Book Title: Saddharma sanrakshaka Muni Buddhivijayji Buteraiji Maharaj ka Jivan Vruttant
Author(s): Hiralal Duggad
Publisher: Bhadrankaroday Shikshan Trust
View full book text
________________
सद्धर्मसंरक्षक योग्य गुरु की खोज के लिये मनोमंथन
भावनगर के श्रीसंघ ने आपको हस्तलिखित शास्त्रों का भंडार दिखलाया । उसमें से जो ग्रंथ आपको पढने के लिये चाहिये थे वे दिये। आपने चौमासा विविध प्रकार के ग्रंथो के स्वाध्याय में व्यतीत किया। आपको तपागच्छ के महोपाध्याय श्रीयशोविजयजी के ग्रंथों को पढने से यह ज्ञात हुआ कि वे अपने समय के प्रकांड विद्वान थे । आपने सुना कि यशोविजयजी ने लगभग सौ ग्रंथों की रचना की है। आप अपनी बनाई हुई मुखपत्ती-चर्चा नामक पुस्तक में लिखते हैं कि "मैंने यशोविजयजी के मात्र पंद्रह-बीस ग्रंथ ही देखे हैं । इनको पढने से ज्ञात होता है कि उन्होंने इस पंचमकाल में भव्यजीवों का बहुत उपकार किया है। जिनशासन के सिद्धान्तों की मार्मिक खोज की है। इस दुषमकाल में ऐसे उपकारी पुरुष मिलने दुर्लभ है। जिनप्रतिमा-पूजन और मुँहपत्ती न बाँधने की मेरी मान्यता को पुष्ट करते हैं। नय-निक्षेप आदि गहन विषयों के पंडित थे । उपाध्यायजी ने जैनी नाम धरानेवाले पाखंडी मतों का भी परिचय लिखा है। स्वमत-परमत का स्पष्ट निर्णय किया है। इससे उपाध्यायजी सत्यतत्त्व-परीक्षक आत्मगवेषी प्रतीत होते हैं । यदि कोई यह कहे कि "उपाध्यायजी ने तो अपने ग्रंथों में उत्सूत्र-मान्यता का खंडन-मंडन किया है । इसलिये वे एक पक्ष की पुष्टि करके कदाग्रही द्वेषी सिद्ध होते हैं। उन्हें तो तपागच्छ से अनुराग था, अन्य गच्छों से द्वेष था, ऐसा प्रत्यक्षप्रतीत होता है।" परन्तु संसार में धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य, बन्ध-मोक्ष, भलाई-बुराई, सदाचारअनाचार, सुमार्ग-कुमार्ग, सुदृष्टि-कुदृष्टि, रागद्वेषभाव-वीतरागभाव
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013)/(1st-11-10-2013) (2nd-22-10-2013) p6.5
[96]