________________ सप्तमी दशा हिन्दीभाषाटीकासहितम् / 285 दीहकालियं- दीर्घकालिक रोगायक-रोगान्त की पाउणेज्जा-प्राप्ति करे तथा केवलि-पण्णत्ताओ-केवली से भाषित धम्माओ-धर्म से भंसेज्जा-भ्रष्ट हो जाय / मूलार्थ-एक रात्रि की भिक्षु-प्रतिमा को सम्यक्तयां पालन न करने वाले अनगार को ये तीन स्थान अहित के लिए, अशुभ के लिए, अक्षमा के लिए, अमोक्ष के लिए और आगामी काल के दुःख के लिए होते हैं / जैसे-उन्माद की प्राप्ति हो जाय, दीर्घ-कालिक रोगान्तक की प्राप्ति हो जाय तथा वह केवली-भाषित धर्म से भ्रष्ट हो जाय / टीका-इस सूत्र में प्रतिपादन किया गया है कि यदि भिक्षु बारहवीं भिक्षु-प्रतिमा का सम्यक्तया आराधन न करे तो उसको वक्ष्यमाण तीन स्थान अहित, अशुभ, अक्षमा, अमोक्ष तथा आगामी काल में दुःख के लिए होते हैं / देवादि के अनुकूल या प्रतिकूल उपसर्गादि के होने से उन्माद की प्राप्ति हो जाती है या दीर्घकाल तक रहने वाले रोगान्तक की प्राप्ति हो जाती है अथवा वह श्रीं केवली के प्रतिपादित धर्म से पतित हो जाता है। जो भिक्षु अपनी प्रतिज्ञा से भ्रष्ट हो जाता है वह श्रुत या चारित्र-रूप धर्म से भी पतित हो जाता है / अतः प्रतिमा का सम्यक्तया पालन न करने से उपर्युक्त तीन दोषों की अवश्य ही प्राप्ति हो जाती है / ____ 'तओ' और 'ठाणा' इन शब्दों का नपुंसक लिङ्ग होते हुए पुँल्लिङ्ग में प्रयोग किया गया है, किन्तु प्राकृत होने के कारण इसमें किसी प्रकार दोषापत्ति नहीं / ___ अब सूत्रकार वर्णन करते हैं कि यदि इस प्रतिमा का सम्यक्तया पालन किया जाय तो किन-२ गुणों की प्राप्ति होती है : एग-राइयं भिक्खु-पडिमं सम्म अणुपालेमाणस्स अणगारस्स इमे तओ ठाणा हियाए, सुहाए, खमाए, निसेस्साए, अणुगामियत्ताए भवंति / तं जहा-ओहिनाणे वा से समुपज्जेज्जा, मणपज्जव-नाणे वा से समुपज्जेज्जा, केवल-नाणे वा से असमुप्पन्न-पुव्वे समुपज्जेज्जा / एवं खलु एसा एग-राइया भिक्खु-पडिमा अहासुयं,