Book Title: Nandanvan Kalpataru 2003 00 SrNo 09
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 61
________________ श्रीवीरवर्द्धमानदेववन्दना - २४ चैत्यवन्दनम् Jain Education International n त्रिशलानन्दन वीरजिन!, मृगपतिलाञ्छनरम्य । सिद्धार्थावनिपतितनय, पूर्णसमर्पणगम्य श्रमणोत्तम महावीर धीर, घोरतपस्विधुर्य ! क्षत्रियकुण्डेजात शुद्ध- ज्ञातवंशकुलसूर्य चरमजिनेश्वर योगिपरम ! हर मम निखिलं कर्म । क्षमधुरन्धर देहि मे, कनकवर्ण शिवशर्म ॥३॥ n स्तवनम् राग- पालय पालय रे पालय मा जिनधर्म तारय तारय रे तारय मां जिनवीर !.... सकलकुशलक मलालीलालय ! सलिलालयगम्भीर ! । करुणासागर ! जितभवसङ्गर ! निर्जितमन्मथवीर ! ॥ तव चरणेऽखिलभयसंहरणे, वसतु सदा मम चित्तम् । तव पदचिन्तनमघकृन्तनमिह, भवतु ममाभयवित्तम् ॥ रागादिक रिपुरिह भवगहने, मोहमहाबलमत्तः । त्वां प्रति वलितं कर्षति बलतो, मामयि दूरे त्वत्तः ॥ लुण्टाकैः कुटिलैस्तैर्विकलः कारितपरिभवनृत्यः । शक्तिमता भवताऽहं स्वामिन् ! नोपेक्ष्यस्तव भृत्यः ॥ मां नहि पालयतो भवतः सा, विश्वे विदिता ख्यातिः । शरणागतपालकतारूपा, वितथा स्यात् शिवतातिन् ! ॥ ४८ For Private & Personal Use Only ॥१॥ तारय... ॥२॥ तारय... ॥३॥ तारय... ॥४॥ तारय... ॥५॥ तारय... www.jainelibrary.org

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