Book Title: Agam 18 Upang 07 Jambudveep Pragnapti Sutra Part 01 Sthanakvasi
Author(s): Kanhaiyalal Maharaj
Publisher: Jain Shastroddhar Samiti Ahmedabad

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Page 940
________________ सम्वृद्धीपप्रज्ञप्तिसूत्रे तोऽपि तस्य भरतस्य कियदन्तमित्याह यावदप्रतिबुध्यन अप्रतिबुध्यन् विनीता राजधानी मध्यं मध्येन मध्यभागेन निर्गच्छति निष्क्राति 'णिग्गच्छित्ता' निर्गत्य निष्काम्य 'जेणेव विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसीभाए अभिसेयमंडवे तेणेव उवागच्छइ' स भरतः यत्रैव विनीताया राजधान्याः उत्तरपौरस्त्ये दिग्भागे ईशानकोणे अभिषेकमण्डपः तत्रैव उपागच्छति 'उवागच्छित्ता' उपागत्य 'अभिसेयमंडवदुवारे आभिसेक्कं हत्थिरयणं ठावेइ' अभिषेकमण्डपबहिरि आभिषेक्यं पट्टहस्तिरत्नं स्थापयति 'ठाविता' स्थापयित्वा 'आभिसेक्काओ हस्थिरयणाओ पच्चोरुहइ' आभिषेक्यात् अभिषेकपट्टहस्तिरत्नात् प्रत्यवरोहति अवतरति 'पच्चोरुहित्ता' प्रत्यवरुहय अवतीर्य 'इत्थीरयणेणं बत्तीसाए उडुकल्लाणिया सहस्सेहिं बत्तीसाए जणवयकल्लाणिया सहस्सेहि बत्तोसाए बत्तोसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धिं संपरिवुडे अभिसेयमंड श्रवण में आसक्त है" इस कथिन पाठ तक यहां पर भी ग्रहण करलेना चाहिये इस तरह की स्थिति में होते हुए वे भरत नरेश विनीता राजधानो के ठीक बोच के मार्ग से होकर निकले (जिग्गच्छित्ता जेणेव विणीयाए रायहाणोए उत्तरपुरस्थिमे देसीभाए अभिसे यमंडवे तेणेव उवागच्छद) बाहर निकल कर वे चक्रवर्ती श्री भरत महाराना जिस और बिनोता रानधानी का इशान कोण एवं जहां पर रमणीय अभिषेक मंडप था वहां पर आये (उवागच्छित्ता अभिसेयमंडवदुवारे आभिसेक्कं हत्थिरयण ठावेइ ) वहांआकर उन्होंने आभिषेक्य मंडप के द्वार पर अपने आमिषेक्य हस्तिरत्न को खड़ा करदिया (ठावित्ता आभिसेककाओ हत्थिरयणामो पच्चोरुहइ) खडा करके वे उस भाभिषेक्यहस्तिरत्न से नीचे उतरे ( पच्चोरुहित्ता इत्थीरयणेणं बत्तीसाए कल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसाए जणवयकल्लाणियासहस्सेहिं बतोसाए बत्तीसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धिं संपरिवुडे ) नीचे उतर कर स्त्रीरत्न सुभद्रा आदि बत्तीस हजार ऋतुकल्याणि का राजकन्याओं से ३२ हजार जनपद के मुखियाओं को कल्याणकारिणि कन्यकाओं से છે, તે પાઠ એટલે કે “વાગતા વાઘોને મંજુધ્વનિ થી જેનું ચિત્ત અન્યત્ર સંલગ્ન થયું નથી, તેવા વાઘોને સાંભળવામાં જ જે આસકત છે' એ કથિત પાઠ સુધી અત્રે પણ પાઠ સંગૃહીત થયું છે. આ પ્રમાણે ઠાઠ-માઠ થી ભારત નરેશ વિનીતા રાજધાની ના ઠીક મધ્યમાં આવેલા भाभा २ नीv41. (णिगच्छित्ता जेणेव विणीयाए रायहाणीए उत्तरपुरस्थिमे दिसी भाए अभिसेयम डवे तेणेव उवागच्छइ) मा२ नीजीने तसा (वनीता यानी ना शान माय मामिष महतो, त्यो ५i-या. (उवागच्छित्ता अभिसेयमंडवदृवारे आभिसेवक हत्थिरयणं ठावेइ) त्यां पायीन तभ माभिषेश्य भन द्वारनी स. मामिषेय स्तिक ने अभुश यु. (ठावित्ता आभिसेक्काओ हस्थिरयणाओ पच्चोरुहइ) २.भान. ते शामिषेय स्तरत्न ७५२ थी नीये तर्या. (पच्चोरुहित्ता हत्थीरयणेण बत्तीसाए जगवयकल्लाणियासहस्सेहिं बत्तीसइबद्धेहिं णाडगसहस्सेहिं सद्धि सपरिवुड) नीये उतरीन खी २ल सुभद्रा, मने ३२२ ऋतु स्यापि २१४ न्यास। ૩૨ હજા૨ જનપદના મુખીઓની કલ્યાણકારિણી કન્યાઓ અને ૩૨–૩૨ પાત્રોથી બદ્ધ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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