________________
हस्तप्रत का संक्षिप्त नाम- को१५९३२, संदर्भांक- १५९३२, पत्रसंख्या- १९, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या१२, प्रतिपंक्ति अक्षरसंख्या- ३३, स्थिति- उत्तम, लेखन प्रशस्ति- प्रत २) के समान। लिखितंग
लयाराम धनजी ४) हस्तप्रत भंडार का नाम- आ. श्री. कैलाससागरसूरि ज्ञानमंदिर, श्री महावीर जैन आराधना केंद्र, कोबा,
गांधीनगर, गुजरात संक्षिप्त नाम- को२०००८, संदर्भाक- २०००८, पत्रसंख्या- १५, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या- १३, प्रतिपंक्ति
अक्षरसंख्या- ४४ स्थिति- उत्तम, लेखन प्रशस्ति- प्रत २) के समान ५) हस्तप्रत भंडार का नाम- मोहनलाल जैन श्वेतांबर ज्ञानभंडार, गोपीपुरा, सुरत
संदर्भाक- पो./७६/५०५, पत्रसंख्या- १७, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या- १२, प्रतिपंक्ति अक्षरसंख्या- ३५, स्थिति- उत्तम, लेखन प्रशस्ति- प्रत २) के समान। लया। जेनरायण संम(व)त १९५९रा मीती काती वदी
६) हस्तप्रत भंडार का नाम- मोहनलाल जैन श्वेतांबर ज्ञानभंडार, गोपीपुरा, सुरत
संदर्भाक- पो./७६/५०६, पत्रसंख्या- १७, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या- १२, प्रतिपंक्ति अक्षरसंख्या- ३५,
स्थिति- उत्तम, लेखन प्रशस्ति- नही है। ७) हस्तप्रत भंडार का नाम- मोहनलाल जैन श्वेतांबर ज्ञानभंडार, गोपीपुरा, सुरत
संदर्भाक- पो./७६/५०७, पत्रसंख्या- ११, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या- १४, प्रतिपंक्ति अक्षरसंख्या- ४८,
स्थिति- उत्तम, लेखन प्रशस्ति- प्रत २) के समान। ८) हस्तप्रत भंडार का नाम- जैनानन्द पुस्तकालय, गोपीपुरा, सुरत
संदर्भाक- ९१२, पत्रसंख्या- ७, प्रतिपृष्ठ पंक्तिसंख्या- १९, प्रतिपंक्ति अक्षरसंख्या- ६० स्थितिउत्तम, लेखन प्रशस्ति- प्रत २) के समान।।
सभी हस्तप्रत कागज की है और लिपि देवनागरी है। अक्षर सुवाच्य एवं बहुधा स्पष्ट है। हस्तप्रत का आंतरिक विवरण
उपयुक्त आठ हस्तप्रत में क्रमांक १ एवं क्रमांक २ उपलब्ध हस्तप्रतों में प्राचीनतम लगती है। क्रमांक १ में लेखनकाल का उल्लेख नहीं है फिर भी अनुमान से पंद्रहवी-सोलहवी शताब्दि की लगती है। अर्थात् कृतिरचना समय (वि.सं.१३८५) के करीब है।
क्रमांक २ हस्तप्रत वि.सं.१९४० में लिखी गई है। लेखन प्रशस्ति के अनुसार यह हस्तप्रत वडोदरा के राजा सयाजीराव ने अपने ग्रंथालय में संग्रह करने हेतु लिखवाई है। गोस्वामी यशवंतभारती के शिष्य गोस्वामी नारायणभारती ने वि.सं.१९४० में दुर्मुख नामक वर्ष में माघ महिने की तृतीया तिथि में गुरुवार के दिन अणहिलपुर पाटण में लिखी है। हस्तप्रत क्रमांक ३, ४, ५, ७, और ८ में यही लेखन प्रशस्ति मिलती है। हस्तप्रत