Book Title: Saddharma sanrakshaka Muni Buddhivijayji Buteraiji Maharaj ka Jivan Vruttant
Author(s): Hiralal Duggad
Publisher: Bhadrankaroday Shikshan Trust
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सद्धर्मसंरक्षक विनतीपत्र पढते ही और संदेशवाहक भक्तजनों के हृदयव्यथा से व्यथित नेत्रों से बहती हुए धारावाही अश्रुधाराओं ने आपको पंजाब की ओर रवाना होने के लिए विवश कर दिया। पंजाब की और विहार
वि० सं० १९१६ (ई० स० १८५६) के चौमासे उठे आपने मानकविजय और पुण्यविजय दो साधुओं को अपने साथ लेकर पंजाब की ओर विहार कर दिया । इस समय मुनिश्री मूलचन्दजी अहमदाबाद में और मुनिश्री वृद्धिचन्दजी भावनगर में थे । आपश्री के पंजाब की ओर विहार कर देने पर पंजाब से आए हुए संदेशवाहक श्रावक भाई पंजाब की तरफ रवाना हो गए और वहाँ पहुंचकर आपश्री पंजाब के लिए रवाना हो चुके हैं ये समाचार दोनों श्रीसंघो को कह सुनाए । समाचार पाकर पंजाब के भगतों के हर्ष का पारावार न रहा। ___ आपके अहमदाबाद से विहार कर जाने के बाद मुनिश्री वृद्धिचन्दजी भावनगर से पालीताना की यात्रा करके आपको और गुरुभाइयों को मिलने के लिए अहमदाबाद पधारे । यहाँ आने पर आपको मालूम हुआ कि गुरुदेव तो पंजाब की तरफ विहार कर गए हैं। यह जानकर गुरुदेव के दर्शनों से वंचित रहने का आपको अपार दुःख हुआ।
गुजरात से चलकर वि० सं० १९१७ (ई० स० १८६०) का चौमासा आपने पाली नगर (राजस्थान) में किया । और वि० सं० १९१८ (ई० स० १८६१) का चौमासा दिल्ली में किया ।
दिल्ली में गुजरांवाला से लाला कर्मचन्दजी दूगड शास्त्री आदि चार मुख्य श्रावक एवं रामनगर से बागाशाह आदि चार श्रावक
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013) 1(1st-11-10-2013) (2nd-22-10-2013) p6.5
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