Book Title: Aatmanushasan
Author(s): Vijay K Jain
Publisher: Vikalp Printers

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Page 210
________________ Ātmānuśāsana आत्मानुशासन body is the soul and withdrawing from indulgence in external sense objects, one should enter the soul within. Note: See also Chakravarti Nayanar, A. (Prof.) (2009), ācārya Kundakunda's Pañcāstikāya-Sāra, verses 128-130, p. 108-109. शरीरमपि पुष्णन्ति सेवन्ते विषयानपि । नास्त्यहो दुष्करं नृणां विषाद्वाञ्छन्ति जीवितुम् ॥१९६॥ अर्थ अज्ञानी जन शरीर को पुष्ट करते हैं और विषयों का भी सेवन करते हैं। ठीक है - ऐसे मनुष्यों को कोई भी कार्य दुष्कर नहीं है - वे सब ही अकार्य कर सकते हैं। वे वैसा करते हुए मानो विष से जीवित रहने की इच्छा करते हैं। The ignorant men nourish their body and indulge in sense-pleasures. Nothing is impossible for such men; they indulge in all wrong-doings. While doing so, they wish to live on poison. ācārya Pūjyapāda's Istopadeśa: यज्जीवस्योपकाराय तद्देहस्यापकारकम् । यद्देहस्योपकाराय तज्जीवस्यापकारकम् ॥१९॥ जो (कार्य) जीव का (आत्मा का) उपकार करने वाले होते हैं वे शरीर का अपकार करने वाले होते हैं। जो शरीर का उपकार करने वाले होते हैं वे जीव का (आत्मा का) अपकार करने वाले होते हैं। १ पाठान्तर 162 EXPLANATORY NOTE - म्

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