Book Title: Mahabharat Ki Namanukramanika Parichay Sahit
Author(s): Vasudevsharan Agarwal
Publisher: Vasudevsharan Agarwal

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Page 318
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra विपापा www.kobatirth.org ( ३१४ ) विपापा - भारतवर्षकी एक प्रमुख नदी, जिसका जल भारतीय प्रजा पीती है ( भीष्म० ९ । १५ ) । विपाप्मा - एक सनातन विश्वेदेव ( अनु० ९१ । ३० ) । विपाशा - पञ्चनद प्रदेशकी एक नदी, जो वसिष्ठजीको पाशमुक्त करनेके कारण 'विपाशा' नामसे प्रसिद्ध हुई ( आदि० १७६ । २ - ६ ) । यह वरुणकी सभामें रहकर उनकी उपासना करती है ( सभा० ९ | १९ । इसका जल भारतीय प्रजा पीती है ( भीष्म० ९ । १५ ) । 'बहि' और 'ही' नामक पिशाच इसमें निवास करते हैं ( कर्ण० ४४ । ४१-४२ ) । जो विपाशा नदीमें पितरोंका तर्पण करता है और क्रोधको जीतकर ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए तीन रात वहाँ निवास करता है, वह जन्ममृत्युके बन्धन से मुक्त हो जाता है ( अनु० २५ । २४ ) | विपुल - ( १ ) सौवीर देशका राजा, जो संग्राम-भूमिमें अर्जुनके हाथसे मारा गया था ( आदि० १३८ । २२) । ( २ ) मगधराजधानी गिरिव्रजके समीपका एक पर्वत ( सभा० २१ । २) । ( ३ ) एक भृगुवंशी ऋषि, जो महर्षि देवशर्मा के शिष्य थे ( अनु० ४० । २१-२२ । इनका अपने गुरुसे इन्द्रका रूप एवं लक्षण पूछना ( अनु० ४० । २६ ) । इन्द्रसे रक्षा करनेके लिये गुरुपत्नी शरीरमें इनका प्रवेश ( अनु० ४० ॥ ५७-५८ ) । इन्द्रको फटकारना (अनु० ४१ । २०२६ ) | गुरुसे इनको वरकी प्राप्ति ( अनु० ४१ ॥ ३५ ) । गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाना ( अनु० ४२ । १६ ) । मार्ग में अपनी दुर्गतिकी बात सुनकर दुखी होना ( अनु० ४२ । २९ ) । गुरुसे स्त्री-पुरुषके जोड़े और छः पुरुषोंके विषयमें प्रश्न ( अनु० ४३ । ३ ) । विपृथु - ( १ ) एक वृष्णिवंशी क्षत्रिय, जो द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था ( आदि० १८५ । १८ ) । यह रैवतक पर्वत पर होनेवाले महोत्सबमें सम्मिलित हुआ था ( आदि ० २१८ । १० ) । सुभद्रा और अर्जुनके विवाहोपलक्ष्य में दहेज लेकर जानेवाले लोगोंमें यह भी था ( आदि ० २२० । ३२ ) । यह युधिष्ठिरकी सभामें रहकर उनकी सेवामें उपस्थित होता था ( सभा० ४ । ३०) । ( २ ) एक प्राचीन नरेश, जो सप्तर्षियोंके बाद भूमण्डल समाट् हुए थे ( शान्ति ० २९४ । २० ) । विप्रचित्ति - दनुके सर्वत्र विख्यात चौंतीस पुत्रोंमेंसे एक, जो महायशस्वी राजा था; यह अपने भाइयोंमें सबसे बड़ा था ( आदि० ६५ । २२ ) । यही इस भूतलपर ' जरासंध' के रूपमें उत्पन्न हुआ था ( आदि० ६७ । ४ ) । यह वरुणी सभामें रहकर उनकी उपासना करता है ( सभा० ९ । १२ ) । जब वामनरूपधारी विभाण्डक श्रीहरि त्रिलोकीको नापने लगे, उस समय विप्रचित्ति आदि दानव अपने-अपने आयुध लेकर उन्हें चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ( सभा० ३८ । २९ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७९० ) । पूर्वकालमें इसे भगवान् श्रीहरिने ( इन्द्ररूपसे ) क्रियात्मक उपायद्वारा मारा था ( शल्य० ३१ । १२-१३ ) । इसको तथा अन्य प्रमुख दैत्य-दानवोंको मारकर इन्द्र देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए थे ( शान्ति० ९८ । ५० )। Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir विभाण्ड - एक प्राचीन ऋषि, जो शरशय्यापर पड़े हुए भीष्मजी को देखने आये थे ( शान्ति० ४७ । ११ ) । विभाण्डक - कश्यप-कुलमें उत्पन्न एक ऋषि, जो इन्द्रकी सभामें रहकर उनकी उपासना करते हैं ( सभा० ७ । १८ दा० पाठ ) । ये ऋष्यशृङ्गके पिता थे ( वन ० ११० | २३ ) । इनका अन्तःकरण तपस्या से पवित्र हो गया था। ये प्रजापति के समान तपस्वी और अमोघवीर्य महात्मा थे। इनका रूप-सौन्दर्य महात्माओंके समान था । ये बहुत बड़े सरोवरमें प्रविष्ट होकर तपस्या करते रहे । इन्होंने दीर्घकालतक महान् क्लेश सहन किया था ( वन० ११० । ३२-३४ ) । एक दिन जलमें स्नान करते समय उर्वशी अप्सराको देखकर इनका वीर्य स्खलित हो गया । उसी समय प्याससे व्याकुल होकर एक मृगी वहाँ आयी और पानीके साथ उस वीर्यको भी पी गयी। इससे उसके गर्भ रह गया । उसीके पेटसे महर्षि ऋष्यशृङ्गका जन्म हुआ ( वन० ११० । ३५ - ३९ ) | विभाण्डक मुनिके नेत्र हरे-पीले रंगके थे । सिरसे लेकर पैरोंके नखतक रोमावलियोंसे भरे हुए थे । ये स्वाध्यायशील, सदाचारी और समाधिनिष्ठ महर्षि थे । एक दिन जब ये बाहरसे आश्रमपर आये तो अपने पुत्रको चिन्तामग्न देखकर उससे पूछने लगे- 'बेटा! बताओ, आज यहाँ कौन आया था ( वन० १११। २०-३० ) । शृङ्गने पिताको अपनी चिन्ताका कारण बताते हुए ब्रह्मचारी रूपधारी वेश्याके स्वरूप और आचरणका वर्णन किया ( वन० ११२ अध्याय ) । विभाण्डकने अपने पुत्रको बताया कि इस प्रकार अद्भुत रूप धारण करके राक्षस ही इस वनमें विचरा करते हैं तथा ऋषि-मुनियोंकी तपस्या में सदा विघ्न डालनेकी चेष्टा करते रहते हैं । अतः तपस्वीको चाहिये कि वह उनकी ओर आँख उठाकर देखे ही नहीं। इस प्रकार पुत्रको उससे मिलने-जुलने के लिये मना करके मुनि स्वयं उस वेश्याकी खोज करने लगे । तीन दिनोंतक खोजनेपर भी जब वे उसका पता न पा सके, तब आश्रमपर लौट आये ( वन० ११३ । (१-५) । तदनन्तर जब वे फल लानेके किये वनमें गये, 1 For Private And Personal Use Only

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