Book Title: Nandanvan Kalpataru 2003 00 SrNo 09
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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श्रीसम्भवदेववन्दना - ३
चैत्यवन्दनम्
सम्भव ! सुखसम्भव ! सतां भवसम्भवहाने ! परिभववर्जित! नित्यरत ! निजवैभवदाने
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श्रावस्तीनगरीरमा - रमण ! श्रमणगणभूप ! सेनानन्दन ! भन्दकन्द ! श्रीनन्दनवररूप !
श्रीजितारिनृपवरतनुज ! तुरगाङ्कितपदपद्म ! । देवधुरन्धर ! दीयतां, निरुपद्रवशिवसद्म !
स्तवनम्
राग - वैष्णवजन तो तेने कहीओ....
सम्भवजिनवर ! जय जगदीश्वर !, स्वर्गङ्गामलमूर्ते ! रे । चारुचरितरचितोचितस्वना - रुचिराचरणस्फूर्ते ! रे
६
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तत्त्वरसिकजनताजिज्ञासा- पूरणपूर्णज्ञाता रे
त्वं भव शुभसम्भव ! भवभयतो, भावुकभविकत्राता रे ॥२॥ सम्भवजिनवर... समतासरसीरुहसरोवर ! वदनविजितपर्वेन्दो ! रे । नयनयुगलगलदविरलशीतल - करुणामृतरसबिन्दो ! रे ॥३॥ सम्भवजिनवर..
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॥१॥ सम्भवजिनवर..
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