Book Title: Sramana 2004 10
Author(s): Shivprasad
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi

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Page 123
________________ गाहा : छाया : हा ! किं न किमपि जल्पसि किंवा त्वं सुतनु ! मत्तो किं वा मया अपराद्धं सुंदरि ! त्वं मह्यम् अर्थ :- अरे हे देवी! तुं केम कांइपण बोलती नथी ! अथवा तो हे सुतनु ! शुं माराथी तुं रिसाई गई छे ? अथवा हे सुन्दरि ! मारा वड़े कोई तारो अपराध करायो छे ? तुं मने कहे. छाया : हा ! किं न किंपि जंपस किंवा तं सुयणु ! मज्झ रुट्ठा सि । किं व मए अवरद्धं सुंदरि ! तं मज्झ हिन्दी अनुवाद :- अरे ! हे देवी! तूं क्यों कुछ भी बोलती नहीं हो ! अथवा हे सुतनु ! क्या तूं मेरे से नाराज हो गई हो ? अथवा तो हे सुन्दरि ! मेरे से क्या कुछ तेरा अपराध हो गया है ? तू मुझसे कह? गाहा : छाया : गाहा : त्वमेव मम वल्लभा स्नेहो मम नास्ति परित्यक्त सकलावरोध - नारि-जनाः ।। १२२ ।। अन्य - स्त्रीषु । तव कृ अर्थ :- तुं ज मारी प्राणप्रिया छे, मारो स्नेह तारा सिवाय अन्यस्त्रीओने विषे नथी, तारा माटे संपूर्ण अन्तःपुरनी नारी जनो मारावड़े त्यजाई छे. हिन्दी अनुवाद :- तूं ही मेरी प्राणप्रिया हो ! मेरा स्नेह तुझे छोड़ अन्य स्त्रियों पर नहीं है। तेरे लिए मैंने संपूर्ण अन्त: पुर की स्त्रियों को भी छोड़ दिया है। गाहा : साहेसु ? ।। १२१ ॥ तं चिय मह वल्लहिया नेहो मह नत्थि अन्न- इत्थी । तुज्झ कए परिचत्तो सयलो ओरोह - नारि - जणो ॥ १२२ ॥ तहवि तुमं किं सुंदरि ! निव्भर-रत्तस्स देसि ता परिय पसिय सामिणि ! उट्ठिय मह देसु रुष्टाऽसि । कथय । । १२१।। तथापि त्वं किं सुन्दरि ! निर्भर रक्तस्य ददासि नाऽऽलापं ? | तस्मात् प्रसीद प्रसीद स्वामिनि ! उत्थिय महयं देहि प्रतिवचनम् || १२३|| अर्थ :- तो पण हे सुन्दरि ! मारा विषे अत्यंत रक्त एवी पण तुं शा माटे बोलती नथी. तो हवे हे स्वामिनी कृपा कर ! कृपा कर ! ऊट्ठीने मने प्रतिवचन आप. " हिन्दी अनुवाद :- तो फिर हे सुन्दरी ! मेरे पर अति रागवाली तूं क्यों बोलती नहीं है, अतः हे स्वामिनी ! कृपा कर ! कृपा कर ! उठकर मुझे प्रत्युत्तर दे । " पुत्र सहित विलाप Jain Education International 18 इमाइ जाव विलवइ विविहं राया सकलुण- सद्देण । ताव अहं संपत्ती रोवंतो तत्थ धणदेव ! ॥ १२४॥ For Private & Personal Use Only नालावं ? | पडिवयणं ।। १२३ । www.jainelibrary.org

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