Book Title: Upmitibhav Prapancha Katha Part 01
Author(s): Chandrashekharvijay
Publisher: Kamal Prakashan

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Page 239
________________ 208 केवलं यावदद्यापि, स आत्मानं न बुध्यते / महामोहादिभिस्तावल्लुप्यते सा महाटवी // 32 // यदा तु तेन विज्ञातः, स स्यादात्मा कथञ्चन / तद्वीर्य वीक्ष्य नश्यन्ति, महामोहादयस्तदा // 33 // यावच्च ते विवर्तन्ते, चित्तवृत्तौ महाभटाः। महानद्यादिवस्तूनि, तावत्तस्यां भवन्ति वै // 34 // तेषामेव यतस्तानि, क्रीडास्थानानि भूभुजाम् / अतस्तेषु विनष्टेषु, तेषां नाशः प्रकीर्तितः // 35 // एवं च स्थिते-अविज्ञातात्मरूपस्य, भद्रे ! जीवस्य कर्मणा / महामोहनरेन्द्रे च, सप्रतापेऽटवीस्थिते // 36 // यदा तानि विवर्धन्ते, जीवश्च बहु मन्यते / महानद्यादिवस्तूनि, नितरामात्मवैरिकः // 37 // तदा तानि स्ववीर्येण, यत्कुर्वन्ति पृथक् पृथक् / जीवस्य तद्विशेषार्थ, दृष्टान्तोऽयं निवेदितः॥३८॥ युग्मम् स चैवं योज्यते भद्र ! प्रस्तुतार्थेन पण्डितः। महानद्यादिवस्तूनां, प्रत्येकं भेदसिद्धये // 39 // यथाऽऽहारप्रियो नित्यं, राजपुत्रो निवेदितः। तथाऽयमपि विज्ञेयो, जीवो विषयलम्पटः // 40 // यथा च तस्य संजातमजीर्ण भूरिभक्षणात् / तथाऽस्यापि कुरङ्गाक्षि ! कर्माजीर्ण प्रचक्षते // 41 // पापाज्ञानात्मकं तच्च, वर्तते कर्म दारुणम् / यतः प्रमत्ततोद्भता, तज्जन्यं तत्पुर(पुलिन)द्वयम् // 42 // यथा प्रकुपितास्तस्य, दोषा जातस्तनुज्वरः / तथा रागादयोऽस्यापि, वर्धन्ते ज्वरहेतवः // 43 // यथा तथास्थितस्यापि, बुद्धिर्भोज्येषु धावति / नरेन्द्रदारकस्येह, तथाऽस्यापि दुरात्मनः // 44 // तथाहि-मनुष्यभावमापनः, कर्माजीर्ण सुदारुणम् / रागादिकोपनं मूढश्चित्तज्वरविधायकम् // 45 // जीवो न लक्षयत्येष, ततश्चास्य प्रवर्तते / अहितेषु सदा बुद्धिः, प्रकाशं सुखकाम्यया // 46 // तथाहि स्वादते मद्यं, निद्राऽत्यन्तं सुखायते / विकथा प्रतिभात्युच्चैरस्यानेकविकल्पना // 47 // इष्टः क्रोधः प्रियो मानो, माया चात्यन्तवल्लभा / लोभः प्राणसमो मन्ये, रागद्वेषौ मनोगतौं // 48 // कान्तः स्पर्शो रसोऽभीष्टः, कामं गन्धश्च सुन्दरः। अत्यन्तदयितं रूपं, रोचते च कलध्वनिः // 49 // विलेपनानि ताम्बूलमलङ्काराः सुभोजनम् / माल्यं वरस्त्रियो वस्त्रं, सुन्दरं प्रतिभासते // 50 // आसनं ललितं यानं, शयनं द्रव्यसञ्चयाः। अलीककीर्तिश्च जने, रुचिताऽस्य दुरात्मनः // 51 // चित्तवृत्तिमहाटव्यां, भद्रे ! सततवाहिनी / महानदी वहत्युच्चैः, सेयमस्य प्रमत्तता // 52 // यथा च तदवस्थस्य, राजपुत्रस्य सुन्दरि ! / समुत्पन्ना विलासेच्छा, यातुमुद्यानिकां मति (प्रति)॥५३॥ कारितानि च भोज्यानि, लौल्येन प्राशितानि च / निर्गतश्च विलासेन, पुरात्प्राप्तश्च कानने // 54 // निविष्टमासनं दिव्यमुपविष्टश्च तत्र सः / विस्तारित पुरो भक्तं, नानाखाद्यकसंयुतम् // 55 // तथास्यापि प्रमत्तस्य, जीवस्य वरलोचने ? कर्माजीर्णात्समुत्पन्ने, भीषणेऽपि मनोज्वरे // 56 // जायन्ते चित्तकल्लोला, नानारूपाः क्षणे क्षणे / यथोपाय॑ धनं भूरि, विलसामि यथेच्छया // 57 // करोम्यन्तःपुरं दिव्यं, भुजे राज्यं मनोहरम् / महाप्रासादसङ्घातं, कारये काननानि च // 58 // षडभिः कुलकम् ततश्च-महाविभवसंपन्नः, क्षपिताखिलवैरिकः / श्लाषितः सर्वलोकेन, पूरितार्थमनोरथः // 59 // शब्दादिमुखसन्दोहसागरे मनमानसः / तिष्ठामि सततानन्दो, नान्यन्मानुष्यके फलम् // 60 // सेयमुद्यानिकाकाङ्क्षा, विज्ञेया सुन्दरि ! त्वया / ततो जीवो महारम्भैः, कुरुते द्रव्यसञ्चयम् // 61 // यथेष्टं दैवयोगेन, विधत्तेऽन्तःपुरादिकम् / शब्दादिसुखलेशं च, किंचिदास्वादयेदपि // 62 // अस्य जीवस्य जानीहि, तदिदं मृगवीक्षणे ! / कारणं मृष्टभोज्यानां, तल्लवानां च भक्षणम् // 63 // ततोऽलीकविकल्पैश्च, सुखनिर्भरमानसः / विलासलास्यसङ्गीतहास्यविब्बोकतत्परः // 64 // युतो दुर्ललितैनित्यं, घुतमद्यरतिप्रियः / सन्मार्गनगरादु दूरे, याति दौःशील्यकानने // 65 // एतन्महाविमर्दैन, पुरनिर्गमनं मतम् / उद्यानप्रापणं चेदं, विद्धि नीलाब्जलोचने // 66 //


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