Book Title: Anusandhan 2008 06 SrNo 44
Author(s): Shilchandrasuri
Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad

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Page 60
________________ जून २००८ ५३ जेहि तुमं जयबंधव ! हरिसविसटुंतनयणनलिणेहिं । एगंपि खणं दिट्ठो तिच्चिय धन्ना जए नूणं ॥ २ ॥ तेहि चिय मणुएहिं पत्तं नियजम्मजीवियाण फलं । भरुयच्छनयरसंठिय ! मुणिसुव्वय ! जेहिं तं दिवो ॥ ३ ॥ तुह नामसिद्धमंतं तिहुअणसिरितिलय ! सुव्वयजिणिद ! । जे झायंति तिसंझं ताणमसेसं वसं भवणं ॥४॥ जाइसरणाइ नाउं पच्छिमजम्मं सदसणाइ फडं। भरुयच्छे कारवियं मुणिसुव्वयसामियं वंदे ।। ५ ॥ न हु अत्थि किंपि नूणं एत्थ असज्झं कयावि मह नाह ! । आणंदबाहनिब्भरनयणेहिं जं तुमं दिट्ठो ॥ ६ ॥ सव्वंग रोमंचो जाण न फुरिओ जिणिंद ! पइ दिढे । ललुमि वि मणुयत्ते का हुज्जा निब्बुई ताण ? ।। ७ ।। परउवयारं मुत्तुं न हु सारं किंपि जीवलोगंमि । इय काउमस्सबोहं तं जिण ! भरुयच्छमोइन्नो ॥ ८ ॥ पइं पेच्छिऊण पहु ! महु(ह) अमंदआणंदगज्जयगिरस्स । अप्पा वि हु वीसरिओ किमहं अवरं थुणामि तओ? ॥ ९ ॥ जे परमाणू नूणं संसारे सारयं समावना । तेहिं तुमं निम्माओ नयणाणं तेण अमियसमो ॥ १० ॥ तं चिय नयणाण सुहं मणनिव्वुयमंदिरंपि तं चेव । मह जीवियंपि तं चिय सव्वस्सं पि य तुमं अहवा ।। ११ ।। अज्जं चिय कप्पतरू लद्धो चिन्तामणी वि अज्ज मए । अज्जं चिय ससिणेहा सिद्धिवहू मं पलोएइ ॥ १२ ॥ एवं वद्धावणयं एसो मह अज्ज ऊसवो परमो । जं भुवणरयण! सूरीहिं थुव्वसि सयावि तं नाह ! ॥ १३ ॥ छ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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