Book Title: Agam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Part 03
Author(s): Bechardas Doshi
Publisher: Dadar Aradhana Bhavan Jain Poshadhshala Trust

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Page 319
________________ शतके १२.-उद्देशक १६. भमवत्सुधर्मखामिप्रणीत भगवतीसूत्र. २९९ खधे आया य नोआया य, ५ देसे आदिट्टे सम्भावपजवे देसा आइटा असब्भावपजवा तिपएसिए खंधे आया य नोआयाओ य, ६ देसा आदिट्ठा सम्भावपजवा देसे आदिटे असब्भावपजवे तिपएसिए खंधे आयाओ य नोआया य, ७ देसे आदिवे सम्मावपजवे. देसे आदिट्टे तदुभयपनवे तिपएसिए बंधे आया य अवतचं आयाइ य नोआयाइ य, ८ देसे आदितु सम्भावपजवे देसा आदिवा.तदुभयपजवा तिपएसिए खंधे आया य अवत्तचाई आयाउ य नोआयाउ य, ९ देसा आदिट्ठा सम्भावपजवा देसे आदितु तदुभयपजवे तिपएसिए खंधे आयाउ य अवत्तष्ठं आयाति य नो आयाति य, एए तिन्नि भंगा, १० देसे आदिट्टे असम्भावपजवे देसे आदिटे तदुभयपजवे तिपएसिए खंधे नोआया य, अवत्तवं आयाइ य नोआयाति य, ११ देसे आदितु असम्भावपज्जवे देसा आदिट्ठा तदुभयपजवा तिपएसिए खंधे नोआया य अवत्तवाई आयाउ य नोआयाउ य, १२ देसा आदिट्ठा असम्भावपजवा देसे आदितु तदुभयपजवे तिपएसिएं खंधे नोआयाउ य अवत्त आयाति य नो आयाति य, १३ देसे आदिढे सम्भावपजवे देसे आदिढे असम्भावपजवे देसे आदितु तदुभयपजवे तिपएसिए खंधे आया य नोआया य अवत्त, आयाति य नोआयाइय। से तेणटेणं गोयमा! एवं वुच्चइ-'तिपएसिए खंधे सिय आया तं-चेव जावनोआयाति य। २१. [प्र०] आया भंते! चउप्पएसिए खंधे अन्ने० पुच्छा। उ०] गोयमा! चउप्पएसिए खंधे १ सिय आया, २ सिय नोआया, ३ सिय अवत्तचं आयाति य नोआयाति य, ४-७ सिय आया य नोआया य ४, ८-११ सिय आया य अवतन्त्र ४, १२-१५ सिय नोआया य अवत्तवं ४, १६ सिय आया य नो आया य अवत्तवं आयाति य नोआयाति य ४, १७ सिय आया य नोआया य अवत्तवाइं आयाओ य नोआयाओ य, १८ सिय आया य नोआयाओ य अवत्तवं आयाति य नो आयाति य, १९ सिय आयाओ य नोआया य अवत्त आयाति य नोआयाति य। २२. [प्र०] से केणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ-'चउप्पएसिए खंधे सिय आया य नोआया य अवत्तवं-तं चेव अटे पडिउच्चारेयवं ? [उ०] गोयमा! १ अप्पणो आदिटे आया, २ परस्स आदिट्टे नोआया, ३ तदुभयस्स आदिट्टे अवत्त आयाति देशना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशोना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिकस्कंध आत्मा तथा नोआत्माओ छे, ६ देशोना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपेक्षाए त्रिप्रदेशिक स्कंध आत्माओ भने नोआस्मारूप छे, ७ देशना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशना आदेशथी उभय-सद्भाव तथा असद्भाव पर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिकस्कंध आत्मा अने आत्मा तथा नोआत्मा-ए उभयरूपे अवक्तव्य छे, ८ देशना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशोना आदेशथी उभयपर्यायनी विवक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध आत्मा भने आत्माओ तथा नोआत्माओ-ए उभयरूपे अवक्तव्यो छे, ९ देशोना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए भने देशना आदेशथी तदुभयपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध आत्माओ अने आत्मा तथा नोआत्मा ए उभयरूपे अवक्तव्य छे.-ए त्रण भागाओ जाणवा. १० देशना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशना आदेशथी उभयपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध नोआत्मा अने आत्मा तथा नोआत्मा रूपे अवक्तव्य छे, ११ देशना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशोना आदेशथी तदुभयपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध नोआत्मा अने आत्माओ तथा नोआत्माओ-ए उभयरूपे अवक्तव्यो छे, १२ देशोना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपक्षाए अने देशना आदेशथी तदुभयपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध नोआत्माओ अने आत्मा तथा नोआत्मा उभयरूपे अवक्तव्य छे, १३ देशना आदेशथी सद्भावपर्यायनी अपेक्षाए, देशना आदेशथी असद्भावपर्यायनी अपेक्षाए अने देशना आदेशथी तदुभयपर्यायनी अपेक्षाए ते त्रिप्रदेशिक स्कंध (कथंचिद् ). आत्मा, नोआत्मा अने आत्मा तथा नोआत्मा उभयरूपे अवक्तव्य छे. माटे हे गौतम! ते हेतुथी एम कर्दा छे के-'त्रिप्रदेशिक स्कंध कथंचिद्-आत्मा छे-इत्यादि यावद्-नो आत्मा छे-'त्यां सुधी बधुं कहे. २१. [प्र०] हे. भगवन् ! चतुःप्रदेशिक स्कन्ध आत्मा-विद्यमान छ के तेथी अन्य छे–इत्यादि प्रश्न. [उ०] हे गौतम ! *चतुःप्र- चतुष्पदेशिक स्कन्थदेशिक स्कन्ध १ कथंचिद् आत्मा छे, २ कथंचिद् नोआत्मा छे, ३ आत्मा अने नोआत्मा उभयरूपे कथंचिद् अवक्तव्य छे, ४-७ कथंचिद् आत्गा अने नोआत्मा छे ४, (एकवचन अने बहुवचनना चार भांगाओ)८-११ कथंचिद् आत्मा अने अवक्तव्य छे ४, १२-१५ कथंचिद् नोआत्मा अने अवक्तव्य छे ४, १६ कथंचिद् आत्मा अने नोआत्मा तथा आत्मान्नोआत्मरूपे अवक्तव्य छे, १७ कथंचिद् आत्मा, नोआत्मा अने आत्माओ तथा नोआत्माओरूपे अववक्तव्यो छे, १८ कथंचित् आत्मा नोआत्माओ तथा आत्मा अने नोआत्मा-उभयरूपे अवक्तव्य छे. १९ कथंचिद् आत्माओ, नोआत्मा तथा आत्मा अने अनात्मरूपे अवक्तव्य छे. २२. [प्र०] हे भगवन् ! शा हेतुथी एम कहेवाय छे के चतुःप्रदेशिक स्कन्ध कथंचित् आत्मा, नोआत्मा अने अवक्तव्य छे–इत्यादि शा हेतुथी 'भारमा' पूर्व प्रमाणे अर्थनो पुनरुच्चार करी प्रश्न करवो. उ०] हे गौतम! १ पोताना आदेशथी-स्वरूपनी विवक्षाथी आत्मा छे, २ परना आदेशथी-पररूपनी विवक्षाथी नोआत्मा छे, ३ तदुभयना आदेशथी आत्मा अने नोआत्मा-ए उभयरूपे अवक्तव्य छे, ४ देशना आदेशथी सद्भा २१* चतुष्प्रदेशिक स्कन्धने विषे पण त्रिप्रदेशिक स्कन्धनी पेठे जाणवू, परन्तु त्यां ओगणीश भांगाओ थाय छे. तेमा प्रथमना प्रण भागाओ सकलादेशी-सकल स्कन्धनी अपेक्षाए थाय छे, ते प्रमाणे बाकीना चार भांगाना प्रत्येके चार चार विकल्पो थाय छे. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.

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