Book Title: Jain Shasan
Author(s): Sumeruchand Diwakar Shastri
Publisher: Bharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad

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Page 296
________________ २८८ जैनशासन प्रायः सभी विद्वान विषाताको इसलिये उलाहना देते हैं, कि उसने खलसबके निर्माण करनेकी अन चेष्टा क्यों की ? महाकवि हरिजन विधाताके अपवादको अपनी कल्पना-चातुरी द्वारा निवारण करते हैं। ये कहते हैं कि विधाताको विशेष प्रयत्न द्वारा खल जगत्का निर्माण करना पड़ा । इससे सत्पुरुषोंका महान् उपकार हुआ । बताओ सूर्यको महिमा अन्धकार अभावमें और मणिको विशेषता कांचके असदभावमें क्या प्रकाशित होती ? कवि कहते हैं "खलं विधात्रा सुजता प्रयत्नात् कि सज्जनस्योपकृतं न तेन । ते तमांसि धुमणिमणिर्वा विना न काचैः स्वगुणं व्यक्ति ।।" -०२० १, २२। दुनिया कहती है 'सल' का कोई उपयोग नहीं होता, किन्तु महाकवि 'खल' शब्द के विशिष्ट अर्थपर दृष्टि डालते हुए उसे महोपयोगी कहते है-- "अहो खलस्यापि महोपयोगः स्नेहQहो यत्परिशीलनेन । आकर्ण मापूरितमात्रमेताः क्षीरं क्षरन्त्यक्षतमेव गावः ॥" 4. श० १, २६ । आश्चर्य है, स्खलका (म्जलीका) महान उपयोग होता है । स्खल स्नेहसोही-प्रेम रहित (सली स्नेह-तैल रहित होती) होता है । इस खल खली) का प्रसाद है, जो गाएं पूर्णपात्र पर्यन्त लगातार क्षीररस प्रदान करती हैं। कबिन 'खलमें' दुर्जनके सिवाय स्खलीका अर्थ सोचकर कितनी सत्य और सुन्दर बात रच डाली। इस प्रकारका विचित्र जादू हरिचन्द्रकी रचनामें पद पदपर परिदृश्यमान होता है। बढ़ापेमें कमर झुक जाती है, कमजोरीके कारण पर पुरुष लाठी लेकर चलता है। इस विषयमें कयिकी उत्प्रेक्षा कितनी लोकोत्तर है, यह सहृदय सहज हो अनुभव कर सकते हैं "असम्भूतं मण्डनमङ्गयष्टेन्ष्टं क्व मे यौवनरत्नमेतत् ।। इतीव वृद्धो नतपूर्वकायः पश्यन्नधोऽधो भुवि बम्भ्रमीति ।।" __ -धर्मशर्माभ्युदय ५९।४ । मेरे शरीरका स्वाभाविक आभूषण योषनरत्न कहाँ खो गया इसी लिये ही मानो आगे से मुके हुए शरीर वाला वृद्ध नीचे-नीचे पृथ्वीको देखता हुआ चलता है। तार्किक पुरुष जर काश्य-निर्माण प्रवृत्ति करते हैं तब किन्हीं विरलोंको मनोहारिणी, स्निग्ध रचना करनेका सौभाग्य होता है। स्वामी समन्तभद्र सदृश

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