Book Title: Aradhak Banvano Marg
Author(s): Bhadrankarvijay
Publisher: Bhadrankarvijay

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Page 19
________________ महामंत्रनी अनुप्रेक्षा भय द्वष अने खेद जे आत्माना तात्त्विक स्वरूपना अज्ञानथी उत्पन्न थता हता ते आत्भानु शुद्ध अने तात्त्विक स्वरूप नु सम्यग् ज्ञान थतांनी साथे दूर थई जाय छे । नमस्कार मंत्रमा रहेला पांचे परमेष्ठिरो शुद्ध स्वरूपने पामेला होवाथी तेमनो नमस्कार ज्यारे चित्तमां परिणाम पामे छे, त्यारे आत्मामां सर्वनी साथे आत्मपणाथी तुल्यतानु ज्ञान तथा स्वस्वरूपथी शुद्धतानुज्ञान आविर्भाव पामे छे अने ते आविर्भाव पामतांनी साथे ज भय, द्वेष अने खेद चाल्या जाय छ । नमस्कारमंत्र वैराग्य अने अभ्यास स्वरूप छ। वैराग्य ए निर्धान्त ज्ञाननु फळ छे अने अभ्यास ए चित्तनी प्रशान्तवाहितानु नाम छ । चित्त ज्यारे प्रशमभावने पामे छे, विश्वमैत्रीवाळु बने छे, जे चित्तमां वैर विरोधनो एक अंश पण रहेतो नथी त्यारे ते अभ्यासरूप गणाय छे । वैराग्य ज्ञानरूप छे अने अभ्यास प्रयत्नरूप छ । ज्ञाननी पराकाष्ठा ते वैराग्य अने समतानी पराकाष्टा ते अभ्यास । ज्ञान अने समता ज्यारे पराकाष्ठाए पहोंचे छे, त्यारे मोक्ष सुलभ बने छ । नमस्कार मंत्र दोषनी प्रतिपक्ष भावना स्वरूप छ - श्रीनमस्कार मंत्र दोषनी प्रतिपक्ष भावना स्वरूप पण छ । योगशास्त्रमा का छे के यो यः स्याद्बाधको दोष स्तस्य तस्य प्रतिक्रियाम् । चिन्तयेद्दोषमुक्तेषु, प्रमोदं यतिषु व्रजन् ॥१॥ -यो.शा. प्र. ३. श्लो..-१३६ स्वोपज्ञ टीकाकार महर्षि प्रा श्लोकना विवरणमा फरमावे छ के'सुकरं हि दोषमुक्त-मुनिदर्शनेन प्रमोदात् प्रात्मन्यपि दोषमोक्षणम् ।' जे दोष पोताने बाधक लागे ते दोषने दूर करवानो इलाज ते दोषथी मुक्त थयेला मुनियोना गुणोने विषे प्रमोदभाव धारण करवो ते छ । दोषमुक्त यतिमोना गुणोने विषे प्रमोद भावने धारण करतो एवो जीव ते ते दोषोथी स्वयमेव मुक्त बनी जाय छ । पंच परमेष्ठि नमस्कार मंत्रनु स्मरण परमेष्ठि पदे बिराजमान महामुनिप्रोना गुणोने विषे बहुमान भाव उत्पन्न करे छे, तेथी स्मरण करनारना अंतःकरणमा रहेला ते ते दोषो स्वयमेव उपशांतिने पामे छ । काम दोषनो प्रतिकार स्थूलभद्र मुनिनु ध्यान छे। क्रोध दोषनो प्रतिकार गजर कुमाल मुनिनु ध्यान छे । लोभ दोषनो प्रतिकार शालिभद्र अने धन्य कुमारमा रहेला तप, सत्य, संतोष आदि गुणोनु ध्यान छ । ए रीते मानने जीतनार बाहुबलि अने ईन्द्रभूति, मोहने जीतनार जबू स्वामी अने वजकुंवर, मद-मान अने मायाने जीतनार मल्लीना, नेमनाथ अने भरत चक्रवर्ती आदि महान आत्माअोनु ध्यान ते ते दोषोने जीतावनार थाय छ ।

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