________________
11
श्री हंसविजयजी महाराज, ग्रन्थालय । नं. १५७७ । ६. श्री हरिसागरगणि, जयपुर का अन्तर्गत भण्डार । नं. १९ (दिनांक : संवत् १६५१) ।
श्री हरिसागरगणि, जयपुर का बाह्य भण्डार, नं. २० । लिमडी भण्डार, लिमडी, जि. अहमदाबाद, नं. २०४, ४५६ । जैनानन्द भण्डार, गोपीपुरा, सुरत, नं. १६२ । विमल गच्छ, उपाश्रय भण्डार, अहमदाबाद । डाभडा नं. ७ (पोथी नं. १४, १७)। इनके अलावा जिन सूचीपत्रों में इस टीका का उल्लेख है वह निम्न प्रकार है। डॉ. बुल्हेर का चौथा संकलन, जो “The Collection of 1873-1874”, इस नाम
से विख्यात है, नं. १५६ । २. जैन ग्रन्थावली प्रकाशक जैन श्वेताम्बर कॉन्फरन्स-Bombay Pydhoni, 19091 पत्र
नं. १४ । ३. प्रा. ए.बी. काथवटे, का रिपोर्ट । यह संकलन “The Collection of 1895-1902",
इस नाम से विख्यात है, जो अभी भाण्डारकर संशोधन केन्द्र में स्थित है, नं.
१०८९ । ३. टीका : अज्ञात । १. बीकानेर के महाराजा का ग्रन्थालय, नं. १६५३ । २. संस्कृत कॉलेज, बनारस, नं. ४७२, ७१७ । ३. श्री जैनानन्द पुस्तकालय, गोपीपुरा, नं. ७, ८ । ४. जेसलमेर भण्डार का पाण्डुलिपियों का सूचीपत्र, गायकवाड ओरियण्टल सिरिझ,
बडोदा, १९२३ में प्रकाशित, पत्र नं. ४३ (न. ३४०) । ४. पर्याय :
भाण्डारकर प्राच्य-विद्या संशोधन केन्द्र, पूणे, हस्तप्रत सूची Vol.XVII. pts. 1 से 3, Nos. 494; 495.
प्रस्तुत सम्पादन में उपयुक्त सामग्री को परिशिष्ट में स्थान दिया है । परिशिष्ट :
प्रथम परिशिष्ट में कल्पनियुक्ति का छाया एवं अनुवाद का ग्रहण किया है जो दशाश्रुतस्कन्धनियुक्ति : एक अध्ययन (लेखक-डॉ. अशोककुमार सिंह) से लिया है।