Book Title: Anusandhan 2004 03 SrNo 27
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 35
________________ 28 अनुसंधान-२७ (6) ला.१नी भूमिकामां आ रासना रचनासमय विषे अटकळ करतां नोंधेलु के 'छतां तेनी रचना विजयसेनसूरिमहाराजनी विद्यमानतामां ज थई होय, अथवा तो आ समग्र घटनाक्रमना कर्ता स्वयं साक्षी पण रह्या होय अने तेमणे आंखे देख्यो हेवाल आ रासरूपे लख्यो होय, तेवी शक्यता वधु लागे छे.'- आ नोंध ला.२नी वाचना द्वारा प्राप्त निम्नांकित पंक्तिओ जोतां यथार्थ होवानुं सिद्ध थाय छे. कर्ता रासनुं समापन करतां लखे छे के आगरइ सहइरि श्रीपासपसाउलइ संवत सोल उगणपंचासइ । कल्याणकुशल गुरुराज कल्याणकर सीस दयाकुशल मनिरंगि भासइ । अर्थात् आगरा शहेरमां संवत १६४९मां दयाकुशले आ रास रच्यो छे. विजयसेनसूरिनो शाह पासे जवा-रहेवानो समय पण आ ज छ; अने कवि ते वखते तेमनी साथे होवा जोईए. 6 (7) ला.१मां जे अंश नथी, ते अंश ला-२ मां मळवाथी खूटती विगतो जाणी शकाय छे. ते आ प्रमाणे : शाहनो संदेशो (आमंत्रण) आव्या पछी गुरु-शिष्य (विजय हीर, विजयसेन) एक स्थाने बेसीने चर्चा करे छे. तेमां शिष्यनी गुरुने मूकीने जवानी अनिच्छा, गुरुनी मोकलवानी भावना, अने शिष्यनी गुरुवचनने न उत्थापवानी तत्परता एकदम अल्प शब्दोमां ज ध्वनित थाय छे. (कडी ४७४९). विजयसेनसूरिनुं मूळ नाम जेसींग-जयसिंह हतुं, तथा गुरु हमेशां तेमने 'जेसींग'ना लाड-नामथी ज बोलावता, तेथी कविए पण आ तबक्के तेमने ते नामे ज वर्णव्या छे. विजयसेनसूरिए विहार कर्यो त्यारे थयेलां शुभ शकुनोनुं वर्णन (५०-५२) वास्तविक लागे तेवू छे. आने मळतुं वर्णन 'विजयप्रशस्ति' काव्यमां पण जोवा मळे छे. आ पछी तेमना विहारक्रमनुं वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिए महत्त्वनुं छे. तेओ कया मार्गे चाल्या, ते खास जाणवालायक छे. राधनपुरथी शंखेश्वर, पाटण, सिद्धपुर, मालवणी, रोह-सरोतरना मार्गे आगळ वधतां मुण्डस्थल, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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