Book Title: Dravyanuyoga Part 2
Author(s): Kanhaiyalal Maharaj & Others
Publisher: Agam Anuyog Prakashan

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Page 732
________________ वुक्कंति अध्ययन प. जइ भवणवइसु उववज्जंति, किं असुरकुमारेसु उववज्जति जाव थणियकुमारेसु उववजंति? उ. गोयमा ! सव्वेसु चेव उववज्जंति। एवं वाणमंतर-जोइसिय-वेमाणिएसु निरंतर उववज्जंति जाव सहस्सारो कप्पो त्ति। -पण्ण. प.६, सु. ६७०-६७२ प. (सम्मुच्छिम जलयरा णं भंते) अणंतरं उव्वट्टित्ता कहिं गच्छंति, कहिं उववज्जति? उ. (गोयमा!) नेरइएसु वि, तिरिक्खजोणिएसु वि, मणुस्सेसु वि, देवेसु वि उववज्जंति। नेरइएसु रयणप्पहाए पुढवीए उववज्जंति सेसेसु पडिसेहो। तिरिएसु सव्वेसु उववज्जंति संखेज्जवासाउएसु वि, असंखेज्जवासाउएसु वि, चउप्पएसु वि, पक्खीसु वि। मणुस्सेसु सव्वेसु कम्मभूमिएसु, नो अकम्मभूमिएसु, अंतरदीवएसु वि, संखेज्जवासाउएसु वि, असंखेज्जवासाउएसु वि, पज्जत्तएसुवि, अपज्जत्तएसु वि। देवेसु जाव वाणतमंतरा। थलयराणं खहयराण वि एवं चेव। -जीवा. पडि. १, सु.३५ प. गब्भवक्कंतिय भुयगपरिसप्प थलयर पंचिंदयतिरिक्ख जोणिया णं भन्ते ! उव्वट्टित्ता कहिं गच्छंति? उ. गोयमा ! उव्वट्टित्ता दोच्चं पुढविं गच्छंति, उरगपरिसप्प थलयर पंचिंदियतिरिक्खजोणिया उव्वट्टित्ता पंचमिं पुढविं गच्छति। चउप्पय थलयर पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया उव्वट्टित्ता चउत्थिं पुढविं गच्छति। जलयर पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया उव्वट्टित्ता अहे सत्तम पुढविं गच्छति। खहयर पंचिंदिय तिरिक्खजोणिया उव्वट्टित्ता तच्चं पुढविं गच्छति। -जीवा. पडि. ३, उ.१, सु. ९७(२) प. दं. २१. मणुस्सा णं भंते ! अणंतरं उव्वट्टित्ता कहिं गच्छंति, कहिं उववज्जति? किं नेरइएसु उववज्जति जाव देवेसु उववज्जंति? १४७१ ) प्र. यदि (वे) भवनपति देवों में उत्पन्न होते हैं तो क्या असुरकुमारों में उत्पन्न होते हैं यावत् स्तनितकुमारों में उत्पन्न होते हैं? उ. गौतम ! (वे) सभी (भवनपतियों) में उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार वाणव्यन्तरों,ज्योतिष्कों और सहनारकल्प पर्यन्त के वैमानिक देवों में निरन्तर उत्पन्न होते हैं। प्र. (भन्ते ! सम्मूर्छिम जलचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक) अनन्तर उद्वर्तन करके कहां जाते हैं, कहाँ उत्पन्न होते हैं? उ. गौतम ! नैरयिकों, तिर्यञ्चयोनिकों, मनुष्यों और देवों में उत्पन्न होते हैं। नैरयिकों में रलप्रभा पृथ्वी तक उत्पन्न होते हैं, शेष पृथ्वियों का निषेध करना चाहिए। तिर्यञ्चों में उत्पन्न हों तो संख्यात वर्षायुष्क, असंख्यात वर्षायुष्क, चतुष्पद और पक्षियों के सभी प्रकारों में उत्पन्न होते हैं। मनुष्यों में उत्पन्न होने पर सभी कर्मभूमिजों के मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं। किन्तु अकर्मभूमिजों में उत्पन्न नहीं होते हैं। संख्यात वर्षायुष्क, असंख्यात वर्षायुष्क पर्याप्त और अपर्याप्त अन्तर्वीपजों में उत्पन्न होते हैं। देवों में वाणव्यन्तर पर्यन्त उत्पन्न होते हैं। स्थलचर और खेचर के लिए भी इसी प्रकार कहना चाहिए। प्र. भन्ते ! गर्भज भुजपरिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक मरकर कहां उत्पन्न होते हैं? उ. गौतम ! वे मरकर दूसरी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं। उरग परिसर्प स्थलचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक मरकर पांचवीं पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं चतुष्पद स्थलचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक मरकर चौथी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं। जलचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक मरकर अधःसप्तम पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं। खेचर पंचेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक मरकर तीसरी पृथ्वी में उत्पन्न होते हैं। प्र. दं.२१. भन्ते ! मनुष्य अनन्तर उद्वर्तन करके कहां जाते हैं, कहां उत्पन्न होते हैं? क्या वे नैरयिकों में उत्पन्न होते हैं यावत् देवों में उत्पन्न होते हैं? उ. गौतम ! (वे) नैरयिकों में भी उत्पन्न होते हैं यावत् देवों में भी उत्पन्न होते हैं। प्र. (भंते ! सम्मूर्छिम मनुष्य) अनन्तर उद्वर्तन करके कहां जाते हैं, कहां उत्पन्न होते हैं ? उ. गोयमा ! नेरइएसु वि उववज्जति जाव देवेसु वि उववज्जति। -पण्ण. प.६, सु. ६७३/१ प. (सम्मुच्छिम-मणुस्सा णं भंते !) अणंतर उव्वट्टित्ता कहिं गच्छंति, कहिं उववज्जति? १. जीवा पडि.१, सु. ३८-४0 वहाँ पर गर्भज जलचर थलचर खेचर की अपेक्षा यह वर्णन है। २. जीवा. पडि.३, उ.१, सु. ९७

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