Book Title: Sramana 2010 10
Author(s): Ashok Kumar Singh, Shreeprakash Pandey
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ISSN-0972-1002 श्रमण ŚRAMAŅA A Quarterly Research Journal of Jainology Vol. LXI No. IV October-December 2010 पार्श्व ना थ वि द्या पी ठ, वा रा ण सी Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण ŚRAMANA A Quarterly Research Journal of Jainology Vol. LXI No. IV October-December 2010 EDITOR Prof. Sudarshan Lal Jain JOINT EDITOR Dr. Shriprakash Pandey Publisher Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi (Recognized by Banaras Hindu University as an external Research Centre) Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण ŚRAMAŅA पार्श्वनाथ विद्यापीठ की त्रैमासिक शोध-पत्रिका A Quarterly Research Journal of Pārsvanātha Vidyāpītha Vol. LXI No. IV October-December-2010 ADVISORY BOARD Dr. Shugan C. Jain, Chairman; Prof. Cromwell Crawford, Hawaii; Prof. Anne Vallely, Canada; Prof. Peter Flugel, London; Prof. Christopher Key Chapple, USA; Prof. Ramjee Singh, Bhagalpur; Prof. Sagarmal Jain, Shajapur; Prof. K.C. Sogani, Jaipur; Prof. D.N. Bhargava, Jaipur, Prof. Prakash C. Jain, Delhi EDITORIAL BOARD Prof. M.N.P. Tiwari, Dept. of History of Art, B.H.U.; Prof. K. K. Jain, Dept. of Jaina Evam Bauddha Darshan, B.H.U.; Prof. Viney Jain, Gurgaon; Dr. A.P. Singh, Dept. of History, B.D.C., Sikandarpur. ISSN: 0972-1002 Subscription Annual Membership Life Membership For Institutions : Rs. 500.00 For Institutions : Rs. 5000.00 For Individuals : Rs. 150.00 For Individuals : Rs. 2000.00 Per Issue Price : Rs. 50.00 Membership fee and articles can be sent in the favour of Parshwanath Vidyapeeth, I T I Road, Karaundi, Varanasi-221005 Published by Shri Indrabhooti Barar, for Parshwanath Vidyapeeth, I. T. I. Road, Karaundi, Varanasi-221005, Ph. 0542-2575521, 2575890 Email: [email protected], [email protected] Type setting-V. C.Mishra, Parvatipuri Colony, Kamachcha, Vns. Printed by- Anand Kumar for Mahaveer Press, Bhelupur, Varanasi नोटः पत्रिका में प्रकाशित विचार और तथ्य लेखक के अपने हैं। यह आवश्क नहीं कि सम्पादक उनके विचार और तथ्यों से सहमत हों । NOTE: The facts stated and views expressed in the Journal are those of authors only. The Editor/Editors may not be agreed with the facts stated in the article. Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पादकीय नव वर्ष की मंगल कामना- दिनाङ्क ५ नवम्बर २०१० को दीपावली पर्व पर आपने निश्चय ही भगवान् महावीर का २५३७वाँ निर्वाण दिवस भक्तिभाव पूर्वक मनाया होगा और अन्तस्तल के गहन अन्धकार को आत्मा की दिव्य ज्योति से दूर किया होगा। भगवान् महावीर निर्वाण से प्रारम्भ होने वाले इस नवीन संवत्सर पर हमारी मंगल कामनाएँ स्वीकार करें। पार्श्वनाथ विद्यापीठ परिवार ने भी इस दिन अपने ७३ वर्ष पूरे करने पर दीपोत्सव सोत्साह सम्मिलित रूप से मनाया। जिज्ञासा-समाधान में इस पर्व पर विशेष लेख भी इस अंक में दे रहे हैं। इसके साथ ही इस त्रैमासिक में समाहित भगवान् पार्श्वनाथ जयन्ती ३१ दिसम्बर २०१० पर हमारी बधाइयाँ स्वीकार करें। ईसवीय वर्ष २०१० का समापन भी इसी दिन हो रहा है और रात्रि १२ बजे के बाद अगला सुप्रभात ईसवीय सन् २०११ का हो रहा है। ईसामसीह का जन्म दिन, 'क्रिसमस' भी २५ दिसम्बर को है। इस हेतु भी श्रमण-परिवार आप सबके प्रति अग्रिम मंगलकामना करता है। श्रमण का यह अंक और विद्यापीठ- मैंने अपने पिछले अंक (जुलाईसितम्बर २०१०) में कहा था कि अगला अंक ISSJS में समागत विदेशी विद्वानों के शोध-लेखों का होगा परन्तु उसे हम अपरिहार्य कारणों से इस अंक के साथ नहीं दे पा रहे हैं, बाद के किसी अंक में देने का पूरा प्रयास करेंगे। इस अंक में पूर्ववत् हिन्दी-अंग्रेजी के लेखों के साथ 'श्रमण-अतीत के झरोखे में का द्वितीय खण्ड प्रकाशित कर रहे हैं। इसमें ई. सन् १९९८ से दिसम्बर २०१० तक के श्रमण में प्रकाशित लेखों की सूची दी गई है जो शोधार्थियों को उपयोगी होगी। श्रमण के इस अंक के मुखपृष्ठ पर षड्-लेश्या का चित्र दिया गया है जो जैन दर्शन के मनोविज्ञानिक चिन्तन को दर्शाता है। क्रोध आदि कषायों से अनुरंजित- मन, वचन और शरीर की गतिविधियों की अवनति व उन्नति के स्तर को बतलाने वाली लेश्याएँ होती हैं। प्रत्येक जीव के शरीर के चारों ओर जो आभामण्डल (Oura) होता है उसके रंग को भी ये बतलाती हैं। ये आत्मा के साथ कर्म-बन्ध में गोंद की तरह कार्य करती हैं। ये छः प्रकार की हैं और अपने रंग के अनुसार व्यक्ति के चरित्र को बतलाती हैं। कृष्ण, नील, कापोत, पीत (तेज), पद्म और शुक्ल इनके माध्यम से व्यक्ति अपनी आध्यात्मिक स्थिति को समझ सकता है। यह चित्र हमें डॉ. शुगनचन्द जैन के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। आगे भी हम इसी तरह के चित्र मुखपृष्ठ Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ - iv : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० पर देते रहेंगे। आगामी अंकों (जनवरी-मार्च २०११) से श्रमण की साइज, लेखों के स्तर आदि को और अच्छा बना रहे हैं। पार्श्वनाथ विद्यापीठ में जैन साध्वियों तथा अध्ययनरत छात्राओं के लिए एक नया श्री धनपतराज सुशीला भंसाली विद्या-भवन बनकर तैयार हो गया है जिसके पुण्यार्जक हैं श्री धनपतराज भंसाली. वाराणसी। यह विद्याभवन उन्होंने अपने माता-पिता की प्रेरणा से उनकी ही स्मृति में बनवाया है। इसका विधिवत् अनुष्ठानपूर्वक उद्घाटन १६ जनवरी २०११ को होगा। इसी अवसर पर पार्श्वनाथ विद्यापीठ से प्रथम बार प्रकाशित इनसाइक्लोपीडिया, खण्ड प्रथम - 'Art and Architecture' का भी लोकार्पण होगा। विद्यापीठ में दिनांक ९ नवम्बर से ३० नवम्बर २०१० तक इन्दिरा गांधी राष्टीय कला केन्द्र, वाराणसी के सौजन्य से 'पाण्डुलिपि संपादन और समीक्षा पर एक कार्यशाला आयोजित हुई जिसका विवरण 'विद्यापीठ के प्राङ्गण' कालम में दिया गया है। इसमें विद्यापीठ के निदेशक का सक्रिय सहयोग रहा। ___डॉ. शुगन चन्द जैन के मार्गदर्शन में पार्श्वनाथ विद्यापीठ अब पी.वी.आई.एस.जे.एस. (PV-ISJS) ग्लोबल सेन्टर के रूप में कार्य कर रहा है जिसके माध्यम से यहाँ विदेशी छात्रों, विद्वानों को जैनधर्म से परिचित किया जा रहा है। कई नयी योजनाएँ भी शुरू हो रही हैं। विशेष के लिए देखें 'विद्यापीठ के प्राङ्गण' शीर्षक में। ___ 'आप पाठकों के द्वारा श्रमण पसन्द किया जा रहा है' यह जानकर प्रसन्नता हुई। हम चाहते हैं कि अपने नये रूप में यह समय से पूर्व आप तक पहुँच जाए। हम विद्यापीठ में विशेष व्याख्यानों का आयोजन भी करते हैं। शीघ्र ही 'कर्मग्रन्थ' का ५वाँ भाग तथा 'जैन कुमार संभव' प्रकाशित हो जायेगा। 'अन्य प्रकाशनों पर भी कार्य पूर्ण होने को है। ___ अन्त में मैं अपने सभी सहयोगियों का आभारी हूँ जिन्होंने बड़ी लगन और मेहनत से इसके संपादन में सहयोग किया है। डॉ. शारदा सिंह को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने प्रूफ रीडिंग की तथा 'श्रमण अतीत के झरोखे में' का संकलन किया। साथ ही श्री विमल चन्द्र मिश्र जिन्होंने टंकण कार्य किया और श्री आनन्द कुमार जैन जिन्होंने छपाई का कार्य किया उन्हें भी धन्यवाद देता हूँ। हम उन सभी लेखकों के आभारी हैं जिनके लेख यहाँ छपे हैं। सम्पादक सुदर्शनलाल जैन Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण अक्टूबर-दिसम्बर २०१० विषयसूची 07-19 20-24 25-31 32-38 39-49 १. आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी २. उत्तराध्ययन सूत्र की सुखबोधा वृत्ति : एक समीक्षा डॉ. एच. सी. जैन ३. तत्त्वार्थसूत्र के कुछ बिन्दुओं पर विचार _____ डॉ. वन्दना मेहता ४. ध्यान : एक अनुशीलन डॉ. रूबी जैन ५. पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन डॉ. मधुबाला जैन ६. वैदिक व श्रमण परम्परा में समान धार्मिक क्रियायें डॉ. मनीषा सिन्हा 1. Representation of Nature in Jaina Art and Tradition Dr. Shanti Swaroop Sinha 2. Jaina Ethics and Its Refletions on Society Prof. (Smt.) Rekha Chaturvedi जिज्ञासा और समाधान (दीपावली पर्व, नमोकार मंत्र) विद्यापीठ के प्रांगण में जैन जगत् साहित्य-सत्कार श्रमण अतीत के झरोखे में 50-54 55-64 65-74 75-79 80-84 ____85 86-89 85 90-136 Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ADVERTISEMENT Parashwanath Vidhyapeeth Varanasi (PV) invites scholars of Jain philosophy, religion, non violence to join its ambitious expansion plans. PV provides an excellent fully equipped campus adjacent to BHU and opportunities to teach and work with foreign scholars and students in India and abroad. PV is an approved external research organization of BHU. PV is a well known Jain education and research organization since 1937. PV is honoured to have leading scholars of Jainism with it since its inception. It has now planned a major expansion plan to conduct research and its applications in Jain doctrine, ethics, languages, meditation, rituals, history, art and their application to resolve issues of society in 21" century. PV has openings for the following academic staff: Position Qualification Experience Professor / Principal Research Fellow Ph.D. 10 + years Associate Professors/ Senior Research Fellows Ph.D. 6+ years Assistant Professors/ Research Fellows Ph.D. 1+ years P.G. Research Fellows Ph.D. Fresh Research Assistants M.A./Ph.D. 1 year for M.A. Other Requirements: The candidates should have demonstrable experience of conducting research and publishing and/or teaching in reputed universities or research institutes. Fluency in English and computer working is desirable along with command of Hindi /Prakrit or Sanskrit. Candidates who have superannuated /retired may also apply for suitable openings. Candidates for Research Associates without a Ph.D. will have the option to work for a Ph.D. also while serving PV. Salary: Competitive salary along with living accommodation at the campus shali be provided. General: All positions are for posting at the campus of PV in Varanasi. Initially all the positions shall be on contract basis for three years and likely to be made permanent on successful completion of the contract period. Openings, especially for foreign scholars also exist for shorter periods of 6 months to one year to work on specific projects earmarked by PV. Please send your applications by 30th March 2011. The President PV D-28, Panchsheel Enclave, New Delhi- 110017 or email to [email protected] Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंक ४ श्रमण, वर्ष ६१, अक्टूबर-दिसम्बर - २०१० आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी * [ विद्वान् लेखक द्वारा १९ फरवरी २००८ को विश्वविद्यालय पाटन में प्रो. नन्दी द्वारा सम्पादित "काव्यानुशासन" के प्रकाशन के अवसर पर उत्तर गुजरात में हेमचन्द्राचार्य विषय पर दिए गये व्याख्यान का यह लेखबद्ध रूप है। लेखक ने संस्कृत काव्य साहित्य विज्ञ अभिनवगुप्त से तुलना करके आचार्य हेमचन्द्र के व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बताया है। प्रसङ्गवश अन्य काव्य- शास्त्रियों की समीक्षा करते हुए तथा अपने मत को प्रस्तुत करते हुए हेमचन्द्राचार्य के स्वतन्त्र- चिन्तन को सराहा है । ] संस्कृत काव्यशास्त्र में जो स्थान आचार्य अभिनवगुप्त का है लगभग वही अथवा उससे बड़ा स्थान आचार्य हेमचन्द्र का ठहरता है। आचार्य अभिनवगुप्त आजीवन तपोरत रहे। वे कश्मीर के शैव पीठ के महामहेश्वराचार्य भी थे। हेमचन्द्र को अभिनव गुप्त के बाद के आचार्यों को अनुपलब्ध ग्रन्थ भी उपलब्ध थे। किन्तु उनका साहित्यिक योगदान साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में केवल बोलकर लिखाई गयी दो टीकाओं तक सीमित है, जबकि आचार्य हेमचन्द्र का लेखकीय योगदान चतुरस्त्र और साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में भी स्पृहणीय ही नहीं, अद्वितीय है। उन्होंने काव्यानुशासन नामक एक स्वतन्त्र ग्रन्थ तो दिया ही, उस पर स्वयं विवेक नामक विस्तृत विवरण भी दिया, जिसकी सामग्री ऐतिहासिक भी है और उपादेय भी । उन्होंने ग्रन्थ - लेखन में भी प्राचीन पद्धति को पुनर्जागरण दिया और साहित्यशास्त्र को महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी पद्धति प्रदान की। यह पद्धति सुगम भी थी और प्रचलित भी । काव्यानुशासन में उन्होंने अनुच्छेदों को अध्याय नाम दिए । साहित्यशास्त्र के सभी विषयों का नवीन समायोजन भी किया और उसमें काव्यप्रकाश जैसी ढील नहीं आने दी। काव्यप्रकाश का तृतीय उल्लास उसी प्रकार द्वितीय उल्लास में जोड़ा जा सकता था जिस प्रकार नवम उल्लास दशम में और पूरा काव्यप्रकाश केवल आठ उल्लासों में रखा जा सकता था। चाहते तो मम्मट भी अपने काव्यप्रकाश * प्रोफेसर इमेरीट्स संस्कृत साहित्य, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० के अनुच्छेदों को उल्लास के स्थान पर अध्याय नाम दे सकते थे जबकि वे वैयाकरणवंश में पैदा हुए थे। यद्यपि वे उत्पन्न हुए थे कश्मीर की उर्वर कल्पना की भूमि में तथापि यह प्रसिद्ध ही है कि उनकी काव्यनिर्माणशक्ति लगभग दुर्बल थी, जबकि आचार्य हेमचन्द्र का संस्कृत भाषा का काव्यलेखन भी अद्वितीय था, जैसा कि उनकी अमर कृति 'त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम्' से स्पष्ट है, जिसमें लेखन का 'पाक' नामक गुण भी अत्यन्त प्रौढ़ि के साथ उपलब्ध है। काव्यनिर्माणशक्ति आचार्य अभिनवगुप्त में भी इतनी अच्छी थी कि वे काव्यकला में सुमेरुशृङ्ग का स्थान पाने योग्य अपने युग का पूर्ण और सही प्रतिनिधित्व करते थे, तथापि वे कोई स्वतन्त्र काव्यकृति नहीं दे पाए। इस अवसर पर मैं जैन सन्तों का स्मरण अतीव आदर के साथ करना चाहूंगा जिन्होंने प्राचीन ग्रन्थों की प्रतिलिपि को धर्मानुष्ठान का स्वरूप दिया और उस समय भी अपने विशाल वाङ्मय को बचाए रखा, उस समय मुद्रण कला का विकास नहीं था । कालिदास - साहित्य के क्षेत्र में मेरा अनुभव यह है कि कालिदास - साहित्य पर लिखी गई जैन टीका-विषयक जैन- परम्परा भी अनेक स्थानों पर महत्त्वपूर्ण है। - - साहित्यशास्त्र ही नहीं आचार्य हेमचन्द्र का साहित्यिक अवदान अन्य और छूटे शास्त्रों तथा अस्पृष्ट विषयों तक व्यापक है। मैं तो केवल दो ही क्षेत्रों में सिमटा रहा — एक संस्कृत काव्यशास्त्र और दूसरा कालिदास साहित्य | इन दोनों में मेरी जो उपलब्धियाँ हैं उनसे मैं स्वयं को कृतकृत्य मानता हूँ। कालिदास साहित्य से मैंने अकालिदासीय साहित्य छाँट दिया है और कालिदास का मूलपाठ भी लगभग असंगतियों से मुक्त और सुसिद्धान्तित कर लिया है। काव्यशास्त्र में मुझ पर ही माता सरस्वती की कृपा हुई कि मुझे ही सर्वसमन्वयी महावाक्य ‘अलं ब्रह्म’ प्राप्त हुआ। चमत्कार या आनन्द ही जब काव्य का उपेय है तब काव्य का भी वही गन्तव्य ठहरता है जो दर्शन का है, क्योंकि आनन्द एकमात्र ब्रह्म ही होता है। यह ऐसी उपलब्धि है जिसमें हम विचार के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी एकरूपता और अस्मिता बचाए मिलते हैं। इस विशेषता के साथ कि दर्शन तो हमें केवल आनन्द का मार्ग दिखलाता है, जबकि साहित्य हमें सीधे आनन्द के सुधासागर में निमग्न कर देता है। रही बात क्षणिकता की तो उसका कोई परिताप नहीं 'वरमद्यकपोतः श्वोमयूरात्' न्याय से। मुझे 'संस्कृत काव्यशास्त्र का आलोचनात्मक इतिहास' भी लिखना पड़ा है और मैं समझता हूँ कि मेरी चतुर्धाम एवं कल्पपञ्चक स्थापना भी वैज्ञानिक Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : ९ है। यही एकमात्र मार्ग था जिससे आलोचना को समग्रता मिल सकी है। इसी से रस को काव्य में स्थान मिल सका। अन्यथा वह फेंक दिया गया था रसिक में, जो काव्य का अनुभविता है, काव्य नहीं। उद्भट तक के आचार्य इस तथ्य से अवगत थे। वे वस्तुवादी और तथ्यपूर्ण आलोचना के पक्षपाती थे। ध्वनिवादियों के समान वे कल्पनालोक के विपर्यस्त विचारक नहीं थे। हम अध्येता भी भावना में अधिक बहे और इसी विपर्यास की स्थिति में इस देश की प्रज्ञा ने काव्यशास्त्र के इतिहास की मध्यवर्ती एक सहस्राब्दी (ई. सन् ८०० से २०००) बिता दी। आचार्य हेमचन्द्र भी यद्यपि इसी अवधि की देन हैं तथापि वे अधिक भावुक न होकर कुछ सावधान मिलते हैं। अपने इतिहास में हमने आचार्य हेमचन्द्र को उचित गौरव दिया है। उन्हें ध्वनिवादी आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त और मम्मट इन तीनों आचार्यों का ज्ञान है किन्तु वे इनके समान अतिवादी नहीं हैं। वे स्वयं भी विचार करते और अपने तर्कों के साथ स्वतन्त्र निर्णय लेते हैं। यह तथ्य उनके निम्नलिखित निर्णयों से प्रमाणित है १. काव्यप्रयोजन के रूप में मम्मट ने जो छ: लाभ गिनाए थे उनमें से आचार्य हेमचन्द्र ने केवल तीन लाभों को अपनाया-आनन्द, यश और कान्तासम्मित उपदेश को। धन, व्यवहार-कौशल तथा अनर्थनिवारण को वैकल्पिक स्थान भी नहीं दिया। उनका कथन है धनमनैकान्तिकम्, व्यवहारकौशलं शास्त्रेभ्योऽपिअनर्थनिवारणम् । प्रकारान्तरेणापीति न काव्यप्रयोजनतया अस्माभिरुक्तम् ।। यद्यपि कार्य या कारण में वैलक्षण्य का निवेश कर आचार्य हेमचन्द्र त्यक्त प्रयोजनों को भी नव्यन्याय के धरातल पर मान्य कर सकते थे। आगे बढ़कर काव्य के साथ प्रयोजन की अनिवार्यता को अमान्य भी किया जा सकता था। उसके लिए आदिकवि का दृष्टान्त था ही। यह धृष्टता हमने काव्यालङ्कारकारिका में की भी है। काव्य या साहित्य के प्रयोजन के विषय में आचार्य हेमचन्द्र ने साहित्य मनीषियों के लिए एक अदभुत सुभाषित उद्धृत किया है। यह सुभाषित एक प्रकार की गायत्री विद्या है, जिसे हमें सतत जपना है उपशमफलाद् विद्याबीजात् फलं धनमिच्छतो भवति विफलो यद्यायासस्तदत्र किमद्भुतम् । Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० न नियतफला भावाः कर्तुं फलान्तरमीशते जनयति खलु ब्रीहेर्बीजं न जातु यवाङ्कुरम् ।। निश्चित ही भारतीय दृष्टि से साहित्यसाधना एक अध्यात्म साधना है और उसका एकमात्र उद्देश्य आन्तरिक शान्ति है। डॉ. नन्दी ने इसे शान्तिशतक से उद्धृत बतलाया है। शतपत्रम् में हमने भी कुछ ऐसा ही उद्गार व्यक्त किया है कविता यदि कीर्तये धनाय व्यवहाराय शरीरशोधनाय । व्यवसायमिमं विभावयामो व्यवसायः कविता कदापि नासीत् ।। संस्कृत महाकाव्य सीताचरितम्, जो अब उत्तरसीताचरितम् नाम से प्रसिद्ध है, उसके मुखबन्ध में भी हमारी विनती थी न यशसे न धनाय शिवतरक्षतिकृतेऽपि च नैव कृतिर्मम । इयमिमां भरतावनिसंस्कृतिं सुरगवीं च निषेवितुमुद्गता' ।। मम्मट के समय तक काव्य और नाट्य की धारणाएँ अनेकता तक ढल चुकी थीं। मम्मट केवल काव्य तक सीमित रहे, जबकि आचार्य हेमचन्द्र ने नाट्य-परिभाषाओं को भी स्थान दिया और काव्यानुशासन की विवेक नामक विस्तृत विवरणिका में उनका विशद विवेचन भोजराज की भाँति किया। हेत्वलङ्कार पर विवेक में आचार्य हेमचन्द्र ने रुद्रट से लेकर मम्मट तक हुए पक्ष-प्रतिपक्ष का विस्तृत विवेचन किया और उसे अन्ततः अमान्य घोषित कर दिया। जिस रूपक को मम्मट ने केवल सादृश्यमूलक आरोप तक सीमित रखा था उसे आचार्य हेमचन्द्र ने भी उसी रूप में प्रस्तुत किया, यद्यपि परवर्ती शोभाकरमित्र उसे आरोप सामान्य तक व्यापक मानते पाए जाते हैं। २. आचार्य हेमचन्द्र रससूत्र में स्थायी भाव को भी स्थान देते हैं। उनके अनुसार रससूत्र का स्वरूप ऐसा है— विभावानुभावव्यभिचारिभिरभिव्यक्तः स्थायी भावो रसः। यह भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के सप्तम अध्याय में आए निम्नलिखित वचन का ही रूपान्तर था'विभावानुभावव्यभिचारिभिरभिव्यक्तः स्थायी रसनाम लभते किन्तु हेमचन्द्राचार्य के उक्त सूत्र में स्पष्ट रूप से मम्मट के काव्यप्रकाश की निम्नलिखित कारिकाओं की अनुश्रुति है कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च । रत्यादेः स्थायिनो लोके तानि चेन्नाट्यकाव्ययोः । Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : ११ अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिणः । विभावा व्यक्तः स तैर्विभावाद्यैः स्थायीभावो रसः स्मृतः ।। किन्तु यह भी सत्य है कि रससूत्र में स्थायी का उल्लेख नाट्यशास्त्र और ध्वनिवादियों के प्रमुख पक्षधरों में नहीं ही है। अभिनवगुप्त अनुल्लेख का ही समर्थन करते और कहते हैं कि यदि उल्लेख होता तो वही रसानुभूति में शल्य बन जाता। अनुल्लेख के समर्थक आचार्य उसे विभावतावच्छेदक के रूप में स्वतः संगृहीत मान लेते हैं। इनके अनुसार केवल दुष्यन्त नहीं, अपितु शकुन्तलाविषयकरतिमान् दुष्यन्त होगा सामाजिकों के लिए विभाव। सामाजिकों को यह विदित रहता है कि दुष्यन्त शकुन्तला के प्रति अनुरक्त है और शकुन्तला दुष्यन्त के प्रति। इस प्रकार रति नामक स्थायी भाव विभाव के साथ आया माना जा सकता है। हेमचन्द्राचार्य ने इस विवाद पर कोई टिप्पणी नहीं की। वस्तुतः रससूत्र का जो रूप नाट्यशास्त्र में उद्धृत है वह उसका तृतीय आकार है । 'चिदेव रसः' प्रथम आकार बनता है और 'भावविशिष्टा चिद् रसः' द्वितीय । हेमचन्द्राचार्य द्वारा उद्धृत स्थायियुक्त सूत्र रससूत्र की चौथी परम्परा में आता है । पाँचवीं परम्परा में उसमें सात्त्विक भाव भी जोड़ दिए जाते हैं। ध्वनिवाद में सात्त्विक भाव अनुभावों के साथ गिन लिए गये माने जाते हैं। यह पूरा विवरण हमने अपने नाट्यशास्त्र में विस्तार के साथ दे दिया है । ' ३. वैज्ञानिक प्रक्रिया हेमचन्द्राचार्य ने सात्त्विकभावों की निष्पत्ति में वैज्ञानिक प्रक्रिया काव्यानुशासन की अलंकारचूडामणि नामक स्वोपज्ञ वृत्ति में इस प्रकार दी है सीदन्त्यस्मिन्निति सत्त्वं प्राणात्मकं वस्तु, सत्त्वगुणस्यात्रोत्कर्षः, साधुत्वञ्च । अयं च पृथिवीभागप्रधाने प्राणे संक्रान्तचित्तवृत्तिगणः स्तम्भः विष्टब्धचेतनत्वम् । जलप्रधाने तु प्राणे वाष्पः । तेजसस्तु प्राणनैकत्वाद् उभयथा तीव्रातीव्रत्वेन प्राणानुग्रहे स्वेदो वैवर्ण्यञ्च । आकाशानुग्रहे गतचेतनत्वं प्रलयः । वायुस्वातन्त्र्ये तु तस्य मन्दमध्योत्कृष्टावेशात् त्रेधा रोमाञ्च-वेपथु-स्वरभेदभावेन स्थितिरिति भरतविदः । बाह्यास्तु स्तम्भादयः शरीरधर्माः अनुभावाः ते चान्तरालिकान् सात्त्विकान् भावान् गमयन्तः परमार्थतो रतिनिर्वेदादिगमका इति स्थितम् ।। ९ यहाँ 'भरतविदः' शब्द ध्यान देने योग्य है। अवश्य ही हेमचन्द्राचार्य को प्राप्त इस प्रक्रिया का भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से सम्बन्धित कोई आगम रहा होगा। उससे सम्बन्धित जो अभिनवभारती रही होगी या तो वह प्राप्त नहीं है Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० अथवा वह स्वयं अभिनवगुप्त को सुलभ नहीं थी। ऐसे अन्य आगम भी हैं जो अभिनवगुप्त में नहीं मिलते, किन्तु जिन्हें भावप्रकाशन उद्धृत करता है। इस प्रकरण में सत्त्व परिभाषा की व्युत्पत्ति भी ध्यान देने योग्य है। स्वयं भरतमुनि 'सत्त्व' शब्द को अनेक अर्थों में प्रस्तुत करते हैं जिनमें से एक अर्थ देह भी है- देहात्मकं भवेत् सत्त्वम्। 'प्राण' शब्द की उपर्युक्त व्युत्पत्ति देह पर ही लागू होती है। हेमचन्द्राचार्य ने विवेक में इन सबके उदाहरण भी दिए हैं। इस वैज्ञानिकता का सम्बन्ध लोक से है तथापि कवि द्वारा काव्य में भी उसे प्रदर्शित करने पर द्रष्टा सहृदय का चित्त प्रभावित होता और रसास्वाद तक पहुँचता है, इसलिए इन्हें अलौकिक भाव भी माना जा सकता है। हेमचन्द्राचार्य इनके निरूपण में मम्मट, अभिनवगुप्त और स्वयं आनन्दवर्धन से ही नहीं, इनके पूर्ववर्ती आचार्यों से भी आगे हैं। ४. हेमचन्द्राचार्य ने स्थायी भावों के स्थायित्व की पँहचान यह कहकर की कि इन भावों के विषय में कारण-जिज्ञासा नहीं होती। इन्हें स्वाभाविक माना जाता है। इस तथ्य पर हेमचन्द्राचार्य ने अभिनवगुप्त की पंक्तियाँ अपना ली हैं और लिखा है जात एव हि जन्तुरियतीभिः संविद्भिः परीतो भवति०००। ये पुनरमी धृत्यादयश्चित्तवृत्तिविशेषास्ते समुचितविभावाभावाज्जन्मध्ये न भवन्त्येवेति व्यभिचारिणः। तस्यापि वा भवन्ति विभावबलात् तस्यापि हेतुप्रक्षये क्षीयमाणाः संस्कारशेषतां नावश्यमनुभवन्ति। रत्यादयस्तु संपादितस्वकर्तव्यतया प्रलीनकल्पा अपि संस्कारशेषतां नातिवर्तन्ते, वस्त्वन्तरविषयस्य रत्यादेरखण्डनात् । यदाह पतञ्जलिः न हि चैत्र एकस्यां स्त्रियां रक्त इत्यन्यासु विरक्तः इति।।११ ५. सञ्चारी भावों के लिए हेमचन्द्राचार्य ने व्यभिचारी भाव शब्द का ही प्रयोग किया और इस निश्चय का समर्थन इन शब्दों में किया अमी स्थायिनं विचित्रयन्तः प्रतिभासन्त इति व्यभिचारिण उच्यन्ते। तथाहि ग्लानोयमित्युक्ते कुत इति हेतुप्रश्नेनास्थायितास्य सूच्यते । न तु राम उत्साहशक्तिमानित्यत्र हेतुप्रश्नमाहुः। __ भोजराज का यह उद्घोष कि चित्तवृत्तिरूप होने से सभी भाव अस्थायी होते हैं इसीलिए रत्यादि भावों को भी स्थायी नहीं कहा जा सकता। ऐसा हेमचन्द्राचार्य के समक्ष रहा होगा, किन्तु उसे उन्होंने मान्यता नहीं दी और Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : १३ उक्त तर्कों के द्वारा उन्होंने स्थायी भावों की स्थायिता का समर्थन किया। कदाचित् हेमचन्द्राचार्य को भोजराज को प्राप्त अग्निपुराण का अहमागम या अहंकारागम रुचिकर नहीं लगा और रस के लिए प्रयुक्त शृङ्गार शब्द भी। इसीलिए शारदातनय ने भी अपने ग्रन्थ को 'भावप्रकाश' कहना अधिक उपयुक्त माना, शृङ्गारप्रकाश नहीं। भोजराज ने सरस्वतीकण्ठाभरणालङ्कार में भी अग्निपुराण के इस आगम को मान्य माना था। हेमचन्द्राचार्य यहाँ इस आगम की चर्चा कर सकते थे, किन्तु आश्चर्य की बात है कि इस आगम की चर्चा साहित्यशास्त्र के किसी भी आचार्य ने नहीं की। यहाँ तक कि स्वयं भोज भी इस आगम का उल्लेख नहीं करते, जबकि यह आगम इन्हीं के वंश के पुराण अग्निपुराण में मिलता है और इसी को वे शृङ्गारैकरसवाद सरस्वतीकण्ठालङ्कार में भी अपनाते हैं। आनन्दवर्धन ने पर्यायोक्त, आक्षेप आदि जिन अलंकारों में ध्वनि के अन्तर्भाव का खण्डन किया है, उनमें ध्वनि के अन्तर्भाव का पक्ष केवल अग्निपुराण में मिलता है। महामहोपाध्याय काणे, पद्मविभूषण डॉ. डे और पद्मभूषण डॉ. वेंकटराम राघवन् आदि आज के विद्वानों के ही समान कदाचित् प्राचीन विद्वानों में भी अग्निपुराण के आगम होने में सन्देह था। वस्तुस्थिति यह है कि अग्निपुराण आगमों का संग्रह है। इसमें परवर्ती आगम भी बाद में जोड़ दिए जाएँ तो पूर्ववर्ती आगम अमान्य नहीं हो सकते, किन्तु हम अवश्य ही आत्मविस्मरण के विषम विष से प्रभावित हैं और हमारे अग्रणी आचार्य भी इस विष से प्रभावित लगते हैं। इसीलिए बोधवारिधि जैसे यथार्थ विरुद से अलंकृत महापुरुष अभिनवगुप्त साहित्यागम के ही समान, क्यों नहीं प्रस्तुत करते अपना स्वयं का आगम शिवागम, रसनिष्पत्तिप्रक्रिया के सन्दर्भ में। स्वयं शिवागम की रसनिष्पत्तिप्रक्रिया पहले पहल प्राप्त होती है शारदातनय के भावप्रकाशन में। यद्यपि अभिनवभारती के मङ्गल पद्य में पीठिका की यही प्रक्रिया है, तथापि वह उद्गार मात्र है, निरूपण नहीं। हमने यह प्रक्रिया अपने 'अलं ब्रह्म' ग्रन्थ में दे दी है। हेमचन्द्राचार्य भी इस कमी से मुक्त नहीं कहे जा सकते, यद्यपि वे भी वस्तुत: कलिकाल सर्वज्ञ हैं। वे अपने जैन आगम की रसनिष्पत्ति प्रक्रिया दे सकते थे। किन्तु उनकी पदावली इस सन्दर्भ में लगभग वही है जो ध्वनिवाद में मिलती है। यद्यपि सत्त्वपरिभाषा में वे भरतमुनि से अधिक प्रभावित हैं। पण्डितराज जगन्नाथ के समान वे स्वयं कहते हैं कि भरत केवल मान्य आचार्य हैं। उनका यह वचन भरतमुनि के प्रति उनके असाधारण आदर का प्रमाण है Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० यद्यपि शाक्याचार्या राहुलादयस्तु मौग्ध्यमदभाविकत्वपरितपनादीनप्यलङ्कारानाचक्षते तेऽस्माभिर्भरतमतानुसारिभिरुपेक्षिताः १२ । ६. अलङ्कारों के विषय में हेमचन्द्राचार्य का स्वतन्त्र अध्ययन अभी तक अपेक्षित है। वे ध्वनिवाद के प्रभाव में अलङ्कार को काव्य की महासंज्ञा तो नहीं मान सके, किन्तु उनके विषय में उन्होंने अपने अध्ययन में कमी नहीं रखी। जो विषय जहाँ से मिला उसे उन्होंने वहाँ से अपनाया और मान्य तर्कों के आधार पर अपना निर्णय दिया। कुछ अलंकारों का आगे उल्लेख किया जाएगा। आश्चर्य की बात आश्चर्य की बात यह है कि हेमचन्द्राचार्य व्यञ्जना को अर्थवृत्ति कहते हुए भी महिमभट्ट के समान अनुमान घोषित नहीं कर सके, जबकि हेत्वाभासाश्रित अनुमान को सभी अनुमान ही कहते आए हैं। पितामह को पौत्र का पिता माना जा सकता है, परन्तु कहा नहीं जा सकता। बल्दियत में तो पिता ही लिखा जाएगा 'पिता' । काव्यशास्त्र भी शास्त्र है। इसकी व्यवस्था लोकविरुद्ध होने पर कोरी भावुकता ठहरेगी। वह ठुकराई जाएगी। व्यञ्जनावाद को जयन्तभट्ट ने ठोकर लगाई ही। श्रीश्रीहर्ष के 'नैषधीयचरित' का निम्नलिखित उद्गार भी वैसी ही ठोकर है दिशि दिशि गिरिग्रावाणः स्वां वमन्तु सरस्वतीं तुलयतु मिथस्तामापातः स्फुरद्ध्वनिडम्बराम् । स पुनरपरः क्षीरोदन्वान् यदीयमुदीयते मथितुममृतं खेदच्छेदि प्रमोदनमोदनः ।। १३ ये दोनों मेधावी विद्वान् महान् दार्शनिक ग्रन्थकार ही नहीं, उत्तमोत्तम कवि भी हैं। स्वयं अभिनवगुप्त से ही साहित्यशास्त्र पढ़े क्षेमेन्द्र ने भी व्यञ्जना को शब्दवृत्ति नहीं कहा। रुद्रट, उद्भट, वामन, भामह, दण्डी, कुन्तक, महिमभट्ट आदि इसी पक्ष के आचार्य हैं। किन्तु मम्मट, जयदेव, विश्वनाथ कविराज. और एकावलीकार ध्वनिवाद में ही घिरे रहे और मम्मट द्वारा प्रस्तुत धूलीप्रक्षेप को ही प्रस्तुत कर संतोष करते रहे। इन आचार्यों ने अनुमान के विरोध में व्यञ्जकगत साध्य के साथ अनिश्चितता और सन्दिग्धता को उछाला था । वस्तुतः हेतुगत दोष अनुमान का बाधक न होकर अनुमानगत प्रामाण्य का बाधक Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : १५ होता है। जहाँ तक प्रामाण्य का सम्बन्ध है स्वयं ध्वनिवादी आनन्दवर्धन काव्य में उसे विरोधी घोषित कर चुके हैं। हेमचन्द्राचार्य इस कमी को दूर कर सकते थे। प्रसन्नता की बात इतनी ही है कि उन्होंने ध्वनिवाद को दृढ़ता के साथ प्रस्तुत नहीं किया। इन और ऐसी अन्य विशेषताओं के कारण हेमचन्द्राचार्य उदार काव्यशास्त्री ठहरते हैं। ___ व्याकरण और छन्दोनुशासन को भी हेमचन्द्राचार्य ने पुनः प्रस्तुति दी है जिसमें प्रक्रिया नई है, किन्तु निष्पत्ति वही है जो आवश्यक थी। शताब्दियों पूर्व जैन मनीषियों ने हेमचन्द्राचार्य के अनुसार धातुपाठ पर ग्रन्थ भी लिखे। छन्दोनुशासन में हेमचन्द्राचार्य ने नाट्यशास्त्र से आगे बढ़कर प्रत्ययों की संख्या तीन से आगे पाँच मानी और सभी के लक्षण भी दिए तथा उदाहरण भी। जबकि भरत के नाट्यशास्त्र में प्रस्तार, उद्दिष्ट और नष्ट तीन ही प्रत्यय स्पष्ट थे। अलंकारों के विषय में हेमचन्द्राचार्य का संग्रह तथा मनन स्तुत्य है। वे पूर्वाचार्यों के मत प्रस्तुत कर उनका विश्लेषण करते और अपना अभिमत प्रस्तुत करते हैं। यथास्वभावोक्ति स्वभावोक्ति पर मम्मट के पूर्ववर्ती कुन्तक ने उसे अमान्य करते हुए जो तीक्ष्ण प्रहार किया था उसका वैसा ही उत्तर एकमात्र महिमभट्ट ने दिया था। हेमचन्द्राचार्य ने उसे अपनाया और वे संप्रदायवाद से तटस्थ रहे। अन्य अलंकारों के विषय में भी हेमचन्द्राचार्य ने पुनर्विचार किया और अनेक नवीन निष्कर्ष प्रदान किए। कन्तक द्वारा अस्वीकृत समासोक्ति, सहोक्ति आदि पर हेमचन्द्राचार्य ने विचार किया और प्राचीन आचार्यों के मान्य तर्क प्रस्तुत किए। व्याजरूपा व्याजोक्ति में हेमचन्द्राचार्य ने अशिष्टता से बचने का आगाह किया। एक उदाहरण दिया आसीन्नाथ पितामही तव मही माता ततोऽनन्तरं , जाया संप्रति भाविनी पुनरहो सैवानवद्या वधूः ।। १४ अर्थात् हे राजन्! भूमि पहले आपकी पितामही रही, फिर माता, उसके बाद प्रिय-जाया और आगे चलकर यही आपकी पुत्रवधू बनेगी। सोचिए कि हेमचन्द्राचार्य कितनी सटीक बात कह रहे हैं। उन्होंने इसे अत्यन्त असभ्य उक्ति कहा है। यह कोई मर्यादावादी महापुरुष ही कह सकता है। अन्यथा वामन ने तो लक्ष्मी और विष्णु के प्रथम संभोग तक को पर Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० कल्याणकारी उदाहरण बना रखा हैकचकुचचिबुकाग्रे पाणिषु व्यापृतेषु प्रथमजलधिपुत्रीसङ्गमेऽनङ्गधाग्नि । निबिडनिबिडनीवीग्रन्थिविश्लेषणोच्छोश्चतुरधिककराशा शाङ्गिणो वः पुनातु ।।१५ इसी प्रकार ससन्देहालङ्कार का विशद निरूपण कर उसके कतिपय स्थलों को हेमचन्द्राचार्य रसाभास या भावाभास कहते हैं। हेमचन्द्राचार्य ने सूक्ष्म तथा अर्थापत्ति का अन्तर्भाव अनुमान में दिखलाया है।१६ सारालङ्कार को परिसंख्या में गतार्थ बतलाते हुए हेमचन्द्राचार्य ने टिप्पणी दीराज्ये सारं वसुधेत्यादौ सारालङ्कारः कैश्चिदुक्तः, स चान्यापोहमन्तरेण न चमत्करोतीति परिसंख्यैवालङ्कार। हेमचन्द्राचार्य ने हेत्वलङ्कार पर विस्तृत और गम्भीर विवेचन करने के बाद लिखा कि काव्यप्रकाश का इस अलङ्कार को अमान्य ठहराना ठीक है यदि इसके स्थलों में चमत्कार न हो। इसका अर्थ यह कहना है कि हेत्वलङ्कार स्थल में चमत्कार का अनुभव हो रहा हो तो उसे अलङ्कार स्वीकार किया जा सकता है। तब मम्मट द्वारा उसे काव्यलिङ्ग अलङ्कार में अन्तर्भूत मानना उचित न होगा।१८ यह कदम कोई स्वस्थ विचारक ही ले सकता है। विनोक्ति में हेमचन्द्राचार्य ने कोई चमत्कार नहीं देखा और सहोक्ति को उपमा में अन्तर्भूत माना।१९ पण्डितराज जगन्नाथ ने विनोक्ति में ध्वनित्व भी माना और 'विशालाभ्यामाभ्यां' उदाहरण प्रस्तुत किया। हेमचन्द्राचार्य ने भाविकालङ्कार के सन्दर्भ में मम्मट से आगे बढ़ते हुए अभिनेय वस्तु और या नाट्य के प्रवेशक, विष्कम्भक आदि को भी स्मरण किया है। यह एक अत्यन्त विचारणीय विषय है।२० उदात्तालंकार में मम्मट ने भोजराज की दानकीर्ति से संबन्धित जो 'मुक्ताः केलिविसूत्रहारगलिता:' उद्धृत किया है उसमें हेमचन्द्राचार्य ने अतिशयोक्ति को मान्यता दी है।२१ "तदिदमरण्यं' इस द्वितीय उदाहरण में भी हेमचन्द्राचार्य ने रामचरित की ध्वनि या उसी के गुणीभूतव्यङ्ग्य को मानने का तर्क प्रस्तुत किया है।२२ इसी प्रकार 'आसीदञ्जनमत्रेति' पद्य में भावध्वनि का चमत्कार माना है, भाविक का नहीं।२३ प्रत्यनीकालंकार में चमत्कार का कारण हेमचन्द्राचार्य ने उत्प्रेक्षा को माना है।२४ समाधान हेमचन्द्राचार्य ने साहित्यशास्त्र में अनेक समाधान भी प्रस्तुत किए हैं। उदाहरणार्थ लता और वृक्ष के व्यवहार से यदि स्त्री-पुरुष के व्यवहार का Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : १७ द्योतन हो रहा हो तो वहाँ रस नहीं, अपितु रसाभास है। एतदर्थ उन्होंने कुमारसम्भव के अष्टम सर्ग का निम्नलिखित पद्य प्रस्तुत किया है अङ्गुलीभिरिव केशसञ्चयं सन्निगृह्य तिमिरं मरीचिभिः । कुड्मलीकृतसरोजलोचनं चुम्बतीव रजनीमुखं शशी ।। २५ इसी प्रकार दोष, गुण और अलंकारों पर हेमचन्द्राचार्य ने अनेक नवीन तर्क और समाधान प्रस्तुत किए हैं। अपेक्षा ___वस्तुतः काव्यशास्त्र का एक-एक विषय हेमचन्द्राचार्य के समय तक पर्याप्त विस्तार पा चुका था, अत: उस पर पूर्ववर्ती विमर्श प्रस्तुत कर परवर्ती विकास भी दिया जाना अपेक्षित है। तभी हमारा साहित्यशास्त्रीय अध्ययन पूर्ण होगा। इस दिशा में कहीं से किसी प्रकार के अभियान की सूचना नहीं है। आचार्य हेमचन्द्र के नाम पर निर्मित पाटन के विश्वविद्यालय में यह अपेक्षा पूरी की जा सकती है। अच्छा होगा यदि इस विश्वविद्यालय में एक-एक शास्त्र की एक-एक स्वतन्त्र फैकल्टी स्थापित हो और उसमें उस शास्त्र से सम्बन्धित प्रत्येक पक्ष का अधिकारी प्राध्यापक अपने विषय को विश्व के समक्ष समग्रता से प्रस्तुति दे सके। अलङ्कार एक महासंज्ञा इतिहास साक्षी है कि अलङ्कारशास्त्र के सभी आचार्य अलंकार संज्ञा को काव्य के सभी धर्मों की एक महासंज्ञा मानते आए हैं। उद्भट ने रस को दण्डी के ही समान एक अलंकार माना और उससे युक्त काव्य को रसवत् नाम दिया, जो व्याकरण और तर्क से संगत और समर्थित था। अतिवादी ध्वनिवाद ने अलंकार को एकमात्र अप्रधान घोषित कर एकमात्र रस को प्रधान ठहराया। तब रसवदलंकार संज्ञा के निर्वाह के लिए रसवत्पद में मतुप् प्रत्यय न मानकर सादृश्यार्थक वतिप्रत्यय मानना चाहा। यह था इतिहास के साथ खिलवाड़। इसका आरम्भ स्वयं आनन्दवर्धन ने ई.सन् ८५० में किया। उन्हीं का वचन है प्रधानेऽन्यत्र वाक्यार्थे यत्राङ्गं तु रसादयः ।। काव्ये तस्मिन्नलङ्कारो रसादिरिति मतिः ।। २६ ध्वनिवाद के समक्ष इस समय प्रश्न उपस्थित है कि रसादि के साथ काव्य का सम्बन्ध है अथवा नहीं। ध्वनिवादी इसका उत्तर दे पाने में असमर्थ Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ १८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० हैं। वे रस का अस्तित्व रसिक में मानते हैं जो काव्य नहीं काव्य का भावक होता है। जिस काव्य में रसिक को रस मिलता है उसमें वह रसाभिव्यञ्जक सामग्री का अस्तित्व स्वीकार करता है, किन्तु उसे काव्य की असाधारणता नहीं कह पाता । भोजराज उसे रसोक्ति वर्ग का असाधारण धर्म और रसोक्ति नामक अलंकार घोषित करने में तनिक नहीं हिचकते । भोजराज अभिनवगुप्त के कनिष्ठ समकालीन आचार्य हैं। ध्वनिवादी जिन आचार्यों ने भाविक और उदात्त जैसे उक्तिधर्मों को अलंकार मान लिया वे रसाभिव्यञ्जिका सामग्री को भी काव्यालङ्कार कह सकते थे। इस प्रकार ध्वनिवाद में रस, काव्य से असंबद्ध ही रहा है। हेमचन्द्राचार्य ने प्राकृत और अपभ्रंश पर भी ग्रन्थ लिखे और उनके कोष दिए। किन्तु संस्कृत पर भी उनका असाधारण अधिकार था और उन्होंने संस्कृत के व्याकरण में भी परिष्कार किया, जिनको आधार बनाकर शताब्दियों पूर्व जैन साधुओं ने शब्दरूप और धातुरूप पर ग्रन्थ लिखे जिनमें केवल प्रक्रियामात्र भिन्न है, परिणति एक और अभिन्न है। उनका कविकर्म भी त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरितम् जैसे विशालकाय महाकाव्य से प्रमाणित है। आनन्दवर्धन ने भी कोई अर्जुनचरितमहाकाव्य लिखा था, किन्तु वह उतना प्रसिद्ध नहीं हुआ जितना हेमचन्द्राचार्य का काव्य । अभिनवगुप्त भी कविकर्म में अपने स्वर्णयुग का पूर्ण प्रतिनिधित्व करते हैं, तथापि उनकी कोई स्वतन्त्र काव्यकृति प्रकाश में आई नहीं। अभिनवभारती में जो उन्होंने अपने उदाहरण दिए हैं वे उनकी प्रौढ़, कवित्वशक्ति में प्रमाण है । मम्मट को तो कविकर्म ने मानो छोड़ ही रखा है। इस प्रकार हेमचन्द्राचार्य कविकर्म में भी किसी ध्वनिवादी से पीछे नहीं हैं। महामहिम काणे के अनुसार हेमचन्द्राचार्य का दूसरा नाम चंगदेव था। कुछ विद्वानों की धारणा है कि वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध सन्त चांगदेव से अभिन्न थे। यह भी कहा जाता है कि हेमचन्द्राचार्य को भगवती पद्मावती सिद्ध थी अथवा उन्हें पद्मावती देवी से विशेष सुविधा प्राप्त थी। उन्हें जिस ग्रन्थ की आवश्यकता होती माता पद्मावती सुलभ करा देती थीं। ये सभी आख्यायिकाएँ हेमचन्द्राचार्य की अद्भुतता की प्रमाण हैं । सन्दर्भ १. काव्यानुशासन, आचार्य हेमचन्द्र १.३ वृत्ति, सं. तपस्वी नन्दी, प्र. हेमचन्द्राचार्य नार्थ गुजरात, यूनिवर्सिटी, पृ. ३ ( नन्दीसंस्करण) Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आचार्य हेमचन्द्र काव्यशास्त्रीय परम्परा में अभिनवगुप्त के प्रतिकल्प : १९ २. काव्यानुशासनविवेक, १.३, नन्दीसंस्करण, पृ. १६२ ३. द्र. काव्यानुशासन, पृष्ठ १७२ ४. शतपत्र श्लोक १०० ५. सीताचरितम्, मुखबन्ध, पृ. १० ६. काव्यानुशासनविवेक, पृ. १७२, काव्या. १.३ नान्दीसंस्करण ७. काव्यप्रकाश, ४.२७,२८ ८. द्र. नाट्यशास्त्र, सम्पादक तथा अनुवादक रेवाप्रसाद द्विवेदी, प्र. IJAS, शिमला, २००५ पृष्ठ ९२) ९. सं.का.शा. का आ. इ. पृ. २४९, काव्यानुशासन २२७-२८ नन्दीसंस्करण। १०. नाट्यशास्त्र अध्याय २२.६ ११. योगसूत्र २४ १२. काव्यानुशासन ७.५२ वृत्ति १३. नैषध, २२ अन्तिम १४. डॉ. नन्दीसंस्करण पृ. ३२२ १५. पृ. ३२४ नन्दीसंस्करण १६. पृ. ३२६ नन्दीसंस्करण १७. पृ. ३२६ नन्दीसंस्करण १८. पृ. ३२७ नन्दीसंस्करण १९. पृ. ३२७ नन्दीसंस्करण २०. पृ. ३२८ नन्दीसंस्करण २१. पृ. ३२९ नन्दीसंस्करण २२. पृ. ३३० नन्दीसंस्करण २३. पृ. ३३० नन्दीसंस्करण २४. पृ. ३३० नन्दीसंस्करण २५. कुमार सम्भव ८.६३ १६. ध्वन्यालोक २.५ Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ अक्टूबर-दिसम्बर-२०१० उत्तराध्ययन सूत्र की सुखबोधा वृत्ति : एक समीक्षा डॉ. एच.सी. जैन* [ आचार्य नेमिचन्द्रसूरिकृत सार्थक नाम वाली सुखबोधावृत्ति (संक्षिप्त टीका) का आधार आचार्य शान्तिसूरिकृत शिष्यहिता टीका है। यह टीका सांस्कृतिक दृष्टि से तथा कुछ विशिष्ट कथाओं की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। लेखक ने इस लेख के माध्यम से इस पर शोध करने की जिज्ञासा प्रकट की है। ] उत्तराध्ययन सूत्र पर आचार्य शान्तिसूरि की शिष्यहिता टीका पर आधारित सुखबोधा टीका स्वतंत्र रूप से लिखी गयी है। इसे आचार्य नेमिचन्द्रसूरि ने ११वीं शताब्दी में लिखा है। उत्तराध्ययन के ३६ अध्ययनों में वर्णित प्राकृत सूत्रों पर यह यद्यपि संस्कृत टीका है किन्तु इसका हिन्दी अनुवाद एवं शोध कार्य अभी तक नहीं हुआ है। मूल ग्रन्थ के अध्ययन के आधार पर समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। यह ग्रन्थ १२००० श्लोक प्रमाण है। उत्तराध्ययन सुखबोधावृत्ति के प्रारम्भ में तीर्थंकर, सिद्ध, साधु एवं श्रुत-देवता को नमस्कार किया गया है। इस ग्रन्थ के अन्त में गच्छ, गुरुभ्राता, वृत्तिरचना का स्थान, समय आदि का निर्देश भी लेखक के द्वारा किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि लेखक ने अपने गुरु-भ्राता मुनिचन्द्रसूरि की प्रेरणा से प्रस्तुत वृत्ति की रचना की है। इस टीका (वृत्ति) की रचना के उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए स्वयं नेमिचन्द्रसूरि (देवेन्द्रगणि) लिखते हैं आत्मस्मृतये वक्ष्ये जडमति-संक्षेप-रुचि-हितार्थञ्च । एकैकार्थ-निबद्धां वृत्तिं सूत्रस्य सुखबोधाय ।। बह्वर्थाद् वृद्धकृताद् गंभीराद् विवरणात् समुद्धृत्य । अध्ययनामुत्तर पूर्वाणामनेकपाठगताम् ।। बोद्धव्यानि यतोऽयं, प्रारम्भो गमनिकामात्रम् ।। * सह-आचार्य, जैनोलोजी एवं प्राकृत विभाग, मोहन लाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान। Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उत्तराध्ययन सूत्र की सुखबोधा वृत्ति : एक समीक्षा : २१ अर्थात् मन्दमति और संक्षिप्त रुचि प्रधान पाठकों के लिए मैंने अनेकार्थ एवं गंभीर-विवरण से पाठान्तरों और अर्थान्तरों से दूर रहकर इस टीका की रचना की है। अर्थान्तरों और पाठान्तरों के जाल से मुक्त होने के कारण इस टीका की सुखबोधा टीका संज्ञा सार्थक भी है। इस टीका (वृत्ति) में छोटीबड़ी सभी मिलाकर १२५ प्राकृत भाषा निबद्ध कथाएँ वर्णित हैं। इन कथाओं में प्रेम, परम्परा-प्रचलित मनोरंजक वृत्तान्त, जीव-जन्तु, जैन साधुओं के आचार का महत्त्व प्रतिपादन करने वाली नीति तथा उपदेशात्मक कथाएँ वर्णित हैं। कथानक-रूढ़ियों का प्रतिपादन करने वाली कथाएँ भी हैं, जैसे- राजकुमारी का वानरी बन जाना, किसी राजकुमारी को हाथी द्वारा भगाकर जंगल में ले जाना। ऐसी ही कथाएँ ‘रयणचूडरायचरियं' में भी वर्णित हैं। उत्तराध्ययन सुखबोधा वृत्ति की प्राकृत-कथाएँ आकर्षण का विषय रही हैं। जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. फीके ने 'साम्यसुत्त' नामक प्राकृत कथा पर अपना शोधपूर्ण निबन्ध लिखा है। यह कथा इसी वृत्ति से ली गयी है। इसी तरह डॉ. हर्मन जैकोबी ने 'महाराष्ट्रीय कथाएँ' नामक अपने निबन्ध में उत्तराध्ययन वृत्ति से कई कथाएँ लेकर उन पर शोधपूर्ण सामग्री प्रस्तुत की है। उत्तराध्ययन वृत्ति की इन कथाओं में से सात कथाओं का संकलन मुनि जिनविजय जी ने 'प्राकृत कथा संग्रह' के नाम से विक्रम संवत् १९७८ में अहमदाबाद से प्रकाशित किया है। प्राकृत-कथाओं की प्रचुरता के कारण यह वृत्ति हरिभद्र शैली का अनुसरण करती हुई प्रतीत होती है। वैराग्य-रस से परिप्लावित ब्रह्मदत्त और अगडदत्त जैसी कथाओं के संयोग से इस सुविशाल टीका में जान आ गयी है और विभिन्न ग्रन्थों और गाथाओं के उदाहरणों के कारण तथा नाना विषयों की विवेचना के कारण इसकी सार्वजनिक उपयोगिता सिद्ध हुई है। आचार्य नेमिचन्द्र सरि ने उत्तराध्ययन के प्रथमांशों की जितनी विस्तृत टीका की है उतनी उत्तरांशों की टीका में विस्तार नहीं है। अंतिम १२-१३ अध्ययनों की टीका अधिक संक्षिप्त होती गयी है, उसमें न कोई विशेष कथाएँ हैं और न कोई अन्य उद्धरण ही हैं। उत्तराध्ययन सुखबोधा टीका सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। उसमें तत्कालीन समाज और संस्कृति के सम्बन्ध में विविध सामग्री प्राप्त होती है। डॉ. जगदीश चन्द्र जैन एवं देवेन्द्रमुनि ने इस टीका की सांस्कृतिक सामग्री पर कुछ प्रकाश डाला है। उत्तराध्ययन की सुखबोधा टीका से ज्ञात होता Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० है कि राजा का उत्तराधिकारी उसका ज्येष्ठ पुत्र होता था। उसके राज्य-कार्य आदि से विरक्त होने पर लघ-पत्र को राज्य दे दिया जाता था। राजकुमार यदि दुर्व्यसनों में फँस जाता था तो उसे देश-निकाला भी दे दिया जाता था। विवाह के समय शुभ तिथि और मुहूर्त भी देखे जाते थे। छोटी-छोटी बातों के लिए पत्नियों को छोड़ देने की भी प्रथा थी। एक वणिक् ने अपनी पत्नी को इसलिए छोड़ दिया कि वह सारा दिन शरीर की साज-सज्जा किया करती थी और घर का बिल्कुल ध्यान नहीं रखती थी। सामान्य स्त्रियों के अतिरिक्त वेश्याओं का भी सम्मान था। विशिष्ट वेश्याएँ नगर की शोभा, राजाओं की आदरणीय और राजधानी की रत्न मानी जाती थीं।१० इस सुखबोधा टीका में अनेक रोगों और उनकी परिचर्याओं का भी उल्लेख मिलता है। रोगों के नाम हैं- श्वास, खांसी, ज्वर दाह, उदरशूल, भगंदर, अर्श, अजीर्ण, दृष्टिशूल, मुखशूल, अरुचि, अक्षिवेदना, खाज, कर्णशूल, जलोदर और कोढ़।११ चिकित्सा के मुख्य चार पाद माने गये हैं- १. वैद्य, २. रोगी, ३. औषधिं और ४. परिचर्या करने वाले।१२ __इस वृत्ति से शिक्षाओं के सम्बन्ध में भी जानकारी प्राप्त होती है। विद्यार्थी का जीवन सादगी से भरा होता था। कितने ही विद्यार्थी अध्यापक के घर पर रहकर पढ़ते थे और कितने ही धनवानों के यहाँ पर अपने खाने-पीने का प्रबन्ध कर लेते थे। कौशाम्बी नगरी के ब्राह्मण काश्यप का पुत्र कपिल श्रावस्ती में पढ़ने के लिए गया, और कलाचार्य के सहयोग से अपने भोजन का प्रबन्ध वहाँ के धनी शालीभद्र के यहाँ पर किया।१३ विद्यार्थी का समाज में बहुत सम्मान था। जब कोई विद्याध्ययन समाप्त कर घर जाता था तब उसका सार्वजनिक सम्मान किया जाता था। नगर को सजाया जाता था। राजा भी उसके स्वागत के लिए सामने जाता था। उसे बड़े आदर के साथ लाकर इतना उपहार समर्पित करते थे कि जीवनभर उसे आर्थिक दृष्टि से परेशानी नहीं उठानी पड़ती थी।१४ बहत्तर कलाओं में शिक्षण का प्रचलन था।१५ समुद्रयात्रा के भी कई वर्णन इस वृत्ति में उपलब्ध हैं। व्यापारी अपना माल भर कर नौकाओं (जहाजों) से दूर-दूर देशों में जाते थे। कभी-कभी तूफान आदि के कारण नौका टूट जाती थी और सारा माल पानी में बह जाता था। जहाज के वलय-मुख (भँवर) में प्रविष्ट होने का बहुत भय था।१६ Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उत्तराध्ययन सूत्र की सुखबोधा वृत्ति : एक समीक्षा : २३ जब व्यापारी दूर देश में व्यापार करने जाते थे तब उन्हें वहाँ के राजा की अनुमति प्राप्त करनी पड़ती थी। जो माल दूसरे देशों से आता था उसकी जाँच करने के लिए व्यक्तियों का एक विशेष समूह होता था।२७ कर भी वसूल किया जाता था। कर वसूल करने वालों को सूंकपाल (शुल्कपाल) कहा जाता था।१८ व्यापारियों के माल असबाब पर भी कर लगाया जाता था। व्यापारी लोग शुल्क से बचने के लिए अपना माल छिपाते भी थे।१९ इस वृत्ति से ज्ञात होता है कि उस समय समाज में कई अपराध भी होते थे। अपराध में चौर्य-कर्म प्रमुख था। चोरों के अनेक वर्ग इधर-उधर कार्यरत रहते थे। लोगों में चोरों का आतंक हमेशा बना रहता था। चोरों के अनेक प्रकार थे।२० कितने ही चोर इतने निष्ठुर होते थे कि वे चुराया हुआ माल छिपाने के लिये अपने कुटुम्बीजनों को भी मार देते थे। एक चोर अपना सम्पूर्ण धन एक कुएँ में रखता था। एक दिन उसकी पत्नी ने उसे ऐसा करते देख लिया। उस चोर ने भेद खुलने के भय से अपनी पत्नी को ही मार दिया। जब उसका पुत्र चिल्लाया तब लोगों ने उसे पकड़ लिया।२१ इसी प्रकार अन्य कितने ही तथ्य इस वृत्ति में उपलब्ध हैं जो तत्कालीन सांस्कृतिक जीवन को स्पष्ट करते हैं। इस वृत्ति की कई कथाएँ भी बहुत लोकप्रिय हुई हैं। सगर-पुत्र सनत्कुमार, ब्रह्मदत्त, मूलदेव, मंडित, अगडदत्त आदि की कथाएँ बहुत मनोरंजक हैं।२२ इस प्रकार सुखबोधा टीका अत्यन्त सरल, सुबोध एवं मार्मिक है। इसकी भाषा-शैली रोचक है। कथाओं एवं सांस्कृतिक दृष्टि से टीका महत्त्वपूर्ण है। सन्दर्भ १. श्रीविजयोमंगसूरि द्वारा सम्पादित आत्मवल्लभ ग्रन्थावली, वलाद, अहमदाबाद से प्रकाशित सुखबोधावृत्ति। २. वही,सूत्र प्रथम ३. जैन धर्म के प्रभावक आचार्य, साध्वी संघमित्रा, पृ. ३११ ४. हिस्ट्री ऑफ इण्डियन लिटरेचर, विस्तार के लिए देखें, विन्टरनित्स, भाग-२ ५. जगदीशचन्द्र जैन, जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज, पृ. ३५ ६. भगवान् महावीर. एक अनुशीलन, देवेन्द्र मुनि शास्त्री, पृ. ५५ ७. उत्तराध्ययन सुखबोधा (वृत्ति) टीका, पृ. ८४ ८. वही, पृ. १४२ ९. वही, पृ. ९७ Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० १०. वही, पृ. ६४ ११. (अ) वही, पृ. १६३ (ब) भगवान् महावीर : एक अनुशीलन, मुनि, आचार्य देवेन्द्र, पृ. ५५, पैरा २ १२. (अ) उत्तराध्ययन वृत्ति (सुखबोधा टीका), पृ. २६९ (ब) भगवान् महावीर : एक अनुशीलन, मुनि, आचार्य देवेन्द्र, पृ. ५६, पैरा ३ १३. वही, पृ. १२४ १४. (अ) वही, पृ. ५७ (ब) उत्तराध्ययनवृत्ति, पृ. १२३ १५. वही, पृ. ३१८ १६. वही, पृ. २५२ १७. वही, पृ. ६५ १८. वही, पृ. ७१ १९. वही, पृ. ६४ २०. वही, पृ. १४९ २१. वही,पृ. ८१ २२. प्राकृत कथा संग्रह, मुनि, जिनविजय, वि. सम्वत् २०१८ Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ अक्टूबर-दिसम्बर-२०१० तत्त्वार्थसूत्र के कुछ बिन्दुओं पर विचार डॉ. वन्दना मेहता [ लेखिका का यह आलेख श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं के तत्त्वार्थसूत्रसम्बन्धी कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डालता है तथा तत्त्वार्थसूत्र को आगम-सम्मत सिद्ध करता है।] तत्त्वार्थसूत्र जैन धर्म-दर्शन का एक प्रतिनिधि ग्रन्थ माना जाता है। यह जैन परम्परा का एकमात्र सूत्रशैली का ऐसा संग्रह ग्रन्थ है जिसे सभी आम्नाय समान रूप से स्वीकार करते हैं। इसे सभी सम्प्रदायों ने अपनी-अपनी परम्परा से जोड़ने का प्रयास किया है। ___मूल रूप से इस लेख में यह देखना है कि तत्त्वार्थसूत्र का मूल स्वरूप किस पर आधारित है? इसकी शैली किससे प्रभावित है तथा उसका अपना क्या वैशिष्ट्य है? ऐसा कहा जाता है कि जिस प्रकार बादरायण ने उपनषिदों का दोहन करके ब्रह्मसूत्रों की रचना द्वारा वेदान्त को व्यवस्थित किया है, उसी प्रकार उमास्वाति (दिगम्बर परम्परा में उमास्वामी) ने आगमों का दोहन करके तत्त्वार्थ की रचना के द्वारा जैन दर्शन को व्यवस्थित करने का प्रयास किया है। उसमें जैन तत्त्वज्ञान, आचार, भूगोल, खगोल, जीव-विद्या, पदार्थविज्ञान आदि विविध प्रकार के विषयों के मौलिक मन्तव्यों को मुल आगमों के आधार पर सूत्रबद्ध किया है तथा उन सूत्रों के स्पष्टीकरण के लिए श्वेताम्बर परम्परानुसार स्वोपज्ञ भाष्य की भी रचना की गई है। तत्त्वार्थ के मूल स्वरूप का आधार इस विषय में पर्याप्त मतभेद हैं कि तत्त्वार्थ के मूल आधार श्वेताम्बर आगम हैं या दिगम्बर आगम षट्खण्डागम और कुन्दकुन्द के ग्रन्थ। इस विषय के स्पष्टीकरण में विद्वान्गण विस्तार से अपने-अपने मन्तव्यों को प्रस्तुत कर चुके हैं। अतः इसमें ज्यादा कहने की आवश्यकता नहीं है। ____ मुनि आत्मारामजी, पं. सुखलालजी, एच.आर. कापडिया, सुजिको ओहिरो' आदि ने स्वीकार किया है कि तत्त्वार्थ के मूल आधार श्वेताम्बर आगम * जे.आर. एफ. फैलो, जैन विश्वभारती, लाडनू। Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० (३२/४५) हैं। पं. जुगलकिशोर मुख्तार, पं. परमानन्द शास्त्री, पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री, नेमिचन्द्र शास्त्री, पं. फूलचन्द्रजी आदि ने स्वीकार किया है कि तत्त्वार्थ के मूल आधार दिगम्बर आगम हैं। उक्त तथ्य के आधार पर हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि आगमों में दार्शनिक विवरण तो था ही किन्तु वे व्यवस्थित रूप में नहीं थे। उन्हें व्यवस्थित करने का सर्वप्रथम प्रयास उमास्वाति द्वारा किया गया। अब हमारे सामने प्रश्न यह है कि उमास्वाति ने आगमों से संग्रहण किस रूप में किया तथा कैसे किया। इस पर यही कहा जा सकता है कि कहीं तो शब्दश: संग्रह है, अर्थात् आगम सूत्रों के भाव (अर्थ) को ध्यान में रखकर तत्त्वार्थसूत्र की रचना की गई है। कहीं-कहीं पर विस्तृत विषयों का संक्षिप्तीकरण किया गया है। इस विषय में पूर्व में कहीं विस्तृत तो कहीं संक्षिप्त रूप में कहा जा चुका है। फिर भी प्रसंगानुकूल होने के कारण कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रही हूँ तत्त्वार्थ का वर्ण्य-विषय दस अध्यायों में विभाजित है पहले अध्याय में ज्ञान से सम्बन्धित चर्चा है तथा पदार्थ निरूपण के सन्दर्भ में सात पदार्थों का उल्लेख प्राप्त होता है"जीवाजीवास्रवबंधसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम्' (१.४) अर्थात् जीव, अजीव आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा और मोक्ष ये सात तत्त्व कहे गये हैं। जैसा कि स्थानांगसूत्र में कहा गया है-"नव सम्भावपयत्था पण्णत्ता, तं जहा-जीवा अजीवा पुण्णं पावं आसवो संवरो णिज्जरा बंधो मोक्खो' (९.६) यहाँ पर विशेष बात यही है कि जहाँ स्थानांगसूत्र में पुण्य-पाप की अलग गणना की गई है वहीं तत्त्वार्थ में पुण्य-पाप को बंध के अन्तर्गत लिया गया है। इसी तरह तत्त्वार्थ के प्रथम अध्याय में ही ज्ञान के सन्दर्भ में 'मतिश्रुतावधिमनःपर्यायकेवलानि ज्ञानम्" (१.९) ये पाँच भेद प्राप्त होते हैं जो कि स्थानांग, भगवती, अनुयोगद्वार एवं नंदीसूत्र में आगत ज्ञान के प्रकार-पंचविहे णाणे पण्णत्ते, तं जहाअभिणिबोहियणाणे सुयणाणे ओहिणाणे मणपज्जवणाणे केवलणाणे' का ही संक्षिप्तीकरण है। अन्तर इतना ही है कि आभिनिबोधिक को मतिज्ञान कहा है। दूसरे से पाँचवें तक चार अध्यायों में ज्ञेय तत्त्व की मीमांसा है- तत्त्वार्थ में ज्ञेय तत्त्व में जीव की मीमांसा के सन्दर्भ में जीव की परिभाषा "उपयोगो लक्षणम्' (२.८) कही है, जो भगवती के "उवओग-लक्खणे जीवे" Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्त्वार्थसूत्र के कुछ बिन्दुओं पर विचार : २७ तथा उत्तराध्ययन के "जीवो उवओग-लक्खणो" पर आधारित है। छठे से लेकर दसवें अध्याय में चारित्र विषयक चर्चा है—इसमें योग के प्रकार "कायवाङ्मनः कर्म योगः" (६.१) कहा है अर्थात्-काय, वचन और मन की त्रिपदी योग है जो भगवतीसूत्र की इस परिभाषा "तिविहे जोए पण्णत्ते, तं जहा-मणजोए, वइजोए, कायजोए" से ली हुई है। ___वाचक ने सत् की परिभाषा देते हुए उसे उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य- युक्तं सत् (५.२९) कहा तथा द्रव्य का लक्षण किया— 'गुणपर्यायवद् द्रव्यम्" (५.३७) तथा "तद्भावाव्ययम् नित्यम्' (५.३०) जो कुन्दकुन्द के प्रवचनसार और पञ्चास्तिकाय में भी प्राप्त होता है। यथा अपरिच्चत्तसहावेणुप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं । गुणवं च सपज्जायं जं तं दव्वं ति वुच्चंति ।। प्रवचनसार, २.३ दव्वं सल्क्खणियं उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं। गुणपज्जयासयं वा जं तं भण्णंति सव्वण्हू ।। पञ्चा. १० इसी तरह और भी अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं। इस प्रकार तत्त्वार्थसूत्र में सर्वत्र आगमों से सूत्रात्मक संग्रहण है फिर भी तत्त्वार्थसूत्र का अपना वैशिष्ट्य है जिसे आगे बताया जाएगा। तत्त्वार्थ की शैली पर प्रभाव ___तत्त्वार्थ के समय के सन्दर्भ में विद्वानों में पर्याप्त मदभेद है। ईसा की प्रथम शताब्दी से लेकर चौथी-पाँचवीं शताब्दी तक उनका काल निर्धारित किया जाता रहा है। काल की दृष्टि से चिन्तन करें तो उस समय जैन आगमों एवं बौद्ध पिटकों के लम्बे एवं वर्णनात्मक सूत्र थे, जैन आगमों की प्राकृत भाषा में चली आ रही शैली की जगह वैदिक विद्वानों में संस्कृत भाषा की संक्षिप्त सूत्रों की रचना-शैली बहुत प्रतिष्ठित हो चुकी थी। जैन परम्परा में अब तक संस्कृत भाषा की संक्षिप्त सूत्रशैली में रचा कोई ग्रन्थ नहीं था जिसे उमास्वाति ने प्रारम्भ किया। रचना के उद्देश्य के सन्दर्भ में विचार करें तो उमास्वाति ने भी अंतिम उद्देश्य मोक्ष को रखकर ही उसकी प्राप्ति का उपाय सिद्ध करने वाले सभी तत्त्वों का वर्णन अपने तत्त्वार्थ में किया। जैसा कि सभी भारतीय शास्त्रकारों द्वारा शास्त्र-रचना के विषय-निरूपण के अन्तिम उद्देश्य के रूप में मोक्ष को ही रखा जाता है चाहे वह कोई भी विषय रहा हो। प्रायः सभी भारतीय दर्शनों Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ २८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० ( वेदान्त, बौद्ध, वैशेषिक, सांख्य, योग) का उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति है। उमास्वाति ने अपने सूत्र ग्रन्थ का प्रारम्भ भी मोक्षमार्ग प्रतिपादक सूत्र से ही किया है। दिगम्बर परम्परा में तो तत्त्वार्थसूत्र 'मोक्षशास्त्र' के नाम से ही प्रसिद्ध है। अध्याय संख्या पर तत्त्वार्थसूत्रकार कणाद के वैशेषिकसूत्र से पर्याप्त प्रभावित हैं। तत्त्वार्थसूत्र १० अध्यायों में विभक्त है और सूत्र ३४४ हैं तथा कणाद का वैशेषिक सूत्र भी १० अध्यायों में बँटा हुआ है और सूत्र संख्या ३३३ है। इन दोनों की बाह्य रचना में इतना साम्य होते हुए भी विशेष अन्तर भी देखे जा सकते हैं कि तत्त्वार्थकार अपने सिद्धान्त की सिद्धि के लिए कहीं भी युक्ति या हेतु नहीं देते जबकि कणाद अपने सिद्धान्त की पुष्टि में पूर्वपक्ष - उत्तरपक्ष न करते हुए भी उनकी पुष्टि में हेतुओं का वर्णन करते हैं।४ दिगम्बर और श्वेताम्बरों के तत्त्वार्थसूत्र की संख्या में कुछ अन्तर है। तत्त्वार्थ का वैशिष्ट्य • उमास्वाति का तत्त्वार्थ की रचना का मुख्य प्रयोजन संक्षेप में सूत्र शैली में जैन सिद्धान्तों को प्रस्तुत करना था इसलिए उन्होंने जैन दर्शन के सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों को लेते हुए विस्तार से बचते हुए सूत्रशैली में विवेचन किया। वाचक सूत्रकार के कई ऐसे मन्तव्य हैं जो दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदायों के अनुकूल नहीं हैं। यद्यपि वे मन्तव्य दार्शनिक दृष्टि से महत्त्व के नहीं हैं इसलिए उनकी चर्चा यहाँ नहीं की गयी है। सत्, द्रव्य, प्रमाण, नय आदि विषय के सन्दर्भ में वाचक की अपनी मौलिक सूझ है जो आगमकाल में प्रचलित नहीं थी। इस तरह के कुछ बिन्दुओं को लेकर तत्त्वार्थ का वैशिष्ट्य इस प्रकार है सत् भारतीय दर्शन के अन्तर्गत द्रव्य को पदार्थ, तत्त्व, सत् आदि नामों से जाना जाता है। जैन आगम साहित्य में इसके लिये 'द्रव्य' एवं 'तत्त्व' शब्द ही प्राप्त होता है, सत् नहीं । किन्तु दूसरे दर्शनों में शाश्वत पदार्थों के लिए 'सत्' शब्द प्रयुक्त हुआ है, जैसे ऋग्वेद के दीर्घतमा ऋषि कहते हैं " एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" (१.१६४.४६ ) । उमास्वाति के सामने यह प्रश्न था कि जैन दर्शन में सत् किसे कहा जाए एवं उसकी क्या परिभाषा की जाए। उमास्वाति ने अपनी मेधा से द्रव्य को ही सत् कहा एवं उसे परिभाषित करते हुए कहा- 'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' । इस परिभाषा से उन्होंने Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्त्वार्थसूत्र के कुछ बिन्दुओं पर विचार : २९ एकान्तनित्यवादी के दर्शन में आने वाले दोषों को दूर कर जैन दर्शन को परिणामी-नित्यवादी सद्धि किया अर्थात् जो उत्पाद और व्यय के होते हुए भी सद् रूप से मिटकर असत् नहीं हो, वह नित्य है। इस प्रकार सत् के निरूपण में उमास्वाति की विलक्षण योग्यता का पता चलता है। द्रव्य, गुण और पर्याय जैन आगमों में द्रव्य, गुण और पर्याय के लक्षण उपलब्ध होते हैं। जैसे- 'गुणाण-आसओ दव्वं"५ अर्थात् जो गुणों का आश्रय हो वह द्रव्य है। गुण को परिभाषित करते हुए कहा- "एगदव्वस्सिया गुणा"६ अर्थात् जो एक द्रव्य के आश्रित हो वह गुण। पर्याय का लक्षण है- "लक्खणं पज्जवाणं तु उभओ अस्सिया भवे" अर्थात् जो द्रव्य और गुण के आश्रित हो वह पर्याय है। तत्त्वार्थ में प्राप्त द्रव्य, गुण एवं पर्याय के लक्षण को देखकर ऐसा लगता है कि उमास्वाति ने आगम में प्राप्त लक्षणों का अवलम्बन तो लिया ही है, किन्तु उसके साथ कहीं-कहीं वैशेषिक परिभाषाओं एवं सूत्र शैली का प्रयोग भी इनमें किया है। जैसे-तत्त्वार्थ की द्रव्य परिभाषा— "गुणपर्यायवद् द्रव्यम्' (५.३७) जो शाब्दिक रचना में वैशेषिक के "क्रियागुणवत्' (१.१.१५) से स्पष्ट प्रभावित है। वाचक ने गुण का लक्षण करते हुए कहा है- "द्रव्याश्रया निर्गुणाः गुणाः" (५.४०) जो वैशेषिक के सूत्र "द्रव्याश्रय्यगुणवान्' (१.१.१६) से आंशिक प्रभावित है एवं वाचक ने पर्याय को "भावान्तरं संज्ञान्तरं च पर्यायः" (५.३७) ऐसा कहा है। इसमें अर्थ और व्यंजन दोनों को उभय दृष्टि से पर्याय का स्वरूप बतलाया गया है। पुद्गल जैन आगमों में पुद्गल का लक्षण ‘ग्रहण' किया है- "गहण-लक्खणे णं पोग्गलत्थिकाए'८ जीव अपने शरीर, इन्द्रिय, योग और श्वासोच्छ्वास रूप से पुदगलों का ग्रहण करता है अर्थात् पुद्गल में जीव के साथ सम्बद्ध होने की क्षमता ‘ग्रहण' गुण शब्द से आगमकार ने प्रतिपादित की है। इससे पुद्गल का स्वरूप बोध स्पष्ट नहीं होता है। उत्तराध्ययनसूत्र में वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श से युक्त पुद्गल का लक्षण प्रतिपादित किया गया है। वाचक ने भी उत्तराध्ययन की परिभाषा का ही अनुसरण करते हुए पुद्गल को स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण कहा। साथ ही पुद्गल को शब्द, बंध, सूक्ष्मत्व, संस्थान, भेद, तम, अन्धकार, छाया, आतप और उद्योत इन दस अवस्थाओं वाला कहा है। Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० पुद्गल द्रव्य के सन्दर्भ में वाचक का वैशिष्ट्य यही है कि उन्होंने द्रव्यों का साधर्म्य-वैधर्म्य बताते हुए पुद्गल को “रूपिणः पुद्गलाः" कहा है जो दूसरे द्रव्यों से पुद्गल का वैधर्म्य बताता है। यह पुद्गल का सबसे संक्षिप्त लक्षण है। काल जहाँ तक काल द्रव्य का प्रश्न है जैन आगमों में काल को स्वतन्त्र द्रव्य के रूप में स्वीकार किया गया है। यह परम्परा श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों में ही देखने को मिलती है। इसलिए जहाँ लोक की परिभाषा की गई है वहाँ लोक को पंचास्तिकायमय कहा गया है। प्राचीन समय में भी काल को द्रव्य तो माना ही जाता था परन्तु उसका स्वरूप ज्यादा स्पष्ट नहीं था। अतः आगे चलकर उमास्वाति ने "कालश्च' सूत्र बनाकर लोक को षद्रव्यात्मक रूप में स्थापित किया। प्रमाण और ज्ञान विमर्श प्रमाण-निरूपण के सन्दर्भ मे वाचक की नई सूझ दिखाई देती है। जैन आगमों में पाँच ज्ञानों की स्पष्ट रूप से चर्चा है साथ ही उन्हें प्रत्यक्ष और परोक्ष ऐसे दो प्रकारों में विभाजित भी किया गया है। उस समय विभिन्न दर्शनों में प्रमाण के तीन, चार और पाँच भेद प्रचलित थे। उसी के आधार पर जैन आगमों में तीन या चार प्रकार की प्रमाण-व्यवस्था बताई गई है। किन्तु वाचक ने इन दोनों का समन्वय कर दिया और मति आदि पाँचों ज्ञानों को ही प्रमाण. कह दिया।११ इस प्रकार वाचक ने आगम में आगत ज्ञान के प्रत्यक्ष और परोक्ष दो भेदों को ध्यान में रखकर प्रमाण के भी दो भेद कर दिए और आगमों में उल्लिखित लोकानुसारी प्रमाण-व्यवस्था को न छोड़ते हुए अपनी सूझ से प्रमाण और पंचज्ञान का समन्वय सिद्ध किया। नय __अनुयोगद्वार के अन्तर्गत तत्त्व के अभिगम (ज्ञान) के लिए चार मूल द्वार-उपक्रम, निक्षेप, अनुगम और नय बतलाए हैं। यहाँ प्रमाण को उपक्रम के प्रभेद के रूप में स्वीकार किया गया है स्वतंत्र रूप से नहीं। दार्शनिक युग में प्रमाण को स्वतंत्र रूप से तत्त्व अभिगम में स्थान दिया गया। लगता है यह उमास्वाति का ही प्रभाव है क्योंकि सर्वप्रथम उन्होंने ही कहा'प्रमाणनयैरधिगमः"। हालांकि तात्त्विक दृष्टि से दोनों में कोई भेद नहीं था किन्तु वस्तु के सकल एवं विकल या सम्पूर्ण एवं आंशिक ज्ञान के आधार पर दोनों का पृथक् रूप ग्रहण किया गया। प्रमाण-जो अखण्ड वस्तु का Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तत्त्वार्थसूत्र के कुछ बिन्दुओं पर विचार : ३१ ज्ञान करवाए और नय—जो वस्तु का आंशिक ज्ञान करवाए। अनुयोगद्वार में नय के सात भेद बतलाए गए हैं किन्तु श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार उमास्वाति ने नय के पाँच ही भेद बताए हैं। नय के पाँच भेद कहने से उमास्वाति पर यह आक्षेप नहीं लगाया जा सकता कि उन्होंने आगमिक परम्परा का उल्लंघन किया है बल्कि यह तो उनकी सूत्रात्मक शैली का उदाहरण प्रस्तुत करता है। क्योंकि उन्होंने अग्रिम सूत्र में शब्द नय के तीन भेद करके सात की संख्या पूर्ण की है। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि आर्यरक्षित ने ही अनुयोगद्वार में 'तिण्हं सद्दनयाणं' कहकर शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत को शब्दनय की संज्ञा दी है। दिगम्बरों के तत्त्वार्थसूत्र में सीधे सात भेद गिनाए गए हैं। ___इस प्रकार उन्होंने आगम का ही अनुसरण किया है, न कि उस परम्परा से हटकर कुछ अन्य कहा है। इसी का परिणाम है कि उमास्वाति ने आगमों के आधार पर संक्षिप्त सूत्रशैली में अपनी मेधा से तत्त्वार्थसूत्र की रचना कर जैन दर्शन को नवीन रूप में प्रस्तुत किया है। सन्दर्भ १. आगम युग का जैन दर्शन, दलसुखभाई मालवणिया, पृ. २०६-२०७ २.१ तत्त्वार्थसूत्र जैनागम समन्वय, उपाध्याय आत्मारामजी महाराज, पृ. ३ २.२ तत्त्वार्थसूत्र, विवेचक पं. सुखलालजी, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी, भूमिका, पृ. १५-२७ २.३. तत्त्वार्थाधिगमसूत्र (स्वोपज्ञभाष्य और सिद्धसेनगणि की टीका सहित), भूमिका, पृ. ३६-४० २.४ तत्त्वार्थसूत्र, विवेचक पं. सुखलालजी, पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, __वाराणसी, पृ. १०५-१०७ ३. सागरमल जैन, तत्त्वार्थसूत्र और उसकी परम्परा, पृ. ६ ४. तत्त्वार्थसूत्र-विवेचक पं. सुखलालजी, भूमिका, पृ. ४५ ५. उत्तराध्ययनसूत्र २८.६ ६. वही ७. वहीं ८. भगवतीसूत्र, १३.४.१८१ ९. सद्दन्धयारउज्जोओ पहा छायातवेइ वा। ___वण्णरसगन्धफासा पुग्गलाणं तु लक्खणं ।। उत्तराध्ययनसूत्र २८.१२ १०. तत्त्वार्थसूत्र, ५.१ ११. मतिश्रुतावधिमन:पर्ययकेवलानि ज्ञानम्। तत् प्रमाणे।'' वही, १.१० Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ अक्टूबर-दिसम्बर-२०१० ध्यान : एक अनुशीलन डॉ. रूबी जैन [ इस लेख में लेखिका ने आगम का सहारा लेकर ध्यान को परिभाषित किया है। तत्त्वार्थसूत्र में वर्णित ध्यान-विवेचन से यह लेख मेल खाता है।] जैनदर्शन में मोक्ष को ही जीव का परम लक्ष्य माना गया है। परन्तु कर्मबन्ध इस मोक्ष-प्राप्ति में बाधक तत्त्व है। इसी मोक्ष एवं कर्मबन्ध के परिप्रेक्ष्य में जैन साहित्य में ध्यान का विशद विवेचन उपलब्ध होता है। 'ध्यान' भ्वादिगण की 'ध्यै' धातु से 'ल्युट' प्रत्यय करने पर निष्पन्न होता है। 'ध्यै' धातु सोचने, मनन करने, विचार करने, चिन्तन करने आदि अर्थों में प्रयुक्त होती है। ल्यूट प्रत्यय पूर्वक इसका अर्थ मनन, विमर्श, विचार तथा चिन्तन है।२ पातञ्जल योग दर्शन में 'ध्यान' शब्द का प्रयोग एक विशेष अर्थ 'धारावाहिक विचारणा' में हुआ है। जो कि 'धारणा' एवं 'समाधि' के साथ मिलकर 'संयम' का वाचक माना गया है। परन्तु तदनुसार ध्यान केवल सुध्यान का ही वाचक प्रतीत होता है जबकि ध्यान शब्द के व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ के अनुसार तो ध्यान अच्छा भी हो सकता है तथा बुरा भी। इसमें गीता भी प्रमाण है जहाँ कहा गया है कि 'ध्यायतो विषयान् पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते' अर्थात् विषयों के चिन्तन से व्यक्ति में उनके प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है। अत: स्पष्ट ही है कि ध्यान ऐन्द्रिक विषयों के प्रति भी हो सकता है जो कि समाधि तथा आत्मस्वरूप प्राप्ति का बाधक होता है तथा इसके विपरीत आत्मरमण रूपी ध्यान समाधि रूप है जो कि सर्वथा ग्राह्य है। जैनदर्शन के मान्य आचार्य, तत्त्वार्थ-सूत्रकार के अनुसार ध्यान का लक्षण “एकाग्र-चिन्ता-निरोध' है।६ चिन्ता अन्त:करण का व्यापार कहा गया है तथा गमन, भोजन, शयन और अध्ययन आदि विविध क्रियाओं में भटकने वाली चित्तवृत्ति का एक क्रिया में रोक देना निरोध है। जिस प्रकार वायुरहित प्रदेश में दीपशिखा अपरिस्पन्द (स्थिर) रहती है उसी तरह निराकुल देश में एक लक्ष्य बुद्धि और शक्तिपूर्वक रोकी गई चित्तवृत्ति बिना व्याक्षेप के वहीं स्थिर * डी.ए.वी. कालेज, होशियारपुर। Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ध्यान : एक अनुशीलन : ३३ रहती है, अन्यत्र नहीं भटकती। दूसरे शब्दों में 'नाना पदार्थों का अवलम्बन लेने से चिन्ता परिस्पन्दवती होती है। उसे अन्य अशेष मुखों से लौटा कर एक विषय में नियमित करना एकाग्र-चिन्ता-निरोध कहलाता है। सूत्र में दिया गया 'एकाग्र' शब्द व्यग्रता की निवृत्ति के लिए है। ज्ञान व्यग्र होता है तथा ध्यान एकाग्र। जैन-आचार्यों ने ध्यान की उत्कृष्ट अवधि एक अन्तर्मुहूर्त (अड़तालीस मिनट से कम) तक मानी है। उनके अनुसार इसके बाद एक ही ध्यान लगातार नहीं रह सकता।११ ज्ञातव्य है कि यह चिन्तानिरोध अभावरूप नहीं किन्तु भावान्तररूप है।२ । एकाग्र-चिन्ता-निरोध रूप यह ध्यान आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान के भेद से चार प्रकार का है।१३ ये चारों ध्यान आगे चार-चार प्रकार के हैं तथा चार-चार लक्षणों से प्रत्यभिज्ञेय हैं। प्रथमतः इनमें से आर्तध्यान के चार प्रकारों को इस प्रकार बतलाया गया है। (१) अनिष्ट-संयोगेमन को प्रिय नहीं लगने वाले विषयों के या पस्थितियों के उपस्थित होने पर उनसे दूर होने अथवा दूर करने के सम्बन्ध में निरन्तर आकुलतापूर्ण चिन्तन करना। (२) इष्ट-वियोगे- मन को प्रिय लगने वाले विषयों का वियोग होने पर या इष्ट के प्राप्त होने पर उनके अवियोग अर्थात् वे सदा अपने साथ रहें, इस प्रकार निरन्तर आकुलतापूर्ण चिन्तन करना। (३) वेदनायाम्- रोग जन्य कष्ट हो जाने पर उनके मिटने के सम्बन्ध में निरन्तर आकुलतापूर्ण चिन्तन करना। (४) निदाने- पूर्व-सेवित कामभोगों की पुनः प्राप्ति हेतु निरन्तर आकुलतापूर्ण चिन्तन करना।१५ आर्तध्यान को निम्न चार प्रकार से भी जाना जा सकता है- क्रन्दनता (रोना), शोचनता (चिन्ता या शोक करना) तेपनता (बार-बार अश्रुपात करना), परिदेवनता (विलाप करना यथा-हाय! मैंने पूर्व जन्म में कितना बड़ा पाप किया जिसका यह फल मिल रहा है।) इत्यादि।२६ रौद्रध्यान के चार प्रकार इस प्रकार हैं- (१) हिंसानुबन्धी- हिंसा करना अथवा करने की योजनायें बनाना' आदि। (२) मृषानुबन्धी- दूसरों को छलने, ठगने, धोखा देने, छिप कर पापाचरण करने, झूठा प्रचार करने, झूठी अफवाहें फैलाने, मिथ्या दोषारोपण करने की योजनायें बनाते रहना आदि मृषानुबन्धी रौद्रध्यान हैं। (३) स्तेयानुबन्धी- तीव्र लोभ आदि के वशीभूत होकर दूसरे की वस्तु का हरण करने की चित्तवृत्ति होना स्तेयानुबन्धी रौद्रध्यान है। (४) संरक्षणानुबन्धी- शब्दादि पाँच विषयों के साधनभूत धन की रक्षा करने की चिन्ता करना और 'न मालूम दूसरा क्या करेगा?' इस आशंका Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० से दूसरों का उपघात करने की कषाययुक्त चित्तवृत्ति रखना संरक्षणानुबन्धी रौद्रध्यान है।१७ रौद्रध्यान के चार दोष- (१) असन्न दोष- हिंसा प्रभृति दोषों में से किसी एक दोष में अत्यधिक लीन रहना। (२) बहु दोष- हिंसा आदि बहुदोषों में संलग्न रहना (३) अज्ञान दोष- मिथ्या शास्त्र के संस्कारवश हिंसा आदि प्रतिकूल कार्यों में धर्माराधना की दृष्टि से प्रवृत्त रहना। (४) आमरणान्त दोष- सेवित दोषों के लिये मृत्युपर्यन्त पश्चात्ताप न करते हुये उनमें अनवरत प्रवृत्तिशील रहना।८ स्वरूप की दृष्टि से धर्मध्यान के चार भेद इस प्रकार हैं-१९ (१) आज्ञा विचय- आप्तपुरुष का वचन आज्ञा कहलाता है। आप्तपुरुष वह है, जो राग-द्वेष आदि से असंपृक्त है। अत: वीतराग प्रभु की आज्ञा, प्ररूपणा या वचन के अनुरूप वस्तु तत्त्व के चिन्तन में मन की एकाग्रता। (२) अपायविचय- अपाय का अर्थ दुःख है, उसके हेतु राग-द्वेष, विषय, कषाय हैं, जिनसे कर्म उपचित होते हैं। ‘सर्व अपाय-नाश तथा आत्मसमाधि की उपलब्धि' इस ध्यान में चिन्तन का विषय होते हैं। (३) विपाक विचयविपाक का अर्थ है फल। इस ध्यान की चिन्तनधारा कर्मों के विपाक या फल पर आधृत होती है। (४) संस्थान विचय- लोक, द्वीप, समुद्र आदि के आकार का एकाग्रतया चिन्तन करना।२० धर्म ध्यान की पहचान निम्न लक्षणों से होती है (१) आज्ञा रुचि- वीतराग प्रभु की आज्ञा में, प्ररूपणा में अभिरुचि होना, श्रद्धा होना। (२) निसर्ग रुचि- स्वभावतः धर्म में रुचि होना। (३) उपदेश रुचि- साधु या ज्ञानी के उपदेश से धर्म में रुचि होना अथवा धर्मोपदेश सुनने में रुचि होना। (४) सूत्ररुचि- आगमोक्त सूत्रों में रुचि या श्रद्धा होना।२१ धर्मध्यान के चार आलम्बन इस प्रकार हैं... (१) वाचना- सत्य सिद्धान्तों का निरूपण करने वाले आगम ग्रन्थों या तत्सम्बन्धित ग्रन्थों को पढ़ना। (२) पृच्छना- अधीत या ज्ञात-विषय में स्पष्टता हेतु जिज्ञासा भाव से अपने मन में ऊहापोह करना, ज्ञानीजनों से पूछना, समाधान पाने का यत्न करना। (३) परिवर्तना- (अनुप्रेक्षा) ज्ञात विषय में मानसिक, वाचिक वृत्ति लगाना। (४) धर्मकथा (धर्मोपदेश)- धर्मकथा करना, महापुरुषों के जीवनवृत्तों के प्रेरक प्रसंगों द्वारा आत्मानुशासन में गतिशील होना।२२ Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ध्यान : एक अनुशीलन : ३५ धर्मध्यान की चार अनुप्रेक्षाएँ हैं (१) अनित्यानुप्रेक्षा- सभी ऐहिक वस्तुयें अनित्य हैं- अशाश्वत हैं, इस प्रकार का चिन्तन करना, ऐसे विचारों का अभ्यास करना। (२) अशरणानुप्रेक्षा- 'जन्म, जरा, रोग, वेदना, मृत्यु आदि के समय कोई शरण नहीं है' ऐसा बार-बार चिन्तन करना। (३) एकत्वानुप्रेक्षा- मृत्यु, वेदना, शुभ-अशुभ, कर्मफल इत्यादि को जीव अकेला ही भोगता है। उत्थानपतन, सुख, दुःख आदि का सारा दायित्व एकमात्र जीव का अपना अकेले का ही है अत: क्यों न प्राणी आत्मकल्याण में जुटे, इस प्रकार की वैचारिक प्रवृत्ति जगाना। (४) संसारानुप्रेक्षा- संसार की असारता का बारम्बार चिन्तन करना। शुक्ल ध्यान- स्वरूप की दृष्टि से शुक्लध्यान के चार भेद इस प्रकार (१) पृथक्त्व-वितर्क-सविचार- वितर्क का अर्थ श्रुतावलम्बी विकल्प है। पूर्वधर मुनि पूर्वश्रुत-विशिष्ट ज्ञान के अनुसार किसी एक द्रव्य का आलम्बन लेकर ध्यान करता है किन्तु उसके किसी एक परिणाम या पर्याय पर स्थिर नहीं रहता, उसके विविध परिणामों पर संचरण करता है- शब्द से अर्थ पर अर्थ से शब्द पर तथा मन, वाणी एवं देह में एक दूसरे की प्रवृत्ति पर, संक्रमण करता है, अनेक अपेक्षाओं से चिन्तन करता है। ऐसा करना पृथक्त्व-वितर्क-विचार शुक्लध्यान है। (२) एकत्व-वितर्क अविचार- पूर्वधर, पूर्वश्रुत का ज्ञाता पूर्वश्रुतविशिष्ट ज्ञान के किसी एक परिणाम पर चित को स्थिर करता है। ऐसा ध्यान जो शब्द, अर्थ, मन, वाणी तथा देह पर संक्रमण नहीं करता एकत्व वितर्क अविचार की संज्ञा से अभिहित है। (३) सूक्ष्मक्रिया-अप्रतिपाति (अनिवर्ती)- जब केवली आयु के अन्त समय में योग-निरोध का क्रम प्रारम्भ करते हैं, तब वे मात्र सूक्ष्म काययोग का अवलम्बन लिये होते हैं, उनके और सब योग निरुद्ध हो जाते हैं केवल श्वास-प्रश्वास जैसी सूक्ष्म क्रिया ही अवशेष. रह जाती है। वहाँ ध्यान से च्युत होने की कोई संभावना नहीं रहती। उस अवस्था का ध्यान सूक्ष्मक्रियाअप्रतिपाति शुक्लध्यान है। (४) समुच्छिन्न-क्रिया-अनिवृत्ति- यह ध्यान मोक्ष का साक्षात् कारण है। यह वह स्थिति है, जब सब प्रकार के स्थूल तथा सूक्ष्म मानसिक, वाचिक Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० तथा दैहिक व्यापारों से आत्मा सर्वथा पृथक् हो जाता है तब इस ध्यान द्वारा अवशेष चार अघातिकर्म- वेदनीय, नाम, गोत्र तथा आयु भी नष्ट हो जाते हैं।२६ शुक्लध्यान के चार लक्षण बतलाये गये हैं—२७ विवेक- देह से आत्मा की भिन्नता, (२) व्युत्सर्ग- नि:संग भाव से शरीर आदि सभी उपकरणों से ममता हटा लेना, (३) अव्यथा- पीड़ा तथा कष्ट आने पर आत्मस्थता नहीं खोना, (४) असंमोह- देव आदि द्वारा रचित माया जाल में तथा सूक्ष्म भौतिक विषयों में संमूढ या विभ्रान्त न होना। शुक्लध्यान के चार आलम्बन इस प्रकार कहे गये हैं- (१) क्षान्तिक्षमाशीलता। (२) मुक्ति- लोभ आदि के बन्धन से उन्मुक्तता। (३) आर्जवऋजुता, सरलता, निष्कपटता। (४) मार्दव- मृदुता-कोमलता, निरभिमानता।२८ शुक्लध्यान की चार अनुप्रेक्षायें बतलाई गई हैं। वे इस प्रकार हैं (१) अपायानुप्रेक्षा- आत्मा द्वारा आचरित कर्मों के कारण उत्पद्यमान अपाय- अनर्थों के सम्बन्ध में पुन:-पुन: चिन्तन। (२) अशुभानुप्रेक्षा- संसार के अप्रशस्त रूप का चिन्तन, (३) अनन्तवृत्तितानुप्रेक्षा- संसार चक्र की अनन्त काल तक चलते रहने की वृत्ति (स्वभाव) पर पुनः-पुनः चिन्तन। (४) विपरिणामानुप्रेक्षा- वस्तु जगत् की परिवर्तनशीलता पर चिन्तन करना।२९ इनमें से आर्त और रौद्र इन दो ध्यानों को अप्रशस्त, अपध्यान कहा गया है। ये ध्यान कर्मबन्ध का हेतु होने से तथा भवभ्रमण एवं दुःख का कारण होने से हेय हैं। जबकि अन्तिम दो ध्यान (धर्म और शुक्ल) प्रशस्त हैं, आचरणीय हैं, ग्राह्य हैं, ये मोक्षमार्ग को प्रशस्त करते हैं।३१ । यदि इन चारों के सामान्यातिसामान्य (स्थूलतम) स्वरूप पर विचार करें तो हम पायेंगे कि प्रथम दो ध्यान नकारात्मक विचार श्रृंखला के द्योतक हैं जो स्वास्थ्य तन्त्र को भी दुष्प्रभावित करते हैं। Dr. William Boericke 37467 Yanto Homeopathic Materia Medica, पृष्ठ ८ पर लिखते हैं कि छोटी से छोटी प्रत्येक बीमारी, भय, चिन्ता तथा परेशानी से जुड़ी हुई होती है३२ तथा एक अन्य स्थान, पृष्ठ ३४२ पर वे एक बीमारी के लक्षणों में अश्रुपात, आहे भरना, सिसकियाँ भरना, विषादग्रस्त होना, बात न करना, शोचनता पूर्ण होना, उदास होना, आदि गिनाये हैं।३३ इसी प्रकार अवसाद (Depression) नामक बीमारी के लक्षण से कौन अपरिचित है। इसके मूल में भी एक प्रकार का आर्तध्यान ही है। यदि इन ऊपर कथित लक्षणों को तथा आर्तध्यान के लक्षणों को मिलायें Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ध्यान : एक अनुशीलन : ३७ तो समानता स्पष्ट उद्घाटित हो जाती है। तात्पर्यार्थ केवल इतना है कि न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से बल्कि शरीर-विज्ञान की दृष्टि से भी तथा मनोविज्ञान की दृष्टि से भी नकारात्मक ध्यान अथवा अपध्यान त्याज्य हैं क्योंकि अपध्यान के कारण शरीर में इस प्रकार के परिवर्तन. होते हैं जिससे मनुष्य का समस्त पाचनतन्त्र तथा परम्परया सम्पूर्ण शरीरतन्त्र दुष्प्रभावित हो उठता है। दूसरी तरफ सुध्यान का मोटा स्वरूप प्रसन्नचित्त या मन से है। इस प्रकार का सुध्यान आध्यात्मिक एवं लौकिक दोनों दृष्टियों से कल्याणकारी है। इससे ऊर्जा का प्रसार होता है। अलौकिक आनन्द मिलता है। सन्दर्भ १. संस्कृत हिन्दी कोश, वामन शिवराम आप्टे, पृ. ५०३ २. वही, पृ. ५०२ ३. 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्'- ३.२ पातञ्जलयोगदर्शनम्, स्वामी श्री ब्रह्मलीन ___ मुनि ४. 'तदेतद्धारणाध्यानसमाधिः त्रयमेकत्र संयमः' पातञ्जलयोगदर्शन की सूत्र संख्या ३.४ पर व्यासभाष्य-स्वामी श्री ब्रह्मलीन मुनि म. ५. श्रीमद्भगवद्गीता- पृ. ६८, गीता प्रेस, गोरखपुर, २०६२ ६. तत्त्वार्थसूत्र, सं. पं. सुखलाल संघवी, ९.२७ ७. तत्त्वार्थवार्तिक, पं. महेन्द्र कुमार जैन, (भाग-२), ९.२७, पृ. ७९० ८. सर्वार्थसिद्धि, पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, ९.२७, पृ. ४४४-२३-२५ ९. तत्त्वार्थवार्तिक, पं. महेन्द्र कुमार जैन, (भाग-२), ९.२७, पृ. ७९० १०. तत्त्वार्थवार्तिक (हिन्दी सार), भाग-२, ९०२७, पृ. ७९० ११. वही, तथा सर्वार्थसिद्धि, ९.२७.४४५.१८ १२. (i) व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र, (भाग-४), २५.७.२३७ आगम प्रकाशन समिति, संपा. श्री अमर मुनि, ब्यावर, राज. झाणे चउव्विहे पण्णते, तं जहा-अट्टे झाणे, रोद्दे झाणे, धम्मेझाणे, सुक्के झाणे। (ii) औपपातिकसूत्र, सूत्र ३०, पृ. ४९ डॉ. छगनलाल शास्त्री, काव्यतीर्थ (iii) तत्त्वार्थसूत्र, ९.२८ १३. (i) भगवतीसूत्र (व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र) भाग-४, २५.७.२३७-२४९ (ii) औपपातिकसूत्र, सूत्र संख्या ३० पृ. ४९-५० १४. वही १५. वही Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ३८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० १६. व्याख्याप्रज्ञप्ति सूत्र, भाग-४, २५.७.२४०, पृ. ५०७ तथा ५०९ १७. औपपातिकसूत्र, पृ. ७० १८. व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र, भाग-४, २५.७.२४२, पृ. ५०७ १९. औपपातिकसूत्रम्, पृ. ७० २०. वही, पृ. ७१ २१. औपपातिकसूत्र, पृ. ७१ २२. वही २३. व्याख्याप्रज्ञप्तिसूत्र, भाग-४, २५.७.२४६ पृ. ५०८ २४. औपपातिकसूत्र, सूत्र ३०, पर्याय- क्षण-क्षणवर्ती अवस्था विशेष २५. औपपातिकसूत्र, पृ. ७४ २६. वही २७. औपपातिकसूत्र, पृ. २८. वही २९. सर्वार्थसिद्धि, ९.२९.४४६.५ ३०. तत्त्वार्थसूत्र, ९.२९ ३१. Homeopathic Materia Medica, Page 8 ; Dr. W. Booricke Jain, Publishers Pvt. Ltd., New Delhi 32. Ibid Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ अक्टूबर-दिसम्बर-२०१० पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन डॉ० मधुबाला जैन [ डॉ. मधुबाला जैन ने इस आलेख में भरत-बाहुबलि महाकाव्य के माध्यम से जैनधर्म के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। इसके काव्य-वैशिष्टय को नहीं बतलाया है। आशा है, आगे इसके काव्य-वैशिष्टय को भी निरूपित करेंगी। ] श्रमण-संस्कृति के अनन्य उपासक पुण्यकुशलगणि का एकमात्र महाकाव्य “भरतबाहुबलिमहाकाव्य" जैन विश्व भारती, लाडनूं से प्रकाशित है। इस महाकाव्य के अध्ययन से ज्ञात होता है कि आचार्य पुण्यकुशलगणि ने समाज में नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा करने हेतु इस महाकाव्य की रचना की है। उनका यह महाकाव्य वाक्य-विन्यास, पद-गरिमा, काव्य-सौष्ठव आदि काव्योचित सभी गुणों से युक्त है। पुण्यकुशलगणि ने अध्यात्म-प्रधान श्रमण-संस्कृति को अपनाकर समाज को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। उन्होंने जैन धर्म एवं दर्शन के स्वरूप को नये आयाम प्रदान किये हैं। धर्म-ध्यान एवं शुक्लध्यान को अपनाकर उन्होंने कर्म-काण्ड आदि बाह्य आडम्बरों को छोड़ने का सन्देश दिया है। वे जन-जन के चित्त को अपनी ओर आकृष्ट कर लेने वाले थे। सार्थकनामा वे पुण्य-कार्यों में ही जीवन की सार्थकता समझते थे। उन्होंने अपनी काव्यप्रतिभा से रसाढ्य, रम्यपदालंकार-युक्त, हृद्य एवं मुक्तिपथ को दर्शाने वाले महाकाव्य की रचना कर संस्कृत-साहित्य के भण्डार को अपूर्व योगदान किया है। धर्म का उदय मानव की आध्यात्मिक रुचि का प्रतिफलन है। 'धर्म' शब्द ऋग्वेद में धारण करने के अर्थ में आया है। महाभारत में भी 'धारणात् धर्ममित्याहुः धर्मों धारयते प्रजाः' इस कथन द्वारा धर्म का धारण अर्थ ही लिया गया है। महाभारतकार के अनुसार न केवल मानव-समाज ही धर्म की आधारशिला पर टिका हुआ है अपितु सम्पूर्ण जगत् की प्रतिष्ठा भी धर्म में * अतिथि प्राध्यापक, राजकीय महाविद्यालय, नाथद्धारा १०७,गोविन्द नगर, सेक्टर १३, उदयपुर, राजस्थान। Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० ही है। जिस प्रकार दाहकता अग्नि का धर्म है तथा गंध पृथ्वी का विशेष धर्म है वैसे ही कुछ विशेषताओं को धारण कर व्यक्ति मानव कहलाता है। अथर्ववेद में सत्य, दीक्षा, तप, ब्रह्म, यज्ञ आदि को धर्मतत्त्व बतलाया गया है। वस्तुतः धर्मतत्त्व मानव-समाज एवं सृष्टि का नियामक है। धर्म का स्वरूप परिवर्तनशील रहा है। वैदिक धर्म यज्ञ-प्रधान था। किन्तु उपनिषत्काल में धर्म का यज्ञ से विशिष्ट सम्बन्ध क्रमशः समाप्त होने लगा और यज्ञ की अपेक्षा नैतिक गुणों पर अधिक बल दिया जाने लगा। छान्दोग्य उपनिषद् के अनुसार धर्म तीन प्रकार का माना गया है - १. गृहस्थधर्म- जिसमें यज्ञ, अध्ययन एवं दान कार्य होते हैं। २. तप-धर्म- जिसमें व्रत, नियम आदि का पालन किया जाता है। ३. नैष्ठिक ब्रह्मचर्य धर्म- जिसमें ब्रह्मचारी सदैव ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अन्त तक आचार्य कुल में रहे। धर्म की विशद व्याख्या स्मृति-शास्त्रों में बतायी गयी है। महाभारत के अनुसार त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ और काम) का सार धर्म ही है।५ "धर्म" प्राणिमात्र को धारण करने वाला है। जैनों के अनुसार वस्तु-स्वभाव धर्म है। किन्तु आचार-धर्म का बोध जैन-धर्म का प्रतिपाद्य है एवं वस्तु-धर्म का बोध जैनदर्शन का विषय है। अन्य धर्मों एवं दर्शनों में भी इन विषयों का विशद विवेचन हुआ है। प्रत्येक दर्शन से तत्तद् आचार धर्म अनुप्राणित होता है। जैन-दर्शन में चिंतन का जो नवनीत निकला उसे धर्म के विराट् फलक पर प्रस्तुत करने का जैन-कवियों का प्रयास सराहनीय है। उन्होंने मनुष्यों के लौकिक एवं पारलौकिक उद्देश्यों को समन्वित कर धर्म का स्वरूप निर्धारित किया है। लौकिक अभ्युदय एवं पारलौकिक निःश्रेयस् दोनों सम्मिलित रूप में धर्म कहलाता है - यतोऽभ्युदयनि:श्रेयस्सिद्धिः स धर्मः। धर्म अन्तर्दृष्टि विशुद्ध आन्तरिक चेतना से अनुप्राणित होती है। भक्ति, कर्म, ज्ञान, साधना, अनुशासन आदि गुण धर्म का क्रियान्वयन है। धर्मानुष्ठानी दूसरों के मनोगत भावों का पारखी होता है। वह दूसरों के हृदयगत भावों को उसकी आकृति एवं चेष्टाओं से सहज जान लेता है। इसे एक दृष्टांत द्वारा सहज ही समझा जा सकता है। भरत द्वारा प्रेषित दूत को देखकर ही बाहुबली सब कुछ जान गये। फिर भी उन्होंने अपने बड़े भाई भरत के प्रति पूर्ण श्रद्धा भाव से उस दूत से आने का कारण पूछा। उसने भरत की महिमा का विस्तार से वर्णन करके उनके चक्र के शस्त्रागार में प्रविष्ट न होने का Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन : ४१ कारण आप द्वारा भरत की अधीनता स्वीकार न करना बताया। अत: आपको भरत की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए। यह सुनकर क्षत्रिय धर्म का पालन करने वाले बाहुबली, दूत की वाचालता एवं भरत की धृष्टता को जानकर हंसने लगे - दूत ! त्वत्स्वामिनो धायं, वाचालत्वं तवोद्धतम्। एतद्वयं ममात्यन्तं, हास्यमास्ये तनोति हि।। बाहुबली का यह हास्य उनके शौर्य और पराक्रम की पराकाष्ठा को व्यंजित करता है। “सर्वार्थसिद्धि' ग्रन्थ में धर्म के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “इष्टे स्थाने धत्ते इति धर्मः'। अर्थात् जो हमें इष्ट स्थान की ओर ले जाता है वह धर्म है। अतः धर्म भी व्यक्ति-विशेष के लिए विशिष्ट होता है। बाहुबली स्वाभिमानी राजा थे। भ्रातृ-प्रेम और राजधर्म में राजधर्म प्रधान है। यही कर्त्तव्य-बोध भरत एवं बाहुबली दोनों को भ्रातृ-प्रेम को तिलांजलि देने का कारण बनता है और उसकी परिणति महायुद्ध में होती है। युद्ध ही राजाओं की नियामक मर्यादा होती है। सज्जन पुरुष अलंघनीय धर्म, अर्थ और काम का युगान्त में भी उल्लंघन नहीं करते हैं - सन्तो युगान्तेऽप्यविलङ्घनीयान् । धर्मार्थकामान् न विलङ्घयन्ति ।। धर्म वही श्रेष्ठ है जो लोक मंगलकारी हो। सांसारिक प्राणियों की रक्षा करना अहिंसा धर्म है। इस धर्म का मूल दया है - धर्मो नाम दयामूलः। बौद्धपाहुड़ में भी 'धम्मो दयाविसुद्धो' कहा है। दयाभाव से अन्त:करण में विद्यमान मोह, राग-द्वेष, हिंसा, क्रोध आदि कषाय-भाव नष्ट हो जाते हैं। यह दयामय धर्म दो प्रकार का होता है - सकल और विकल। सकल धर्म को धारण करने वाले जैन-मुनि होते हैं और विकल धर्म का पालन करने वाले श्रावक (सद्गृहस्थ) होते हैं। अत: सकलधर्म, मुनिधर्म तथा विकलधर्म गृहस्थधर्म कहलाता है। सकलधर्म का पालन जैन मुनि ही कर सकते हैं। घर आदि समस्त परिग्रहों का त्याग कर देने वाले मुनि सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन एवं सम्यग्चारित्र वाले होते हैं। श्रावक एवं मुनि-चरित पर टिप्पणी करते हुए अमृतचन्द्रसूरि ने बताया कि सर्वथा त्यागरूप महाव्रत के अधिकारी मुनिराज होते हैं और एकदेशत्याग रूप अणुव्रत के अधिकारी श्रावक या उपासक होते हैं। मोक्ष Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० प्राप्त करने के लिए अणुव्रतधारी श्रावक ही महाव्रतधारी मुनि हो सकता है। युद्ध के लिए प्रयाण करने पर श्रावक भरत ने बाहुबली की सीमा में विद्यमान जैन-मन्दिर में भगवान् ऋषभ की पूजा-अर्चना की। वहां उन्हें एक मुनि मिले। भरत ने उन्हें पहचान कर दीक्षा लेने का कारण पूछा। प्रत्युत्तर में उन मुनि ने बताया कि भरत के साथ युद्ध में पराजित होकर विरक्त हो गये और जिन-दीक्षा ग्रहण कर ली। यह जानकर भरत को युद्ध की विभीषिका एवं विनाश की परिकल्पना का पुनराभास हुआ। वे भी अन्तर्मन से मुनिचर्या का पालन करने की इच्छा अभिव्यक्त करते हैं किन्तु अपने आपको कर्मों से बंधा हुआ कहकर वैसा करने में असमर्थता प्रकट करते हैं - इच्छामि चाँ भवतोपपन्नां, कर्माणि मे नो शिथिलीभवन्ति। तैरेव बद्धो लभतेऽत्र दुःखं, जीवस्तु पाशैरिव नागराजः।।" वस्तुत: जैनधर्म की आचार-संहिता में मुनि-धर्म ही श्रेष्ठ धर्म है। इसी धर्म में शान्तरस का सूर्य चित्तवृत्तिरूपी उदयाचल पर उदित होता है। अतएव श्रावकों के हृदय-कमल उनके दर्शन मात्र से विकसित हो जाते हैं - त्वच्चित्तवृत्तिप्रथमाद्रिचूलां, शमांशुमाली समुदेत्युपेत्य। ततोऽस्मदीयं हृदयारविन्दं, विकासितामेति विलोकनेन।। जैन-मुनि-धर्म विश्व के सभी धर्मों में अद्वितीय है। इसमें आदित: समस्त परिग्रहों का त्याग कर सत्य, अहिंसा, अस्तेय एवं पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। तप:साधना इस धर्म का प्राण है। अत: जैन-काव्यों में नायक एवं प्रतिनायक अन्त में प्रव्रजित होकर मुनि-दीक्षा ग्रहण करते हैं। यहां पर भी विजयी प्रतिनायक बाहुबली महाव्रतधारी मुनि बन जाते हैं - मुनिरेष बभूव महाव्रतभृत् , समरं परिहाय समं च रुषा। सृहृदोऽसुहृदः सदृशान् गणयन्, सदयं हृदयं विरचय्य चिरम् ।। इस प्रकार मुनि बाहुबली सभी के लिए पूज्य एवं वन्दनीय हो गये। अतएव महाराज भरत ने भी अपनी अश्रु-प्रवाह से पंकिल मुख-कान्ति से संयम में संलग्न एवं संसार विरक्त बाहुबली को प्रणाम किया - पतदनुकणाविलवक्त्ररुचिर्भरताधिपतिः समुपेत्य ततः । प्रणनामतरां मतराभसिकानुरतेर्विरतं निरतं विरतौ ।। किन्तु बाहुबली के मन से “अहं'' पूर्ण रूप से निकला नहीं था। अत: केवल-ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो रही थी। किन्तु कालान्तर में प्रव्रजित ब्राह्मी Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन : ४३ और सुन्दरी के प्रबोध से उन्होंने अपने 'अहं' का परित्याग कर अपने पूर्व प्रव्रजित छोटे भाइयों की वन्दना की। क्योंकि जैनधर्म में धर्म-वृद्ध पूज्य होते हैं, आयुवृद्ध नहीं। जैसा कि कालिदास ने भी कुमारसंभव में कहा है न धर्मवृद्धेषु वयः समीक्ष्यते। . इस महाकाव्य के नायक भरत भी अपने समस्त परिवार-जनों के प्रव्रजित हो जाने तथा स्वयं के निराभरण हस्त को देखकर बाह्य उपाधियों एवं स्वभाव में होने वाले अन्तर को समझकर विरक्त हो जिन-दीक्षा ले ली और उनके चित्त में उत्पन्न वीतरागी भावनाओं से ही उन्हें केवलज्ञान हो गया। इस प्रकार इस महायुद्ध का अन्त शान्तरस की निर्मल धारा में अपने समस्त कषायों के प्रक्षालन से होता है। ____यह महाकाव्य संस्कृत के उच्चकोटि के महाकाव्यों की शैली पर रचा गया है। अत: यहां कवि एक साहित्यकार के रूप में "रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत्' की शिक्षा की भांति यही संदेश देता है कि संसार की यथार्थता को समझकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाय तो अध्यात्म-मार्ग का अनुसरण कर चरम पुरुषार्थ “मोक्ष" को प्राप्त करना चाहिए। क्योंकि आत्मा के परम हित का प्रतिपादन ही जैनदर्शन का प्रयोजन है और उसका परम हित मोक्षप्राप्ति ही है। यह मोक्ष आत्यन्तिक एवं अव्याबाध सुखस्वरूप होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, और सम्यक् चारित्र ही मोक्ष-मार्ग में ले जाता है। ___जैनधर्म प्राणिमात्र का कल्याण करने वाला है। इस धर्म का स्वरूप अहिंसा, संयम और त्याग का समन्वय है। इस धर्म में क्षमा, मृदुता, सरलता, पवित्रता, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दस नियम या धर्म होते हैं। इस धर्म का क्षमा-गुण बहुत उपयोगी है। हृदय से की गयी क्षमा परस्पर मैत्री-भाव को बढ़ाती है और वैर-भाव का विनाश करती है। राष्ट्रीय भावात्मक एकता का मूलस्वर क्षमा गुण ही है। सच्चा धर्म वैर-विरोध को नहीं सिखाता। वह तो संयम और विवेक से अपने कर्त्तव्य का बोध कराता है। कर्त्तव्य-पालन एवं अध्यात्म-निष्ठा ही धर्म है जो इस लोक और परलोक दोनों का कल्याण करने वाला है। इसी भाव को अभिव्यक्त करते हुए कवि ने भरत से कहलवाया है - भ्रातस्त्वं लघुरसि तत्तवापराधाः क्षन्तव्या मनसि मया गुरुर्गुरुत्वात्। Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० दाक्षिण्यं तव तु ममारितीव्रमेतन्नो, कर्ता तुहिनरुचेर्यथा तमास्यम्।। १२ अर्थात् हे भाई ! तुम छोटे हो और मैं बड़ा हूँ। इसलिए मुझे अपने गुरुत्व को ध्यान में रखकर मन ही मन तुम्हारे अपराधों को क्षमा कर देना चाहिए। किन्तु यह मेरा तीव्र चक्र तुम्हारे पर कृपा नहीं करेगा, जैसे राहु चन्द्रमा पर नहीं करता। यहां कर्तव्यबोध होने से क्षमा-भाव का उदय तो धर्म है किन्तु अहिंसा भाव के अभाव में यह धर्म निष्क्रिय हो जाता है। अतः भगवान् महावीर ने “अहिंसा परमो धर्म:' का उद्घोष किया था। __ज्येष्ठ भ्राता भरत को युद्ध में मारने के लिए उद्धत बाहुबली को देवताओं ने जो उपदेश दिया वह सभी धर्मों का सार प्रतीत होता है - कलहं तमवेहि हलाहलकं, यमिता यमिनोऽप्ययमा नियमात्। भवती जगती जगतीशसुतं, नयते नरकं तदलं कलहैः।। १२ अर्थात् तुम उस कलह को हलाहल विष के समान जानो जिसका आश्रय लेकर संयमी मुनि भी संयम से विचलित हो जाते हैं। कलह के कारण यह पूजनीया पृथ्वी राजपूत्र को नरक में ले जाती है, अत: इस पृथ्वी (राज्य) के लिए किये जाने वाले कलह से हमें सदैव विमुख रहना चाहिए। यही नहीं, देवतागण बाहुबली को शान्तरस के सेवन के लिए मुनि-पद की साधना करने का प्रस्ताव रखते हैं। उनकी सच्ची वाणी को सुनकर बाहुबली तत्काल युद्ध और रोष को एक साथ छोड़कर, मित्र और शत्रु को समान मानते हुए हृदय को सदा के लिए करुणामय बनाकर महाव्रतधारी मुनि बन गये - मुनिरे ष बभूव महाव्रतभृत् , समरं परिहाय समं च रुषा। सुहृदोऽसुहृदः सदृशान् गणयन्, सदयं हृदयं विरचय्य चिरम् ।। १४ “समणसुत्त'' में मुनि मार्ग को मोक्ष-मार्ग बतलाया गया है। इस मार्ग पर चलकर भव्य जीव इस अनन्त संसार-सागर को पार कर लेता है। इसका आश्रय कोई भी व्यक्ति ले सकता है। वर्ण या जाति का यहां कोई बन्धन नहीं है। जिन अर्थात् जितेन्द्रिय महापुरुषों का वचन ऐसी अमृततुल्य औषधि है जो विषय-वासनाओं का विरेचन कर देती है तथा जरा, मृत्यु एवं रोगों का भी समूलोन्मूलन कर देती है। इस प्रकार सब दुःखों का विनाश कर देने वाली इस जिनवाणी रूपी. औषधि का सेवन आध्यात्मिक स्वास्थ्य को प्रदान करने वाला है। यही कारण है कि युयुत्सु भरत और बाहुबली जिनवाणी Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन : ४५ के प्रभाव से युद्धोन्माद से विरत होकर केवलज्ञानी हो गये। इस महाकाव्य में "धर्म" को पुण्य का प्रतीक बताया है जो मानवमात्र की उन्नति करने वाला होता है। इसके विपरीत अधर्माचरण पापकारक होता है। पापी पाप के कारण अधःपतन की ओर अग्रसर होकर अपना सर्वस्व खो देता है। इसी तथ्य को महाकवि ने प्रकारान्तर से बताया है कि सेना के आगे चलने वाले घोड़ों के खुरागों से ऊपर उठती हुई धूल उन घोड़ों के पीछे चलने वाले मदोन्मत्त हाथियों के मद-जल से वैसे ही नीचे गिरा दी जाती है जैसे भले व्यक्ति पाप के कारण नीचे गिर जाते हैं। पुण्य परोपकार से होता है। पुण्यवान् जीव ऐसी संरचना करते हैं जो दूसरों के लिए प्रेरणादायक होती है। भगवान् का मन्दिर सभी के लिए दर्शनीय एवं वन्दनीय होता है। क्योंकि उसमें ऋषभदेव, पार्श्वनाथ, महावीर आदि तीर्थंकरों की प्रतिमाएं होती हैं। उन प्रतिमाओं से अलंकृत जैन-मन्दिर वैसे ही सुशोभित होते हैं जैसे पुण्य के अतिशय से जीवन, आत्मा से देह और कमल से तालाब सुशोभित होते हैं। महाराज भरत भी बाहुबली के राज्य के सीमान्त प्रदेश में स्थित एक मन्दिर को देखकर हाथी से नीचे उतर गये। उन्होंने उत्तरासंगविधि करके अर्थात् स्नान कर एवं साधारण धवलवस्त्र धारण कर मन्दिर में प्रवेश किया और तीन बार भगवान् की प्रदक्षिणा कर पंचांग (दोनों हाथ, दोनों घुटनों तथा मस्तक को जमीन पर रखकर) नमस्कार किया। क्योंकि तीर्थकर को पावन हृदय से नमस्कार करने से चक्रवर्ती राजा भी अन्य राजाओं से नमस्कृत होते हैं। जिनेन्द्र-दर्शन से पाप की वैतरणी सूख जाती है और उसमें पुण्य-सलिल बहने लगता है। यह संसार-समुद्र तो कषाय रूपी मत्स्यों से भरा हुआ है। वस्तुतः यह काम-वासनाओं के कल्लोलों से अत्यन्त दारुण संसार-सागर तभी पार किया जा सकता है जब जिनेन्द्र-प्रतिमा रूपी नौका उपलब्ध हो।१५ देव-मन्दिर हमारे देश की संस्कृति के धरोहर हैं। अत: महाकवि ने जैन-मन्दिरों के निर्माण की प्रेरणा दी है।१६ इस विचित्र संसार में कुछ मनुष्य अप्राप्त भोगों की कामना करते हैं और कुछ प्राप्त सभी भोगों को छोड़कर कैवल्यरूपी वधू का वरण करते हैं।१७ ऐसे त्यागी-यशस्वी जनों के शान्तरस का सूर्य चित्तवृत्तिरूपी उदयाचल को प्राप्त कर उदित होता है तो वह भव्य जीवों के हृदयरूपी कमलों को विकसित कर देता है।१८ महाराज भरत भी मन्दिर में स्थित विद्याधर मुनि को देखकर वैराग्य-भाव से भरकर कहते हैं कि हे मुनि! मैं भी आप Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० द्वारा स्वीकृत मुनि-चर्या को प्राप्त करना चाहता हूँ किन्तु मेरे कर्म-बन्धन शिथिल नहीं हो रहे हैं। बन्धन से बँधा हाथी जैसे दुःख पाता है वैसे ही यह संसारी जीव कर्म-बन्धनों से कष्ट ही भोगता है।१९ इस संसार में तो जो सुख के कारण हैं, वे ही दुःख के भी कारण हैं और जो राग के हेतु हैं वे ही संताप के भी हेतु हैं। इसी प्रकार जो मैत्री के कारण हैं, वे ही बैर के कारण हैं। अत: इस संसार में शाश्वत सुख कहीं भी नहीं है। जिनके ये सब नहीं हैं वे मुनि धन्य हैं।२० मुनिजन तो क्रोधरूपी अग्नि को क्षमा-जल से सर्वथा उपशान्त कर देते हैं। वे अपने मानरूपी हाथी को मार्दव रूपी सिंहनाद से परास्त कर देते हैं तथा मायारूपी वृक्ष का ऋजुता के परशु से उच्छेद कर देते हैं।२१ _इस महाकाव्य में मुनिधर्म का महत्त्व बताते हए महाकवि ने कहा है कि वे सर्वदा मन, वचन और काय की प्रवृत्ति में संयत होते हैं। वे तीर्थंकरों द्वारा प्रतिपादित मार्ग का साधुवृत्ति से आचरण करते हैं। वे दोनों (बाह्य और आभ्यन्तर) तपस्याओं में लीन रहते हैं। वे आवश्यक क्रियाओं में कभी प्रमाद नहीं करते हैं।२२ मुनिधर्म ज्ञान, भक्ति और क्रिया का समन्वय है। अत: उनके उपदेश सर्वधर्मसमभाव को लिए हुए होते हैं। उनके उपदेशों से मानव की पाशविक और स्वार्थमयी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगता है। धर्म की निष्ठा से व्यक्ति का कल्याण होता है और स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक उदात्त वृत्ति होती है जिसे धर्म कहा जा सकता है। इस प्रकार धर्म की अनुभूति होने पर भी प्रवृत्ति नहीं होती है। मुनि अपने प्रवचन से उसी अनुभूति को जीवन में उतारने की प्रेरणा देते हैं। अत: जैन आम्नाय में मुनिधर्म को श्रेष्ठ धर्म माना जाता है। मुनि मोक्ष-सम्पदा के भोक्ता होते हैं।२३ वे भव्य जीवों के सांसारिक द:खों को दूर करने वाले होते हैं। क्योंकि उन्होंने सभी प्रकार के द्वन्द्वों से मुक्त होकर जन-जन के अज्ञानान्धकार को दूर करने का प्रयास कर परोपकार की धर्मध्वजा को फहराने का निश्चय किया है। वे ही ज्ञान-सूर्य और ज्ञान-चन्द्र की उपमा को धारण करते हैं। अत: भरत ऐसे महात्माओं की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि हे युगादिदेव ! यह संसार-समुद्र कषायरूपी मत्स्यों से भरा पड़ा है। यह कामवासना की कल्लोलों से अत्यन्त दारुण और दुरुत्तर है। अतः हे देव ! तुम ही नौका बनकर प्राणियों को इससे पार पहुंचा सकते हो।२४ ऐसे महामुनियों के नाम-स्मरण से भी महान् पुण्यरूपी धर्म होता है। जब उनके साक्षात् दर्शन हो जाते हैं तो अनेक Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन : ४७ पुण्यशाली श्रावक महाव्रतधारी मुनि बन जाते हैं। बाहुबली जैसे अद्वितीय योद्धा भी युद्ध - विजय को मानवता की अवहेलना समझकर महाव्रतधारी मुनि हो जाते हैं। उन्हें संयम में संलग्न देखकर चक्रवर्ती भरत भी उनके चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। वे उनसे निवेदन करते हैं कि हे शान्तरस के नायक ! मैं अपराधी हूँ, इसलिए मेरी जीभ कुछ कह नहीं पा रही है। हे सुमते ! ग्रीष्म-: ऋतु से तप्त मेरी अभिमत सरिता को आप पानी से भर दें। चक्रवर्ती के इस प्रकार के दीन-वचन सुनकर भी बाहुबली मुनि मौन बने रहे क्योंकि जिन व्यक्तियों का हृदय आसक्ति से रहित है वे राजाओं को भी तृण के समान तुच्छ समझते हैं।२५ इस महाकाव्य में भगवान् ऋषभदेव का विस्तृत गुणगान किया गया है। वे प्रथम तीर्थंकर कहलाते हैं। उनके पश्चात् तेईस तीर्थंकर और हुए हैं। उनमें तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ तथा चौबीसवें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर की ऐतिहासिकता सर्वमान्य है। इनके अतिरिक्त बाईसवें तीर्थंकर नेमिनाथ या अरिष्टनेमि को भी विद्वान् ऐतिहासिक मानते हैं। वे श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे। जैन - पुराणों में भी इन्हीं चार तीर्थंकरों के विशेष, विस्तृत, प्रामाणिक एवं प्राचीन विवरण प्राप्त होते हैं। इन सभी तीर्थंकरों ने धर्म में अहिंसा, संयम और तप को विशेष महत्त्व दिया है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय,. . ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को श्रमणों के लिए महाव्रत के रूप में आवश्यक माना है तथा श्रावकों के लिए भी इन व्रतों का आंशिक रूप से पालन करना अनिवार्य है। ये ही पांच व्यक्तिभेद से महाव्रत एवं अणुव्रत कहलाते हैं। इन व्रतों का महत्त्व दार्शनिक दृष्टि से भी है। जैनधर्म निरीश्वरवादी है। इस धर्म में सृष्टि के कर्ता, पालनकर्ता और संहर्ता के रूप में ईश्वर की अवधारणा को नहीं माना गया है। यह धर्म तो पुरुषार्थवादी है। श्रमण संस्कृति में मनुष्य ही अपने पुरुषार्थ के द्वारा ईश्वरत्व को प्राप्त कर सकता है। अतः कोई भी मनुष्य श्रम के द्वारा श्रमण बन कर सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर सकता है। अतः श्रमण-धर्म उदारवादी है। इसमें जैनेतर व्यक्ति भी दीक्षित हो सकता है। सभी जैन तीर्थंकर क्षत्रिय थे। यही इस धर्म की विराटता का प्रबल प्रमाण है। महावीर के अनेक शिष्य ब्राह्मण थे। अतः इस धर्म में जाति- बन्धन नहीं है। आज भी अनेक जैन मुनि जैनेतर जाति के हैं। जैन-धर्म में कर्म-मीमांसा प्रमुख है। जो जैसा कर्म करता है वह वैसा फल पाता है। शुभ कर्मों का शुभ परिणाम होता है और अशुभ कर्मों का Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ४८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० अशुभ। अत: कर्म की पवित्रता से ही पुण्यास्रव होता है। तभी कोई व्यक्ति सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन और सम्यक् चारित्र (आचरण) से मुक्ति रूप परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार जो मुक्ति की योग्यता प्राप्त कर लेते हैं वे विशद्ध ज्ञान से समद्ध एवं उत्तम चरित्र के धारक हो जाते हैं। ऐसे ही महापुरुषों को अर्हत्, जीवन्मुक्त, सिद्ध या स्थितप्रज्ञ कहते हैं। जैन-श्रमण मूलत: निर्ग्रन्थ होते हैं। अत: त्याग-प्रधान इस धर्म में अहिंसा को प्रमुख माना है। सभी जीवों पर दयाभाव इस धर्म की प्रमुख विशेषता है। इस धर्म में वनस्पतियों में भी जीव माना गया है। अत: पर्यावरण को भी इस धर्म का प्रमुख अंग माना जा सकता है। सर्वधर्मसमभाव की भावना के कारण ही जैन-दर्शन में अनेकान्तवाद एवं स्यावाद की अवधारणा को बल मिला। इस महाकाव्यकार ने दार्शनिक पाण्डित्य को अपने काव्य में स्थान नहीं दिया है। - यद्यपि इस महाकाव्य में अन्य दर्शनों का भी उल्लेख हुआ है किन्तु उनके सिद्धान्तों का खण्डन करना कवि का उद्देश्य नहीं है। जैनदर्शन के मर्मज्ञ महाकवि पुण्यकुशलगणि ने स्याद्वाद-सिद्धान्त के अनुसार अन्य दर्शनों की विशेषताओं का ही प्रकारान्तर से उल्लेख किया है - त्वमेव नैयायिकवाक्प्रपञ्चैर्विभुः प्रमेयोऽसि लसत्प्रताप । त्वमेव भोक्ता शिवसंपदो हि, वेदान्तसिद्धान्तमताभितळ ।। २६ अर्थात् महाराज भरत ऋषभ-प्रतिमा की वन्दना करते हुए कहते हैं कि हे तेजस्विन् ! नैयायिक सिद्धान्त के अनुसार तुम-सर्वव्यापी और प्रमेय-प्रमिति के विषय हो। हे वेदान्तसिद्धान्तमत से अभितळ ! तुम ही मोक्ष-सम्पदा के भोक्ता हो। सन्दर्भ ग्रन्थ सूची १. त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुगोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्।। - ऋग्वेद १/२२/१८ २. महाभारत, शान्तिपर्व - १०९/११ . ३. अथर्ववेद - १२/१/१ ४. त्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमस्तप एवेति द्वितीयो ब्रह्मचर्याचार्यकुलवासी तृतीयोऽत्यन्तमात्मानमाचार्यकुलेऽवसादयन्। -छान्दोग्योपनिषद् २/२३ Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुण्यकुशलगणि विरचित भरतबाहुबलिमहाकाव्य में जैनधर्म एवं दर्शन : ४९ ५. ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न कश्चित् शृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते।। - महाभारत, स्वर्गारोहणपर्व, ५/६२ ६. भरतबाहुबलि महाकाव्य १०/२२ ७. भ.बा.म. - ३/७ ८. भ.बा.म. - २/६८ ९. भ. बा. म. १०/५० १०. भ. बा. म. १०/४७ ११.. भ. बा. म. १७/७६ १२. भ. बा. म. १७/७९ १३. भ. बा. म. १७/६१ १४. भ. बा. म. १७/७० १५. भ. बा. म. १७/७६ १६. वही १०/२९ १७. वही १०/४२ १८. वही १०/४७ १९. वही १०/५० २०. वही, १०/५१ २१. वही १०/५२ २२. वही १०/६३ २३. वही १०/२० २४. वही १०/२२ २५. वही १७/७९ २६. भ. बा. म. १०/२० Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ अक्टूबर-दिसम्बर-२०१० वैदिक व श्रमण परम्परा में समान धार्मिक क्रियायें डॉ. मनीषा सिन्हा* [ वैदिक एवं श्रमण परम्परा में व्रत, तीर्थयात्रा, दान आदि की जो धार्मिक क्रियायें पूर्वकाल में प्रचलित थीं वे आज भी प्रचलित हैं। इनमें पापक्षय और पुण्य-लाभ की भावना रहती है। यदि ये वीतरागभाव से की जाती हैं तो मोक्ष-प्राप्ति में सहायक होती हैं।] इहलोक तथा परलोक को सुखी बनाने के लिए, पाप-प्रक्षालन तथा पुण्य-प्राप्ति हेतु लोग मुख्यतः तीर्थ, व्रत, दान आदि की धार्मिक क्रियायें सम्पादित करते हैं। तीर्थयात्रा करना एक ऐसा साधन है जो सामान्य जन को स्वार्थमय जीवन के कर्मों से दूर रखने में सहायक होता है। लोगों को उच्चतर एवं दीर्घकालीन नैतिक और आध्यात्मिक जीवन-मूल्यों के विषय में सोचने को मार्ग प्रदान करता है। आपत्तियों से मुक्ति तथा लौकिक जीवन में शुद्धि-प्राप्ति की आशा में सामान्य जन द्वारा तीर्थ (पवित्र स्थानों) की यात्रा की जाती है। __ वैदिक परम्परा में अयोध्या, मथुरा, माया, काशी, काँची, अवन्तिका, द्वारिका को मोक्षदायक तीर्थ माना गया है। अमावस्या, संक्रान्ति, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण पर गंगा-स्नान को असंख्य तीर्थ का फल माना गया है। महाभारत के वनपर्व में तीर्थयात्रा के पुण्य को अग्निष्टोम जैसे यज्ञ से उत्तम बताया गया है। अनुशासन पर्व में तीर्थयात्रा को पूर्ण पुण्य प्राप्त करने वाला कहा गया है। अग्नि पुराण में कहा गया है कि जिससे भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है वह तीर्थ है। जैन आगम जम्बूद्वीप-प्रज्ञप्ति में मागधतीर्थ, वरदामतीर्थ, प्रभासतीर्थ का उल्लेख है। आवश्यक नियुक्ति में तीर्थ को महत्त्वपूर्ण कहा गया है। तीर्थंकर के जन्म, केवलज्ञान, तप और निर्वाण कल्याणकों से सम्बन्धित स्थलों को पवित्र तीर्थ माना गया है। * प्रवक्ता- प्राचीन इतिहास, श्री अग्रसेन क. स्वा. पी.जी. कालेज, वाराणसी Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वैदिक व श्रमण परम्परा में समान धार्मिक क्रियायें : ५१ बौद्धों में भी तथागत के जन्मस्थान, ज्ञानप्राप्ति, धर्मचक्र प्रवर्तन और निर्वाण इन चार घटनाओं से सम्बन्धित स्थान को पवित्र मान इनकी यात्रा को महत्त्व प्रदान किया गया है। सुधाभोजन जातक' में तीर्थस्थल के रूप में बाहुका, गया, तिम्बरू का उल्लेख है। भूरिदत्त जातक में पाप-प्रक्षालन तीर्थ के रूप में प्रयाग का उल्लेख है। यहाँ का जल पापनाशक के रूप में प्रख्यात था।' धार्मिक क्रिया का दूसरा मुख्य अंग व्रत है। वैदिक एवं श्रमण दोनों परम्पराओं में अनिष्टकारी शक्ति से व्रत किया जाता है। व्रत धार्मिक संकल्प के रूप में ग्राह्य है अर्थात् किसी तिथि, सप्ताह, दिन या मास में एक मानसिक प्रतिज्ञा की जाती है जिसमें व्यक्ति को भोजन-सम्बन्धी या आचरण सम्बन्धी कुछ निषेधों का पालन करना पड़ता है। वैदिक संहिता में आचरण से सम्बन्धित नैतिक-विधियों के अर्थ में व्रत आया है। पूर्णमासी के उपरान्त आठवें दिन अष्टमी को व्रत तिथि कहा गया है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र में उल्लेख है कि अमावस्या की रात्रि में चन्द्र, सूर्य के साथ रहता है इसलिए इसे दर्श भी कहा गया है। अग्निपुराण में व्रत के दस गुणों का वर्णन किया गया है। पुराणों में उल्लेख है कि कामदेव, यक्ष, शिव के लिए क्रमश: त्रयोदश, चतुदर्शी, पूर्णिमा के दिन व्रत सम्पादन होता था। एकादशी व्रत की मान्यता सर्वाधिक है और इस सम्बन्ध में प्रचलित है कि एकादशी व्रत से उत्पन्न अग्नि से सहस्रों जीवन में किये गये पापों का इंधन जलकर भस्म हो जाता है। अश्वमेध एवं वाजपेय जैसे सहस्रों यज्ञ एकादशी व्रत के सोलहवें अंश तक भी नहीं पहुँच सकते। एकादशी स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायक है। एकादशी की रात्रि से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चातुर्मास्य व्रत की स्थापना की जाती है। इस समय व्रती को शय्या, शयन, मांस, मधु आदि का त्याग करना पड़ता है। जैन साहित्य में पंचमी, अष्टमी, एकादशी, चतुर्दशी को उपवास का दिन बताया गया है। व्रत को पोषधोपवास या पोसहसाल कहा गया है।१५ उपासकाध्ययन में कहा गया है कि व्रत के दिन विशेष पूजा करके व्रत का आचरण कर धर्म कर्म को बढ़ाना चाहिए। इसके पूर्व के दिनों में रस का त्याग, एकाशन या उपवास, एकान्त-निवास, करना चाहिए।१६ लोग अपने आध्यात्मिक विकास के लिए प्रत्येक अष्टमी, चतुर्दशी पूर्णमासी के दिन उपवास करते थे एवं संध्या को पौषध ग्रहण करते थे। मज्झिमनिकाय,१८ अंगुत्तरनिकाय? Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० संयुक्तनिकाय० थेरीगाथा२१ से विदित है कि अनिष्टकारी शक्ति एवं प्रभाव से बचने के लिए विभिन्न प्रकार के मनोकामना पूर्ति के लिए सामान्य जन प्रायः चतुर्थी, पंचदशी, अष्टमी तथा नवमी व्रत का पालन करते थे। चातुर्मास व्रत को वर्षावास कहा गया है। वृहत्कल्पभाष्य में वर्षावास का परम प्रमाण चार माह गया है।२२ स्थानांग सूत्र२३ तथा विनयपिटक२४ में चातुर्मास्य व्रत के रूप में वर्षावास का उल्लेख है। धार्मिक क्रिया का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग दान है। ऋग्वेद में दान को अति श्रेष्ठ माना गया है। इसमें नीति है कि दानदाता के पाप को इन्द्र नष्ट कर देते हैं।२५ दानकर्ता के लिए कहा गया है कि वह स्वर्ग में उच्च स्थान प्राप्त करता है। अश्व-दान करने वाला सूर्यलोक में निवास करता है। स्वर्ण का दानी देवता का पद प्राप्त करता है। परिधान का दान करने वाला दीर्घ जीवन का लाभ करता है। सप्तम मण्डल में अश्वदान, गायदान, रथदान का उल्लेख है।२७ पंचम मण्डल में रक्तदान का उल्लेख है।२८ चतुर्थ मण्डल में गोदान करने वाले का दान प्रशंसनीय कहा गया है।२९ छान्दोग्य उपनिषद् में आया है कि जनश्रुति पौत्रायण ने स्थान-स्थान पर ऐसी भोजनशालाएँ बनवा रखी थी जहाँ पर सभी दिशाओं से आकर लोग भोजन प्राप्त कर सकते थे। महाभारत के अनुशासन पर्व में भूमिदान, वशिष्ठ-धर्मसूत्र, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति में विद्यादान, विष्णु धर्मसूत्र में अभयदान को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है।३१ ___जैनों के सूत्रकृतांग में अभयदान को श्रेष्ठ कहा गया है।२२ जैन आगम में दान के लिए मुद्यादायी और मुद्याजीवी शब्द का उल्लेख किया गया है। दान वही श्रेष्ठ है जिसमें दाता का कल्याण हो और गृहीता का भी कल्याण हो।३३ आचारांग सूत्र में उल्लेख है कि तीर्थंकर दीक्षा लेने के पहले वर्षीदान करते हैं। स्थानांग सूत्र में दान को श्रेष्ठ धर्म कहा गया है।३४ स्थानांग सूत्र तथा आवश्यकचूर्णि में दान के दस प्रकारों का भी उल्लेख है। आवश्यक सूत्र, उपासकदशांग, सूत्रकृतांग एवं भगवतीसूत्र में दान के उत्तम प्रकारों का उल्लेख है। इनमें शासन, दान, खादिम, स्वादिम, वस्त्र, पात्र, कम्बल, पादपोछन, पीठफलक, शय्या, संस्तारक, औषध और भैषज्यदान को श्रेष्ठ फलदायी कहा गया है।३६ बौद्ध साहित्य में भी दान-क्रिया की निरन्तरता जारी है और दिव्य बल, आयु ब्रह्मलोक की प्राप्ति, सर्वज्ञता की प्राप्ति२९, देवत्व की प्राप्ति, Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वैदिक व श्रमण परम्परा में समान धार्मिक क्रियायें : ५३ पुत्र प्राप्ति १, पुण्य एवं स्वर्ग-प्राप्ति के लिए दान दिये जाने का उल्लेख है। संयुक्त निकाय में दानी द्वारा श्रमणों, ब्राह्मणों को भोजन, वस्त्र, गन्ध आदि अनेक वस्तुएँ दान में देने का उल्लेख है। जातकों से विदित होता है कि दानपतियों द्वारा अपने अपने नगर में प्राय: छह-छह दानशालाओं के निर्माण की प्रथा प्रचलित थी।४ दुहद जातक में सामूहिक दान का उल्लेख है।४५ इस प्रकार हम देखते हैं कि वैदिक और श्रमण परम्परा में अनेक धार्मिक क्रियाएँ समान थीं। यदि इन धार्मिक क्रियाओं को वीतरागभाव से किया जाता है तो ये परम्परया मोक्ष-लाभ में सहायक होती हैं। सन्दर्भ-सूची १. काणे, पी.वी.- धर्मशास्त्र का इतिहास, तृतीय भाग, पृ. १३७१ २. वही पृ. १३०० ३. अग्निपुराण, अध्याय १०१, पृ. २३५ गीता प्रेस, द्वितीय संस्करण ४. जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति ३/५७ हिन्दी अनु. मधुकर मुनि ५. आवश्यक नियुक्ति पृ. २८४ ६. वही ७. सांकृत्यायन, राहुल- बुद्धचर्या, पृ. ५०० ८. जातक, ५, पृ. ४७१-७२ ९. जातक, ६, पृ. २३४ १०. काणे, पी. वी.- धर्मशास्त्र का इतिहास, हिन्दी अनु.- चतुर्थ भाग, पृ. ८, ११. वही, पृ. २६ १२. वही पृ. २८ १३. वही पृ. ४२ १४. वही १५. उपासकदशांग- सूत्र, अभयदेव टीका, पृ. ४५ १६. उपासकाध्ययन ७/८/१९ १७. कोठारी, सुभाष- उपासकदशांग और उसका श्रावकाचार एक परिशीलन, पृ. १८२ १८. मज्झिम निकाय, हिन्दी अनुवाद- राहुल सांकृत्यायन, पृ. १६६ १९. अंगुत्तर निकाय, भाग एक, हिन्दी अनुवाद- भदन्त आनन्द कौसल्यायन, _पृ. १४७ २०. संयुक्त निकाय, भाग एक, हिन्दी अनु. जगदीश काश्यप, धर्मरक्षित, पृ. १८१ Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ५४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० २१. थेरीगाथा, हिन्दी अनु. भरत सिंह उपाध्याय, पृ. १३ २२. वृहत्कल्पभाष्य १/६/७/८ २३. स्थानांग सूत्र, हिन्दी अनु. मधुकर मुनि, पृ. २८२-८३ २४. विनयपिटक, हिन्दी अनु. राहुल सांकृत्यायन पृ. १७ २५. ऋग्वेद, चतुर्थ मण्डल, सूक्त २० पृ. ३६ २६. काणे, पी.वी., धर्मशास्त्र का इति. हिन्दी अनु., पृ. ४४७ २७. सप्तम मण्डल, सूक्त १८ २८. पंचम मण्डल-सूक्त ८ २९. चतुर्थ मण्डल सूक्त १ ३०. काणे, पी. वी.- धर्मशास्त्र का इतिहास, हिन्दी अनुवाद, पृ. ४४८ ३१. वही ३२. सूत्रकृतांग, हिन्दी अनुवाद, मधुकर मुनि- पृ. ३२५ ३३. मुनि पुष्कर- जैन धर्म में दान एक समीक्षात्मक अध्ययन, पृ. ३१४ ३४. आचारांग सूत्र, हिन्दी अनुवाद मधुकर मुनि, पृ. ३७९ ३५. स्थानांग सूत्र, हिन्दी अनुवाद, मधुकर मुनि, भाग एक, पृ. ७१९ ३६. मुनि पुष्कर- जैन धर्म में दान एक समीक्षात्मक अध्ययन, पृ. ३६३ ३७. महावग्ग, ६४४ पृ. २३६ ३८. अरक जातक, २, पृ. १६९ ३९. विसच्छ जातक, ३, पृ. २९२ ४०. बिलारकेसिय जातक ४, पृ. २६४-६५ ४१. महावेस्सन्तर जातक, ६, पृ. ४२. अंगुत्तर निकाय, हिन्दी अनुवाद भदन्त आनन्द कौसल्यायन, भाग-२, - पृ. २७७-७९ ४३. संयुक्त निकाय, हिन्दी अनुवाद- जगदीश काश्यप, धर्मरक्षित, भाग १, पृ. २० ४४. बिलारकेसिय जातक, ४, पृ. २६४, शंखपाल जातक, ५, पृ. २५२ ४५. दुहद जातक, २, पृ. २६२-६३ Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Śramana, Vol. 61, No. 4 October - December 10 REPRESENTATION OF NATURE IN JAINA ART AND TRADITION (with special reference to Khajurāho) Dr. Shanti Swaroop Sinha Jaina Art and Architecture depicts the close association of Jaina Ācāryas and. Tirtharikaras with nature. If we look at the images of twenty-four Tīrtharkaras, all the images are found necessarily imbibed with the figure of either any tree or any animal based on the cognizance of that particular Tīrtharkara. It shows the concern of the great exponents of Jainism towards nature as well as their close relationship with environment. The author of the article has beautifully described this theme with the help of several examples from Jaina Art and Architecture. Since man appeared, there have been two kinds of things on earth -objects of nature and objects of art. Objects of nature existed even before Men came. Human art is in fact an utterance of man's understanding of Nature. The best gift of god to man is nature. The cosmic phenomena of Nature are represented everywhere in human art as an integrated expression and also in the backdrop. The present paper deals with "Representation of Nature in Jaina Art and Tradition with special reference to Khajurāho”. Jainism being the religion of deep faith in Ahiṁsā (nonviolence) and principle of life in the vegetation world had sustained nature as the benevolent protector of humanity. The Jaina texts frequently speak of the prohibitions towards making injury to world of flora and fauna. To impart this massage of essentiality of flora and fauna for the survival of the human life, the Jaina texts * Assistant Professor, Department of Visual Arts, BHU Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 56 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 wonderfully visualized their main deities- the 24 Jinas or Tīrthankaras in the midst of the nature. Each of the 24 Jinas has been provided with an identifying cognizance (fig. 01), which in case of 15 Jinas are either some animals (including aquatic ones) or some birds. In two examples of Padmaprabha and Naminātha they are red or blue lotus. One very interesting point of respectful association of flora and fauna with the Jinas is that contrary to the deities of Brahmanical and Buddhist (except Buddha) cult they never ride upon their mounts (animals or birds) simply because that act would also amount to violence against them. Those are shown only as identifying emblems on the pedestal. Further every Jina in course of his Tapas (meditation) attains absolute knowledge (Kevala Jñāna) invariably under some tree like Aśoka, śāla, Pīpala, Vața, Amra etc. Thus the Jaina tradition has beautifully and intelligently underline perennial importance of flora and fauna by way of showing them in intimate association with all the 24 Jinas, highest in Jaina worship. This association is also shown in tabular form. FLORA & FAUNA ASSOCIATED WITH TIRTHANKARAS AS THEIR COGNIZANCES AND KEVALA TREE Sl. No. Cognizance Tirthankara Rsabhanātha 1. Bull Ajitanātha Elephant Sambhavanātha Horse | Kevala Jñāna Tree Asoka tree (Jhonesia Ashoka) Saptaparņa tree (Alstoma Scholaris) Śāla tree (Shorea Robusta) Piyaka or Piyālā tree (Sarala) Priyāngu tree (Panicum Italicum) Abhinandana Monkey Sumatinātha Goose Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Representation of Nature in Jaina Art and Tradition : 57 Padmaprabha Red Lotus Banyan tree Supārsvanātha Svastika Sirisa tree (Acacia Sirisa) Candraprabha Puspadanta Śītalanātha Crescent Crocodile Śrivatsa Śreyaṁsanātha Rhinoceros Vāsupūjya Buffalo Vimalanātha Boar Nāga tree (Punnaga) Malura tree Pippala tree (Ficus Religiosa) Asoka tree (Jhonesia Ashoka) Pātala tree (Big nonia Suaveolens) Jambū tree (Eugenia Jambolana) Aśvattha tree (Ficus Religiosa) Dadhiparņa tree (Clitorea Ternatea) Nandi tree (Cedrela Toona) Tilaka tree Mango tree Anantanātha Falcon Dharmanātha Thunderbolt Śāntinātha Tortoise Kunthunātha Goat Aranātha Nandyāvarta Mallinātha or Water pot Asoka tree (Jhonesia Ashoka) Mallisvāmi (as female in Śvetāmbara tradition) Munisuvrata Tortoise Champā tree (Michelia hampaka) Naminātha Blue Lotus Bakula tree Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 58 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 (Misnusops Elengi) Vetasa tree (Reed Neminātha or Conch Aristanemi or Bamboo) Pārsvanātha Snake Dhātiki tree (Grislea Tomentosa) Śāla tree (Shorea Robusta) Mahāvīra Lion The importance of flora and fauna is further extended when we find that all the 24 Yakşas and Yakṣis (Śāsanadevatās) associated with the Jinas are provided with Vāhanas (conveyances) which are mainly some animals, birds or reptiles and flowers (shown animal, bird wise in tabular form). Further the Yakşas likeGomedha, Brahmā; Yakṣis like- Kālikā, Ašokā, Chandā, Vinītā, Ankuśā, Nirvāni, Dhāriņi, Vairotyā, Padmavati and Mahāvidyās like Rohiņī, Vajrašķīnkhalā, Kālikā, Gāndhārī, Mānavi are shown as carrying lotuses in one of their hands. ASSOCIATION OF NATURE WITH ŚĀSANADEVATĀS & MAHAVIDYĀS Animal, Bird and Yaksa Yakşi Mahāvidya Aquatics Vāhanas Bull Gomukha (face) Isvara, Yakşendra, Varuņa, Bhřkuti śāntā, Sutară Cow Rohiņi Rohiņi Elephant Gomukha (mount), Mahāyakşa, Mahakali, Śanta, Vajrassňkhalā, śānta, Vajrānkuša Siddhāyikā Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Representation of Nature in Jaina Art and Tradition : 59 Mātanga, Garuda, Kubera, Horse Kusumă Acyutā, Chanda Prajāpati, Acyută Lion Mahākāli, Mātanga, Gandharva, Kubera Vairoți, Mahāmānasi Mānavi, Dhariņi, Naradattā, Ambikā, Siddhāyikā Buffalo Duritări, Naradattă, Jvālamălini Bhrikuti, Nirvāņi, Bālā, Padmăvati Snake Vairoti Timukha, Yakşendra Ašokā, Vinită, Naradatta Boar Garuda Jvālāmālini Bhrikuti, Ašokā, Bālā Deer Kusuma Mănavi Kālikā Monkey Gāndhāri Tiger Kandarpā Peacock / Duritāri, Prajāpti cock Trimukha, Kusuma Kumārā Bhrikuți, Nirvāni, Sanmukha Bālā, Padmāvati Eagle Tumbarā, Cakreśvari, Apraticakră Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 60 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 Kumāra Nirvāņi Swan Kālikā, Mānasi, Yakşeśvara, Vijaya, Gandharva Mahāmānasi Bhrikuti, Ankuśā, Gāndhāri Pigeon Vijaya Fish Kinnara Kandarpā Tortoise Sutară Gāndhāri Ajita, Dharanendra Crocodile Pātāla, Kinnara Candă, Gāndhāri Another point of interest in Jaina context is the Samavasaraṇa, (big congregation hall built by Indra) having three fortification walls, at the top of which sits every Jina after attaining omniscience to deliver first sermon. What is specially important in this context, as mentioned in Jaina texts like- Adipurāņa of Jinasena (early 9th century), Harivaṁsa Purāņa of Jinasena (783 AD), Trisaștiśalākāpuruśacaritra of Hemacandra (12th century), is that for listening to the maiden preachings of the Jinas, the animals with inherent enmity also became friendly and came together and sat face to face. Accordingly we find in sculptural examples of Samavasaraņa from Kumbhariya, Delvada, Ranakpur and other places that such snake-peacock, elephant-tiger, .tiger-deer like animals are shown sitting face to face. Thus tradition of Samavasaraņa also presents not only world of animals alongwith human world but also show the impact of the preaching's of the non-violence of Jinas on animals. Another dimension of the representation of nature in Jaina tradition and art is Auspicious Dreams (Mārgalika Svapna), which are 14 according to Svetāmbara texts and 16 according to Digambara texts. These auspicious dreams (fig. 02) were seen by respective mothers of 24 Jinas before their births. The attached table of auspicious dreams distinctly show that the list has three Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Representation of Nature in Jaina Art and Tradition : 61 four-legged powerful animals namely Bull (symbol of Dharma or religion, agriculture, procreation, strength and power), Elephant (symbol of majesty, dignity, strength and prosperity and hold unique distinction in the Indian religion, mythology and art) and Lion (king of animals, suggestive of strength, and royalty). Besides, Puspahāra (flower garland) and four main primeval elements of Nature- Sun, Moon, Fire and Water are also mentioned in the list of auspicious dreams. The mention of Nāgendra Bhavana reminds of snake worship, which is also associated with seventh Jina Supārsvanātha and 23rd Jina Pārsvanātha . The representation of auspicious dreams in the miniature paintings of Kalpasūtra and sculptural renderings from Kumbhariya, Ranakpur, Khajuraho (fig. 03) temples mainly on their doorway above lintel are worthy of mention. Now we shall make a brief study of the representation of the nature in Jaina Art of Khajuraho. Khajuraho (Chatarpur, MP) being a very prolific temple site of Chandella period, has yielded more than 25 surviving temples. The discussion concerns only Jaina temples. Presently there are four surviving Jaina temples at Khajuraho namely Pārsvanātha temple (actually dedicated to Jina Ādinātha, c.950 - 70 A.D.), Ghantai (dedicated to Ādinātha) temple, c. 950 A.D. (now broken and only its porch is surviving), Šāntinātha temple (A.D. 1028) and Ādinātha temple (11th century A.D.). Besides a number of other Jaina temples were also built, the fragmentary remains of which are found mainly in the forms of door-way, wall portion and images sometimes reused in modern construction of Jaina temples. The remains are found in the three local museums of Khajuraho also. Pārsvanātha Jaina temple of Khajuraho (fig. 04) is the best preserved and indeed one of the finest temples of Khajuraho. The harmonious integration of sculpture and architecture infuse life in inanimate stone and the temple becomes melody in stone. The Pārsvanātha Jaina temple was constructed by Pāhila who was Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 62 : Sramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 "honoured by the king Dhanga”, the son and successor of Yasovarmana. The inscription in the Pārsvanātha temple bear the date, in Vikrama year 1011 (A.D. 954). The mention about donation of seven Vātikās (gardens) in the names of Pāhil, Dhanga, Chandra, Laghechandra, Sankara, Pañcāyatana and Amra in the inscription is significant. Apparently the gardens could be the source of maintenance of big temple like Pārsvanātha. The projections and recesses of farade (fig. 06) of outer and inner circumambulation carry three elegant bands of sculptures, which show figures of Jinas, Ambikā Yakși, Bāhubali (fig.07), Aștadikpālas, Brahmanical deities (Śiva, Vişņu, Brahmā, Kāmadeva) and Sura-sundarīs (nymphs). Barring the figures of Jinas with cognizances and the Yakṣīs like Cakreśvarī and Ambikā with Vāhanas (mount), the door-jambs (fig. 05) also show the floral decorations. The figures of two main river goddesses Gangā and Yamunā with their Vāhanas- Makara (crocodile) and Kūrma (tortoise) represent Jala-Devis and thus primeval element of Nature -water. The other temple- Ghantai, dedicated apparently to first Jina Rşabhanātha, survive only with its porch having floral and other decorations. This temple of 10th century alongwith 11th century Ādinātha temple are important from the standpoint of the renderings of 16 auspicious dreams which consist of Bull, Elephant, Lion like animal and lotus and elements of nature - Water (ponds - sarovara, ocean), Sun and Moon. Adinātha temple is also important for the beautiful damsel figures shown in close association with nature- tree. The figures of Mahāvidyās and Yakṣis like Cakreśvarī, Padmāvatī, Ambikā are shown with the mounts, which are either four-legged animals or some birds. The Jaina temples are identical in architectural schema with the Brahmanical temples of Khajuraho, which invariably show the ghața, flowers, creepers and animals in the intervening space of the figures all along the temples and also on their basement. The Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Representation of Nature in Jaina Art and Tradition : 63 Pārsvanātha temple is specially rich so far as the figures of Vyālas (leogryphs) are concerned. Although Vyālas are mythical animal but they look like a powerful lion to suggest the royal power of the rulers. These Vyālas mostly having the face of a lion (grotesque) sometimes have the faces of an elephant or a parrot or a horse and also of human being. Under the feet of the roaring Vyālas figures of warriors are shown, who hold sword and rides a horse. They are in the attitude of fighting the Vyālas. These representations are forceful. Of the 24 Jinas, 13 are represented at Khajuraho, the most important being Rşabhanātha, Pārsvanātha and Mahāvīra. They are invariably shown respectively with bull, snake (as seven hooded snake canopy) and lion. While the Jinas are shown with lāñchana, a good number of Brahmanical deities on Khajuraho Jaina temple make an important point of study in respect of harmony revealed • through Jaina temples at Khajurāho. The deity like Kāmadeva is shown with Pañchaśara (five arrows made of flowers) and Ikșudhanu (bow of sugarcane). The figures of Yaksis like Cakreśvarī on the doorways and outer wall or adhisthāna of Jaina temples, shown with garuda (eagle) vāhana and Ambikā with āmralumbi (bunch of mangoes) in hands and shade of mango tree above the head alongwith lion mount are also noteworthy. Another popular Yakși Padmāvati, is the snake goddess, holding snakes in hands and having snake canopy. Khajuraho sculptures as pointed out by my teacher Prof. Maruti Nandan Tiwari, reveal that the artists / patrons had special fascination for lotus flower which has been shown in the hands of all the deities irrespective of the fact whether or not lotus was to be shown with them. The variety of the lotus rendering is also tremendous. Another interesting representation is to be seen in the forms of the Apasarās or beautiful damsel figures, which look to be the combination of heavenly and earthly beauty. The tree foliage is Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 64 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 invariably associated with them as an umbrella or canopy. Sometimes the appearance of monkey or scorpion somewhere on their legs or thigh has deep suggestion of the pangs of love and exposure of beauty through fear. Apparently the use of the flora and fauna in the figures of damsels also gives meaning in expressing the feminine beauty. Thus the Jaina temples of Khajuraho are the examples whereon the beauty, spirituality and devotion are created by putting the divine and human figures in close association with the nature. References :1. M.N.P.Tiwari- Jaina Pratimāvijñāna, Varanasi, 1981; Elements of Jaina Iconography, Varanasi, 1983; Kajurāho Kā Jaina Purătatva, Khajuraho, 1987. 2. K.K. Chakravarty, M.N.P. Tiwari & Kamal Giri (eds.)- Khajurāho In Perspective, M.P. 1994. 3. M.N.P. Tiwari & S.S. Sinha- Jaina Kalā Tīrtha Deogarh, Deogarh, 2002. 4. M.N.P. Tiwari & S.S. Sinha- Jaina art and Aesthetics, New Delhi, 2010. 5. U.P.Shah- Jaina Rūpa Mardana, Varanasi List of Illustrations 1. Line-drawing, Cognizances of 24 Jinas, imbibing world of Nature. 2. Line-drawing, Auspicious Dream showing fusion of Flora & Fauna. 3. Auspicious Dreams, Door-Lintel, śāntinātha temple complex, Khajuraho (Chatarpur, M.P.), 114h century A.D. 4. Pārsvanātha Jaina temple, Khajuraho, c. 954 A.D. 5. Door Frame, Porch, Pārsvanātha Jaina temple, Khajuraho, c. 954 A.D. 6. Divinities with Flora & Fauna, south wall, Pārśvanātha Jaina temple, Khajuraho, c. 954 A.D. 7. Bāhubali, inner south wall of Garbhagļha, Pārsvanātha Jaina temple, Khajuraho, c. 954 A.D. Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Śramana, Vol. 61, No. 4 October - December 10 JAINA ETHICS AND ITS REFLETIONS ON SOCIETY Prof. (Smt.) Rekha Chaturvedi Being an ascetic religion Jainism has been blamed by some of the scholars that it is not for society. But this is not true. Though it belongs to Nivettimārgi tradition and talks of renunciation but it is very much for the society. Being reconciliatory in its attitude, Jania Ethics gives us a bundle of commandments by applying which one can make one's life as well as society healthy and virtuos. It does not talk of renunciation of world but it talks of renunciation of attachment and aversion and supra moral plan of life in the society. The author has recorded here some of the reflections of Jainism on Society. Wealth, health, beautiful persons, good food, clothing and houses are some of the objects, which an average man generally likes to have. On the contrary poverty, ill health, ugly faces, starvation and ill-feeding are the objects which a person tries to escape from. The desired object causes happiness and undesired causes misery. Pleasure and pain are the two sides of a coin. According to Jaina Ethics, our worldly possessions do not make us necessarily and fully happy.' Nor are poor people always unhappy. Happiness mainly depends on our mental attitude. The state of mental poise and calmness which springs forth form selfcontrol and integrity of personality can not be bought for money. There is a happiness, which reveals from within and that is called 'bliss' or 'beatitude'. The aim of worldly happiness is called ‘Preyas' and the end of spiritual bliss is called ' Śreyas' respec * Deptt. of Ancient History, D.D.U. University, Gorakhpur Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 66: Śramana, Vol 61, No. 4 October-December-10 tively. The main concern of Jaina Ethics is 'Śreyas' and not 'Preyas'. It aims at spiritual upliftment of the individual rather than his worldly success. It prescribes a supra-moral plan of life.3 Where one transcends both good and bad. Here Jaina point of view is nearer to Bhagvadgita's transcendental state of mind (Sthitiprajñatā). Any extrovert activity, whether vicious or virtuous is a deviation from the path of liberation. Acarya Kundakunda says that vice and virtue are shackles of iron and gold both of which bind us to the physical world4. The ideal of Jaina Ethics is the state of self-absorption with inner awakening. The supra Ethical plane of life can be realised only by persons with higher spiritual attainments who have dived deep into the realm of life. Every body should aspire for this ideal but with consideration to one's limitations. In the initial stage the aspirant is required to be vigilant so that he may not go astray. Pujyapāda says that virtuous life is definitely to be preferred to licentiousness. It is better to wait if we have to wait at all in the cool shade rather than in the hot sun3. In the Vedic period, the Rṣis seem to be anxious for long life, progeny, wealth and fame. In the Upanisadic age the pressure of the problem of misery was acutely felt. Narada who had mastered all branches of knowledge including Vedas could not find the way to get rid of misery. As referred in Chandogyopaniṣad he approached Sanat Kumara in all humbleness and told him that though he had heard that a man with self realisation crossed miseries, he himself was not capable of overcoming them 'O' Lord, I am 'in grief' lead me to the shore that lies beyond grief." 6 The credit of dealing with misery goes to Lord Buddha. He systematically expounded an elaborate ethical system for removal Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jaina Ethics and its Refletions on Society : 67 of sorrow. The universality of misery according to him was birth, old age, decay, sickness, death, sorrow, grief, woe, lamentation and despair and not to get desired. Buddha perceived the existence of misery but he prescribed a way of redemption from it. He suggested four noble truths that:? i) Misery exists (HCG: PORT) ii) It has a casual chain (5:04464 ) iii) It can be stopped (G:Cf218) and iv) There is way to get rid of it. (G:UFRIETAT Frygt) There is a view that there are tangible means of getting rid of misery e.g. diseases can be cured by medicines and therefore one need not worry about ethics. But from another point of view there are objections to it. i) Firstly, it is not sure that a particular misery can be cured by a tangible means without fail. ii) Secondly, a medicine may or may not cure the disease. iii) Thirdly, the relief is only temporary. Therefore, one can not depend on tangible means. The root cause of the miseries has to be found and a check imposed so as to uproot miseries permanently and unfailingly. The necessity of a moral discipline is a must. In the Jaina view Ācārya Śīlānka gives his commentary in the beginning of Ācārānga-sūtra ‘all creatures, over come by attachment, aversion and delusion tormented by various excessively bitter, physical and mental miseries should try to know that is good and what is bad for the removal of misery.! Uttarādhyayana says that all worldly pleasure is suffering in the ultimate analysis. “All singing is but prattle, all dancing is but mocking, all ornaments are but a burden, all pleasure produce but pain.'' Jaina thinkers gave a formula that; Āśrava (inflow of karmic matter causing misery) is the cause of birth and rebirth while Saṁvara Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 68 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 (stoppage of that inflow) is the cause of liberation. The soul engulfed in the mud of karmic matter from times immemorial, after getting rid of it, shines forth in its intrinsic purity of infinite knowledge, intuition, bliss and potency. The foundation principle of ethics is 'As you sow, so shall you reap, but Jaina relates it with a Psychological attitude of habit and says, 'we sow a character and reap our fate'. Human efforts and freedom of will have their own part to play in altering, amending, aggravating or affecting our past deeds and determining our future." The virtues lead to happiness and are to be preferred to vices, but the ultimate aim of morality is a state beyond vice and virtue. Such perfection is a far cry for an ordinary man as he has normal duties to discharge. For his help a code of conduct is prescribed and the code is only a path not the end. For perfection a considered balance is required between practical code of conduct and a supra moral plane of life. .: The meritorious action leads to wealth, wealth to pride, pride to infatuation and infatuation to sin; but from practical point of view good actions have to be preferred to bad action for the following reason. i) For a common man happiness is naturally preferable to . misery!2. ii) Good activities result in negation of passions. 13 iii) Good acts promote the interest of society are preferable to bad ones which are cause its disintegration. Jaina ācāryas ask their adherents to follow those general customs of the society, which are not contrary to spiritual teachings.14 Jainism is reconciliatory in its attitudes. Right faith, right knowledge and right conduct are the compact exclusive formula Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jaina Ethics and its Refletions on Society : 69 for liberation. 16 On the other hand, some systems of Indian philosophy like Sāṁkhya and Vedānta hold knowledge (tattvajñāna) to be the means of liberation. Mimāṁsā holds karman (right action) to be superior to any thing. Bhakti-cult holds devotion and faith to be the only way. Jainism shares its attitude with other systems of Indian philosophy. Right faith is an outcome of right attitude. It has a dynamic quality. Jainism does not accept the supremacy of a particular person like other world religions. Jainism approves the direct comprehension of truth as a landmark in the life of an aspirant. Right conduct and Right knowledge is impotent without Right faith. The union of the three brings real bliss to the soul. Jaina right believer is a Nişkāmakarmayogi of Bhagvadgitā. Jainism places ethics above metaphysics. Knowledge acquired through direct spiritual experience leads to liberation. Reflections and influence of Jaina ethics on society The Vedic people were more inclined towards worldly engagements than spiritual attainments in the first phase. They glorified the institutions of war as means of destroying enemies ‘vaidiki hissā himšā na bhavati was a slogan and at the time of Mahāvīra, animals were killed mercilessly in sacrifices but Manusmrti praises avoidance of meat eating under Śramņic influence. Mahābhārata declared non-violence as supreme duty'7. Thus, the central principal of Jainism becomes important principle of Hinduism. It is a real truth in the saying that life lives on life.18 Still justice demands that we should not inflict misery on others-to inflict on us. This golden rule is adopted in the Bible also. The five vows, the three-fold path of self-discipline and the Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 70 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 five-fold path of vigilance are the constituents of practical conduct. The five vows are: 1. Truth (Satya) 2. Non-violence (Ahimsā) 3. Non-stealing (Asteya) 4. Non-possession (Aparigraha) 5. Celibacy (Brahmacarya) The first four vows were prescribed by Pārsvanātha and were called cāturyāma. Mahāvīra strictly emphasised it and divided the last into tow and added celibacy as fifth. Buddha prescribed first four and included the vow of abstinence from intoxicants as the fifth vow and called it Pancasila. Chāndogyopanişad described the five qualities of a Goodman and they are : 1. Penance (Tapas) 2. Liberality (Dāna) 3. Simple dealing (Arjavam) 4. Non-violence (Ahiṁsā) 5. Truthfulness (Satya-vacana) The Jaina view of non-possession is more comprehensive than abstinence. The first four vows were unanimously accepted by Brāhmanism, Buddhism and Jainism. The fifth vow was modified by each religion according to its own requirement and suitability. In the original vow of liberality was replaced by the ascetic vow of non-possession. Originally the life of a householder in the Brāhmanism was guided by such social virtues as sacrifice, study and liberality rather than by ascetic virtues. In the influence of Jainism Brahmanical tradition changed when Patañjali replaced liberality by nonpossession. Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jaina Ethics and its Refletions on Society : 71 The Brahmanical tradition originally did not favour the idea of renouncing the word in the prime of youth. It was only after the duties of worldly life were fulfilled that a person could adopt monk-hood to lead a retired life in the forest. The Šramaņa tradition influenced the Brāhmaṇa tradition in this respect also. The old division of aśramas continued, but the new idea of renouncing the world, the very day one attains detachment was also introduced. Jaina ethics is primarily ascetic. The Śrāvakācāra includes Brahmacarya, Vānaprastha, and Saṁnyāsāśrama of Hinduism in it. In Jainism the life of a householder is meant to be a short-stay for enduring the hardships of the life of a monk. Some salient features of Jaina view on life 1. Jaina view is neither based on oneness of life as in Vedānta, nor on momentary nature of self as in Buddhism. It is based on equalities of life. All souls are equal. That is why nonviolence in Jainism takes into account not only the human beings or animals or insects but even plant-life or one sensed elemental life. 2. The social life as anticipated by Jaina ethics does not make any distinction on the basis of caste, creed or colour but the Jaina society adopted caste system from Hinduism and observe it as strictly as the latter. If a foreigner comes to India, he can not distinguish between the two religious and two communities. 3. Jaina ethics is based on fundamental doctrine of non absolutism (anekāntavāda). This has saved Jaina Ethics from being one sided. Jaina Ethics always takes into account all the different views and tries to reconcile them e.g. various factors of time, nature, fate, accident and matter find their proper place in Jaina view of life. Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 72 : Śramaņa, Vol 61, No. 4 October-December-10 4. The approach of Jainism towards opponent school of thought is constructive and not destructive. Non absolutist view led to the balanced view between such opposite conceptions as they of practical morality and transcendental morality, between fate and human efforts, between efficacy of substantial cause and instrumental cause. In fact, non-absolutism influenced the Indian society at every step. It gave the concept of social harmony among different view customs and styles of living Jainism never confronted with any other faith and never came in hit list of any. Besides this Jainism followed a principle that it would not oppose any established practice of society in an absolute way!9. This principle gave a long life to Jainism in India while Buddhism disappeared from its birthplace. 5. Jaina ethics never confused the science of spirituality (Mokşa-śāstra) with science of social righteousness (Dharma-Šāstra). It has thus been able to distinguish the essential nature of dharma from its non-essential beliefs, which change from time to time and place to place. The cats of public welfare can be dealt with separately in books of social sciences; but they should not be confused with the essential aim of emancipation. Here Jaina thinkers alike Hindu thinkers spoke of social duties towards city, nation and family. In the first instance Jaina and Buddhist monks wandered for preaching throughout the year but when they found that their wandering destroyed grains in the rainy season they stopped at a place for the four rainy months and studied their scriptures and preached the householders like Brāhmaṇa tradition. 7. In the someway Jaina monastic order was open for all without any distinction of caste and creed but later on the Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Jaina Ethics and its Refletions on Society : 73 entrance was based on pure merit. Consequently, Brahmins uphold due to their calibre and thus casteism entered indirectly in the Jaina social order. 8. The Jaina formulated their monastic rules in accordance with state legislature and social norms e.g. a child, an offender, a debtor, a slave and a diseased were restrained form the entrance. In other words the entrance of monastery needed ‘no objection' certificate form society and the state. 9. Jaina Ethics is not merely a system but it is a religion to be lived in practice. Jaina householder and monks practise the rules of conduct in their lives. Thus it is a living system of ethics. 10. Equal emphasis on faith, knowledge and conduct saves Jaina Ethics from being either a mere speculation of philosophy or merely religion of rituals. References 1. Kundakundācārya, Samayasāra, Delhi, 1959, Gāthā-146 2. Kathopanişad 1.1.27 3. Dayanand Bhargava, Jaina Ethics, MLBD, 1938, p.68, compare: G. C. Pande, 'Lectures on Jainism,' University of Delhi, 77, p14 17 4. Samayasāra, Gāthā-146 5. Istopadeśa 6. Chāndogyopanişad, See Dr. S. Radhakrishnan, 'The Principal Upanishads'p. 7 7. Arguttara-nikāya, London, 1959, 3.61, 1-13 8. Sāṁkhyakārikā-Poona, 1934, verse-1 9. Uttarādhyayana-sūtra, SBE. Vol. XLV, 13.16 10. Ibid. 13.16-17 11. Jaina Ethics, p.14 12. Istopadeśa-3 13. Bhāvasamgraha, 616-17 14. Yaśastilaka-campū, Bombay 1901, 8.31 Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 74: Śramana, Vol 61, No. 4 October-December-10 15. Uttaradhyayana 28.3 16. Pujyapāda on Tattvärtha-sūtra, 9.18 17. Ahimsa-paramo-dharmaḥ Mahābhārata 18. Jīvo jīvasya bhojanaṁ 19. Jadapi suddham tadapi loka-viruddhaṁ na karaniyam na caraṇīyaṁ. Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ || जिज्ञासा और समाधान १. जिज्ञासा- जैन धर्म में दीपावली पर्व क्यों मनाते हैं? इस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए? कु. अर्चिता जैन, अमेरिका समाधान - भारतीय पर्व संस्कृति के संवाहक होते हैं। इनके पीछे महापुरुषों के जीवन और कार्यों की घटनाओं का अपूर्व इतिहास छुपा होता है। ये केवल मौज-मस्ती से सम्बन्धित नहीं होते हैं अपितु इममें एक जनकल्याणकारी संदेश छुपा रहता है। दीपावली (दीप +आवली = दीप-पंक्ति) एक ऐसा ही ज्योति- पर्व है जो बाह्य-अन्धकार के साथ आभ्यन्तर-अन्धकार को भी दूर कर देता है। इस पर्व में हिन्दू और जैन सभी समान भाव से सम्मिलित होते हैं। इसे आध्यात्मिक चेतना का राष्ट्रीय पर्व भी कह सकते हैं। इसे मनाने के पीछे कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख हमें प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। जैसे हिन्दू पुराणों के अनुसार इस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम चौदह वर्ष के वनवास के बाद 'रावण' नामक राक्षस का बध करके अयोध्या वापस आए थे। तब अयोध्यावासियों ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त करने तथा मर्यादा पुरुषोत्तम राम का स्वागत करने के लिए नगर को सजाकर दीपोत्सव मनाया था। २. हिन्दू पुराणों के ही अनुसार अत्याचारी और व्यभिचारी नरकासुर नरेश ने १६००० राज-कन्याओं को कैद कर लिया था जिससे प्रजाजन बहुत संत्रस्त थे। श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करके उन राजकन्याओं को मुक्त कराया था। फलस्वरूप प्रजा ने खुशी में दीप जलाये थे जो कालान्तर में ज्योति-पर्व बन गया। ३. आज के दिन अत्याचारी राजा बलि को पाताल जाना पड़ा था और प्रजा में हर्ष व्याप्त हुआ था। ४. सिक्खों के छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी को जेल से आज के दिन मुक्त किया गया था। ५. गुरु नानक का जन्म भी इसी दिन हुआ था। * प्रो. (डॉ.) सुदर्शनलाल जैन, निदेशक, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी। मो. ०९४१५३८८२१८ Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० ६. स्वामी दयानन्द सरस्वती की आज समाधि हुई थी। ७. जैन- परम्परानुसार कार्तिक कृष्णा अमावस्या को सूर्योदयकाल (चतुर्दशी सोमवार की रात्रि का अंतिम प्रहर तथा अमावस्या मंगलवार का उषाकाल) में चौबीसवें तीर्थङ्कर महावीर का करीब ७२ वर्ष की आयु में ई. पूर्व ५२७ (शक सं. ३०५ वर्ष ५ माह पूर्व वि.सं. ४७० वर्ष पूर्व) में परिनिर्वाण हुआ था। हरिवंश पुराण, तिलोयपण्णत्ति आदि की पौराणिक भाषा में जब चौथे काल (सुषमा - दुषमा) के समाप्त होने में ३ वर्ष ८.५ माह शेष रह गए थे तब तीर्थङ्कर महावीर का परिनिर्वाण हुआ था अर्थात् सर्वज्ञता के बाद २९ वर्ष ५ माह २० दिन बीतने के बाद तीर्थङ्कर महावीर ने अवशिष्ट चारों अघातिया कर्मों को नष्ट करके मोक्ष - लक्ष्मी का वरण किया था। इस पवित्र काल में चारों ओर एक अलौकिक प्रकाश फैल गया था। इसी दिन सायंकाल तीर्थङ्कर महावीर के प्रमुख शिष्य इन्द्रभूति गौतम गणधर को केवल ज्ञान हुआ था। इन दोनों आध्यात्मिक घटनाओं की खुशी में जैन दीपावली पर्व मनाते हैं तथा उनकी स्मृति में उस दिन से महावीर निर्वाण संवत् प्रारम्भ किया गया। आज वीर निर्वाण संवत् का २५३७ वाँ वर्ष चल रहा है। इसी तरह अन्य कई घटनाएँ दीपावली पर्व के साथ जुड़ी हैं। इस पर्व के साथ तीन अन्य पर्व भी भारतीय संस्कृति में जुड़ गए हैं जिनकी जैनधर्मानुसार व्याख्या इस प्रकार की जाती है— (१) धनतेरस - कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी को भगवान् ने बाह्य लक्ष्मी समवसरण का त्याग करके मन, वचन और काय का निरोध किया था। उस योग-निरोध से भगवान् को मोक्षलक्ष्मी प्राप्त हुई थी। अतः मोक्ष - लक्ष्मी की प्राप्ति में निमित्तभूत त्रयोदशी धन्य (धनतेरस) हो गई। अतः आज के दिन बाह्य-संग्रह का त्याग करके रत्नत्रय का संग्रह करना चाहिए। न कि बाजार से सोना, चाँदी, बर्तन आदि खरीदना चाहिए। (२) रूपचौदस - का. कृ. चतुर्दशी को भगवान् महावीर ने १८ हजार शीलों को प्राप्त कर रत्नत्रय की पूर्णता की थी तथा पूर्णरूप से अपने स्वरूप में लीन हो गए थे जिससे यह 'रूप चौदस का पर्व बन गया। (३) गोवर्द्धन पूजा - कार्तिक शुक्ला प्रतिपदा के दिन केवलज्ञान प्राप्ति के बाद स्वामी गणधर गौतम के मुखारबिन्द से सप्तभङ्गी अनेकान्त स्याद्वादमयी दिव्यध्वनि प्रथम बार प्रकट हुई थी। अतः यह दिन गोवर्द्धन पूजा (गो = Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान सप्तभङ्गमयी जिनवाणी का वर्द्धन ) के रूप में प्रचलित हुआ। जैनेतर लोग गोबर से चित्रादि बनाकर सप्तपूत मां की कथा का श्रवण करते हैं। : ७७ (४) दीपावली या दिवाली- दीपावली को दिवाली भी कहते हैं जिसका एक अर्थ यह भी कुछ लोग करते हैं- 'सांसारिक प्रपञ्चों का दिवाला निकालना' (कर्मों का नाश करना)। यह अर्थ भी भगवान् के परिनिर्वाण से जुड़ा है क्योंकि इस दिन उन्होंने सभी कर्मों (घातिया - अघातिया) से छुटकारा पा लिया था । चित्त की निर्मलता होने पर आत्मा में एक नाद होता है जिसके विस्फोट ( पटाका फूटना ) से सभी कषायें चूर-चूर हो जाती हैं। अतः हम जो रागद्वेष के जाल से जकड़े हुए हैं उसे हटाना है अर्थात् आत्म- घर की सफाई करना है। बाह्य अन्धकार के साथ आभ्यन्तर अन्धकार को भी इस दिन दूर करना चाहिए। यह इस पर्व का लक्ष्य है। जैसे तिल-तिल जलता दीपक प्रकाश देता है वैसे ही हमें तप द्वारा कर्मों को जलाकर आभ्यन्तर को प्रकाशित करना चाहिए। करुणा, दया, प्रेम, इंसानियत और वात्सल्य को प्रजाजन में उड़ेलना चाहिए। जन्म-जन्मान्तरों से ईर्ष्या, घृणा, लोभ, मोह और अहंकार की जो एक मोटी से काली परत आत्मा पर चढ़ी है उसे यदि साफ करना है तो कषायों को जलाना होगा क्योंकि पवित्र हृदय में ही मानवता की दिव्य ज्योति जगमगाती है। गरीबों की गरीबी दूर कर उन्हें प्रकाश दीप देना चाहिए। उन्हें भरपेट खाना खिलाना चाहिए। आज दिगम्बर जैन समाज में प्रातः काल पूजा के बाद महावीर निर्वाण का लाडू चढ़ाया जाता है और सायंकाल रात्रि में भी पूजा आदि की जाती है। व्यापारी वर्ग लेखा-जोखा करके गणेश और लक्ष्मी का पूजन करते हैं। कुछ जैनी भगवान् महावीर के साथ तिजोरियों से धन निकाल कर गणेश और लक्ष्मी की भी एक साथ पूजा करते हैं जो ठीक नहीं है। आतिशबाजी, जुआ आदि की कुछ विसंगतियाँ भी आज के दिन के साथ जुड़ गई हैं जो दीपावली की मूल धारणा के प्रतिकूल हैं। तान्त्रिक आज की रात्रि को मंत्र-सिद्धि का अनुकूल समय मानते हैं जो सांसारिक परिभ्रमण में कारण वस्तुतः जैन दृष्टि से दीपावली पर्व आत्मशुद्धि द्वारा आत्मा को केवलज्ञान की ज्योति से प्रकाशित करने का पर्व है। है। २. जिज्ञासा- 'नमोकार अथवा 'णमोकार' मंत्र के सम्बन्ध में जानकारी कु. सृष्टि जैन, भोपाल दीजिए। Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ७८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० सं. १. २. ३. ४. समाधान नमोकार मंत्र नमो (णमो) अरिहन्ताणं नमो (णमो) सिद्धाणं ७ णमो (णमो) आइरियाणं नमो (णमो) उवज्झायाणं ७ १५ नमो (णमो लोए सत्वसाहूणं ९ योग ३५ ५८ अक्षर ७ मात्रा ११ ९ ११ १२ स्वर 3 व्यञ्जन เ ত 5 ७ ९ ८ ३४ ३० इसका अर्थ है- सभी अर्हन्तों को नमस्कार है। सभी सिद्धों को नमस्कार है। सभी आचार्यों को नमस्कार है। सभी उपाध्यायों को नमस्कार है और लोक के सभी सच्चे साधुओं को नमस्कार है। इस मंत्र में 'लोए' और 'सव्व' ‘अन्त्यदीपक' हैं जिसका अर्थ है इन्हें सभी मन्त्र वाक्यों के साथ जुड़ा हुआ समझना चाहिए। प्राकृत भाषा में रचित यह पंच परमेष्ठी वाचक मंत्रराज है। इसका संस्कृत रूप है नमस्कार मंत्र। यह सभी पापों को नष्ट करने वाला और सभी मंगलों में प्रथम (श्रेष्ठ) मंगल है। कहा है णमोयारो एसो पंच सव्व- पावप्पणासणो । मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं होई मंगलं ।। इस मन्त्र के कई रूप मिलते है, जैसे (१) अरिहंत - मोह रूप कर्म - शत्रुओं को नष्ट करने वाला या उन्हें आत्मा से अलग करने वाला । यहाँ हिंसा का भाव नहीं है। (२) अरहन्त ( अर्हन्त ) - यह पूज्यार्थक 'अर्ह' धातु से बना है। अतः इसका अर्थ है 'पूज्य'। (३) 'अरूहंताणं' इसका अर्थ है संसार रूपी वृक्ष के बीज को दग्ध करने वाला। 'अरुह' अर्थात् जो बीज पुनः अंकुरित न हो । है। (४) 'नमो' के स्थान पर दिगम्बर परम्परा में 'णमो' का प्रयोग मिलता प्राकृत के नियमानुसार 'न' को 'ण' होता है परन्तु हेमचन्द्राचार्य ने पद के आदि के 'नं' के प्रयोग को उचित बतलाया है। (५) 'आयरियाणं या आइरीयाणं' दोनों प्रयोग मिलते हैं। प्राकृत नियमानुसार आयरियाणं में 'य' श्रुति हुई है। (६) 'सव्व' के स्थान पर 'सब्ब' भी प्रयुक्त होता है। Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान : ७९ इस मंत्र का सभी को प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल अवश्य स्मरण (जप) करना चाहिए। यह नमस्कार मंत्र अहंकार का विसर्जन करता है। आत्मशुद्धि करता है। इस मंत्र के कई नाम हैं-पंच नमस्कार मंत्र, महामंत्र, अपराजित मंत्र, मूलमंत्र, अनादिनिधन मंत्र, मंगल मंत्र, परमेष्ठी मंत्र आदि। इस मंत्र में किसी देवता को नमस्कार नहीं किया गया है, अपितु जिन्होंने तप-ध्यान के द्वारा अपनी आत्मा का कल्याण किया है तथा जो आत्म-कल्याण के मार्ग में स्थित हैं तथा भविष्य में मुक्ति प्राप्त करने वाले हैं, ऐसे महापुरुषों को नमस्कार किया गया है। इस मंत्र के द्वारा किसी प्रकार की याचना नहीं की गई है फिर भी अपने आप कार्यसिद्धि होती है, जैसे अंजन चोर को आकाश-गामिनी विद्या की प्राप्ति, मरणासन्न कुत्ते को राजकुमार जीवन्धर द्वारा यह मंत्र सुनाने पर सुदर्शन नामक यक्षेन्द्र देवत्व की प्राप्ति। निन्दा करने पर सुभौम चक्रवती को सातवें नरक की प्राप्ति। इस महामंत्र का संक्षिप्त रूप 'ॐ' है। 'ओम्' (अ + अ + आ + उ + म्) में पाँचों परमेष्ठियों के आदि अक्षर समाहित हैं, जैसे- अ = अरहन्त, अ = अशरीरी, सिद्ध, आ = आचार्य, उ = उपाध्याय और म् = मुनि (साधु)। कहा है अरहंता असरीरा आयरिया तह उवज्झाया मुणिणो। पढमक्खर-णिप्पण्णो ओंकारो पंच परमेट्ठी ।। इसका दूसरा संक्षिप्त रूप है- अ-सि-आ-उ-सा नमः। आप प्रश्न कर सकते हैं कि सिद्धों को पहले नमस्कार करना चाहिए क्योंकि उन्होंने आठों कर्मों को निर्जीर्ण कर दिया है जबकि अर्हन्तों ने अभी सभी अघातिया कर्मों को निर्जीर्ण नहीं किया है। इसका उत्तर है कि अर्हन्त ही हमें संसार-सागर से पार उतरने का समवसरण में दिव्य उपदेश देते हैं। अतः उन्हें प्रथम नमस्कार किया है। वे ही हमारे मार्ग दर्शक हैं। सिद्ध अशरीरी हैं उनसे साक्षात् उपदेश नहीं मिलता है। वस्तुत: “सिद्ध' और 'अर्हन्त' ये परमात्मा की दो अवस्थायें हैं- सशरीरी-अवस्था (जीवन्मुक्त या केवलज्ञानी) और अशरीरी-अवस्था (विदेहमुक्त या सिद्ध)। Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विद्यापीठ के प्रांगण में पाण्डुलिपियों के संपादन एवं उनकी समीक्षा पर कार्यशाला ९ नवम्बर से ३० नवम्बर २०१० तक पार्श्वनाथ विद्यापीठ में इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी तथा राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन, नई दिल्ली के संयुक्त तत्त्वावधान में कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला के उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता प्रो. आर. सी. पण्डा, संकाय प्रमुख, संस्कृत विद्या धर्मविज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने की। इसके मुख्य अतिथि पूर्व कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय, प्रो. बी. एम. शुक्ल थे। कार्यशाला का परिचय डॉ. वी. एस. शुक्ला ने दिया। स्वागत इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) के परामर्शदाता प्रो. कमलेश दत्त त्रिपाठी ने दिया तथा धन्यवाद ज्ञापन विद्यापीठ के निदेशक प्रो. सुदर्शन लाल जैन ने किया। इसके समापन समारोह में अध्यक्षता विद्यापीठ के निदेशक प्रो. सुदर्शनलाल जैन ने की तथा इसके मुख्य अतिथि थे प्रो. बी.डी. सिंह, रेक्टर, बी.एच.यू.। प्रो. के. डी. त्रिपाठी ने कार्यशाला में उपस्थित विद्वज्जनों का स्वागत किया तथा डॉ. एन. डी. तिवारी ने कार्यशाला का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रणति घोषाल ने किया। कार्यशाला में शारदा व नेवारी लिपियों का पुनर्निरीक्षण, विद्वानों के व्याख्यान तथा पाण्डुलिपियों की प्रयोगात्मकता पर कार्य किया गया। इस कार्यशाला में स्थानीय तथा बाहर से आये हुए व्याख्यानकर्ता थे - प्रो. वी. वी. जद्दीपाल, प्रो. प्रकाश चन्द्र पाण्डेय, एन. झा, प्रो. रत्ना वासु, प्रो. जी. सी. त्रिपाठी, वी.एस. शुक्ला, डॉ. श्रीमती सुभद्रा देसाई, डॉ. जितेन्द्र बी. शाह, प्रो. बसन्त कुमार भट्ट, प्रो. के. डी. त्रिपाठी, प्रो. आर. शुक्ला, प्रो. आर. सी. पण्डा, प्रो. आर.सी. पाण्डेय, प्रो. वाई. के. मिश्रा, प्रो. एस. एल. जैन आदि। इस कार्यक्रम में श्री सी. आर. गरेखान, अध्यक्ष इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (IGNCA) ट्रस्ट तथा प्रो. दीप्ति त्रिपाठी निदेशक (NMM, New Delhi) ने अपनी गरियामयी उपस्थिति से इस कार्यशाला को गौरवान्वित किया। कार्यशाला अत्यन्त उपयोगी रही जिसमें संस्थान के निदेशक प्रो. सुदर्शनलाल जैन ने पूर्ण सहभागिता देते हुए जैन साहित्य का इतिहास, विद्यापीठ में संगृहीत पाण्डुलिपियों का विवरण तथा उनकी महत्ता पर प्रकाश डाला। Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विद्यापीठ के प्रांगण में : ८१ विद्यापीठ परिवार द्वारा सामूहिक दीपावली-पूजन ४ नवम्बर, रात्रि ८ बजे दीपावली के पावन अवसर पर संस्थान के निदेशक प्रो. सुदर्शनलाल जैन के विशेष आह्वान पर एक सामूहिक जैन पूजा का आयोजन किया गया जिसमें विद्यापीठ के समस्त कर्मचारीगण, अधिकारीगण, पार्श्वनाथ विद्यापीठ में रह रहे समस्त छात्र-छात्राएँ, अध्यापक आदि उपस्थित थे। प्रो. जैन ने जैन विधि-विधान के अनुसार मन्त्रोच्चार सहित पूजन किया तथा संस्थान की स्थापना के ७३ वर्ष पूरे होने की खुशी में ७३ दीप प्रज्वलित किये गये व प्रसाद वितरण किया गया। जैना के संस्थापक डॉ. तनसुख साल्गिया जी का अपने सहयोगी मित्रों के साथ विद्यापीठ में आगमन डॉ. तनसुख साल्गिया, पूर्व अध्यक्ष व संस्थापक-जैना (फेडरेशन आफ जैन एसोसियेशन, नार्थ अमेरिका) तथा मानद् सदस्य- अन्तर्राष्ट्रीय महावीर जैन मिशन, जैन सोसायटी ग्रेटर क्लीव लैण्ड, महावीर विजन, ब्राह्मी जैन सोसायटी तथा एशियन अमेरिकन सर्विस कौन्सिल, का विद्यापीठ में आगमन दिनांक १६.११.२०१० को हुआ। आपके साथ आपकी पत्नी, मित्र धीरज भाई संघवी, मुम्बई तथा प्रो. रमेश चन्द चतुर्वेदी, लखनऊ भी थे। डॉ. साल्गिया ने विद्यापीठ में चल रही परियोजनाओं में विशेष रुचि ली तथा संग्रहालय आदि अनेक परियोजनाओं पर सहयोग करने का आश्वासन दिया। पार्श्वनाथ विद्यापीठ में वड्डमाणु स्तूप पर व्याख्यान २१ नवम्बर २०१० को पार्श्वनाथ विद्यापीठ में लाला श्री हरजसराय जैन स्मृति व्याख्यान-माला के अन्तर्गत प्रो. विजय कुमार बाब, प्राचीन इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व विभाग, ओस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने "आन्ध्र के जैन स्मारक, बड्डमाणु स्तूप: एक अध्ययन" पर व्याख्यान देते हए उक्त विषय पर प्रकाश डाला और कहा कि 'कुछ अभिलेख व इमारतें ऐसी हैं जिनमें से जैन इतिहास के सन्दर्भो को सुनिश्चित करने में पर्याप्त सहायता मिलती है। उन्हीं स्मारकों में से वड्डमाणु स्तूप एक प्रमुख स्मारक हैं जो तत्कालीन समाज के आर्थिक, सामाजिक स्थिति पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। प्रो. बाबू के अनुसार वड्डमाणु स्तूप पर अंकित कला की तुलना उदयगिरि, खण्डगिरि में प्राप्त होने वाली कला से की जा सकती है। इसमें मुख्य रूप से मछली, Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० श्रीवत्स, चक्र, पूर्णघट, कल्पवृक्ष तथा स्वस्तिक का अंकन हुआ है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. मारुति नन्दन प्रसाद तिवारी ने संचालन डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय ने तथा धन्यवाद ज्ञापन निदेशक, पार्श्वनाथ विद्यापीठ प्रो. सुदर्शन लाल जैन ने किया । पार्श्वनाथ विद्यापीठ - आई. एस. जे. एस. ग्लोबल सेन्टर की गतिविधियाँ - जैसा कि आपको विदित है कि पार्श्वनाथ विद्यापीठ को विदेशी छात्रों / विद्वानों को जैन धर्म-दर्शन एवं संस्कृति से परिचित कराने एवं जैनविद्या पर उनके विशेष अध्ययन हेतु एक पी. वी. आई. एस. जे. एस. ग्लोबल सेन्टर की स्थापना की गयी है। यह सेन्टर अन्तर्राष्ट्रीय जैन अध्ययन स्कूल (आई.एस.जे.एस.) के सहयोग से डॉ. सुलेख जैन (यू. एस. ए.) के नेतृत्व एवं डॉ. शुगनचन्द जैन के मार्गदर्शन में स्थापित किया गया है। आई. एस. जे. एस. के भारत में तीन मुख्य केन्द्र बनाए गए हैं- दिल्ली, जयपुर एवं वाराणसी। वाराणसी (पार्श्वनाथ विद्यापीठ) में विगत चार वर्षों से विदेशी छात्र / विद्वान् आई.एस.जे.एस. के सहयोग से जैन विद्या पर विशेष अध्ययन हेतु लगातार आ रहे हैं। इनके पठन-पाठन, भोजन आवास की समुचित व्यवस्था पार्श्वनाथ विद्यापीठ आई. एस. जे. एस. के सहयोग से करता है। विदेशी छात्रों को जैन विद्या अध्ययन के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जाये, कैसे उनकी इस क्षेत्र में अभिरुचि बढ़ाई जाये इस विषय पर विचारविमर्श करने के लिए आई. एस. जे. एस. ने उससे जुड़े सदस्यों की एक बैठक छोटी दादावाड़ी, दिल्ली में दिनांक १६ - १७ दिसम्बर २०१० को बुलाई थी। बैठक में लगातार दो दिनों तक समर स्कूल के अनेक बिन्दुओं पर चर्चा हुई, जिनमें अनेक बहुमूल्य सुझावों को रेखांकित किया गया। यह अत्यन्त हर्ष का विषय है कि अन्तर्राष्ट्रीय जैन अध्ययन स्कूल (आई.एस.जे.एस.) अब पार्श्वनाथ विद्यापीठ के अकादमिक विकास में अपनी हर सम्भव सहायता देगा तथा पार्श्वनाथ विद्यापीठ को जैन विद्या के एक विशेष केन्द्र के रूप में विकसित करेगा। आई. एस. जे. एस. के निदेशक डॉ. शुगनचन्द जैन जो पार्श्वनाथ विद्यापीठ प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष भी हैं, संस्था के चतुर्दिक् विकास के लिए कटिबद्ध हैं। विद्यापीठ में अब शीघ्र ही एम. ए. जैन विद्याध्ययन और योग पर नूतन पाठ्यक्रम चलाए जायेंगे तथा दूरस्थ शिक्षा के माध्यम Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विद्यापीठ के प्रांगण में : ८३ से भी संस्था के अकादमिक कैलेण्डर में नूतन जीवन का संचार किया जाएगा। ग्रन्थालय (पाण्डुलिपि-ग्रन्थों तथा मुद्रित ग्रन्थों का भण्डार) तथा म्यूजियम को नया रूप देकर विस्तार किया जायेगा। 'तीर्थङ्कर पार्श्वनाथ' पर संगोष्ठी सम्पन्न दिनांक २८.१२.२०१० को पार्श्वनाथ विद्यापीठ में 'तीर्थङ्कर पार्श्वनाथ' पर उनकी जन्म जयन्ती (३१.१२.२०१०) के उपलक्ष्य में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी के मुख्य अतिथि थे-प्रोफेसर इमरीट्स प्रो. रेवाप्रसाद द्विवेदी, सारस्वत अतिथि थे संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के डीन प्रो. आर. सी. पण्डा तथा अध्यक्ष थे स्वतन्त्र चिंतक श्री शरद कुमार 'साधक'। अन्य प्रमुख वक्ता थे प्रो. फूलचन्द्र जैन प्रेमी, प्रो. कमलेश कुमार जैन, डॉ. मुन्नी पुष्पा जैन, डॉ. अरुण प्रताप सिंह, साध्वी श्री सिद्धन्तरसा जी, साध्वी मैत्रीकला जी आदि। कार्यक्रम का संचालन तथा अतिथियों का स्वागत प्रो. सुदर्शन लाल जैन, निदेशक पार्श्वनाथ विद्यापीठ ने किया। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय, सहनिदेशक ने किया। सभी वक्ताओं ने पार्श्वनाथ के बहुआयामी व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए उनकी शिक्षाओं की आज के संदर्भ में उपयोगिता बतलाई। श्री शरद कुमार 'साधक' जी के पार्थिव शरीर का अनुकरणीय दान 'तीर्थङ्कर पार्श्वनाथ' पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे स्वतन्त्र चिंतक श्री शरद कुमार ‘साधक' का संगोष्ठी-समाप्ति के तुरन्त बाद अचानक हृदयगति रुक जाने से स्वर्गवास हो गया। अथक प्रयास के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। आपके आदर्श थे महात्मा गांधी और विनोबाजी। समाजसेवा आपका लक्ष्य था। वे जैसा कहते थे वैसा ही आचरण में स्वयं लाते थे। ७९ वर्षीय साधकजी ने इसीलिये अपनी वसीयत में पहले से लिख दिया था कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे शरीर के कण-कण का उपयोग समाजसेवा में लगे और उसे अस्पताल में दान दे दिया जाये। तदनुसार ही उनके परिवारवालों ने उनके पार्थिव शरीर को स्थानीय सरसुन्दरलाल अस्पताल का.हि.वि.वि. को दान में दे दिया। आपका जन्म चारभुजा (मेवाड) में दिनांक २-८-१९३१ को हुआ था। Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० कई ग्रन्थ आपकी लेखनी से प्रसत हए, कई ग्रन्थों और पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। विद्यारत्न आदि कई सम्मानों से आप सम्मानित किये गये। आपकी धर्मपत्नी प्रभा देवी ने उनके कंधे से कंधा मिलाकर पूर्ण सहयोग किया। पर्यावरण संरक्षण तथा गो सेवा के लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहे। पार्श्वनाथ विद्यापीठ से आपका काफी लगाव था? एसे मनीषी अध्यात्मप्रेमी और समाजसेवी शरद कुमार 'साधक' के आकस्मिक महाप्रयाण से पार्श्वनाथ विद्यापीठ परिवार मर्माहत है तथा उनके परिवार को यह दुःख सहन करने की क्षमता प्राप्त हो ऐसी कामना करता है। श्रमण के नये सदस्य १. श्री अनिल मेहता - ५००/२. श्री सतीश कुमार जैन १०००/३. श्री अतुल जैन २०००/४. श्री अतिवीर जैन २०००/ विद्यापीठ को प्राप्त सहायता राशि१. श्री तनसुख साल्गिया ७५००/२. श्री सुनील जैन २७७०/३. श्री अतिवीर जैन (प्रो. विमल दास कोंदिया एवं विद्या देवी जैन की ३५००/ स्मृति में Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | जैन जगत् । संक्षिप्त समाचार १. मुम्बई में २०-२१ नवम्बर २०१० को आचार्य श्री सुनील सागर जी के सानिध्य में प्राकृत परिचर्चा सम्पन्न हुई। जिसमें “अज्झप्पसारो" ग्रन्थ का विमोचन आचार्य श्री सुनील सागर जी म.सा. द्वारा हुआ तथा श्रुत सेवा यंग अवार्ड पुरस्कार के अन्तर्गत श्री सागर शाह शास्त्री, मुम्बई को पुरस्कृत किया गया। २. वैशाली २० नवम्बर २०१० को प्राकृत जैन शास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान में डॉ. गुलाबचन्द चौधरी व्याख्यानमाला का आयोजन डॉ. रवीन्द्र कुमार सिंह, अध्यक्ष, दर्शन विभाग, बिहार विश्वविद्यालय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ। तदुपरान्त वर्ष २००८ में प्राकृत व जैन शास्त्र में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले छात्र श्री रत्नाकर शुक्ल को प्रो. भागचन्द जैन स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। डॉ. श्रेयांस कुमार सिंघई, जयपुर ने “पवयणपाहुड में श्रमण' विषय पर व्याख्यान दिया। निदेशक प्राकृत जैन शास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान डॉ. ऋषभ जैन ने संचालन किया। पार्श्वनाथ विद्यापीठ के निदेशक प्रो. सुदर्शनलाल जैन अस्वस्थता के कारण वहाँ व्याख्यान देने नहीं पहुँच सके। ३. इन्दौर, २ दिसम्बर २०१० को प्रो. प्रेम सुमन जैन को जैन विद्या के क्षेत्र में उनके द्वारा दिये गये महत्त्वपूर्ण योगदान के लिये वर्ष २००९ का कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया तथा प्रशस्ति-पत्र के साथ २५ हजार रुपये की सम्मान राशि प्रदान की गयी। Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ | साभार प्राप्ति (क) श्री देवेन्द्रसरि विरचित तथा श्री सर्वोदय सागर जी द्वारा पद्यानुवादित तथा श्री चरित्ररत्न फा.चे. ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ१. कर्मविपाक (कर्मग्रन्थ) २. कर्मस्तव (कर्मग्रन्थ), ३. बन्यस्वामित्व (कर्मग्रन्थ), ४. षडशीति (कर्मग्रन्थ) ५. शतक (कर्म ग्रन्थ) ६. सप्ततिका (कर्मग्रन्थ), ७. चैत्य वंदन भाष्य, ८. गुरु वंदन भाष्य तथा ९. पच्चक्खाण भाष्य। (ख) श्री शांतिसूरि विरचित/श्री अचल गच्छेश, श्री गौतम सागर सूरीश्वर जी द्वारा गुजराती पद्यानुवादित तथा श्री चरित्ररत्न फा.चे. ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ१. जीव विचार प्रकरण, २. दण्डक प्रकरण, ३. नवतत्त्वप्रकरण तथा ४. लघु संग्रहणी। (ग) कुन्दकुन्द भारती, नई दिल्ली के प्रकाशन १. वन्दे-तद्गुणलब्धये, सतीश जैन, २. सूतक-पातक न मानने वाला मिथ्यादृष्टि, श्वेतपिच्छाचार्य, विद्यानन्द मुनि, ३. पिच्छि-कमण्डलु, विद्यानन्द मुनि, ४. जैन : शासन ध्वज, ५. वन का पति वनस्पति-मुनि विद्यानन्द तथा ६. पद्मावती, मुनि विद्यानन्द। अन्य स्थानों से प्राप्त ग्रन्थ१. दीपावली पूजनम, पं. हेमन्त जी काला एवं पं. भरत काला, २. जिनशासन का विभूतियाँ, श्री ज्ञानमुनि जी महाराज, श्री वर्द्धमान स्थानकवासी जैन संघ, मल्लिश्वरम्, बंगलोर, ३. योगदृष्टि सम्मुच्चय :सटीकः लेखक हरिभद्रसूरि, संपादक- विजयशील चन्द्रसूरि, प्रकाशकश्री जैन ग्रन्थ प्रकाशन समिति, ४. जैन पंचांग, संयोजक- प.पू. मनिराज, प्रकाशक मेवाड़ केशरी फाउण्डेशन, शाहीबाग अहमदाबाद, ५. जैन धर्म में आचारशास्त्रीय सिद्धान्त, खण्ड-१, लेखक-संपादकडॉ. कमलचन्द सोगानी, दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र, श्री महावीर जी, राजस्थान, ६. ज्ञानधारा, संपादक- नवनीत कुमार जैन, डॉ. सुधाकर नाथ मिश्रा, श्रुत संवर्द्धन संस्थान, ७. जैन धर्म का इतिहास, भाग१,२,३, कैलाश चन्द्र जैन, प्रकाशक- डी. के. प्रिंटवर्ल्ड (प्रा.) लि. Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साहित्य सत्कार : ८७ नई दिल्ली, २०१० मेरठ ८. Sumati-Jnana, Editor Dr. Shiv Kant Dwivedi, Dr. Navneet Kumar Jain, Publisher-Acharya Shanti Sagar Chhani Smriti Granthmala, Budhana, Muzaffar Nagar, 9. Surya Prabha (Studies in Jainology) Chief Editor-Prof. Hampa Nagarajaia, Editor Prof. Arvind Kumar Singh, Dr. Navneet Kumar Jain, Pub. Acharya Shanti Sagar Chhani Smriti Granthamala, Budhana (U.P.), 10. History of Jainism, K.C. Jain, Vol-1,2,3 Publisher-D.K. Printworld (P.) Ltd., New Delhi, 2010. (ङ) सुदर्शनलाल जैन, निदेशक पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा भेंट शोध-प्रबन्ध १. सुबन्यु की वासवदत्ता : एक समीक्षात्मक परिशीलन- विश्वरंजन सिंह, २. विज्ञानभिक्षु प्रणीत योगसार संग्रह का समीक्षात्मक अध्ययनअशोक कुमार, ३. संस्कृत साहित्य में काव्य-लक्षण और काव्य-प्रयोजनआशारानी वर्मा, ४. श्री नेहरू चरितम् का समीक्षात्मक अध्ययनउदयनारायण पाण्डेय, ५. भारतीय दर्शन में भक्ति की अवधारणा- राकेश दत्त मिश्र, ६. सुदर्शनोदय महाकाव्य का समीक्षात्मक अध्ययन- अर्चना सिंह, ७. मालविकाग्निमित्र और उसकी टीका का अध्ययन- लक्ष्मी देवी गुप्ता, ८. सर्वार्थसिद्धि एक अध्ययन- सविता अस्थाना, ९. प्रमुख पुराणों में श्री नारद- संतोष पाण्डेय, १०. वेदान्त केशरी : एक परिशीलनसुमन रटाटे, ११. महाकवि कालिदास कृत मेघदूत और मेरुतुंगकृत जैन मेघदूत- रविशंकर मिश्र. १२.श्रीलंका के सांस्कृतिक अनुष्ठानों पर वेदवेदांगों का प्रभाव- श्री विसुद्धि थेरो, १३. प्रमुख संस्कृत काव्यों में भक्तिरागिनी श्रीवास्तव, १४. वेदान्त में समाजवाद के स्रोत- ममता राय, १५. आचार्य विट्ठल नाथ विरचित गाररसमण्डलम्- शुचि अग्रवाल, १६. पञ्चाध्यायी : एक समीक्षात्मक अध्ययन- मनोरमा जैन, १७. जैन साहित्य में भक्ति की अवधारणा- धरमचन्द जैन, १८. वस्तुपाल की कृतियों का समीक्षात्मक अध्ययन- विवेक पाण्डेय, १९. नास्तिक दर्शन में कार्यकारण सिद्धान्त : एक मूल्यांकन- श्रीमती सुषमा सिंह, २०. ऋग्वेदीय और अथर्ववेदीय समाज का तुलनात्मक अध्ययन- नामवर सिंह, २१. तैत्तिरीयोपनिषद् का आलोचनात्मक अध्ययन-श्रीमती तारा देवी, २२. पण्डितराज जगन्नाथ के काव्य ग्रन्थों का समीक्षात्मक अध्ययन- मनुलता शर्मा, २३. संस्कृत साहित्य में यथार्थ- कमलेश कुमार, २४. विशेषावश्यक भाष्य के गणधरवाद एवं निह्नववाद की दार्शनिक समस्यायें एवं Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ८८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० समाधान - साध्वी विचक्षणश्री, २५. संबोधि का समीक्षात्मक अनुशीलनसमणी स्थित प्रज्ञा, २६. उदयनकथाश्रित संस्कृत रूपकों का समीक्षात्मक अध्ययन- उषा देवी, २७. उपरूपकों का उद्भव एवं विकास- इन्द्रा चक्रवाल, २८. भारतीय दर्शन में मृत्यु की अवधारणा - कल्पना पाण्डेय, २९. भारतीय दर्शन में गुण विचार- सुधांसु कुमार षडंगी, ३०. धनञ्जय की दृष्टि में रस : एक समीक्षात्मक अध्ययन- रेनू रानी, ३१. वेदान्त और जैन दर्शन में तत्त्वमीमांसा - पीयूषरानी अग्रवाल, ३२. आरण्यकों एवं उपनिषदों में वनस्पतियों एवं औषधियों का समीक्षात्मक अध्ययनकुमुद श्रीवास्तव, ३३. भारतीय दर्शनों में ईश्वर की अवधारणा - परमानन्द पाण्डेय, ३४. जैन चम्पू काव्यों का समीक्षात्मक अध्ययन- मणिनाथ मिश्र, ३५. शुक्ल यजुर्वेद में प्राप्त आयुर्वेदिक तत्त्वों का विवेचन - शशि श्रीवास्तव, ३६. जयदेव और उनका प्रसन्नराघव- परमेश्वर दत्त शुक्ल, ३७. भारतीय दर्शनों में कर्म सिद्धान्त - सुरेन्द्र कुमार पाण्डेय, ३८. विधिमार्गप्रपा के परिप्रेक्ष्य में जैन विधिविधान- साध्वी सौम्यगुणाश्रीजी, ३९. प्रमुख उपनिषदों की विवेचन पद्धतियाँ- राजीव अग्रवाल, ४०. जैन दर्शन में त्रिविध आत्मा की अवधारणा- साध्वी प्रियलता श्री, ४१. जयोदय महाकाव्य की समालोचनात्मक गवेषणा- श्रीमती रेणू जैन, ४२. भासकालीन सामाजिक अनुशीलन- श्यामसुन्दर दुबे, ४३. रूपगोस्वामी प्रणीत पद्यावली का समीक्षात्मक अध्ययन- श्रीमती आभा, ४४. श्रीमद्भागवत पुराण में योग तत्त्व - श्रीमती सविता, ४५. महामहोपाध्याय वासुदेव शास्त्री प्रणीत अद्वैतामोद का समीक्षात्मक अध्ययन- सीमा जैन, ४६. संक्षेप शारीरक सारसंग्रह - सीमा जैन, ४७. नैषधीयचरित महाकाव्य की श्लेष विच्छित्तियों का सांगोपांग अध्ययन - कविता शर्मा, ४८. भारतीय दर्शन में सापेक्षवाद - ऋचा चतुर्वेदी, ४९. जानकीहरणमहाकाव्ये महर्षिवाल्मीकेः प्रभाव- राघवकुमार झा, ५०. वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड का समीक्षात्मक अध्ययन- अजय कुमार पाठक, ५१. पूर्व - मीमांसा एवं न्याय दर्शन में प्रमाण- प्रेमचन्द श्रीवास्तव, ५२. रूपगोस्वामी विरचित ललितमाधव - विदग्धमाधव का आलोचनात्मक अध्ययन- गीता श्रीवास्तव, ५३. नाट्यशास्त्र के आंगिक अभिनय का समीक्षात्मक अध्ययन - नीलम श्रीवास्तव, ५४. प्रस्थानत्रयी शांकर भाष्य में कर्म का स्वरूप - अंजुलता दुबे, ५५. वैशेषिक एवं जैन तत्त्वमीमांसा में द्रव्य का स्वरूप- पंकज मिश्र, ५६. जैन आगमों के आचार दर्शन एवं पर्यावरण संरक्षण का मूल्यांकन - मुनि भुवनेश विद्यार्थी, ५७. स्वामी सच्चिदानन्द Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साहित्य सत्कार : ८९ सरस्वती कृत सूत्रभाष्यार्थ तत्त्वविवेचनी- दुर्गेश, ५८. दशकुमारचरित का साहित्यिक अनुशीलन- सरोज गोस्वामी, ५९. देव कृत णेमिणाहचरिउ का सम्पादन एवं सांस्कृतिक अध्ययन-श्रीमती सरोज जैन, ६०. प्राणी संरक्षण एवं पर्यावरण- श्रीमती नीलम चपलोत, ६१. संस्कृत रूपकों में नायक विधान- शिव कुमार मिश्र, ६२. कवि कृष्णभट्ट कृत ईश्वरविलास महाकाव्य का समीक्षात्मक अध्ययन- निशा नागर, ६३. सांख्य दर्शन का ऐतिहासिक विकास और उसका नास्तिक दर्शनों पर प्रभाव- विमला कुमारी, ६४. वैदिक साहित्य में श्रमण परम्परा के तत्त्व- गीता देवी, ६५. Data base for students record, संजय कुमार जैन और अमित कुमार उपाध्याय ६६. प्रस्थानत्रयी शांकरभाष्य में मनस् का विवेचन- अर्चना कुमारी। Page #91 --------------------------------------------------------------------------  Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंक ई.सन् १-३ १९९८ पृष्ठ १-८ १-३ १९९८ ९-१३ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) (ई. सन् १९९८ से २०१० तक) संकलनकी : डॉ. शारदा सिंह, शोधाधिकारी, पार्श्वनाथ विद्यापीठ लेख लेखक विषय वर्ष अंगविज्जा और नमस्कार मन्त्र की विकास यात्रा डॉ. सागरमल जैन आगम और साहित्य ४९ जैन सन्दर्भ में अचेतन द्रव्य व्यवस्था डॉ. विनोद कुमार तिवारी दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा ४९ - जैन दर्शन का मानववादी दृष्टिकोण डॉ. विजय कुमार जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ४९ जैन दर्शन और कबीर : एक तुलनात्मक अध्ययन डॉ. साध्वी मंजुश्री तुलनात्मक ४९ जैन और बौद्ध ध्यान-पद्धति : एक अनुशीलन डॉ. सुधा जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ४९ स्वयं की अनेकान्तमयी दृष्टि से तनावमुक्ति डॉ. पारसमल अग्रवाल दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान-मीमांसा खरतरगच्छ-पिप्पलक शाखा का इतिहास डॉ. शिवप्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व एवं ४९ कीर्तिकौमुदी में प्रयुक्त छन्द डॉ. अशोक कुमार सिंह आगम और साहित्य ४९ मुनिराज वन्दना बत्तीसी डॉ.(श्रीमती) मुन्नी जैन आगम और साहित्य ४९ १-३ १-३ १९९८ १९९८ १४-२७ २८-४३ १-३ १९९८ ४४-५३ १-३ १९९८ ५४-६४ कला १-३ १-३ १-३ १९९८ १९९८ १९९८ ६७८१ ८३-९० ९१-१०० Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख बीसवीं सदी के जैन आन्दोलन जैन-विद्या के विकास हेतु रचनात्मक कार्यक्रम साहु सरणं पवज्जामि कांगड़ा के ऐतिहासिक किले लेखक डॉ. कमलेश कुमार जैन दुलीचन्द्र जैन पानमल सुराणा श्री महेन्द्र कुमार 'मस्त' ई.सन् १९९९ १९९९ १९९९ पृष्ठ ६०-७० ७१-७८ ७९-८२ १९९९ ८३-८४ एलोरा की जैन सम्पदा आनन्द प्रकाश श्रीवास्तव विषय वर्ष अंक इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला५० १-३ विविध ५०. १-३ आगम और साहित्य ५० १-३ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५० १-३ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५०. १-३ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५० १-३ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५० १-३ आगम एवं साहित्य ५० १-३ आगम एवं साहित्य ५० ४-६ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५० ४-६ ९२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० १९९९ ८५-८७ तपागच्छ-विजयसंविग्न शाखा का इतिहास शिवप्रसाद १९९९ ८८-१०६ नागपुरीयतपागच्छ का इतिहास । शिवप्रसाद The Image of Indian Ethology Rajmal Jain आचारांग के कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्र : एक विश्लेषण डॉ. सुरेन्द्र वर्मा प्रेक्षाध्यान एवं भावातीत ध्यान : एक चिन्तन डॉ. सुधा जैन १९९९ १०७-१२१ १९९९ १२२-१३६ १९९९ १-१० १९९९ ११-१६ आचार्य राजकुमार जैन आगम एवं साहित्य ५० ४-६ १९९९ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त सम्बन्धी विषय प्राकृत वैद्यक (प्राकृत भाषा की आयुर्वेदीय अज्ञात जैन रचना) १७-२६ कुन्दन लाल जैन आगम एवं साहित्य ५० ४-६ १९९९ २७-५१ Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक आचार्य हरिभद्रसूरि प्रणीत 'उपदेशपद एक अध्ययन' डॉ. फूलचन्द जैन 'प्रेमी' श्री जिनेन्द्र वर्णीजी द्वारा प्रणीत 'पदार्थ विज्ञान' और डॉ. कमलेश कुमार जैन उसकी विवेचन शैली डॉ. विजय कुमार जैन डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव शर्की - कालीन हिन्दी साहित्य के विकास में बनारसी डॉ. राजदेव दुबे दास का अवदान प्राचीन भारत के प्रमुख तीर्थस्थल : बौद्ध और राजेश कुमार इतिहास, पुरातत्त्व एवं साहित्य जैन धर्म के विशेष सन्दर्भ में ( शोधप्रबन्ध-सार) जैन दर्शन में सृष्टि की अवधारणा अतुल कुमार प्रसाद सिंह दर्शन तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा डॉ. शिवप्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला समाज एवं संस्कृति गुरु का स्वरूप : गुरुतत्त्वविनिश्चिय के विशेष सन्दर्भ महावीर के सिद्धान्त : वर्तमान परिप्रेक्ष्य विधिपक्ष अपरनाम अंचलगच्छ (अचलगच्छ) का संक्षिप्त इतिहास आधुनिक सन्दर्भों में तीर्थंकर - उपदेशों की 'प्रासंगिकता Vasanta in Prakrit Literature विषय आगम एवं साहित्य दर्शन - तत्त्व मीमांसा व अनिल कुमार ज्ञान-मीमांसा दर्शन - तत्त्व मीमांसा व ज्ञान मीमांसा धर्म, साधना, नीति एवं आचार आगम एवं साहित्य Dr. Veneemadhavashastri आगम एवं साहित्य Joshi वर्ष ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ई.सन् पृष्ठ ४-६ १९९९ ५२-६६ अंक अँ ४-६ १९९९ ६७-७२ ४-६ १९९९ ४-६ ४-६ ४-६ ४-६ ४-६ ४-६ ४-६ १९९९ १९९९ १९९९ ७३-८५ १९९९ १९९९ ८६-९० ९१-९५ ९६-१०१ १९९९ १०२ - १११ ११२ - १५३ १५४ - १५८ १९९९ १५९ - १७७ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ९३ Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख पर्युषण : सही दृष्टि देने वाला महापर्व वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ तीर्थंकर ऋषभदेव व उनकी सांस्कृतिक परम्परा महावीर और उनकी परम्परा क्रोध का अभाव ही क्षमा है ५० ५० ५० ७-९ ७-९ ७-९ १९९९ १९९९ १९९९ १-९ १०-२६ २७-६३ ५० ७-९ १९९९ ६४-७० ९४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० जीवन की सरलता ही मृदुता है ५० ७-९ १९९९ ७१-७६ लेखक विषय प्रो. भागचन्द्र जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' समाज एवं संस्कृति प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' समाज एवं संस्कृति प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार - जीवन की निष्कपटता ही ऋजुता है ५० ७-९ १९९९ ७७-८१ जीवन की निर्मलता ही शुचिता है ५० ७-९ १९९९ ८२-८७ सत्य : साधना की ओर बढ़ता पदचाप ५० ७-९ १९९९ ८८-९३ मन पर नकेल लगाना ही संयम है ५० ७-९ १९९९ ९४-९९ स्वस्थ होना ही उत्तम तप है ५० ७-९ १९९९ १००-१११ Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ लेख राग-द्वेष भाव का विसर्जन ही त्याग है ५० ७-९ १९९९ ११२-११७ निर्ममत्व की ओर बढ़ना ही आकिंचन्य है ५० ७-९ १९९९ ११८-१२२ आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है भाषाना विकासमा प्राकृत-पालिभाषानो फालो जैन परंपरानुं अपभ्रंश साहित्यमा प्रदान Jaina Festivals Fear of Food? Jaina attitudes on Eating जैन अलङ्कार साहित्य वाग्भट्टालङ्कार भट्टाकलङ्कदेव रचित 'तत्त्वार्थवार्तिक आचार्य अजितसेन और उनकी अमरकृति 'अलङ्कारचिन्तामणिः' चन्द्रप्रभचरित एवं महाकवि वीरनन्दी महाकवि अर्हद्दास और उनकी रचनाएँ काव्य-कल्पलता और कवि-कल्पलता लेखक विषय प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' धर्म, साधना, नीति एवं आचार पं. बेचरदास दोशी आगम और साहित्य प्रो. हरिवल्लभ चु. भायाणी आगम और साहित्य Padmanabh S. Jaini समाज एवं संस्कृति Padmanabh S. Jaini पं. अमृतलाल शास्त्री आगम एवं साहित्य पं. अमृतचन्द्र शास्त्री आगम एवं साहित्य पं. अमृतचन्द्र शास्त्री आगम एवं साहित्य पं. अमृत शास्त्री आगम एवं साहित्य ५० ५० ५० _ ५० ५० ५० ५० ५० ५० ७-९ १९९९ १२३-१२९ ७-९ १९९९ १३०-१४० ७-९ १९९९ १४१-१५० ७-९ १९९९ १५१-१५९ ७-९ १९९९ १६०-१७४ १०-१२ १९९९ १-११ १०-१२ १९९९ १२-१७ १०-१२ १९९९ १८-२४ १०-१२ १९९९ २५-३१ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ९५ पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. श्री अमृतलाल शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य ५० ५० ५० १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ ३२-७१ ७२-७५ ७६-७७ Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक भक्तामर स्तोत्र: एक विवेचन पं. अमृतचन्द्र शास्त्री तत्त्वसंसिद्धि और उसकी वचनिकाः एक विवेचन पं. अमृतचन्द्र शास्त्री नेमिनिर्वाण: एक अध्ययन पं. अमृतचन्द्र शास्त्री अप्रतिहत शक्ति भगवान् महावीर भगवान् महावीर की देन काशी के कतिपय ऐतिहासिक तथ्य अतिशय क्षेत्र पपौरा भोजन और उसका समय उपकारी पशुओं की यह दुर्दशा महान् पूज्य श्री तुलसी गणी श्री मुदितमुनि : अभिनन्दनपत्रम् अभिनन्दन पत्रम् : साध्वीप्रमुखा श्रीकनकप्रभा पं. अमृतचन्द्र शास्त्री जी विद्वानों की दृष्टि में श्री पंचासरा पार्श्वनाथ मंदिर विषेना केटलाक ऐतिहासिक उल्लेखो पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृचतन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री पं. अमृतचन्द्र शास्त्री प्रो. भोगीलाल ज. सांडेसरा विषय आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला विविध समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति विविध इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला वर्ष ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० ५० अंक ई.सन् १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ पृष्ठ ७८-८७ ८८-९७ ९८- १०५ १०६ - ११२ ११३ - ११५ १०-१२ १९९९ ११६-११८ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १०-१२ १९९९ १२९-१३० १०-१२ १९९९ १३०-१३१ १०-१२ १९९९ १३१-१३२ १०-१२ १९९९ १३३ -१४० ११९ - १२१ १२२-१२४ १२५-१२८ १२९-१३० १०-१२ १९९९ १४१ - १४८ ९६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ लेख गुजरातनुं प्रथम इतिहासकाव्य लेखक प्रो. जयन्त ठाकर विषय इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५० १०-१२ १९९९ १४९-५७ Dr. Mukul Raj Mehta Bandha-Karma-Moksa and Divinity in Jainism जैन दर्शन में निक्षेप : एक विवेचन ५० १०-१२ १९९९ १५८-१६९ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय ५१ १-६ २००० १-७ ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्वमीमांसा और ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्वमीमांसा और ज्ञानमीमांसा आगम और साहित्य जैन ज्ञान-मीमांसा-एक अवलोकन डॉ. विजय कुमार ५१ ५१ १-६ १-६ २००० २००० ८-२९ ३०-३२ डॉ. के आर. चन्द्र शूबिंग महोदय द्वारा संपादित आचारांग और इसिभासियाइं की भाषा की तुलना सम्यक्त्वपच्चीसी महाभारत और आदि-पुराण में शिवतत्त्व खरतरगच्छ-लघुशाखा का इतिहास ५१ ५१ १-६ १-६ २००० २००० ३४-४५ ४६-५० श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ९७ ५१ १-६ २००० ५१-६२ डॉ. मुन्नी जैन आगम और साहित्य डॉ. पुष्पलता जैन आगम और साहित्य डॉ. शिवप्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व और कला डॉ. ओम प्रकाश श्रीवास्तव इतिहास, पुरातत्त्व और कला डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव आगम और साहित्य डॉ. मधु अग्रवाल धर्म, साधना, नीति एवं आचार महावीर निर्वाण भूमि पावा ५१ ५१ १-६ १-६ २००० २००० ६३-६५ ६६-७५ आदिपुराण में विश्व सौन्दर्य 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' में अहिंसा के तत्त्व ५१ १-६ २००० ७६-७९ Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख अंक ई.सन् पृष्ठ महावीर का साधना-मार्ग १-६ २००० ८०-८६ तंत्र-मंत्र एवं साधना विधि लेखक विषय वर्ष श्री दुलीचन्द जैन धर्म, साधना, नीति और आचार ५१ श्री महेन्द्र कुमार जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५१ श्री भंवरलाल नाहटा ५१ धर्म, साधना, नीति, एवं आचार श्री ओम प्रकाश सिंह आगम और साहित्य ५१ विविध ५१ प्रो. भागचन्द्र जैन 'भास्कर' समाज एवं संस्कृति ५१ १-६ १-६ २००० २००० ८७-९३ ९४-९८ भारंड पक्षी अहिंसा की परिधि में पर्यावरण सन्तुलन ९८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० अमरकोश में शिवतत्त्व स्व. श्री शान्तिभाई बनमाली सेठ : एक परिचय आदर्श परिवार की संकल्पना : जैन धर्मशास्त्रों के परिप्रेक्ष्य में हरिभद्रसूरिनूं ज्ञानतत्त्वचिन्तन १-६ १-६ १-६ २००० ९९-१०५ २००० १०६-१०८ २००० १०९-११० २००० १११-११३ आगम एवं साहित्य ५१ १-६ २००० ११४-१२३ Technical Science in Jaina Canons Divine Essence of Arhat and Tirthankara Anekasandhānakāvya Jaina Version of Mahābhārat Presidential Address of Professor Y.C. Simhadri प्रो. रसिकलाल छोटालाल पारिख Dr. N.L. Jain Dr. M.R. Mehta Dr. Ashok K. Singh Prof. B.C. Jain समाज एवं संस्कृति आगम और साहित्य आगम और साहित्य समाज एवं संस्कृति ५१ ५१ ५१ ५१ १-६ १-६ १-६ १-६ २००० १२४-१२९ २००० १३०-१३६ २००० १३७-१५० २००० १५१-१६५ ५१ १-६ २००० १६६-१७० Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंक ७-९ ७-९ ई.सन् २००० २००० पृष्ठ १-२० २१-२३ ७-९ ७-९ ७-९ २००० २००० २००० २४-३२ ३३-४० ४१-४२ | श्री राजयश ७-९ : २००० ४३-४७ लेख लेखक विषय वर्ष यशोगाथा आचार्य राजयश विजय जी समाज एवं संस्कृति ५१ श्रमण संस्कृति के गायक लब्धिसूरि श्री रावलमल जैन 'मणि' समाज एवं संस्कृति ५१ साधना, ज्ञानार्जन एवं लौकिक सेवा से पूर्ण जीवन डॉ. के. सी. जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५१ लब्धिसूरि की रचना में भक्तिसौरभ श्री रावलमल जैन 'मणि' आगम एवं साहित्य ___५१ समाज को साम्प्रदायिकता से बचाना होगा आचार समाज एवं संस्कृति ५१ विजय जी आचार्यश्री विजयलब्धिसूरिजी महाराज : डॉ. गंगाचरण त्रिपाठी समाज एवं संस्कृति ५१ एक अविस्मरणीय व्यक्तित्त्व लब्धिभक्तामरस्तोत्रम् साध्वी हंसश्री आगम एवं साहित्य ५१ पंचमकालामृतम् पंन्यास प्रवर श्रीमुक्ति आगम एवं साहित्य ५१ विजय गणि गुरुदेव महान् आचार्यश्री जयंतसूरि जी समाज एवं संस्कृति म.सा. ___५१ प्रभुता से प्रभुता दूरः लघुता से प्रभुता हजूर मुनिश्री कलहंस विजय जी समाज एवं संस्कृति ५१ महान् विभूति के साथ बीते क्षण (संस्मरण) इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५१ सम्यक् प्रमाण (कविता) पंन्यास वारिसेण विजय आगम और साहित्य ५१ महात्मा लब्धिसूरि देव (कविता) श्री सुरेश 'सरल' आगम एवं साहित्य ५१ पूज्यश्री के प्रवचन . श्री मूलचन्द बोथरा 'कोविद' समाज एवं संस्कृति ५१ ७-९ ७-९ २००० २००० ४८-५४ ५५-५६ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ९९ ७-९ ७-९ ७-९ ७-९ ७-९ ७-९ २००० २००० २००० २००० २००० २००० ५७ ५८-५९ ६०-६८ ६९ ७०। ७१-७३ Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पृष्ठ लेख लेखक लब्धिवाणी श्री चेनराज लूणिया चौबीस तीर्थंकर भगवान् के चौबीस स्तवन श्री लब्धिसूरि आचार्य लब्धिसूरिकृत कतिपय ग्रन्थों की नामावली भद्रबाहु सम्बन्धी कथानकों का समीक्षात्मक डॉ. सागरमल जैन अध्ययन 'कौमुदीमित्रानन्द' में प्रतिपादित आचार्य रामचन्द्रसूरि डॉ. सागरमल जैन की जैन जीवन-दृष्टि अंगविज्जा और नमस्कार महामन्त्र की विकास-यात्रा डॉ. सागरमल जैन जीवसमास : एक परिचय डॉ. सागरमल जैन विषय समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति आगम एवं साहित्य आगम और साहित्य वर्ष ५१ ५१ ५१ ५१ अंक ई.सन् ७-९ २००० ७-९ २००० ७-९ २००० १०-१२ २००० १२० १-२३ समाज एवं संस्कृति ११ १०-१२ २००० २४-२९ १०० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० १०-१२ २००० ३०-३६ जैन विद्या के अध्ययन की तकनीक कषायमुक्ति : किलमुक्तिरेव १०-१२ २००० १०-१२ २००० ३७-६६ ६७-७५ डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन इतिहास एवं पुरातत्व कला ५१ दर्शन-तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा ५१ आगम एवं साहित्य ५१ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५१ आगम और साहित्य ५१ आगम एवं साहित्य ५१ डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन १०-१२ २००० ७६-९३ १०-१२ २००० ९४-१०१ १०-१२ २००० १०२-१०७ स्वाध्याय की मणियाँ आचार्य हरिभद्रकृत श्रावकधर्मविधिप्रकरण : एक परिचय अप्रभंश के महाकवि स्वयम्भू : व्यक्तित्त्व एवं कृतित्त्व जैन परम्परा में काशी डॉ. सागरमल जैन समाज एवं संस्कृति ५१ १०-१२ २००० १०८-११६ डॉ. सागरमल जैन इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५१ १०-१२ २००० ११७-१२६ Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक डॉ. सागरमल जैन Dr. Sagarmal Jain विषय समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति वर्ष ५१ ५१ अंक ई.सन् पृष्ठ १०-१२ २००० १२७-१४५ १०-१२ २००० १४६-१५८ लेख पुण्य की उपादेयता का प्रश्न Introduction to Dr. Charlotte Krause : Her life and literature Foreword : Aparigraha : The Humane Solution Spiritual Foundation of Jainism Dr. Sagarmal Jain ५१ १०-१२ २००० १५९-१६२ Dr. Sagarmal Jain ५१ १०-१२ २००० १६३-१७५ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय अनेकान्तवाद : मूल्यपरक शिक्षा के यन्त्र के रूप में जैन तत्त्व चिन्तन की वैज्ञानिकता ५२ १-३ २००१ १-१० । डॉ. कमलेश कुमार जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार दर्शन-तत्त्व-मीमांसा एवं मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा आगम और साहित्य आगम एवं साहित्य समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला विविध ५२ ५२ ५२ ५२ १-३ १-३ १-३ १-३ २००१ २००१ २००१ २००१ ११-१६ १७-२० २१-२९ ३०-३८ वराङ्गचरित : एक महाकाव्य श्री जितेन्द्र कुमार सिंह अपभ्रंश साहित्य में पर्यावरण चेतना डॉ. प्रेमचन्द्र जैन पर्यावरण चिन्तन : जैन वाङ्मय के सन्दर्भ में डॉ. संगीता मेहता जालोर मण्डल में जैन धर्म और अध्ययन सम्बन्धी डॉ. सोहनकृष्ण पुरोहित स्त्रोत सादड़ी के प्रतिमालेख में उल्लिखित हेमतिलक डॉ. शिवप्रसाद सूरि कौन? श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १०१ ५२ ५२ १-३ १-३ २००१ २००१ ३९-५६ ५७-६० Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक. डॉ. पुष्पलता जैन विषय समाज एवं संस्कृति वर्ष ५२ अंक १-३ ई.सन् २००१ पृष्ठ ६१-६७ लेख राष्ट्रोत्थान में प्रागैतिहासिककालीन जैन महिलाओं का योगदान रसशास्त्र के विकास में जैनाचार्यों का योगदान धम्मिलकुमारचरित्र दीघनिकाय में व्यक्त सामाजिक परिवेश । गुजरातनी केटलीक प्राचीन जिनमूर्तियो सिद्धशारस्वताचार्य अमरचन्द्र सूरि The influence of Svayambhūdeva's Paūmacariu on Puspadanta's Rāma-story in the Mahāpurāņa The Jaina way of life The Veda and Indian Philosophy कु. अंजू श्रीवास्तव समाज एवं संस्कृति ५२ श्री भंवरलाल नाहटा आगम और साहित्य ५२ डॉ. दीनानाथ शर्मा समाज और संस्कृति ५२ श्री साराभाई मणिलाल नवाब इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५२ कनैयालाल भाईशंकर दवे समाज एवं संस्कृति ५२ १-३ १-३ १-३ १-३ १-३ २००१ ६८-७४ २००१ ७५-९० २००१ ९१-९४ २००१ ९५-९६ २००१ ९७-१०२ १०२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० Miss. Eva De Clereq Duli chand Jain Dr. Kireet Joshi १-३ १-३ १-३ २००१ १०३-१२१ २००१ १२२-१२९ २००१ १३०-१४० आगम एवं साहित्य ५२ समाज और संस्कृति ५२ दर्शन-तत्त्व मीमांसा ५२ एवं ज्ञान मीमांसा . आगम एवं साहित्य ५२ दर्शन-तत्त्व मीमांसा ५२ एवं ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ५२ ज्ञान मीमांसा Jaina Dūtakāvya Dr. Ashok Kumar Singh द्रव्य, गुण और पर्याय का पारस्परिक सम्बन्ध : डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय (सिद्धसेन दिवाकरकृत 'सन्मतिप्रकरण' के विशेष सन्दर्भ में) अनेकान्तवाद और उसकी समसामयिकता डॉ. अजय कुमार १-३ ४-९ २००१ १४१-१५३ २००१ १-१५ ४-९ २००१ १६-१९ Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख वैशाली महावीर के जन्म स्थान पर नया प्रकाश देवलोक व तिर्यञ्च में नाग जैन धर्म, संस्कृति व कला के विकास में गंग, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजवंशों का योगदान भारतीय भाषाओं का प्रथम व्यंग्य उपन्यासधूर्त्ताख्यान आधुनिक युग में अहिंसा की प्रासंगिकता लेखक आचार्य. विजयेन्द्र सूरि सरस्वती जैन धर्म के चतुर्विध संघों का पारस्परिक सहदायत्त्व खरतरगच्छ - कीर्तिरत्नसूरिशाखा का संक्षिप्त इतिहास डॉ. शिवप्रसाद शोध-प्रबन्धसार अजय कुमार सिन्हा डॉ. अशोक कुमार सिंह डॉ. अरुण प्रताप सिंह श्री भँवरलाल नाहटा प्रो. भागचन्द्र जैन प्रो. श्याम सुन्दर घोष दुलीचंद जैन श्रीमती शारदा सिंह विषय इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला विविध समाज और संस्कृति इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम और साहित्य धर्म, साधना, नीति एवं आचार दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा वर्ष ५२ ५२ ५२ ५२ g g ५२ ५२ ५२ ५२ अंक ई.सन् ४-९ २००१ २०-४९ ४-९ २००१ ५०-५४ ४-९ २००१ ५५-६२ ४-९ २००१ ६३-७३ ४-९ ४-९ पृष्ठ ४-९ २००१ ४-९ २००१ ४-९ ४-९ २००१ ७४-८८ २००१ ८१-११२ ११३ - १२८ १२९ - १३३ २००१ १३४ - १४३ २००१ १४४ - १४७ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १०३ Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख शोध-प्रबन्धसार गुजराती साहित्यमां जैन भक्तिकाव्यो लेखक श्रीमती किरण श्रीवास्तव पन्नालाल रसिकलाल शाह दर्शन, तत्त्व मीमांसा विषय आगम और साहित्य आगम एवं साहित्य ५२ एवं ज्ञान मीमांसा वर्ष ५२ ५२ ४-९ अंक ई.सन् पृष्ठ ४-९ २००१ १४८-१५१ ४-९ २००१ १५२-१६३ २००१ १६४-१६९ School of Jaina Philosophy Rightful exposition of Jainism in the west Samyakdarśana Dr. N.L. Jain J.P. Jain 'Sadhak' ५२ ५२ ४-९ ४-९ २००१ १७०-१७९ २००१ १८०-१८४ दर्शन, तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा आगम एवं साहित्य आगम और साहित्य १०४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० ५२ १०-१२ २००१ ५२ १०-१२ २००१ १-९ १०-३६ विविध ५२ १०-१२ २००१ ३७-४७ आगम एवं साहित्य ५२ १०-१२ २००१ अर्धमागधी आगम साहित्य : कुछ सत्य कुछ तथ्य डॉ. सागरमल जैन जैन आगमों की मूल-भाषा : अर्धमागधी या डॉ. सागरमल जैन शौरसेनी प्राकृत विद्या में प्रो. टाँटिया जी के नाम से डॉ. सागरमल जैन प्रकाशित उनके व्याख्यान के विचार-बिन्दुओं की समीक्षा शौरसेनी प्राकृत के सम्बन्ध में प्रो. भोलाशंकर डॉ. सागरमल जैन व्यास की स्थापनाओं की समीक्षा अशोक के अभिलेखों की भाषा : मागधी या डॉ. सागरमल जैन शौरसेनी क्या ब्राह्मी लिपि में 'न' और 'ण' के लिये एक डॉ. सागरमल जैन ही आकृति थी? ओङ्मागधी प्राकृत : एक नया शगूफा डॉ. सागरमल जैन ४८-५६ आगम और साहित्य ५२ १०-१२ २००१ ५७-६५ आगम एवं साहित्य ५२ १०-१२ २००१ ६६-७४ Pin या आगम और साहित्य ५२ १०-१२ २००१ ७५-८३ Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गवेषणा लेख लेखक विषय वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ भारतीय दार्शनिक चिन्तन में निहित अनेकान्त डॉ. सागरमल जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५२ १०-१२ २००१ ८४-१०२ जैन दर्शन की पर्याय की अवधारणा का डॉ. सांगरमल जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं समीक्षात्मक विवेचन ज्ञान मीमांसा ५२ १०-१२ २००१ १०३-११९ प्रवचनसारोद्धार : एक अध्ययन डॉ. सागरमल जैन आगम एवं साहित्य ५२ १०-१२ २००१ १२०-१९० स्व. भंवरलालजी नाहटा : एक युगपुरुष एवं समाज एवं संस्कृति ५३ १-६ २००२ १-१२ अनुपम प्रेरणा स्रोत (संक्षिप्त परिचय) डॉ. सागरमल जैन द्वारा गुणस्थान-सिद्धान्त की डॉ. धर्मचन्द जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ५३ १-६ २००२ १३-२४ ज्ञान मीमांसा पार्श्वनाथ के सिद्धान्त : दिगम्बर-श्वेताम्बर दृष्टि प्रो. सुदर्शनलाल जैन समाज एवं संस्कृति ५३ १-६ २००२ २५-३२ हिन्दी काव्य परम्परा में अपभ्रंश महाकाव्यों का महत्त्व साध्वी डॉ. मधुबाला आगम एवं साहित्य ५३ १-६ २००२ ३३-३८ भारतीय आर्य भाषाओं की विकास-यात्रा में साध्वी डॉ. मधुबाला आगम एवं साहित्य ५३ १-६ २००२ ३९-४३ अपभ्रंश का स्थान प्रकीर्णक साहित्य : एक अवलोकन डॉ. अतुल कुमार प्रसाद सिंह आगम एवं साहित्य ५३ १-६ २००२ ४४-६२ जैन संस्कृति में पर्यावरण चेतना डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव ५३ १-६ २००२ ६३-६७ पादलिप्त सूरिकृत 'तरंगवईकहा' (तरंगवती कथा) श्री वेदप्रकाश गर्ग आगम एवं साहित्य ५३ १-६ २००२ ६८-७० नाट्यशास्त्र और अभिनवभारती में शान्तरस की डॉ. मधु अग्रवाल आगम एवं साहित्य ५३ १-६ २००२ ७१-७९ अभिनेयता प्रतिपादन और विश्वशान्ति में इसकी उपादेयता श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १०५ Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष लेख मोक्ष मार्ग में सम्यग्दर्शन की भूमिका अंक लेखक डॉ. कमलेश कुमार जैन ई.सन् पृष्ठ ५३ ५३ १-६ १-६ २००२ २००२ ८०-८६ ८७-९५ 'समराइच्चकहा' में व्यवसायों का सामाजिक आधार राघवेन्द्र प्रताप सिंह जैन दर्शन में परमात्मा का स्वरूप एवं स्थान श्रीमती कल्पना (शोध प्रबन्ध सार) जैनागमों में भारतीय शिक्षा के मूल्य दुलीचन्द जैन ५३ १-६ २००२ ९६-९९ १०६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० ५३ १-६ २००२ १००-१०६ राजेन्द्र सिंह गुर्जर' विषय दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा समाज एवं संस्कृति दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम एवं साहित्य । दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा समाज एवं संस्कृति धर्म, साधना, नीति एवं आचार आगम एवं साहित्य गाँधी चिन्तन में अहिंसा एवं उसकी प्रासंगिकता (जेहादी हिंसा के सन्दर्भ में) खरतरगच्छ-आद्यपक्षीयशाखा का इतिहास ५३ १-६ २००२ १०७-११२ डॉ. शिवप्रसाद Dr. Ashok Kumar Singh Dr. Rajjan Kumar ५३ ५३ ५३ १-६ १-६ १-६ २००२ ११३-१२१ २००२ १२२-१३१ २००२ १३२-१४५ Jain Campū Literature Misunderstanding vis-a vis understanding with reference to Jainism तीर्थकर अरिष्टनेमि आचार्य हरिभद्र की योगदृष्टियाँ : एक विवेचन ५३ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय डॉ. सुधा जैन ७-१२ २००२ १-११ आचार्य हरिभद्रसूरि प्रणीत उपदेशपद : एक अध्ययन डॉ. फूलचन्द जैन 'प्रेमी' ५३ ५३ ७-१२ ७-१२ २००२ २००२ १२-२१ २२-३६ Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक जैनाचार्यों का छन्द-शास्त्र को योगदान कु. मधुलिका 'अग्रवाल' शब्द की प्राचीनता विषयक एक और प्रमाण श्री वेद प्रकाश गर्ग अर्बुदमण्डल में जैन धर्म डॉ. सोहनलाल पाटनी विषय आगम एवं साहित्य विविध धर्म, साधना, नीति एवं आचार इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम एवं साहित्य वर्ष ५३ ५३ ५३ अंक ७-१२ ७-१२ ७-१२ ई.सन् २००२ २००२ २००२ पृष्ठ ३७-५१ ५२-५४ ५५-६० इतिहास की गौरवपूर्ण विरासत : काँगड़ा के जैन मन्दिर श्री महेन्द्र कुमार 'मस्त' ५३ ५३ ७-१२ २००२ ७-१२ २००२ ६३-६४ ७-१२ ७-१२ ७-१२ २००२ ६५-९३ २००२ ९४-१०५ २००२ १०६-११० अयोध्या से प्राप्त अभिलेख में उल्लिखित नयचन्द्र डॉ. शिवप्रसाद रम्भामंजरी के कर्ता नहीं खरतरगच्छ-रुद्रपल्लीय शाखा का इतिहास डॉ. शिवप्रसाद । जैनागमों में शिक्षा का स्वरूप श्री दुलीचन्द जैन जैन आगम साहित्य में नरक की मान्यता डॉ. मनीषा सिन्हा सामाजिक-राजनैतिक समस्याओं का समाधान : डॉ. हेमलता बोलिया अनेकान्त जैन संस्थाएँ एवं समाज में उनका योगदान डॉ. शैलबाला शर्मा Jaina Kośa Literature Dr. Ashok Kumar Singh जैन साहित्य और संस्कृति में वाराणसी मंडल डॉ. कमलेश कुमार जैन जैन पुराणों में वर्णित जैन संस्कारों का जैनेतर संस्कारों डॉ. विजय कुमार झा से तुलनात्मक अध्ययन इतिहास पुरातत्त्व एवं कला ५३ आगम एवं साहित्य ५३ आगम एवं साहित्य ५३ दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५३ समाज एवं संस्कृति ५३ आगम एवं साहित्य ५३ आगम एवं साहित्य ५४ समाज और संस्कृति ५४ ७-१२ २००२ १११-११५ ७-१२ २००२ ११६-१२४ ७-१२ २००२ १२५-१५९ १-३ २००३ १-१० १-३ २००३ ११-२९ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १०७ Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक डॉ. विजय कुमार झा अंक १-३ ई.सन् २००३ पृष्ठ ३०-४२ स्थानकवासी सम्प्रदाय के छोटे पृथ्वीचन्द्र जी महाराज की परम्परा का इतिहास धर्म और धर्मान्धता डॉ. वशिष्ठ नारायण सिन्हा १-३ २००३ ४३-५० धूलियाँ से प्राप्त शीतलनाथ की विशिष्ट प्रतिमा प्रो. सागरमल जैन खरतरगच्छ जिनभद्रसूरि शाखा का इतिहास डॉ. शिवप्रसाद Catalogues of Jaina Manuscripts Dr. Ashok Kumar Singh जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण (पार्श्वनाथ विद्यापीठ डॉ. अर्चना श्रीवास्तव द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता २००१ में पुरस्कृत आलेख) जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्री छैल सिंह राठौर विषय वर्ष इतिहास, पुरातत्त्व एवं ५४ कला धर्म, साधना नीति एवं ५४ आचार इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५४ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५४ आगम एवं साहित्य ५४ धर्म, साधना, नीति एवं ५४ आचार धर्म, साधना, नीति एवं ५४ १-३ १-३ १-३ ४-६ २००३ २००३ २००३ २००३ ५१-५४ ५५-७६ ७७-११२ १-१२ १०८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० ४-६ २००३ १३-२१ आचार श्री अमित बहल ५४ ४-६ जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण कु. रेनू गांधी ५४ ४-६ २००३ ३१-३५ धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्री रोहित गांधी ५४ ४-६ २००३ ३६-४१ जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण कु. निधि जैन ५४ ४-६ २००३ ४२-४६ Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण (पार्श्वनाथ विद्यापीठ दीपिका गांधी द्वारा आयोजित निबन्ध प्रतियोगिता २००१ हेतु प्राप्त अन्य विशिष्ट आलेख जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण डॉ. श्याम सुन्दर शर्मा वर्ष ५४ अंक ४-६ ई.सन् २००३ पृष्ठ ४७-५६ ५४ ४-६ २००३ ५७-६१ जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्री कमलिनी बोकारिया ५४ ४-६ २००३ ६२-७२ जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्री मनोरमा जैन ५४ ४-६ २००३ ७३-८१ विषय धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार धर्म, साधना, नीति एवं आचार इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला धर्म, साधना, नीति एवं जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्री देवेन्द्र कुमार हिरण ५४ ४-६ २००३ ८२-९० जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण कु. अल्का सुराणा ५४ ४-६ २००३ ९१-९३ जैनधर्म और पर्यावरण संरक्षण श्रीमती सुधा जैन ५४ ४-६ २००३ ९४-१०० श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १०९ जैन धर्म की ऐतिहासिक विकास यात्रा प्रो. सागरमल जैन ५४ ७-९ २००३ १-५३। जैनयोग : एक दार्शनिक अनुशीलन अनिल कुमार सोनकर आचार ५४ ७-९ २००३ ५४-६१ Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विषय वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ लेख जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में वस्तु-स्वातन्त्र्य एवं द्रव्य की अवधारणा भगवती आराधना में समाधिमरण के तत्त्व लेखक कु. अल्पना जैन ५४ ७-९ २००३ ६२-७१ डॉ. सुधीर कुमार राय दर्शन-तत्त्व-मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा धर्म, साधना, नीति एवं आचार आगम एवं साहित्य समाज एवं संस्कृति रजनीश शुक्ल डॉ. उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ५४ ५४ ५४ ७-९ ७-९ ७-९ २००३ २००३ २००३ ७२-८० ८१-९३ ९४-९७ वज्जालग्गं का काव्यात्मक मूल्य पूर्वमध्यकाल में स्त्रियों की दशा । (त्रिशुष्टिशलाकापुरुषचरित के सन्दर्भ में) भारतीय कला को बुद्ध का अवदान ११० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० प्रो. अंगने लाल इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ४ ७-९ २००३ ९८-१०४ एलोरा की महावीर मूर्तियाँ ६ डॉ. आनन्द प्रकाश श्रीवास्तव इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला डॉ. शिवप्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ७-९ २००३ १०५-११० खरतरगच्छ-बेगड़ शाखा का इतिहास ५४ ५४ ७-९ ७-९ २००३ १११-१२३ २००३ १२४-१३२ Mangilal Bhutodia Myth of Lord Mahāvīra's Embryo-Transfer in Jaina scriptures Religious Aspect on Non-violunce Dr. B.N. Sinha ५४ ७-९ २००३ १३३-१५६ धर्म, साधना, नीति एवं आचार दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा जैन दर्शन में द्रव्यदृष्टि एवं पर्यावरणीय नीतिशास्त्र का डॉ. रामकुमार गुप्त पारस्परिक सम्बन्ध ५४ १०-१२ २००३ १-५ Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ लेख जैन एवं बौद्ध भिक्षुणियों के आहार सम्बन्धी नियम लेखक अंशु श्रीवास्तव ५४ १०-१२ २००३ ६-९ दिगम्बर जैन जातियाँ : उद्भव एवं विकास कुसुम सोगानी विषय धर्म, साधना, नीति एवं आचार इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला समाज एवं संस्कृति धर्म, साधना, नीति एवं आचार समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति ५४ ५४ डॉ. किरण श्रीवास्तव डॉ. नन्दलाल जैन १०-१२ २००३ १०-१२ २००३ १०-२५ २६-३२ सिद्धसेन दिवाकर का जैन दर्शन को अवदान वनस्पति और जैन आहार शास्त्र अनामिका सिंह डॉ. श्याम किशोर सिंह ५४ १०-१२ २००३ ५४ १०-१२ २००३ ५४ १०-१२ २००३ ३३-५३ ५४-६० ६१-६६ आचार्य शंकर की बौद्ध दृष्टि वर्तमान सामाजिक सन्दर्भ में अध्यात्मवाद की चुनौतियाँ एवं जैन दृष्टि से उसका समाधान जाति व्यवस्था एवं उसका दायित्व गाँधी और शाकाहार ५४ १०-१२ २००३ ६७-७० डॉ. कमलेश कुमार जैन समाज एवं संस्कृति डॉ. शैलबाला शर्मा धर्म, साधना, नीति एवं आचार . डॉ. काकतकर वासुदेव राव समाज एवं संस्कृति डॉ. शिवप्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला श्री महेन्द्र कुमार मस्त इतिहास, पुरातत्त्व एवं ५४ १०-१२ २००३ ५४ १०-१२ २००३ ७१-७७ ७८-९२ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १११ जैनों की नास्तिकता-धर्मनिरपेक्ष समाज का आधार खरतरगच्छ-भावहर्षीयशाखा का इतिहास ५४ १०-१२ २००३ ९३-९९ जैनों एवं सिक्खों के ऐतिहासिक सम्बन्ध कला ५४ १०-१२ २००३ १००-१०२ Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक विषय वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ ... Landmark of Bāhubali Images in Karnataka Prof. M.N.P. Tiwari इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं ५४ १०-१२ २००३ १०३-११० ५४ १०-१२ २००३ १११-११८ Origin of Śramaņism causes and conflict Dr.Niharika कला ५४ १०-१२ २००३ ११९-१३८ Jaina Contribution to Indian Grammar लाढ़ प्रदेश में महावीर Dr. A. K. Singh डॉ. रमाकान्त जैन आगम एवं साहित्य इतिहास, पुरातत्त्व एवं ११२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० कला ५५ १-६ २००४ १-३ । त्रस एवं स्थावर का विभाग समणी मंगल प्रज्ञ १-६ २००४ ४-९ जैन दर्शन में रत्नत्रय प्रो. अमरनाथ पाण्डेय १-६ २००४ १०-१४ जैन दर्शन में निहित वैज्ञानिक तत्त्व डॉ. अनुपम जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा व ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा आगम एवं साहित्य समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति १-६ २००४ १५-३२ श्री अनिल कुमार सोनकर जैन धर्म में प्रतिपादित षडावश्यक की समीक्षा और इसकी प्रासंगिकता पार्वाभ्युदय काव्य में अभिव्यंजित मेघदूत काव्य सामान्य केवली और अर्हन्तपद : एक समीक्षा जीवन्धरचम्पू में पर्यावरण की अवधारणा डॉ. मधु अग्रवाल साध्वी विजयश्री डॉ. कमलेश कुमार जैन ५५ ५५ ५५ १-६ १-६ १-६ १-६ २००४ २००४ २००४ २००४ ३३-४५ ४६-५१ ५२-५६ ५७-६३ Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख जैन दर्शन में अकान्तवाद लेखक डॉ. शारदा सिंह वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ श्रमण आचार व्यवस्था-ऐतिहासिक पृष्ठभूमि कु. नीतू द्विवेदी ५५ ५५ १-६ १-६ २००४ ६४-६८ २००४ ६९-७६ श्री वेद प्रकाश गर्ग डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय ५५ १-६ २००४ साधारण सिद्धसेनसूरि रचित 'विलासवईकहा' जैन दर्शन का कर्म सिद्धान्त एवं उनके समान्तर भारतीय दर्शन में प्रचलित अन्य सिद्धान्त जैन गुफाएँ : ऐतिहासिक व धार्मिक महत्त्व ७७-७९ विषय दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा इतिहास, पुरातत्व एवं कला आगम एवं साहित्य दर्शन-तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला दर्शन-तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला विविध १-६ २००४ ८०-९० डॉ. एन. के. शर्मा ५५ १-६ जैन दर्शन एवं योगवाशिष्ठ में मृत्यु विचार श्री मनोज कुमार तिवारी ५५ ५५ १-६ १-६ २००४ ९९-११० २००४ १११-११५ महावीर एवं बुद्ध का वर्षावास डॉ. मनीषा सिन्हा तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमाएं (होशंगाबाद डॉ. गुलनाज तंवर संग्रहालय के सन्दर्भ में) महाराणा प्रताप का पत्र अकबर प्रतिबोधक जैनाचार्य डॉ. सोहनलाल पटनी हीरविजय सूरि के नाम खरतरगच्छ-क्षेमकीर्ति शाखा का इतिहास डॉ. शिवप्रसाद श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ११३ ५५ ५५ १-६ १-६ २००४ ११६-११७ २००४ ११८-११९ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५५ १-६ २००४ १२०-१२८ Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ । Concept of self Evolution in Jainism Dr.M.R.Mehta विषय धर्म, साधना, नीति एवं आचार समाज एवं संस्कृति ५५ ५५ १-६ १-६ २००४ १२९-१३४ २००४ १३५-१४७ D.S. Baya 'Sreyas' Jaina Śramaņa Tradition from Ādinātha to Pārswanātha Social Aspect of Non-Violence Dr. B.N. Sinha ५५ १-६ २००४ १४८-१७३ ११४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० प्रो. सागरमल जैन जैन और बौद्ध प्रमाण मीमांसा : एक तुलनात्मक अध्ययन कर्म साहित्य में तीर्थंकर ७-९ २००४ १-१६ डॉ. धर्मचन्द्र जैन आवश्यकसूत्र का स्रोत एवं वैशिष्ट्य प्राकृत साहित्य का कथात्मक महत्त्व संवेगरंगशाला में प्रतिपादित मरण के सत्रह प्रकार धर्म, साधना, नीति एवं आचार दर्शन-तत्त्व मीमांसा व ज्ञान मीमांसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य धर्म साधना नीति एवं आचार आगम और साहित्य धर्म, साधना, नीति एवं आचार आगम एवं साहित्य श्री अनिल कुमार सोनकर डॉ. हुकुमचन्द्र जैन साध्वी प्रियदिव्यांजनाश्री ५५ ५५ ५५ ७-९ ७-९ ७-९ ७-९ २००४ २००४ २००४ २००४ १७-२५ २६-३६ ३७-४२ ४३-४८ साध्वी डॉ. मंजुश्री श्री महेन्द्र कुमार 'मस्त ५५ ७-९ २००४ जैन आगमों में संगीत विज्ञान | भगवान् महावीर द्वारा प्रतिपादित गृहस्थों की आचार संहिता नेमिदूतम् का अलंकार लावण्य ४९-५६ ५५ ५५ ७-९ ७-९ डॉ. विनोद कुमार शर्मा एवं आशा शर्मा २००४ २००४ ५७ ५८-८१ Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ लेख खरतरगच्छ-सागरचन्द्रसूरिशाखा का इतिहास लेखक डॉ. शिवप्रसाद ५५ ७-९ २००४ ८२-९१ Jainism as Perceived by Huen-Tsang Dr. A.P. Singh ७-९ २००४ १०-१२ २००४ ५५ ५५ ९२-९८ १-४ निर्ग्रन्थ संघ और श्रमण परम्परा साध्वी विजयश्री 'आर्या' चंद्रवेध्यक प्रकीर्णक की विषय-वस्तु का मूल्यांकन डॉ. हुकुमचंद जैन अर्द्धमागधी जैन आगम साहित्य में माला निर्माण-कला डॉ. हरिशंकर पाण्डेय आगमिक मान्यताओं में युगानुकूलन डॉ. नन्दलाल जैन प्राचीनतम् एक दुर्लभ जैन पाण्डुलिपि प्राचार्य कुन्दन लाल जैन विषय इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास पुरातत्व एवं कला आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य आगम और साहित्य इतिहास, पुरातत्त्व एवं । कला आगम एवं साहित्य इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला समाज एवं संस्कृति ५५ १०-१२ २००४ ५५ १०-१२ २००४ ५५ १०-१२ २००४ ५-८ ९-१२ १३-२३ ५५ ५५ १०-१२ २००४ १०-१२ २००४ २४-२६ २७-२९ डॉ. वेद प्रकाश गर्ग डॉ. अशोक प्रियदर्शी जैन कथा साहित्य का गौरव-'वसुदेवहिण्डी' बिहार गाँव की मृण्मुहरें ५५ १०-१२ २००४ ३०-३४ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ११५ कल्पप्रदीप में उल्लिखित वाराणसी के जैन एवं डॉ. शिवप्रसाद कतिपय अन्य तीर्थस्थल जैन और बौद्ध श्रमण संघ में विधि शास्त्र का विकास : डॉ. चन्द्ररेखा सिंह एक परिचय फतेहपुर सीकरी से प्राप्त श्रुतदेवी (जैन सरस्वती) डॉ. अशोक प्रियदर्शी की प्रतिमा ५५ १०-१२ २००४ ५५ १०-१२ २००४ ३५-३९ ४०-४७ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५५ १०-१२ २००४ ४८-५१ ।। Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ ५५ १०-१२ २००४ ५२-५६ Status of woman in Jain Community Concept of Sūkşma Sarīra in Indian Philosophy Economic Aspect of Non-Violence ५५ १०-१२ २००४ ५७-५९ ५५ १०-१२ २००४ ६०-८८ जीवदया : धार्मिक और वैज्ञानिक आयाम लेखक विषय Dr. Reeta Agrawal समाज और संस्कृति Dr. Saroj Sharma दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा Dr. B.N. Sinha धर्म, साधना, नीति एवं आचार डॉ. काकतकर वासुदेव राव धर्म, साधन, नीति एवं आचार डॉ. हरिशंकर पाण्डेय धर्म, साधना, नीति एवं आचारडॉ. अल्पना जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा डॉ. विनोद कुमार तिवारी दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा डॉ. कमलेश कुमार जैन आगम और साहित्य ११६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० ५६ १-६ २००५ १-१७ रूपस्थ और रूपातीत ध्यान ५६ १-६ २००५ १८-२४ कर्म-सिद्धान्त एवं वस्तुस्वातन्त्र्य ५६ १-६ २००५ २५-३९ भारतीय दार्शनिक सन्दर्भ में जैन अचेतन द्रव्य ५६ ५६ १-६ १-६ २००५ २००५ ४०-४४ ४५-५६ प्राकृत भाषा और राजशेखर कृत 'कर्पूरमञ्जरी' में देशी शब्द आचार्य नेमिचन्द्रसूरि कृत 'रयणचूडरायचरिय' में वर्णित अवान्तर कथाएँ एवं उनका मूल्यांकन । मुहम्मद तुगलक और जैन धर्म डॉ. हुकुमचन्द जैन आगम और साहित्य ५६ १-६ २००५ ५७-७४ डॉ. निर्मला गुप्ता धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५६ १-६ २००५ ७५-८० Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक डॉ. महेश प्रताप सिंह अगरचंद नाहटा मुनि पीयूष सागर लेख राजपूत काल में जैन धर्म जौनपुर की बड़ी मस्जिद क्या जैन मंदिर है? आनन्दजी कल्याणजी पेढ़ी के संस्थापक युगपुरुष श्रीमद् देवचन्द्र जी महाराज The Jaina Manuscript and Miniature Tradition Mathematical Formulary of Jinistic Precepts N.L. Jain Scientific Thought Evident in the Labdhisāra L.C. Jain भारतीय संस्कृति के दो प्रमुख घटकों का सहसम्बन्ध डॉ. सागरमल जैन (वैदिक एवं श्रमण ) महावीर का श्रावक वर्ग तब और अब : डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन די Lalit Kumar एक आत्मविश्लेषण भगवान् महावीर का जन्म-स्थल : एक पुनर्विचार भगवान् महावीर का केवल ज्ञान स्थलः एक पुनर्विचार भगवान् महावीर की निर्वाणभूमि पावा : एक पुनर्विचार डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन जैन तत्त्वमीमांसा की विकासयात्रा : ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जैन दर्शन में मोक्ष की अवधारणा डॉ. सागरमल जैन विषय इतिहास पुरातत्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्त्व और कला आगम और साहित्य समाज एवं संस्कृति इतिहास पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला दर्शन - तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा वर्ष ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ अंक ई.सन् १-६ २००५ १-६ २००५ १-६ २००५ १-६ १-६ १-६ ३-४ ३-४ २००५ ५६ ३-४ ५६ ३-४ ५६ ३-४ २००५ २००५ २००५ २००५ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५६ ३-४ २००५ २००५ २००५ ५६ ३-४ २००५ २००५ पृष्ठ ८१-८५ ८६-८८ ८९-९३ ९५-१२५ १२६ - १३३ १३४ - १५० १-१७ १८- २४ २५-३६ ३७-४० ४१-४७ ४८-५७ ५८- ६१ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ११७ Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख जिन प्रतिमा का प्राचीन स्वरूप : एक समीक्षात्मक चिन्तन "अंगविज्जा" में जैन मंत्रों का प्राचीनतम् स्वरूप उमास्वाति एवं उनकी उच्चैनार्गर शाखा का उत्पत्ति स्थल एवं विचरण क्षेत्र उमास्वाति का काल उमास्वाति और उनकी परम्परा जैन आगम साहित्य में श्रावस्ती प्राकृत और अपभ्रंश साहित्य में कृष्ण ऋषिभाषित में प्रस्तुत चार्वाक दर्शन राजप्रश्नीयसूत्र में चार्वाक मत का प्रस्तुतीकरण एवं लेखक डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन मूलाचार : एक अध्ययन डॉ. सागरमल जैन प्राचीन जैनागमों में चार्वाक दर्शन का प्रस्तुतीकरण एवं डॉ. सागरमल जैन समीक्षा कुछ प्रमाण बौद्ध धर्म में सामाजिक चेतना धर्म निरपेक्षता और बौद्ध धर्म डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन समीक्षा भागवत के रचना काल के सन्दर्भ में जैन साहित्य के डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन विषय इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम और साहित्य इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम और साहित्य आगम और साहित्य इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला आगम और साहित्य आगम और साहित्य आगम एवं साहित्य वर्ष ५६ ५६ ३-४ ५६ ३-४ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ ५६ आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य समाज एवं संस्कृति ५६ धर्म, साधना नीति एवं आचार ५६ ५६ ५६ अंक ई.सन् पृष्ठ ३-४ २००५ ६२-६८ ५६ ३-४ ३-४ ३-४ २००५ ८२-८६ ३-४ २००५ ८७-९२ ३-४ २००५ ९३-९६ ३-४ २००५ ९७-११० ३-४ २००५ १११-१२३ ३-४ २००५ १२४-१३१ ३-४ २००५ २००५ ३-४ ३-४ ६९-७५ ७६-८१ २००५ १३२-१३६ २००५ १३७-१४१ २००५ १४२-१४५ २००५ २००५ १४६ - १५५ १५६ - १६३ ११८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक डॉ. सागरमल जैन Dr. Sagarmal Jain विषय समाज एवं संस्कृति समाज और संस्कृति वर्ष ५६ ५६ अंक ३-४ ३-४ ई.सन् पृष्ठ २००५ १६४-१७४ २००५ १७६-१८५ लेख महायान सम्प्रदाय की समन्वयात्मक जीवन दृष्टि Human Solidarity and Jainism : The challenge of our times The impact of Nyāya and Vaišeșika school of Jaina प्राकृत कथा-साहित्य में सांस्कृतिक चेतना कर्पूरमञ्जरी में भारतीय समाज तत्त्वार्थसूत्र का पूरक ग्रन्थ : जैन सिद्धान्त-दीपिका भारतीय व्याकरण शास्त्र की परम्परा ३-४ २००५ १८६-१९२ ५७ Dr. Sagarmal Jain दर्शन, तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा श्रीरंजन सूरिदेव आगम एवं साहित्य डॉ. हरिशंकर पाण्डेय समाज एवं संस्कृति डॉ. धर्मचन्द्र जैन आगम और साहित्य डॉ. अतुल कुमार प्रसाद आगम और साहित्य सिंह डॉ. श्वेता जैन आगम और साहित्य ५७ ५७ ५७ १ १ १ १ २००६ २००६ २००६ २००६ १-१० ११-१८ १९-३२ ३३-४४ २००६ ४५-५३ पद्मपुराण में राम का कथानक और उसका सांस्कृतिक पक्ष धम्म चक्र प्रवर्तन सूत्र : मानवीय दुःख विमुक्ति का निदान पत्र प्रतीत्यसमुत्पाद और निमित्तोपादानवाद प्रो. अँगने लाल धर्म,साधना, नीति एवं आचार ५७ १ २००६ ५४-५९ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : ११९ कु. अल्पना जैन महावीर कालीन मत-मतान्तर : पुनर्निरीक्षण जैन धर्म के जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता वैदिक ऋषियों का जैन परम्परा में आत्मसातीकरण डॉ. विभा उपाध्याय दुलीचन्द जैन डॉ. अरुण प्रताप सिंह दर्शन, तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ ५७ १ १ १ १ २००६ २००६ २००६ २००६ ६०-६५ ६६-८४ ८५-९६ ९७-१०५ Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक डॉ. रामकुमार गुप्त डॉ. शारदा सिंह कुमार प्रियदर्शी Dr. Pramod Kumar Singh Dr.Nandini Verma Dr. Ratnesh Verma जस्टिस.एम.एल. जैन कु. रंजना श्रीवास्तव विषय वर्ष धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५७ विविध ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ अंक १ १ १ १ लेख 'दया-मृत्यु' एवं 'संथारा-प्रथा' का वैज्ञानिक आधार जैन श्रमण संघ में विधि शास्त्र का विकास देवानन्दा-अभिनन्दन The conception of Death in Buddhism and Jainism Jaina Šāsanadevatās : Source and Iconography श्वेताम्बर आगम और दिगम्बरत्व प्राचीन भारत में आर्थिक विचार : जैन आगमों के परिप्रेक्ष्य में जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में सांख्य का विकासवाद ई.सन् पृष्ठ २००६ १०६-१११ २००६ ११२-१२० २००६ १२१-१२३ २००६ १२६-१३८ समाज एवं संस्कृति ५७ १ २००६ १३९-१४१ १२० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० आगम और साहित्य आगम और साहित्य ५७ ५७ २ २ २००६ २००६ १-१४ १५-१९ डॉ. सत्यदेव मिश्र बौद्ध भिक्षु संघ का विकास और नियम वैदिक और श्रमण परम्परा में अहिंसा दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा ५७ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५७ धर्म, साधना नीति एवं आचार ५७ २ २ २ २००६ २००६ २००६ २०-२६ २७-३४ ३५-४५ डॉ. कमलेश दूबे डॉ. रीता अग्रवाल, डॉ. अनीता अग्रवाल डॉ. ललिता शुक्ला Prof. Cromwell Crawford भारत की अहिंसक संस्कृति The Role of Ahimsa in health care Ethics समाज एवं संस्कृति ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ २ २ २००६ २००६ ४६-५१ ५३-७० Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंक २ २ ई.सन् २००६ २००६ पृष्ठ ७१-८२ ८३-८९ लेख लेखक विषय वर्ष Medical Ethics in Ancient India SwamiBrhmeshanand धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ The Jaina concept of Ahiṁsā and the Prof.v.V. Menon धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ modern world Political Aspectof Non-Violence Dr. B.N. Sinha धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ प्राकृत महाकाव्यों में ध्वनि-तत्त्व . डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव आगम और साहित्य ५७ आचार्य हरिभद्रसूरि प्रणीत उपदेश-पद : एक अध्ययन डॉ. फूलचन्द जैन 'प्रेमी' आगम एवं साहित्य ५७ जैन हिन्दू ही हैं लेकिन किस अर्थ में? विनायक दामोदर सावरकर विविध ५७ जैन साहित्य में शिक्षा का स्वरूप अजय कुमार गौतम आगम एवं साहित्य ५७ जैन दर्शन का कारणता सिद्धान्त डॉ. श्रुति दूबे दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान ५७ मीमांसा जैन दर्शन में ईश्वर विचार डॉ. सुधा जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५७ अनेकान्तवाद एवं उसकी प्रासंगिकता डॉ. मनोज कुमार तिवारी दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५७ अनेकान्तवाद-एक दृष्टि डॉ. जयशंकर सिंह दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा . ५७ जैन चिन्तन में मन की अवधारणा डॉ. अजय कुमार धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ जैन दर्शन व शैव दर्शन में प्रतिपादित मोक्ष डॉ. शारदा सिंह जैन दर्शन-तत्त्व मीमांसा व २ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ २००६ २००६ २००६ २००६ २००६ २००६ ९०-११५ १-१० ११-२५ २६-३८ ३९-४३ ४४-५१ ३-४ २००६ ५२-५७ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १२१ ३-४ २००६ ५८-६५ ३-४ ३-४ २००६ २००६ ६६-७४ ७५-७९ Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक वर्ण व्यवस्था - जैन धर्म तथा हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में डॉ. दीपंजय श्रीवास्तव हिन्दू परम्परा में कर्म सिद्धान्त की अवधारणा भारतीय विद्या में शब्दविषयक अवधारणा का विकास दुःख का कारण कमी नहीं कामना डॉ. रजनीश शुक्ल डॉ. जयन्त उपाध्याय कन्हैया लाल लोढ़ा डॉ. राघवेन्द्र पाण्डेय डॉ. उमाकान्त पी. शाह डॉ. अशोक प्रियदर्शी जैन आगमों में शिल्प : एक दार्शनिक दृष्टि तीर्थंकरों की मूर्तियों पर उकेरित चिन्ह फतेहपुर सीकरी से प्राप्त श्रुतदेवी (जैन सरस्वती) की प्रतिमा कला की अनुपम कृति जबलपुर का श्री शीतलनाथ मंदिर स्मृति प्रमाण (प्रमाणमीमांसा के सन्दर्भ में) एक समीक्षात्मक अध्ययन Dravya, Guna and Paryaya in Jaina Thought Environmental Aspect of Non-violence Philosophilogy Interpretations of Religion Buddhists Ethics and its contemporary relevance कृष्ण मुरारी पाण्डेय भूपेन्द्र शुक्ल Jayendra Soni Dr. B.N. Sinha Prof. S.P. Dubey Dr. R.K. Gupta अंक ई.सन् ३-४ २००६ ३-४ २००६ ३-४ २००६ ५७ ३-४ २००६ २००६ २००६ विषय ज्ञान मीमांसा समाज एवं संस्कृति समाज एवं संस्कृति इतिहास, कला और पुरातत्व समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्व एवं कला ५७ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५७ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५७ ३-४ दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५७ दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान ५७ मीमांसा धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५७ वर्ष * 3 3 3 3 3 3 3 3 ५७ ५७ ५७ ५७ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ ३-४ पृष्ठ ८०-८९ ९०-९५ ९६ - १०४ १२५-१३१ २००६ १३२-१३९ २००६ १४०-१४४ २००६ २००६ १०५ - ११३ ११४- १२४ २००६ १४५-१४७ २००६ २००६ २००६ १४८ - १५६ १५७-१७३ १७४ - १८४ १८५ - १९६ १९७ - २०२ १२२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंक ई.सन् पृष्ठ ३-४ ३-४ १ १ २००६ २०३-२०६ २००६ २०७-२०९ २००७ १-३१ २००७ ३२-३९ लेख लेखक विषय वर्ष Anekāntavāda : A way Towords world Peace Dr. Baleshwar दर्शन-तत्त्व मीमांसा व ज्ञान Prasad Yadava मीमांसा ५७ The Jaina Tāntric Yantras Dr. Lalit Kumar ५७ तीस वर्ष और तीन वर्ष स्व. नन्दलाल जैन विविध ५८ आगमों में अनगार के प्रकार : परिव्राजक, तापस डॉ. विजय कुमार आगम और साहित्य ५८ और आजीवक के विशेष सन्दर्भ में । वैदिक और श्रमण समाज में सामाजिक पारस्परिकता डॉ. सुधा जैन संस्कृति और समाज ५८ जैन-जैनेतर धर्म-दर्शनों में अहिंसा डॉ. श्याम किशोर सिंह धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ जैन और बौद्ध धर्मों में चतुर्विध संघों का परस्पर डॉ. शारदा सिंह धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ योगदान जैन ज्ञानमीमांसा : 'प्रमाणनयतत्त्वालोक' के विशेष डॉ. राघवेन्द्र पाण्डेय दर्शन-तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञान सन्दर्भ में मीमांसा ५८ भारतीय तर्कशास्त्र को जैन दर्शन का योगदान डॉ. राकेश कुमार सिंह दर्शन-तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञान ५८ मीमांसा जैन व शैव धर्मों के बीच समीपता के साहित्यिक डॉ. कृष्ण कान्त मिश्रा इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ एवं अभिलेखीय प्रमाण जैन साहित्य में वर्णित व्यापारिक साधन डॉ. संजय कुमार जैन आगम और साहित्य ५८ Tattvārthavivaraña: An appraisal Dr.G.L. Suthar आर.1 और साहित्य ५८ The concept of Dharma: A Reappraisal Dr.Bijayananda Kar धर्म, साधना, नीति और आचार ५८ १ १ १ २००७ २००७ २००७ ४०-४५ ४६-५४ ५५-६१ १ १ २००७ ६२-७५ २००७ ७६-८३ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १२३ १ २००७ ८४-८६ १ १ १ २००७ ८७-९० २००७ ९१-१०१ २००७ १०२-११३ Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख Can there be a choice between Religion or no Religion The Influence of Jainism on Akbar, The Mughal Emperor The concept of Mind in won-Buddhist Philosophy and Yoga Anekanta and concept of Absolutism in Jainism जैन परम्परा में मंत्र - तन्त्र तपः साधना और समाधान निरयावलिया-कल्पिका : एक समीक्षात्मक अध्ययन धार्मिक सहिष्णुता और धर्मों के बीच मैत्री भाव- जैन दृष्टिकोण वैदिक, श्रमण परम्परा और उसकी लोक- यात्रा लेखक Dr. Kanchan Saxena Dr. Nirmala Gupta Prof. Soon-Keum Kim Dr. Jagdish P. Jain डॉ. ऋषभचन्द्र जैन 'फौजदार ' डॉ. रज्जन कुमार डॉ. सुधा जैन डॉ. राजेन्द्र जैन डॉ. विन्ध्येश्वरी प्रसाद मिश्र 'विनय' आप्तोपदेशः शब्दः की जयन्त भट्टीय व्याख्या डॉ. जयन्त उपाध्याय डॉ. संजय कुमार सिंह कालिदास के नाटकों में प्रयुक्त प्राकृत के तद्धित प्रत्यय कौशल्या चौहान विषय वर्ष धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ इतिहास, पुरातत्व एवं कला ५८ दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा ५८ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ ५८ ५८ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ आगम और साहित्य धर्म, साधना, नीति और आचार ५८ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा आगम और साहित्य ५८ ५८ अंक ई.सन् १ १ १ २-३ पृष्ठ २००७ ११४ - १२० २००७ १२१-१३० २००७ १३१ - १४२ २००७ १४३-१४९ २००७ १-१२ २-३ २००७ २-३ २००७ २-३ २००७ २-३ २००७ २-३ २००७ २-३ २००७ १३-२२ २३-३३ ३४-४२ ४३-५३ ५४ - ६२ ६३-७५ १२४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख तन्त्र दर्शन में ज्ञान का स्वरूप जैन दर्शन एवं योगवाशिष्ठ में ज्ञान की क्रमागत अवस्थाओं का विवेचन वैदिक और श्रमण परम्पराओं की दार्शनिक पारस्परिकता बौद्ध एवं जैन दर्शन में व्यक्ति-विमर्श जैन दार्शनिक चिन्तन का ऐतिहासिक विकास-क्रम प्रकाशित उपांग साहित्य Concept of Omniscience in Jainism Contribution of Śramana Tradition to Indian culture Jahangir's relation with Spiritual Jaina Leaders Jainism and Meat-Eating Towards world Peace on the Wheels of ‘Anekāntavāda’and ‘Syādvāda’ बौद्धों का शून्यवाद लेखक डॉ. जयशंकर सिंह डॉ. मनोज कुमार तिवारी दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला डॉ. विजय कुमार डॉ. राघवेन्द्र पाण्डेय डॉ. किरन श्रीवास्तव श्री ओम प्रकाश सिंह Dr. S.P. Pandey Dr. B.N. Sinha Dr.Nirmala Gupta विषय दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा M.V. Shah Dr. Jaya Singh डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान इतिहास, पुरातत्व एवं कला मीमांसा वर्ष मीमांसा दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा ५८ ५८ ५८ २-३ २००७. ७६-८० ५८ ५८ आगम और साहित्य ५८ दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान ५८ समाज एवं संस्कृति मीमांसा ५८ समाज एवं संस्कृति धर्म, साधना, नीति और आचार ५८ दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञान ५८ ५८ अंक ई.सन् ५८ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ ४ २००७ २००७ पृष्ठ २००७ २००७ २००७ २००७ २००७ १०१-११४ ८१-९४ ९५ - १०० ११५ - १२६ १२७-१३५ १३७ - १६२ १६३ - १७१ २००७ १७२ - १८७ २००७ २००७ १८८ - २०६ २००७ २०७-२१७ १-६ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १२५ Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ई.सन् लेख मध्यकालीन भारतीय प्रतिमा लक्षण पृष्ठ ७-१५ २००७ लेखक विषय वर्ष अंक डॉ. मारुति नन्दन प्रसाद इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ तिवारी डॉ. हरिशंकर पाण्डेय इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ . ४ डॉ. एस.पी. सिंह इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ ४ साध्वी डॉ. आर्चना दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ४ डॉ. भूपेन्द्र शुक्ला दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ४ डॉ. राज नारायण सिंह तुलनात्मक ४ २००७ २००७ आचारांग में भारतीय कला जैन धर्म और ब्रज मध्ययुगीन संत-काव्य में जैन-न्याय का निक्षेप-पद्धति जैन दर्शन में प्रत्यभिज्ञान प्रमाण १६-२२ २३-३१ २००७ ३२-३७ १२६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४/ अक्टूबर-दिसम्बर-१० २००७ ३८-४२ २००७ १४३-४६ ४ २००७ १४७-५१ हठयोग एवं जैनयोग में प्रत्याहार का स्वरूप : एक तुलनात्मक अध्ययन जैन पोथियों में जैनेतर दृश्य जैन दर्शन एवं श्री अरविन्द के दर्शन में चेतना का स्वरूप : एक तुलनात्मक सर्वेक्षण The contribution of Bhuddhism to the world of art and Architecture Venerable Jaina Architecture and Images of western India under the western Kşatrapas The concept of Mind (Manas) in Jaina Philosophy डॉ. शैलेन्द्र कुमार विविध ५८ डॉ. अवनीश चन्द पाण्डेय दर्शन-तत्त्व मीमांसा और ज्ञान मीमांसा ५८ Dr.RewatDhamma इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ ४ ४ २००७ २००७ ५२-५८ ६१-७२ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५८ ४ २००७ ७३-८३ Prof. Rasesh Jamindar Dr. S.P. Pandey दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान ५८ मीमांसा ४ २००७ ८४-९७ Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख Jainism in Bengal प्रज्ञापना-सूत्र : एक समीक्षात्मक अध्ययन - महामंत्र नवकार की साधना औ उसका प्रभाव परीषह एवं उपसर्गजय के सन्दर्भ में सल्लेखना व्रत पुरुषार्थ-चतुष्टय : जैन दर्शन के परिप्रेक्ष्य में । विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता विज्ञान के क्षेत्र में अहिंसा की प्रासंगिकता Concept of Śila in Jainism लेखक विषय वर्ष अंक Dr. Harihar Singh धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५८ ४ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय आगम और साहित्य ५९१ डॉ. सुधा जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ १ डॉ. सोहनराज तातेड़ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ डॉ. दीपक रंजन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ हिमांशु सिंघवी धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ कु. निकिता चोपड़ा धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ कु. प्रियंका चोरडिया धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ श्रीमती सरोज गोलेछा धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ श्रीमती कमलिनी बोकारिया धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ छैल सिंह राठौड़ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ रामस्वरूप जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ Dr. S.P. Pandey दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५९ १ Dr. Vijay Kumar दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ५९ १ डॉ. सागरमल जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ २ ई.सन् पृष्ठ २००७ ९८-१०३ २००८ १-३२ २००८ ३३-४० २००८ ४१-५० २००८ ५१-५७ २००८ ५९-६२ २००८ ६३-६४ २००८ ६५-६८ २००८ ६९-७५ २००८ ७६-८० २००८ ८१-८७ २००८ ८८-८९ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १२७ २००८ ९१-११६ Concept of Jīva in Jaina Metaphysics २००८ ११७-१२२ २००८ १-२४ भारतीय दार्शनिक ग्रन्थों में प्रतिपादित बौद्ध धर्म एवं दर्शन Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख गुणस्थान सिद्धान्त पर एक महत्त्वपूर्ण शोध-कार्य जैन धर्म में ध्यान - विधि की विकास-यात्रा ध्यानशतक : एक परिचय आचारांगसूत्र की मनोवैज्ञानिक दृष्टि क्या तत्वार्थसूत्र स्त्रीमुक्ति का निषेध करता है। राजप्रश्नीयसूत्र का समीक्षात्मक अध्ययन वृष्णिदशा : एक परिचय जैन इतिहास : अध्ययन विधि एवं मूल स्तोत्र शंखेश्वर तीर्थ का इतिहास 'नवदिगम्बर सम्प्रदाय' की कल्पना कितनी समीचीन? जैन कथा - साहित्य : एक समीक्षात्मक सर्वेक्षण जैन जीवन-दृष्टि विक्रमादित्य की ऐतिहासिकता : जैन साहित्य के सन्दर्भ में षट्जीवनिकाय की अवधारणा : एक वैज्ञानिक विश्लेषण Role of Religion in unity of Mankind and world peace लेखक डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागर जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन डॉ. सागरमल जैन Dr. Sagarmal Jain विषय दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा वर्ष ५९ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ साधना, धर्म, नीति एवं आचार ५९ विविध ५९ विविध ५९ आगम और साहित्य ५९ आगम और साहित्य ५९ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५९ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५९ विविध ५९ आगम और साहित्य ५९ समाज एवं संस्कृति ५९ इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५९ विविध धर्म, साधना, नीति एवं आचार ५९ ५९ अंक ई.सन् पृष्ठ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ २ ∞∞ २ २ २ २ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २५-३१ ३२-३६ ३७-४९ ५० - ६१ ६२-६८ ६९-८२ ८३-८५ ८६-९९ १०० - १०४ १०५ - ११२ ११३ - १२३ १२४ - १३४ १३५ - १४१ २००८ १४२ - १४९ २००८ १५१ - १६७ १२८ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख लेखक Dr. Sagarmal Jain Dr. Sagarmal Jain विषय आगम और साहित्य वर्ष ५९ ५९ अंक २ २ ई.सन् पृष्ठ २००८ १६८-१७३ २००८ १७४-१८३ विविध Dr. Sagarmal Jain Dr. Sagarmal Jain आगम और साहित्य आगम और साहित्य ५९ ५९ २ २ २००८ १८४-१९७ २००८ १९८-२१६ प्रो. एस.आर. व्यास ५९ ३ २००८ १-७ Jaina Literature How appropriate is the proposition of NeoDigambara School? Jaina Canonical Literature An investingation of the earlier subject matter of Praśnavyākaraņa sūtra कीट-रक्षक सिद्धान्त का नैतिक आधार एक उदार दृष्टिकोण का पक्षधर है : जैन दर्शन का 'स्याद्वाद' जैनागम में 'पाहुड' का महत्त्व जैनशास्त्रों में विज्ञानवाद वर्तमान संदर्भ में अनेकान्तवाद की प्रासंगिकता पदार्थ बोध की अवधारणा अपभ्रंश जैन कवियों का रसराज-'शांत रस पाश्चात्य एवं जैन मनोविज्ञान में मनोविक्षिप्तता एवं उन्माद जैन दर्शन में जीव का स्वरूप उदारवादी जैन धर्म-दर्शन : एक विवेचन ५९ ३ डॉ. सुरेन्द्र वर्मा डॉ. ऋषभचन्द्र जैन डॉ. कमलेश कुमार जैन डॉ. श्याम किशोर सिंह डॉ. जयन्त उपाध्याय डॉ. शंभु नाथ सिंह ५९ ५९ ५९ ५९ ३ ३ ३ ३ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ २००८ ८-१० ११-१४ १५-२३ २४-२८ २९-३६ ३७-४२ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १२९ डॉ. साधना सिंह नीरज कुमार सिंह डॉ. द्विजेन्द्र कुमार झा ५९ ५९ ३ ३ ३ २००८ २००८ २००८ ४३-५२ ५३-५९ ६०-७० Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख भारत की सांस्कृतिक यात्रा में श्रमण संस्कृति का अवदान मिथिला और जैन धर्म जैन दर्शन में निक्षेपवाद : एक विश्लेषण The role of Jainism in Evolving a Global Ethics Individual and Society in Jainism Contribution of Buddhism and Postmodernism to Society पर्यावरण और वनस्पति देहात्मवाद धुतंगनिद्देस में प्रयुक्त अर्थघटन के उपकरण भरत : एक शब्द यात्रा जैन चिन्तन में संपोष्य विकास की अवधारणा जैन साहित्य में श्रमिकों की दशा लेखक डॉ. विनोद कुमार तिवारी डॉ. अशोक कुमार सिन्हा नवीन कुमार श्रीवास्तव Dr. Sohan Raj Tater Dr. C. Krause Dr. Ram Kumar Gupta डॉ. सुधा जै डॉ. विजय कुमार श्रीमती सरिता कुमारी डॉ. अविनाश कु. श्रीवास्तव वेद प्रकाश गर्ग डॉ. पंकज कुमार शुक्ल डॉ. नागेन्द्र नाथ मिश्र डॉ. रघुवर दयाल सिंह विषय समाज एवं संस्कृति दर्शन - तत्त्व मीमांसा व ज्ञान मीमांसा विविध समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्व एवं कला आगम एवं साहित्य वर्ष अंक ई. सन् ५९ ५९ އެ ५९ ५९ ५९ ५९ m m m ५९ ५९ ३ ३ ३ m mr ३ ५९ ३ ५९ ४ ५९ ४ ३ ㄨㄨ ४ ܡ ४ पृष्ठ २००८ ७१-७४ २००८ ७५-७८ २००८ ७९-८३ २००८ ८५-९० २००८ ९१-११६ २००८ ११७-१२२ २००८ १-८ २००८ ९-१८ २००८ २००८ १९-२८ २९-३६ २००८ ३७-४६ २००८ ४७-५० १३० : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख उत्तरी मध्य प्रदेश में जैन धर्म : १०वीं से १३वीं शताब्दी तक विश्व शांति और अहिंसा : एक विश्लेषण भास का प्राकृत प्रयोगजन्य दर्शन पूर्वमध्य कालीन जैन ग्रन्थों में शिक्षा के तत्त्व अष्टपाहुड एवं प्रवचनसार के परिप्रेक्ष्य में योग्यअयोग्य साधु विवेचन Śvetambara Scholars on Kundakunda: An appraisal Revising Buddhism in Mughal India : Through the Seventeenth century Presian literature Dabistan-I Mazahib Theory of Karma and Rebirth in Theravāda Jainism Art and Education an overture Practice of Brahmvihära in Theravada Buddhism लेखक यशवन्त सिंह डॉ. मुक्तेश्वर नारायण सिंह डॉ. रामाशंकर रजक रविशंकर गुप्ता आनन्द कुमार जैन Dr. Jagdish Prasad Jain Dr. Damodar Singh Dr. Abha Singh Priti Kumari Archphurich Nomnian विषय वर्ष इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ५९ धर्म, साधना, नीति और आचार ५९ दर्शन - तत्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा समाज एवं संस्कृति आगम और साहित्य ५९ दर्शन- तत्त्वमीमांसा एवं ज्ञानमीमांसा ५९ ५९ समाज एवं संस्कृति इतिहास, पुरातत्व एवं कला ५९ ५९ ५९ ५९ ५९ अंक ई.सन् ४ २००८ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ ४ २००८ २००८ २००८ पृष्ठ ५१-५४ ५५-५९ २००८ ७२-७६ २००८ ७७-८५ २००८ २००८ २००८ ६१-७१ ८७-१०४ २००८ १०५-११३ ११४-१२२ १२३ - १३१ १३२ - १.४१ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १३१ Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक विषय वर्ष अंक ई.सन् पृष्ठ Samani Chaitya Prajna दश ज्ञानमीमांसा समाज एवं संस्कृति ५९ ५९ ४ ४ २००८ १४२-१५६ २००८ १५७-१६३ Dr.Anita Singh लेख Consciousness in Sartrean and Jain Philosophy Women working class as reflected in Buddhist literature: An analytical view Life story of Rsabhadeva पतञ्जलि का अष्टांग योग तथा जैन योग-साधना प्रेक्षाध्यान द्वारा भावनात्मक चेतना का विकास जैन साहित्य में कृष्ण का स्वरूप जैन धर्म का सामाजिक क्रान्ति के रूप में मूल्यांकन सामाजिक नैतिकता के सन्दर्भ में कर्म सिद्धान्त का स्वरूप (गीता एवं जैन दर्शन की दृष्टि में) भगवतीसूत्र में वर्णित परमाणु विज्ञान उत्तराध्ययनसूत्र में वर्णित पंचमहाव्रत जैन चिन्तन में प्राणायाम : एक अनुशीलन जैन धर्म में भक्ति का स्वरूप पार्श्वचन्द्रगच्छ का संक्षिप्त इतिहास पूर्व मध्य कालीन जैन अभिलेखों में वर्णित समाज Kuşāņa Art in Mathurā Contribution of Jainism to Indian culture RudraniMukerjee समाज एवं संस्कृति ५९ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० डॉ. सुधा जैन धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० डॉ. शंभु नाम सिंह आगम और साहित्य ६० डॉ. आनन्द कुमार शर्मा समाज एवं संस्कृति ६० डॉ. श्याम किशोर सिंह धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० ४ १ १ १ १ १ २००८ १६४-१७८ २००९ १-८ २००९ ९-१२ २००९ २००९ १७-२० २००९ २१-२४ १३२ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० १ १ ओम प्रकाश सिंह डॉ. शर्मिला जैन मुनि मणिभद्र डॉ. ओम प्रकाश सिंह डॉ. शिवप्रसाद मंजु कश्यप Prof. R.C. Sharma Dr. S.P. Pandey आगम और साहित्य ६० आगम और साहित्य ६० धर्म, साधना, नीति और आचार ६० धर्म, साधना, नीति और आचार ६० इतिहास, पुरातत्व एवं कला ६० इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ६० इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ६० समाज एवं संस्कृति ६० worror or २००९ २००९ २००९ २००९ २००९ २००९ २००९ २००९ २५-२७ २८-३२ ३३-३५ ३६-३८ ३९-४९ ५०-५३ ५५-६४ ६५-८२ १ १ १ or Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेखक Dr.Vijay Kumar विषय समाज और संस्कृति वर्ष ६० अंक १ ई.सन् २००९ पृष्ठ ८३-८८ Km. Richa Singh इतिहास, पुरातत्त्व एवं कला ६० १ २००९ ८९-९२ लेख Religious Exclusion : A threat to social Equality in Jaina Perspective Śrāvasti - The secred Place of Śramaņa Tradition समाधिमरण और प्रायोपवेशन : श्रमण दृष्टि और वैदिक दृष्टि भगवद्गीता और जैन साहित्य जैन दर्शन में कर्मवाद डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० २-३ २००९ १-८ २-३ २००९ ९-१८ 'आख्यानकमणिकोश' का समीक्षात्मक अध्ययन २-३ २-३ २००९ २००९ डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय आगम एवं साहित्य ६० डॉ. सोहन राज तातेड़ दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ६० डॉ. एच.सी. जैन आगम और साहित्य ६० डॉ. इन्दुबाला जैन डॉ. सरोज कुमार वर्मा धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० डॉ. अयोध्या नाथ त्रिपाठी समाज और संस्कृति ६० डॉ. राहुल कुमार सिंह धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० १९-३० ३१-३६ ३७-४४ २-३ २-३ २-३ २००९ २००९ २००९ महावीर की अहिंसा : ओशो की दृष्टि में प्राग्बौद्धकालीन श्रमण संस्कृति की समन्वयधर्मिता जैन विचारणा के नित्यानित्यात्मवाद की नैतिक अपरिहार्यता स्वास्थ्य संरक्षण में योग की उपादेयता जैन एवं वैदिक दृष्टि जैन दर्शन में पुरुषार्थ की अवधारणा श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १३३ डॉ. अरुण कुमार सिन्हा धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० २-३ २००९ ६०-६४ नमिता कपूर दर्शन-तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान मीमांसा ६० २-३ २००९ ६५-६८ । Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख पुद्गल : एक पर्यवेक्षण अंक ई.सन् पृष्ठ लेखक विषय वर्ष डॉ. नवीन कुमार दर्शन, तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान श्रीवास्तव मीमांसा ६० जैन सिद्धांताचार्य साध्वी समाज एवं संस्कृति डॉ. विजयश्री 'आर्या' ६० Dr.RaniMajumdar आगम और साहित्य ६० २-३ २००९ ६९-७६ २-३ २-३ २००९ २००९ ७७-७९ ८०-८९ अर्हत् शब्द की प्राचीनता व मौलिकता : जैन धर्म के सम्बन्ध में The Vidyās of the Vidyādharas according to the VasudevahimdiCurrent trends in the Practice of Voluntary peaceful Death (Samādhi Marana) in the Jain tradition: An Empirical study १३४ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर-१० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० २-३ २००९ ९१-१०६ Dr. Col. D.S. Baya 'Sreyas' Tirtha, Tourism and Jainism Non-Violence in Jainism : Issues and Prospectives इतिहास, पुरातत्व एवं कला धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० ६० २-३ २-३ Dr. Rajjan Kumar Dr. Ramathtollah Saiedi Dr. Nanjunda D.C. उपाध्याय अमर मुनि २००९ १०७-११५ २००९ ११६-१२४ ध्वनिवर्धक का प्रश्न हल क्यों नहीं होता? क्या विद्युत अग्नि है? जैन धर्म में धार्मिक सहिष्णुता की स्थापना के मूल आधार डॉ. राजेन्द्र जैन ६१ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६१ ४-१ २००९-१० १-१३ ४-१ २००९-१० १४-३० Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख जैन दर्शन में काल की अवधारणा जैन दर्शन में आकाश बौद्ध परम्परा में सौन्दर्य शास्त्र का दर्शन जैन आगमों में वर्णित शासन व्यवस्था जैन साधना पद्धति : मनोऽनुशासनम् श्रमण परम्परा में समाज व्यवस्था Development of Jain Yoga Sāmāyika पातञ्जल योगदर्शन' और हेमचन्द्राचार्य रचित 'योगशास्त्र' में प्राणायाम निरूपण महावग्ग में औषधि एवं शल्य चिकित्सा जीवन (कविता) A study of Jaina Monastic Life आदर्श और स्वस्थ जीवन जीने की कला जैन साहित्य में वर्णित वास्तुकला : एक समीक्षात्मक लेखक डॉ. सुदर्शन मिश्र डॉ. रामजी राय अध्ययन जैनागमों में शिक्षा का स्वरूप डॉ. रामकुमार गुप्त डॉ. अरुणिमा रानी डॉ. हेमलता बोलिया डॉ. हरिशंकर पाण्डेय विषय दर्शन - तत्त्व मीमांसा और ज्ञानमीमांसा दर्शन - तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञानमीनांसा Padmanabh S. Jaini Dr. Sunil Kumar Jain डॉ. सोहनलाल तातेड़ डॉ. हुकुमचन्द जैन एवं डॉ. इन्दुबाला जैन दुलीचन्द जैन वर्ष आगम एवं साहित्य आगम और साहित्य ६१ ६१ ६१ ६१ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६१ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६१ प्रो. डॉ. विष्णु कुमार पुरोहित धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६१ डॉ. दिवाकर लाल श्रीवास्तव ६१ डॉ. वशिष्ठ नारायण सिन्हा Dr. Ashok Kumar Singh ६१ धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० जैन आगम एवं साहित्य आगम एवं साहित्य अंक ई.सन् ४-१ २००९-१० ३१-३६ पृष्ठ ४-१ २००९-१० ३७-४१ ४-१ २००९-१० ४२-४८ ४-१ २००९-१० ४९-५६ ४-१ २००९-१० ५७-६५ ४-१ २००९-१० ६६-७३ ४-१ २००९-१० ७४-८० ४-१ २००९-१० ८१-८७ ४-१ २००९-१० ८८ ४-१ २००९-१० ८९-१०७ २-३ २००९-१०१०८ - ११६ २-३ २००९-१०११७- १२४ २-३ २०१० १-१० ६० २-३ ६० २-३ २०१० २०१० ११-२१ २२-३३ श्रमण अतीत के झरोखे में (द्वितीय खण्ड) : १३५ Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लेख प्राकृत साहित्य में अंकित नारी जैन धर्म में शान्ति की अवधारणा सामाजिक क्रान्ति और जैन धर्म तीर्थंकालीन श्रमणियों पर एक विचार दृष्टि Contribution of Acarya Mahāprajña to the World of Philosophy Karuņā and the significance of its Social Implementation Potentials of Tourism with Reference to Varanasi and its Jaina Places लेखक डॉ. अल्पना जैन प्रो. सागरमल जैन अनु. डॉ. राजेन्द्र कुमार जैन डॉ. आनन्द कुमार शर्मा साध्वी विजयश्री 'आर्या' Dulichand Jain विषय वर्ष धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० - Samani Dr. Shashiprajna दर्शन तत्त्व मीमांसा एवं ज्ञान ६० मीमांसा Vivek Tiwari धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० धर्म, साधना, नीति एवं आचार ६० इतिहास पुरातत्त्व एवं कला ६० अंक ई.सन् २-३ २०१० २-३ २-३ २-३ २-३ २-३ २०१० ४५-६५ २०१० ६६-७१ २०१० ७२-७४ २०१० २०१० पृष्ठ ३४-४४ २-३ २०१० ७५-८३ ८४-८९ ९०-९७ १३६ : श्रमण, वर्ष ६१, अंक ४ / अक्टूबर-दिसम्बर - १० Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ NO PLY, NO BOARD, NO WOOD ONLY NUWUD(r) INTERNATIONALLY ACCLAIMED Nuwud MDF is fast replacing ply, board and wood in offices, homes & industry, As cellings DESIGN FLEXIBILITY flooring furniture, mouldings, panelling, doors, windows... and almost infinite variety of VALUE FOR MONEY woodwork. 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