Book Title: Updeshpad Mahagranth Satik Part 02
Author(s): Jinendrasuri, 
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala

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Page 396
________________ उपदेशपदः महाग्रंथः मइमंतस्स पसत्ती न जुञ्जए काउमेयम्मि ।। ३२७।। तहा हि । जग्गंति संपयासुं विवईए दूरदुक्खपयवोओ निचं मच्चू तह जीवियम्मि आसाण मूलम्मि || ३२८|| पियपुस्तकलत्ताईण संगमा दुस्सहा विओगोवि । परिजज्जरभावकरी जोवणलच्छीए एत्थ जरा ।। ३२९ ।। जह गोवाला गोवग्गपालणे इह लहेइ नियविति । तह छट्ठसं राया जणलाभाओ परिलहंता । ३३०।। पुहवीए पालणाओ निचतक्कज्जचितणादुहिओ । किंकरसमावि मन्नइ अप्पाणं णायगं मूढो ||३३१ || ।।८०२ ।। नाहत्तणमयमत्तो जीवा तं किंचि कम्ममायरइ । जेण कलुसीकयप्पा पावइ पावाई ठाणाई ॥ ३३२ ॥ बंधुं पियरं तह मायरं च बहुनेहनिब्भरंपि न । लुद्धो मुद्धो विहलेइ दूरमवगणियवय णिज्जा ॥ ३३३॥ जह चुल्लीओ अन्नस्स कारणा कावि कड्डइ करेहिं । जलणं स डज्झइ चिय तह थ इमो परियणनिमित्तं ।। ३३४|| कुणमाणो पावाई हिंसाईयाइं विविहरूवाई | पावफलमप्पणचि परिभुंजइ निच्छया ताव ।। ३३५ ।। धी धी भागा धणमवि धीधी इंदियसमुब्भवं साक्खं । धीधी पियसंजागा धीधी एसो परियणोवि ॥ ३३६ ॥ जं एएसु पसत्ता सत्ता पत्ता पमत्तचरियाई । पावति दुहाई दुत्तराई नरगाइरूवाई ॥ ३३७ ॥ ता जुत्तो मे काउं कुसलारंभा भवा विरत्तस्स । जं दुलहा संजोग मणुयत्तणसुकुलमाईणं ।।३३८ ।। एत्थंतरम्मि उज्जाणपालगेणं नरेण विन्नत्तो । जह देव ! तुहुज्जाणे समोसढो सिरिधरो सूरी ॥ ३३९ ॥ पुलयंकुरियसरी हरिसाओ सुणिय वयणमेयस्स । चितइ अहा ! अपुत्र्वा सुहोदओ मज्झ संजाओ ॥३४०॥ कत्थेसा मम चिंता कत्थेसेो गुणनिही मुणी पत्तो । मात्तु विलंबं जमुचियमेयस्स खणस्स तं काहं ।। ३४१ ।। तो सयलपरि विषयाभ्यासे शुकोदाहर णम् ।।८०२।।

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