Book Title: Nandanvan Kalpataru 2012 11 SrNo 29
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 20
________________ (४) शरत् विलसति शरदिह घनमलरहिता धवलजलधिफेनोज्ज्वलनिर्जल-मेघाडम्बरभरिता..... जलवाहिन्यो निर्मलसलिलाः मार्गाः शोषितकर्दमकलिलाः, प्रखरदिवसकरसहिता..... गोपीमण्डलरासकरावा तृप्तविहङ्गममधुरारावा, कर्षकगोकुलसुहिता..... निष्पादितबहुविधशुभशस्या विकसितकमलवनेन प्रशस्या, यया धरित्री विहिता..... निर्झरदसमसुधारसगाच्या शशधरमण्डितराकारात्र्या, तप्तिर्यस्याः पिहिता..... निर्मलनीलाकाशविलसिना पूर्णकलोदितशारदशशिना, भुवि रसधारा निहिता..... विलसति शरदिह घनमलरहिता..... Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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