Book Title: Acharang Churni
Author(s): Jindasgani Mahattar, 
Publisher: Rushabhdevji Keshrimalji Shwetambar Samstha

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Page 317
________________ श्रीआचारांम सूत्र चूर्णिः ॥३१५॥ उप्पायगा पहारअकोसदसमसगादिया, यदुक्तं भवति-पडिलोमा, परलोइया परलोकदुक्खुप्पायगा, यदुक्तं भवति-अणुलोमा, केइD लेहलौकिउभयलोइया, तंजहा-अस्सगतो पुरिसो अतिणेति, तहा अणुलोमे परलोमे य करेंति जहा अभयमुदरिसणस्स, भीमाइं अणे. कोपसर्गादि | गरूवाई भीमा पुव्वभणिया, अणेगरूवाइ व भणिया, उवसग्गाहिगारे एव अणुलोमा पडिलोमा य, जेण वुचति-अवि सुम्भिदुन्भिगंधाई अवि पदार्थसंभावणे, सुरभिग्गहणा अणुलोमग्गहणं, दुब्भिगहणा पडिलोमा, पडिगहणा अणुपडिलोमग्गहणं सुरमिगंधपुष्पमल्ल देवा पूएंता, मणुस्सा य तेहिं मुरभिएहिं, दुरभिगंधेहि पाणभोयणेहि, चमरादिअस्सिता, दुरभिगंधा मासा णेया, पडिमाए द्वियस्स अस्सादा गंधा आसी, जत्थ गंधो तत्थ रसोवि, जहा गंधाई तहा सद्दाईपि अणेगरूबाईपि, अणेगरूबाईपि अणुलोमपडिलोमाई, अणुलोमा थुइवंदणापूयाअञ्चणाई, णिभत्थणाति पडिलोमा, अहियासए सयासमाहिए (७४) फासाइंपि विरूवरूवाई अहियासितवां, अहियासए सयतं-णिचं, जहा एगदिवसंतहा अद्धतेरसवासे पक्खाधिते नाणादिएहिं, पढिजइ य-समिते सम्म इतो समितो वासीचंदणकप्पो समभावे हितो, जह गंधरससद्दाई तहा फासाइंपि, विस्वरूबाइंपि सुहासुहफासाई | अवुत्तमवि णच्चति, एवं रूवाणिवि, अहवा अणेगरूबाइंति रूबग्गहणमेव कयं भवति, पढिजइय-अहियासए समाहिते इति मंता भगवं अणगारे इति पदरिसणे, तंजहा-ते चेव सुब्भिसदा पोग्गला दुम्भिसद्दयाए परिणमंति, अहवा इमं मंता-कम्मनिजरा भवति अहियासेंतस्स, इहरहा कम्मबंधो, ण तस्स अगारं विजतीति अणगारो, किंच-सव्वेहिं विसएहिं अणुलोमपडिलोमेहि अरती समुप्पञ्जति, संजमरती ण भवति, अरर्ति रतिं च अभिभूता जा संजमे अरती उप्पञ्जति पडिलोमेहिं उवसग्गेहिं, विणा वा उवसग्गेहिं, असंजमे चा रती सदातिविसए पप्प पुधरतअणुस्सरणाओवा, ते अभिभूत सज्झाणेणेव रीयति माहणेति ||॥३१५।।

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