् [वीरम्] ररम् [सूर्यवदनम्] ररम् [आभ्यन्तरवैरिवारविजेतारम्] रररम् [कामकृशानुकम्] ररम् [रसारत्नम् ररम् [रजश्छेदकम्] ररम् [रुचिररूपम्] रम् [गुरुम् रम् [ईश्वरम् अरम् [श्रीअरनाथजिनेश्वरम्] सर्वदा [सदा] ईडिष्व [स्तुष्व ।
१२६
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ननु कृतं धनधान्यसमृद्धिनैव सार्थक्यञ्च तस्य दान एव सन्ति चात्र पुष्कला: पार्थिवा धनधान्यपरिपूर्णा अपि मितम्पचत्वेन मुद्रितान्त:करणा न च तीर्थेशोऽयमेतादृग् परमौदार्यात् तदेवाह ।
पुनः कीदृशम् ? रररम् • र: = रङ्क: → रस्तु रक्षणे भीतौ रजसि रके च - [११७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, रम् = धनम् → रं रत्नं रोदनं धनम् - [८३] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, रं राति = ददाति इति रर: = द्रविणदाता → रांक दाने - [१०६९] इति धातुपाठो श्रीहेमचन्द्राचार्यगुम्फित:, रेभ्यो रर इति ररर: = दीनेभ्यो द्रविणदायक: परमकृपालुत्वात्, तम्, बिभ्रत्यत्र परिपूर्णं सर्वेऽपि किन्तु नैष्फल्यमेव तद्दानस्य वारिधौ वृष्टेयर्थ्यात् यथा तथा दीनेभ्यो ददतेऽल्पीयांस एव केचिद् दयालदो नि:स्वार्थवृत्तयो दानं करुणापरत्वादिति ।
पुन: कीदृशम् ? रम् छ र: = वीर: → र: स्यात् पुमान् शिवे वह्नौ वजे कामे रवौ गुरौ, अनाथे कपिले पिण्डे वीरे [९७] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवग्रथिता, सर्वारिजेतृत्वादेतेन जिनेशितुश्चक्रित्वं व्याख्यातम्, षट्खण्डनायकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ररम् - र: = सूर्य: → र: कामो वह्निः सूर्योऽथ . [८१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, रम् = वक्त्रम् → रं क्लीबे रुधिरे मूर्ध्नि ध्याने व्योमाण्डकुक्षिषु वक्त्रे - [११८] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, र इव रं यस्य स रर: = सूर्यवदन: अतीवतेजस्वित्वाद् देदीप्यमानत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ररम् - र: = शत्रु: → रुरौ शब्दौ पुमांसौ द्वौ शम्भु(शत्रु)शब्दार्थवाचकौ - [१०३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, र: = क्षय: → र: पुमान् पावके कामे क्षये - [६५] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृत:, राणां रो यस्मात् स रर: = शत्रुक्षायक: प्रभो: प्रभावादन्येषामपि शत्रुजयने प्रभुतेत्याशय:, अथवा राणां रो यस्य स रर: = शत्रुक्षायक: सर्वारिजेतृत्वात्, तम् । [रः] श्रीअरनाथजिनस्तुतिः
१२७
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रुचिरा
हे अनाथ मानव ! तुं धन धान्य से समृद्ध, दीनों को धन देनेवाले, वीर, सूर्य सम तेजस्वी मुखवाले, आंतरशत्रुविजेता, कामाग्नि का उपशमन करने में नीर तुल्य, पृथ्वी में रत्न समान, रज के उच्छेदक, सुंदर रूपवाले, गुरु, ईश्वर, श्री अरनाथ भगवान की सर्वदा स्तवना कर ||२०||
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जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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ननु सर्वारिजेतृत्वमुक्तं पूर्वमेव 'वीरम्' इत्यमुष्मिन् विशेषणे अथालं पुनरुक्त्येति चेत्.... न आशयपार्थक्यात् तत्र तु शत्रुत्वेन बायशत्रव एव बोध्या न तीर्थकृदयं केवलं बाहयारिजेता क्रोधादिशत्रुसमूहरहितश्चापि तेषामपि जेतृत्वात्, अत एवात्राभ्यन्तरवैरिवारविजेतृत्वमपि विज्ञेयम् ।
पुनः कीदृशम् ? रररम् - र: = काम: → रो ध्वनौ तीक्ष्णे वैश्वानरे कामे 6 [१६/१७] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रकविविहिता, र: = वह्निः → र: स्मये जलदे तीक्ष्णे वह्नौ [१९] इति शब्दरत्नसमन्वय: शाहराजमहाराजगुम्फितः, रम् = जलम् → रंजले - [१०१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुलिखिता, र एव र इति ररस्तत्र रवद् य: स रररम् = कामकृशानुकम्, पूर्वोक्ताभ्यन्तरारिरहितत्वे एवास्यान्तर्भाव: स्यात्तथापि कामरिपोर्दुर्जेयत्वव्याख्यानाय पृथगुपन्यासः, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? ररम् - र: = भूमिः पृथ्वीत्यर्थः → रश्च रामेऽनिले वह्नौ भूमावपि - [२९] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवरचितः, रम् = रत्नम्
→ रं रत्नम् - [८३] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, रे रमिव य: स ररम् = रसारत्नम्, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? ररम् - र: = रज: → रस्तु रक्षणे भीतौ रजसि . [११७] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, र: = छेद: → रो नादे छेदने वेदे 6 [१०२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, रस्य रो यस्य यस्माद् वा स रर: = रजश्छेदकः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ररम् - र: = रुचिर: → रुचिरो रेफ ईरित: - [४५] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकृतः, र: = रूपम् → रश्च कामेऽनले वजे शब्दे रूपे च कीर्तित: [३०] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, रो रो यस्य स रर: = रुचिररूपवान् तदनुपमत्वात् सर्वसुरैरपि जिनाङ्गुष्ठतुल्यरूपं विधातुमशक्यत्वात्, तथा चार्षम् → सव्वसुरा जइ रुवं अंगुट्ठपमाणयं विउव्वेज्जा जिणपायंगुठं पड़ णं सोहइ तं जहिंगालो + [५६९] इत्यावश्यकनियुक्तौ, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? रम् - र: = गुरुः → र: स्यात् पुमान् शिवे वह्नौ वजे [र] श्रीअरनाथजिनस्तुतिः १२९
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રુચિરા હે અનાથ માનવ ! તું ધનધાન્યથી સમૃદ્ધ, દીનોને ધન આપનારા, વીર, સૂર્ય સમ તેજસ્વી મુખવાળા, આંતરશત્રુવિજેતા, કામાગ્નિનું ઉપશમન કરવામાં વારિ સમાન, પૃથ્વીમાં રત્નસમાન, રજનું ઉચ્છેદન કરનારા, સુંદર રૂપવાળા, ગુરુ, ઇશ્વર શ્રીઅરનાથ ભગવાનની સર્વદા સ્તવના કર. || ૨૦ ||
१३०
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रवौ
कामे खौ गुरौ ← [१७] इति पूर्वोक्तामात्यमाधववचनाद्, धर्मोपदेशकत्वाद् अज्ञानतिमिरनिवारकत्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? रम् रः = ईश्वरः रश्च प्रकीर्तितः, ईश्वरे ← [२६/२७] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकग्रथितः, परमैश्वर्योपभोजित्वात्, तम् ।
चतुर्थ्यां रामचैत्रस्य श्रीकञ्चनपुरे पुरे ।
स्तुति: श्रीअरनाथस्य रकारेण प्ररूपिता ।। १ ।।
इति श्रीअरनाथजिनस्तुतिः ।। २० ।।
[र] श्रीअरनाथजिनस्तुतिः
★★
१३१
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| [ ল: ] श्रीमल्लिनाथजिनस्तुतिः
ললল ললল লল
| ল লল ললল লল !। লল লল লল ল ল ! |
| মলিলাগু মুনু ! || 2 ৭ |
१३२
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मञ्जुला
योऽरं संसारसागरस्य अरम् = तटम् प्राप्नोति स कामाक्रोधाद्याभ्यन्तरशत्रूणां जयने मल्लः स्यादेव वीर्यानन्त्यात्, मल्ल एव मल्लिरित्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीमल्लिनाथजिनस्य स्तुति: प्रोच्यते ।
रेल ! - रे सम्बोधने → सम्बोधनेग भो: प्याट् पाट् हे है हंहो अरेऽपि रे - [१५३७] इत्यभिधानचिन्तामणि: श्रीहेमचन्द्राचार्यप्रणीतः, ल: = दीन: → लो दीनेन्दु- [१४] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्ररूपिता, तस्य सम्बोधने रे ल ! = हे दीन ! त्वम् मल्लिनाथम् = श्रीमल्लिनाथजिनेश्वरम् जुषस्व = सेवस्व इति क्रियाकारकयोग: → जुष् मुदि सेवे - [३१०-३११] इति कविकल्पद्रुमः वोपदेवप्रणीत:।
कीदृश रे ल !? लल ! • लम् = सुखम् → लं लक्षणं सुखम् - [८५] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, लम् = अपूर्णम् → अपूर्णे लं प्रकीर्तितम् . [१०५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुभणिता, लेन लमिति ललम् = सुख्खेनापूर्णम्, तस्य सम्बोधने । ___अत्र 'जुषस्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहृतं पदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'मल्लिनाथम्', किं सम्बोधनम् ? 'रे ल !', 'लल' इति तु तस्य विशेषणम्, अन्यानि श्रीमल्लिनाथस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीमल्लिनाथम् ? लललम् = ल: = स्वर्ग: → लो दीप्तौ द्याम् । [३०] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवप्रणीत:, लम् = सुखम् → लं लक्षणं सुखम् * [८५] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, लस्य लमिति ललम् = स्वर्गसुखम्, ललं लाति = ददाति इति ललल: = स्वर्गसुखदाता → राति लाति द्वावपि दानार्थौ .
[ल:] श्रीमल्लिनाथजिनस्तुति:
१३३
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अन्वयः ॐ रे लल ! ल ! [हे सुखेनापूर्ण ! दीन !] (त्वम्) लललम्
[स्वर्गसुखदातारम्] लललम् [शिवशर्मदायकम्] लम् [सर्वफलप्रदम् ललम् [अवनिचन्द्रमसम्] ललम् [इन्द्राणामपीन्द्रम्] लललम् [भयविषनिवारणे पीयूषोपमम्] ललम् [दयासदनम् ललम् [दीनदानदायकम् ललम् [शशिवदाह्लादकम्] लम् [विमलम्] मल्लिनाथं [श्रीमल्लिनाथस्वामिनम्] जुषस्व [सेवस्व] ।
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[अदादि.-पृ.१४६] इति माधवीयाधातुवृत्तिः सायणाचार्यनिर्मिता, → आतो डोऽह्वावाम: - [सि.है.श.-५/१/७६] इत्यनेन 'ड'प्रत्ययः, तम् ।।
ननु प्रोक्तं तीर्थकृतो दिव्यसुखप्रदातृत्वमलञ्च तेन मोक्षाभिलाषुकाणामाकाङ्क्षन्ति च ते सर्वदा शिवशर्मैव नान्यदस्ति च किं जिनस्य तद्दायकत्वं न वेत्याशङ्कायामस्त्येवेति निगदन्नाह ।
पुन: कीदृशम् ? लललम् + ल: = व्यापक: → लश्चन्द्रः .... व्यापक: - [१४८] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधानम्, लम् = सुखम् → लं लक्षणं सुखम् । [८५] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनात्, ल एव लमिति ललम् = व्यापकसुखं शिवशर्मेत्यर्थः ल: = दानम् → लो दाने च प्रकीर्तित: - [३१] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवविरचित:, स्यात् ललस्य लं यस्मात् स ललल: = शिवशर्मप्रदाता तम्, न केवलमर्हन् स्वर्गसुखमेव ददाति किन्तु शिवशर्मापीत्याशयः ।।
न च स्वर्गापवर्गशर्मफलप्रदानादेवावधिरर्हतः समागता सर्वफलप्रदातृत्वादित्याशयादाह ।
पुन: कीदृशम् ? लम् - लम् = सर्वफलप्रदम् → लकारं शक्रबीजं स्यात् पीतं सर्वफलप्रदम् - [४३] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, परमकृपालुत्वादप्रतिमसामर्थ्याच्च, तद् । ___पुन: कीदृशम् ? ललम् - ल: = भूमि: पृथ्वीत्यर्थ: → लश्च भूमौ - [३०] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवगुम्फित:, ल: = इन्दुः → लो दीनेन्दु- [१४] इति पूर्वोक्तनत्वादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, ले ल इव य: स लल: = अवनिचन्द्रमा: सर्वासुमन्नक्षत्रसेव्यत्वात्, तम् ।।
नन्ववनिस्थासुमतां सेव्यत्वमस्त्वथामरावतीस्थामरादीनामर्चनीयत्वमस्ति न वेति जिज्ञासायामाह।
पुन: कीदृशम् ? ललम् + ल: = इन्द्रः → लश्चालौ च बिडौजसि . [१२३] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, लानां ल इति लल: = इन्द्राणामपीन्द्रः पुरन्दरादिभिः सर्वैः पूजनीयत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? लललम् - ल: = भयम् → लश्च भूमौ भये - [३०] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवप्रणीत:, लम् = विषम् → लं लक्षणं सुखं नाम रक्षः [ल:] श्रीमल्लिनाथजिनस्तुति: १३५
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रुचिरा सुख से अपूर्ण हे दरिद्र मानव ! तुं स्वर्ग एवं मोक्ष के सुख के प्रदाता, सर्व फल के दाता, पृथ्वी में चन्द्र तुल्य, इन्द्रों के भी इन्द्र, भय रूपी विष का निवारण करने में सुधा तुल्य, दया के घर स्वरूप, दीनों को दान देनेवाले, चन्द्र सम आह्लादक, निर्मल श्री मल्लिनाथ भगवान की सेवा कर ॥२१।।
રુચિરા સુખથી અપૂર્ણ હે દરિદ્રમાનવ ! તું સ્વર્ગનાં તથા મોક્ષનાં સુખને અર્પનારા, સર્વળનું દાન કરનારા, પૃથ્વીમાં ચંદ્રસમાન, ઇન્દ્રોનાં પણ ઇન્દ્ર, ભયરૂપી વિષનું નિવારણ કરવામાં અમૃતસમાન, દયાનાં ઘર
સ્વરૂપ, દીનોને દાન આપનારા, ચંદ્ર સમ આલ્હાદક, નિર્મલ શ્રીમલ્લિનાથા (भगवाननी सेवा 5२. || २१ ।।
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श्रोत्रं वचो विषम् - [८५] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, ल: = अमृतम् → ल इन्द्रे चलनेऽमृते - [३९] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपनिर्मित:, ल एव लमिति ललम्, तत्र ल इव य: स ललल: = भयविषनिवारणे पीयूषोपमः, तम्, निर्भय इत्यर्थ: अप्रमत्तत्वात् प्रमत्तस्य सर्वतो भयोपपत्तेस्तथा च पारमर्षम् → सव्वतो पमत्तस्स भयं सव्वतो अप्पमत्तस्स णत्थि भयम् - [१२९] इत्यचारागसूत्रे ।
पुन: कीदृशम् ? ललम् - ल: = दया → लश्चामृते दिशायाम् (दयायाम्) 6 [३९] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिकृता, ल: = आलय: → ल आलये - [१०६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, लस्य ल इति लल: = दयासदनम् परमकारुण्यात्, तम् ।
नन्वस्तु जिनस्य दयालुत्वं किन्तु केषु दयावारिवर्षित्वं तत्तु नोदितमीक्ष्यतेऽत्र बहूनां स्वार्थिनां तृप्तेष्वेव कृपावर्षकत्वं न चायमेतादृशो दीनेष्वपि दयादानवर्षित्वात्, तदेवाह ।
पुन: कीदृशम् ? ललम् - ल: = दीन: → दीनेन्दुविहङ्गमे - [१४] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, ल: = दानम् → लश्च दाने प्रकीर्तित: 6 [३१] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातगुम्फिता, लेभ्यो लो यस्य यस्माद् वा स लल: = दीनदानदायक: निर्धनेऽपि दयालुत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? ललम् + ल: = शशी → लो दीनेन्दुविहङ्गमे - [१४] इति पूर्वोक्तनत्वादिनाममालोक्तेः, ल: = दीप्तिरालादनं वा → लो दीप्तौ द्यां लश्च भूमौ भये चालादनेऽपि च - [३०] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवप्रणीत:, लवद् दीप्तिरालादनम् वा यस्य यस्माद् वा स लल: = शशिवद् दीप्तिमान् शशिवदाह्लादको वा नयनरम्यत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? लम् - ल: = विमल: → विमलो लघु:..... लकारक: - [५२] इति प्रकारान्तरवर्णनिघण्टुः, द्रव्यभावतो निर्मल इत्याशयः, तम् ।
औरङ्गाबादपुर्यां श्री-मल्लिनाथजिनेशितुः । स्तुतिश्चैत्रे शितौ षष्ठ्यां लकारेण प्रकीर्तिता ।। १ ।।
इति श्रीमल्लिनाथजिनस्तुतिः ।। २१ ।।
[ल:] श्रीमल्लिनाथजिनस्तुतिः ..
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[वः] श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुतिः
ववं ववं ववं वं वं
वववं वववं ववः । वववं वववं वं वं
वन्देऽहं मुनिसुव्रतम् ।। २२ ।।
१३८
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मञ्जुला
य आभ्यन्तरारिजयने मल्लः स अवश्यं मुनिसुव्रत: (मुनिरिव सुव्रतः), अथवा स मुनिः = सर्वज्ञः मनुते जगत्त्रिकालावस्थामिति मुनिः → मनूयि बोधने ← [ १५०७ ] इति है मधातुपाठः, मनेरुच्च ← [ ५६२] उणादिपाठः, इत्यनेन उपान्त्यस्याकारस्योत्वम्, मुनिश्चासौ सुव्रतश्चेति मुनिसुव्रतः - इत्यनेन सम्बन्धेनागतस्य श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनः स्तुतिरुच्यते ।
ववं ववमिति ।
अहं मुनिसुव्रतम् = श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनम् वन्दे = नमामि वदुङ् स्तुत्यभिवादनयोः ← [ ७२१] इति हैमधातुपाठ:, इति क्रियाकारकसण्टङ्कः, कीदृशोऽहम् ? ववः • वः = संयमः वः पुमान् गत्वरे वायौ संयमे ← [ १२५ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्ररूपिता, वम् = वसनम् →वं सुखं वसनम् ← [८८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरि प्रोक्ता, वस्य वं यस्य स ववः = संयमवसन: श्रीवीरवेषधारीत्यर्थः, एतेन स्वस्य दीक्षितत्वं व्याख्यातम् ।
अत्र ‘वन्दे' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? 'अहम्', कीदृशोऽहम् ? ' वव:', कं कर्मतापन्नम् ‘मुनिसुव्रतम्', अन्यानि श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनम् ? ववम् वः = बुधः → वो बुधः ← [२९] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकप्रणीतः, वः = प्रबोधः वः पुमान् स्वान्तगे वाते मरणे संयमेऽधरे प्रबोधे ← [ १०३ / १०४ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, वानां वो यस्मात् स ववः = विबुधप्रबोधक: विद्वच्छिरोमणि श्रीगणभृदादीनां प्रतिबोधकरत्वात्, तम् 1
पुनः कीदृशम् ? ववम् - वम् = श्वेतम् → वकारं वरुणं विद्यात् श्वेतम् ←
[व] श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुतिः
१३९
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अन्वयः ववम् [ विबुधप्रतिबोधकम् ] ववम् [ शुक्लरुधिरम् ] ववम् [ सुगन्धितनुमन्तम् ] वम् [सुखिनम् ] वम् [ शुभम् ] वववम् [ विकारवसनवह्निम् ] वववम् [विषमायुधविरोचनवारि] वववम् [सुखवारिवारिदम् ] वक्त्रम् [वधवारिदवायुम्] वम् [श्रेष्ठम् ] वम् [बुधम् ] मुनिसुव्रतम् [ श्रीमुनिसुव्रतस्वामिनम्] वव: अहम् [ श्रीवीरवेषधारी (संयमी ) अहम् ] वन्दे [ नमामि ] |
१४०
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[२०] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातविद्वत्कृता, वम् = रक्तम्वं सुखं वसनं रक्तम् ← [८८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, वं वं यस्य स ववः = शुक्लरुधिरः आर्हतातिशयात्, तम् 1
पुनः कीदृशम् ? ववम् ” वम् = गन्धः सुगन्ध इत्यर्थः → शिक्षाभृद्गन्धगतिषु वा स्त्री वं तु नपुंसके ← [ १०४ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवकृता, वम् वपुः वं सुखं वसनं रक्तं वपुः ← [८८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविरचिता, वं वे यस्य स ववः = सुगन्धितनुमान् पुण्यप्रकर्षात्, तम् ।
=
पुनः कीदृशम् ? वम् ं वः = सुखी → वः पङ्गुः सुखी ← [ ८६ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, परमशर्ममहोदधिनिमग्नत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? वम् • वः = शुभः → वः सान्त्वने च वाते च वरुणे वन्दने ( शुभे) ← [ ४९४७ ] इति वाङ्मयार्णवः पण्डितरामावतारशर्मप्रणीतः, कल्याणकारित्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? वववम् वः = विकार: विकारे वः प्रकीर्तितः ← [३२] इत्यभिधानादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, वम् = वसनम् वं सुखं वसनम् ← [८८] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, वः = वह्निः → वः पुमान् गत्वरे वायौ संयमे वरुणे स्मरे कान्तारेऽग्नौ ← [ १२५ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविरचिता, व एव वमिति ववम्, तत्र - तज्ज्वलने व इव यः स वववः = विकारवसनवह्निः वेदोदयरहितत्वान्निष्कामित्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? वववम् वः = विषमायुधः स्मर इत्यर्थः, → वः पुमान् सान्त्वने वायौ संयमे वरुणे स्मरे ← [७२] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघव-निर्मितः, वः = विरोचनः वह्निरित्यर्थः वो वह्निः ← [ २९ ] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकविहितः, वः = वारि जलसंज्ञश्च खड्गीशोऽपि वकारक: ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकृतः, व एव व इति ववः, तत्र तदुपशान्तौ व इव यः स वववः = विषमायुधविरोचनवारि विरक्त्युपदेशकत्वाद् वैराग्यजननहेतुत्वाच्च, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? वववम् वम् = सुखम् → वं सुखम् ← [ ८८ ] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, वः = वनम् जलमित्यर्थः, वः = वारिद: मेघ इत्यर्थः → [व] श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुतिः
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रुचिरा विद्वानों के प्रतिबोधक, श्वेत रक्तवाले, सुगंधी देहवाले, सुखी, शुभ, विकार रूपी वस्त्र को प्रज्वलित करने के लिए वह्नि तुल्य, काम रुपी वह्नि का उपशमन करने के लिए वारि तुल्य, सुख रूपी जल को अर्पण करने के लिए मेघ तुल्य, वध रूपी बादल को दूर करने के लिए वायु तुल्य, श्रेष्ठ, प्रबुद्ध श्री मुनिसुव्रत स्वामी को संयमी मैं नमन करता हूं ।।२२।।
રુચિરા વિદ્વાનોનાં પ્રતિબોધક, સફેદ રક્તવાળા, સુગંધી દેહવાળા, સુખી, શુભ, વિકાર રૂપી વસ્ત્રને પ્રજવલિત કરવામાં વહ્નિસમાન, કામ રૂપી વહિને ઉપશાંત કરવામાં વારિ સમાન, સુખ રૂપી વારિને આપવામાં મેઘ સમાન, વધ રૂપી વાદળાને દૂર કરવામાં વાયુ સમાન, શ્રેષ્ઠ, પ્રબુદ્ધ શ્રીમુનિસુવ્રતસ્વામીને સંયમી હું નમન કરું છું. / ૨૨ //
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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वारिदवारुणौ उत्कारी जलसंज्ञश्च खड्गीशोऽपि वकारक: [४७] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकृत:, वमेव व इति ववस्तस्य प्रदाने व इव य: स वववः = सुखवारिवारिद: सर्वासुमतां सातप्रतीतिकारकत्वात्, तम् ।। ___पुन: कीदृशम् ? वववम् न् व: = वध: हिंसेत्यर्थ: → व: पुमान् गत्वरे वायौ संयमे वरुणे स्मरे कान्तारेऽग्नौ वधे [१२५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, व: = वारिद: → वारिद-....वकारक: + [४७] इति पूर्वोक्तैकाक्षरीमातृकाकोशवचनात्, व: = वायु: → व: पुमान् सान्त्वने वायौ . [६४] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथगुम्फिता, व एव व इति वव: तत्रतदूरीकरणे व इव य: स ववव: = वधवारिदवायु: अतिशयविशेषात्, तम्, वायोरागमने यथा वारिदस्य दूरीभवनं तथैव तीर्थकृदायाने तत्क्षेत्राद् साधिकशतयोजनं यावन्न स्याद्धिंसादिरिति भावः ।
पुन: कीदृशम् ? वम् व: = श्रेष्ठ: → श्रेष्ठे विकारे व: प्रकीर्तित: [३२] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, पुरुषोत्तमत्वात् सर्वगुणसम्पन्नत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? वम् » व: = बुध: → वो बुध: - [२९] इति पूर्वोक्तमहाक्षपणकवचनाद्, प्रबुद्धत्वात्, तम् ।
श्रीमुनिसुव्रतस्वामिचतुष्कल्याणपावने । श्रेष्ठे राजगृहीतीर्थे स्तुत्वा श्रीमुनिसुव्रतम् ।। १ ।। वकारेणाथ तस्यैव जिनस्य विहिता स्तुतिः । चैत्रमासस्य कृष्णायां त्रयोदश्यां तिथौ मया ।। २ ।। युग्मम् ।।
इति श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुति: ।। २२ ।।
[व:] श्रीमुनिसुव्रतस्वामिस्तुतिः
१४३
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[शः] श्रीनमिनाथजिनस्तुतिः
शशः शशः शशं शः श
शः शशः शशशः शशः । शशः शशः शशः शः शः
श्रीनमिर्जयतात् सदा ।। २३ ।।
१४४
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मजुला
यो मुनिसुव्रत: (मुनिवत् सुव्रत:) स नमि: (नमन्ति प्रह्वीभवन्ति परीषहोपसर्गा अमुमिति, अथवा नमन्ति सर्वेऽपि व्रतप्रभावविशेषादिति) 'नम्'- धातो: 'इन् प्रत्यय: → सर्वधातुभ्य इन् — [५५७] इत्युणादिपाठः, तथा च गर्भगते जिने रिपुराजराजिभि: प्रणति: कृता, इत्यनेन सम्बन्धेन प्राप्तस्य श्रीनमिनाथजिनेश्वरस्य स्तुतिरुद्यते।
शश: शश इति ।
श्रीनमिः = श्रीनमिनाथस्वामी सदा = सर्वदा जयतात् = विजयं प्राप्नुयाद् इति क्रियाकारकसम्बन्ध: → जिं अभिभवे [८] इति हैमधातुपाठः ।
अत्र 'जयतात्' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? श्रीनमि:, कदा ? 'सदा' अन्यानि श्रीनमिनाथस्य विशेषणानि ।
कीदृश: श्रीनमि: ? शश: + श: = वरेण्य: श्रेष्ठ इत्यर्थ: → श: परोक्षे समाख्यात: शान्तौ शोभावरेण्ययो: - [३३] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाज्ञातप्रणीता, शम् = धर्म: → शं धर्मे - [३०] इति विश्वलोचनकोश: श्रीधरसेनाचार्यरचित:, श: शं यस्य स शश: = प्रकृष्टधर्मप्ररूपक: सत्यसमेतत्वात् सत्यस्यैव प्रशस्यतमत्वात् जिनधर्मस्तु जिनवचनादेवावगम्यते जिनवचश्च शास्त्राल्लभ्यते शास्त्रञ्चासत्यशून्यमिति बिभणिषुराह ।
पुन: कीदृश: ? शश: - शम् = सत्यम् → शं सत्ये 6 [१३३] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, शम् = शास्त्रम् → शं च शास्त्रं निगद्यते - [२९] इत्येकाक्षरकोश: पण्डितमनोहरकृत:, शं शे यस्य स शश: = सत्यशास्त्र: सत्ययुक्तशास्त्रवक्तेत्यर्थः रागद्वेषरहितत्वात्, तयोरसत्यजननबीजत्वात् तत्प्रोक्तम[श:] श्रीनमिनाथजिनस्तुति: १४५
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अन्वयः - शश: [प्रकृष्टधर्मप्ररूपकः] शश: [सत्ययुक्तशास्त्रवक्ता] शशम् [अज्ञानां
शरणम्] श: [शोभन:] शश: [शशाङ्कवच्शीत:] शश: [सूर्यवद् दीधितिमान्] शशश: [शशाङ्कशोचि:श्लोकः] शश: [राजाधिराजः] शश: [सुखसागरः] शश: [स्वर्गसुखप्रदायकः] शश: [सुन्दरसुखदाता श: [स्वच्छ:] श: [भर्ता] श्रीनमि: [श्रीनमिनाथजिनेश्वरः] सदा सर्वदा जयतात् [विजयमवाप्नुयात् ।
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स्माभिः जिनराजस्तोत्रस्य राजहंसाभिधानायां स्वोपज़वृत्तौ → रागद्वेषयोरसत्यजननहेतुत्वात् - [श्लो.-५.पृ.-२९] इति ।
सत्यशास्त्रत्वात् स्याज्जिनेश्वरादेव संज्ञानलाभः, अत एवाशयोऽयं यदज्ञानाम् - ज्ञानरहितानामल्पज्ञानिनां वा शरणमर्हन्नेवेति व्याचिख्याषुराह ।
पुन: कीदृश: ? शशम् शम् = अज्ञ: → शं सुखार्थाज्ञशक्तिषु - [७६] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः, शम् = शरणम् → शं सुखं शरणम् . [९०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, शानां शमिति शशम् = अज्ञानिनां शरणम् सज्ञानोपलब्धेः।
पुन: कीदृश: ? श: + श: = शोभन: → श: सूर्ये शोभने — [१०८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, सर्वविषयेषु सौन्दर्यान्न कस्यचिद्विषयस्योल्लेखः ।
पुन: कीदृश: ? शश: - श: = शशाङ्क: चन्द्र इत्यर्थः → श ? (श:) शशाके - [१०८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, श: = शीत: → श: सूर्ये शोभने शीते - [१०८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, श इव श इति शश: = शशाङ्कवच्शीत: परमसौम्यत्वात् क्रोधकषायशून्यत्वाच्च ।
पुन: कीदृश: ? शश: * श: = सूर्य: → श: सूर्ये - [१०८] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनात्, श: = रश्मि: → श ? (श:) शशाङ्केऽच्छवारिणि रश्मौ * [१०८/१०९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, अथवा शा = शोभा → शा स्त्रियां देवपूजायां शक्तौ शोभावरेण्ययो: [६७] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथगुम्फिता, श इव शा यस्य स शश: = सूर्यवद्दीधितिमान् सूर्यवच्छोभावान् वा देदीप्यमानत्वादज्ञानतिमिरप्रध्वंसकत्वाच्च ।
पुन: कीदृश: ? शशश: श: = शशाङ्क: श: = रश्मि: → श ? (श:) शशाङ्केऽच्छवारिणि रश्मौ - [१०८/१०९] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भूक्ते:, शम् = कीर्ति: → शं क्लीबे शास्त्रे श्रेयसि मङ्गले कीत्तौ + [६८] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथनिर्मिता, शस्य श इति शश: = शशाङ्कशोचि: चन्द्रि के त्यर्थः तद्वत् शम् यस्य स शशश: = शशाङ्कशोचि:श्लोक: चन्द्रिकावन्निर्मलसर्वगयशसा प्रसाधितदिगन्त इत्यर्थः, अर्हत्त्वात्, तदुक्तम् → [श:] श्रीनमिनाथजिनस्तुति: १४७
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रुचिरा श्रेष्ठ धर्म के प्ररुपक, सत्य युक्त शास्त्रों के वक्ता, अज्ञानी जीवों के शरण स्वरूप, सुंदर, चंद्र सम शीतल, सूर्य सम प्रभावाले, चांदनी सम निर्मल कीर्तिमान, राजाओं के भी राजा, सुख के समुद्र, स्वर्ग सुख के प्रदाता, मुक्ति सुख के प्रदाता, निर्मल, चतुर्विध संघ के नायक श्री नमिनाथ भगवान सदा विजयी हो ॥२३॥
१४८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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नियजसससहरपसाहिय दियंते निययमणाईअणंते पडिवन्नो शरणमरिहते - [२१] इति चतुःशरणप्रकीर्णके।
पुन: कीदृश: ? शश: ७ श: = भूप: → शो वल्मीके शिवे कूर्मे भूपे , [६७] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथकृता, शानां श इति शश: = भूपानामपि भूप: राजाधिराजत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? शश: - शम् = सुखम् → शं सुखश्रेयसोरपि - [३९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनविहितः, श: = महार्णव: सागर इत्यर्थः → शो महेशे महार्णवे - [१०९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविरचिता, शस्य श इति शश: = सुखसागर: आनन्दानन्त्याद् दु:खांशशून्यत्वाच्च ।
न चास्तु सुखसागरत्वेन साफल्यमस्यान्यस्मै शर्मप्रदानविधावेव यथा वैयर्थ्यमेवावबुध्यते कोट्यधिकसुवर्णमुद्राधिपते: कार्पण्ये सुवर्णादीनां तथेति वाच्यम् अनन्तरमेव कथयिष्यमाणत्वाद् । ____ पुन: कीदृश: ? शश: - शम् = स्वर्ग: → शं शास्त्रे श्रेयसि मङ्गले कीत्तौ शक्त्यायुधे स्वर्गे - [६८] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथग्रथिता, शम् = सुखम् → शं सुखम् - [३३] इत्येकाक्षरकोश: पुरुषोत्तमदेवप्रणीत:, शस्य शं यस्मात् स शश: = स्वर्गसुखप्रदायक: तद्दानेऽपीशत्वात् ।
नन्वस्त्वनेनाप्यस्माकं यतो नाशंसामहे स्वर्गसौख्यमाशास्महे वयं तु शिवशर्मैव नान्यन्न च प्रोक्तं तदतो दोषस्य तादवस्थ्यमेवेति चेत्...... श्रुणु तस्यैव निगद्यमानत्वाद् ।
पुन: कीदृश: ? शश: - श. = शोभन: → श: सूर्ये शोभने - [१०८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, शम् = सुखम् → शं सुख्खे स्याच्च . [४०] इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपनिर्मित:, स्यात् श: शं यस्मात् स शश: = सुन्दरसुखदायक: शिवशर्मण एव सुन्दरतमत्वात् तस्यानन्त्यादनवधित्वाच्च । ___कोट्यधिकसुवर्णमुद्राधिपतेर्दातृत्वेऽपि न स स्वादिना स्ववदन्यस्यापि समृद्धिमत्त्वं कल्पते न च सर्वमपि राति तीर्थकरस्तु स्वाख्रिलान्येव शर्मादीन्यन्यस्मायपि प्रयच्छति तथा च तस्यानुदानं स्यात् क्षैण्यमहतस्तु तन्नेति भेदविशेषश्च ।
पुन: कीदृश: ? श: - श: = स्वच्छ: → तथा स्वच्छे श: 6 [१०९] [श:] श्रीनमिनाथजिनस्तुति: १४९
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રુચિરા. શ્રેષ્ઠ ધર્મનાં પ્રરૂપક, સત્યથી યુક્ત શાસ્ત્રો કહેનારા, અજ્ઞાની જીવોનાં શરણ સ્વરૂપ, સુંદર, ચંદ્ર સમ શીતલ, સૂર્ય જેવી પ્રભાવાળા, ચાંદની જેવી નિર્મળ કીર્તિવાળા, રાજાઓનાં પણ રાજા, સુખનાં સમુદ્ર, સ્વર્ગનાં સુખને આપનારા, મુક્તિસુખદાતા, નિર્મળ, ચતુર્વિધ સંઘના નાયક શ્રી નમિનાથ ભગવાન સદા જય પામો. || ૨૩ ||.
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इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, कर्ममालिन्यरहितत्वाल्लब्धस्फटिकनैर्मल्याच्च ।
पुन: कीदृश: ? श: - श: = भर्ता नेतेत्यर्थ: → शोऽश्वशूद्राम्बुभर्तरि - [१४] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, चतुर्धासङ्घनायकत्वात् ।
पवित्रे गणभृद्वर्यश्रीगौतमर्षिजन्मतः । श्रीकुण्डलपुरे तीर्थे शकारेण विधाय वै ।। १ ।। स्तुतिं श्रीनमिनाथस्य चैत्रस्यामावसीदिने । आदीशगौतमोश्च सन्ध्यायां संस्तवः कृतः ।। २ ।। युग्मम् ।।
इति श्रीनमिनाथजिनस्तुतिः ।। २३ ।।
★★★
[शः] श्रीनमिनाथजिनस्तुति:
१५१
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[ षः ] श्रीनेमिनाथजिनस्तुतिः
षषं षषं षषं षं ष -
षं षषं षषषं वष ! |
षषष षषषं षं ष !
नेमीनं नम वा मन ॥ २४ ॥
१५२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यो नमि: (नमयति बाह्याभ्यन्तररिपून् ) स नेमि: ( नयति = प्रापयति शीघ्रं शैवसुखम् ) →णीं प्रापणे ← [ ८८४] इति हैमधातुपाठ नियो मिः ← [४८३ ] इत्युणादिपाठः, गुणश्चेति सम्बन्धेनायातस्य श्रीनेमिनाथजिनस्य स्तुतिराख्यायते ।
षषं षषमिति ।
-
हे ष ! ० षः = विज्ञः षः पुंसि केशे विज्ञे ← [ पृ. १९६२ ] इति शब्दस्तोममहानिधिस्तारानाथप्रणीतः, तस्य सम्बोधने हे ष ! त्वं नेमीनम् श्रीनेमिनाथम् नम = वन्दस्व मन = अर्चय णम नतौ ← [ पृ. ४९८ ] मन पूजायाम् ← [पृ. ८४४] इति शब्दस्तोममहानिधिस्तारानाथप्रोक्तः, वा समुच्चये → वा स्याद् विकल्पोपमयोरेवार्थे च समुच्चये ← [ ७२] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवविरचित:, इति क्रियाकारकयोजना ।
कीदृश हे ष ? षषष : = विषयः काम इत्यर्थः → षः स्वर्गे विषये च ना ← [६९] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथविहिता, षः = अग्निः → ष: शून्यार्काग्निकीनाशे ← [१५] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, षस्य षो यस्य स षषः = विषयवह्निः कामाग्निना दग्ध इत्यर्थस्तस्य सम्बोधने ।
गुणिनः संस्तवनाद् निगुर्णोऽपि गुणितां प्रयात्यतो ब्रह्मपरं परब्रह्मस्वरूपं श्रीनेमिनाथजिनेश्वरं वन्दस्वार्चय चेत्युपदेशः कामार्तस्य विशेषतः ।
अत्र ‘नम मन’ चेति द्वे अपि क्रियापदे, कः कर्ता ? ‘त्वम्’ अध्याहार्यमिदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'नेमीनम्' इति, किं सम्बोधनम् ? 'ष !', ' षष' इति तु तस्य विशेषणम्, अन्यानि श्रीनेमीनस्य कर्मतापन्नस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीनेमीनम् ? षषम् षः = श्रेष्ठः ष: श्रेष्ठे ← [४१] [ ष: ] श्रीनेमिनाथजिनस्तुतिः
१५३
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ॐ
अन्वयः _ (हे) षष ! ष ! [हे कामाग्निदग्ध ! विज्ञ ! ] (त्वम्) षषम् [ श्रेष्ठशर्माणम् ] षषम् [सिद्धिसुखरातारम्] षषम् [वरवालम् ] षम् [ गम्भीरलोचनम् ] षषम् [मानवश्रेष्ठम्] षषम् [ पण्डिताभीष्टम् ] षषषम् [विद्वद्वृन्दविभाकरम् ] षषषम् [ क्रोधरोगौषधम् ] षषषम् [ वरमधुरम् ] षम् [निपुणम् ] नेमीनम् [ श्रीनेमिनाथम् ] नम [ वन्दस्व ] मन [ अर्चय] वा [च] ।
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जिनेन्द्रस्तोत्रम
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इत्यनेकार्थतिलक: सचिवमहीपप्रणीत:, षम् = सुखम् → सुखे षं स्यात् - [११०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, ष: षं यस्य स षष: = श्रेष्ठशर्मा मुक्तिसुखानुभूते: मुक्तिसुखस्यैव प्रशस्यतमत्वात्, तम् ।
परमकृपालुत्वादन्यस्मायपि तद्रातीति व्याचिख्याषुराह ।
पुन: कीदृशम् ? षषम् - ष: = अपवर्ग: → षोऽतिरोषेऽपवर्गे - [१०९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, षम् = सुखम् → सुख्खे षं स्यात् + [११०] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भूक्तेः, स्यात् षस्य षं यस्मात् स षष: = सिद्धिसुखराता परमकारुण्यवत्त्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? षषम् + ष: = श्रेष्ठ: → ष: श्रेष्ठे - [१९] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रसूरिकृता, षः = कच: → ष: कचे पुंसि विज्ञेय: - [३७] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरविहितः, षा: षा यस्य स षष: = वरवाल: परमपरमाणुभिर्निष्पन्नत्वात् पूजितैः पूजितत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? षम् - ष: = गम्भीरलोचन: → षश्च गम्भीरलोचने * [३१] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकप्रणीत:, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? षषम् - षा: = मानवा: → ष: पुंसि मानवे - [पृ.११६३] इति शब्दस्तोममहानिधिस्तारानाथविरचितः, ष: = श्रेष्ठ: → षकारस्तु मत: श्रेष्ठे - [२६] इत्येकाक्षरीनानार्थकाण्ड: श्रीधरसेनाचार्यप्ररूपितः, षेषु ष इति षष: = मानवश्रेष्ठः सर्वगुणसंपन्नत्वात्, तम् ।।
पुन: कीदृशम् ? षषम् - षम् = पण्डित: → पण्डितेपि षमादृतम् - [११०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, ष: = इष्टः → ष: सदार: स्यात् तथेष्टे - [४३] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिगुम्फिता, षाणां ष इति षष: = पण्डितानामभीष्टः ज्ञानोपलब्धे: संशयनिराकृतेश्च, तम् ।
किं वैशिष्ट्यं श्रीनेमिजिनेशितरि ? यत: पण्डितानामपीष्ट इत्याशङ्कायामाह।
पुनः कीदृशम् ? षषषम् + षः = सानुः विद्वानित्यर्थ: → ष: प्रक्षरे सानुवेधसो: [१०९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रोक्ता, ष: = निवह:
वृन्दमित्यर्थ: → निवहे चैव रवे चैत्यादिषु स्मृत: विशेष्यनिज: षशब्द: [१११] [ष:] श्रीनेमिनाथजिनस्तुति: १५५
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रुचिरा कामाग्नि से प्रज्वलित हे विद्वान् ! तुं मोक्ष सुख का अनुभव करनेवाले, मोक्ष सुख के प्रदाता, सुंदर केशवाले, गंभीर नयनवाले, मानवों में श्रेष्ठ, पंडितों को इष्ट, विद्वानों के समूह में सूर्य समान, क्रोध रूपी रोग का निवारण करने में औषध तुल्य, श्रेष्ठ मधु तुल्य मधुर ध्वनिवाले, निपुण श्री नेमिनाथ भगवान की वंदना एवं अर्चना कर ॥२४॥
રુચિરા કામાગ્નિથી પ્રજ્વલિત હે વિદ્વાન ! તું મોક્ષનાં સુખનો અનુભવ કરનારા, મોક્ષનાં સુખને અર્પનારા, સુંદર (એકદમ કોમળ) વાળવાળા, ગંભીર નયનવાળા, માનવોમાં શ્રેષ્ઠ, પંડિતોને પણ ઈષ્ટ, વિદ્વાનોનાં સમૂહમાં સૂર્યસમાન, ક્રોધ રૂપી રોગનું નિવારણ કરવામાં ઔષધ સમાન, શ્રેષ્ઠ મધ જેવો મધુર અવાજ છે જેનો તેવા, નિપુણ શ્રીનેમિનાથ ભગવાનની વંદના અને અર્ચના કર. | ૨૪ ||
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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लेकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवभणिता, ष: = अर्क: विभाकर इत्यर्थः → ष: शून्यार्काग्नि- 6 [१५] इति पूर्वोक्तनत्वादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, षाणां ष इति षषस्तत्र ष इव य: स षषष: = विद्वद्वन्दविभाकर: सर्वज्ञत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? षषषम् - ष: = अतिरोष: क्रोध इत्यर्थ: ष: = अतिरोग: → षोऽतिरोषे (अतिरोगे) - [१०९] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, षम् = भेषजम् → भेषजे च षम् - [११०] इत्यप्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, ष एव ष इति षष: = अतिरोषातिरोग: तत्र तन्निवारणे षवद् य: षषषम् = क्रोधरोगौषधम् निष्क्रोध: क्रोधानभिभूत इत्यर्थ: सुखित्वात् क्रोधाभिभूतस्य सुखविरहात् तदुक्तम् → कोहाभिभूया न सुहं लहंति + [३] इति गौतमकुलके, तद् । ___पुन: कीदृशम् ? षषषम् - षम् = श्रेष्ठम् → षं विरामके गर्भमोक्षे मर्षणे च परोक्षश्रेष्ठयोस्त्रिषु [७७] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृतः, षम् = मधु → षं सस्यं मधु + [९२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, ष: = रव: → रवे
चैत्यादिषु स्मृत: विशेष्यनिन: षशब्द: - [१११] इति पूर्वोक्ता-मात्यमाधववचनाद्, षं च तत् षञ्चेति षषम्, तद्वत् षो यस्य स षषष: = वरमधुरव: सुस्वरनामकर्मोदयात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? षम् - ष: = निपुण: → ष: पुंसि कचे त्रिषु विज्ञे निपुणे - [भा.१, पृ.६४८] इति शब्दार्थचिन्तामणि: सुखानन्दनाथविरचितः, ...यकौशल्यात्, तम् ।
श्रीमहावीरनिर्वाणकल्याणकात् प्रपावने । पावापुर्यभिधे तीर्थे तृतीये ह्यक्षये दिने ।। १ ।। निर्माय नेमिनाथस्य षकारेण स्तुतिर्मुदा । त्रि:प्रदक्षिणीचक्रे च सिद्धिस्थलसरो मया ।। २ ।। युग्मम् ।।
इति श्रीनेमिनाथजिनस्तुतिः ।। २४ ।।
[ष:] श्रीनेमिनाथजिनस्तुति:
१५७
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[ सः ] श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
ससः ससः ससः सः स
सः ससः सससः ससः ।
सससः सससः सः सः
पार्श्वो दद्याच्शिवश्रियम् || २५ ||
१५८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
यो नेमि: (नयति = प्रापयति सिद्धिसुखम् ) स पार्श्वः = सर्वज्ञः (स्पृशति = जानाति ज्ञानेन सर्वमिति पार्श्व: - ' स्पृश संस्पर्शने' पृषोदरादित्वात् साधुः) इत्यनेन सम्बन्धेनागतस्य श्रीपार्श्वनाथस्वामिनः स्तुतिरभिधीयते ।
सस सस इति ।
पार्श्वः = श्रीपार्श्वनाथ: शिवश्रियम् = मुक्तिलक्ष्मीम् दद्यात् = दिश्यात् इति क्रियाकारकयोगः → डुदांग्क् दाने ← [ ११३८ ] इति हैमधातुपाठः ।
अत्र 'दद्यात्' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' पार्श्वः', कां कर्मतापन्नाम् ? ‘शिर्वाश्रयम्’, अन्यानि श्रीपार्श्वस्य विशेषणानि ।
कीदृश: श्रीपार्श्वनाथ: ? ससः • सम् = सुखम् → सं सुखम् ← [ ९४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, सः = निवासः सः सङ्गार्थे शोभनार्थे प्रकृष्टार्थसमर्थयोः प्रथमे तदवस्थाने निवासे ← [ १३७/१३८] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यास रचिता, सस्य सो यः स सस: = सुखसदनम् आत्मामन्दानन्दनिमग्नत्वादसातस्यानुदयाच्च ।
पुनः कीदृश: ? ससः सः = सनातनम् ध्रुवमित्यर्थः → सः पुंसि मदने वायौ परोक्षसूर्ययोरपि सनातने ← [ १३७ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, सम् = यौवनम् सं वनं धनं यौवनेऽपि समाख्यातम् [११२/११३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, सः सं यस्य स ससः = सनातनयौवन: अनश्वरतारुण्य इत्यर्थः वार्धक्यविरहितत्वात् ।
पुनः कीदृश: ? ससः सः = शशी → सार्णक: शशी ← [५० ] [स] श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
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अन्वयः_ ँ ससः [सुखसदनम् ] सस: [ सनातनयौवन: ] सस: [शशिशुचि:] सः [श्रेष्ठ: ] सस: [सम्यग्ज्ञानदायक: ] सस: [ समयावबोधी] सस: [ सूर्यप्रभ: ] सः [सुरूपः] सस: [दुर्जनानामपि हितकारी ] ससस: [ क्रोधवृषसिंहः ] ससस: [ प्रद्युम्नपादपप्रभञ्जनः ] स: [ सत्यवान् ] स: [ समर्थ: ] पार्श्व: [श्रीपार्श्वनाथस्वामी] शिवश्रियम् [ मुक्तिलक्ष्मीम् ] दद्यात् [ रातु ] ।
१६०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातविहितः, स: = भा: → स: पुंस्युमासुते वायौ देहभा:- * [७८] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविरचितः, स इव सो यस्य स सस: = शशिशुचि: आह्लादजननहेतुत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? स: + स: = श्रेष्ठ: → सकार: कीर्तित: श्रेष्ठे - [३५] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, पुरुषोत्तमत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? सस: - सम् = सम्यक् → सं सम्यक् परिकीर्तितम् - [४३] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिभणिता, सम् = ज्ञानम् → सं पक्षिस्पन्दने क्लीबे ज्ञाने - [७९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रोक्तः, सं सं यस्मात् स सस: = सम्यग्ज्ञानदायक: सन्मार्गोपदेशकत्वात् ।
__पुन: कीदृश: ? सस: - स: = समय: अभेद्यकाल इत्यर्थः → समय: सामग: शुक्रः सङ्गति: सार्णक: 6 [५०] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातग्रथितः, सम् = ज्ञानम् → सं क्लीबे स्पन्दनपथे ज्ञाने - [७१] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथगुम्फिता, सस्य सं यस्य स सस: = समयावबोधी सूक्ष्मज्ञत्वात् समयस्य सूक्ष्मत्वं ध्वनितमनु योगद्वारे [सू.-३६६] कैवल्यादेवै क समयस्यावगम्यत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? सस: - स: = सूर्यः → स: सोमे सोमपानेऽपि सूर्ये - [११२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, स: = भा: प्रभेत्यर्थः → स: पुंस्युमासुते वायौ देह-भा: - [७८] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवरचित:, सवत् सो यस्य स सस: = सूर्यप्रभ: अतीवप्रदीप्रत्वात् ।।
पुन: कीदृश: ? स: - स: = सुरूप: अनन्यलावण्यवानित्यर्थः, अथवा स: = सुयशा: निर्मलयशा इत्यर्थः → सो हंस: सुयशाः... सुरूपश्च - [१५९-१६१] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधानम्, अर्हद्रूपस्य अर्हद्यशसश्च सर्वगत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? सस: + स: = दुर्जन: → सोऽस्रभुक्सिंहदुर्जने - [१५] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, स: = हितम् हितकारीत्यर्थ: → सकार: पुंसि साकारे गौरीपुत्रे प्रभञ्जने धर्मे हिते + [११२] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविहिता, सानां स इति सस: = दुर्जनानां हितकारी । [स:] श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुति: १६१
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रुचिरा
सुख के घर स्वरूप, सदैव युवा, चंद्रप्रभ, श्रेष्ठ, सम्यग्ज्ञान के प्रदाता, अत्यंत सूक्ष्म समय के ज्ञाता, सूर्य सम तेजस्वी, श्रेष्ठ रूपवाले, दुर्जनो के लिए भी हितकारी, क्रोध रूपी वृषभ के लिए सिंह तुल्य, काम रूपी वृक्ष को निर्मूल करने के लिए वायु तुल्य, सत्य वक्ता, समर्थ श्री पार्श्वनाथ भगवान मुक्ति लक्ष्मी का दान करो ||२५||
१६२
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पुनः कीदृश: ? ससस: + स: = क्रोध: → स: कोपे - [२४] इत्येकाक्षरकोशोऽज्ञातविरचितः, स: = वृष: → वृषे च स: - [११२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, स: = सिंहः → सोऽस्रभुसिंहदुर्जने - [१५] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातगुम्फिता, स एव स इति ससस्तत्र-तभेदने स इव य: स ससस: = क्रोधवृषसिंहः निष्क्रोधीत्यर्थ: संसारपारगत्वात् क्रोधादे: संसारकारणमूलत्वात् तदुक्तं पुष्पमालायाम् → संसारकारणाणं मूलं कोहाइणो तेय * [२६७] इति, अथवा स: = जीव: → सो हंस:... जीव: - [१५९-१६२] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधानम्, सः = नक्षत्रम् → सं नक्षत्रे [१४०] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, स: = सूर्य: → स: सूर्य: + [९३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिसमुदिता, सा एव सा इति ससास्तत्र स इव यः स ससस: = जीवनक्षत्रसूर्य: जिनेशितॄणां सर्वासुमन्नक्षत्रनेतृत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? ससस: + स: = काम: → स: परोक्षे च कामे च . [४३] इत्येकाक्षरनाममालावररुचिभणिता, स: = द्रुः पादप इत्यर्थ: → स: पुंस्युमासुते वायौ देहभा:श्रीद्रुवाजिषु — [७८] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रोक्तः, स: = प्रभञ्जन: पवन इत्यर्थ: → सकार: पुंसि साकारे गौरीपुत्रे प्रभञ्जने - [११२] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्ररूपिता, स एव स इति ससस्तत्र-तद्विच्छेदने स इव य: स ससस: = प्रद्युम्नपादपप्रभञ्जनः ।
पुन: कीदृश: ? स: + स: = सत्यवान् → स: पुंसि मदने वायौ परोक्षसूर्ययोरपि सनातने सत्यवति — [१३७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, सत्यवचनार्ह इत्यर्थः, अर्हत्त्वात् तस्य तथात्वात् तदुक्तम् → अरिहंता सच्चवयणमरिहंता . [१७] इति चतुःशरणप्रकीर्णके ।
पुन: कीदृश: ? स: - स: = समर्थ: → स: सङ्गार्थे शोभनार्थे च प्रकृष्टार्थसमर्थयो: - [१३७/१३८] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, सर्वं कर्तुमिति शेषः, अचिन्त्यसामर्थ्यवानित्यर्थ: सिद्धत्वात् तदुक्तम् → अचिंतसामत्था * [२५] इति विशेषणम् चतुःशरणप्रकीर्णके ।
[स:] श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
१६३
Page #189
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રુચિરા સુખનાં ઘર સ્વરૂપ, સદૈવ યુવા, ચંદ્ર સમ પ્રભાવાળા, શ્રેષ્ઠ, સમ્યજ્ઞાનને આપનારા, અત્યંત સૂક્ષ્મ સમયને પણ જાણનારા, સૂર્ય સમ પ્રભાવાળા, શ્રેષ્ઠ રૂપવાન, દુર્જનોને પણ હિતકારી, ક્રોધ રૂપી વૃષભને વિશે સિંહ સમાન, કામ રૂપી વૃક્ષને નિર્મૂળ કરવામાં વાયુ સમાન, સત્યવક્તા, સમર્થ શ્રી પાર્શ્વનાથ ભગવાન મુક્તિ લક્ષ્મીને આપો. | ૨૫ /
१६४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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परिपूते महावीरजन्मकल्याणकेन हि । तीर्थे क्षत्रियकुण्डाख्ये स्तुत्वा वीरजिनेश्वरम् ।। १ ।। लछवाडाभिधे तीर्थे ह्यष्टम्यां श्वेतमाधवे । भक्त्या सायं सकारेण श्रीपार्श्वस्य स्तुति: कृता ।। २ ।। युग्मम् ।।
इति श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुतिः ।। २५ ।।
★★★
[स:] श्रीपार्श्वनाथजिनस्तुतिः
१६५
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[ हः ] श्रीमहावीरस्वामिस्तुतिः
हहह हहहं हं ह
हं हह हहह ह ! ह !। ह ह हह हह ह ह
वीरमुपारस्व सर्वदा ।। २६ ।।
१६६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
य: पार्श्व: (सर्वज्ञः) स स्यादेव महावीर इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्य श्रीमहावीरस्वामिन: स्तुतिरुद्गीर्यते ।
हहहमिति ।
ह ह ! - ह सम्बोधने → ह सम्बुद्धौ - [४२] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्रणीत:, हः = शूरः → हः कामशूर- 6 [१५] इति नत्वादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, तस्य सम्बोधने ह ह ! = हे शूर ! त्वम् सर्वदा = सदैव वीरम् = श्रीमहावीरस्वामिनम् उपास्व = वरिवस्य उपासनां कुर्वित्याशय: → उपास्तौ वरिवस्यति शुषूषते ? परिचरत्युपास्ते + [५५- ब्राचेष्टावर्ग:] इत्याख्यातचन्द्रिका भट्टमल्लविरचिता, इति क्रियाकारकसम्बन्धः ।
अत्र ‘उपारस्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहारिपदम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'वीरम्', कदा ? 'सर्वदा', किं सम्बोधनम् ? ‘ह ! ह !', अपराणि श्रीवीरजिनस्य विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीमहावीरस्वामिनम् ? हहहम् - हः = गर्व: अभिमान इत्यर्थ: → हः शङ्करे हरौ हंसे रणरोमाञ्चवाजिषु गर्वे - [७३/७४] इति नानार्थरत्नमालेरुगपदण्डाधिनाथरचिता, हः = गज: → हो हर्षे वायुपुत्रे स्यात् सम्बुद्धौ पादपूरणे गजे - [१४४/१४५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, हः = सिंहः → हकार: पुंसि जनने हरिण्यां हरिसिंहयो: ६ [११५] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविहिता, ह एव ह इति हहस्तत्र ह इव य: स हहहः = गर्वगजकेसरी, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? हहहम् हः = नाक: स्वर्ग इत्यर्थः → हः शिवे सलिले हः] श्रीमहावीर स्वामिस्तुति: १६७
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अन्वयः - ह ह ! [हे शूर !] (त्वम्) इहहम् [गर्वगजकेसरिणम् हहहम्
[सुरालयसुखवद्राज्यादेस्त्यक्तारम् हम् [ईश्वरम् हहम् [अनगारम्] हहम् [तुरङ्गमगमनम्] हहहम् [दारुणकन्दर्पनिवारकम्] हम् [वीरम् हम् भासुरम्] हहम् [हास्यशून्यम् हहम् [संपूर्णसुखिनम्] हम् [पापहरणम्] वीरम् [श्रीमहावीरस्वामिनम्] सर्वदा [सदैव] उपास्स्व [वरिवस्य ह [पादपूर्ती ।
१६८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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शून्ये धारणे मङ्गलेऽपि च गगने नकुलीशे च रक्ते नाके च वर्ण्यते ← [३३ - १] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरनिर्मितः, हम् = सुखम् हं क्लीबमस्त्रसुखयोः ← [८१] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवविरचितः ह इव हम् यस्मिंस्तद् हहम् = राज्यादिसुखम् पुण्यप्रकर्षाद् गार्हस्थ्येऽपि जिनस्य परमबाह्यशर्मावाप्तिरत एवोक्तं सुरालयवत्सुखानुभूतिः प्राज्यं राज्यमेकचक्रिशासनमित्यादिकम्, तथापि विरक्तिभावात् तद् - हहं जहाति = त्यजति ‘ड’प्रत्ययश्च ओहांक् त्यागे ← [ ११३१] इति धातुपाठः श्रीहेमचन्द्राचार्यप्रणीतः, अथवा तथोत्तरपदस्थोऽयं घातके त्याजकेऽपि च← [ ६६६७ ] इति वाङ्मयार्णववचनाच्च, हहहः = सुरालयवत्सुखत्यक्ता सुरालयसुखवद्राज्यादेस्त्यक्तेत्याशय आत्मैकलक्षित्वात् संसारपराङ्मुखत्वाच्च तम् ।
पुनः कीदृशम् ? हम् हः = ईश्वरः → हकारः पुंसि जनने हरिण्यां हरिसिंहयोः ईश्वरे ← [११५] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवग्रथिता, त्रिलोक्यधिपतित्वात् तम् ।
पुनः कीदृशम् ? हहम् ह = निवासः हः शूलिनि करे नीरे क्रोधे गर्भप्रभाषणे निवासे ← [४५] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिगुम्फिता, हा = त्याग: → हा त्यागे ← [८१] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवभणितः, हस्य हा यस्य स हहः = अनगार: निष्परिग्रहित्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? हहम् ← हः = वाजी अश्व इत्यर्थः हः शङ्करे हरे हंसे रणरोमाञ्चवाजिषु ← [८०] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवप्रोक्तः, हः = गमनम् → हः कामशूरगमने ← [१५] इति नत्वादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्ररूपिता, ह इव हो यस्य स हहः = तुरङ्गमगमन : शुभविहायोगतित्वात्, तम् ।
P
पुनः कीदृशम् ? हहहम् हः = भयङ्करः हः शिवे करे वीरे भयङ्करे ← [४२-४३] इत्यनेकार्थतिलकः सचिवमहीपप्रणीतः, हः कामः हः कामशूरगमने ← [१५] इति पूर्वोक्तनत्वादि-एकाक्षरीनाममालावचनात्, हः = वारणम् निवारणमित्यर्थः → हः कोपे वारणे ← [ ३६ ] इत्येकाक्षरकोषः पुरुषोत्तमदेवरचितः, हश्चासौ हश्चेति हहः = भयङ्करकामः परमसाधकानामप्यस्मात् स्याद्विनिपातोऽतोऽस्य
[ : ] श्रीमहावीर स्वामिस्तुति:
१६९
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रुचिरा हे शूरवीर ! तुं अभिमान रूपी हाथी के लिए सिंह समान, स्वर्ग के सुख तुल्य राज्यादि सुख के त्यक्ता, ईश्वर, अनगार, अश्व सम शुभ गतिमान, भयंकर काम के निवारक, वीर, देदीप्यमान, हास्य रहित, पूर्ण सुखी, पाप के हर्ता श्री महावीर स्वामी की सर्वदा उपासना कर ॥२६।।
१७०
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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भीष्मत्वम्, तस्य हो यस्मात् स हहहः = दारुणकन्दर्पनिवारकः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? हम् ऊ हः = वीरः → होऽथ वीरे - [४१] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनग्रथित:, रागरहितत्वात्, रागरहितस्य वीरत्वात्, तदुक्तम् प्रथमाने → तम्हा वीरे ण रज्जति - [आचा.-९८] इति, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? हम् - हम् = भासुरम् → हं चौर्यं हरणं पूर्णं भासुरम् । [९७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, देवाधिदेवशक्रवद्द्युतिमानित्यर्थस्तथा च पारमर्षम् → सक्के व देवाहिवई जुईमं - त्ति [१-६-८] सूत्रकृताङ्गे, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? हहम् * हम् = हास्यम् → हं क्लीबमस्त्रसुख्खयो: क्वणिते मणिरोचिषि परब्रह्मामन्त्रणयोस्त्रिषु तून्मत्तहास्ययो: [८२] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्मित:, हः = शून्यम् → हः शिवे सलिले शून्ये - [३३-१] इति पूर्वोक्तमेदिनीकरवचनाद्, हेन ह इति हहः = हास्यशून्य: गतरागत्वात्, हास्यस्य रागस्वरूपत्वात्, तम् ।
अथ हास्यशून्यत्वे स्पष्टमेवार्हत: शोकार्तत्वम् दु:खस्य तद्धेतुत्वादिति चेत्.... न हास्यस्य मोहनीयभेदत्वाद् तदुक्तम् → हसनं हास:, हासमोहोदयजनितो विकार: 6 [२६९] इति स्थानाङ्गसूत्रवृत्तौ, जिनस्य च तच्छून्यत्वाद् निर्मोहस्य जिनस्य पूर्णसुखित्वाच्च, तदेवाह ।
पुन: कीदृशम् ? हहम् - हम् = पूर्णम् → हं चौर्यं हरणं पूर्णम् - [९७] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, हम् = सुखम् → हं क्लीबमस्त्रसुखयो: - [८२] इति पूर्वोक्तैकाक्षरकाण्डोक्तेः, हं हं यस्य स हहः = संपूर्णसुखी सिद्धवात् सिद्धसुखस्यानन्यत्वादमेयत्वाच्च तथा चार्षम् → सिद्धस्स सुहो रासी सव्वद्धापिंडिओ जड़ हविज्जा सोऽणंतवग्गभइओ सव्वागासे न माइज्जा त्ति [९७६] आवश्यकनियुक्तौ, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? हम् - हः = पापहरण: → (ह) अथ पुंसि शिवे शून्ये व्योम्नि स्वर्गेऽप्सु धारणे चन्द्रेऽपि पापहरणे + [६६६६] इति वाङ्मयार्णव: पण्डितरामावतारशर्मभणित:, सन्मार्गोपदेशकत्वात् तस्यैव तत्कारणत्वात्, तम् ।
ह:] श्रीमहावीर स्वामिस्तुति:
१७१
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રુચિરા. હે શૂરવીર ! તું અભિમાન રૂપી હાથીને વિશે સિંહ સમાન, સ્વર્ગનાં સુખ સમાન રાજ્યાદિ સુખનો ત્યાગ કરનારા, ઈશ્વર, અણગાર, અશ્વસમ શુભગતિમાન, ભયંકર એવા કામનાં નિવારક, વીર, દેદીપ્યમાન, હાસ્યરહિત, પૂર્ણસુખી, પાપને હરનારા શ્રી મહાવીર સ્વામીની સર્વદા ઉપાસના કર. || ૨૬ ||
१७२
जिनेन्द्रस्तोत्रम् ।
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ह पादपूरणे → तु हि च स्म ह वै पादपूरणे - [२००] इति शेषनामभालायाम् ।
प्रारब्धा श्रीमहावीरकैवल्यप्राप्तिवासरे। दशम्यां शुभ्रवैशाख्खे सोनुपुरे सुभावतः ।। १ ।। श्रीऋजुवालुकातीर्थे सुरम्ये सरितातटे । वीरं प्रसेव्य कैवल्यज्ञानावाप्तिस्थले मुदा ॥२॥ हकारेण स्तुतिश्चासौ क्रियमाणा शनैः शनैः । समाप्ता मासि वैशाख्ने श्यामायां प्रतिपत्तिथौ ।। ३ ।। त्रिभिर्विशेषकम् ।।
इति श्रीमहावीरजिनस्तुति: ।। २६ ।।
★★★
हः] श्रीमहावीर स्वामिस्तुतिः
१७३
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प्रशस्तिः (वसन्ततिलका)
स्तोत्रं न्विदं द्रुतमशेषजिनेश्वराणां
श्रीराजपुण्यविजयस्य गुरोर्विनेयः
राजेन्द्रसूरिसुगुरोः कृपयाऽर्हतां च ।
श्री राजसुन्दरमुनिः कृतवान् सुभक्त्या ||२७||
॥ इति श्रीजिनेन्द्रस्तोत्रम् ॥
१७४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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मञ्जुला
अथ जिनेन्द्रस्तोत्रप्रशस्तिर्निगद्यते । स्तोत्रं न्विदमिति ।
अशेषजिनेश्वराणाम् = अखिलार्हताम् इदं स्तोत्रम् अमुं स्तवं जिनेन्द्रनामकम् अर्हतां राजेन्द्रसूरिसुगुरोश्च कृपया = तीर्थकराणां तथा स्वप्रगुरोः सद्गुरोः कलिकुण्डाद्यनेकतीर्थोद्धारकपूज्याचार्यविजयराजेन्द्रसूरिवरस्य च करुणया गुरोः श्रीराजपुण्यविजयस्य विनेयः श्रीराजसुन्दरमुनिः सुभक्त्या = अतीवभक्तिपूर्वकम् स्वहृदयपरमोल्लासादित्यर्थ: द्रुतम् = शीघ्रम् कृतवान् = रचितवान् ।
जिनेन्द्रसंस्तवनान्नूनं स्यात्तत्कृपोपलब्धिस्तथा च गुर्विच्छापूरणाच्चावश्यं स्याद् गुरुकृपाप्राप्तिरत एवाह 'देवगुरुकृपये 'ति । विना तयास्य समाप्तेरसम्भवात् ।
=
सौम्यवदनाख्यकाव्यानन्तरं जिनराजस्तोत्रानन्तरं निरमायि जिनेन्द्रस्तवनास्वरूपं ‘जिनेन्द्रस्तोत्रम्’ अतीवभक्तिफलमत आह 'सुभक्त्येति' अन्यथास्य जननविरहाद् । न चैवमथास्मादेवास्तु परितोषः प्रार्थये परमेश्वरं यदन्यान्यमर्हत्संस्तवनमप्यस्तु भविष्यतीति ।
प्रशस्ति:
श्रीप्रथमेशादारभ्यावीरजिनेश्वरं - सर्वसार्वसंस्तवनादाह- 'अशेष' इति ! उपहस्तिनापुरतीर्थान्मवानाग्रामादारभ्य सम्मेतशिखरशैलालङ्कृते मधुवनग्रामे न्यूननवतिदिनेष्वेव समाप्तमत आह 'द्रुतम्' इति ।
सर्वेषामर्हतां संस्तवनात्सर्वार्हतां कृपावाप्तिरतः 'अर्हताम्' इत्यत्र बहुत्व
मुक्तम् ।
१७५
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अन्वयः
अर्हतां राजेन्द्रसूरिसुगुरोश्च कृपया गुरोः श्रीराजपुण्यविजयस्य विनेयः श्रीराजसुन्दरमुनिः सुभक्त्या अशेषजिनेश्वराणामिदं स्तोत्रम् द्रुतं कृतवान्
नु ।
१७६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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अर्हद्भक्तिप्रेरकस्य सर्वदा श्रेष्ठत्वमत: श्रीराजेन्द्रसूरिगुरोः ‘श्रेष्ठत्वम्' समुदितम् ।
श्रीसत्यपुरपद्यात्रासङ्घमालामहोत्सवे । सम्मेतशिखरे नूने भोमियाभवने मया ।।१।। श्रीसौम्यवदनाख्यस्य काव्यस्यानुविमोचनम् । वैशाख्ने मासि कृष्णायां तृतीयायां प्रमोददा ।।२।। श्रीजिनेन्द्राख्यस्तोत्रस्येयं प्रशस्ति: प्ररूपिता । गुरूणां कृपयारम्भोऽन्तोऽपि स्यात् तत्कृपाबलाद् ।।३।।त्रिभिर्विशेषकम्।।
इति प्रशस्ति: ॥२७॥
प्रशस्ति:
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रुचिरा
श्री अरिहंत परमात्मा की एवं सद्गुरुदेव श्री राजेन्द्र सूरीश्वरजी महाराजा की कृपा से गुरुदेव श्री राजपुण्य वि. जी म. के शिष्य मुनि राजसुन्दर विजय ने परम भक्ति से सर्व जिनेन्द्र परमात्मा का यह स्तोत्र शीघ्रतया किया || २७॥
१७८
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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अथ वृत्तिप्रशस्ति:।
(वसन्ततिलका) श्रीशान्तिचन्द्रगुरुपीतकृपाकबन्धा: श्रीसोमचन्द्रगुरुपट्टवियत्पतङ्गाः । सक्ताः सदैव कलिकुण्डजिनेशभक्तौ राजेन्द्रसूर्यभिधसद्गुरवो जयन्तु ।। १ ।।
(उपजाति:) शिष्यास्तदीया मुनिराजपुण्यास्तपस्विन: खल्वमनस्विनश्च । तातास्तथा सद्गुरवो मदीया: सेवाकृत: सन्तु सदा प्रसन्ना: ।। २ ।। पञ्चम्यां श्याममाघस्य दीक्षाप्राप्तिदिने स्तवः । मवानापुरि प्रारब्धो लब्धगुर्वाशिषा मया ।। ३ ।। सम्मेताद्रौ समाप्तोऽह्नि तृतीये श्याममाधवे ।
वैक्रमे व्रत-षड्-व्योम-वाहमिते हि हायने ।। ४ ।। युग्मम् ।। तद्वितीयदिने यात्रां ससङ्घ: कृतवानहम् । अर्हद्भ्य: स्तुतिसूनानि समर्पितानि भावत: ।। ५ ।। तीर्थकृत: सदा सर्वेऽधमप्रधानकारणा: । चित्रमेकाक्षरं काव्यं तत: प्राप्तं प्रधानताम् ।। ६॥ कृतं नन्वीदृशं काव्यं कथं हि वर्णमालया ? । बालोऽहं नाधिकं जाने ततो हि वर्णमालया ।। ७ ।। दृश्यते सुन्दरं यत्तत् सुन्दरस्य गुरोहि नः । दृश्यतेऽसुन्दरं यत्तत् सुन्दरस्य, गुरोर्नहि ।। ८ ।। यदत्रोक्तमसूत्रोक्तं मतिमन्दतया मया । सकरुणैर्भवद्भिस्तच्छुध्यतां शुद्धबुद्धयः ! ।। ९ ।।
प्रशस्ति:
१७९
Page #205
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રુચિરા
શ્રીઅરિહંત પરમાત્માની અને સદ્ગુરુદેવ શ્રી રાજેન્દ્રસૂરીશ્વરજી મહારાજાની કૃપાથી ગુરુદેવ શ્રીરાજપુણ્યવિ.જી મ.ના શિષ્ય મુનિ રાજસુંદરવિજયે પરમભક્તિથી સર્વ જિનેન્દ્રપરમાત્માનું આ સ્તોત્ર શીઘ્રતયા કર્યું. I॥૨૭॥
१८०
3
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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________________
(शार्दूलविक्रीडितम्) यावत्तापकरः सहस्रकिरणो यावच्शशी शीतलो यावन्मेरुगिरिर्मरुद्भिरचलो यावद् धनो वारिद: ।
यावद् रत्नमया ह्यसौ वसुमती यावद् गभीरोऽर्णवस्तावद् वृत्तिरियं तथा विजयतां स्तोत्रं जिनेन्द्राभिधम् ।। १० ।। ग्रन्थाग्रम् - १४००.१०.
इति वृत्तिप्रशस्तिस्तत्समाप्तौ समाप्तेयं स्वोपज्ञा मञ्जुलाभिधाना वृत्तिः ।
प्रशस्तिः
१८१
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जिनेन्द्रस्तोत्रम्
ह सषं शवलं रं य
मभं बं फप नं धद । थतं ण ढं डठं टं अं
झजं छचं डघं गख ।। १ ।। कलिकुण्डेश ! नुत्वा व्वां
श्रीराजेन्द्रं गुरुं तथा ।। स्तोत्रं कुर्वे जिनेन्द्राणा
मात्मकर्मविमुक्तये ।। २ ।। ककक: कककः कः क
क: कक: ककक: कक: |
कक-कक: कक: क: क:
श्रीआदीशः श्रियेऽस्तु नः || ३ || खखखं खं खखं खं ख
खं खखखं खखं खख ! । खखखं खखखं खं खं
स्तुष्व त्वमजितं जिनम् ।। ४ ।। गगं गगं गगं गं गं
गगगं गगगं गगः । गगं गगं गगं गं गं भजेऽहं शम्भवं जिनम् ।। ५ ।। १८२
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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घघघं घघघं घं घ
घं घघं घघघं घघ ! | घघघघं घघं घं घं
त्वं वन्दस्वाभिनन्दनम् ।। ६ ।। चचचं चचचं चं च
___ चचचचं चचं च ! च ! । चचं चचं चचं चं चं
सुमतिं सुमतिं स्तुहि ।। ७ ।। जजजजं जज जं ज
जजज ज ! जज जज ! | जज जज जजं जं जं
पाप्रभं प्रभु भज ।। ८ ।। तततं तततं तं त
तततं तततं तत ! | ततं ततं ततं तं तं
सुपार्श्व ! त्वामुपास्महे ।। ९ ।। थथं थथथथं थं थ
थं थथं थथथं थथः । થર્થ થથે થર્થ શું થે
चन्द्रप्रभ नमाम्यहम् ।। १० ।। ददं ददददं दं द
दं ददं दददं द ! द ! | ददददं ददं द द !
रोवस्व सुविधि सदा ।। ११ ।।
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
१८३
Page #209
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________________
धधधधं धधं धं ध
धं धधं धधधं ध ! ध !। धधधधं धधं धं ध!
शेवस्व शीतलं जिनम् ।। १२ ।। ननं ननं ननं नं न
ननननं ननं न नः !। न ! ननं नननं नं न
श्रेयांसं श्रेयसे श्रय ।। १३ ।। पपपः पपपः पः पः
पपपपः पपः प ! पः । पपः पपः पपः पः पं
त्वं वासुपूज्य ! दर्शय ।। १४ ।। फफफं फफफं फं फ
फं फफं फफफं फफ ! | फ ! फफं फफफं फं फं
विमलं विमलं नुहि ।। १५ ।। बबं बबबबं बं ब
बबं बब बब बब ! । बबं बबबबं बं ब
मर्चानन्तजिनेश्वरम् ।। १६ ।। ਸਸ ਸਮੇਂ -
ਸਮੇਂ ਸਮੇਂ ਸਮ !! भभभ भभभं भं भं धर्मं त्वं हृदये धर || १७ ।। १८४
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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जिनेन्द्रस्तोत्रम्
ममममममं मं म
ममममममं मम ।
ममममममं मं मं
शान्तीशं पूजयाम्यहम् ॥ १८ ॥
ययय यययं यं य
यं ययं य ! ययं यय ! |
ययं यं यययं यं यं
कुन्थुनाथं समर्चय ॥ १९ ॥
ररररररं रंर
रं ररं रररं रर ! |
ररं ररं ररं रं र
मरमीडिष्व सर्वदा ॥ २० ॥
ललल लललं लं ल
लं ललं ललल लल ! |
ललं ललं ललं लं ल !
मल्लिनाथं जुषस्व रे ! ॥ २१ ॥
ववं ववं ववं वं वं
ववव ववव ववः |
ववव वववं वं वं
वन्देऽहं मुनिसुव्रतम् ॥ २२ ॥
शशः शशः शशं श: श
शः शश: शशश: शश: ।
शश: शश: शशः शः श:
श्रीनमिर्जयतात् सदा || २३ ||
१८५
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षषं षषं षषं षं ष -
षं ष षषषं षष ! |
षषष षषषं षं ष !
नेमीनं नम वा मन ॥ २४ ॥
ससः सराः ससः सः स
सः ससः सससः ससः ।
ससस सससः सः सः
पार्श्वो दद्याच्शिवश्रियम् ॥ २५ ॥
TEE हहहं हं ह
हं हं हं ह ! ह ! |
हं हं हं हं हं ह
वीरमुपास्स्व सर्वदा ॥ २६ ॥
स्तोत्रं न्विदं द्रुतमशेषजिनेश्वराणां
राजेन्द्रसूरिसुगुरोः कृपयाऽर्हतां च ।
श्रीराजपुण्यविजयस्य गुरोर्विनेयः
श्रीराजसुन्दरमुनिः कृतवान् सुभक्त्या ॥२७॥
॥ इति श्रीजिनेन्द्रस्तोत्रम् ||
१८६
जिनेन्द्रस्तोत्रम्
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॥ ॐ ह्रीं श्रीं अहँ कलिकुण्डदण्डाय नमः ।। ॥ श्रीजित-हीर-बुद्धि-तिलक-शान्ति-सोम-राजेन्द्रसूरीश्वरेभ्यो नमः ।।
मनोरमाभिधस्वोपज्ञवृत्तिसमेतम्
अर्हत्स्तोत्रम्
कर्ता कलिकुण्डतीर्थोद्धारकपूज्याचार्यविजयश्रीराजेन्द्रसूरीश्वराणाम् शिष्यरत्नानां तपस्विमुनीनां श्रीराजपुण्यविजयानां शिष्य:
मुनिराजसुन्दरविजय:
अर्हत्स्तोत्रम्
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Dark and Light
वि.सं. २०६५ के शिखरजी चातुर्मास में पर्युषण पर्व अनन्तर पारणा के दिन मध्याह्न पश्चात् विशेष जिज्ञासा सह पू. गुरुदेवश्री के पास गया। गुरुदेव को कुछ विशेष प्रश्न पूछे । गुरुदेव ने युक्तियुक्त समाधान प्रदान करके मेरी समस्याओं का निराकरण किया । पूर्ण संतोष के साथ जब मैं खडा हो रहा था तब गुरुदेव ने मेरे हाथ में रही नोट प्रति अंगुलि करके कहा “ इस नोट में क्यां लिखा है ? ” ।
“जिनराजस्तोत्रम् एवं जिनेन्द्रस्तोत्रम् का रफ आलेखन इस नोट में किया था ” कहकर गुरुदेव को नोट दी ।
कुछ
नोट के प्रथम पेज पर वर्णमाला लिखी हुई थी । लेकिन वर्णमाला के व्यंजनों Dark थे तथा कुछ व्यंजनों Light थे । सहज गुरुदेव ने पूछा “ऐसा क्यों ?" ।
"गुरुदेव ! जिनराजस्तोत्रम् की रचना से पूर्व किस वर्णों से स्तोत्र का निर्माण करना वह निश्चित नहीं था । तब वर्णमाला के सभी व्यंजनों का आलेखन किया था । तत्पश्चात् जिस वर्णों से स्तुति रचना होती गई उस वर्णों की पुनरुक्ति न हो अतः पुनः लिखकर उस वर्णों को Dark किया । तथैव जिनेन्द्रस्तोत्रम् की रचना के बाद भी वही वर्णों और Dark हो गए । तथा ङ, छ, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण से स्तुति रचना नहीं हुई इस लिए वह Light रह गये ।
गुरुदेव ने परम स्नेह से कहा “सुन्दर ! यह मत समझना कि इस वर्णों तु Dark करता है किन्तु यह क ख ग आदि वर्णों से परमात्मा की स्तुति का निर्माण हुआ है - यह वर्णों परमात्मा के चरणों में समर्पित हुए है अतः यह वर्णों Dark है - यह वर्णों में तेज है । तथा जिस वर्णों से परमात्मा की स्तुति का निर्माण नहीं हुआ उस वर्णों में तेज नहीं है।
गुरुदेव की अभिनव कल्पना से मैं आफरीन हो गया ।
कुछ रुक कर पुनः गुरुदेव ने कहा “अब ऐसा भी क्यों न हो कि जिस
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वर्णों से स्तुति रचना नहीं हुई उस वर्गों से भी अरिहंत परमात्मा की स्तुति रचना हो जाए - किसी को तेजहीन रख कर क्या लाभ ? उस वर्गों को भी परमात्मा के चरणों में समर्पित करके Dark कर दे ।
गुरुदेव की इच्छा-अनुज्ञा का अनुपालन किया । भाद्रपद धवला अष्टमी से ही नव्य स्तोत्र का प्रारंभ किया । गुरुदेव ने कहा था कि 'अरिहंत परमात्मा की स्तुतिरचना कर' अत: प्रत्येक स्तुति अरिहंत परमात्मा की बनाई । इसी कारण से स्तोत्र का नाम भी ‘अर्हत्स्तोत्रम्' रखा । मंगलाचरण की रचना भी विचित्र ढंग से की । मंगलाचरण की विचित्रता की स्पष्टता तत्रैव (पृ.नं.-६) पर है। धीरे-धीरे ङ, छ - आदि वर्गों से स्तुतिनिर्माण होता रहा । प्रभु के प्रभाव से सभी वर्गों Dark हो गए।
अंत में 'कु' एवं 'गो' से भी (एकस्वर तथा एकव्यंजनमय) स्तुति का निर्माण हुआ।
हस्व स्वर से अनन्तर 'छ' का द्वित्व आदि (च्छ) होने के कारण ‘छ' की स्तुति तथा सर्वत्र दीर्घ स्वर होने के कारण 'गो' की स्तुति 'विद्युन्माला' छन्द में है । अन्य स्तुति ‘अनुष्टुभ् छन्द में है ।
पूर्वोक्त कारण से प्रस्तावनादि का हिन्दी में आलेखन किया । रचना में क्षति हुई हो तो त्रिविध क्षमापना । बस...प्रभुभक्ति का ऐसा मौका बार-बार मिलता रहे ।
સુન રાખસુંદર વિ. श्रावणी पूर्णिमा, वि.सं.२०६६ २४-८-१० , गुरुवार
सत्यपुरतीर्थ
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अर्हत्स्तोत्रम्
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॥ नम: कलिकुण्डाय ॥
मनोरमा दीक्षाया अष्टमे वर्षे सद्भक्त्या संस्तवीम्यहम् । धरणेन्द्रसुरेणार्घ्यं कलिकुण्डजिनेश्वरम् ।। १ ।। क्रतुभुक्कलत्रवक्त्रकुमुदकौमुदीपतिम् । प्रणमामि शशिश्वेतं चन्द्रप्रभजिनेश्वरम् ।। २ ।। 'तपा'गच्छबृहद्व्योमप्रकाशनप्रभाकरम् । स्तवीमि गुरुराजेन्द्रसूरीशं विरतिप्रदम् ।। ३ ।। पूज्यानेकार्हतां पादपद्मपरागपावने । सम्मेतशिखरे तीर्थे गुरुप्रेरणया मया ।। ४ ।। मनोरमाभिधा वृत्ति: स्वोपज्ञाऽतिमनोरमा । भाद्रपदोज्ज्वलाष्टम्यामर्हत्स्तोत्रस्य तन्यते ।। ५ ।। युग्मम् ।।
मङ्गलाचरणम्
३
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॥श्रीअर्हत्स्तोत्रम् ॥
कडं झडं थपम्यं शं खचं जढं दफं रष । गं छ टणं धबं लं सं घज ठतं नभं वह || १ ||
कलिकुण्डप्रभो ! नत्वा त्वां राजेन्द्रगुरुं तथा । अवशिष्टाक्षरैरईत्स्तोत्रं प्रक्रियते मुदे ।। २ ॥
[युग्मम्
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथेह ग्रन्थादौ मङ्गलमाह। कडं झडमिति ।
हे कलिकुण्डप्रभो ! = हे श्रीकलिकुण्डतीर्थस्याधीश्वरपार्श्वप्रभो ! त्वां तथा राजेन्द्रगुरुम् = कलिकुण्डतीर्थोद्धारकाचार्यविजयश्रीराजेन्द्रसूरीश्वरम् नत्वा = अभिवन्द्य मदे = प्रत्यक्षत: स्ववार्तमानिकप्रमोदाय परोक्षतश्च महानन्दानन्दावाप्तये अवशिष्टाक्षरैः = श्रीजिनराजस्तोत्र-श्रीजिनेन्द्रस्तोत्रशेषवर्णै: अर्हत्स्तोत्रम् = श्रीअर्हत्परमात्मन: स्तोत्रम् प्रक्रियते = प्रारभ्यते इति क्रियाकारकसंयुतम् ।
अत्रानुस्वाररहितानि 'कलिकुण्डप्रभो !' इत्यस्य विशेषणानि, तथा सानुस्वाराण्यखिलान्यपि ‘त्वाम्' इत्यस्य विशेषणानि ।
कीदृश हे कलिकुण्डप्रभो !? रष ! • र: = गुरु: → र: स्यात् पुमान् शिवे वह्नौ वजे कामे रवौ गुरौ - [९७] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्रणीता, ष: = इष्ट: → ष: पुन: सारसे इष्टे - [१३५] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, राणां ष इति रष: = गुरुणामभीष्ट: जगद्गुरुत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ? छ! - छ: = स्वच्छ: → छ: सूर्ये सोमनैर्मल्ये छेदे स्वच्छे [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, मनोमालिन्यरहितत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ? वह ! 7 व: = श्रेष्ठ: → श्रेष्ठे विकारे व: प्रकीर्तित: 6 [३२] इत्यभिधानादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, हम् = सुखम् → हं क्लीबमस्त्रसुखयो: “ [८१] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृत:, वो हं यस्य स वह: = श्रेष्ठसुख: परमानन्दनीरधिनिमग्नत्वात्तदक्षयत्वाच्च, तस्य सम्बोधने ।
अथ श्रेष्ठसुखस्य दुःखशून्यत्वं स्पष्टमेव, तदाह ।
अथ कीदृशं त्वाम् ? कडम् - कम् = दुःखम् → कं सुखं तोयं पयो दुःखम् - [२०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, ङः = शून्य: → ङ: शून्ये * [३०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, केन ङइति कङ = दु:खशून्य: दु:खरहित इत्यर्थः, दुष्कर्मरहितत्वात्, तम् । मङ्गलाचरणम्
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अर्हत्स्तोत्रम्
( मंगलाचरण श्लोक की रचना पद्धति )
___
서
क. o ho
외
외
- प्रस्तुत स्तोत्र के मंगलाचरण में (प्रथम श्लोक में) पूर्वोक्त पद्धति अनुसार श्लोक की रचना की गई है।
- वस्तुत: यह ‘अनुष्टुभ्' छंद में केवल ३२ वर्णो ही प्रयुक्त होते है, और सर्व व्यंजन ३३ है । अत: सर्व व्यंजनों के समावेश को ध्यान में रखते हुए ‘म' को अर्ध करके 'य' में संमीलित किया है । एक भी व्यंजन को पुनरुक्त किये बिना सर्वव्यंजनों का समावेश किया है।
- प्रस्तुत श्लोक में मात्र 'अ' स्वर का प्रयोग किया है।
- यह स्तुति श्री कलिकुण्ड पार्श्वनाथ भगवान की एवं स्वतंत्रतया श्री सामान्य जिनेश्वर परमात्मा की भी है।
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★
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अर्हत्स्तोत्रम्
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अथ दुःखशून्यस्य वीतरागत्वमपि स्पष्टमेव, तदाह ।
पुनः कीदृशम् ? झडम् - झ: = नष्ट: → झो नष्टे 6 [8] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रसूरिप्रोक्ता, डः = राग: → ड: शब्द: पुंसि डिण्डीरे हस्ते चापि भगन्दरे पिशाचे पथिके काले रागे च परिकीर्त्यते - [६०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्ररूपिता, झो डो यस्य स झड: = नष्टराग: रागरहित इत्यर्थः, विरक्तिवार्धिविलग्नत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? थपम्यम् - थ: = श्रान्त: → थो मिथ्यावाचके श्रान्ते . [६४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, प: = पापी → प: पापी - [६९] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, म्य: = यम: → म्यो मयो यम: - [१६] इति ट्यक्षरकाण्ड: सौभरिनिर्मित:, पाश्च म्यश्चेति पाम्या:, था: पाम्या यस्मात् स थपम्य: = श्रान्तपापियम: सद्धर्मप्ररूपकत्वाज्जन्ममृत्युविरहाद्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? शम् - श: = शोभन: → श ? (श:) सूर्ये शोभने [१०८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, सर्वसौन्दर्यस्वामित्वाद्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? खचम् - खम् = व्योम » खं स्व: संविदि व्योमनीन्द्रिये - [१-५] इत्यनेकार्थसङ्ग्रहः श्रीहेमचन्द्राचार्यग्रथित:, च: = विमल: → चं क्लीबे विमले त्रिषु - [२९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवगुम्फितः, खवच्च इति खच: = व्योमविमल: कर्मकालुष्याकलितत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? अढम् + ञः = मुनि: → जो मुनौ — [१९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्रोक्तः, ढम् = वरम् → ढं पयो वरम् । [५४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्ररूपिता, जेषु ढमिति अढम् = मुनिश्रेष्ठ: साधुसत्तम इत्यर्थः, अतिचारादिदोषाऽनाचारित्वात्, तद् ।।
पुन: कीदृशम् ? दफम् - दः = क्षीण: → दो दाने पूजने क्षीणे - [६७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, फम् = लोभ: → फं क्लीबे लाभे लोभे - [८५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, दो फं यस्य स दफः = क्षीणलोभ: वीतरागत्वान्निष्कषायत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? गम् + गम् = शुभम् + गकारं तु...शुभम् - [१८] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, कल्याणकरत्वात्, तद् ।।
पुन: कीदृशम् ? टणम् + ट:=पृथिवी → ट: पृथिव्याम् + [२०]
मङ्गलाचरणम्
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अन्वयः - रष ! [गुरूणामभीष्ट !] छ ! [स्वच्छ !] वह ! [श्रेष्ठसुख !]
कलिकुण्डप्रभो ! हे कलिकुण्डतीर्थेशपार्श्वप्रभो !] कडम् [दुःखशून्यम्] झडम् [रागरहितम्] थपम्यम् [श्रान्तपापियमम् शम् [सुन्दरम् खचम् [व्योमविमलम् अढम् [साधुसत्तमम्] दफम् [क्षीणलोभम् गम् [शुभम् टणम् [भूभूषणम्] धबम् [सुखसिन्धुम्] लम् [सर्वफलप्रदम्] सम् [ईश्वरम्] घजम् [अब्दशब्दम्] ठतम् [ज्ञानितारकम्] नभम् [सूर्यप्रभम्] त्वां तथा राजेन्द्रगुरुं नत्वा [त्वां तथा श्रीराजेन्द्रसूरीश्वरञ्च प्रणम्य] मुदे [स्वानन्दाय] अवशिष्टाक्षरैः [श्रीजिनराजस्तोत्र-श्रीजिनेन्द्रस्तोत्रशेषवर्णैः (कुकार-गोकाराभ्याञ्च)] अर्हत्स्तोत्रम् [श्रीअर्हत्परमात्मस्तोत्रम् प्रक्रियते [प्रारभ्यते ।
अर्हत्स्तोत्रम्
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इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिविहिता, ण: = भूषण: → ण: पुमान् बिन्दुदेवे स्याद् भूषणे - [१२] इत्येकाक्षरनाममाला मेदिनीकरकृता, टस्य ण इति टण: = भूभूषण: तदनुपमत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? धबम् - धम् = सुखम् → धं धनं धूननं दानं धारणं करणं सुखम् - [६६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, ब: = सागर: → ब: पुमान् वरुणे सिन्धौ - [२३] इत्येकाक्षरनाममाला मेदिनीकरगुम्फिता, धस्य ब इति धब: = सुखसिन्धुः पूर्वं सुखस्य प्रशस्यत्वं व्याख्यातमधुनानन्त्यमिति, तम् । ____ पुन: कीदृशम् ? लम् + लम् = सर्वफलप्रदम् → लकारं शक्रबीजं स्यात् पीतं सर्वफलप्रदम् - [४३] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातप्रोक्ता, सर्वद इत्याशय:, तद् ।
पुन: कीदृशम् ? सम् + सः = ईश्वर: → स ईश्वर: * [३५] इत्येकाक्षरकोश: पुरुषोत्तमदेवप्ररूपित:, परमैश्वर्योपभोक्तृत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? घजम् + घ: = मेघ: → मेघे निदाघे किङ्किण्यां घण्टायां घट्टने च घ: - [२७] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रणीत:, जः = शब्द: → जो जये विजये मेरौ शब्दे - [३१] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवरचितः, घवज्जा यस्य स घज: = अब्दशब्द: मेघवद् गाम्भीर्यपूर्णशब्दवानित्याशयः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? ठतम् + ठ: = ज्ञानी → ठ: सूनुर्ज्ञानी - [४८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, तम् = तरणम् → तश्चौरामृतपुच्छेषु क्रोडे म्लेच्छे च कुत्रचित् अपुमास्तरणे - [१४] इत्येकाक्षरनाममाला मेदिनीकारविहिता, ठानां तं यस्मात् स ठत: = ज्ञानितारक: परमज्ञानित्वात् सन्मार्गप्ररूपकत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? नभम् + नः = तरणि: → तरणौ न: प्रकीर्तित: * [१९] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणककृत:, भा = दीप्ति: → भा दीप्तिरपि * [२४] इत्येकाक्षरकोषो मनोहरग्रथितः, न इव भा यस्य स नभ: = सूर्यप्रभ: अतीवदेदीप्यमानत्वादज्ञानतमोनिवारकत्वाच्च, तम् ।
अथेयं स्तुतिन केवलं श्रीकलिकुण्डपार्श्वस्यैवापि तु श्रीजिनवरसामान्यस्यापि तथा हि।
मङ्गलाचरणम्
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कमनीया गुरुजनों को इष्ट, स्वच्छ, श्रेष्ठ सुखवाले हे कलिकुण्ड पार्श्वनाथ भगवान ! दुःखशून्य, रागरहित, पापी जीवों एवं यमराज को श्रान्त करनेवाले, सुन्दर, आकाश सम निर्मल, साधुओं में श्रेष्ठ, लोभ का क्षय करनेवाले, शुभ, पृथ्वी में भूषण स्वरूप, सुख का सागर, सर्वफल के प्रदाता, ईश्वर, मेघ सम गंभीर शब्दोंवाले, ज्ञानीओं के तारक, सूर्य सम प्रभावी, आपको एवं कलिकुंड तीर्थोद्धारक पू. गुरुदेव श्री राजेन्द्रसूरीश्वरजी महाराजा को नमन करके आत्मिक आनंद के लिए शेष अक्षरों से 'अर्हत्स्तोत्र' का प्रारंभ होता है ।। १-२ ।।
કમનીયા. ગુરુ જનોને ઈષ્ટ, સ્વચ્છ, શ્રેષ્ઠ સુખવાળા હે કલિકુંડ પાર્શ્વનાથ ભગવાન ! દુ:ખશૂન્ય, રાગરહિત, પાપીઓને અને યમને થકવનારા, સુંદર, આકાશ સમ નિર્મળ, સાધુઓમાં શ્રેષ્ઠ, લોભનો ક્ષય કરનારા, શુભ, પૃથ્વીનાં આભૂષણ સ્વરૂપ, સુખનાં સમુદ્ર, સર્વ ફળને આપનારા, ઈશ્વર, મેઘ સમ ગંભીર શબ્દોવાળા, જ્ઞાનીઓને તારનારા, સૂર્ય સમ પ્રભાવાળા એવા તમને અને કલિકુંડ તીર્થોદ્ધારક પૂ.ગુરુદેવ શ્રી રાજેન્દ્ર સૂરીશ્વરજી મહારાજાને નમન કરીને આત્મિક આનદ માટે શેષ અક્ષરો દ્વારા અહસ્તોત્રમ્'નો પ્રારંભ કરાય છે.
अर्हत्स्तोत्रम्
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हे छ ! - छ: = चौरः → छ: सूर्ये छेदके चौरे ← [ ५६ ] इत्येकाक्षरीनाममाला सौभरिगुम्फिता, तस्य सम्बोधने, त्वम् नभम् = जिनवरम् • नः = जिन: सर्वज्ञ इत्यर्थ: → नकारो जिनपूज्ययो: ← [१३] इत्येकाक्षरीनानार्थकाण्डः श्रीधरसेनाचार्यप्रोक्तः, भम् = श्रेष्ठम्भकारं भार्गवम्... श्रेष्ठम् ← [३९] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातप्ररूपिता, नेषु भमिति नभम् = जिनवर:, तद्, वह = प्राप्नुहि वहतीत्येतत् स्यन्दने प्रापणे ← [नानार्थवर्ग: ९४ ] इत्याख्यातचन्द्रिका भट्टमल्लप्रणीता । कीदृश हे छ ! ? रष ! रः = अग्निः रः सूर्येऽग्नौ ← [ १०१ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, षः = अतिरोष: षोऽतिरोषे ← [ १०९ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, रवत् षो यस्य स रषः = अग्निवदतिरोषः तस्य सम्बोधने |
-
फलितार्थः, हे छ ! ' रष' विशेषणविशिष्ट ! त्वं नभं 'कड - झडा'दिविशेषणैर्विशिष्टं वहेति स्वतन्त्रमपीदं श्रीजिनवरसामान्यस्तवनमवगन्तव्यम्, श्रीकलिकुण्डपाश्वप्रभोस्तु स्पष्टमेव ।
इति मङ्गलाचरणम् ।। १-२ ।।
मङ्गलाचरणम्
११
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[ ] अर्हत्स्तुतिः
डडं डीडो-डडा-ऽडाडं
डाडडुडो-ऽडडं डङ ! । डाडौडौ-डडडौङ ङ !
त्वमर्हन्तं समर्च हे ! ||३||
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ डकारेणार्हत्स्तुतिमाह । डडं डीडो-डङा-ऽडाङमिति ।
हे ङ ! - ङः = पूजक: → ङः पूजकद्विजकाक्षे - [८] इति नत्वादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, तस्य सम्बोधने, त्वम् अर्हन्तम् = श्रीजिनेश्वरम् समर्च = पूजय हे सम्बोधने → हे - अ. सम्बोधने - [पृ.५४३४] इति वाचस्पत्यम्, पूजकोऽद्य यावदन्यदेवं पूजितवानथास्मायेवार्चयेत्याशय: ।
कीदृश हे ङ ! ? डङ = ङः = निन्दा , ङ शून्ये दानवाञ्छायां निन्दायाम् + [३०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, ङः = व्यसनम् → (ङ)कार: पुंसि शब्दज्ञे पुं व्यसन-[४२] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवनिर्मिता, डस्य ङो यस्य स डङ = निन्दाव्यसन: अतीवापवादाचारकत्वाद् व्यसनित्वम्, तस्य सम्बोधने ।
__ अत्र ‘समर्च' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'अर्हन्तम्', किं सम्बोधनम् ? 'हे ङ !', 'टुङ !' सम्बोधनस्य विशेषणमन्यानि कर्मणो विशेषणानि ।
__ अथ कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? डडम् - ङः = व्यसनम् → (ङ)कारः पुंसि शब्दजे पुं व्यसन- [४२] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवसमुदिता, ङः = शून्य: → ङः शून्ये - [३२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकथिता, ङाद् ङ इति ढुङ: = व्यसनशून्य: निर्व्यसनीत्यर्थः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? डीडो-डङा-ऽडाङम् ।
डीङौः - डी: = पार्थिव: → डीभूप: [३१] इत्येकाक्षरनाममाला [] अर्हत्स्तुतिः
१३
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________________
अन्वयः - हे डङ ! हु ! [हे निन्दाव्यसन पूजक !] डढम् [व्यसनरहितम्] डीडो
डङा-ऽडाडम् [पार्थिवपञ्चानन-सिद्धिसुखा-ऽभयङ्कराशायिनम् डाङडुङो-ऽडङम् [जनपापसुकरसिंह-दुःखशून्यम्] डाडौडौ-डङडौडम् [सर्वंसहासवितृसोम-विषयस्पृहाभयकराग्निजलम् अर्हन्तम् [श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् त्वम् समर्च [त्वं प्रपूजय]।
१४
अर्हत्स्तोत्रम्
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सौभरिविहिता, डौः = सिंहः → ङोश्च सिंहोऽथ * [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, ‘डो'शब्दस्यायं प्रयोग: कारिकायां तु स्वरूपदर्शित्वं वेद्यम्, ङीषु डरिव य: स डीडौः = पार्थिवपञ्चानन: शौर्यशालित्वात् ।
डङ: + ङः = सिद्धिः → ङः शून्ये दानवाञ्छायां निन्दायामाधिसादरे सौदामिन्यां नदे सर्प सिद्धौ - [३०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, डम् = सुखम् → डं वितानं सुखम् - [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, डस्य हुं यस्य स डङ: = सिद्धिसुख: सिद्धिसुखनिमग्न इत्याशयः।
अडाङ: - ङः = भयङ्करः → (ङ)कार: ...... त्रिलिङ्गे च भयङ्करे * [४१/४२] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवभणिता, न ङ इत्यङ: अभयङ्कर इत्यर्थः परमसौम्यत्वात्, ङ = शायी शयनशील इत्यर्थः → (ङ)कार:...पुंसि व्यसनशायिषु + [४१/४२] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रोक्ता, न ङ इत्यङ: अशायीत्यर्थ: अप्रमत्तत्वात् शयनस्य प्रमादस्वरूपत्वात्, अडश्चासावडश्चेति अङाङः = अभयङ्कराशायी ।
ङीऔश्चासौ ङडश्चेति ङीङो-डङः, ङीङो-ङडश्चासावङाङश्चेति ङीडो-डङाङाङः = पार्थिवपञ्चानन-सिद्धिसुखा-ऽभयङ्कराशायी, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? डाङडुङो-ऽडडम् । ___ डाङडुडौ: ङा: = जना: → डं क्लीबमञ्जने ना तु भैरवे विषये जने * [२४] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथप्ररूपित:, डम् = सुखम् पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, न ङमित्यडं दु:खमित्यर्थः, डुः = सुकर: → डुः = सुकर: । [३१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, डौः = सिंहः पूर्वोक्तसौभर्युक्तेः, ङानामङमिति डाङम्, ङाङमेव कुरिति ङाङडुस्तत्र ङौरिव य: स डाङडुङौः = जनपापसुकरसिंहः यथा सिंहप्रभावात् सुकरादिक्षुद्रजन्तूनां पलायनं तथैव जिनेशप्रभावात् दुःखस्यापीत्याशयः ।
परदुःखदूरीकरणं प्रोक्तमथ स्वयमदु:ख: सदुःखो वेत्याशङ्कायामाह ।
अडङ: - अडम् = दुखम् पूर्वोक्तेः, ङ = शून्य: → ङः शून्ये - [३०] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, अङाद् ङ इति अङङ: = दुःखशून्य: दु:खरहित इत्यर्थ: निष्कर्मत्वात् । [ङ] अर्हत्स्तुतिः
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कमनीया
हे निन्दा व्यसनी पूजारी ! तुं व्यसन रहित, राजाओं में सिंह तुल्य, सिद्धि सुख में निमग्न, सौम्य, शयन नहीं करनेवाले, मानवों के पाप रूप सुवर के लिए सिंह समान, दुःख रहित, पृथ्वी में सूर्य एवं चन्द्र सम, विषयैषणा रूप भयंकर अग्नि को उपशांत करने में वारि तुल्य श्री अरिहंत परमात्मा की अर्चना कर ॥ ३ ॥
કમનીયા
હે નિન્દાના વ્યસની પૂજારી ! તું નિર્વ્યસની, રાજાઓમાં સિંહ સમાન, સિદ્ધિ સુખમાં નિમગ્ન, સૌમ્ય, શયનને નહીં કરનારા, માનવોનાં પાપ રૂપી સુવરને વિશે સિંહ સમાન, દુઃખ રહિત, પૃથ્વીમાં સૂર્ય અને ચંદ્ર સમાન, વિષયૈષણા રૂપી ભયંકર અગ્નિનું શમન કરવા માટે વારિ સમાન, श्रीमरिहंत परमात्मानी अर्चना ९२ ॥ 3 ॥
१६
अर्हत्स्तोत्रम्
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ङाङडुङौश्चासावङडश्चेति डाङडुङोऽङङ = जनपापसुकरसिंह-दु:खशून्यः, तम् । ___ पुनः कीदृशम् ? अौडौ-डडडडम् ।
ङाङौडौः + ङा = धरा → ङा धरा . [३०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, डौः = सूर्यश्चन्द्रो वा → डौः सूर्योऽरुणो वह्निः कलानिधि: * [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, ङौश्च ङौश्चेति डौङावौ ङायां ङौडावाविव य: स ङाडौङौः = सर्वंसहासवितृसोम: प्रकाश्यते पूष्णा पृथ्वी दिवैव न निशायां निशाकरेण च तस्यामेव नापरस्मिन् जिनेशिता तूभययोरतोऽर्हतो दिवाकरत्वेन निशाकरत्वेन चोपमा ।
टुडङौडम् + ङः = विषयस्पृहा → ङः पुमान् विषये ख्यातः स्पृहायां विषयस्य च . [५] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरविहितः, ङः = भीम: भयङ्कर इत्यर्थः → शब्दो विषये भीमे - [१७] इत्येकाक्षरकाण्ड: महीपसचिवकृत:, डौः = वह्निः → डौः सूर्योऽरुणो वह्निः + [३२] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनात्, डम् = पय: जलमित्यर्थः → डं वितानं सुखं ब्रह्म सर्पिस्तोयं विषं पय: - [३२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, डश्चासौ ङौश्चेति डडौः = भयङ्कराग्नि:, ङ एव उौरिति डङौस्तत्र ङमिव यः स उडङौङम् = विषयस्पृहाभयङ्कराग्निजलम् ।। ___डाडौङौश्चासौ डडडौङञ्चेति ङाङौडौ-डडडौङम् = सर्वंसहासवितृसोमविषयस्पृहाभयङ्कराग्निजलम्, तद् ।
इति डकारेणार्हत्स्तुतिः ।। ३ ।।
[] अर्हत्स्तुतिः
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[छः] अर्हत्स्तुतिः
छाछाछा-ऽऽछं छाछा-ऽऽछौछ
छूछं छूछं छोछं छे ! छ !। छूछाछं छा-ऽऽछीछं छोछूमर्हन्तं हे ! त्वं संस्तुष्व ||४||
[विद्युन्मालावृत्तम्]
१८
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ छकारेणार्हत्स्तुति: समुद्यते । छाछाछा-ऽऽछमिति ।
हे छे ! • छिः = कुलालक: कुलालविशेष: → छि: कुलालक: 6 [३६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, तस्य सम्बोधने, त्वमर्हन्तम् = त्वं श्रीतीर्थकृत्परमात्मानम् संस्तुष्य = संस्तवनविषयीकुरुष्व इति क्रियाकारकयोग: ।
कीदृश हे छे ! ? - छ ! छ: = स्वच्छ: → छ: सूर्ये सोमनैर्मल्ये छेदे स्वच्छे । [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, प्रभुभक्तस्य तथात्वात्, तस्य संबोधने ।
अत्र ‘संस्तुष्व' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'अर्हन्तम्', किं सम्बोधनम् ? 'छे!', 'छ!' तस्य विशेषणमन्यानि कर्मणो विशेषणानि ।
अथ कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? छाछाछा-ऽऽछम् ।
छाछाछ: ७ छा = रुट रोष इत्यर्थः → छा च रुट - [३६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, छा = गिरिः → छा...गिरौ - [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, छ: = भेदक: → छ इति ... भेदकेऽपि च . [३०/३१] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृत:, छैव छेति छाछा तस्य छ इति छाछाछ: = रोषगिरिभेदकः क्षमासिन्धुत्वान्निष्क्रोधत्वाच्च, भूधरवद् रोषस्य भेदने बह्वल्पा एव क्षमाऽतस्तेन सहोपमा।
___ आछ: - आ: = अनन्त: → अनन्तः... दीर्घ आकार एव च . [४] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातग्रथित:, छ: = श्रुतम् ज्ञानमित्यर्थः → छः पुंसि... श्रुते . [४६/४७] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवगुम्फिता, आ: छो यस्य स
[छ:] अर्हत्स्तुतिः
१९
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अन्वयः * हे छ ! छे ! त्वम् [हे स्वच्छ ! कुलाल ! त्वम्] छाछाछा-ऽऽछम्
[रोषगिरिभेदका-नन्तज्ञानम् छाछा-ऽऽछौछम् [निम्नगानिर्मलकामकारस्करच्छेदकम्] छूछम् [पृथ्वीपतगम्] छूछम् [सर्वंसहासोमम्] छोछम् [पूर्णदानम्] छूछाछम् [संसारसरितानावम् छा-ऽऽछीछम् [ज्ञानिगुरु-सूर्यशोभास्यम्] छोड्रम् [अलङ्कृतावनिम्] अर्हन्तम् [श्रीतीर्थकृत्परमात्मानम्] संस्तुष्व [संस्तवनविषयीकुरुष्व] ।
२०
अर्हत्स्तोत्रम्
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आछ: = अनन्तज्ञान: लोकालोकालोकित्वात ।
छाछाछश्चासावाछ इति छाछाछा-ऽऽछ: = रोषगिरिभेदका-ऽनन्तज्ञान:, तम् । पुन: कीदृशम् ? छाछा-ऽऽछौछम् ।
छाछ: - छा = सरिता → छाबन्तो निम्नगा — [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रोक्ता, छ: = निर्मल: → छो भान्वा... त्रिष्वयं निर्मले 6 [२६] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथप्ररूपित:, छावत् छ इति छाछ: = निम्नगावन्निर्मल: कर्मकालुष्याकलितत्वात् ।
आछौछ: + आ = मन्मथ: → आ...मन्मथे - [१०/११] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, छौः = तरु: → छौः समीरस्तरुः [३७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, छः = छेदक: → छ: सूर्ये छेदके - [१७] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिनिर्मिता, आ एव छोरिति आछौस्तस्य छ इति आछौछ: = कामकारस्करच्छेदक: निर्विषयित्वादनभिष्वगित्वाच्च ।
छाछश्चासावाछौछश्चेति छाछा-ऽऽछौछ: = निम्नगानिर्मल-कामकारस्करच्छेदक:, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? छूछम् - छू: = भूः पृथ्वीत्यर्थ: → छूर्भूः - [३७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, छ: = सूर्य: पतङ्ग इत्यर्थः → छ: सूर्ये [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, छ्वां छवद्य: स छूछ: = पृथ्वीपतग: अज्ञानतिमिरनिवारकत्वाद्, तम् । ____ अथाहतोऽर्कवत्तमोवारकत्वे सत्यमृतद्युतिवदाह्रादकत्वमपि, तत्तु नोक्तमथ पुनरवन्याममृतद्युतित्वमाह।
पुन: कीदृशम् ? छूछम् • छू: = पृथ्वी सर्वसहेत्यर्थः → छूभू: - [३७] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, छः = सोम: चन्द्र इत्यर्थ: → छ: सोम: * [३६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, छ्वां छवद्य: स छूछ: = सर्वंसहासोम: परमाह्लादकत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? छोछम् + छौ: = पूर्ण: ‘छो'शब्दस्यायं प्रयोग: → छोः पूर्ण: - [३७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, छ: = दानम् → छ: शब्द: पारदे दाने - [२२] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रोक्ता, छौश्छो यस्य स
[छ:] अर्हत्स्तुति:
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कमनीया
हे स्वच्छ कुंभार ! तुं रोष रूप गिरि के भेदनेवाले, अनन्तज्ञानी, सरिता सम निर्मल, काम रूप वृक्ष को छेदनेवाले, पृथ्वी में सूर्य एवं चन्द्र तुल्य, पूर्ण दान करनेवाले, संसार रूप सरिता में सर्व जीवों को तारने के लिए नौका समान, ज्ञानीओं के गुरु, सूर्य की शोभा सम देदीप्यमान मुखवाले, अवनि को अलंकृत करनेवाले श्री अरिहंत परमात्मा की स्तवना कर ॥ ४ ॥
२२
अर्हत्स्तोत्रम्
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छोछ: = पूर्णदान: स्वसमीपे यस्य विद्यमानता तदखिलस्य दान एव पूर्णदानत्वम्, अर्हन् स्वानन्तशर्मज्ञानादीन् रात्यत: पूर्णदानत्वमित्युक्तम्, तम् ।
अथवा अत्र श्लेष: कर्तव्य: 'छ-ऊछः' इति
छ: = चारी पादचारीत्यर्थ: → चारी छकार: + [२५] इत्येकाक्षरीमातृकाकोषोऽज्ञातप्ररूपित:, अयानविहारित्वात् ।
ऊछ: + ऊः = चन्द्रः → ऊ: स्याच्छुचेन्द्रो: “ [१०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रणीत:, छम् = मुखम् → छमचिर्भूतलं स्व: स्यात् कूटं कूलं मुखम् । [३८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, ऊरिवच्छं यस्य स ऊछ: = विधुवदन: परमसौम्यत्वात् ।
छश्चासावूछश्चेति छोछः = चारि-विधुवदनः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? छूछाछम् - छू: = पृथ्वी तात्पर्यात् संसार इत्यर्थ: → छूर्भूः - [३७] इति पूर्वोक्तसौभर्युक्तेः, छा = सरिता → छाबन्तो निम्नगा . [३३] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भूक्तेः, छ: = तरणी नौरित्यर्थ: → तरले (तरणी) छ: [१२] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकनिर्मित:, छूरेवच्छेति छूछा तत्र छ इव य: स छूछाछ: = संसारसरितातरणी सर्वजीवतारकत्वात्, तम् । ___पुन: कीदृशम् ? छा-ऽऽछीछम् ।
छा: - छ: = ज्ञाता ज्ञानीत्यर्थ: → छ: सूर्ये सोमनैर्मल्ये छेदे स्वच्छे च ज्ञातरि - [३३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, आ: = गुरु: → गुरुस्तथा...आकार: - [४] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातकृत:, छानामा इति छा: = ज्ञानिगुरुः परमविद्वद्गणभृद्गुरुत्वात् ।
आछीछम् + आ = अर्क: → आ ब्रह्माब्ध्यर्कचापेषु [३] इति नत्वादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातग्रथिता, छी: = छवि: शोभेत्यर्थ: → छीश्छवि: - [३७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, छम् = मुखम् → छमचिर्भूतलं स्व: स्यात् कूट कूलं मुखम् - [३८] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, आयाश्छीरिति आछीस्तद्वच्छं यस्य स आछीछ: = सूर्यशोभास्य: देदीप्यमानत्वात्, पूर्वं निशाकरोपमया परमसौम्यत्वमुक्तमथ भास्करोपमया देदीप्यमानत्वम् ।
___ छाश्चासावाछीछश्चेति छा-ऽऽछीछः = ज्ञानिगुरु-सूर्यशोभास्यः, तम् । [छ:] अर्हत्स्तुतिः
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કમનીયા
હે સ્વચ્છ કુંભાર ! તું રોષરૂપી પર્વતને ભેદનારા, અનન્ત જ્ઞાની, સરિતા સમ નિર્મલ, કામરૂપી વૃક્ષને છેદનારા, પૃથ્વીમાં સૂર્ય અને ચંદ્ર સમાન, પૂર્ણ દાન કરવાવાળા, સંસારરૂપી સરિતામાં સર્વ જીવોને તારવા માટે નૌકા તુલ્ય, જ્ઞાનીઓનાં ગુરુ, સૂર્યની શોભા સમાન દેદીપ્યમાન મુખવાળા, અવનિને અલંકૃત કરનાર શ્રી અરિહંત પરમાત્માની સ્તવના
કર || ૪ ||
२४
अर्हत्स्तोत्रम्
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___ पुन: कीदृशम् ? छोछूम् - छौः = अलङ्कृत: 'छो'शब्दस्यासौ प्रयोग: → छोः पूर्णोऽलङ्कृत: - [३७] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, छू: = पृथ्वी → छू : - [३७] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, छौः = अलकृता छू: = अवनि: येन स छोछू: = अलङ्कृतावनि: अनन्यत्वाद् भूषणायमानत्वाच्च, तम् ।
हूस्वानन्तरच्छकारस्य द्विर्भावात् पूर्वस्मिन् चकारदर्शनेनान्यवर्णदर्शनादत्र सर्वत्र दीर्घत्वमेवोररीकृतम्, तेनच्छन्दश्चात्र ‘विद्युन्माला' लक्षणं च तस्य → मो मो गो गो विद्युन्माला - [पृ.- २५] इतिच्छन्दोमञ्जरी । द्वितीयतूर्यचरणान्त्ययोईस्वत्वेऽपि गुरुत्वपरिगणनान्न दोषः ।
इतिच्छकारेणार्हत्स्तुतिः ॥ ४ ॥
[छ:] अर्हत्स्तुतिः
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[ झः ] अर्हत्स्तुतिः
झझो झौझूझझा-ऽझूझो -ऽ
झझो झझझझो झझैः ।
झझोऽझो झाझझोऽझेझो
जयतादर्हदीश्वरः ||५||
२६
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ झकारेणार्हत्स्तुतिरभिधीयते ।
झझझझझझेति ।
अर्हदीश्वरः = श्रीवीतरागपरमात्मा जयतात् = विजयताम् → जिं अभिभवे ← [८] इति है मधातुपाठः ।
अत्र 'जयतात्' इति क्रियापदम् कः कर्ता ? 'अर्हदीश्वर:', अन्यानि कर्तुर्विशेषणानि ।
कीदृश: श्रीअर्हन् ? झझः झः = नष्टः झो नष्टे ← [२०] इत्येकाक्षरकाण्डः महीपसचिवप्रणीतः, झः = दर्प निगदित: ? (तो) झकार: पद्मासने च दर्पे ← [२४] इत्यजिरादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातरचिता, झोझो यस्मात् स झझ: = गतगर्व: मृतमद इत्यर्थ: निष्कषायत्वाद्, अथवा झम् = भुवनम् → भुवने झम् ← [ ३९ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, झः = रविः झो वावपि निर्दिष्टः ← [१०] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकविहितः, झे झ इव यः स झझः = भुवनभास्करः मिथ्यामततमोऽस्तकृत्त्वात् ।
मिथ्यामतनिवारकप्रभुपङ्कजेऽलीभूयायान्त्यमरावत्यादितेयास्तदाह ।
P
पुनः कीदृश: ? झौझूझझा-झूझः । झौझूझझम् झौ: = नाक: स्वर्ग इत्यर्थः झौः स्मृतो नाक: ← [४२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, झूः = अमर: बहुत्वेऽमराः → झूश्च ध्रुवः सङ्घोऽमरः ← [४१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, झः = भ्रमरः → झशब्दस्तु पुमान् धातरि हंसके प्रतापे भ्रमरे ← [ २८/२९] इत्येकाक्षर[झ: ] अर्हत्स्तुतिः
२७
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अन्वयः_• झझः [गतगर्व: ] झौझूझझा-झूझ: [ स्वर्गामरभ्रमरारविन्द-शोकभयरहित:] अझझः [कामकेलिकाङ्क्षारहित: ] झझझझ: [ एकान्तवादविचारचोरचारः] झझै:[त्रिभुवनगुरु: ] झझ: [ प्रभाकरप्रतापः] अझः [विविवरः] झाझझ: [वारिररव: ] अझेझ: [ मुक्तिदाता ] अर्हदीश्वरः [श्रीअर्हत्परमात्मा] जयतात् [विजयताम्] |
२८
अर्हत्स्तोत्रम्
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काण्ड इरुगपदण्डाधिनाथग्रथितः, झम् = पद्मम् → झो व्यूहे...क्लीबे तु भयपद्मयो: “ [६२] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासगुम्फिता, झावो इव इति झौझ्वस्ते एव झा इति झौझूझास्तत्र झवद् य: स झोझूझझम् = स्वर्गामरभ्रमरारविन्दम् इन्दिन्दिरैर्यथारविन्दमालोक्य तत्रासज्यन्ते तथैव सुरवरैरप्यर्हच्चरणाम्बुजे इत्याशयः ।
___ अझूझ: • झूः = शोक: → शोके मूढासमोचने च झुः, ऊदन्त: [४०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुभणिता, झम् = भयम् → झो व्यूहे... क्लीबे तु भयपद्मयो: * [६२] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, झूश्च झञ्चेति झूझे, न विद्येते झूझे यस्य स अझूझ: = शोकभयरहित: महानन्दानन्दोदधिनिमग्न
त्वात् ।
झोझूझझञ्चासावझूझश्चेति झोझूझझाऽझूझ: = स्वर्गामरभ्रमरारविन्दशोकभयरहितः ।
पुन: कीदृश: ? अझझ: • झम् = मैथुनम् → झं मैथुनमिति स्मृतम् 6 [४२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, झ: = वाञ्छा → झो व्यूहे विषये गर्वे लेपे मूर्ध्नि खरध्वनौ महेश्वरे च वाञ्छायाम् [६२] इत्येकाक्षरी - नाममाला कालिदासव्यासप्ररूपिता, नास्ति झस्य झो यस्य स अझझ: = कामकेलिकाङ्क्षारहित: अनभिष्वगित्वाद्, अथवा झम् = धनम् → वने (धने) च भुवने झम् + [३९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, झ:= वाञ्छा पूर्वोक्तेः, नास्ति झस्य झो यस्य स अझझः = वित्तवाञ्छारहित: निराशंसत्वात् ।
__ पुन: कीदृश: ? झझझझ: - झम् = एकान्तम् एकान्तवाद इत्याशयः → एकान्ते सगते च झम् - [३९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, झ: = विचार: → झ: पुंलिङ्गे जवे व्योम्नि विचारे च प्रकीर्त्यते [५०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवनिर्मिता, झ: = चोर: → झ: पुमान् भ्रमणे नष्टे प्रतापे हंसचोरयो: 6 [३४] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवविहितः, झ: = चार: गुप्तचर इत्यर्थः → चारुवाक्-चारयोर्झ: [१९] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिकृता, झस्य झ इति झझः, स एव झ इति इाझझस्तत्र [झः] अर्हत्स्तुति:
२९
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कमनीया अभिमान रहित, स्वर्ग के देवों रूप भ्रमरों के लिए पद्म तुल्य, शोक-भय एवं मैथुन की इच्छा से रहित, एकान्त विचार रूप चोर को पकडने के लिए गुप्तचर समान, त्रिभुवन गुरु, सूर्य सम प्रतापी, निदूर्षण, मेघ सम गंभीर ध्वनिवाले, मोक्ष के प्रदाता श्री अरिहंत परमात्मा को जय की प्राप्ति हो ॥ ५ ॥
अर्हत्स्तोत्रम्
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P
टाकटीकरणे झ इव य: स झझझझः = एकान्तवादविचारचोरचारः मिथ्यामतापस्कर्तृत्वात्, स्पशो यथा स्तेनं प्रजापीडकं प्रकटीकुरुते तथैवार्हन्नेकान्तवादविचारमपीत्याशयः, अथवा झझझझः झम् = श्रेष्ठम् → झकारमर्धनारीशं शामं रक्तसमाकुलम् सर्वसौख्यकरं श्रेष्ठम् ← [२४] इत्येकाक्षरनाममालाऽज्ञातग्रथिता, झः = विचारः झः पुंलिड्गे जवे व्योम्नि विचारे च प्रकीर्त्यते ← [५० ] इति पूर्वोक्तामात्यमाधवोक्ते:, झम् = धनम् वने (धने) च भुवने झम् ← [३९] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, झ: = दाता झशब्दस्तु पुमान् दातरि ← [६१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदास - व्यासगुम्फिता, झञ्चादो झ इति झझ:, झझ एव झमिति झझझं तस्य झ इति झझझझः = श्रेष्ठविचारद्रविणदाता सत्यप्ररूपकत्वाद् न केवलं जिनेशितैकान्तवादापस्कर्ता किन्तु स्याद्वादपुरस्कर्तापीति भावः । अत एव विश्वत्रयाणां गुरुरिति विवदिषायामाह । पुनः कीदृश: ? झझै: : झम् = भुवनम् भुवने झम् ← [३५] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, झै: = गुरु: झैर्गुरु: ← [४१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिभणिता, झानां झेरिति झझैः = त्रिभुवनगुरु: त्रिलोकीतमोस्तकृत्त्वात् त्रयाणां भुवनानां परिग्रहार्थं बहुवचनं प्रयुक्तम् ।
यथा तरणिस्त्रैलोक्यतमोस्तकृत्तथैवार्हन्नप्यतः परमेश्वरस्य प्रतापः प्रभाकरबदेवेति व्याचिख्यासुराह ।
पुनः कीदृश: ? झझ: झः = पूषा झो रवावपि निर्दिष्ट: ← [१०] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकप्रोक्तः, झः = प्रताप: → झशब्दस्तु पुमान् दातरि हंसके प्रतापे ← [६१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्ररूपिता, झव झो यस्य स झझः = प्रद्योतनप्रतापः सर्वत्र प्रकाशकरत्वात्,
अथवा झम्
श्रेष्ठम् → झकारमर्धनारीशं शामं रक्तसमाकुलम् सर्वसौख्यकरं श्रेष्ठम् ← [२४] इति पूर्वोक्तैकाक्षरनाममालावचनाद्, झ: = सङ्गः → झो नष्टानिलसङ्गेषु ← [९] इति नत्वादि- एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, झं झो यस्य स झझः = श्रेष्ठसङ्गः विरक्तिजनकत्वात् ।
पुनः कीदृश: ? अझ: झः = विवरम् झः विनष्टे विवरे ← [३८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, न विद्यते झो यस्मिन् स अझः = [झ: ] अर्हत्स्तुति:
=
३१
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કમનીયા અભિમાનરહિત, સ્વર્ગનાં દેવો રૂપી ભમરોને વિશે પદ્મ સમાન, શોકરહિત, નિર્ભય, મેથુનની ઇચ્છા વિનાના, એકાન્ત વિચાર રૂપી ચોરને પકડવામાં ગુપ્તચર સમાન, ત્રણ ભુવનનાં ગુરુ, સૂર્યસમ પ્રતાપી, દૂષણ વિનાનાં, મેઘ સમ ગંભીર ધ્વનિવાળા, મોક્ષને આપનારા શ્રી અરિહંત પરમાત્મા જય પામો. || ૫ ||
अर्हत्स्तोत्रम्
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विविवर: निर्दूषण इत्यर्थः सर्वसद्गुणसमेतत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? झाझझः - झा = वारि → झा तु मदवार्यो: ? (वारिणो:) 6 [३५] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्मित:, झ: = दाता → झशब्दस्तु पुमान् दातरि - [६१] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासवचनाद्, झ: = रव: ध्वनिरित्यर्थः → रवो झकार: कथित: 6 [१४] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवविहितः, झाया झ इति झाझ: = वारिर: धराधर इत्यर्थस्तद्वद् झो यस्य स झाझझ: = वारिररव: धराधरध्वनिरित्याशय: गाम्भीर्ययुक्तत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? अझेझ: - झेः = भव: संसार इत्यर्थः → झेश्चर्मकृद् भव: + [४१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, झ: = भ्रमणम् → झ: पुमान् भ्रमणे - इति पूर्वोक्तराघवकविवचनाद्, नास्ति झयो झो यस्य स अझेझः, यद्वा झयो झो यस्य स झेझः, न झेझ इत्यझेझ इत्यप्यपररीत्या समास:, अझेझः = अभवभ्रमण: अपवर्गोपलब्धेः, अथवा झेः = भव: न झेरित्यझे: मोक्ष इत्यर्थः, झ: = दाता → झशब्दस्तु पुमान् दातरि . [६१] इति पूर्वोक्तकालिदासोक्तेः, अझयो झ इति अझेझ: = मुक्तिदाता स्वयं मुक्त एव परानपि मोचयति नान्य इत्याशय: ।
इति झकारेणार्हत्स्तुतिः ।। ५ ।।
[झः] अर्हत्स्तुतिः
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[ञः] अर्हल्स्तुतिः
अजं जं अजूनं जा-5
जनजौ-जजनिं जजे !। जे ! जे ! जूनं अजा-ऽञानं
नमार्हन्तं तथा नुहि ।। ६ ।।
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ ञकारेणार्हत्स्तुति: प्रोच्यते । अजं अञमिति ।
हे जे ! • ञिः = सम्राड् → ञि: सम्रा - [४३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, तस्य सम्बोधने, त्वम् अर्हन्तम् = श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् नम = वन्दस्व तथा नुहि = स्तुहि ‘तथा' समुच्चये, इति क्रियाकारकयोगः ।
कीदृश हे जे ! ? अञ ! • अम् = मद: → अं जूनि(रि)ति प्रतापे च हंसके भ्रमरे मदे + [५२] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रणीता, ञि: = पर्वत: → ञिस्तु पर्वते - [४२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, अमेव जिर्यस्य स अञिः = मदमहीधर: सर्वस्वामित्वस्य मानोत्पत्तेरपि संभवस्तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? जे - ञिः = चञ्चल: → ञिस्तु पर्वते निषेधे चञ्चले * [४२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, मनसोऽस्थैर्यात्, तस्य सम्बोधने ।
अत्र 'नम' 'नुहि' इति क्रियापदे, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहारतो ग्राह्यम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'अर्हन्तम्', 'जे-अजे' सम्बोधनस्य विशेषणे, अन्यान्यखिलानि कर्मणो विशेषणानि, 'तथा' समुच्चये ।
अथाभिमानी सम्राडभिमानरहितमेवार्हन्तमभिनमतीति बिभणिषुरर्हतो गतगर्वत्वमभिदधाति ।
कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? अञम् + ञः = गत: → ञ: शब्द: स्यादले विपत्तौ च दावाग्नौ चापि गते 6 [२५] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममाला-ऽज्ञातविहिता,
ञ: = गर्व: → जो व्यूहे विषये गर्वे 6 [२९] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डा[ञः] अर्हत्स्तुति:
३५
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ॐ
अन्वयः _ (हे) ञे ! ञञे ! जे ! [हे चञ्चल ! मदमहीधर ! सम्राट् !] (त्वम्) ञञम् [गतगर्वम्] ञञम् [ज्ञाननिधानम् ] अजूञम् [ चतुरभ्रमरकमलम् ] ञ-ऽञञञौ-ञञञिम् [सुखदा - ऽज्ञानिकुर्कुरकरि-साधुसमूहस्वामिनम् ] जूञम् [ हंसवदुज्ज्वलात्मानम् ] ञञा ऽञाञम् [कुशानुकान्तिजराभयरहितम् ] अर्हन्तम् [ श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् ] नम तथा नुहि [वन्दस्व स्तुष्व च] ।
३६
अर्हत्स्तोत्रम्
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धिनाथकृतः, ञो ओ यस्मात् स ञञः = गतगर्व: निष्कषायत्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? अञम् - ञ: = ज्ञानम् → जो ज्ञाने + [४१] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, ञः = निधानम् → उपाये ञ ? (ओ) निधाने 6 [५२] इत्येकाक्षरशब्दमालामात्यमाधवगुम्फिता, अस्य जो यस्य स अञ: = ज्ञाननिधान: सर्वज्ञत्वाद्, तम्, अथवा ञः = गूढम् → ञः पुन: गायने घर्घरध्वाने गूढ-रूपकयोस्तथा 6 [१९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्डः परमानन्दनन्दनभणित:, जो ओ यस्य स अञ: = गूढज्ञान: केवलज्ञानित्वात् केवलज्ञानस्य सर्वत्राप्रतिहतत्वात्, तम् ।। ___पुन: कीदृशम् ? अजूञम् - : = चतुरा: कुशलजना इत्यर्थः → जो मुनौ चतुरे - [१९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्रोक्तः, ञ्व: = भ्रमरा: शब्दस्य बहुवचने प्रयोग: → अं जूनि(रि)ति प्रतापे च हंसके भ्रमरे - [५२] इति पूर्वोक्तमाधववचनाद्, ञम् = पद्मम् → जो व्यूहे...क्लीबे तु भयपद्मयो: . [२९/३०] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथप्रणीतः, ञा एव व इति अञ्च: = चतुरभ्रमरा: तत्र ञवद् य: स अजूञम् = चतुरभ्रमरकमलम् चातुर्यसुरभिमत्त्वात् सच्चारित्रसद्रूपवत्त्वाच्च, तद्, अथवा 'अजू-ञम्' इति श्लेष: कर्तव्यः, अजू: - ञः = सिद्धिः → सिद्धिरङ्कुशी शर्वसंज्ञक: झान्तगो ह्यनुनासश्च ञकारश्च - [२८] इत्येकाक्षरीमातृका-कोशोऽज्ञातरचितः, जू: = उपाय: → जं जूनि(रि)ति प्रतापे च हंसके भ्रमरे मदे उपाये - [५२] इत्येकाक्षरशब्दमाला-डमात्यमाधवनिर्मिता, ञस्य यूः स्याद् यस्मात् स अजू: = सिद्धेरुपायद: मोक्षमार्गोपदेशकत्वात्, ञ: = प्राज्ञ: → ञ: प्राज्ञपटगायने - [९] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, प्रबुद्धत्वात्, अश्चासौ ञश्चेति अजू-ञः = सिद्ध्युपायप्रद-प्राज्ञः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? जा-ऽञञञऔ-अञञिम् ।
: = सुखद: → अकारो बोधिनी विश्वा कुण्डली म(सु)खदो वियत् 6 [८६] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधाने, मुक्तिदायकत्वात् । ____ अञञञऔः + ञः = ज्ञानम् → जो ज्ञाने 6 [४१] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, न विद्यते जो येषां ते अञा: = अज्ञानिन: ञा: = श्वान: कुर्कुरा इत्यर्थः → ञ: श्वा [४२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, औः = करी → औ!: पाषण्डवाक् करी - [४४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, [ञ:] अर्हत्स्तुति:
३७
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कमनीया
चंचल एवं अभिमान के पर्वत सम हे सम्राट् ! तु अभिमान रहित, ज्ञान के भंडार, चतुर पुरुष रूप भ्रमरों को आनन्दित करने में पद्म तुल्य, सुख के प्रदाता, अज्ञानी रूप श्वान को दूर करने के लिए हस्ति तुल्य, साधुसमुह के स्वामी, हंस सम उज्ज्वल आत्मावाले ( निर्मलात्मा ), अग्नि सम कान्तिमान, जरा एवं भय रहित, श्री अरिहंत परमात्मा को वंदन कर एवं स्तवन कर ॥ ६ ॥
३८
अर्हत्स्तोत्रम्
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अञा एव ञा इति अञञा अज्ञानिकुर्कुरा इत्यर्थस्तत्र औरिव यः स अञञञ = अज्ञानिकुर्कुरकरी |
ञञञि: - ञ: = मुनयः जो मुनौ ← [१९] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्डः परमानन्दनन्दनगुम्फितः, ञः = कलापः ञः शब्दः स्यादले विपत्तौ च दावाग्नौ चापि गते उपलेपकलापसीमासु ← [ २५ ] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातभणिता, ञिः = नाथ : → चञ्चले ञः स्यान्निर्माणे (ञिर्नाथे) ← [ ४२ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रोक्ता, जनां ञ इति ञञस्तस्य ञिरिति ञञञि: = साधुसमूहस्वामी ।
अथवा अमुमेवाशयं श्लेषपूर्वकमाह, ‘ञ - ञञि: ' इति श्लेषः कृत्य: । ञञি: ञ = मुनयः ञ मुनौ ← [१९] इति पूर्वोक्तपरमानन्दनन्दनवचनाद्, ञिः = सम्राड् ञिः सम्राड् ← [ ४३ ] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनात्, ञनां ञिरिति ञञिः = साधुसम्राट् ।
ञ = सिद्धः शुभो वा सिद्धो झान्तः सर्वेश्वरः शुभः, दुर्मुखश्चानुनासश्च वामाङ्गुल्यग्रगश्च ञः ← [२८] इति प्रकारान्तरवर्णनिघण्टुः भूतडामरतन्त्रोक्तः, पूर्वञकारस्य चासावर्थ: ञश्चासौ ञञिश्चेति ञ ञञिः = शुभ-साधुसम्राट् ।
ञश्चासावञञञश्चेति ञ-ऽञञञौः, ञ-ऽञञञौश्चासौ ञञञिश्चेति ञ-ऽञञञौ-ञञञि: = सुखदा - ऽज्ञानिकुर्कुरकरि - साधुसमूहस्वामी, तम् । पुनः कीदृशम् ? ञ्ञम् ञः = हंसः ञं ञूनि (रि) ति प्रतापे च हंसके ← [५२] इति पूर्वोक्तामात्यमाधवोक्तेः, ञः = आत्मा → ञकारो विषयात्मनि ← [ १६ ] इत्यभिधानादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातनिर्मिता, जूवद् ञो यस्य स ञ्ञः = हंसात्मा हंसवन्निर्मलात्मेत्यर्थः, कर्ममलरहितत्वात्,
तम् ।
पुनः कीदृशम् ? ञञा-ऽञाञम् । ञञ: ← ञ: = अग्नि: ञः श्वाग्निः ← [ ४२ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्ररूपिता, ञम् = द्युतिः कान्तिरित्यर्थः जं तु स्याद् द्युतिपद्मयोः ← [५२] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्रणीता, ञ इव ञं यस्य स ञञ: = कृशानुकान्तिः प्रदीप्यमानत्वाद् ।
जा जरा ← [ ४२ ] इत्येकाक्षरनाममाला जो व्यूहे ... क्लीबे तु भयपद्मयो: ← [२९/ ३०] इति पूर्वोक्तेरुगपदण्डाधिनाथोक्तेः, न विद्यते जाया जं यस्य स अञाञ:
अञाञम् ← ञ = जरा सौभरिरचिता, ञम् = भयम्
[ञ: ] अर्हत्स्तुतिः
३९
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કમનીયા
ચંચલ અભિમાનનાં પર્વત સમા હે સમ્રાટ ! તું અભિમાનરહિત, જ્ઞાનનાં ભંડાર, ચતુર પુરુષ રૂપી ભ્રમરોને આનંદિત કરવામાં કમળ સમાન, સુખ આપનારા, અજ્ઞાની રૂપી શ્વાનને વિશે હાથી સમાન, સાધુસમૂહનાં સ્વામી, હંસ સમ ઉજ્વલ આત્માવાળા (નિર્મલાત્મા), અગ્નિસમ કાંતિમાન, જરા અને ભય રહિત શ્રી અરિહંત પરમાત્માની વંદના કર તથા સ્તવના કર | ૬ ||
४०
अर्हत्स्तोत्रम्
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= जराभयरहित: ननु जराया भयं मास्तु अन्यस्यास्त्विति चेत्... न सर्वथा निर्भयित्वात् समासान्तरेण तदुच्यमानत्वात्, यथा आ च अञ्चेति बाजे, न विद्येते आजे यस्य स अञाञ: = जराभयरहितः ।।
अञश्चासावञाञश्चेति ञञा-ऽञाञ: = कृशानुकान्ति-जराभयरहित:, तम् ।
इति अकारेणार्हत्स्तुतिः ॥६॥
★ ★ ★
____ [अ] अर्हत्स्तुतिः
४१
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[ट:] अर्हत्स्तुतिः
टटा-टिटं टटा-ऽटै-टू
टटं टोटो-ऽटटं टटौः ! । टीटा-ऽटटं टटौटं टौः !
स्तुष्वार्हन्तं सुभावतः ।। ७ ।।
४२
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ टकारेणार्हत्स्तुतिरुच्यते ।
टटा- टिटमिति ।
टौः = शिष्य : 'टो' कारस्यायं प्रयोगः → टोः परेतो गुरुः शिष्यः ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, तस्य सम्बोधने, हे टौः ! त्वम् अर्हन्तम् श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् सुभावतः = प्रशस्यभक्त्या स्तुष्व = स्तवनविषयीकुरुष्व इति क्रियाकारकसंयोजना |
कीदृश हे टौः ! ? टटौ ! टः = स्थिरः टः स्थिरे ← [ ४३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, टौः = विनीतः टौर्विनीतः ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, टश्चासौ टौश्चति टटौ: = स्थिरविनीतः शिष्यस्य चाञ्चल्यरहितत्वान्नम्रत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
अत्र 'स्तुष्व' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' त्वम्' अध्याहारतो ज्ञातव्यम्, कं कर्मतापन्नम् ? ‘अर्हन्तम्', किं सम्बोधनम् ? ' टौ:', कीदृग्रीत्या ? ' सुभावतः', 'टटौ : ' सम्बोधनस्य विशेषणमन्यानि कर्मणो विशेषणानि ।
=
कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? टटा - टिटम् ।
टटा - ट: = भूपः → टः पुमान् कटके भूपे ← [ ६४ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, टा = सूनुः सूनौ भूव्यावृत्त्योस्तु टा स्त्रियाम् ← [ ६५ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासकृता, टस्य टेति टटा = पार्थिवपुत्रः अर्हतां प्रशस्याभिराम एव जनुस्त्वात् ।
P
टिट: टि: = पृथ्वी भूरित्यर्थ: टिः करेणुर्भूः ← [ ४५] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, टः = भूपटः पुमान् कटके भूपे ← [ ६४ ] इति
[ट] अर्हत्स्तुति:
४३
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अन्वयः - (हे) टटौ: ! टौ: ! [हे स्थिरविनीत ! शिष्य !] (त्वम्) टटा-टिटम्
[पार्थिवपुत्र-पृथ्वीपतिम्] टटा-ऽटै-टूटटम् - [अब्दशब्दा-ऽशत्रुभयाभ्रप्रभञ्जनम्] टोटो-उटटम् [गुरुगुर्वविरुद्धशब्दम्] टीटा-ऽटटम् [अचलाचला-ऽजरामरम्] टटौटम् [विषयदावानलजलधरम्] अर्हन्तम् [श्रीतीर्थकरपरमात्मानम्] सुभावत: [प्रशस्यभक्त्या स्तुष्व [स्तवनविषयीकुरुष्व ।
अर्हत्स्तोत्रम्
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पूर्वोक्तकालिदासव्यासोक्ते:, टेष्ट इति टिट: = भूभूपः न केवलं सम्राट्सूनुः किन्तु स्वयमपि पृथ्वीपतिरित्याशयः ।
टटा चासौ टिटश्चेति टटा-टिट: = पार्थिवपुत्र - पृथ्वीपतिः, तम् । पुनः कीदृशम् ? टटा ऽटै टूटटम् ।
टट: ← टम् = अब्द: मेघ इत्यर्थ: अब्दे टम् ← [२०] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिभणिता, ट: = शब्दः टः शब्दे ← [२१] इत्येकाक्षरसंज्ञकाण्ड: महीपसचिवभणितः, टवत् टा यस्य स टटः = अब्दशब्दः मेघवद् गम्भीरशब्दवान् वाचो गाम्भीर्यगुणोपेतत्वात् ।
अटै: टैः = द्विड् शत्रुरित्यर्थोऽन्धो वा टैर्द्धिडन्धः ← [ ४६ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरि प्रोक्ता, न विद्यन्ते टाय: अरयो यस्य स अटैः = अशत्रुः सर्वारिजेतृत्वात्, अथवा टै: = अन्ध: अज्ञानादिनेत्यर्थः न टैरिति अटै: = अनन्धः कैवल्यलोचनालोकनत्वात् ।
टूटट:
टू: = भी: → टूर्ननन्दा स्वसा च भी: ← [ ४६ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्ररूपिता, टम् = अब्दः → अब्दे टम् ← [२०] इति पूर्वोक्तवररुचिवचनाद्, टः = वायुः टः पुमान् कटके भूपे तापेऽर्ककिरणे ध्वनौ चापध्वनौ जले वायौ ← [ ६४ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, टूरेव टमिति टूटम् तत्र तद्दूरीकरणे ट इव य: स टूटट: = भयाभ्रप्रभञ्जनः अभयदत्वात् ।
टटश्चासावटैश्चेति टटा ऽटै, टटा ऽटैश्चासौ टूटटश्चेति टटा - sटै- टूटट:
-
= अब्दशब्दा-ऽशत्रु-भयाभ्रप्रभञ्जनः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? टोटो - ऽटटम् । टोटो : टौ: = गुरु: 'टो' रूपम् टोः परेतो गुरु: ← [ ४७ ] इति पूर्वोक्तसौ भरिवचनाद्, टवां टौरिति टोटौ = गुरूणां गुरु: जगद्गुरुरित्यर्थः । अटट: ं टः = विरुद्धः → टकारः पुंसि विषये विरुद्धे ← [ ५४ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, टः = शब्दः टः शब्दे ← [२१] इति पूर्वोक्तमहीपसचिवोक्ते:, न ट इत्यटः अविरुद्ध इत्यर्थः, अटा टा यस्य स अटटः = अविरुद्धशब्दः सत्यसमेतत्वात् सत्यस्य सर्वदाऽविरुद्धत्वात् । [ट: ] अर्हत्स्तुति:
४५
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कमनीया
स्थिर एवं विनीत शिष्य ! तुं राजा के पुत्र, पृथ्वीपति, मेघ सम गंभीर शब्दवाले, शत्रु रहित, भय रूप मेघ को दूर करने में वायु तुल्य, गुरुओं के भी गुरु, अविरुद्ध शब्दवाले, पर्वत सम अचल, जरा एवं मृत्यु रहित, विषय रूप दावानल को शांत करने में जलधर तुल्य, श्री अरिहंत परमात्मा की श्रेष्ठ भाव से स्तवना कर ॥ ७ ॥
કમનીયા
હે સ્થિર અને વિનીત શિષ્ય ! તું રાજાનાં પુત્ર, પૃથ્વીપતિ, મેઘ સમ ગંભીર શબ્દવાળા, શત્રુરહિત, ભય રૂપી મેઘને દૂર કરવામાં વાયુ સમાન, ગુરુઓનાં પણ ગુરુ, અવિરુદ્ધ શબ્દવાળા, પર્વત સમ અચલ, જરા અને મૃત્યુ વિનાનાં, વિષય રૂપી દાવાનલને શાંત કરવામાં જલધર સમાન, श्रीमरिहंत परमात्मानी श्रेष्ठ लावथी स्तवना ९२ ॥ 9 ॥
४६
अर्हत्स्तोत्रम्
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टोटोश्चासावटटश्चेति टोटोsटट: = गुरुगुर्वविरुद्धशब्दः, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? टीटा -ऽटटम् ।
टीट: • टी: = धराधरः → टीर्धराधरः ← [ ४५] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, टः = स्थिरः टः स्थिरे ← [४३ ] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, टीरिव टो य: स टीट: = धराधरस्थिरः अचलवदचल इत्यर्थः ।
अटट: ← टः = जरा → जरा मुकुन्दः.... टकः स्मृतः ← [२९] इत्येकाक्षरी - मातृकाकोशोऽज्ञातविहितः, टम् = मरणम् →टं नेत्रं श्रवणं पात्रं भ्रमणं मरणं तथा ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, टश्च टञ्चेति टटे, न विद्येते टटे यस्य स अटटः = अजरामरः अजनित्वात् सजनेरेव तत्संभवात् ।
टीटश्चासावटटश्चेति टीटा - ऽटट: = अचलाचला ऽजरामरः, तम् । पुनः कीदृशम् ? टटौटम् ← टः = विषयः → टः पुमान् कटके भूपे तापेऽर्ककिरणे ध्वनौ चापध्वनौ जले वायौ विषये ← [ ६४ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासग्रथिता, टौः = दव: दावानल इत्यर्थ: टौर्विनीतो दवः ← [ ४७ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, टम् = अब्दः अब्दे टम् ← [२०] इति पूर्वोक्तवररुचिवचनाद्, ट एव टौरिति टटौ: = विषयदावानलः तत्र टवद् य इति टटौटम् = विषयदावानलजलधरः, तद् ।
इतिटकारेणार्हत्स्तुतिः ॥ ७ ॥
[टः] अर्हत्स्तुतिः
४७
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[ठः] अर्हत्स्तुतिः
ठठे-ऽठठ ! ठठौठे-ठा-5
ठोऽ-ठूठो ! ठुठुठो ! ठठः । ठठठोऽठाठठोऽठोऽठ!
त्वमर्हन् ! विजयस्व हे ! ।। 6 ||
४८
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ ठकारेणार्हत्स्तुतिः कथ्यते ।
ठठे -ऽठठेति ।
हे अर्हन् = हे जिनेश्वरपरमात्मन् ! त्वम् विजयस्व = त्वं जेता भव इति क्रियाकारकसण्टङ्कः ।
अत्र ‘विजयस्व’ इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? 'त्वम्’, किं सम्बोधनम् ? ‘हेऽर्हन्’, ‘ठठे ! अठठ ! ठठौठै-ठ ! अठो ! अठूठो ! ठुठुठो ! अठ' इति सम्बोधनस्य विशेषणान्यन्यानि सर्वाण्यपि कर्तुर्विशेषणानि ।
कीदृश श्रीअर्हन् !? ठठे ! ठः = भूपः राजेत्यर्थः ठो महेशे महामन्त्रे मन्त्रि - भूप- ← [ ४५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, ठि: = कुमारः → ठिः कुमारः ← [ ४९ ] इत्येकाक्षरनाममाला विश्वशम्भुरचिता, ठस्य ठिरिति ठठिः = राजकुमारः, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? अठठ ! ठः = हासः ठः = त्रासः ठः पुमान् वृषभे शून्ये हा त्रासे ← [ ६७ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासनिर्मिता, ठश्च ठश्चेति ठठौ, न विद्येते ठठौ यस्य स अठठः = हासत्रासरहितः मोहनीयवेदनीयशून्यत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? ठठौठै-ठ ! । ठठौठैः • ठः = महीपः ठशब्द: कथ्यते पुंसि बृहद्ध्वानमहीपयोः ← [ ५६ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवविहिता, ठौः = तारा तारासु ठौ ? ठौः स्त्रियाम् ← [४८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, ठैः = सूर्य: ठैरदैन्तो ? वृथाहास्ये सूर्ये ← [ ४८ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, [ठः] अर्हत्स्तुतिः
४९
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अन्वयः - ठठे ! [राजकुमार !] अठठ ! [हासत्रासरहित !] ठठौठे-ठ !
[महीपतारातपन-सर्वमित्र !] अठो ! [धनरहित !] अटूठो ! [अधैर्य क्षायक !] ठुठुठो ! [वञ्चकविषयविजेत: !] अठ ! [निर्दूषण !] हेऽर्हन् । [हे तीर्थकरपरमात्मन् !] ठठः [ज्ञानामृतवान्] ठठठ: [ज्ञानवारिवारिद:] अठाठठः [अज्ञान्यज्ञानक्षायक:] अठ: [पीडारहित:] त्वं विजयस्व [त्वं जय] ।
५० .
अर्हत्स्तोत्रम्
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ठा एव ठाव इति ठठावस्तत्र लैरिव य: स ठठौठैः = महीपतारातपन: ।
ठः = सर्वमित्रक: → ठः शून्यम्....सर्वमित्रकः [९४] इति प्रकारान्तरमन्त्राभिधानम्, सुविशालहत्त्वादजातशत्रुत्वाच्च ।
ठठौठैश्चासौ ठश्चेति ठठौठै-ठ: = महीपतारातपन-सर्वजीवमित्रम्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश !? अठो ! • तुः = धनम् → ठुकार: कथ्यते... धने - [५८] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवभणिता, नास्ति तुर्यस्य स अतुः = धनरहित: निष्परिग्रहित्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश !? अठूठो ! • ठू: = धृति: → ठू: प्रज्ञा धृतिरेव च . [४९] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, तुः = क्षय: → ठुकार: कथ्यते... क्षये - [५८] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्ररूपिता, न टूरित्यठूरधैर्यमित्यर्थस्तस्य तुर्यस्मात् स अतूटुः = अधैर्यक्षायकः, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ! ? ठुठुठो ! - ठुः = वञ्चक: → वञ्चके वेषकारे तु: 6 [४९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, तुः = विषय: → ठुकार: कथ्यते पुंसि विषये - [५८] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, तुः = विजय: → विजये देवसेवने तुः + [४७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुनिर्मिता, ठुश्चासौ तुश्चेति तुतुः सर्वेषां प्रति शाठ्यकृत्त्वाद्विषयस्य वञ्चकत्वमुक्तम्, तस्य तुर्यस्य स ठुठुतुः = वञ्चकविषयविजेता निर्विकारित्वात्, अथवा मध्यम तुकारस्य अन्योऽर्थः, तुः = यम: → तुः कदम्बो यम: * [४९] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिविहिता, तथैव ठुठुतुः = वञ्चकयमविजेता विषयवद् यमोऽपि सर्वान् प्रति वञ्चनां विदधात्यतोऽत्रापि वञ्चकत्वम्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश ! ? अठ ! - ठ: = आधि: → ठो महेशे महामन्त्रे मन्त्रिभूपाधि- 6 [४५/४६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, न विद्यते ठो यस्य स अठ: = आधिरहित: परमानन्दनिमग्नत्वात्, तस्य सम्बोधने, अथवा ठम् = विवरम् दूषणमित्यर्थः → ठं ज्ञानं विवरम् - [५०] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, नास्ति ठं यस्य स अठ: विविवर: निर्दूषण इत्यर्थः सर्वगुणसंपन्नत्वात्, तस्य सम्बोधने, अथवा ठः = परिताप: → ठः शब्द: स्याद् भवने [ठ:] अर्हत्स्तुति:
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कमनीया राजकुमार, हास्य एवं त्रास से रहित, राजा रूपी ताराओं में सूर्य तुल्य, सर्व जीवों के मित्र, धनरहित, अधीरता के नाशक, वंचक विषय को जीतनेवाले, निर्दूषण हे अरिहंत परमात्मान् ! ज्ञान रूपी अमृत के धारक, ज्ञान रूपी नीर को बरसाने के लिए मेघ तुल्य, अज्ञानी जीवों के अज्ञान को नष्ट करनेवाले, पीडा रहित आप विजयी हो ॥ ८ ॥
५२
अर्हत्स्तोत्रम्
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दिनकरकिरणेषु परितापे ← [२६] इत्यजिरादि - एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातगुम्फिता, न विद्यते ठो यस्य स अठः = परितापरहितः निश्चिन्तत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
अथ कीदृशस्त्वम् ? ठठः ठः भूपः ठो महेशे महामन्त्रे मन्त्रिभूप- ← [ ४५ ] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, ठः = सूनुः ठः सूनुः ← [ ४८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिभणिता, ठस्य ठ इति ठठः = पार्थिवपुत्रः ननु विशेषणस्यास्य पूर्वोक्ताद्यविशेषणेन 'ठठे' इत्यनेन शब्दान्तरत्वेऽप्यर्थेन सह साम्यत्वात् पुनरुक्तिरिति चेत्... सत्यम् परिहायैनमर्थमन्यार्थस्योच्यमानत्वात् - ठः = अब्द: मेघ इत्यर्थः ठः = स्वनः शब्द इत्यर्थः ठः शङ्करे बृहद्भासे बृहद्ध्वनौ जटाब्दयोः बस्तौ स्वने ← [ ६६ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रोक्ता, ठ इव ठो यस्य स ठठः = अब्दशब्दः, अथवा ठम् = ज्ञानम् ठम् = अमृतम् → ठं ज्ञानं विवरं शून्यममृतम् ← [ ५० ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्ररूपिता ठमेव ठं यस्य स ठठः = ज्ञानामृतवान् ज्ञानीत्यर्थः ।
-
सजलो जलदः प्रददाति सर्वेभ्यः स्वजलं यथा तथा सज्ञानोऽर्हन्नपि स्वज्ञानमित्याशयादेवाह ।
पुनः कीदृश: ? ठठठः • ठम् = ज्ञानम् ठम् = पयः →ठं ज्ञानं विवरं शून्यममृतं शारदं पयः ← [ ५० ] इत्येकाक्षरनाममाला विश्वशम्भुप्रणीता, ठः = मेघः ठः ..... . वृषभध्वनिमेघयो: ← [ ६६ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, ठमेव ठमिति ठठम्, तत्र ठवद् यः स ठठठः = ज्ञानवारिवारिदः । अथ ज्ञानप्रदानादज्ञानानामज्ञानविध्वंसनं स्पष्टमेव तदाह ।
पुनः कीदृश: ? अठाठठ: - ठः = ज्ञानी → ठः सूनुर्ज्ञानी ← [ ४८ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, ठम् = ज्ञानम्ठं ज्ञानम् ← [५० ] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भूक्तेः ठः = क्षयः ठः पुमान् वृषभे शून्ये हासे से क्षये ← [ ६७ ] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, न ठा इत्यठा अज्ञानिन इत्यर्थ:, न ठमित्यठमज्ञानमित्यर्थः, अठानामठमित्यठाठम् अज्ञान्यज्ञानम्, तस्य ठो यस्मात् स अठाठठः = अज्ञान्यज्ञानक्षायकः ।
पुनः कीदृश: ? अठः ठः = वाचालः ठः सूनुर्ज्ञानी मध्वरिरेव च वाचाल: ← [४८] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, न ठ इत्यठः अवाचाल: [ठः] अर्हत्स्तुतिः
५३
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કમનીયા
રાજકુમાર, હાસ્ય અને ત્રાસથી રહિત, રાજા રૂપી તારાને વિશે સૂર્ય સમાન, સર્વ જીવોના મિત્ર, ધનનો ત્યાગ કરનારા, અધૈર્ય ( અધીરતા) નો નાશ કરનારા, ઠગ એવા વિષયને જીતનારા, નિર્દૂષણ હે અરિહંત પરમાત્મન્ ! જ્ઞાનરૂપી અમૃતને ધારણ કરનારા, જ્ઞાનરૂપી નીરને વરસાવવામાં મેઘ સમાન, અજ્ઞાની જીવોનાં અજ્ઞાનનો ક્ષય કરનારા, પીડા રહિત તમે જય પામો. II ૮ II
५४
अर्हत्स्तोत्रम्
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परममौनित्वात् अथवा ठः = शयनम् ठो महेशे महामन्त्रे मन्त्रिभूपाधिताण्डवे आसने शयने ← [ ४५/४६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, न विद्यते ठो यस्य स अठः = अशयन: अप्रमत्तत्वात्, अथवा ठा = पीडा → पीडायामपि ठा स्मृता ← [ ५९ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवभणिता, नास्ति ठा यस्य स अठः = पीडारहितः अशातस्यानुदयात्, अथवा ठः = शठ: ठशब्द: कथ्यते... शठे ← [ ५६/५७ ] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवकृता, न ठ इत्यठः सरल इत्यर्थः परमर्जुत्वात्, अथवा अयमेवाशयोऽनया रीत्या - = वञ्चकः → वञ्चके वेषकारे ठुः ← [ ४९ ] इति पूर्वोक्तविश्वशम्भुवचनाद्, न दुरित्यठुरवञ्चक इत्यर्थः परमर्जुत्वात्, तस्य सम्बोधने, (पङ्क्तौ 'अठो' इति दर्शनाद्) ।
ठुः
इति ठकारेणास्तुतिः ॥ ८ ॥
[ठः] अर्हत्स्तुतिः
५५
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[डः] अर्हत्स्तुतिः
डाडडु डोडडाऽडीडं
डेडु डडडडं डुडो ! । डडा-ऽडाडा-ऽडडं डो-ऽड
मर्हन्तं हे ! त्वमर्चय ।। ९ ।।
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ डकारेणार्हत्स्तुतिर्निगद्यते । डाडडुमिति ।
हे डो ! • तृतीयचरणवर्युपान्त्यपदमिदम् डुः = बाल: → धातुवद् डुश्च... सर्ववधे बाले - [५१/५२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, तस्य सम्बोधने, हे डो ! त्वम् अर्हन्तम् = श्रीतीर्थकृत्परमेश्वरम् अर्चय = पूजय इति क्रियाकारकयोगः ।
कीदृश हे डो ! ? डुडो ! - डुः = भ्रान्त: डुः = बलहीन: → धातुवद् डुश्च... भ्रान्ते सर्ववधे बाले बलहीने [५१/५२] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुरचिता, डुश्चासौ डुश्चेति डुडुः = भ्रान्तबलहीन: संसारेऽटाट्यमानत्वात् शौर्यरहितत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
अत्र ‘अर्चय' इति क्रियापदम्, क: कर्ता ? 'त्वम्' अध्याहारतो वेद्यम्, कं कर्मतापन्नम् ? 'अर्हन्तम्', किं सम्बोधनम् ? 'हे डो !', 'डुडो' सम्बोधनस्य विशेषणमन्यानि कर्मणो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? डाडडुम् - डा = पृथ्वी → डा ६मा + [५१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, डः = चन्द्रः → डो भयङ्करनादेषु चन्द्रे - [५०] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, डुः = सौम्यः → डुशब्दस्तु त्रिलिङ्गे स्याद् गूढे सौम्यापसद्मयोः + [६१] इत्येकाक्षरशब्दमालाउमात्यमाधवकृता, ड इव डुरिति डडुः, डायां डडुरिति डाडडुः = सर्वंसहासोमसौम्य:
परमालादप्रदत्वात्, तम्। [:] अर्हत्स्तुतिः
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अन्वयः - हे डुडो ! डो ! त्वम् [हे भ्रान्तबलहीन ! बाल ! त्वम् ] डाडडुम्
[सर्वंसहासोमसौम्यम्] डोडडा-ऽडीडम् [मनुष्यभयक्षयदम्भहासरहितम् डेडुम् [धर्मदातारम् डडडडम् [विषयभीमपिशाचजेतारम् डडाडडाडाऽडडम् [इक्षुरसवाग्रमारागरहिताविस्मयभयम्] अडम् [अशठम्] अर्हन्तम् [श्रीतीर्थ-कृत्परमेश्वरम्] अर्चय [पूजय] ।
अर्हत्स्तोत्रम्
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पुन: कीदृशम् ? डोडडा-ऽडीडम् ।
डोडड: + डाव: = नर: मनुष्या इत्यर्थः, 'डो'शब्दस्यायं प्रयोग: → डोरोदन्तोऽन्त्यजे नरि + [५४] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, ड: = भयम् → ड: पिशाचे भये - [६९] इत्येकाक्षरीनाममाला विश्वशम्भुगुम्फिता, डः = क्षय: → डः पुमान् विषये शम्भौ हासे त्रासे क्षये - [३३] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथभणित:, डवां ड इति डोडस्तस्य डो यस्मात् स डोडड: = मनुष्यभयक्षय: अभयदानप्रदत्वात्, मनुष्योपलक्षणात् सर्वजीवभयच्छेत्तृत्वमवगन्तव्यम् ।
अडीड: - डी = दम्भ: → दण्डे (दम्भे) डी + [५३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रोक्ता, ड: = हास: हास्यमित्यर्थः → ड: पुमान् विषये शम्भौ हासे - [३९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्ररूपित:, डी च डश्चेति डीडौ = दम्भहासौ, न विद्यते डीडौ यस्य स अडीड: = दम्भहासरहित: निष्कपटत्वान्मोहनीयशून्यत्वात्, अथवा डी: = धात्री पृथ्वीत्यर्थ: → डी: शिव: धात्री . [५१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, डम् = वध: हिंसेत्यर्थः → डं क्लीबे डामरे दुर्गे वधे - [४०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवरचितः, न स्यात् डी: = पृथ्वी तस्यां डम् = वध: यस्मात्-यस्य प्रभावात् स अडीड: = पृथिव्यां हिंसानिवारकः । ____डोडडश्चासावडीडश्चेति डोडडा-ऽडीडः = मनुष्यभयक्षय-दम्भहासरहितः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? डेडुम् + डेः = धर्म: → डेर्धर्म: + [५२] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, डुः = दानम् → डुः फेने दाने - [५३] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, डयो डुर्यस्मात् स डेडुः = धर्मदाता परानुग्रहकृत्त्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? डडडडम् + डः = विषय: → ड: पुमान् विषये 6 [३३] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथकृत:, डः = भीम: → डकार: शङ्करे त्रासे ध्वनौ भीमे निरूप्यते - [१८] इत्येकाक्षरकोष: पुरुषोत्तमदेवग्रथितः, ड: [ड:] अर्हत्स्तुति:
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कमनीया हे भ्रान्त एवं बल हीन बालक ! तुं पृथ्वी में चंद्र सम सौम्य, मानवों के भय का क्षय करनेवाले, दंभ एवं हास्य रहित, धर्म के दाता, विषय रूप भयंकर पिशाच से विजयी, इक्षु रस सम मधुरभाषी, रमा के राग से रहित, अविस्मयी, निर्भय, अशठ श्री अरिहंत परमात्मा की अर्चना कर ॥ ९ ॥
अर्हत्स्तोत्रम्
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= पिशाच: → डशब्द: पुंसि डिण्डीरे हस्ते चापि भगन्दरे पिशाचे * [६०] इत्येकाक्षरनाममालाडमात्यमाधवगुम्फिता, ड: = जय: → ड: पुमान् विषये शम्भौ हासे त्रासे जये - [३९] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवभणित:, ड एव ड इति डड: = भयङ्करपिशाच:, ड एव डड इति डडडस्तस्य डो यस्य स डडडड: = विषयभीमपिशाचजेता, तम् ।।
पुनः कीदृशम् ? डडा-ऽडाडा-उडडम् ।
डड: - डः = अतिशय: → डकारोऽतिशये - [२७] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रोक्ता, ड: = क्षान्ति: → क्षान्तिर्दारकश्च डामरो दक्षगुल्फग: व्याघ्रपाद: शुभाङ्घिश्च डकार: - [३१] इत्येकाक्षरीमातृकाकोषोऽज्ञातप्ररूपित:, डो डो यस्य स डड: = अतिशयक्षान्तिमान् क्षमाशीलत्वात्, अथवा ड: = इक्षुरस: → डकारोऽतिशये रतदुरसाविस्मये इक्षुरसे - [२७] इत्यजिरादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातप्रणीता, ड: = वाचा → ड: पुमान् विषये... व्रीडावाचो: * [३३] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथरचित:, ड इव डो यस्य स डड: = इक्षुरसवाक् परममाधुर्यात् ।
अडाड: - डा = रमा लक्ष्मीरित्यर्थः → डा क्ष्मा च सरमा रमा - [५१] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिनिर्मिता, ड: = राग: → डशब्द: पुंसि डिण्डीरे हस्ते चापि भगन्दरे पिशाचे पथिके काले रागे - [६०] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवविहिता, नास्ति डाया डो यस्य स अडाड: = रमारागरहित: वैराग्यवारिधिविलग्नत्वात् ।
अडड: * ड: = विस्मय: → डकारोऽतिशये रतदुरसाविस्मये . [२७] इति पूर्वोक्ताजिरादि-एकाक्षरीनाममालावचनाद्, ड: = भयम् → ड: पिशाचे भये - [६९] इति पूर्वोक्तकालिदासव्यासोक्तेः, डश्च डश्चेति डडौ, न विद्येते डडौ यस्य स अडड: = विस्मयभयरहित: सर्वज्ञत्वाच्छौर्यशालित्वात्, पूर्व परभीभेदकत्वमुक्तमत्र स्वयमेव निर्भय इत्याशयः ।
डडश्चासावडाडश्चेति डडा-ऽडाडः, डडा-ऽडाडश्चासावडडश्चेति डडाऽडाडाडडडः = इक्षुरसवाग्रमारागरहिताविस्मयभय:, तम् । [ड:] अर्हत्स्तुतिः
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કમનીયા હે ભ્રાન્ત અને બળહીન બાળક ! તું પૃથ્વીમાં ચંદ્ર સમ સૌમ્ય, માનવોના ભયનો ક્ષય કરનારા, દંભ અને હાસ્ય વિનાના, ધર્મનું દાન કરનારા, વિષય રૂપી ભયંકર પિશાચને જીતનારા, ઈક્ષરસ જેવી મધુર ભાષી, રમાનાં રાગથી રહિત, વિસ્મય અને ભય વિનાના, અશઠ શ્રીઅરિહંત પરમાત્માની અર્ચના કર. | ૯ ||
अर्हत्स्तोत्रम्
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पुन: कीदृशम् ? अडम् - ड: = शठ: → ड: पुमान् विषये... त्रिषु दृढे शठ: [३९/४०] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवकृतः, न ड इत्यड: अशठ: इत्यर्थः सारल्यमूर्तित्वाद् अथवा ड: = त्रास: → डकार: शङ्करे त्रासे - [१३] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकग्रथितः, न विद्यते डो यस्य यस्माद् वा स अड: = अत्रास: परवेदनाकर्तृत्वाभावादशातस्यानुदयाद्, परवेदनाऽकृतोऽशातानुदयः स्पष्ट एव, तम् ।
इति डकारेणार्हत्स्तुतिः ॥ ९ ॥
★
★
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[ड:] अर्हत्स्तुतिः
Page #279
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[ ढः ] अर्हत्स्तुतिः
बैठो उढ ! ढीढा - Sढो-s
ढढीढा - Sढढ ! ढोढढः ।
ढोढ ! ढोढो ढढो ढा-Sढ !
मय्यर्हस्त्वं कृपां कुरु || १० ||
६४
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ ढकारेणार्हत्स्तुतिर्गीयते ।
ढढढो ढढेति ।
हे अर्हन् ! = हे जिनेन्द्र ! त्वं मयि = ममोपरि कृपां कुरु = करुणां कुरु इति क्रियाकारकान्वयः ।
अत्र 'कुरु' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' त्वम्', कां कर्मतापन्नाम् ? ‘कृपाम्’, कस्मिन् ? ‘मयि’, किं सम्बोधनम् ? ' अर्हन् !' 'ढैढढः, ढीढा - Sढः, ढः, अढढः, ढोढो-ढढ: ' कतुर्विशेषणान्यन्यानि सम्बोधनस्य विशेषणानि ।
कीदृश हे श्रीअर्हन् ! ? ढढ ! ढम् = वरम् ढं पयो वरम् ← [ ५४ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, ढम् = ज्ञानम् ज्ञा (ने) तुर्यमुखेऽपि ढम् ← [७०] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, ढं ढं यस्य स ढढः = प्रशस्यज्ञान: लोकालोकालोकत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? अढढीढा - Sढढ ! |
अढढीढम् • ढः = रागः → ढः पिशाचे भये काले जडे गायकरागयोः ← [४१] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवप्रणीतः, ढीः = वह्निः अग्निरित्यर्थः → ढीर्धूमो वह्निः ← [ ५३ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिरचिता, ढम् = पयः जलमित्यर्थः → ढं पयः ← [ ५४ ] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, न ढ इत्यढ: अरागो द्वेष इत्यर्थस्तद्विरुद्धार्थिनञाश्रयणाद्, अढ एव ढीरित्यढढीस्तत्र तदुपशमने ढवद् य: स अढढीढम् = द्वेषदहनदकम् ।
अढढः • ढः = रागः ढः पिशाचे भये काले जडे गायकरागयोः ← [४१] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवनिर्मितः, ढः = रोग: → ढः शब्दस्तु पिशाचे [ढः] अर्हत्स्तुति:
६५
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अन्वयः - ढढ ! [प्रशस्यज्ञान !] अढढीढा-उढढ ! [द्वेषदहनदक-रागरोग
रहित !] ढोढ ! [वर्यस्वभाव !] ढ ! [सौम्य !] अढ ! [अभयप्रद !] (हे) अर्हन् हि जिनेन्द्र !] ढेढढ: [मारपिशाचभयद:] ढीढा-ऽढ: [मनुष्यश्रेष्ठा-उनायुधः] ढः [विश्वेश्वरः] अढढ: [विद्वद्वर्यविरक्तवर्यः] ढोढो-ढढः [सुखिश्रेष्ठ-श्रेष्ठगतिः] त्वं मयि कृपां कुरु [त्वं ममोपरि करुणां कुरु ।
अर्हत्स्तोत्रम्
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मूकाऽलसमूर्खमुग्धरोगेषु - [२८] इत्यजिरादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातविहिता, ढ एव ढ इति ढढः, न विद्यते ढढो यस्य स अढढः = रागरोगरहित: निष्कषायत्वात् ।
अढढीढञ्चासावढढश्चेति अढढीढा-उढढः = द्वेषदहनदक-रागरोगरहित:, तस्य सम्बोधने, विशेषणाभ्यामाभ्यामर्हतो रागद्वेषविरहितत्वम् व्याख्यातम् ।
पुन: कीदृश ! ? ढोढ ! - ढौः = वर्य: ‘ढो'शब्दस्यायं प्रयोग: → ढो: सुखी वर्य: [५४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, ढः = स्वभाव: → ढ: स्वभावे . [५७] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, ढौझै यस्य स ढोढः = वर्यस्वभाव: प्रतिकूलत्वविरहाद्, तस्य सम्बोधने ।
पुनः कीदृश ! ? ढ ! • ढः = सौम्य: → ढ: .... त्रिषु स्याद् गूढसौम्ययो: - [४१/४२] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवग्रथितः, चन्द्रमोवदाननत्वात्, तस्य सम्बोधने ।
पुन: कीदृश !? अढ ! - ढः = भयम् → ढः पिशाचे भये - [३५] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथगुम्फित:, नास्ति ढो यस्माद्यस्य वा स अढ: = अभयप्रदो निर्भयो वा करुणाकरत्वात्सुबलत्वाच्च, तस्य सम्बोधने ।
अथ कीदृशस्त्वम् ? ढैढढः - डैः = मार: → डैार: 6 [५४] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिभणिता, ढः = पिशाच: → ढ: शब्दस्तु पिशाचे 6 [२८] इति पूर्वोक्ताजिरादि-एकाक्षरीनाममालोक्तेः, ढ: = भयम् → ढ: पिशाचे भये 6 [४१] इति पूर्वोक्तकविराघववचनाद्, ढेरेव ढ इति द्वैढस्तस्य स्याद् ढो यस्माद् स ढेढढः = मारपिशाचभयदः ।
पुन: कीदृश: ? ढीढा-5ढः ।
ढीढम् • ढी: = ना मनुष्य इत्यर्थः → ढीर्ना - [५५] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रोक्ता, ढम् = वरम् → ढं पयो वरम् + [५४] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, ढीषु ढमिति ढीढम् = मनुष्यश्रेष्ठः सर्वगुणैरलङ्कतत्वात् ।
अढ: " ढः = आयुध: → आयुधे ढः स्याद् - [५६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्ररूपिता, न विद्यन्ते ढा यस्य स अढः = अनायुधः त्यक्त[ढ:] अर्हत्स्तुतिः
६७
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कमनीया
उत्तम ज्ञानवाले, द्वेष रूप अग्नि को उपशान्त करने के लिए नीर तुल्य, राग रूप रोग से रहित, श्रेष्ठ स्वभाववाले, सौम्य, अभयदान को देनेवाले हे अरिहंत परमात्मा ! काम रूप पिशाच को भयभीत करनेवाले, मनुष्यों में श्रेष्ठ, शस्त्र रहित, विश्वेश्वर, विद्वान, वैरागी, सुखी जीवों में श्रेष्ठ, श्रेष्ठ गतिवाले आप मेरे पर कृपा करें ॥१०॥
કમનીયા
ઉત્તમ જ્ઞાનવાળા, દ્વેષ રૂપી અગ્નિનું ઉપશમન કરવામાં નીર સમાન, રાગ રૂપી રોગથી રહિત, સારા સ્વભાવવાળા, સૌમ્ય, અભયદાનને આપનારા હે અરિહંત પરમાત્મા ! કામ રૂપી પિશાચને ભયભીત કરનાર, मनुष्योमा श्रेष्ठ, शस्त्र रहित, विश्वेश्वर, विद्वान, वैरागी, सुजीभुवोमां श्रेष्ठ, सारी यासवाला तमे भारा उपर पारो ॥ १० ॥
६८
अर्हत्स्तोत्रम्
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राज्यत्वात्, त्यक्तराज्यस्यायुधानावश्यकत्वात् ।
ढीढञ्चासावढश्चेति ढीढा-ऽढ: = मनुष्यश्रेष्ठा-ऽनायुधः ।
पुन: कीदृश: ? ढः - ढः = विश्वेश्वर: → ढो हि विश्वेश्वरेऽपि च . [१४] इत्येकाक्षरकोषो महाक्षपणकनिर्मित:, त्रिलोक्यधिपत्वात् ।
पुन: कीदृश: ? अढढः + ढः = मूढः मूर्ख इत्यर्थः → मूढे वाद्यभेदे ढ उच्यते - [५६] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुविहिता, ढ: = मुग्धः मोहीत्यर्थः → ढ: शब्दस्तु....-मुग्धरोगेषु + [२८] इति पूर्वोक्ताजिरादिएकाक्षरीनाममालावचनाद्, ढश्चासौ ढश्चेति ढढः = मूढमुग्धः, न ढढ इति अढढः = अमूढमुग्ध: विद्वद्वर्यो विरक्तवर्य इत्यर्थः ।
पुन: कीदृश: ? ढोढो-ढढः ।
ढोढौः + ढौः = सुखी ढौः = वर्यः → ढो: सुखी वर्य: [५४] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, ढोषु ढौरिति ढोढौः = सुखिश्रेष्ठः अव्याबाधसुखस्वामित्वात् ।
ढढः + ढम् = वरम् → ढं पयो वरम् - [५४] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, ढः = गति: → ढः शब्दगतिनिर्गुणे 6 [१०] इति नत्वादिएकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, ढं ढो यस्य स ढढ: = श्रेष्ठगति: शुभविहायोगतिमत्त्वाद्, अथवा ढम् = वरम् पूर्ववद्, ढः = ध्वनि: → ढ: पिशाचे भये काले जडे गायकरागयो: ध्वनौ + [४१] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवग्रथितः, ढं ढो यस्य स ढढः = श्रेष्ठध्वनि: सुमधुरस्वरेण गीयमानत्वाद् । .
इति ढकारेणार्हत्स्तुतिः ।। १० ।।
[ढ:] अर्हत्स्तुतिः
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[णः ] अर्हत्स्तुतिः
णा-ऽणं णणं णुणा-ऽणीण
णं णणाणणणं णणः । ण ! णणा-ऽणूं णुणा-ऽणौण
मर्हन्तं त्वं सदा भज || ११ ||
ण
७०
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
णाणं णणमिति ।
हे ण ! = हे तस्कर ! → णो निर्गुणे जपे योग्ये दुष्टे क्रोडे च तस्करे ← [ ५८ ] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुप्रणीता, त्वम् अर्हन्तम् = श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् सदा = सर्वदा भज = सेवस्व इति क्रियाकारकसम्बन्धः ।
कीदृशस्त्वम् ? णण: णः = मोक्षः
णो मोक्षे ← [२३] इत्यनेकार्थतिलकः महीपसचिवरचित:, णः = रतिः रतिर्दक्षपदाग्रगः निर्वाणस्त्रिगुणाकारस्त्रिरेखो णः समीरितः ← [ ३३ ] इत्येकाक्षरीमातृकाकोशोऽज्ञातनिर्मितः, णे णो यस्य स णण: = मोक्षरति: अपवर्गाभिलाषुकत्वात् कारणवशाच्चौरत्वेऽपि निर्वाणेच्छुक इत्याशयः ।
अत्र ‘भज' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? ' त्वम्’, कं कर्मतापन्नम् ? ‘अर्हन्तम्’, कदा ? ‘सदा', किं सम्बोधनम् ? 'ण !', 'णण : ' कर्तुर्विशेषणमन्यानि कर्मणो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? णा-ऽणम् ।
ण: = निर्गुण: अर्हत्त्वादर्हतो निर्गुणत्वेन सह तुल्यार्थित्वादिकमुक्तमस्माभिर्जिनेन्द्र स्तोत्रस्य मञ्जुलाभिधानायां स्वोपज्ञवृत्तौ (मङ्गलाचरणे पृ.-९) । णा = वेदना णा स्त्री रजन्यां जायायां वेदनायामपि स्मृता ← [६२] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवविहिता, न विद्यते णा यस्य स अण: = वेदनारहितः सातस्यैवोदयात् ।
अणः
णश्चासावणश्चेति णा-ऽण: = निर्गुण-निर्वेदन:, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? णणम् णः = दुष्टः णः = जय: णो निर्गुणे [णः] अर्हत्स्तुतिः
७१
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अन्वयः
(हे) ण ! [हे तस्कर ! ] णण: त्वम् [मोक्षरतिस्त्वम् ] णा-ऽणम् [निर्गुणनिर्वेदनम्] णणम् [दुष्टजयम् ] गुणा-ऽणीणणम् [भूभूषणाऽक्षीणज्ञानदर्शनम्] णणाणणणम् [निर्वाणज्ञानाऽनिर्वाणज्ञानकृपम् ] णणा-ऽणूम् [कमलदललपन - जटारहितम् ] गुणा-ऽणौणम् [करेणुगमन-मायारतिरहितम् ] अर्हन्तम् [ श्रीतीर्थकरपरमात्मानम् ] सदा [ सर्वदा] भज [ सेवस्व ] |
७२
अर्हत्स्तोत्रम्
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जपे (जये) योग्ये दुष्टे - [५८] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुकृता, णानां णो यस्य स णण: = दुष्टजय: बाह्याभ्यन्तरसर्वरिपूणां जेतेत्याशय: अचिन्त्यबलवत्त्वात्, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? णुणा-ऽणीणणम् ।
णुण: णुः = भू: पृथ्वीत्यर्थ: → णु: करेणुर्भूः - [५५] इत्येकाक्षरनाममालिका सौभरिग्रथिता, ण: = भूषण: → ण: पुमान् बिन्दुदेवे स्याद् भूषणे 6 [१२] इति मेदिनीकोशो मेदिनीकरग्रथितः, णोर्ण इति गुण: = भूभूषण: तदलङ्कारायमाणत्वात् ।
अणीणण: + णी: = क्षीणम् → क्षीरे (क्षीणे) रणे धने धान्ये णी: 6 [५९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुगुम्फिता, णम् = ज्ञानम् → णं सरोजदले ज्ञाने - [४३] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवभणित:, णम् = दर्शनम् → णं दर्शनमिति स्मृतम् - [५६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रोक्ता, न णीरित्यणीरक्षीणमित्यर्थः, णञ्च णञ्चेति णणे, अणियौ णणे यस्य स अणीणण: = अक्षीणज्ञानदर्शन: ज्ञानावरणीयदर्शनावरणीयकर्मशून्यत्वात् ।। __णुणश्चासावणीणणश्चेति णुणा-णीणण: = भूभूषणा-ऽक्षीणज्ञानदर्शन:, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? णणाणणणम् + णः = निःश्रेयस: मोक्ष इत्यर्थः → णस्तु निःश्रेयसे 6 [२१] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्ररूपित:, णम् = ज्ञानम् → णं संशोध्यजले ज्ञाने - [६२] इत्येकाक्षरशब्दमालाउमात्यमाधवप्रणीता, णस्य णं यस्य स णण: = निर्वाणज्ञान:, न णण इत्यणण: अनिर्वाणज्ञान इत्यर्थः, णणश्चाणणश्चेति णणाणणौ = मोक्षज्ञानाइमोक्षज्ञानौ, ज्ञान्येकोऽज्ञान्यपर इति द्वयोर्भेदः, अथवास्तिकनास्तिकावित्यप्यर्थः, तयोः = उभयोरुपरि णा = कृपा → णा स्त्रियां ध्वजिनीशय्याधेनुनासाकृपासु च 6 [४३] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवनिर्मित:, यस्य स णणाणणण: = निर्वाणज्ञानाऽनिर्वाणज्ञानकृप: समदर्शित्वान्निष्पक्षत्वाच्च, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? णणा-ऽणूम् ।
णण: ७ णम् = सरोजदलम् → णं सरोजदले - [३७] इत्येकाक्षरकाण्ड [ण:] अर्हत्स्तुति:
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कमनीया
हे चोर ! मोक्ष का अभिलाषुक तुं निर्गुण, वेदना रहित, दुष्टों को जीतनेवाले, पृथ्वी के भूषण समान, अनंत ज्ञान - दर्शनमय, मुक्ति सम्बन्धी ज्ञानवाले एवं अज्ञानी जीवों पर कृपा करनेवाले, कमलदल सम (सौम्य ) मुखवाले, जटा रहित, हस्ति सम (उत्तम) गतिवाले, माया एवं रति रहित श्री अरिहंत परमात्मा का सदा भजन कर ॥११॥
કમનીયા
હે યોર ! મોક્ષની અભિલાષાવાળો તું નિર્ગુણ, વેદના વિનાના, દુષ્ટોને જીતનારા, પૃથ્વીનાં આભૂષણ સમાન, અનંત જ્ઞાન-દર્શનમય, મુક્તિ સંબંધી જ્ઞાનને જાણનારા અને નહી જાણનારા એમ ઉભય ઉપર रृपा डरनार, भलहल सम (सौम्य ) मुग्मवाना, भटारहित, हाथी सभ (ઉત્તમ) ગતિવાળા, માયા અને રતિ રહિત શ્રી અરિહંત પરમાત્માને સદા HIT GY. || 99 ||
७४
अर्हत्स्तोत्रम्
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इरुगपदण्डाधिनाथविहितः, णः = आस्यम् णो गन्धेभास्यहर्षेसु ← [33] इति नत्वादि-एकाक्षरीनाममालाऽज्ञातकृता, णवद् णो यस्य स णण: = कमलदललपनः तद्वदतीवर्जुपरमसौम्यमुखवानित्यर्थः ।
अणू: P णू: = जटा → णू: कालिन्दी सटा (जटा ) ← [ ५५ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिग्रथिता, न विद्यते शूर्यस्य स अणूः = जटारहितः केशलुञ्चनकृत्त्वात् न च शतक्रतुविज्ञप्तश्री ऋषभदेवस्य जटावत्त्वेन सदोषत्वमिति वाच्यम् तथात्वस्य कादाचित्कत्वात् न चानुलुञ्चनं वालवर्धनेनास्तु जटासहितत्वेनैव पुनस्तादवस्थ्यमेवेति वाच्यम् अर्हतोऽतिशयविशेषेणैव तदनभिवर्धनाद् तदुक्तम् → केशरोमनखश्मश्रु तवावस्थितमित्ययम् - [ ४-७ ] इति वीतरागस्तोत्रे, अथवा णू: = जरा → णू : कालिन्दी सटा (जटा ) जरा ← [ ५५ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, न विद्यते शूर्यस्य स अणू: = जरारहितः सदैव युवत्वात् 1 णणश्चासावणूश्चेति णणा-ऽणू : = कमलदललपन - जटारहितः, तम् । पुनः कीदृशम् ? णुणा-ऽणौणम् ।
णुणः णुः = करेणुः णुः करेणुः ← [ ५५ ] इति पूर्वोक्तसौभरिवचनाद्, णम् = गमनम् →णं संशोध्यजले ज्ञाने गमने परिकीर्त्यते ← [६२] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवभणिता, णुरिव णं यस्य स गुणः करेणुगमन : शुभविहायोगतित्वात् ।
=
अणौण: • णौ: = माया → णौर्माया ← [ ५६ ] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरि प्रोक्ता, णः = रतिः रतिर्दक्षपदाग्रगः निर्वाणस्त्रिगुणाकारस्त्रिरेखो
ण: समीरितः ← [३३] इति पूर्वोक्तैकाक्षरीमातृकाको शोक्तेः, णौश्च णश्चेति णौणौ, न विद्यते णौणौ यस्य स अणौण: = मायारतिरहितः निर्दम्भत्वाद
नासक्तत्वात्,
गुणश्चासावणौणश्चेति णुणा - ऽणौणः = करेणुगमन-मायारतिरहितः,
इति णकारेणार्हत्स्तुतिः ।। ११ ।।
★ ★ ★
तम् ।
[ण: ] अर्हत्स्तुतिः
७५
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[ कु:] अर्हल्स्तुतिः
कुकुकुकुकुकु कु कु
कुकुं कुकुं कुकुः कुकुः । कुकुं कुकु कुकु कु कु !
त्वमर्हन्तं भजस्व नः ! ।। १२ ।।
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ कुकारेणार्हत्स्तुति: कथ्यते । कुकुकुकुकुकुमिति ।
कुं न: ! • कुं सम्बोधने → कुं घटे कुङ्कुमे पाके सम्बोधने - [४३] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, ना = नर: स्पष्टमेव तस्य सम्बोधने, कुं न: ! = हे नर ! त्वमर्हन्तम् = त्वं श्रीसार्वपरमात्मानम् भजस्व = सेवस्व → भजी सेवायाम् - [८९५] इति हैमधातुपाठः, इति क्रियाकारकान्वयः ।
हे न: ! कीदृशस्त्वम् ? कुकुः - कुः = कोप: कुः = शिखी अग्निरित्यर्थः → कुशब्द:..... कोपे शिखिन्यपि - [२८/२९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवरचिता, कुरेव कुर्यस्य स कुकुः = कोपकृशानुः कोपाग्निदग्ध इत्यर्थः अतीव-क्रोधित्वात् ।
पुन: कीदृश: ? कुकुः • कु = निन्दा → कु निन्दायाम् + [२] इत्येकाक्षरीनानार्थकाण्ड: श्रीधरसेनाचार्यनिर्मित:, कुः = शब्द: → कुस्तु भूमौ शब्दे च - [४] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रकविविहिता, कु = निन्दाया: कव: = शब्दा: यस्य स कुकुः = निन्दाशब्दवान् सर्वेषां निन्दाकृदित्यर्थः ।
अत्र 'भजस्व' इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? 'त्वम्', कं कर्मतापन्नम् ? 'अर्हन्तम्', किं सम्बोधनम् ? 'कुं न: !', 'कुकुः' 'कुकु:' कर्तुर्विशेषणे, अपराण्यखिलानि कर्मणो विशेषणानि ।
कीदृशं श्रीअर्हन्तम् ? कुकुकुकुकुकुम् - कुः = पृथ्वी → पृथिव्यां कुः समाख्यात: 6 [८] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिकृता, कुः = पापीयान्
अतीवपापी-त्यर्थः → कुः पापीयसि 6 [१०] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: [कु:] अर्हत्स्तुतिः
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अन्वयः
कुं न: ! [हे नर !] कुकुः कुकुस्त्वम् [कोपकृशानुः निन्दाकृत् त्वम् ] कुकुकुकुकुकुम् [पृथ्वीपापीयोऽल्पपापपापनिवारकम् ] कुम् [नम्रम् ] कुकुकुम् [उपसर्गपीडानिवारकम् ] कुकुम् [ महीहारम् ] कुकुम् [ पापरहितम् ] कुकुम् [ प्रायेण मौनिनम् ] कुकुम् [कैतवनिवारकम् ] कुम् [अनुकूलम्] त्वमर्हन्तम् [त्वं श्रीसार्वपरमेश्वरम् ] भजस्व [ सेवस्व] ।
७८
अर्हत्स्तोत्रम्
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परमानन्दनन्दनग्रथितः, कु = अल्पम् कु = पापम् → कुः स्त्री भुवि कु पापेऽल्पे 6 [१९] इत्येकाक्षरकाण्ड इरुगपदण्डाधिनाथग्रथित: कु कु यस्य स कुकुः = अल्पपापी, कु = पापम् पूर्वोक्तेः, कुः = निवारणम् → कुर्भू कुत्सितशब्देषु पापीयसि निवारणे 6 [१०] इत्येकाक्षरनाममाला सुधाकलशमुनिगुम्फिता, कुश्च कुकुश्चेति कुकुकू = पापीयोऽल्पपापौ, कौ कुकुकू इति कुकुकुकू, तयोः कु = पापम् इति कुकुकुकुकु, तस्य कुः = निवारणम् स्याद् यस्मात् स कुकुकुकुकुकुः = पृथ्वीपापीयोऽल्प-पापपापनिवारकः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? कुम् - कुम् = नम्रः → कुं प्रश्नेऽपि रुषोक्तौ च प्राध्वं नम्र-6 [३] इत्येकाक्षरीनाममाला महेश्वरभणिता, अव्ययमिदं निरभिमानित्वाद्, तम् । __पुनः कीदृशम् ? कुकुकुम् - कुः = उपसर्ग: → कुशब्दस्तूपसर्गे स्याद् - [२८] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवप्रोक्ता, कुः = पीडा → कुत्सिते च पीडायाम् . [४१] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्ररूपिता, कुः = निवारणम् → कुर्धात्र्यां कुत्सिते शब्दे पापीयसि निवारणे - [३७] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रणीता, को: कुरिति कुकुस्तस्य कुर्यस्मात् स कुकुकुः = उपसर्गपीडा- निवारक: परमदयालुत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? कुकुम् - कुः = मही पृथ्वीत्यर्थः → कुर्वसुमती मही + [९३६] इत्यभिधानचिन्तामणि: श्रीहेमचन्द्राचार्यरचितः, कुः = हार: → कुशब्दस्तूपसर्गे .....हारे 6 [२८/२९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवनिर्मिता, को: कुरिव य: स कुकुः = महीहार: सर्वगुणसंपन्नत्वादर्हताऽवन्यप्यलङ्कृतेत्यर्थः, तम् । ___पुन: कीदृशम् ? कुकुम् - कु = पापम् → कु पापे - [२] इत्येकाक्षरीनाममाला महेश्वरकविविहिता, कुः = विसहित: रहित इत्यर्थः → कुशब्दस्तूप-सर्गे स्यादुर्व्या विसहितेऽपि च * [२८] इत्येकाक्षरशब्दमालाउमात्यमाधवविहिता, कु = पापम् तस्माद् कुः = रहित: इति कुकु: पापरहित: पापशून्य इत्यर्थः, तम् ।
पुन: कीदृशम् ? कुकुम् - कु = ईषदर्थे अल्प इत्यर्थः → कु निन्दायामी[कु:] अर्हत्स्तुति:
७९
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कमनीया हे मानव ! क्रोध रूपी अग्नि से प्रज्वलित एवं सर्व की निन्दा करनेवाला तुं, पृथ्वी पे बहु पापी एवं अल्प पापीओं के पाप के निवारक, नम्र, उपसर्ग की पीडा के निवारक, पृथ्वी के हार स्वरूप, पाप रहित, प्राय: मौनी, कैतव के निवारक, सर्व को अनुकूल श्री अरिहंत परमात्मा की सेवा कर ।। १२ ।।
કમનીયા હે માનવ ! ક્રોધ રૂપી અગ્નિથી પ્રજ્વલિત અને સર્વની નિન્દા કરનાર તું, પૃથ્વી પર બહુ પાપીઓનાં અને અન્ય પાપીઓનાં પાપનું નિવારણ કરનારા, નમ્ર, ઉપસર્ગની પીડાનું નિવારણ કરનાર, પૃથ્વીના હાર સ્વરૂપ, પાપરહિત, પ્રાયઃ મૌની, કેતવનું નિવારણ કરનાર, સર્વને અનુકૂળ શ્રી અરિહંતપરમાત્માની સેવા કર. / ૧૨ ||
अर्हत्स्तोत्रम्
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षदर्थे ← [२] इत्येकाक्षरीनानार्थकाण्डः श्रीधरसेनाचार्यकृतः, कुः = शब्द: कुः शब्देऽपि प्रकीर्तितः ← [८] इत्येकाक्षरकोषः पुरुषोत्तमदेवग्रथितः, कु = अल्पा: कवः = शब्दाः यस्य स कुकुः = अल्पशब्द: प्रायेण मौनीत्यर्थः, व्यर्थवचनावक्तृत्वात्, तम् ।
पुनः कीदृशम् ? कुकुम्कुः कैतवम् कुशब्दस्तूपसर्गे स्यादुर्व्या = → विसहितेऽपि च चक्रे च कैतवे [ २८/२९] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवगुम्फिता, कुः निवारणम् कुः पापीयसि मयां च निवारण - कुशब्दयोः ← [१०] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्डः परमानन्दनन्दनविरचितः स्यात् कोः कुर्यस्माद् स कुकुः = कैतवनिवारकः सद्धर्मोपदेशकत्वात्, तस्मात्तन्निवारणात्, तम् । पुनः कीदृशम् ? कुम् कुम् = अनुकूलः →कुं प्रश्नेऽपि रुषोक्तौ च प्राध्वं नम्रानुकूलयोः ← [३] इत्येकाक्षरीनाममाला महेश्वरभणिता, सर्वेषामनुकूल इत्यर्थः, तम्, अव्ययमिदम् ।
इति कुकारेणार्हत्स्तुतिः ।। १२ ।।
[कु: ] अर्हत्स्तुतिः
P
८१
,
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[ गौः] अर्हत्स्तुतिः
गोगोगो-गोगो-ऽगोगोगो
गोगोगो-गोगोगो-गो-गोः । गोगोगो-गो-ऽगोगोगो-गोरहन् सौख्यं दद्यान्माम् ।।१३।।
[विद्युन्माला]
अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ गोकारेणार्हत्स्तुतिर्निगद्यते ।
गोगोगो - इति ।
अर्हन् = श्री जिनेश्वरपरमात्मा मह्यम् सौख्यं दद्यात् = मह्यम् सुखं प्रददातु डुदांग दाने ← [ ११३८ ] इति हैमधातुपाठः ।
अत्र ‘दद्याद्’ इति क्रियापदम्, कः कर्ता ? 'अर्हन्', किं कर्मतापन्नम् ? ‘सौख्यम्’, कस्मै ? ‘मह्यम्', अन्यान्यर्हतो विशेषणानि ।
कीदृश: श्रीअर्हन् ? गोगोगो-गोगो-गोगोगो-गोगोगो-गोगोगो-गो
गोः ।
गोगोगौ: ← गौः = गुरुः → गौर्नेत्रं लज्जा गुरुः ← [२६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिप्रणीता, गौः = नक्षत्रम् → कृपा नक्षत्र .... गौ ← [२४-२६] इत्येकाक्षरकाण्डः कविराघवरचित:, गौः = हिमांशुः चन्द्र इत्यर्थ: गौ ? (गौ:) पुमान् वृषभे स्वर्गे खण्डवज्र हिमांशुषु ← [४] इत्येकाक्षरीनानार्थकाण्डः श्रीधरसेनाचार्यनिर्मितः, गाव एव गाव इति गोगावः = गुरुनक्षत्राणि तत्र गोवद् यः स गोगोगौ: = गुरुनक्षत्रनिशाकरः सुरगुरुगुरुगुरुत्वात्, नक्षत्राणां राजा राजा यथा तथैवार्हन्नपि सर्वगुरूणां गुरुर्गुरुरित्यर्थः ।
गोगौ: गौ: = भूमिः पृथ्वीत्यर्थ: गौविनायके स्वर्गे दिशि पशौ रश्मी वज्रे भूमौ ← [६] इत्येकाक्षरनाममालिका श्रीअमरचन्द्रकविविहिता, गौः = माता → गोर्वज्रे ऽप्सु... मातृषु ← [१५] इत्येकाक्षरसंज्ञकाण्डः सचिवमहीपकृतः, गावो गौरिति गोगौ: = महीमाता पृथ्वीशब्दाल्लोकत्रयी विज्ञेया तत्पातृत्वात् । गोगोगश्चासौ गोगौरिति गोगोगो-गोगौ: (५) ।
[गौ: ] अर्हत्स्तुति:
८३
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अन्वयः गोगोगो-गोगो-ऽगोगोगो-गोगोगो-गोगोगो-गो-गो: [गुरुनक्षत्रनिशाकर
महीमात्रसत्यवस्त्रवति-दर्पाद्रिदम्भोलि-पृथ्वीपुष्करप्रभाकर-पृथ्वीपतिश्रेष्ठराजपुत्र:] गोगोगो-गो-डगोगोगो-गो: [रमारामाऽरागि-चारिदुःखवद्विवारि-सुखसागरः] अर्हन् [श्रीजिनेन्द्रपरमात्मा] मह्यं सौख्यं दद्यात् [मह्यं शर्म प्रददातु] ।
अर्हत्स्तोत्रम्
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अगोगोगौ: - गौ: = सत्यम् → गौर्जलं....सत्याक्षि- + [१३/१४] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनग्रथित:, गौ: = वस्त्रम् → करणवस्त्रयो..... गौः 6 [२५/२६] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवग्रथितः, गौः = वह्निः → गौर्जलं...रश्मिवढ्योश्च - [१३/१४] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनगुम्फितः, न गौरित्यगौरसत्यमित्यर्थः, अगौरेव गौरित्यगोगौस्तत्र गौरिव य: स अगोगोगौ: = असत्यवस्त्रवह्निः असत्योच्छेदक इत्यर्थः सर्वज्ञत्वात् सदा सत्यप्ररूपणाच्च ।
गो...गौश्चासावगोगोगौरिति गो...गौ: (८)।
गोगोगौः - गौः = मद: → गौ के...मदे - [४८/४९] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासप्रोक्ता, गौ: = गिरिः → गौर्जलं वजबाणयोः वृषधेन्वोर्गिरौ * [१३] इत्येकाक्षरीयप्रथमकाण्ड: परमानन्दनन्दनप्ररूपित:, गौः = वज्रम् → गौः स्वर्गे वृषभे रश्मौ वजे - [४] इत्येकाक्षरीनाममाला महेश्वरप्रणीता, गौरेव गौरिति गोगौस्तत्र गौरिव य: स गोगोगौः = दर्पाद्रिदम्भोलि: निष्कषायत्वात्परमानविच्छेदकत्वाच्च ।
गो...गौश्चासौ गोगोगौरिति गो...गौ: (११) ।
गोगोगौः - गौ: = पृथ्वी → गौरुदके दृशि स्वर्गे दिशि पशौ रश्मौ वजे भूमौ [१-६] इत्यनेकार्थसङ्ग्रहः श्रीहेमचन्द्राचार्यरचितः, गौः = व्योम → गोशब्द इष्टिदीधितिरागिषु व्योम्नि + [३८] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवनिर्मिता, गौ: = सूर्य: → गौ के....रवौ - [४८/४९] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासविहिता, गौरेव गौरिति गोगौस्तत्र गोवद्य: स गोगोगौः = पृथ्वीपुष्करप्रभाकर: स्वज्ञानदीप्तिदेदीप्यमानत्वादज्ञानतिमिरनिवारकत्वाच्च ।
गो....गौश्चासौ गोगोगौरिति गो....गौः (१४)।
गौ: - गौ: = धरणीविभुः पृथ्वीपतिरित्यर्थः → गौः स्यात्... धरणीविभौ * [३६/३७] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकृता, राजाधिराजत्वात् ।
गो...गौश्चासौ गौश्चेति गो...गौ: (१५)। राजाधिराजस्य कुलीनत्वमस्त्येव, तदाह ।
गो: + ग: = उत्तम: → ग: प्रीतो भव: श्रीपतिरुत्तमः + [२३] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिकृता, ऊः = राजपुत्र: → ऊकार: पुरुषे चन्द्रे राजपुत्रे [गौः] अर्हत्स्तुतिः
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कमनीया
गुरु रूपी नक्षत्रों में चंद्र तुल्य, पृथ्वी की माता, असत्य रूप वस्त्र को प्रज्वलित करने में अग्नि तुल्य, मद रूपी पर्वत का विच्छेदन करने में वज्र तुल्य, पृथ्वी रूपी आकाश को प्रकाशित करने में सूर्य तुल्य, पृथ्वीपति, श्रेष्ठ राजकुमार, लक्ष्मी एवं स्त्री से विरक्त, पादचारी, दुःख रूपी अग्नि का उपशमन करने में नीर तुल्य, सुख के सागर श्री अरिहंत परमात्मा मुझे सुख प्रदान करें ।। १३ ।।
કમનીયા
ગુરુ રૂપી નક્ષત્રોમાં ચંદ્ર સમાન, પૃથ્વીની માતા, અસત્ય રૂપી વસ્ત્રને વિશે અગ્નિ સમાન, મદ રૂપી પર્વતને વિશે વજ્ર સમાન, પૃથ્વી રૂપી આકાશને પ્રકાશિત કરવામાં સૂર્ય સમાન, પૃથ્વીપતિ, શ્રેષ્ઠ રાજકુમાર, લક્ષ્મી અને સ્ત્રીથી વિરક્ત, પાદ ચારી, દુ:ખ રૂપી અગ્નિને શાંત કરવામાં નીર સમાન, સુખનાં સાગર શ્રી અરિહંત પરમાત્મા મને સુખ 2414). || 93 ||
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अर्हत्स्तोत्रम्
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6 [१८] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासग्रथिता, गश्चासावूश्चेति गो: = उत्तमराजकुमार: व्यसनविरहितत्वात् राजपुत्रस्य प्रायेण तथात्वात् ।
गो...गौश्चासौ गोश्चेति गो...गो: (१६)। पुनः कीदृश: ? गोगोगो-गो-ऽगोगोगो-गोः ।।
गोगोगौ: + गौ: = रमा लक्ष्मीरित्यर्थ: → गौर्नेत्रं लज्जा गुरु रमा [२६] इत्येकाक्षरनाममाला सौभरिगुम्फिता, गौ: = स्त्री → -स्त्रीश्रवणेषु...गौः * [२६] इत्येकाक्षरकाण्ड: कविराघवप्रोक्तः, गौः = रागी → गोशब्द इष्टिदीधितिरागिषु - [३८] इत्येकाक्षरशब्दमालाऽमात्यमाधवप्ररूपिता, गौश्च गौश्चेति गोगावौ = रमारामे न गौरित्यगौररागी विरक्त इत्यर्थः, गोगोभ्यामगौरिति गोगोऽगौः = रमारामाऽरागी वैराग्यवारिधिविलग्नत्वात् ।
गौः - गौ: = चारी पादचारीत्यर्थ: → गौरक्षिण स्वर्ग-चारिणि - [१२] इत्येकाक्षरनाममाला वररुचिप्रणीता, यानाविहारित्वात् ।
गोगोगौश्चासौ गौश्चेति गोगोगो-गौ: (४)।
अगोगोगौ: • गौः = सौख्यम् → गौ के...सौख्ये + [४८/४९] इत्येकाक्षरीनाममाला कालिदासव्यासरचिता, गौः = वह्निः → गौर्वजे...वह्वयक्षि- [१५] इत्येकाक्षरसंज्ञकाण्ड: सचिवमहीपविहितः, गौः = वारि → भूवाग्वारिषु गौ: - [५] इत्येकाक्षरीनाममाला महेश्वरकृता, न गौरित्यगौरसौख्यं दु:खमित्यर्थः, अगौरेव गौरित्यगोगौस्तत्र-तदुपशमने गोवद् य: स अगोगोगौः = दु:खवह्निवारि परदुःखनिवारकत्वाद् दु:खरहितत्वाच्च ।
गो...गौश्चासावगोगोगौश्चेति गो...गौ: (७) । दु:खशून्यस्य सर्वदा परमसुखित्वम्, तदेवाह ।
गो: • गा = सुखम् → स्त्रियां तु सुख-... गा स्मृता • [३५] इत्येकाक्षरशब्दमालाडमात्यमाधवकृता, उ: = सागर: → उ: शब्दः शङ्करे तोये तोयधौ - [९] इत्येकाक्षरनाममालिका विश्वशम्भुग्रथिता, गाया उरिति गोः = सुखसागर: परमशर्मसागरे निमग्नत्वात् ।
गो....गौश्चासौ गोश्चेति गो...गो: (८)। विद्युन्मालावृत्तम् ।। १३ ।।
इति गोकारेणार्हत्स्तुतिः । गौ:] अर्हत्स्तुतिः
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प्रशस्तिः
सम्मेताद्रौ श्रीराजेन्द्र
गुरुप्रेरणयाऽकरोद् ।
राजपुण्यशिशू राज
सुन्दरः स्तोत्रमर्हतः ||१४||
॥ इति श्रीअर्हत्स्तोत्रम् ॥
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अर्हत्स्तोत्रम्
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मनोरमा
अथ प्रशस्तिः ।
सम्मेताद्राविति ।
सम्मेताद्रौ = श्रीसम्मेतशिखरतीर्थे विंशत्यर्हन्निर्वाणकल्याणकपुण्ये श्रीराजेन्द्रगुरुप्रेरणया = कलिकुण्डतीर्थोद्धारकसम्मेतशिखरतीर्थशैलोपरित्रयोविंशतिजिनालयप्रेरणाप्रदाचार्यविजयश्रीराजेन्द्रसूरीशप्रेरणया राजपुण्यशिशुः == परमतपस्विमुनिश्रीराज पुण्यविजयस्य शिष्यः राजसुन्दरः अर्हतः स्तोत्रम् = इदं तीर्थकरस्तोत्रम् ङच्छझञटठडढणकुगोऽक्षरस्तुतिस्वरूपम् अकरोत् = व्यदधात् ।
इति प्रशस्तिः ॥ १४ ॥
प्रशस्ति:
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अन्चयः - सम्मेताद्रौ श्रीराजेन्द्रगुरुप्रेरणया राजपुण्यशिशू राजसुन्दर: अर्हतः
स्तोत्रमकरोद् ।
कमनीया श्री सम्मेतशिखरजी तीर्थ में पू. गुरुदेव श्री आ. वि. राजेन्द्र सूरीश्वरजी म.सा. की प्रेरणा से पू. मुनि श्री राजपुण्य वि.जी म.सा. के शिष्य मुनि राजसुन्दर विजय ने 'अर्हत्स्तोत्र' की रचना की ।। १४ ।।
કમનીયા શ્રી સમેતશિખરજીતીર્થમાં પૂ.ગુરુદેવ શ્રી આવિ રાજેન્દ્ર સૂરીશ્વરજી મ.સા.ની પ્રેરણાથી પૂ.મુનિ શ્રી રાજપુણ્ય વિ.જી મ.સા.ના શિષ્ય મુનિ रासुंधर विYये 'महरती'नी श्यना री || १४ ।।
९०
अर्हत्स्तोत्रम्
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प्रशस्तिः
अथ वृत्तिप्रशस्तिः ।
सुसमाधिसुधासिन्धौ संमग्नाः स्तोत्रप्रेरका: । सम्मेतशिखरे तीर्थे जिनसद्मोपदेशकाः ॥ १ ॥
संप्राप्तकलिकुण्डेशपार्श्वप्रभुकृपामृताः ।
*सदाशिषं प्रयच्छन्तु श्रीमद्राजेन्द्रसूरयः || २ || युग्मम् ॥ तत्पादाम्भोजसंलीना: श्रीराजपुण्यसाधवः ।
विजयन्तां तपस्कारा गुरवो जनकाश्च मे ।। ३ । कृपासागर - राजेन्द्रसूरिपट्टप्रभावकाः ।
श्रीराजशेखराचार्या वर्षयन्तु सदा कृपाम् ।। ४॥
६ ० २
परमेष्ठिरसव्योमपन्मितेऽब्दे हि विक्रमात् ।
इदं स्तोत्रं चतुर्मास्यां सम्मेतशिखरे कृतम् ॥ ५॥ समारम्भ इदं भाद्रपदोज्ज्वलाष्टमीदिने । भाद्रपदस्य कृष्णायामष्टम्यामपृणां तथा ।। ६ ।। स्वीयसद्गुरुसद्वाचासुधाजं सुरसालवद् ।
अर्हत्स्तोत्रमिदं विद्भिर्वाच्यमानं जयेत् सदा ।। ७ ।। स्वोपज्ञेयं च तद्वृत्तिर्मनोरमा मनोरमा । सदा मुदे विदामस्त्वितीप्सति राजसुन्दरः ।। ८ ॥ इति वृत्तिप्रशस्तिः ।
ग्रन्थाग्रम् - ६४८.५
५
॥ इति स्वोपज्ञा मनोरमाभिधा वृत्तिः ॥
* सदा आशिषमित्यर्थः, अथवा सदाशिषम् - शुभाशिषमित्यप्यर्थः सत्त्वस्यैव तत्र सत्त्वात्
1
339
९१
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॥ श्रीअर्हत्स्तोत्रम् ॥ कडं झडं थपम्यं शं खचं जढं दफं रष । गं छ टणं धबं लं सं घजं ठतं नभं वह ।। १ ।। कलिकुण्डप्रभो ! नत्वा
त्वां राजेन्द्रगुरुं तथा । अवशिष्टाक्षरैरर्हत्
स्तोत्रं प्रक्रियते मुदे || २ ॥ डडं डीडो-डडा-ऽडाडं
डाडडुडो-ऽडडं डङ ! | डाडौडौ-डडडौङ ङ !
त्वमर्हन्तं समर्च हे ! ||३|| চাচা-SSস্ত চাস্তা-SSীত
छूछ छूछ छोछं छे ! छ !। छूछाछं छा-ऽऽछीछं छोछू
__ मर्हन्तं हे ! त्वं संस्तुष्व ||४|| झझो झौझूझझा-ऽझूझो-5
झझो झझझझो झझैः । झझोऽझो झाझझोऽझेझो
जयतादर्हदीश्वरः ।।५||
अर्हत्स्तोत्रम्
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आज जज अजं जा-5
ञञञौ-अञजिं जजे ! । ओ ! जे ! जूजं जञा-ऽञानं
नमार्हन्तं तथा नुहि ।। ६ ।। टटा-टिटं टटा-ऽटै-टू
___टटं टोटो-ऽटटं टटौः ! | टीटा-ऽटटं टटौटं टौः !
स्तुष्वार्हन्तं सुभावतः ।। ७ ।। ठठे-ऽठठ ! ठठौठे-ठा-5
ठोऽ-ठूठो ! ठुठुठो ! ठठः । ठठठोऽठाठठोऽठोऽठ !
व्वमर्हन् ! विजयस्व हे ! || 6 || डाडडु डोडडाऽडीडं
डेडु डडडडं डुडो !। डडा-ऽडाडा-ऽडडं डो-ऽड
मर्हन्तं हे ! त्वमर्चय ।। ९ ।। डैढढो ढढ ! ढीढा-5ढो-5
ढढीढा-ऽढढ ! ढोऽढढः । ढोढ ! ढोढो-ढढो ढा-ऽढ !
मय्यहँ रत्वं कृपां कुरु ॥ १० ॥
अर्हत्स्तोत्रम्
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णा - Sणं णं णुणा - Sणीण
णं णाणणणं णणः ।
! णणा-Sणूं गुणा-Sणौण
मर्हन्तं त्वं सदा भज ॥ ११ ॥
कुकुकुकुकुकु कु कुं
-
कुकुं कुकुं कुकुः कुकुः ।
कुकुं कुकुं कुकुं कुंकुं !
त्वमर्हन्तं भजस्व नः ! ॥ १२ ॥
गोगोगो-गोगो-गोगोगो
गोगोगो-गोगोगो-गो-गोः ।
गोगोगो-गो-गोगोगो-गो
रहन् सौख्यं दद्यान्माम् ||१३||
सम्मेताद्रौ श्रीराजेन्द्र
गुरुप्रेरणयाकरोद् ।
राजपुण्यशिशू राज
सुन्दरः स्तोत्रमर्हतः ||१४||
॥ इति श्रीअर्हत्स्तोत्रम् ॥
९४
अर्हत्स्तोत्रम्
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‘બિનરાગસ્તોત્રમ્ વિશે પૂજ્યોનો અભિપ્રાય
તમારું એક વ્યંજન ઉપર રચના કરેલ ચોવીસ જિનની સ્તવનાનું પુસ્તક મળ્યું. ગંભીર અર્થવાળું બન્યું છે. અન્વય અર્થ સમજવાથી વ્યંજનથી જોડાયેલ શબ્દોનો અર્થ સમજવામાં આવે છે. અન્વયાર્થ ન હોય તો વ્યંજનથી બનેલ શબ્દોમાંથી અર્થ કાઢવો ઘણો અઘરો છે.
ખરેખર મૃતદેવીની કૃપાથી અને દેવગુરુના મળેલા આશીર્વાદથી આવી સુંદર સ્તુતિની રચના કરી છે તેની ભૂરિ અનુમોદના.
ઉત્તરોત્તર શ્રત દ્વારા અનેક સુંદર રચના દ્વારા જૈન શાસનની પ્રભાવના કરતાં રહો એ જ એક મંગલ કામના.
પૂ. આ. વિ. રાજેન્દ્ર સૂજી મ. (પૂ. આ. વિ. ભુવનભાનું સૂજી મ.)
કાવ્ય રચના બદલ અભિનંદન. “સૌમ્યવદના' કાવ્યનું ઘડતર બે વ્યંજનોમાં થયું, આમાં એક જ વ્યંજન વાપરીને તમે વર્તમાનમાં સંસ્કૃત સર્જન ક્ષેત્રે એક ચમત્કાર સરજ્યો છે, એમ કહેવું જ રહ્યું. મુદ્રણાદિ પણ મનોહર બન્યું છે. બે વ્યંજન-અક્ષરમય કાવ્ય, પછી એક વર્ણ-વ્યંજનમય રચના : આવા તમારા કાવ્ય-કૌશલ્યને કયા શબ્દોમાં બિરદાવવું?
પૂ. આ. વિ. પૂર્ણચંદ્ર સૂરિજી મ.
નૂતન કાવ્ય જિનરાજ સ્તોત્ર મળ્યું.
દેવગુરૂ કૃપાથી પ્રાપ્ત થયેલ શક્તિનો ખૂબ જ વિકાસ થાઓ અને જૈન શાસનમાં કાવ્ય-મહાકાવ્યનું સર્જન કરી શાસન પ્રભાવક બનો એ જ શુભકામના.
પૂ. આ. વિ. હેમપ્રભસૂ. જી મ.
'जिनराजस्तोत्रम्' प्राप्तम् । ‘सौम्यवदना'काव्यानन्तरम् शीघ्रं भवता अन्य उपहार: साहित्यजगद्मध्ये स्थापित इति महदानन्दविषयः ।
युष्माकं कृतिदर्शनेन पूर्वाचार्याणां साहित्यकृतीनां स्मरणं भवति ।
पूज्या: श्रीमुनिचन्द्रसूरीश्वराः
અભિપ્રાય
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जिनराजस्तोत्रपुस्तकमस्माभिरुपलब्धम् । भवतः सर्जनं प्रशंसार्हमिति सूचयन्तो बहूनां पूज्यानामभिप्राया अस्माभिस्तत्र पठिताः । अस्माकमपि तत्र सम्मतिः । भवन्तो नूनं साहित्यसेवा विधास्यन्तीति वयं कामयामहे ।
पूज्याः श्रीशीलचन्द्रसूरीश्वराः
अभिनव डाव्य 'विनशवस्तोत्रम्' मन्युं ... यित्तने यमद्भुत डरती हृति.... તમારી કાવ્ય કલાને ધ્વનિત કરે છે. તમારી કલ્પનાશક્તિની કલ્પના આપે છે. એકાક્ષરી કોશની યાદદાસ્તની યાદ આપે છે. તે તે સમુચિત શબ્દની શીઘ્ર સ્ફુરણાને સ્ફુરિત કરે छे. श्री 'विन-रान' प्रत्येनी तभारी अभिभ प्रीतिनी प्रतीति खाये छे.... કયા શબ્દોમાં ધન્યવાદ આપું ? તમારી પ્રતિભા જાણીને ખરેખર આનંદ થયો
छे...
તમારો જ્ઞાનાવરણનો ક્ષયોપશમ + વીયન્તિરાયનો ક્ષયોપશમ... દેવગુરુની કૃપાના તથા મા સરસ્વતીના અનુગ્રહના સહારે એક-એકથી ચઢિયાતા સોપાનો સર કરો એવી પરમકૃપાળુ પરમાત્માને પ્રાર્થના...
पुस्तकमद्य प्राप्तम् । तं पठित्वातीवानन्दस्संजात: । भवतः प्रयत्नः प्रशंसनीयोऽस्ति । एकाक्षरशब्दस्य या विविधता अर्थसंयोजना - छन्दोयोजनाश्च कृतास्ता अद्भुताः सन्ति । श्रुतज्ञानं प्रति भवद्भिः यः प्रयासः कृतस्सोऽनुमोदनीयः । एकैकश्लोक: निदिध्यासनीयोऽस्ति । एषा कृतिः नास्ति परंतु चमत्कृतिरस्ति ।
पू. मा. वि. जलयशेजर सू. भ.
पूज्याः श्रीरत्नचन्द्रसूरीश्वराः
‘जिनराजस्तोत्रम्’ पुस्तकं लब्धम् । अष्टाविंशतिशोभनकाव्येषु चतुर्विंशतितीर्थंकराणां महिमवर्णनं चित्तचमत्कारिशैल्यां भवता यत्कृतं तेन महदानन्दानुभूति: भूता । लघुवयसि लघुसंयमपर्याये च संस्कृत श्लोकसर्जने भवद्द्यत्नोऽतिभव्योऽभूत् ।
पूज्याः श्रीकलाप्रभसूरीश्वराः
-
• स्वोपज्ञ' राजहंसा' वृत्तियुतं जिनराजस्तोत्रं मिलितमवलोकितं च ।
षष्ठ- सप्तम- सदृशे स्वल्पे दीक्षाब्दे प्रथमं तावद् द्व्यक्षरीं रचनापद्धतिमुररीकृत्य
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अर्हत्स्तोत्रम्
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'सौम्यवदना'काव्यसर्जनमधुना च ततोऽपि क्लिष्टतरामेकाक्षरी रचनापद्धतिं स्वीकृत्य जिनराजरतोत्रं युष्मत्कृतं दृष्ट्वा वयं विस्मितचित्ता: सञ्जाता: । ग्रन्थस्याऽस्याऽवलोकने स्मृतिपथं समागता सूक्तिरियं यद् :
बाला अपि रवे: पादा:, पतन्त्युपरि भूभृताम् । तेजसा सह जातानां, वय: कुत्रोपयुज्यते ।
- चतुर्विंशतिजिनस्तुतिमयं स्तोत्रमिदं भक्तिभावमयमस्त्येव, परं काव्यचातुर्यमयं कल्पनाशिल्पमयं वैदुष्यमयमप्यस्ति । अन्यत्तु दूरे, 'राजहंसा'वृत्तिगतो द्वैतीयिक: श्लोकोऽपि कीदृश आहलादको यत्तत्र सप्ताऽपि विभक्तय: पकारप्रासाश्च विलसन्ति सर्वत्र ।
___ - साधुवादं दद्महे आशास्महे च यदस्मिन् ग्रन्थे समुदिता चतुर्विंशतिजिनस्तुतिः, परं भाविकाले सर्वेषामपि जिनानां स्तोत्रग्रन्थान् पृथक्पृथक्तया स्रष्टुं भवन्त: सामर्थ्यवन्त: स्युरिति ।
- पूज्या: श्रीसूर्योदयसूरीश्वराः - पूज्या: श्रीराजरत्नसूरीश्वराः
सम्प्राप्ता जिनराजस्तोत्रप्रति:,, प्रत्यवेक्ष्य संस्मृतं श्रीमहोपाध्यायवचनमिदम् - काव्यं दृष्ट्वा कवीनां हृतममृतमिति स्व:सदां पानशकी खेदं धत्ते तु मूर्जा मृदुतरहृदयः सज्जनो व्याधुतेन । ज्ञात्वा सर्वोपभोग्यं प्रसृमरमथ तत्कीर्तिपीयूषपूरं नित्यं रक्षापिधानानियतमतितरां मोदते च स्मितेन ।। इक्षुद्राक्षारसौघः कविजनवचनं दुर्जनस्याग्नियन्त्रानानार्थद्रव्ययोगात्समुपचितगुणो मद्यतां याति सद्यः । सन्तः पीत्वा यदुच्चैर्दधति हृदि मुदं घूर्णयन्त्यक्षियुग्मं स्वैरं हर्षप्रकर्षादपि च विदधते नृत्यगानप्रबन्धम् ॥ (अध्यात्मसारे २१/११, १३) स्पृहयामि सततं समाप्नुयां सुन्दराणि सौन्दराणि गुम्फनानीति
पूज्याः श्रीकल्याणबोधिसूरीश्वराः
જિનરાજ સ્તોત્રમ્’ પુસ્તક મળ્યું. પૂર્વ મહાપુરુષોની કૃતિને તમે વર્તમાનમાં જીવંત બનાવી. બેનમુન કૃતિ છે. તમારો આ જબરદસ્ત ક્ષયોપશમ અને શક્તિ ઉત્તરોત્તર શાસન સેવા કરનારી બને એ જ પરમાત્માને પ્રાર્થના....
५. Bा. श्री विमलसेन वि. म.
અભિપ્રાય
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| જિનરાજસ્તોત્રમ્ પુસ્તક મળ્યું છે. તમારી પ્રતિભાના ચમકારા આમાં છે અને તમે સ્વગુણોપાર્જિત કવિપદ પ્રાપ્ત કરી ચૂક્યા છો એની સાબિતી પણ છે. તમારી સંસ્કૃતભાષા પરની હથોટી આનંદ અને ગૌરવની અનુભૂતિ કરાવી જાય છે.
પૂ. ઉપા. શ્રી ભુવનચંદ્રજી મ.
'जिनराजस्तोत्रम्' इति ग्रन्थरत्नम् समुपलब्धम् । शतशः साधुवादाः ।
पूज्या: पं.प्र.श्रीमुक्तिचन्द्रविजयाः पूज्याः पं.प्र.श्रीमुनिचन्द्रविजयाः
“જિનરાજ સ્તોત્રમ્' અંગે શું લખાય ?
ટીકાના વિવરણ વિના સમજી ન શકાય તેવા અતિ અતિ અદ્ભૂત કાવ્યની રચના તમે કરી છે ? કે ખરેખર સરસ્વતી માતાએ તમારા મગજ - કલમ પર આસન જમાવી પૂર્વકાળના કાંક વિરલ-અદ્ભુત કાવ્ય રચનાકાર મહાપુરુષની યાદ અપાવી છે?
જરાય આવું ન મૂકાય અને અત્યારના કાશી જેવા જ્ઞાનનગરના પંડિતોને ચેલેંજ આપી શકાય તેવી અદ્ભુત તમારી કાવ્યરચના છે.
ખૂબ ખૂબ ધન્યવાદ - અનુમોદના તમારી આ કાવ્યશક્તિની....
પૂ.પં.પ્ર.શ્રી નંદીભૂષણ વિ.જી ગણી
જિનરાજ સ્તોત્ર મળ્યું. કમાલ..કમાલ...કમાલ.. આટલી બધી નાની ઉંમર... માત્ર ૭ વર્ષના નાના દીક્ષા પર્યાયમાં સખત, સતત અને સરસ પરિશ્રમ કરવા દ્વારા સ્તોત્રનું સર્જન કર્યું છે. શ્રમણ-શ્રમણી સમુદાયમાં પ્રશંસનીય બન્યું છે. આદરણીય બન્યું છે. તમારું શ્રુતસર્જનનું કાર્ય વિઘ્ન વિના, વિલંબ વિના સતત ચાલતું રહો.
પૂ. મુનિશ્રી કલ્યરક્ષિત વિ.જી મ.
सम्प्राप्तं जिनराजस्तोत्रम्, अत्र विजृम्भितः कविवैदुष्यविलासः, मुखरितो भक्तिप्राग्भारः, परम्पराऽनुकूला कल्पना, सरलाऽर्थरचना, रसपूर्णः शब्दस्तोक एवमेकाक्षरी-कृतये यदपेक्ष्यते तदुपपन्नमिति सुन्दरेयं कृतिः।
कृत्यतया भवान् भवतो गुरुपरम्परा समुदायश्च निःशङ्कगौरवमण्डिता भविष्यन्ति । भवतो बुद्धिदीपस्य कान्तिरभितोवर्धतान्तया च रोचिष्णुकाव्यवर्तुलाः प्रत्यग्रं प्रसुवतामित्याशासे
पूज्याः श्रीहितवर्धनविजयाः
अर्हत्स्तोत्रम्
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प्रभुकृपाऽतिसुन्दरं गुरुकृपाऽतिसुन्दरं संस्कृतकृपाऽतिसुन्दरं छन्दःकृपाऽतिसुन्दरं स्वाध्यायकृपाऽतिसुन्दरं क्षयोपशमकृपाऽतिसुन्दरं मातृकृपाऽतिसुन्दरं पितृकृपाऽतिसुन्दरं लेखनकृपाऽतिसुन्दरं शारदाकृपाऽतिसुन्दरं सुन्दरम् - सुन्दरम् – सुन्दरम् - सुन्दरम् ।
जिनालये जिनराजः... उपाश्रये गुरुराजः... समुदाये मुनिराजः... सौराष्ट्र गिरिराजः... सर्वत्र राज - राज - राज - राजिः अपितु ग्रन्थे निपुणम् छन्दसि कुशलम् एतानि सर्वाणि सुन्दराणि कस्मिन् मुनौ वर्तते ? तस्य राजसुन्दरमुनेरहमप्यनुमोदनाङ्करोमि ।
पूज्याः श्रीहेमहर्षविजयाः
“જિનરાજસ્તોત્રમ” જોઈ આનંદ થયો. સાત વર્ષના દીક્ષાપર્યાયમાં સંસ્કૃત ભાષામાં નૂતન કાવ્યરચનાઓનું સર્જન અનુમોદનીય છે. આપનો પુરુષાર્થ અવિરત ચાલુ રહે તેવી શુભેચ્છા.
- पू. मुनि श्री हुशवडीतिवि. म.
भवता सूद्योगेन रचितं 'जिनराजस्तोत्रम्' प्राप्तम् । दृश्यन्नेवोल्लसितभवत्प्रतिबहुमानपूरितहृदयाभ्यामस्माभ्यां मुखादहोवादः प्रसरितः। भवद्रचनाया मनसि स्फूरितमुत 'मनुष्यजीवनमुद्यानसमं न भवेत् यत्र सर्वजनाश्चलन्ति किन्तु नभःसमं भवेत् यत्र सर्वे भ्रमितुमिच्छन्ति' । खलु भवादृशाः प्रारब्धमुत्तमजना न परित्यजन्ति । गुरुकृपाप्रकटिता भवदुत्साहवैदुष्यभ्यासता आवां पुनः पुनः अनुमोदयावः । एवं नूतनकाव्यानि विरच्य लोकहदि जिनगुरुसंस्कृतभाषासु अनुक्रमशः भक्तिसमर्पणाध्ययनजिज्ञासा भवेयुरिति अभिलाषा।
पूज्याः श्रीमलयगिरिविजयाः पूज्याः श्रीभाग्यहंसविजयाः
કલિકુંડ તીર્થોદ્ધારક પ.પૂ.આ.વિ. રાજેન્દ્રસૂરીશ્વરજી મ.સા.ના શિષ્યરત્ના તપસ્વી પૂ. મુનિશ્રી રાજપુણ્યવિજયજી મ.સા. ના શિષ્યરત્ન પૂ. મુનિશ્રી રાજસુંદરવિજયજી મ.સા.
જેઓ નાની વયમાં સંસ્કૃત ભાષા પર પક્ક મેળવીને પોતાને મળેલા જ્ઞાનનો સ્વ-પરના લાભ માટે ઉપયોગ કરવા તત્પર બન્યા છે.
સંસ્કૃત ભણ્યા પછી સંસ્કૃત ભાષામાં ગ્રંથની રચના કરવી ખૂબ કઠિન કામ છે. જ્યારે પધમાં રચના (શ્લોક રૂપે) કરવી એ તો સામાન્ય વ્યક્તિ માટે ગજા બહારની વાત કહી શકાય.
જ્યારે પૂજ્ય વિદ્વાન મુનિશ્રી પદ્યરચનામાં પણ બે ડગલાં આગળ વધીને એકાક્ષરી શ્લોકોની રચના કરી છે. એ રચનામાં વિદ્વત્તા ઓર ખીલી છે, ખૂલી છે. પૂ.મુનિશ્રીએ ૨૪ ભગવાનની સ્તુતિમાં ક થી ૭ સુધીના અક્ષરોનો ઉપયોગ કર્યો છે. અભિપ્રાય
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ત્રીજા
અર્થાત્ એક ભગવાનની સ્તુમાં ‘ક', બીજા ભગવાનની સ્તુતિમાં માત્ર ‘ખ’, ભગવાનની સ્તુતિમાં ‘ગ’ એ પ્રમાણે ‘ હ સુધીના ૨૪ વ્યંજનોનો ઉપયોગ કરીને રચના કરી છે. માત્ર ૩, જી, જ્ઞ, ૮, ૯, ૩, ૩, ૪, ૫ વ્યંજનોનો જ ઉપયોગ નથી કર્યો.
પ્રત્યેક એકાક્ષરી શ્લોકમાં અદ્ભુત કવિત્વની છાંટ જોવા મળે છે.
‘જિનરાજ સ્તોત્ર' ગ્રંથના પ્રારંભમાં મંગલાચરણમાં દ્દ થી માંડી સ સુધીના ૩૨ વ્યંજનો ક્રમશઃ આપવામાં આવ્યા છે. અને સ્વરો માં માત્ર ૬ અને ઞ નો જ ઉપયોગ કર્યાં છે.
આ ગ્રંથની ‘રાજહંસાવૃત્તિ' નામે સ્વોપજ્ઞ વૃત્તિની રચના કરવામાં આવી છે. જે ‘વિદ્યાગુરુ’ના ઉપકારસ્મરણ માટે રચના કરવામાં આવી છે. પ્રત્યેક શ્લોકનો અનુવાદ 'રાજરશ્મિ' નામાભિધાનથી પ્રગટ કરેલ છે.
આ કાવ્યસ્તોત્ર ગ્રંથમાં કલિકુંડ તીર્થોદ્ધારક પૂજ્યશ્રીએ સંસ્કૃત ભાષામાં મંગલ આશીર્વાદ પાઠવ્યા છે અને શાસનપ્રભાવક ૫.પૂ.આ.વિ. યશોવિજયસૂરીશ્વરજી મ.સા. ‘એક યુગનો પુનરવતાર' નામે પ્રસ્તાવના આલેખી છે. પરમવિદ્વાન ગણિવર્ય શ્રી યશોવિજયજી મ.સા. સંસ્કૃત ભાષામાં પ્રસ્તુત ગ્રંથની પ્રસ્તાવના આલેખી છે.
દીક્ષાનાં માત્ર સાત વર્ષમાં આ દ્વિતીય ગ્રંથની રચના પૂજ્ય મુનિશ્રીએ કરી છે. લગભગ અઢીથી ત્રણ મહિનાની અંદર આ ગ્રંથની રચના પૂ. મુનિશ્રીએ કરી છે. લગભગ ૧૨૫૦ શ્લોકમાન ધરાવતા આ ગ્રંથ ખરેખર વિદ્વદ્ભોગ્ય બન્યો છે. એટલું જ નહીં નવોદિત વિદ્વાન અભ્યાસુઓને આંગળીચીંધણું કરતો પૂજ્ય મુનિશ્રીનો આ પ્રયાસ સ્તુત્ય છે, અભિનંદનીય છે.
છેલ્લે મુનિશ્રી દ્વારા આલેખિત પ્રથમ કાવ્યગ્રંથ ‘સૌમ્યવદનાકાવ્યમ્’ ગ્રંથ પૂજ્ય વિદ્વાન આચાર્ય ભગવંતાદિએ અભિનંદન પાઠવેલ પત્રોનું સંકલન છે.
હજુ પણ આવા અનેક ગ્રંથોની રચના પૂજ્ય મુનિશ્રી કરતા રહે અને શાસનને જ્ઞાનનો ખજાનો આપતા રહે એવી મંગલ આશા.
શાન્તિસૌરભ (માસિક) ફેબ્રુઆરી - ૨૦૧૦
‘સૌમ્યવદના' નામક રચનાથી સકળ સંઘમાં અને સવિશેષતઃ વિદ્વર્ગમાં એકી અવાજે આવકાર પામેલા કવિ મુનિ શ્રી રાજસુંદર વિજયજી મહારાજે વર્તમાનકાળમાં જેને ચમત્કાર જ ગણી શકાય એવા કૌશલ્ય પૂર્વક એક જ વર્ણમય ૨૪ જિનની સ્તવના કાવ્યરૂપે ગુંથતા એ રચના ખૂબ જ સુંદર રૂપરંગમાં ‘બિનરાગસ્તોત્રમ્’ ના નામે પ્રકાશિત થવા પામી છે. સૌમ્યવદના કાવ્ય દ્વિવર્ણમય હતું, તોય વિદ્વાનોએ એને મુક્ત મને વખાણ્યું હતું. જ્યારે પ્રસ્તુત ‘જિનરાજકાવ્ય' તો માત્ર એક અક્ષરમાંથી જ સ્વરના સંયોજનથી બનેલા શબ્દોમાંથી નમનિર્મિત બન્યું છે, એથી આને વધાવતા વિદ્વાનોના ચહેરે આશ્ચર્યચક્તિતા ચમક્યા વિના નહિ જ રહે. છેલ્લા ઘણા વર્ષોના ઈતિહાસમાં
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अर्हत्स्तोत्रम्
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આવી કાવ્યરચના પ્રથમવાર જ કરવાનું શ્રેય પૂ. મુનિશ્રીના શિરે અંકિત કરવું જ રહ્યું. ગુજરાતી કાવ્યરચના પણ સહેલી નથી, ત્યાં સંસ્કૃતમાં આવી રચના માત્ર એક-એક અક્ષર-વ્યંજનમાંથી શબ્દોને ગુંથીને કરવી, એ તો ક્યાંથી સહેલી હોય. પણ મુનિશ્રી આવી રચનામાં સફ્ળ સિદ્ધ થયા છે, આવી વિદ્વત્તાનો સૌ રસાસ્વાદ માણી શકે, એ માટે સંસ્કૃતમાં રાજહંસાવૃત્તિ અને ગુજરાતીમાં રાજરશ્મિ નામક અનુવાદ સહિત મુદ્રિત આ કાવ્ય પ્રકાશનને ‘સૌમ્યવદના' કરતા અનેક ગણો આવકાર મળી રહેશે, એ નક્કી છે.
અભિપ્રાય
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કલ્યાણ (માસિક) એપ્રીલ-૨૦૧૦
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નોંધ
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________________ जिनेन्द्रस्तोत्रम् | પ્રિન્ટીંગ:ક્યજિનેન્દ્ર અમદાવાદ, મો:૯૮૨૫૦ ૨૪ર૦૪