Book Title: Dravyanuyoga Part 2
Author(s): Kanhaiyalal Maharaj & Others
Publisher: Agam Anuyog Prakashan

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Page 796
________________ १५३५ वुक्कंति अध्ययन "सयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववज्जति, नो असयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववज्जंति?" उ. गंगेया ! कम्मोदएणं कम्मगुरुयत्ताए, कम्मभारियत्ताए, कम्मगुरुसंभारियत्ताए, सुभासुभाणं कम्माणं उदएणं, सुभासुभाणं कम्माण विवागणं, सुभासुभाणं कम्माणं फलविवागेणं सयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववजंति, नो असयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववज्जति। से तेणटेणं गंगेया ! एवं वुच्चइ"सयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववज्जति, नो असयं पुढविकाइया पुढविकाइयत्ताए उववज्जति। दं.१३-२१. एवं जाव मणुस्सा। दं. २२-२४. वाणमंतर, जोइसिय, वेमाणिया जहा असुरकुमारा। "पृथ्वीकायिक, पृथ्वीकायिकों में स्वयं उत्पन्न होते हैं, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते हैं?" उ. गांगेय ! कर्मों के उदय से, कर्मों की गुरुता से, कर्मों के भारीपन से, कर्मों के अत्यन्त गुरुत्व और भारीपन से, शुभाशुभ कर्मों के उदय से, शुभाशुभ कर्मों के विपाक से, शुभाशुभ कर्मों के फल-विपाक से स्वयं पृथ्वीकायिक, पृथ्वीकायिकों में उत्पन्न होते हैं, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते हैं। तप्पभिई च णं से गंगेये अणगारे समणं भगवं महावीरे पच्चभिजाणइ सव्वण्णू सव्वदरिसी। इस कारण से गांगेय ! ऐसा कहा जाता है कि"पृथ्वीकायिक स्वयं पथ्वीकायिकों में उत्पन्न होते हैं, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते हैं।" दं.१३-२१. इसी प्रकार मनुष्य पर्यन्त जानना चाहिए। दं. २२-२४. जिस प्रकार असुरकुमारों के विषय में कहा, उसी प्रकार वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकों के विषय में भी जानना चाहिए। तब से (इन प्रश्नोत्तरों के पश्चात्) गांगेय अनगार ने श्रमण भगवान् महावीर को सर्वज्ञ और सर्वदर्शी के रूप में पहचाना। इसके पश्चात् गांगेय अनगार ने श्रमण भगवान महावीर को तीन बार आदक्षिणा प्रदक्षिणा की, वन्दन नमस्कार किया और इस प्रकार निवेदन कियाभन्ते ! मैं आपके पास चातुर्यामरूप धर्म से पंचमहाव्रतरूप धर्म को अंगीकार करना चाहता हूँ। इस प्रकार सारा वर्णन प्रथम शतक के नौवें उद्देशक में कथित कालास्यवेषिकपुत्र अनगार के समान जानना चाहिए यावत् गांगेय अनगार सिद्ध बुद्ध मुक्त यावत् सर्वदुःखों से रहित बने। तए णं से गंगेये अणगारे समणं भगवं महावीर तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेइ, करेत्ता वंदइ नमसइ, वंदित्ता, नमंसित्ता एवं वयासीइच्छामि णं भंते ! तुब्भं अंतियं चाउज्जामाओ धम्माओ पंचमहव्वइयं एवं जहा कालासवेसियपत्तो तहेव भाणियव्वं जाव सव्वदुक्खप्पहीणे। -विया. स. ९, उ. २, स. ५२-५८

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