Book Title: Anusandhan 2008 06 SrNo 44
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 55
________________ ४८. अनुसन्धान ४४ बत्तीसं इंदेहिं सुरसिहरिसिरम्मि सायरं न्हविओ। तिनि य वाससयाई कुमरत्तं पालियं तुमए ।। ५ ॥ करुणसरं विलवंती निरुवमरूयाणुरायपुनावि । रायमई कह चत्ता नाह ! तए एक्कहेलाए ॥ ६ ॥ वियरियवच्छरदाणो छटेण तुमं सहस्सपरिवारो। सावणसियछट्ठीए निक्खंतो नाह ! उज्जिते ॥ ७ ॥ चउपन्नं दिवसाइं छउमत्थो विहरिऊण उज्जिते । आसोयमावसाए संपत्तो उत्तिमं नाणं ।। ८ ।। मिच्छत्तविसाइन्नं भुवणं देसणसुहाइ बोहितो । सत्तसए वरिसाणं जाव तुमं विहरिओ एत्थ ॥ ९ ॥ पंचहिं छत्तीसेहिं सहिओ साहूण रेवयगिरिम्मि । आसाढअट्ठमीए सुद्धाए ते(तं) सिवं पत्तो ।। १० ।। धन्नोहं जयबंधव ! जमज्ज नयणाण गोयरं पत्तो । दुहदावतावियाणं निव्वावणअमियकुल्लसमो ॥ ११ ॥ तुह मुहचंदे दिढे लोयणकुमुएहि विहसियं अज्ज । असुहमणपंकएणं सहसच्चिय मीलियं नाह ! ।। १२ ॥ नवजलयसमे दिढे तणुमहिरोमंकुराण हेउंमि । भवभीरुत्तणहंसो सामिय ! मह माणसं सरइ ।। १३ ।। पई दिढे मह सामिय ! हरिसविसर्दृतसयलदेहस्स । नयणेहिंतो नीरं हिययाउ मलं गलइ जुगवं ॥ १४ ।। तुह उवरि अवन्नाए ईसालुत्तं वहंति जे हियए । सिद्धिपुरंधी तेच्चिय निब्भरनेहो पलोएइ ॥ १५ ॥ किं किं मए न पत्तं संसाए नाह ! दंसणे तुज्झ । चिंतामणिमि लद्धे अह चोज्जं केरिसं एयं ॥ १६ ॥ दो-सहस-जीहजुत्तो नाह ! सुवन्नोवि तुह गुणे थोउं । असमत्थो त्ति रि(वि?)याणिय नं लज्जाए वसइ हेट्ठो ॥ १७ ॥ तेच्चिय सवणा सवणा जे तुम्ह गुणे सयावि निसुणंति । तेच्चिय नयणा नयणा जे तुह रूअं नियच्छंति ॥ १८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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