Book Title: Antim Tirthankar Ahimsa Pravartak Sargnav Bhagwan Mahavir Sankshipta
Author(s): Gulabchand Vaidmutha
Publisher: Gulabchand Vaidmutha

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Page 87
________________ ८६ एक ही उद्देश्य था और वह यह था कि दुनियां के घर घर और दर-दर सवही जगहोंमें सत्यका शुभ सन्देश पहुंचे । संसारके दुखित प्राणी सत्य की सुशोतल छायामें परमानन्दका सदा उपभोग करें । कलह और क्लेश, दुःख और दर्द, बैर और विरोधका दुनियासे निर्वासन हो । अवनि तलपर अहिंसाका अखंड शासन सुदृढ़ वना रहे । दयाका अखंड स्रोत प्राणीमात्रके हृदयमें बहता रहे । घरघरमें परोपकारकी प्रतिष्ठा हो । जगतमें सात्विक प्रेमका पसारा हो; और अन्तमें लोग एकमात्र आत्मज्योतिके सुन्दर दर्शन कर मोक्ष मार्गकी ओर अग्रसर होते चले जाय । भगवानके इस सत्य-सन्देशका तत्कालीन मनुष्य समाज पर बड़ा असर पड़ा । उन्होंने अहिंसाके भिन्न-भिन्न स्वरूपोंका निरूपण कर जगतको समता रसका अमृत पान कराया। बस, इतना होते ही जन-समुदायमें राग-द्वेषकी भावनाएं मिटने लगीं । साम्य भाव प्रत्येक प्राणीके हृदयमें स्थान पाने लगा । अमानुषिक अत्याचारों का प्रवाह वेगसे लोप होने लगा। यज्ञोंके नामपर लाखों पंशुओंके रक्तसे पृथ्वीका रंजित होना एकदम रुक गया । जाति भेद गत घृणित रूढ़ियों का प्रायः अन्त हो गया । समतावादका चारों आर सुन्दर शासन प्रसारित हुआ । शान्तिका स्वागत घरघर होने लगा । लोभवृत्ति और स्वार्थ-कामनाकी काया पलटी। जगतमें त्याग और तपस्याकी प्रतिष्ठा बढ़ी। लोगोंने एक नयी और चमत्कारपूर्ण सात्विक भावनाओंको लेकर प्राणीमात्रोंके एक नवीन प्रजातन्त्र युगमें पदार्पण किया । भगवान महावीरने कोई नवीन बात नहीं बतलाई, परन्तु भूले हुए दुःखित प्राणियों को पूर्व तीर्थकरों द्वारा भाषित अहिंसा धर्मका Shree Sudharmaswami Gyanbhandar-Umara, Surat www.umaragyanbhandar.com

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