Book Title: Nandanvan Kalpataru 2012 11 SrNo 29
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 28
________________ काव्यत्रयी डॉ. कौशल तिवारी १. मार्गः २. समरक्षेत्रम् मार्गा न गच्छति कुत्राऽपि स स्थितः सदैव स्वस्थान एवं विना दूषणं विना महत्त्वाकांक्षाम्, अहमेव चलामि तस्मिन् विना श्रान्ति विना विश्राम लक्ष्यस्येच्छायाम्, भ्रमामि सततं त्यक्त्वा सहपथिकान् सार्थस्याऽग्रतः, विस्मरामि यत् मार्गो न गच्छति कुत्रापि ॥ अन्धतमसम् एकलोऽहं नैकै ते समरक्षेत्रम्, अस्त्रैः शस्त्रैः सुसज्जितास्ते निःशस्त्रः कवचहीनोऽहम्, बलेन गर्वितास्ते निर्बलो भयभीतोऽहम्, जिगीषवस्ते प्रहारकामुकाः जीवनकृते प्रयासरतोऽहम्, अकस्मात् त्रुटिता निद्रा स्वप्ना भग्नाः तथाऽपि सैव कथा, अन्धतमसम् एकलोऽहं नैकै ते समक्षेत्रम् ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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