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ऋषि मंडल-स्तोत्र-भावार्थ
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देवदेवस्य यच्चक्रं, तस्य चक्रस्य या प्रभा ॥ तया छादितसर्वांगं,-मा-मां-हिनस्तु डाकिनी २८
भावार्थ-देवों के भी देव एसे तीर्थकर भगवान जिनके चक्र अर्थात् समूहकी प्रभासे मेरा शरीर आच्छादित है, अतः मेरे शरीरको डाकिनी किसी प्रकारकी भी पीडा मत करो। ___इस तरहके तेरह श्लोक हैं जिनका अर्थ इसी श्लोक के अनुसार है, सिर्फ डाकिनी के नामकी जगह दूसरे नाम आये हैं सो अर्थका विचार करते समझ लेना चाहिए। (२८ से ४१ श्लोक तक) श्रीगौतमस्य-या-मुद्रा, तस्या-या-भुवि लब्धयः॥ ताभिरभ्युद्यतज्योतिरहः सर्वनिधीश्वरः ॥ ४२ ॥ __ भावार्थ-श्री गौतमस्वामी गणधर महाराज जो लब्धिवानथे, जिनकी लब्धि भूमिपर फैल रही है, जिनकी लब्धिरुप ज्योतिसे भी अत्यन्त प्रकाशमान ज्योति तीर्थकर भगवानकी है और वह तमाम प्रकारकी निधीका भण्डार है। पातालवासिनो देवाः देवा-भूपीठवासिनः॥ स्वर्वासिनोपि-ये देवाः-सर्वेरक्षन्तु-मामितः ४३
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