Book Title: Samudrik Shastram
Author(s): Mansukhlal Hiralal
Publisher: Hiralal Hansraj Shravak
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(१२) खितो नित्यं । धनहीनो न संशयः ॥ ६० ।। इति रुधिरलक्षणं ॥ विस्तीर्णा च कटिः स्निग्धा । शुभा प्रौढा प्रशस्यते ॥ निर्मासास्थि. कटिईया । नराणां दुःखदायिनी ॥६१॥ सिं. हव्याघसमा येषां । कटिस्ते दंगनायकाः ॥ र. दोवानरतुल्या च । कटियेषां न शोनना ॥ ॥ ६ ॥ इति कटिलदणं ॥ मृगोदरो नरो दरिडी थाय . ॥ ६० ॥ एवीरीते रुधिरनां लक्षण कयां . ॥ मनुष्यनी विशाल प्रौढ यने मृदु काट वखणाय ने. मांसरहित तथा हाडकांवाळी कटि दुःख थापे ।। ६१॥ सिंह घने व्याघजेवी जेननी कटि होय ते सेना. पति थाय , पण रादास धने वानरजेवीक. हिसारी कहेवाती नथी. ॥ ६॥ एवीरीते कटिनां लक्षण कह्यां ने. ॥ हरिण मोर अने
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