Book Title: Khartar Gaccha Ka Itihas
Author(s): Gyansundar Maharaj
Publisher: Ratnaprabhakar Gyan Pushpmala

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Page 197
________________ १९७ विजयहीरसूरि ने डाला था या जिनचन्द्रसूरि ने? बादशाह के राज में विजयहीरसूरि का मान था या जिनचन्द्रसूरि का? इन सब बातों को तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाय तो अव्वल नम्बर विजयहीरसूरि का ही रहेगा फिर बिचारे जिनचंद्रसूरि को अकबर प्रतिबोधक कहना यह उनके लिये एक कलंक की ही बात है। जैसे राजा आम को बप्पभट्टसूरि ने प्रतिबोध दिया तथा राजा कुमारपाल को कलिकालसर्वज्ञ भगवान हेमचन्द्रसूरि ने प्रतिबोध दिया था। यदि बाद में कोई भी आचार्य उन राजाओं से मिले होंगे तो क्या मिलने वाले आचार्य उन राजाओं के प्रतिबोधक बन सकते हैं? नहीं। तो फिर वि. सं. १६३९ में विजयहीरसूरि ने बादशाह अकबर को प्रतिबोध दिया बाद १६४८ में जिनचंद्रसूरि बादशाह से मिले तो क्या इसको प्रतिबोधक कहा जा सकता है? नहीं कदापी नहीं ! खरतरों ने जिस प्रकार बादशाह अकबर को जिनचंद्र के प्रतिबोध देने का एक कल्पित ढांचा खड़ा किया है। इसी प्रकार जिनचंद्र ने बादशाह की सभा में मुल्ला की टोपी आकाश में उड़ाकर उसको अपने ओघे से ठोक कर मंगाई तथा बकरी वाली घटना लिखी हैं, यह भी कल्पना का कलेवर के अलावा कुछ भी नहीं है। कारण, यदि जिनचन्द्र ने इस प्रकार का काम किया होता तो बादशाह अकबर का इतिहास आज अंधेरे में नहीं है। यह बात किसी न किसी विद्वान द्वारा अवश्य लिखी जाती। पर इस बात की इतिहास में गन्ध तक भी नहीं मिलती हैं। अतः खरतरों ने जिनचंद्र का महत्व बढ़ाने के लिये इस प्रकार की झूठी बातें लिख डाली हैं। इसी प्रकार जिनचंद्र के जीवन में श्रीअभयदेवसूरि को खरतर बनाने की एक गप्प लिख डाली है। पर जब खरतर शब्द की उत्पत्ति ही जिनदत्तसरि से हुई है तो अभयदेवसूरि खरतर हो ही कैसे सकते हैं ? इतना ही क्यों पर अभयदेवसूरि के साथ खरतरों का कुछ सम्बन्ध ही नहीं है। क्योंकि अभयदेवसूरि हुये हैं चान्द्रकुल में तब खरतरमत की उत्पत्ति हुई है कुर्चपुरा गच्छीय जिनवल्लभ के पट्टधर जिनदत्तसूरि से। अतएव खरतर वरमाल अभयदेवसूरि के कंठ में नहीं पर खरतरों के गले में ही शोभा देगी, इस विषय का विस्तृत लेख खरतर गच्छोत्पत्ति भाग १-२ में कर दिया है अतः वहां से देख लेना चाहिये। कई अनभिज्ञ खरतर यतियों के धोखे में आकर यह भी कह देते हैं कि खरतराचार्यों ने नदी के बीच खड़े रह कर पांच पीरों की साधना कर उनको वश में कर लिये इत्यादि । खरतरों ने जैसे जिनेश्वरसूरि और चैत्यवासियों के शास्त्रार्थ का कल्पित चित्र तथा जिनचन्द्रसूरि और मुल्ला की टोपी का जाली चित्र बनाया

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