Book Title: Anusandhan 2008 06 SrNo 44
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 40
________________ जून २००८ ३३ स्तोतुमास्याम्बुजं नाथ ! यावदुत्सहते मम । सौख्याधिक्याय मन्येऽहं तावद्वाचो मनःश्रिताः ॥ ६॥ देवाकर्णय विज्ञप्तिं किमन्यैर्भूरिभाषितैः । सुधां हालाहलं मन्ये नेमे ! त्वदर्शनात्पुरः ॥ ७ ॥ नरं न (न रत्न ?) सिंहवन्मन्ये न तं सूरिं ब्रवीम्यहम् । यः प्रीतः प्रातरुत्थाय श्री नेमे ! त्वां न पश्यति ॥ ८ ॥ छः ।। (१४) श्रीमद्धर्मसूरि गुण स्तुति षट्त्रिंशिका जयइ स जएक्कदीवो वीरो सिवगमणलद्धअत्थमणो । जस्स विओए अज्जवि मोहतमंधो जणं रुयइ ॥ १ ॥ तयणु जयइ तं तित्थं गणहारिसुहम्मसामिणो भुवणे । मिच्छत्तविसपसुत्तं तिजयं पि हु बोहियं जेण ॥ २ ॥ निरुवमसव्वगुणेणं ठाणं विहिणा विणिम्मियं देहं । बहुअच्छेरयभूयं चरियं जस्सेह वित्थरियं ॥ ३ ॥ जंगमतित्थं संपइ कयजुग-लब्भंपि कहवि अवयरियं । सिरिधम्मसूरि सुगुरुं तं चिंतामणिसमं थुणिमो ॥ ४ ॥ तुम्ह गुणाणं सामिय ! पडिछंदं महियले पलोयंतो । अप्पाणं धीरविउं कत्थ न भमिओ चिरं बहुसो ॥ ५ ॥ सयलजलं जलहीओ कोइ कुसग्गेण इह तए घेत्तुं । जह तह जीहाइ अहं घेच्छं सामिय ! गुणे तुम्ह ॥ ६ ॥ तं नत्थि नाह ! तुम्हं कित्तीए जं न धवलियं ठाणं । गुणचंदवाइ वयणं एगं मुत्तूण तिजयंमि ॥ ७ ॥ पइ विरहतावियाए महिलाए पेइयं जहा ठाणं । दक्खिण(ण्ण)याए सुहगुरु ! तुम्ह विणा तह निओ सद्दो ।। ८ ॥ सिरि धम्मसूरि ! कह तुह सिंधू गंभीरिमोवमं जाओ । दट्ठण कोमुइं कामुओव्व जं भिंभलो सो हु ॥ ९ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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