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प्रवचन-६६
१९४ जैनी दीक्षा दे दे। यदि मैं लूँगी तो मेरे प्रति अत्यन्त स्नेहशील परिवार भी दीक्षा ग्रहण करेगा।' __श्री आर्यरक्षित ने कहा : 'हे माता! इस लोक में तू ही तीर्थ है। जैसे तू कहती है वैसे तुझे मैं दीक्षा दूंगा।'
श्री आर्यरक्षितसूरिजी ने माता को दीक्षा दे दी। रुद्रसोमा के साथ-साथ सोमदेव ने भी दीक्षा ली। पुत्री और दामाद ने भी दीक्षा ली। सारा परिवार दीक्षित बन गया।
कैसा स्नेह, सरलता और सहिष्णुता से सुशोभित परिवार होगा! आर्यरक्षित के प्रति सारे परिवार को स्नेह था! रुद्रसोमा के प्रति सारे परिवार को प्रेम था! एक-दूसरे के धर्म भिन्न होते हुए भी परस्पर प्रेम था! चूँकि वे लोग सरल थे। सहिष्णु थे। इन मौलिक गुणों ने इस परिवार को चारित्री बनाया।
रुद्रसोमा और सोमदेव ने संतानों के प्रति अपने कर्तव्यों का कैसा सुन्दर पालन किया होगा? कैसे सुसंस्कारों का सिंचन किया होगा? संतानों के प्रति माता-पिता के जो कर्तव्य हैं, उन कर्तव्यों का पालन माता-पिता को करना ही चाहिए।
१. संतानों का पालन। २. संतानों को शिक्षादान । ३. देव-गुरु-धर्म से परिचय। ४. स्वजनों का परिचय। ५. उत्तम व्यक्तियों के साथ मैत्री।
संतानों का पालन करते समय, जब वे बच्चे होते हैं, बड़ा ख्याल रखना चाहिए | कैसे वस्त्र पहनना, कैसे खाना-पीना, कैसे बोलना....ये सारी प्राथमिक बातें बच्चे छोटे होते हैं तभी सीखते हैं। माता सुशिक्षित होगी, जीवन जीने की दृष्टि उसके पास होगी तो ही वह संतानों को प्रशिक्षित कर सकेगी। छोटे छोटे बच्चों को कभी गालियाँ बोलते सुनता हूँ....तो मेरा मन खिन्न हो जाता है। घर में माता-पिता स्वयं गालियाँ बोलते हों तो बच्चे भी वैसी ही भाषा सीखेंगे न?
जब बच्चों में बुद्धि आती है तब उनको व्यावहारिक शिक्षा देनी चाहिए। व्यावहारिक शिक्षा का प्रश्न विकट बन गया है। शिक्षा का स्तर आज गिर गया
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