Book Title: Shrimad Vallabh Vedanta
Author(s): Vallabhacharya
Publisher: Nimbarkacharya Pith Prayag

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Page 681
________________ ( ५६८ ) न चैवमथैतैरेव रश्मिभिरित्यवधारणानुपपत्तिरिति वाच्यम् । तस्याः श्रुतेरुत्क्रमणमात्र मार्गनिरूपकत्वात् तथाहि, तत्रोपक्रमे ह्यथ यत्र दस्माच्छरीरादुत्क्रामत्यैथतैरेव रश्मिभिरूद्ध आक्रमत इत्युच्यते । एतस्मात्पुरस्तादथ या एता हृदयस्य नाड्य इत्युपक्रम्य पिंगलस्यादित्यत्वमुक्त्वा तद् यथा महापथ आतत उभौ ग्रामौ गच्छन्ति इमं चामु चैवमेवता आदित्यस्य रश्मय उभौ लोको गच्छन्तीमं चामु चामुष्मादादित्यात् प्रतायन्ते ता आसु नाडोषु सृप्ता आभ्यो नाडीभ्यः प्रतायन्ते तेऽमुष्मिन्नादित्ये सृप्ता इत्यन्तेन वाक्येन नाडीषु रश्मिप्रचारमुक्त्वा अने, अथ यत्रतदस्मादित्यायुक्तम् । उपसंहारे च शतं चैकाहृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्द्धानमभिनिःसृतका तयोर्ध्वमापन्नमृतत्वमेति विध्वङङन्या उत्क्रमणे भवन्ति इति । एवमुपक्रमोपसंहाराभ्यामुत्क्रमणमात्रमार्गनिरूपकत्वं, नतु ब्रह्मप्रापकमार्गस्यातस्तदनुपपत्ति परिहारोऽनर्थकः । ऐसा नहीं कह सकते कि-रश्मियों में अवधारणा शक्ति संभव नहीं है। उक्त श्रुति में तो उत्क्रमण मार्ग का निरूपण रश्मि के रूपक से किया गया है उस श्रुति के उपक्रम में कहा गया है कि-"इस शरीर से जब उठता है तो इन रश्मियों के सहारे ऊपर उठता है ।" इसके पहिले "इन हृदय की नाड़ियों" ऐसा उपक्रम करके पिंगला नाड़ी का सूर्य रूप बतलाकर 'तद् यथा महापथ आतत" इत्यादि अन्तिम वाक्य से नाड़ियों में रश्मि का प्रचार बतलाकर "इस शरीर से जब उठता है" इत्यादि कहा गया है । प्रसंग के उपसंहार में कहते हैं कि-''एक सौ एक हृदय की नाड़ियों में से एक मूर्द्धा की ओर जाती है, उसके सहारे ऊपर जाकर जीव अमृतत्व प्राप्त करता है" इत्यादि उपक्रम और उपसंहार से निश्चित होता है कि-उत्क्रमण मार्ग का निरूपण मात्र ही किया गया है, ब्रह्मप्रापक मार्ग का निरूपण नहीं है अतः उसकी असंभावना के परिहार की आवश्यकता ही क्या है। नन्वनेकपर्वविशिष्टत्वेन मार्गस्यैकत्वे तं निरूपयन्ती श्रुतिः किंचित् पर्व निरूपयति क्वचिन्ने तिकथम् ? उपसंहारेण प्राप्स्यत इति तात्पर्येण तथेति चेद् ब्रवीषि तदा शाखान्तरमविदुषस्तदसम्भवेन तं प्रति श्रुतेन्यूनता पातः । नहि सर्वशाखाविदिदं प्रत्येव कथनमिति वक्तुमुचितम् । तस्याऽसंभवादतः स्वस्वशाखाज्ञानवन्तं प्रत्येव तथा । अध्ययनविधेरपि तावन्मात्र परत्वात् । शाखान्तरसंवादिपर्वकथनानुपपत्तिश्च । उपसंहारेणव तस्यापि प्राप्तिसंभवादतो विरुद्धदिक्कानां स्वस्वमार्गेणेक ग्रामप्राप्तिवदिहापि भवितुमर्हति स्वातंत्र्येण सर्वेमार्गब्रह्मप्राप्तिः।

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