Book Title: Mruganka Charitram
Author(s): Ruddhichandraji
Publisher: Shravak Hiralal Hansraj

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Page 26
________________ मृगांक // 25 // अदृष्टकरणी विद्यां परविद्याविनाशनीम् / अन्यरूपकरी चैव सापि जग्राह तत्क्षणे // 13 // .. अर्थः-ते विद्याधर पासेथी तेणीए अदृष्टीकरणी, बीजाओनी विद्यानो विनाश करवावाळी अने अन्यरुपकरी ए त्रणे || विधाओ तुरतज ग्रहण करी. // 13 // अहं मुश्चामि कुत्र त्वां बाले ! कथय मत्पुरः / तयोक्तं सुसुमाराख्यपुरे मुश्च महाशय ! // 14 // ___ अर्थ:-हे बाळा ! हुं तने क्यां मूकुं ? ते मने कहे ? एम विद्याधरे पूछवाथी तेणीए को, के हे महाशय ! मने मुसुमारपुर नामे नगरमां मूक ? // 14 // स बालां तत्पुरोधाने मुक्त्वा स्वसदने गतः। साऽन्यरूपपरावर्त्या विद्यया पुरुषोऽभवत् // 15 // ____ अर्थः-बाद तेणीने ते नगरना उद्यानमा मूकीने विद्याधर पोताने स्थानके गयो, पछी पद्मावती रूपपरावर्तिनी विद्याथी पुरुषरूपे थइ. // 15 // सहस्राङ्केति नाम्नाऽसौ भूत्वाजगाम तत्पुरे। पुष्पलावीगृहे तस्थौ लीलया क्रीडयन् भृशम् // 16 // अर्थः-सहस्रांक नाम धरीने तेणी गाममा गइ अने मालीने घरे उतरीने अत्यंत क्रीडा करवा लागी. // 16 // नगरस्य जनाः सर्वे आयान्ति तस्य संनिधौ / सोऽपि समस्तशास्त्राणि सर्वेषां वदति स्फुटम् // 17 // // 25 // A.. P.P.AC. Gunratnasuri M.S. Jun Gun Aaradhak Trust

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