Book Title: Sambodhi 1978 Vol 07
Author(s): Dalsukh Malvania, H C Bhayani, Nagin J Shah
Publisher: L D Indology Ahmedabad

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Page 300
________________ महाकविश्रीरामचन्द्रविरचितं क्वापि दुरात्मा मनुष्यकीटः । हला मनोरमे ! मध्यस्थिताऽस्मद्वयापाराणां विघातमासूत्रयसि ?। (मनोरमा वेपते । ) ... तापसकुमारः - ( सरोषम् ) अम्ब ! किमेनं निरपराध महात्मानं व्यापादयसि ? । मामेव हृदयसन्तापहेतुं दुरपत्यं व्यापादय । चन्द्रलेखा - आः पापे ! सोल्लुण्ठवादिनि ! कौमारकुलिटे ! यदि ते व्यापादनसमीहा तदानीमेषा पूरयामि । ( तापसं केशैगृहीत्वा ) देवलक ! गृहागैतां दुष्टपरिचारिकाम् ( इत्यभिदधाना सदेवलका निष्क्रान्ता ।) ॥ तृतीयोऽङ्कः ॥३॥ Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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