Book Title: Shatrunjay Tirthmala Ras
Author(s): Nirnaysagar Press
Publisher: Nirnaysagar Press
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श्रीगौतमायनमः ॥ अथ श्रीसिद्धगिरिस्तुति प्रारंनः ॥
॥ दोहा ॥ ॥ श्री शादीश्वर अजर अमर. अव्याबाध अर नीश ॥ परमातम परमेसरू, प्रणामुं परम मुनीश ॥१॥ जय जय जगपति ज्ञाननान, जासित लोकालोक । शुरूस्वरूप समाधिमय, नमित सुरासुर थोक ॥ ३ ॥ श्रीसिहाचल मंमणो, नानिनरेसर नंद ॥ मिथ्यामति मत जणो, नविकुमुदाकर चंद ॥३॥ पूरव नवाणु जस सिरे, समवसस्या जगनाथ ॥ ते सिक्षाचल प्रण मीयें, नक्तं जोडी हाथ ॥४॥ अनंतजीव इणी गिरि वरें, पाम्या नवनो पार ॥ ते सिक्षा॥ लहिये मंगत माल ॥ ५ ॥ जस शिर मुकुट मनोहरू, मरुदेवानो नद॥ ते सा॥का सदा सुखवद ॥६॥ माहमा जेहनी दाखवा, सुरगुरु पण मतिमंद ॥ ते तोर्येश्वर प्रणमी, प्रगटे सहजानंद ॥ ७॥ सत्ताधर्म समारवा, कारण जेह पमूर ॥ते तीर्थे०॥ नाशे बघ सवि दूर॥७॥ कर्म काट सवि टालवा, जेहनुं ध्यान दूताश ॥ ते तीर्थ ॥ पामीजें सुखवास ॥ ५ ॥ परमानंद दशा ल
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