Book Title: Aatmanushasan
Author(s): Vijay K Jain
Publisher: Vikalp Printers

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Page 248
________________ Atmānuśāsana आत्मानुशासन EXPLANATORY NOTE Ācārya Umāsvāmi's Tattvārthasūtra: मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥८-१॥ मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग - ये पाँच बन्ध के हेतु (कारण) हैं। Wrong-belief (mithyādarśana), non-abstinence (avirati), negligence (pramāda), passions (kaşāya) and activities (yoga) are the causes of bondage (bandha). ममेदमहमस्येति प्रीतिरीतिरिवोत्थिता । क्षेत्रे क्षेत्रीयते यावत्तावत्काऽशा तपःफले ॥२४२॥ अर्थ – 'यह मेरा है और मैं इसका हूँ', इस प्रकार का अनुराग जब तक ईति* के समान खेत (शरीर) के विषय में उत्पन्न होकर खेत के स्वामी के समान (आत्मा) आचरण करता है, तब तक तप के फलभूत मोक्ष के विषय में भला क्या आशा की जा सकती है? नहीं की जा सकती है। Infatuation for the body – 'the body is mine and I am its' - is like the calamity (iti) that inflicts the harvest. So long as such infatuation for the body persists in the soul, what hope is there for its liberation (moksa), the fruit of austerities (tapa)? * ईति अर्थात् खेत पर महामारी, अतिवृष्टि, अनावृष्टि आदि का संकट . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . 200

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