Book Title: Agam 15 Upang 04 Pragnapana Sutra Part 02
Author(s): Shyamacharya, Punyavijay, Dalsukh Malvania, Amrutlal Bhojak
Publisher: Mahavir Jain Vidyalay

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Page 795
________________ मूलसहो पण्णवणासुत्तपरिसिट्ठाई सक्कयस्थो सुत्तंकाइ । मूलसद्दो फले ५४ [२] गा. ५५ फासगुणे फलम् ५४ [३] गा. ६४, फासचरिमेणं ५४ [४] गा. ७४ १२३३ फासणामे फलेषु ५५ [३] गा. १०९ फाणितम् १२३३ ० फासणामे " ९७२ गा. २०३ फासतो ० फलेसु • फाणिए +फाणिय फाणियं फालियामया फास सक्कयत्यो सुसंकाइ स्पर्शगुणान् १८०१ स्पर्शचरमेण ८२८ [१], ८२९ [१] स्पर्शनाम १६९३, १६९४ [१२] १६९४ [१२] स्पर्शतः १० [१], ११ [२,५८,१२ [१.२,४.८], १३ [१,४.५], १८०९ स्पर्शपरिणताः [४] , ८ [४], ९ [9] तः फासपरिणता • फासपरिणता स्फटिकमयानि १९५ [१] स्पर्श ८ [४], ९ [१] तः १३ [५], ४४४ तः ४४८, ४५२, ४५५ [१३], ४५६ [१], ४५७ [१] ४५९ [१], ४६२ [१], ४६६ [१], ४६७ [१], ४६८ [१], ४७० [१], ४७३ [१], ४७४ [१], ४७५ [१], ४७७ [१], ४८२ [१], ४८३ [१], ४८५ [१], ४८७ [१], ४८९ [१], ४९० [१], ४९१ [१], ४९३ [१], ४९५ [१], ४९७,५०४, ५०८,५१०,५१९,५२५ [१], ५२९ [१], ५३८ [१], ५४५ [१], ५४७ [१], ५४८ [१], ५५० [१], ५५१ [१], ५५२ [१], ५५४ [१३],५५५ {२}, ५५६ [१], ५५७ [१], ५५८, १६७९ स्पर्शतः ९ [१-५], १० [२], ११ [१,३-४], १२ [२.३,५], १३ [२-३], ८७७ [१४], १८०० [२], १८०१, १८०६ [१] फासपरिणया फासपरिणामे स्पर्शपरिणामः९४७, ९५५ फासपरियारगा स्पर्शपरिचारकाः - प्रवीचारकाः २०५२ [१,३], २०५३ फासपरियारणा स्पर्शपरिचारणा- प्रवी. चारणा २०५२ [9] फासमंताई स्पर्शवन्ति - स्पॉपेतानि ८७७ [६,१३], १७९५, १८०० [१] फासविण्णाणावरणे स्पर्शविज्ञानावरणम् १६७९ स्पर्शम् २१६९ फासा स्पर्शाः ३३३, ४५८, ४६९,४७६,४८४,४९२, ५०४, १६८१ [१], १६८४ [१], १७०२ ३२], १८०० [२] फासा स्पर्शाः १६७ तः १७४, फास १९६ फासओ फासाई . फासाई फासाणं ० फासाणं . फासाणि स्पर्शान् ९९० [४] स्पर्शानि १८०० [१] स्पर्शानाम् ३३३ ,,५२४, पृ. १६२ टि.१ स्पर्शान् ९९० [४] Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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