Book Title: Sramana 2010 04
Author(s): Ashok Kumar Singh, Shreeprakash Pandey
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 52
________________ प्राकृत साहित्य में अंकित नारी : ४३ कि चर्चा के विषय बनें। पति के प्रेम में आसक्त कोई पत्नी अग्नि-प्रवेश की अथवा आत्मदाह की प्रतिज्ञा भी करती दिखाई देती है। किन्तु वह धार्मिक विश्वास के लिये या किसी डर से किया गया सतीमरण नहीं है। निर्धनता के कारण या कर्ज चुकाने के लिए स्त्रियाँ नौकरी आदि भी करती थीं। उन्हें दासी, धाई, आदि नामों से जाना जाता था। इस विवेच्य युग में प्राकृत साहित्य में नारी के प्रायः उन सभी रूपों का विवरण प्राप्त है, जिनसे उसकी प्रतिष्ठा और महत्त्व का ज्ञान होता है। प्राकृत साहत्यि में नारी पात्रों के चरित्र का रेखांकन सुख एवं दुःख दोनों में प्रेरणा देता है। इनके माध्यम से हम एक पूरी सांस्कृतिक-ऐतिहासिक विरासत से जुड़ते हैं जो तमाम विषमताओं में सुख एवं शान्ति को नष्ट होने से बचा लेती है। इन नारियों के जीवन चरित्र में हमें आज भी नारियों से जुड़े समस्त प्रश्नों के उत्तर और सामाजिक विसंगतियों का सर्वसम्मत प्रतिकार दृष्टिगोचर होता है। जिस पल भी जीवन निरर्थक लगे, समस्याओं का जाल जकड़ने लगे अथवा जीवन में कोई राह दृष्टिगत न हो तो सत्यनिष्ठता, एकाग्रता, पवित्रता से इन सात्त्विक नारियों का स्मरण अप्रत्याशित रूप से उर्जास्वित कर देगा। आज की प्रत्येक नारी के अन्तर में इनका निवास है, आवश्यकता है इनके गुणों को समाहित कर विकसित करने की। सन्दर्भ-सूची १. पुत्तकुमार पुण्णमंतो अहयं जस्स तुमं पुत्तो, कुवलयमाला, १६२.१० २. तत्तो तीए पुत्त धम्माओ वि अहियं कयाइ वद्धावणयाइं। कुव० १६२.९१ ३. समराइच्चकहा, भव-५, पृ. ३५ ४. समराइच्चकहा, भव, ८, पृ. ७४४ ५. वही, भव-८ पृ. ६. वही, भव-२ पृ.८७-८८ ७. सव्व कलागम-कुसलो जिणवयणसणिच्छओ महाबुद्धी-कुवलयमाला, १२३.२६ ८. इमिणाप ओगेण अक्खर-लिवीओ गाहिआ। कुवलयमाला, २७-१-१८ ९. समराइच्चकहा, भव-९, पृ. ९२२ १०. जैन, जगदीशचन्द्र, प्राकृत जैन कथा साहित्य, पृ. ६० ११. पउमचरिउ १२. कण्ण दाणु कहिंतणउ जइ, पउम.,६३/९ १३. कुल सील-कित्ति-परिव्वज्जियाहं, पउम, ८२/२/४

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