Book Title: Kaise Sulzaye Man ki Ulzan
Author(s): Chandraprabhsagar
Publisher: Jityasha Foundation
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रीललितप्रभ कैसे सुलझाएँ मन की उलझन चिंता तनाव को प्रतिशोध अहंकार घुटन चिंता, तनाव, क्रोध, अवसाद से छुटकारा दिलाने वाली चाबी For Personal & Private Use Only www.lainelibrary.org Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Personal & Private Use Only Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Full form of FAMILY FATHER AND MOTHER I LOVE YOU For Personal & Private Use Only Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कैसे सुलझाएँ । मन की उलझन तनाव, चिंता, क्रोध, अहंकार, प्रतिशोध, अवसाद, घुटन जैसे मनोविकारों से मुक्त कर अन्तर्मन की शांति प्रदान करने वाली अनमोल पुस्तक महोपाध्याय ललितप्रभ सागर For Personal & Private Use Only Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कैसे सुलझाएँ मन की उलझन श्री ललितप्रभ प्रकाशन वर्ष : जनवरी 2012 प्रकाशक : श्री जितयशा श्री फाउंडेशन बी-7, अनुकम्पा द्वितीय, एम. आई. रोड, जयपुर (राज.) आशीष : गणिवर श्री महिमाप्रभ सागर जी म. मुद्रक : बबलू ऑफसेट, जोधपुर मूल्य : 30/ For Personal & Private Use Only Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रवेश से पूर्व मन की शांति जीवन का स्वर्ग है । जिसका मन शांत है वह व्यक्ति सदा सुखी, प्रसन्न और आनंदित जीवन का मालिक होता है। उसके जीवन में हर सुबह ईद, हर दिन होली और हर रात दीवाली होती है। शांत मन व्यक्ति को बुद्ध बनाता है, वहीं अशांत मन व्यक्ति को बुद्ध । मन अपार शक्ति का मालिक है । इसे साधकर इसकी शक्तियों का सार्थक उपयोग किया जाए तो यह हमारे जीवन का बाधक बनने की बजाय मददगार बन जाता है। अगर एक ओर अकूत सम्पत्ति मिल रही हो और वहीं दूसरी ओर मन की शान्ति तो हमें चयन में विलम्ब नहीं करना चाहिए, झट से मन की शान्ति को स्वीकार कर लेना चाहिए। प्रस्तुत पुस्तक 'कैसे सुलझाएं मन की उलझन' हमारे लिए यही मार्गदर्शन कर रही है । T जीवन की सहजता और मन की उलझनों को सुलझाने के लिए ही 'कैसे सुलझाएं मन की उलझन' पूज्य श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज का पावन प्रवचन ग्रन्थ है । जीवन की दुरूहता को सरल बनाने के लिए और जीवन को सहज रूप से जीने के लिए ही पूज्य श्री कहते हैं कि मन की शान्ति न तो किराये पर मिलती है और न ही खरीदी जा सकती है जिसे जीने की कला आ जाती है वह मन की शांति को पा लेता है । व्यक्ति सदैव खुशियों से भरा रहे और जैसे सुखों के लिए बाहें फैलाता है, वैसे ही दुःख आने पर उनका स्वागत करे। जैसे हम कैमरे के सामने फोटो खींचवाते समय पंद्रह सैकण्ड के लिए मुस्कुराया करते हैं। वैसे ही हमें सदैव ही मुस्कान से भरे रहना चाहिए । 1 महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज आज देश के नामचीन विचारक संतों में हैं। प्रभावी व्यक्तित्व, बूंद-बूंद अमृतघुली आवाज, सरल, विनम्र और विश्वास भरे व्यवहार के मालिक पूज्य गुरुदेव श्री ललितप्रभ मौलिक चिंतन और दिव्य ज्ञान के द्वारा लाखों लोगों का जीवन रूपांतरण कर रहे हैं । उनके ओजस्वी प्रवचन हमें उत्तम व्यक्ति बनने की समझ देते हैं। अपनी प्रभावी प्रवचन शैली के लिए देश भर के हर कौम-पंथ-परम्परा में लोकप्रिय इस आत्मयोगी संत का शांत चेहरा, सहज भोलापन और रोम-रोम से छलकने वाली मधुर मुस्कान इनकी ज्ञान सम्पदा से भी ज्यादा प्रभावी है। For Personal & Private Use Only Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रस्तुत पुस्तक' कैसे सुलझाएं मन की उलझन में' मन की उलझनों को परत-दर-परत उघाड़ा गया है । इसमें तनाव, चिंता, क्रोध, अहंकार, प्रतिशोध और अवसाद जैसे मन के रोगों को न केवल पकड़ने की कोशिश की गई है, अपितु यह किताब उन रोगों का निदान भी करती है। इस किताब का हर पन्ना तनाव, घुटन और अवसाद से उबरने के लिए किसी टॉनिक का काम करता है। मधुर जीवन के लिए आवश्यक है कि हमारा मनोमस्तिष्क मधुर हो और मनुष्य ढोंग से जीने की बजाय ढंग से जीना सीख जाए। जीवन में तनाव और चिंता की चिता जला देनी चाहिए। ये हमारे शांति, सुख और सफलता के शत्रु हैं । पूज्यश्री हमारा मार्गदर्शन करते हुए कहते हैं कि मन में अनर्गल विचार न पालें, हर समय दुःखदायी विचारों में न डूबे रहें, सहनशीलता बढ़ाएं और हर परिस्थिति का स्वागत करें। तनाव, चिंता और क्रोध की तरह ही पूज्यश्री भय को मानसिक उलझन बताते हैं। दृढ़ निश्चय, आत्मविश्वास और साहस से व्यक्ति भय के भूत को भगा सकता है। पूज्यश्री का यह वचन हमारी जिंदगी में आत्मविश्वास की रोशनी प्रदान करता है कि किसी की जिंदगी में मौत दो बार नहीं आती और समय से पहले भी नहीं आती, हर व्यक्ति की मृत्यु सोमवार से रविवार के बीच ही होती है। फिर हम निरर्थक भयभीत होकर चित को अशांत क्यों करें। पूज्यश्री अहंकार और क्रोध को जीवन से हटाने की सलाह देते हुए कहते हैं कि ये विनाश के बीज हैं । जब व्यक्ति के अहंकार को चोट लगती है तब वह मानसिक तौर पर तिलमिलाता है और क्रोध में व्यक्ति दूसरों को दु:खी कर पाए या ना कर पाए पर स्वयं तो दुःखी हो ही जाता है। शांत मन का मालिक बनने के लिए प्रस्तुत पुस्तक में सुझाव दिया गया है कि हमें कर्मयोग से विमुख नहीं होना चाहिए, विपरीत स्थिति में मन को विचलित नहीं होने देना चाहिए और साथ ही हवाई किले नहीं बनाने चाहिए। धैर्य, आशा, आत्मविश्वास को जीवन का रत्न बताते हुए इस पुस्तक में पूज्यश्री ने सलाह दी है कि हम अपनी सोच को उन्नत रखें, प्रकृति तथा परमात्मा की व्यवस्थाओं में विश्वास रखें और अपने जीवन को सजगता तथा सहजतापूर्वक जीने का प्रयास करें। जो लोग मन की शांति के मालिक बनना चाहते हैं, एक आध्यात्मिक संत की यह पुस्तक उन लोगों के लिए एक गुरु की भूमिका अदा करेगी। किसी सद्गुरु की तरह इस पुस्तक को सम्मानपूर्वक अपने साथ रखिए और अपने मन की हर उलझन को सुलझाने का प्रयास कीजिए। .लता भंडारी 'मीरा' For Personal & Private Use Only Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अनुक्रम 1. कैसे सुलझाएं मानसिक तनाव की गुत्थियां 2. बाहर निकलिए चिंता के चक्रव्यूह से 3. क्रोध पर कैसे काबू पाएं 4. अहंकार : कितना जिएँ, कितना त्यागें 5. प्रतिशोध हटाएं, प्रेम जगाएं 6. सदाबहार प्रसन्न रहने की कला 7. जीवन की मर्यादाएं और हम For Personal & Private Use Only 1 22 44 67 85 108 119 Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ For Personal & Private Use Only Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कैसे सुलझाएँ मानसिक तनाव की गुत्थियाँ तनाव - मुक्ति के लिए मुस्कान वैसा ही सहारा है जैसे बूढ़े के लिए लाठी । हजार सुख-सुविधाएँ होने के बावजूद अगर आज का मनुष्य दुःखी और उदास नजर आता है तो जरूर वह किसी न किसी मानसिक अशांति से पीड़ित है । मनुष्य के पास इतनी सुविधाएँ कभी नहीं हुई होंगी जितनी आज हैं 1 इसके बावजूद हर मनुष्य के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का शोक और द्वंद्व झलकता है। सब कुछ होने के बावजूद अगर मन की शांति और जीवन की प्रसन्नता गायब है, तो उसका मुख्य कारण हमारे अन्तर्मन में पलने वाला तनाव है । तनाव हमारी मानसिक एकाग्रता को भंग कर देता है, जीवन की खुशहाली हमसे छीन लेता है । और तो और, दिन की रोटी और रात की नींद तक वह हराम कर देता है। आखिर यह तनाव क्या है, इसे जानबूझ कर क्यों पाला जाता है? क्या हैं इसके परिणाम और कैसे इससे उबर सकते हैं? आइए इन प्रश्नों के उत्तर हम अपने ही इर्द-गिर्द तलाशते हैं । रोगों का मूल, न दें इसे तूल हर व्यक्ति जो बाहर से स्वयं को स्वस्थ बता रहा है, वह जरा मानसिक निरीक्षण करे कि उसके भीतर कहीं तनाव का रोग छिपा हुआ तो For Personal & Private Use Only Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नहीं है? व्यक्ति पत्नी, परिवार और व्यवसाय से भी ज्यादा मानसिक उलझन, चिंता तथा तनाव से घिरा हुआ है। किशोर भी इसी तनाव से ग्रस्त हैं और वृद्ध भी। कोई जवान भी तो कहाँ बचा है इससे? कैंसर, एड्स और सार्स जैसी भयानक बीमारियाँ तो दुनिया में पाँच-दस फीसदी लोगों तक ही पहुंची हैं लेकिन तनाव ने तो हर किसी को घेर रखा है। दुनिया की एक प्रतिशत आबादी एड्स से ग्रस्त है, दो प्रतिशत आबादी कैंसर से ग्रस्त है, पांच प्रतिशत पोलियो से ग्रस्त है, दस प्रतिशत विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो सकती है लेकिन शायद इन सबको भी मिलाकर तनाव का प्रतिशत ज्यादा ही होगा। इस रोग की पीड़ा और इसकी उलझन को तो वही जान सकता है जो इससे गुजरा है। दुनिया के किसी भी रोग से ज्यादा पीड़ादायी है तनाव का रोग जो जीते-जी व्यक्ति को मारकर ख़त्म कर देता है। हमारे पचास प्रतिशत रोगों का मूल कारण तनाव है। सावधान रहें, चाहे सिर दुख रहा है या पेट, जरूर इसके मूल में किसी प्रकार का तनाव ही जुड़ा होगा। शरीर में रोग होता है, रोगी डॉक्टर के पास जाता है और डॉक्टर रोग के लक्षणों के आधार पर दवा देता है । वह रोग तो दब जाता है पर नया रोग पैदा हो जाता है। मन को स्वस्थ किये बगैर जब भी तन का इलाज होगावह निष्प्रभावी ही होगा। इलाज तो पहले मन का हो और उसके बाद तन का। अच्छी सेहत के लिए तनाव-रहित जीवन सर्वप्रथम आवश्यक है। तनाव से घिरा हुआ व्यक्ति यदि व्यापार भी करेगा तो उसका व्यापार भारभूत बनकर उसे असफलता ही दिलाएगा। तनावग्रस्त विद्यार्थी की मानसिक क्षमता और एकाग्रता क्षीण हो जाती है वह रातभर जग कर पढ़ाई करता है, उसके बावजूद अनुत्तीर्ण हो जाता है। तनावग्रस्त व्यक्ति अगर मिठाई और पकवान भी खाए तो वे बेस्वाद हो जाते हैं, तनाव ग्रस्त व्यक्ति अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं कर पाता है। वहीं जीवन का उत्साह, उमंग और आनंद जीवन की हर गतिविधि में जान डाल देता है। तनाव है घुन, बजाएँ शांति की धुन दुनिया में चाहे जितने आश्चर्य हों पर मानव-मस्तिष्क से बड़ा आश्चर्य For Personal & Private Use Only Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दूसरा नहीं हो सकता। लेकिन इंसान धोखा भी तो अपने इसी दिमाग के कारण खाता है। अस्वस्थ या असंतुलित दिमाग़ आदमी की सबसे बड़ी बीमारी है । प्रकृति ने हमें प्रज्ञा-शक्ति, ज्ञान-शक्ति मस्तिष्क के रूप में प्रदान की हैं लेकिन कभी-कभी छोटी-सी चर्चा, छोटी-सी बात, छोटी-सी घटना या छोटा-सा अवसाद मनुष्य के भीतर उस घुन का काम करता है जो भीतर ही भीतर गेहूँ को खाकर समाप्त कर देता है । यह अवसाद, बेचैनी, घुटन, तनाव उस दीमक का काम करते हैं जिससे कि मनुष्य भीतर - ही - भीतर समाप्त हो जाता है । बाहर से अखंड दिखाई देने वाला शरीर अंदर से खंड-खंड हो जाता है । यह रोग कभी भी लग सकता है। बचपन, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था या वृद्धावस्था में। बुढ़ापे में अगर यह रोग लग गया तो इससे निजात पाना और भी मुश्किल हो जाता है क्योंकि तनावग्रस्त बूढ़ा व्यक्ति अनेक प्रकार की शारीरिक बीमारियों से भी ग्रस्त हो जाता है । पर आज तनावरहित जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है। तनाव ने हमें शांति से जीवन जीना भुला दिया है और हमारे जीवन के भावात्मक जुड़ाव को समाप्त प्रायः कर दिया है। अखूट ऐश्वर्य एवं वैभव की चाह तथा रातों-रात करोड़पति बनने की चाहत लोगों में तनाव और अवसाद पैदा कर रही है । हमारी आधुनिक जीवनशैली हमें कुछ घंटे या कुछ दिन तो सुख देती है, उससे जीवन में अनियमितताएं एवं विसंगतियाँ ही पैदा हो रही हैं। अनियमित जीवन-शैली के कारण लोग शारीरिक बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं, उसी से मानसिक बीमारियाँ भी बढ़ी हैं और मनोरोग विश्वव्यापी समस्या बनता जा रहा है। हर तीसरे घर में तनाव और अवसाद ने अपनी जगह बना ली है । रोग-शोक का मूल : तनाव कोई व्यक्ति कितना भी सम्पन्न क्यों न हो, उसने भले ही शरीर पर आभूषण पहन रखें हों पर यदि थोड़ा-सा भी तनाव उसके अन्तर्मन में पल रहा हो तो उसका चेहरा अप्रसन्न ही नजर आता है। दुनिया का कोई भी व्यक्ति जो आत्महत्या करता है, उसका मूल कारण शारीरिक या पारिवारिक दुःख नहीं होता बल्कि व्यक्ति किन्हीं कारणों से स्वयं ही मानसिक रूप से दुःखी हो 3 For Personal & Private Use Only Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जाता है। जब वह तनावग्रस्त या अवसादग्रस्त हो जाता है तो वह आत्महत्या करने को मजबूर हो जाता है । समाचार पत्रों में हम रोज आत्महत्या की खबरों के बारे में पढ़ते हैं। मैं समझता हूँ इस तरह आत्महत्या करने वाली महिलाएँ दहेज के कारण ऐसा कदम कम उठाती हैं इसमें भी मूल कारण कहीं न कहीं मानसिक तनाव ही रहता है । 1 जितना तनावग्रस्त मनुष्य आज है उतना पहले नहीं था । हमारी दिन-रात की व्यवस्थाओं में ऐसी अनेक बातें और घटनाएँ होती हैं जो हमारे तनाव को बढ़ाती हैं। यह संभव नहीं है कि दुनिया में हर आदमी जो चाहे उसे वही मिल जाये । सम्पन्नता पहले भी थी और आज भी है । अभाव पहले भी थे और आज भी हैं । आज अगर कोई चीज बढ़ी है, तो हमारी आपसी खींचतान ही बढ़ी है, मानसिक द्वंद्व ही बढ़ा है। महानगरों में बसों और ट्रेनों से प्रतिदिन शुरू होती है जीवनयात्रा । दिनभर इतनी उलझन भरी रहती है कि व्यक्ति कुछ पल के लिए भी दिन में अपने मन और मस्तिष्क को विश्राम नहीं दे पाता । और उसमें भी रात को सोने से पहले देखे जाने वाले मारधाड़ या सेक्स से भरी फिल्में या टी.वी. के उल्टे-सीधे दृश्य मन की शांति को भंग करने में अहम् भूमिका अदा करते हैं । 1 शरीर के रोग और विकारों पर विश्व में तेजी से अनुसंधान हो रहा है और उनका निदान भी हो रहा है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार रोगों की उत्पत्ति केन्द्रों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जा रहा है इसलिए इन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। तनाव, अवसाद, घुटन, ईर्ष्या, चिंता ये सब विश्वभर के चिकित्सकों के लिए गंभीर चुनौती बन गए हैं। दमा हो या दाद, एग्जीमा हो या ब्लडप्रेशर, शुगर का बढ़ना हो या हार्ट प्रोब्लम, वास्तव में इनके पीछे चिंता, अवसाद और मानसिक तनाव छिपे रहते हैं । आधुनिकता की इस दौड़ में तेज रफ्तार की जिंदगी और दम घोटने वाला वातावरण हमें जहाँ मानसिक तनाव से ग्रस्त करता है वहीं तनाव रोगों के रूप में शरीर पर अपना प्रभाव दिखाता है। विश्व के कई चिकित्सकों ने मन और शरीर के रोगों पर काफी गहरा अनुसंधान किया है। एक बात साफ तौर पर सिद्ध हो गयी है कि भय, ग़म, For Personal & Private Use Only Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चिंता, ईर्ष्या, बुरे विचार और इनसे पैदा हुई बुरी तरंगें हमारे पेट और आंतों के रोगों को जन्म देती हैं वहीं स्वस्थ विचार हमारे शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं और स्वास्थ्य लाभ देते हैं। अच्छे विचार का परिणाम जहाँ अच्छी तरंगे, प्रसन्नचित्त मन तथा निरोगी जीवन होता है, वहीं बुरे विचार का परिणाम रोगी मन, बुरी तरंगे, दुःखी तथा रुग्ण जीवन ही निकलता है। निवारण से पहले समझें कारण तनाव क्यों होता है, यह जानने से पहले यह समझें कि तनाव क्या है? किसी एक बिंदु पर निरंतर व व्यर्थ का किया जाने वाला चिंतन जब चिंता का रूप धारण कर ले, मस्तिष्क में स्थान बना ले, इस स्थान बनाने का नाम ही तनाव है। जब कोई व्यक्ति किसी एक बात विशेष पर अपने क्षुद्र अहंकार के चलते बार-बार नकारात्मक सोच रखता है तब तनाव की स्थिति निर्मित होती है। ___ तनाव से घिरा हर व्यक्ति जानता है कि तनाव में जीना बुरा है पर तनाव को छोड़ पाना क्या हर किसी के हाथ में है? बुद्धि मारी जाती है जब व्यक्ति तनावग्रस्त होता है और बुद्धि का उपयोग करके ही व्यक्ति इस चक्रव्यूह से बाहर निकल सकता है। कैसे बचें तनाव से, इस पर हम कुछ समझें, उससे पहले उन कारणों को समझना जरूरी होगा जिनके कारण तनाव जन्मता है। भले ही हम तनाव के उपचार के लिए किसी चिकित्सक के पास चले जाएँ लेकिन कोई भी न्यूरोफिजिशियन इसका समूल समापन नहीं कर पाता है। डॉक्टर दवाइयाँ देता है पर वे दवाइयाँ तनाव-मुक्ति की नहीं होती, नींद की होती है। निद्रा में हमारा मस्तिष्क अक्रियाशील हो जाता है, उसे थोड़ी सी राहत भी मिलती है पर फिर से छोटा-सा निमित्त पाकर तनाव हम पर पुनः हावी हो जाता है। तोड़ें, चिंता का चक्रव्यूह तनाव का प्रमुख कारण है- चिंता। चिता की दहलीज पर व्यक्ति एक बार जलता है पर चिंता की दहलीज पर वह जीवन भर जलता रहता है। किसी सार्थक, सकारात्मक, विधायात्मक बिंदु पर किया गया चिंतन और मनन तो व्यक्ति को सार्थक परिणाम देता है किंतु निरर्थक, नकारात्मक बिंदु पर पुनः For Personal & Private Use Only Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पुनः किया जाने वाला चिंतन व्यक्ति के मनोमस्तिष्क में तनाव भर देता है। चिंता तो चक्रव्यूह है, अभिमन्यु की तरह हम इसमें प्रवेश करना तो जानते हैं पर इसमें से बाहर निकलना नहीं जानते । रात में सोये तो सुबह की चिंता, सुबह जागे तो दिन की चिंता, दोपहर में शाम की चिंता। चिंता का यह रोग मनुष्य को दिन में सुख की रोटी और रात में चैन की नींद नहीं लेने देता। चिंता और तनाव जब मन में समा जाते हैं तब व्यक्ति मनोरोगी भी हो जाता है। व्यक्ति चिंता से इतना ग्रस्त हो जाता है कि सारी सुख-सुविधाएँ भी उसे संतुष्ट नहीं कर पातीं। वह नींद की गोली लिये बिना सो ही नहीं सकता। मैं देखा करता हूँ कि लोग व्रत-उपवास करते हैं और दूसरे दिन जब व्रत खोलेंगे तब क्या खाएँगे, यही सोचा करते हैं। आज व्रत किया है लेकिन, कल के भोजन की चिंता कर रहे हैं। अरे, जब कल आएगा तब ही सोचना न; अभी से क्यों चिंता कर रहे हो? । __ अंतर्मन में पलने वाली बेवजह की चिंताएँ तनाव की जड़ हैं। क्रोध तो हमारे संबंधों को कमजोर करता ही है पर चिंता हमारी देह के साथ दिमाग को भी कमजोर करती है। चिता व्यक्ति को एक बार जलाती है लेकिन चिंताग्रस्त व्यक्ति जीवन में बार-बार मरने को मजबूर होता है। यही वह चिंता है जो धीरे-धीरे हमारे मनोमस्तिष्क को अवरुद्ध कर देती है। जैसे घुन गेहूँ को भीतर ही भीतर खाकर खत्म करती है ऐसे ही चिंता हमें खोखला बना देती है। व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को लेकर चिंतित होता है पर, दुनिया में कोई भी चिंता किसी समस्या का समाधान नहीं बनी है। अगर हम समाधान का हिस्सा बनना चाहते हैं तो चिंता की बजाय चिंतन को अपने जीवन में स्थान दें। चिंता जहाँ हमारी मानसिक क्षमता को अवरुद्ध करती है, वहीं चिंतन उसे प्रखर करता है। तनाव और चिंता यकायक हों तो आदमी उससे छुटकारा भी पा सकता है लेकिन ये अंगुली पकड़कर आते हैं, और धीरे-धीरे हमारे, तन-मन को अपने आगोश में समेट लेते हैं। तनावग्रस्त व्यक्ति की स्थिति वैसी ही हो जाती है जैसी जाले में फंसी मकड़ी की। जिसने जाला भी खुद बनाया और फँसी भी खुद। For Personal & Private Use Only Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भगाएं, भय का भूत तनाव का दूसरा कारण है भय। मनुष्य के भीतर भय की ऐसी ग्रंथि निर्मित हो जाती है कि वह हाथी और शेर जैसी शक्ति रखते हुए भी गीदड़ से भी पस्त हो जाता है। कमजोर शरीर पर मजबूत मन जहाँ निश्चित ही विजयी होता है, वहीं इसके विपरीत मजबूत शरीर और कमजोर मन जीवन में पराजय का मुख्य कारण बनता है। हमें महाभारत का वह घटनाक्रम याद है। जब अर्जुन जैसा धनुर्धर योद्धा युद्ध-भूमि में लड़ाई के कुछ समय पूर्व ही शत्रुसेना में अपने परिजनों को देखकर बैचेन हो जाता है और कृष्ण से कहता है, 'प्रभु, युद्ध भूमि में अपने परिजनों को देखकर मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुँह सूख रहा है, शरीर काँप रहा है। प्रभु, मेरा गांडीव मुझसे उठाया नहीं जा रहा है। मुझे चक्कर आ रहे हैं। और तो और, मैं खड़ा भी नहीं रह पा रहा हूँ।' ये सारे लक्षण चिंता और घबराहट के ही तो हैं। चिंता और भय से ग्रस्त व्यक्ति उन निमित्तों से मुकाबला करने की बजाय अपने आपको कमजोर महसूस करता है। उसे लगता है कि उसके हाथ-पाँव ठंडे पड़ते जा रहे हैं। भय की स्थिति में मुँह और गला सूखता है, भूख कम हो जाती है और आमाशय में रोग पैदा होने शुरू हो जाते हैं। भयग्रस्त व्यक्ति सामने वाले का मुकाबला करना तो दूर, सही ढंग से किसी बात का जवाब भी नहीं दे पाता। जैसे सूखी घास के ढेर में लगी छोटी-सी चिंगारी शुरुआत में थोड़ी ही दिखाई देती है लेकिन धीरे-धीरे पूरी घास को ही राख में तब्दील कर देती है; ऐसी ही स्थिति भयग्रस्त व्यक्ति की हो जाती है। व्यक्ति को जीवन में सबसे बड़ा भय होता है मृत्यु का । तुम्हें किसी ने फोन पर धमकी दे दी, रात भर तुम्हें नींद नहीं आयी। डर गये यह सोचकर कि पता नहीं, अब क्या होगा? भला इससे डरना कैसा? दुनिया में कोई भी व्यक्ति जन्मा है तो उसका मरना तय है और हर व्यक्ति सोमवार से रविवार के बीच ही गया है। आंठवाँ वार तो किसी के लिए नहीं हुआ। जिनके भीतर भय की गुत्थी है, वे सदैव इस बात को याद रखें कि मारने वाले के सौ हाथ होते हैं पर बचाने वाले के हजार हाथ। समय से पहले हमें कोई मार नहीं सकता। भय For Personal & Private Use Only Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ होता है रोग का, विशेषकर उन रोगों का जो लाइलाज होते हैं- जैसे कैंसर, एड्स। इन खतरनाक रोगों के बारे में सोचकर भी व्यक्ति भयभीत हो जाता है। अब तक के अनुभव हमें यह बता चुके हैं कि भयभीत व्यक्ति जहाँ उन रोगों से घिरकर जल्दी पस्त हो जाता है, वहीं व्यक्ति निर्भय चित्त होकर इन पर कुछ अंश तक विजय भी प्राप्त कर लेता है। तेज का नाश करे उत्तेजना उत्तेजना तनाव का तीसरा कारण है। कुछ लोगों की आदत पटाखों की तरह होती है कि एक तीली लगाई और बम फूटा। उन्हें कुछ भी कहा नहीं कि बस लड़ने-भिड़ने को पहले से ही तैयार! ऐसा लगता है कि बस अब बरसे कि तब बरसे। जो छोटी-छोटी बातों में उत्तेजित हो जाते हैं, उनके जीवन में शांति का अभाव होता है। हमने आज के युग में तकनीकी चमत्कारों से बहत कुछ पाया है किन्तु यदि कुछ खोया है तो केवल मन की शांति को। सुखसुविधा की चकाचौंध में शांति के मार्ग, मौन के मार्ग, साधना के मार्ग और जीवन की सहजता के मार्ग हमारे हाथ से फिसल गए हैं। चारों ओर अशांति का साम्राज्य है। आशंका, आवेश, आग्रह ये सब उत्तेजना के इर्द-गिर्द घूमते. रहते हैं। जो व्यक्ति किसी के दो कड़वे शब्दों को शांति से सहन नहीं कर सकता वह जीवन में कभी भी मन की शांति का मालिक नहीं बन सकता। दूसरों की बातों पर गौर न करते हुए अपनी ही बात का आग्रह करते रहना और छोटी-मोटी बातों में क्रोधित और उत्तेजित हो जाना तनाव के प्रारम्भिक लक्षण हैं। भगवान महावीर अगर अपने कानों में कीलें ठुकवा सकते हैं और श्रीकृष्ण शिशुपाल की निन्यानवें गलतियों को माफ कर सकते हैं तो क्या हम किसी के दो कड़वे शब्द सुनने और किसी की नौ गलतियों को माफ करने का बड़प्पन नहीं दिखा सकते? परिवार में रखिए वैचारिक संतुलन तनाव का एक और कारण होता है जो केवल व्यक्ति को ही नहीं पूरे परिवार और समाज को तनावग्रस्त कर देता है और वह है 'हमारा वैचारिक असामंजस्य'। हम एक दूसरे के विचारों का न तो सम्मान कर पाते हैं और न 8 For Personal & Private Use Only Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ही उन्हें सही अर्थ में समझ पाते हैं। ऐसी स्थिति पिता-पुत्र, भाई-भाई, सासबहू, पति-पत्नी इन सब में मानसिक दूरियाँ बढ़ती हैं और इनके पारस्परिक सम्बन्ध वैसे ही हो जाते हैं जैसे सूखे तालाब की मिट्टी में पड़ी दरारें। परिवार का हर व्यक्ति अगर अपने आपको ज्यादा बुद्धिमान मानेगा और स्वयं को बड़ा समझकर अपने अहंकार की पुष्टि करने का प्रयास करेगा तो आप यह मानकर चलें कि वह घर, घर नहीं अपितु सूखा मरुस्थल होगा जिसमें हर सदस्य एक-दूजे के प्रति शक, आक्रोश और विपरीत भावना से भरा होगा। वे साथ रहेंगे पर दूर-दूर। एक घर में रहेंगे पर एक दूजे से कटकर तनावग्रस्त होंगे। किसी को पति के कारण तनाव, किसी को सास के कारण, किसी को बहू के कारण तनाव होगा तो कहीं देवराणी-जेठाणी में अनबन के कारण तनाव होगा। आप अपने द्वारा परिवार को तनाव दे रहे हैं या परिवार के द्वारा आप तनाव में हैं, दोनों ही स्थितियों में हमारा घर नरक बन सकता है। न अतीत, न भविष्य; केवल वर्तमान ___ तनाव का एक और कारण है, 'अतीत की स्मृति और भविष्य की कल्पना।' उसने मेरे साथ ऐसा किया, अब मैं उसके साथ वैसा करूँगा। अगर उस समय मैंने वैसा नहीं किया होता तो अभी ऐसा नहीं होता। यदि उस समय ऐसा कर देता तो ठीक रहता। पता नहीं, इस तरह की कितनी यादें व्यक्ति अपने मन में संजोए रखता है। जो बीत गया उसे वापस लौटाया नहीं जा सकता तो उसे याद करने का क्या औचित्य है? और जो होने वाला है, वह होकर ही रहेगा तो उसके बारे में व्यर्थ का तनाव या चिंता पालने का क्या औचित्य? जो बीत चुका है उस पर विलाप करने से क्या लाभ और जो अभी उपस्थित नहीं है उसकी कल्पना के जाल क्यों बुनना? माह बीत जाता है कलेन्डर से पन्ना फाड़ देते हैं, वर्ष बीत जाता है तो कलेन्डर को ही हटा देते हैं लेकिन व्यक्ति अपने भीतर पलने वाली उत्तेजना को, अनर्गल विचारों को, दूसरों के प्रति होने वाले वैमनस्य को हटा नहीं पाता। साठ वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति अपने अतीत को बहुत अधिक याद करता है और सबसे अधिक चिंता और तनाव से ग्रस्त होता है। जीवन की शेष For Personal & Private Use Only Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आयु चिंता और तनाव में बीतती है क्योंकि हमारी अपेक्षाएँ अपनी संतानों से बढ़ जाती हैं और जब अपेक्षा उपेक्षा में बदल जाती है तो तनाव उत्पन्न होता है। अच्छा होगा यदि हम औरों से अपेक्षा न पालें। जो, जितना, जैसा मिल जाए, हो जाए उसी में प्रसन्न रहने की कोशिश करें। जीवन में जो मिला है, जैसा मिला है उसे प्रभु का प्रसाद मानकर जो स्वीकार कर लेता है वह कभी तनावग्रस्त नहीं होता। मनुष्य दूसरी चिंता करता है 'भविष्य की।' वह न जाने किन-किन कल्पनाओं में खोया रहता है। जो कुछ है नहीं, उसके ही सपने बुनता है। वह अपनी कल्पनाओं के जाल में मकड़ी की तरह उलझा रहता है। न अतीत में जाओ और न भविष्य की रूपरेखा बनाओ अपितु वर्तमान में जीओ। जैसा हो रहा है, उसको वैसा ही स्वीकार कर लो। जिसने कल दिया था उसने कल की व्यवस्था भी दी थी और जो कल देगा वह उस कल की व्यवस्था भी अपने आप देगा। तुम क्यों व्यर्थ में चिंता करते हो, तुम्हारी चिंता से कुछ होता भी नहीं है। तुम व्यर्थ के विकल्पों में क्यों जीते हो? क्यों स्वयं को अशांत और पीड़ित कर रहे हो? तुम्हारे किये कुछ होता नहीं है क्योंकि जो प्रकृति की व्यवस्थाएँ हैं वे अपने आप में पूर्ण हैं । माँ की कोख से बच्चे का जन्म बाद में होता है किन्तु उसके दूध की व्यवस्था प्रकृति की ओर से पहले ही हो जाती है। । तनाव के और भी कई कारण होते हैं। सभी कारणों में हमारी नकारात्मक सोच जुड़ी है। वह हमारी बुद्धि को विपरीत बना देती है। अत्यधिक काम का बोझ, गलाकाट स्पर्धा, क्षमता से अधिक कार्य भी तनाव के कारण बन सकते हैं। हीन-भावना भी तनाव का कारण बनती है। सुंदरता, कद-काठी, अंगभंग, बीमारियाँ या शारीरिक क्षमताओं को लेकर हीन-भावना उत्पन्न हुआ करती है। चिंता, भय, अतिलोभ, उत्तेजना, विचारों का असामंजस्य- ये सब तनाव के मूल आधार हैं । तनाव का पहला प्रभाव पड़ता है हमारे मनोमस्तिष्क पर। उससे हमारा आज्ञाचक्र शिथिल होता है। आज्ञाचक्र को हम शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं या दर्शनकेन्द्र भी कहते हैं। जैसे ही व्यक्ति तनाव का 10 For Personal & Private Use Only Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शिकार होता है, वैसे ही आज्ञाचक्र शिथिल हो जाता है। उसे लगता है जैसे उसे चक्कर आ रहे हैं, सिर में दर्द हो रहा है और उसका मन कमजोर पड़ता जा रहा है। तनाव के रोग : दिल से दिमाग़ तक __तनाव मन का सबसे भयंकर रोग है। रोगी मन ही शरीर को बीमार करता है। निश्चित तौर पर तनाव से उबरा जा सकता है, पर इससे पूर्व यह समझना जरूरी है कि वह हमारे तन, मन और जीवन पर क्या प्रभाव डालता है? तनाव के वश में है कि हमारे गृहस्थ जीवन को दुःखदायी कर दे, जीवनविकास को रोक दे, मन की प्रसन्नता को भंग कर दे और एकाकीपन में जीने को मजबूर कर दे। पता नहीं ऐसे कितने ही काम तनाव कर देता है। आप अगर स्वयं गहरे तनाव में जी रहे हैं या किसी तनावग्रस्त व्यक्ति के साथ जीने का मौका मिला है तो तनाव-जनित रोगों को जरूर देखा होगा। दिल की धड़कन से लेकर पेट और आँतों तक की बीमारियों को तनाव पैदा करता है। किसी को यह कब्ज की बीमारी कर देता है तो किसी को दस्त की। किसी के गले में रोग पैदा कर देता है तो किसी के कमर और जोड़ों में। थकान, कमजोरी, स्मरण-शक्ति का ह्रास, आत्मविश्वास में कमी और अनिद्रा जैसी बातें तो यह हर किसी के साथ कर ही देता है। तनावग्रस्त व्यक्ति जब देखो तब उदास ही मिलता है। खुशियों के अवसर आने पर भी वह ग़म और उदासी में ही जीता है। काम-काज में उसकी दिलचस्पी नहीं रहती। किसी से बात करना भी वह पसंद नहीं करता। हर समय वह एक विशेष उदासी में जीता है। अगर कोई चेहरा लटकाकर बैठा हो तो एक बच्चा भी पछ लेगा, 'क्या बात है, किस बात का टेंशन है?' जैसे तेज धूप में फूल मुरझा जाते हैं, वैसे ही तनाव में हमारा चेहरा। चिकित्सकों को चाहिये कि जब वे किसी के शरीर का इलाज करें उससे पहले उसके मन का इलाज जरूर कर लें। तनाव सीधे तौर पर दूसरा प्रभाव डालता है हमारी रोगों से लड़ने की क्षमता पर । वह हमारी रोग-निरोधक क्षमता को घटा देता है। अमेरिका में डॉ. 11 For Personal & Private Use Only Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बौक ने लगभग 1500 छात्रों पर एक प्रयोग किया। उन्होंने ऐसे छात्रों को चुना जो सदैव जुकाम और पेट के रोग से ग्रस्त रहते थे। रोगियों से गहरी बात करने पर उन्हें पता लगा उनमें प्रायः अधिकांश विद्यार्थी ऐसे थे जो भय, गम, अवसाद, निराशा या तनाव से पीड़ित थे। डॉ. बौक ने प्रयोग किया और आश्चर्यजनक परिणाम सामने आये कि जुकाम और पेट के रोग तब मिट गये जब मनोवैज्ञानिक समझ देकर भय और तनाव से छात्रों को मुक्त कर दिया गया। मन का तन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, अगर तनावग्रस्त व्यक्तिं को उसके रोग के मूल कारणों का पता चल जाये तो वह शीघ्र स्वस्थ हो सकता है। भय, चिंता, फिक्र ये सबसे पहले हमारे दिमाग पर अपना प्रभाव डालते हैं। शरीर की संचालन-व्यवस्था में मस्तिष्क का सबसे बड़ा हाथ है। विपरीत मनोभाव मानसिक खिंचाव पैदा करते हैं। मानसिक खिंचाव हमारे शरीर पर अपना विपरीत प्रभाव छोड़ता है। परिणामस्वरूप शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग पनपने शुरू हो जाते हैं। माइग्रेन की समस्या का मूल कारण भी तनाव ही है। साथ ही रोगप्रतिरोधिक क्षमता में कमी आने के कारण आए दिन कई तरह के रोग पैदा हो जाते हैं। उससे याददाश्त तो कमजोर होती ही है। मन के हारे हार है तनाव पहला प्रभाव डालता है व्यक्ति की कार्यकुशलता पर। जैसेजैसे व्यक्ति इसके मकड़जाल में उलझता है, उसके मनोबल में कमजोरी आनी शुरू हो जाती है। हमने कई बार देखा है कि जब किसी टूर्नामेंट में दो देशों की टीम एक मैदान में उतरती हैं तो लोग पहले ही अंदेशा लगा लेते हैं, खिलाड़ियों के चेहरे को देखकर कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा? जो मैदान में उतरने से पहले ही दूसरी टीम को लेकर मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया है, उसका हारना तय हो जाता है। अगर आप दूसरी टीम से जीतना चाहते हैं तो मैदान में उतरने से पहले ही उस पर इतना मनोवैज्ञानिक दबाव डाल दीजिये कि मानसिक रूप से वह स्वयं को हारा हुआ महसूस करने लग जाये। ऐसी स्थिति में ____12 For Personal & Private Use Only Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ खिलाड़ी तनाव - ग्रस्त हो जाता है और उसका आत्म-विश्वास कमजोर हो जाता है। मानसिक रूप से हारा हुआ व्यक्ति मैदान में भी हारता ही है । हमारे जीवन की असफलताओं का पहला कारण है हमारी मानसिक कमजोरी । तनाव ग्रस्त व्यक्ति एक विशेष प्रकार की परेशानी से ग्रस्त होता है और हर समय उदास रहता है। अपने आप से ही अप्रसन्न रहना, खुद को हीन समझना और उन लोगों से दूर रहना जो हमारी प्रसन्नता के कारण हैं, ये सब तनाव के स्पष्ट प्रभाव हैं । उदासी और अप्रसन्नता से हमारी समझ, तर्कशक्ति और वैचारिक क्षमता कमजोर हो जाती है और हर समय व्यक्ति का दृष्टिकोण निराशावादी हो जाता है। ऐसा लगता है जैसे वह कुछ नहीं कर पाएगा। छोटी-मोटी बातों पर वह अपने-आपको अपराधी मानता है और उसका शरीर कुम्हलाया-सा हो जाता है । उसे भोजन करने के लिए पूरी भूख नहीं लगती और भोजन करने बैठ जाए तो भोजन स्वादिष्ट नहीं लगता । शायद मन की शांति का सुकून तो उसे सपने में भी नहीं मिल पाता । भरोसा रखें, प्रकृति की व्यवस्था पर ऐसा नहीं है कि तनाव से छुटकारा नहीं पाया जा सकता। आवश्यकता सिर्फ अपने आप पर नियंत्रण रखने की और अनुकूल वातावरण बनाने की है । उससे मुक्ति पाने के लिए जीवन में थोड़ा-सा परिवर्तन ही पर्याप्त होता है । आखिर कैसे बचें तनाव से - शायद हर व्यक्ति के भीतर यह प्रश्न उठता है । अगर थोड़ी-बहुत सावधानियाँ रखी जायें तो हम तनाव से बच सकते हैं । तनाव-मुक्ति का पहला उपाय है निश्चलता - 'रिलेक्शेसन'। अगर आप चिंताग्रस्त या भ्रमित हैं, कई प्रकार के मानसिक दुःखों के शिकार हैं और परिणामस्वरूप शरीर में कई प्रकार के रोग प्रभावी हो गये हैं तो ऐसी स्थिति में निश्चलता, विश्राम, शरीरभाव से मुक्ति हमें रोग - मुक्त कर सकती है। पहले चरण में मैं मन की निश्चलता के बारे में कहना चाहूँगा । व्यक्ति सदैव यह सोचकर बेफिक्र रहे कि जो हुआ वह तो होना ही था इसलिए हो गया और जो नहीं हुआ उसका होना संभव नहीं था इसलिए नहीं हुआ । किसी वस्तु के मिलने पर गुमान न हो और खो जाने पर गिला न हो । प्रकृति की अपनी 13 For Personal & Private Use Only Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जबरदस्त व्यवस्था होती है और वह प्रायः हमारी हर जरूरत को पूरा करती है। बच्चा पीछे पैदा होता है और उसके लिए माँ के आँचल में दूध की व्यवस्था पहले होती है। दुनिया में असंख्य जानवर जन्म लेते हैं, प्रकृति उनकी भी व्यवस्था करती है। माना कि जानवर खेती नहीं कर सकते पर मनुष्य अपने लिए अन्न पाने के लिए जब खेती करता है तो धान पीछे आता है किंतु जानवरों के लिए घास पहले उग आती है और इस तरह मनुष्य एवं पशु- दोनों के आहार की व्यवस्था प्रकृति द्वारा हो जाती है। करें, तनावोत्सर्ग-ध्यान तनाव से बचने या उबरने के लिए प्रतिदिन 15 मिनट ही सही भौंहों के बीच आज्ञाचक्र पर अपनी मानसिकता को एकाग्र करने की कोशिश करें। उससे हम 2-3 माह में ही तनाव से उबर जाएँगे। अगर आपको लगता है कि तनाव ने आपको गहरे जकड़ लिया है तो आप शरीर की निश्चलता का ध्यान करें। निश्चलता का अर्थ होता है शरीर की वह अवस्था जब हमारे सम्पूर्ण शरीर की माँसपेशियाँ और मस्तिष्क की सम्पूर्ण कोशिकाएँ पूर्ण विश्राम में हों। निश्चलता हमारी माँसपेशियों के तनाव को समाप्त करती है। अगर आप किसी भी प्रकार के तनाव से ग्रस्त हैं तो आप तनावोत्सर्ग ध्यान करें। इस ध्यान की प्रक्रिया से गुजरना मन-मस्तिष्क के लिए काफी उपयोगी होता है। तनावोत्सर्ग ध्यान करने के लिए किसी शांत स्थान का चयन करें। ऐसा कोई स्थान या कमरा चुनें जहाँ किसी तरह का कोई व्यवधान न हो। वैन्टीलेटर के अलावा कमरे के दरवाजे एवं खिड़कियाँ बंद भी रख सकते हैं ताकि हल्का-सा अँधेरा हो जाये। यदि रात को कर रहे हों तो खिड़कियाँ खुली भी रखी जा सकती हैं। फर्श पर कोई आरामदेय आसन या गद्दा बिछा लें ताकि लेटने में तकलीफ न हो। सावधान रहें कि इस विधि से गुजरते समय ढीले कपड़े पहनना ज्यादा उचित रहता है। अगर सर्दी हो तो कोई शाल भी ओढ़ सकते हैं और गर्मी हो तो हवा की व्यवस्था कर सकते हैं। आप तनावोत्सर्ग विधि प्रारम्भ करें। बड़े आराम से लेट जाएँ। दानों पाँव थोड़े 14 For Personal & Private Use Only Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ फासले पर रहें, दोनों हाथ शरीर से थोड़े दूर और सीधे रखें, हथेलियाँ ऊपर की ओर हों। हथेलियाँ इतनी ढीली छोड़ दें कि अंगुलियाँ स्वतः ही थोड़ी-सी मुड़ जाएँ। इस विधि में कुछ बातों की सावधानी रखनी उचित रहती है । साँस आराम से और आहिस्ते-आहिस्ते लें और धीरे-धीरे उसे सहज छोड़ दें। साँस बाहर निकालने के बाद अंदर खींचने की जल्दी न करें और अंदर खींचने के बाद बाहर निकालने की भी जल्दी न करें। दोनों ही प्रक्रियाओं में आप जितनी सहजता से सांस को अंदर करने के बाद रोक सकते हैं तो अवश्य रोंके । सबसे पहले शरीर को ढीला छोड़कर मधुर मुस्कान लें। शरीर निर्जीव वस्तु की तरह पड़ा रहे और मधुर मुस्कान जारी रहे। अगर हँसने का जी कर रहा है तो किसी अच्छे से चुटकले या घटनाप्रसंग को यादकर हँस भी लें और फिर स्वसंबोधन द्वारा अपने शरीर को तनाव - मुक्ति की प्रक्रिया में प्रवेश करने दें। धीरे-धीरे श्वास लेते हुए पूरे शरीर में कसावट दें। श्वास को रोकते हुए सम्पूर्ण ऊर्जा के साथ समस्त माँसपेशियों को नाभि की ओर दो क्षण के लिए खिंचाव दें और तत्क्षण उच्छ्वास के साथ शरीर ढीला छोड़ दें। यह प्रक्रिया कुल तीन बार करें। अब शरीर के प्रत्येक अंग को मानसिक रूप से देखते हुए एक-एक अंग को शिथिल होने के लिए आत्म-निर्देशन दें और प्रत्येक अंग में प्रसन्नता और मुस्कुराहट को विकसति करें। पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक रोम-रोम को प्रमुदितता और अन्तर् प्रसन्नता का सुझाव दें। सर्वप्रथम पाँव के अंगूठे, अंगुलियाँ, तलवा, पंजा, एडी, टखना, पिंडली, घुटना, जाँघ, नितंब, कटिप्रदेश को शिथिल करते हुए वहाँ प्रसन्नता का संचार करें । फिर हाथ के अंगूठे, अंगुलियों, हथेली, पृष्ठ भाग, कलाई, हाथ, कोहनी, भुजा एवं कंधों को प्रसन्नता और मुस्कुराहट का सुझाव दें । तदुपरान्त पेट, पेट के अंदरूनी अवयव, बड़ी आँत, छोटी आँत, पक्वाशय, आमाशय, किडनी, लीवर तथा हृदय, फेंफड़े, पसलियाँ, पूरी पीठ, रीढ की हड्डी, कंठ और गर्दन के भाग में शिथिलता, प्रसन्नता एवं मुस्कुराहट को विकसित करें । इसके बाद चेहरे के एक-एक अंग - ठुड्डी, होंठ, गाल, आँख, कान, 15 For Personal & Private Use Only Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नाक, ललाट, सिर, बाल, मस्तिष्क के स्नायु और कोशिकाओं पर आनन्द भाव केन्द्रित करें और मन ही मन मुस्कुराएँ । आत्मनिरीक्षण करें और देखें कि यदि अब भी तनाव महसूस हो रहा है तो खिलखिलाकर हँसते हुए लोटपोट हो जायें और तनाव-मुक्ति बरकरार रखें। सकारात्मक सोच : तनाव-मुक्ति की औषधि तनाव-मुक्ति का दूसरा उपाय है- 'सकारात्मक सोच।' व्यक्ति अपनी सोच को सदैव विधायात्मक रखे। जैसी सोच होती है वैसा ही अनुकूल और प्रतिकूल हमारा जीवन होता है। किसी की छोटी-मोटी टिप्पणी पर ध्यान न दें और अपने द्वारा भी छोटी-मोटी घटनाओं पर टिप्पणी न करें। सकारात्मक सोच एक ऐसा मंत्र है जिससे चुटकियों में ही व्यक्ति तनावमुक्त हो सकता है। तनाव-मुक्ति की बेहतर औषधि है 'सकारात्मक सोच'। किसी ने हमारे लिए अच्छा किया और हमने भी उसके लिए अच्छा किया- यह जीवन की सामान्य व्यवस्था है। प्रेम के बदले में प्रेम दिया ही जाता है, लेकिन सकारात्मक सोच वाले व्यक्ति की यह विशेषता होती है कि वह अपना अहित करने वाले का भी हित करता है, शत्रु में मित्रता के सूत्र तलाशने की कोशिश करता है। वह काँटे बोने वाले के लिए भी फूल बिछाता है। सकारात्मकता व्यक्ति के मनोमस्तिष्क में विपरीत चिंतन को घर नहीं करने देती। आवेश, आशंका, आग्रह आदि सोच के वे दोष हैं, जो हमें नकारात्मकता की ओर धकेलते हैं। जब भी किसी बिंदु पर सोचें, समग्रता पूर्वक और विधायक नजरिये से सोचें। प्रसन्न रहें, तनाव-मुक्ति के लिए ___ सदैव प्रसन्न रहना तनाव से बचने का अच्छा टॉनिक है। जिस प्रकार अंधे के लिए लकड़ी सहारा बनती है और बीमार के लिए दवा, वैसे ही तनावग्रस्त व्यक्ति के लिए प्रसन्नता औषधि का काम करती है। हँसने, मुस्कुराने, प्रसन्न और आनन्दित रहने से मन का मैल तो साफ होता ही है, शरीर की सम्पूर्ण कोशिकाएँ- नाड़ियाँ सक्रिय भी होती हैं। एक प्रसन्नता सौ दवा का काम करती है। मैंने सुना है, एक व्यक्ति बुखार से ग्रस्त हो गया। वह कई दिन तक 16 For Personal & Private Use Only Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घरेलू इलाज कराता रहा पर स्वस्थ न हो पाया। वह चिकित्सक के पास पहुँचा। चिकित्सक ने उसे पीने की दवा दी। उस व्यक्ति के घर में एक पालतू बंदर था। व्यक्ति ने दवा की एक खुराक ली। पास बैठे बंदर ने जब अपने मालिक को दवा पीते देखा तो उसके मन में भी दवा पीने की इच्छा हुई। उसने मालिक से नजर चुराकर दवा पी ली। दवा जबरदस्त कड़वी थी। दवा पीते ही बन्दर ने बड़ा विचित्र-सा मुंह बनाया। वह दाँत किटकिटाने लगा और अपने मालिक को घुड़काने लगा। बन्दर की इस भाव-भंगिमा को देखकर मालिक को बडी जोर की हँसी आयी। वह आधे घंटे तक लगातार हँसता रहा, क्योंकि बंदर बार-बार अपना मुँह बिगाड़ रहा था। आश्चर्य! दो घंटे बाद जब उसने थर्मामीटर से अपना बुखार मापा तो उसे खबर लगी कि उसका बुखार उतर चुका है। वह अपने आपको काफी हल्का महसूस करने लगा। मैं यही बताना चाह रहा हूँ कि जो काम दवा की दस खुराक नहीं कर पाती है, वह काम प्रसन्नता की एक खुराक कर जाया करती है। प्रसन्नता हमारे भीतर उत्साह पैदा करती है। उत्साह से मनोयोग जन्मता है और मनोयोग किसी भी कार्य की पूर्णता का प्राण होता है। उत्साहहीन व्यक्ति भले ही कितना भी काम करता रहे लेकिन उसे मनचाहा परिणाम नहीं मिल सकता। दुनिया के जितने भी महापुरुषों ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं, उनके पीछे उनका उत्साह ही था। जीवन-विकास का मंत्र : आत्मविश्वास तनाव-मुक्ति के लिए प्रसन्नता और उत्साह का ही मित्र बनता है हमारा 'आत्मविश्वास'। यह तो जीवन में वही काम करता है जो कार या बस को चलाने में पैट्रोल या डीजल करता है। शरीर में जितना रक्त का महत्व है उतना ही महत्व जीवन में आत्मविश्वास का है। एक मैदान में दो खिलाड़ी उतरते हैं। एक हारता है और एक जीतता है। इसमें अगर सबसे बड़ा कारण है तो दो में से एक का आत्मविश्वास ही है। यह जीवन का वह पुख्ता सहारा है जिससे हम बड़ी-से-बड़ी सफलता को आत्मसात् करते हैं और हर बाधा को लांघ सकते हैं। 17 For Personal & Private Use Only Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जन्म से मूक, बधिर और नेत्रहीन हेलन केलर अगर दुनिया की महान् नारी बनी तो उसके मूल में उसका आत्मविश्वास ही था। हजारों बार प्रयोग करने के बाद दुनिया की रातों को रोशन करने के लिए बल्ब की रोशनी का आविष्कार करने का श्रेय अगर अल्वा एडिसन को जाता है तो उसके पीछे उनका आत्मविश्वास ही काम करता है। इसी आत्मविश्वास ने कोलम्बस से नई दुनिया की खोज करवा ली थी। इसी आत्मविश्वास ने सिंकदर को विश्वविजयी बनाया था। दुनिया के हर महान् व्यक्ति के जीवन-विकास में आत्मविश्वास ने मंत्र का काम किया है। व्यस्त रहें, मस्त रहें एक और उपाय किया जा सकता है तनाव-मुक्ति के लिए वह यह है कि कार्य से प्यार करें। हर समय व्यस्त रहो, हर हाल में मस्त रहो- यही तनाव-मुक्ति की रामबाण दवा है। मुझे नहीं मालूम कि शैतान का घर किस पाताल-लोक में होता है पर यह अनुभव की बात है कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है, अगर आपके जीवन में कोई बड़ी दुर्घटना घटित हो गयी है, पति-पत्नी या पुत्र की मृत्यु भी हो गयी है तो भी आप इस सदमें से उभर सकते हैं अगर आप अपने आपको किसी श्रेष्ठ कर्मयोग से जोड़ लें। एक महानुभाव को मैं जानता हूँ जिनके पत्नी और बेटी की हत्या हो गयी, घर में डकैती हो गयी। लेकिन उन्होंने दूसरी शादी करने की बजाय 'होनी' को ही स्वीकार किया और किसी प्रकार के अवसाद या तनाव से कुंठित होने की बजाय कुछ ही दिनों में स्वयं को सामाजिक कल्याण की गतिविधियों से जोड़ लिया जिसके परिणामस्वरूप वे जीवन के सबसे बड़े सदमे से सहज ही उबर गये। जीवन का महान योग : कर्मयोग जीवन में किसी भी कार्य को तन्मयता से करें और उसे बोझ समझने की बजाय योग समझें। अगर आप लगनपूर्वक किसी भी कार्य को सम्पादित करते हैं तो आप उस कार्य को शीघ्रता से तो पूर्ण कर ही लेते हैं, साथ ही साथ अनावश्यक मानसिक खिंचाव से भी बच जाते हैं। अगर तुम झाड़ भी निकालो . 18 For Personal & Private Use Only Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तो इतनी लगनपूर्वक कि उधर से स्वर्ग के देवता भी अगर गुजर जाएँ तो तुम्हारी पीठ थपथपायें और कह पड़ें कि क्या बेहतर सफाई की है। इससे जुड़ा हुआ ही एक और बिन्दु है, एक वक्त में एक ही काम करें। यह भी कर दूँ, और वह भी कर दूं- सोचकर अपने दिमाग को भारी करने की बजाय धीरे-धीरे ही सही व्यवस्थित तौर पर एक-एक कार्य को पूर्ण करें। दिन भर में बीस कार्यों की योजना बनाने की बजाय किन्हीं दो कार्यों को पूर्ण करना कहीं ज्यादा लाभदायी है। जो व्यक्ति अपने दिन भर के कार्यों को समयबद्ध व्यवस्थित तौर पर करता है, वह सात दिन के कार्यों को एक दिन में पूरा कर लेता है। अच्छा होगा कि सुबह उठने के बाद जब आप आवश्यक कार्यों से निवृत्त हो जाएँ तो दिन भर में किये जाने वाले कार्यों की एक सूची बना लें और फिर उसमें पहले किसको करना है और पीछे किसको करना है, इसके आधार पर क्रम डाल दें।आप पाएँगे कि आपने सभी कार्यों को सरलता से सम्पादित कर लिया है और कोई भी काम आपके लिए तनाव का कारण नहीं बना है। न करें हड़बड़ी, होगी नहीं गड़बड़ी एक सावधानी और रखें। कार्य को जल्दबाजी में पूर्ण करने का प्रयास न करें। हम व्यस्त रहें पर अस्त-व्यस्त न रहें। हड़बडी में गड़बड़ी की ज्यादा संभावना होती है और ज्यादा जल्दबाजी हमारे दिमाग में खिंचाव और तनाव पैदा करती ही है। इससे कार्य जल्दी होने की बजाय देरी से होता है और शक्ति भी कहीं ज्यादा खर्च होती है। जीवन में अपने परिश्रम पर भरोसा रखें, मुफ्त के मालपुए खाने के बजाए मेहनत की 'रूखी-सूखी' रोटी बेहतर होती है। जो लोग जीवन में कर्मयोग से जी चुराते हैं और रातों-रात करोड़पति होने का ख्वाब देखा करते हैं, वे लोग जीवन में सदैव वहीं के वहीं पड़े रह जाते हैं। मुझे याद है कि किसी पर्यटनस्थल पर एक होटल खुला। दुनिया का अद्भुत होटल! बाहर लिखा था 'आप होटल में आएँ, जी भर कर खायें। जो इच्छा हो सो खाएं, बिल की तनिक भी चिंता न करें। आप के बेटे-पोतों से उसका भुगतान ले लिया जाएगा।' एक मुफ्तखोर उधर से गुजरा। उसने भी 19 For Personal & Private Use Only Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उसे पढ़ा। उसे लगा कि मुफ्त में माल खाने का यह सबसे अच्छा अवसर है। मेरी तो शादी ही नहीं हुई है। यह बिल का भुगतान किससे लेगा? वह भीतर गया, जम के मनपसंद भोजन किया। बाहर जाने लगा तो होटल के मैनेजर ने सात सौ रुपये का बिल पकड़ा दिया। वह चौंका। उसने कहा, 'आपने बाहर लिखा है कि जी भर के खाओ, भुगतान बेटे पोतों से लिया जाएगा फिर मुझे बिल क्यों दिया जा रहा है?' होटल के मैनेजर ने कहा, 'जनाब, यह आपका खाने का बिल नहीं है। यह तो आपके बाप-दादा खाकर गये उनका बिल है।' उसे लगा कि आज बुरे फंसे। जीवन-भर याद रखें, मुफ्त के मालपुए खाने की बजाय परिश्रम की रूखी-सूखी रोटी बेहतर होती है। चिंता-तनाव : डुबाए जीवन की नाव तनाव से बचने के लिए बेवजह की चिंताओं से भी बचें। कोई काम करना हो तो उस पर व्यक्ति सोच कर निर्णय ले ले, यह तो उचित है, लेकिन किसी भी बिंदु पर केवल सोचते रहना और निर्णय न ले पाना अपने मस्तिष्क पर जानबूझ कर बोझ डालना है। वास्तव में चिंता व्यक्ति को तब सताती है जब कोई कार्य हमारी इच्छा या अपेक्षा के अनुकूल न हो रहा हो। व्यक्ति एक ही बात को जब बार-बार अपने भीतर घोटता रहता है तो उसके परिणामस्वरूप वह तनाव में आ जाता है और कभी-कभी तो बिना किसी ठोस कारण के मात्र किसी भावी अनिष्ट की आशंका से व्यक्ति चिंता में डूब जाता है। ऐसी स्थिति में तो तनाव और भी गहरा हो जाता है जब व्यक्ति हर पहलू पर नकारात्मक दृष्टि से सोचता है। हर समय प्रसन्न रहना और छोटी-मोटी बातों की चिंता करने की बजाय उन्हें भुला देना ही तनाव-मुक्ति की अमृत औषधि है। जो कुछ और जैसा भी हमको मिला है उसी में संतुष्ट रहना अगर मनुष्य को आ जाए तो तनाव की आधी बीमारी खत्म हो सकती है। आपके पास खुशी का कोई साधन नहीं है तो भी आप मुस्कुराते हुए बच्चे को देखकर प्रसन्न हो सकते हैं। खिले हुए फूल व खेत-खलिहान को, पर्वत-नदियों व प्राकृतिक सौन्दर्य को देखकर खुश हो सकते हैं और तो और, उगते हुए सूरज, खिला हुआ चांद और टिमटिमाते तारों को देखकर भी हम प्रसन्न हो सकते हैं। 20 For Personal & Private Use Only Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से एक दिन यों ही किसी ने पूछा कि आप रात को बारह बजे तक कार्य करते हैं फिर भी तरोताजा बने रहते हैं। इसका कारण क्या है? आपकी तंदुरुस्ती का राज़ क्या है? पंडित जी ने कहा, 'मैं रोज थोड़ी देर बच्चों के बीच रहता हूँ। जिनसे ढेर सारी खुशियाँ बटोर लेता हूँ। रोज सुबह बगीचे में टहलता हूँ जिससे ताजी हवा पा लेता हूँ और एक काम जो वर्षों से करता आया हूँ, वह है- बीती बातों को ज्यादा सोचा नहीं करता हूँ। बीते का चिंतन न कर, छूट गया जब तीर। अनहोनी होती नहीं, होती वह तकदीर॥ तनाव-मुक्ति के लिए हम इस सूत्र का सहारा ले सकते हैं। कुछ अच्छी बातें होती हैं जिन्हें हम अपने जीवन में जीने का प्रयास करें। ये बातें पंगु के लिए वैसाखी का काम कर सकती हैं। औरों की निंदा, ईर्ष्या, दोषारोपण की भावना, बिना सोचे समझे कुछ भी बोल जाना, ये सब पछतावे के कारण होते हैं और धीरे-धीरे हमें तनाव की ओर खींच लेते हैं। हम अपने ही भीतर जन्मने वाले विचारों का निरीक्षण करें। जो विचार औरों से जुड़े हुए हैं, देखें कि वे विचार ईर्ष्या और द्वेष से प्रेरित तो नहीं है? अगर ऐसा है तो उन्हें दरकिनार करें। आपकी भूलने की आदत हैं, यह अच्छी बात है। आप उसका उपयोग करें। प्लीज'! आप अपने जीवन की खुशियों के लिए उन बातों को भूल जाएँ जो बार-बार आपकी जिंदगी में तनाव के काँटे उगा रही हैं। इस बात का बोध रखें कि हमारा मूल स्वभाव क्या है- पीड़ा या आनंद? और जब इन दो में से एक के चयन का मौका आए तो झट से आनंद को चुन लें। अपनी जेब में ऐसी मुहर रखें, जिससे सदा एक ही शब्द छपता हो और वह है खुशी। सुबह उठते ही एक मिनट तक तबीयत से मुस्कुराएं। वह एक मिनिट की मुस्कान आपके चौबीस घंटे की दैनंदिनी व्यवस्थाओं में माधुर्य घोल देगी। सुबह उठकर मुस्कुराना अपनी झोली में खुशियों को बटोरने का पहला साधन है। 21 For Personal & Private Use Only Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बाहर निकलिए चिंता के चक्रव्यूह से चिंता चिता से बदतर है। मस्त रहने की आदत डालिये, चिंता से छुटकारा मिलेगा। पूरी दुनिया में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसे किसी प्रकार की चिंता न सता रही हो। चिंता करना मनुष्य का सहज स्वभाव है। जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है और जैसे-जैसे उसकी व्यवस्थाएँ बढ़ती हैं वैसे-वैसे मनुष्य के मनोमस्तिष्क में चिंता अपना बसेरा शुरू कर देती है। बचपन तक तो हम फिर भी चिंता-मुक्त रहते हैं, लेकिन इसके बाद धीरे-धीरे अपनी दैनंदिन व्यवस्थाओं में इतने ज्यादा चिंतित हो जाते हैं कि हमारी चिंतन की धार समाप्त हो जाती है और हमें चिंता का जंग लग जाता है। किसी को इम्तहान की चिंता, किसी को होमवर्क की चिंता, कोई अपने कैरियर के लिए चिंतित, तो कोई नौकरी के लिए। किसी को विवाह के पहले चिंता सता रही है और किसी को बाद में। घर-खर्च, बेटी की शादी, बीमारियाँ, सेहत, बच्चों का भविष्य, प्रमोशन, पत्नी की फरमाइशें, कर्ज और भी पता नहीं जिंदगी में कितने-कितने कारण बन जाते हैं व्यक्ति की चिंता के लिए। चिंता : समाधान नहीं, स्वयं समस्या चिंता इस तरह अपना घर बनाती है कि चिंता से मुक्त रहने की सलाह देने वाला भी स्वयं चिंतित ही होता है। सच्चाई तो यह है कि चिंता किसी For Personal & Private Use Only Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समस्या का हल नहीं अपितु अपने आप में एक बड़ी समस्या है। जैसे-जैसे यह हमारे जिंदगी में पाँव पसारना शुरू करती है वैसे-वैसे यह तन-मन धन तीनों को ही खाना शुरू कर देती है। चिंताग्रस्त व्यक्ति जी-जीकर भी जीवन भर मरने को मजबूर होता है। कई बार तो वह इतना अधिक टूटा हुआ, उदास और बैचेन हो जाता है कि उस व्यक्ति की जिंदगी को देखकर हमें दया आने लगती है। पद, प्रतिष्ठा, पहचान, पैसा इन सबको पाने की अकूत चाहना हमारे मन की अशांति का मूल निमित्त बनती है। पहले का मनुष्य कम चिंतित था, क्योंकि उसकी जिंदगी में उलझनें कम थीं। उसकी इच्छाओं की सीमा थी और फिजूलखर्ची पर रोक थी। लेकिन आधुनिक युग का मनुष्य जैसे-जैसे विकास करता चला गया वैसे-वैसे चिंता उसकी पिछलग्गू बन गयी। मैं मानता हूँ कि हमारी आधुनिक सभ्यता ने हमें अनेक सुख-सविधाएँ दी हैं पर साथ ही साथ हमारी मन की खुशियों को चूसने वाली चिंता भी दी है। इससे हमारा परिवार प्रभावित होता है, व्यवसाय प्रभावित होता है और हमारा सामाजिक स्वरूप भी प्रभावित होता है। धीरेधीरे चिंता हमारे जीवन की आदत बन जाती है। चिंतन करें, चिंता छोड़ें यद्यपि हम सभी इस चिंता के रोग से ग्रस्त हैं फिर भी यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आखिर यह चिंता होती क्या है? चिंता कोई शारीरिक रोग नहीं है अपितु घटित या घटने वाले किसी बिन्दु पर लगातार सोचने पर होने वाला मानसिक तनाव ही चिंता है। किसी कार्य पर चिंतन करने से वह आराम से पूर्ण हो जाता है किंतु उसी कार्य की लगातार चिंता करते रहने से वह दुरूह होने लगता है। अगर व्यक्ति जीवन में स्वास्थ्य, सुख और सफलता को प्राप्त करना चाहता है तो इसके लिए जरूरी है कि वह अपने जीवन में चिंता पर विजय प्राप्त करे। हमारी यह मानसिकता रहती है कि अगर हम किसी बिन्दु पर बारबार सोचेंगे तो उसका कोई समाधान निकलकर आ जाएगा पर इसमें एक सावधानी रखने की बात यह है कि अगर हम किसी भी बिंदु पर सकारात्मक 23 For Personal & Private Use Only Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ नजरिये से सोचते हैं तो वह हमारे लिए समाधान के द्वार खोलता है। अगर हम नकारात्मक नजरिये से सोचेंगे तो वही सोच चिंता बनकर हमारी अशांति का मूल कारण बन जाएगा। जैसे, आपने किसी को दो लाख रुपये ब्याज में दे रखे थे। संयोग की बात कि उस व्यक्ति ने अपना दिवाला निकाल दिया। आपको खबर लगी और आप यकायक तनाव और चिंता से ग्रस्त हो गए। किसी ग्राहक से बात करने का भी आपका मूड न रहा, अत: उस दिन का सारा व्यवसाय भी प्रभावित हो गया। आप घर पहुँचे। पत्नी ने स्वादिष्ट भोजन बना रखा था किंतु आप चिंताग्रस्त थे, इसलिए यह कहते हुए भोजन नहीं किया कि आज मेरा खाने का मूड नहीं है।' रुपये गए सो गये, सुख की रोटी भी हाथ से गई। रात भर कमरे में लेफ्ट-राइट करते रहे अथवा बिस्तर पर पड़े-पड़े करवटें बदलते रहे और नींद न ले पाए। कभी सोचते, 'मैंने रुपये दिए ही क्यों थे? पिछले महीने किसी ने कहा भी था कि यह व्यक्ति हाथ ऊँचा करने वाला है, पर मैंने उस समय ध्यान नहीं दिया। अगर मैं उस समय ही रुपए वापस ले लेता तो आज यह नौबत नहीं आती।' पत्नी ने समझाया कि रुपये के पीछे नींद हराम करने से क्या होगा? पर तुम इतने ज्यादा चिंतित हो गए कि पूरी रात ही खुली आंखों बिस्तर पर पड़े रहे। यह हुआ चिंता के कारण तीसरा नुकसान, रुपए गए सो गए, चैन की नींद भी गई। और तो और, अगले दिन सुबह तुम्हारे मित्र तुम्हारे घर आए पर तुम उनसे भी प्रेम से बात न कर पाये क्योंकि तुम चिंतित थे। परिणामस्वरूप मैत्री भी कमजोर हुई। हजार चिताओं से बदतर एक चिंता एक चिंता हजार चिताओं से भी बदतर है। चिता एक बार जलाती है पर चिंता जिन्दगी में हजार बार जलने को मजबूर करती है। उसमें भी चिता तो मरे हुए को जलाती है पर चिंता तो जीते जी व्यक्ति को ही जला डालती है। चिंता हमारा कोई प्राकृतिक धर्म नहीं है और न ही यह हमारा स्वभाव है। यह धीरे-धीरे कुछ निमित्तों के चलते हमारे भीतर प्रवेश करती है या यों कहें कि हमारे भीतर बीज के रूप में प्रकट होती है और धीरे-धीरे स्वस्थ व्यक्ति को भी अपने आगोश में जकड़ लेती है। सच्चाई तो यह है जो चिंता 24 For Personal & Private Use Only Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पहले किसी बड़ी बात को लेकर हमारे भीतर जगती है, पीछे वही छोटी-छोटी बातों पर भी हम पर हावी होती है और उसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे मनुष्य उसका आदी हो जाता है। चिंता करने वाला व्यक्ति औरों की बजाय कहीं अधिक भावुक और संवेदनशील होता है और इस कारण छोटी-छोटी बातें भी उस पर गहरा दुष्प्रभाव छोड़ती है। चिंता की आदत बीड़ी-सिगरेट और शराब की आदत से भी कहीं ज्यादा खर्चीली है। बीड़ी पीने वाला बीड़ी पर खर्च करता है, सिगरेट पीने वाला सिगरेट पर और शराब पीने वाला शराब पर, वैसे ही चिंताग्रस्त व्यक्ति भी अपना बहुत बड़ा खर्चा डॉक्टर और दवाओं पर कर देता है। किसी भी कार्य को एक ही तरीके से बार-बार करना ही आदत पड़ने का मूल कारण है। फिर चाहे हम चाहें या न चाहें। आदत एक रस्सी की तरह होती है, जिसका एक-एक धागा हम बुनते हैं और उसके बाद रस्सी का रूप लेकर वे ही धागे हमें ही बाँध लेते हैं। चिंतित व्यक्ति सदैव निराशावादी और भयग्रस्त होता है। यदि चिंता ग्रस्त व्यक्ति चिंता की आदत को छोड़ने की बार-बार कोशिश करे तो वह कुछ समय के अभ्यास से इस रोग पर काफी विजय प्राप्त कर सकता है। विपरीत नजरिया चिंता का स्रोत चिंता का आभास मुख्यतः दो स्रोतों से होता है, या तो व्यक्ति के वस्तु, स्थान और परिस्थिति को देखने का दृष्टिकोण अथवा मन में बैठा हुआ उसका भय या आशंका। किसी भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति को देखने के लिए दो नजरिये होते हैं। अगर हम हर समय उन्हें विपरीत नजरिये से देखते रहेंगे तो परिणाम यह आएगा कि एक दिन वे सब हमारी चिंता के मूल कारण बन जाएँगे जिससे हमारे विचार खराब होंगे। हमारा हर विचार चिंता और दुःख से भरा हुआ होगा और हमें हर कार्य में असफलता महसूस होगी। फिर तो स्थिति यह होगी कि हम एक विशेष प्रकार के भ्रम के शिकार हो जाएँगे। बादल गरजेंगे तो तुम्हें महसूस होगा कि तुमसे टकराने के लिए ही वे तुम्हारे पास से गुजरे हैं । अगर कार में बैठोगे तो बैठते ही किसी परिचित की दुर्घटना 25 For Personal & Private Use Only Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ याद हो आएगी और इस तरह तुम्हारा हर कार्य तुम्हें मानसिक तौर पर बैचेन करता रहेगा। चिंता हृदय में लगी हुई वह आग होती है जिसकी पीड़ा को वही जान सकता है जो उसमें झुलस रहा होता है। उसके कारण कई सुनहरे अवसर हाथ से छूट जाते हैं और खुशियों के दिन बीत जाया करते हैं । प्रकृति की व्यवस्था है कि जो जन्म देता है, वह जीवन की व्यवस्था भी कर देता है- 'चोंच देई सो चून हू देगो' । जो चोंच देता है वह चुग्गा भी देता है । इसके बावजूद व्यक्ति भविष्य की कल्पनाओं और अतीत की स्मृतियों में डूबा हुआ चिंता, अवसाद और घुटन को भोगता रहता है । आखिर क्या कारण हैं चिंता के ? निवारण से पहले समझें कारण मेरी नजर में चिंता का सबसे बड़ा कारण है हमारा निराशावादी दृष्टिकोण । व्यक्ति सफलताओं की ओर बढ़कर भी बार-बार इसलिए असफल हो जाता है क्योंकि उसके भीतर घर कर चुकी निराशा उसे सफलता के अंतिम चरण में लाकर वापस लौटने को मजबूर कर देती है । अगर व्यक्ति छोटी-छोटी रुकावटों को देखकर निराश हो जाता है तो उसका चिंतित होना स्वाभाविक है । सदा याद रखें प्रयास करना मनुष्य का कर्त्तव्य होता है लेकिन उस प्रयास का परिणाम देना किसी और के हाथ में होता है । जितनी गंभीरता से व्यक्ति परिणाम को देखना चाहता है, संभवतः उतनी गंभीरता से वह प्रयास नहीं करता । मैंने देखा है कि हम लोग प्राय: किसी भी कार्य में असफल हो जाने पर तकदीर का ही दोष बताते हैं । अच्छा होगा यदि हम अपने भाग्य का रोना रोने की बजाय कार्यशैली के जो दोष रहे हैं, उन दोषों को पहचानें । हजार रुकावटें और मुसीबतें आने के बावजूद जो व्यक्ति धैर्य को बरकरार रखता है वह कभी चिंताओं के मकड़जाल में नहीं उलझा करता । निराशावादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति को फूल के इर्द-गिर्द काँटे ही नजर आएँगे और आशावादी व्यक्ति को काँटों के बीच भी फूल ही नजर आएगा । व्यक्ति दुकान खोलता है, ऑफिस चलाता है, कोई फैक्ट्री या किसी संस्थान की योजना प्रारम्भ करता है 26 For Personal & Private Use Only Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तो उसे शुरुआती दौर पर मिलने वाली असफलताओं को देखकर विचलित होने की बजाय भविष्य के गर्भ में छिपी हुई सफलता को देखने की कोशिश करनी चाहिए। भूलें बंद द्वार, खोजें खुले द्वार निराशावादी दृष्टिकोण वाला व्यक्ति न केवल चिंतित होता है अपितु हतोत्साहित भी हो जाता है। मैं कर नहीं सकता, मैं कुछ हो नहीं सकता, मेरा तो भाग्य ही खराब है, क्या करूँ, जहाँ हाथ डालूँ वहीं हाथ जलता है; ये सब बातें वे लोग किया करते हैं जो निराशावादी होते हैं। जीवन भर याद रखें प्रकृति की व्यवस्था जब एक द्वार बंद करती है तो दूसरा द्वार खोल भी दिया करती है। हमें बंद द्वारों को देखकर रोना रोने की बजाय जीवन में किसी खुले द्वार की खोज करनी चाहिए। जिंदगी में निन्यानवे द्वार बंद हो जाएँ तो भी हताश न हों क्योंकि प्रकृति की व्यवस्था है कि वह सौवां द्वार जरूर खुला रखती है। हमारा आशावादी दृष्टिकोण ही विफलता में भी सफलता का मार्ग खोज लेता है। आशावादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति पर चाहे दुःखों का पहाड़ भी क्यों न टूट पड़े, वह तो हमेशा मुस्कुराहट के साथ उन सबका सामना करता है। अगर जिंदगी में ऐसी नौबत आ जाए कि पाँव में जूते भी न हों और नंगे पाँव चलना पड़े तब भी तुम ईश्वर को साधुवाद दो कि उसने जूते नहीं दिए तो क्या हुआ, पाँव तो दिए हैं। दुनिया में लाखों लोग ऐसे हैं जिनको उसने पाँव भी नहीं दिए हैं। भगाएं, भय का भूत चिंता का दूसरा कारण है मन में बैठा हुआ भय; अनावश्यक भय। जैसे ही मनुष्य भयग्रस्त होता है, वह चिंतित भी हो जाता है। उसकी शारीरिक और मानसिक शक्ति कमजोर पड़ जाया करती है। भयग्रस्त व्यक्ति अँधेरे में रस्सी को भी सर्प मान कर भयभीत हो जाता है और निर्भयचित्त व्यक्ति महावीर की तरह साँप को भी रस्सी मान कर उसे उठा कर फेंक देता है। किसी ने फोन पर छोटी सी धमकी दे दी अथवा किसी का कोई उलटा-सीधा खत आ गया 27 For Personal & Private Use Only Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तो हम तत्काल उद्वेलित हो जाते हैं और भयभीत होकर अनिर्णय की स्थिति में पहुँच जाते हैं। परिणामतः हम सभी ओर से कमजोर पड़ जाते हैं। जब होनी को टाला नहीं जा सकता और अनहोनी को किया नहीं जा सकता तो व्यर्थ की चंता क्यों? जो लोग अपने जीवन में भय से ग्रस्त हैं वे अपने आत्मविश्वास को बटोरें और भय को नेस्तनाबूत करें। मुझे याद है : एक बच्चा अपनी सौतेली माँ के गलत व्यवहार से तंग आकर घर छोड़कर कहीं और जा रहा था। चलते-चलते एक गाँव में पहुँचा। उसने गाँव वालों से ठहरने के लिए जगह माँगी तो गाँव वालों ने कहा, 'गाँव के बाहर एक सुनसान मंदिर है। तुम उसमें ठहर सकते हो पर ध्यान रखना रात में उस मंदिर में मत रहना क्योंकि उस मंदिर में रात को भूत रहता है और जो भी रात को इस मंदिर में रहता है वह उसे मार खाता है।' बच्चा मंदिर में गया, यह सोच कर रातबसेरा का भी उसने निर्णय ले लिया कि यहाँ का भूत मेरी सौतेली मम्मी से ज्यादा खतरनाक थोड़े ही होगा। वह निर्भय मन हो रात को वहीं टिका रहा। रात के लगभग बारह बजे भूत आया और मंदिर में किसी बच्चे को देखकर उसे आश्चर्य हुआ। उसने बच्चे को उठाया और कहा, 'क्या तुम्हें मालूम नहीं है कि इस मंदिर में जो भी रात को रहता है वह मेरा भोजन बन जाता है?' उसने अट्टहास करते हुए कहा, 'मुझे जोरों की भूख भी लगी थी, अच्छा हुआ तू आ गया।' बच्चे ने बड़ी विनम्रता से हाथ जोड़ते हुए भूत से कहा, 'भूत अंकल, आप मुझे मत मारो। मैं तो वैसे भी अपनी सौतेली माँ के द्वारा बहुत ज्यादा सताये जाने के बाद घर छोड़ कर यहाँ आया हूँ। आप मुझ पर दया करें, रहम खाएँ और मुझे जीवित रहने दें। मैं आपके लिए रोज खाना भी बना दूंगा, मालिश कर दूंगा और आप जो कहेंगे, वह भी कर दूंगा।' भूत उसकी सौतेली माँ से थोड़ा ठीक था। उसे बच्चे पर दया आ गई। उसने कहा, 'मैं एक शर्त पर तुम्हें जीवित रख सकता हूँ कि तुम कभी भी इस मंदिर से बाहर नहीं जाओगे। तुम जैसे ही बाहर जाने के लिए कदम बढ़ाओगे, मैं तत्काल तुम्हें जान से मार दूंगा।' 28 For Personal & Private Use Only Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कई महीने बीत गए। बच्चा वहीं रहता रहा। भूत के भय से उसने बाहर जाने की कभी हिम्मत भी नहीं की। भूत भी समय-समय पर बच्चे को डराता रहता था। ____एक दिन भूत ने कहा, 'बेटा मैं यमराज के पास जा रहा हूँ, उनसे प्रार्थना करने के लिए। क्या तुम्हारा कोई काम है उनसे?' बच्चे ने कहा, भूत अंकल, कोई विशेष काम तो नहीं है किंतु आप केवल इतना-सा उनसे पूछ आएँ कि मेरी उम्र कितनी है?' भूत यमराज के पास जाकर वापस आया और उस बच्चे से कहा, 'तुम्हारी उम्र सत्तर साल, आठ महीने, तीन दिन और आठ घंटे की है। बच्चे ने कहा, 'ठीक है।' कुछ दिन बाद भूत फिर यमराज के पास जाने लगा तो बच्चे ने भूत से कहा, 'अंकल, आप जरा यमराज से इतना कहिएगा कि या तो मेरी उम्र एक घंटा ज्यादा कर दे या कम कर दे।' थोड़े दिन बाद भूत वापस लौट कर आया और कहा, 'भैया, माफ करो। यमराज कहते हैं कि किसी की उम्र का एक घंटा बढ़ाना और घटाना उनके हाथ में नहीं है।' बच्चा बात समझ गया। वह शाम को मंदिर से बाहर निकलने लगा तो भूत ने उसे धमकाया और कहा, 'बाहर निकलने की कोशिश की तो जान से मार दूंगा।' बच्चा चूल्हे के पास गया और उसने जलती हुई बड़ी लकड़ी उठाई और भूत के पीछे भागा और कहा, 'हे भूत ! तुम मुझे क्या मारोगे? जब यमराज के हाथ में भी मेरी जिन्दगी को बढ़ाना और घटाना नहीं है तो तेरी क्या मजाल है?' लड़का जलती लकड़ी लेकर भूत के पीछे पड़ा। भूत समझ गया कि अब इस बच्चे को नहीं डराया जा सकता है क्योंकि इसके भीतर के भय का भूत मर गया है। तभी उसने मंदिर में जोर की आवाज सुनी, भागो भूत ! भूत आया।' उसके बाद आज तक भूत वापस उस मंदिर में नहीं आया। अभय बनो, अभयदाता बनो तीर्थंकर महावीर ने पचीस सौ वर्ष पूर्व मानव-जाति को अपनी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करने के लिए निर्भयचित्त होने की प्रेरणा देते हुए कहा था कि 'व्यक्ति न तो औरों से भयभीत हो और न ही अपने द्वारा औरों को भयभीत करे।' तुम अभय बनो और अभयदाता भी बनो। कायर भय से डरता 29 For Personal & Private Use Only Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है और साहसी व्यक्ति से भय डरता है । एक निर्भय व्यक्ति सौ भयभीत व्यक्तियों पर भारी पड़ सकता है । भयाकुल व्यक्ति अपने वर्तमान का उपयोग कम करता है। वह कल का चिंतन ज्यादा करता है कि कहीं ऐसा हो गया तो मेरा क्या होगा? यह सोच ही हमारे मन को निर्बल कर देती है । मैं यह भी नहीं कहता कि भय सदा के लिए ही हानिकारक है या साहस सदैव लाभकारी है लेकिन प्राय: ये दोनों हमारे लिए हानि और लाभ से जुड़े रहते हैं। वह भय हमारे लिए चिंता का निमित्त बन जाता है जो बार-बार किसी एक ही बिन्दु, स्थान या व्यक्ति से जुड़ा रहता है। श्री कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया वह संदेश चिंता और तनाव से भरे हर किसी व्यक्ति के लिए बार-बार मननीय है कि हे अर्जुन! हीनता और नपुंसकता तुम्हें शोभा नहीं देती। मन में घर कर चुकी दुर्बलता का त्याग करो और अपने कर्त्तव्य के लिए सन्नद्ध रहो। मैं भी आपसे यही कहना चाहूँगा कि साहस और भय में हमेशा संतुलन रखा जाए। कुछ बिंदु ऐसे होते हैं जिनमें कुछ भय रखना अच्छी बात है और कुछ बिंदु ऐसे होते हैं जिनमें साहस की सीमा रखना ज्यादा श्रेष्ठ रहता है। मैं समझता हूँ कि पुलिस जितना काम नहीं करती उससे ज्यादा उसका भय काम करता है । तो यह भय अच्छा है क्योंकि इससे व्यक्ति समाज-विरोधी, राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से बचता है। हाँ, मूर्खतापूर्ण साहस करना भी हानिकारक है । अगर कोई खूँखार शेर के सामने निहत्था लड़ने के लिए चला जाएगा तो उसकी मृत्यु निश्चित है। जिएँ, संतुलित जीवन अच्छा होगा कि हम विवेकपूर्ण और संतुलित जीवन जिएँ और ज्ञान के प्रकाश में तथ्यों का भलीभाँति अवलोकन करें। हम वास्तविकता और अंधविश्वास में भेद समझें और ऐसे भय को अपने पास में न फटकने दें जो आपकी शारीरिक और वैचारिक शक्तियों का दमन करता है । अगर इसके बावजूद कोई अनजाना भय हमारे मनोमस्तिष्क में अपना घर बना ले तो हम भय के कारणों का विश्लेषण करें और पूरी शक्ति से भय की ग्रंथि को बाहर खदेड़ दें। आवेश और डर- इन दोनों से ही मुक्त होकर हम सफल और सक्षम 30 For Personal & Private Use Only Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्यक्ति बन सकते हैं। याद रखें, हमारी चिंताएँ हमेशा हमारी कमजोरियों का कारण होती हैं। अगर हम कुछ कर सकते हैं तो हीनता की वृत्ति से भी बचें। हीनभावना अथवा सदैव दुःखदायी विचारों में जीना हमारी मानसिक ग्रंथियों को अवरुद्ध करता है। उससे हमारे ज्ञानतंतु कमजोर होते हैं । जीवन में संभव है कि किसी प्रकार का कोई एक दुःख आ जाए अथवा जिससे हम बहुत अधिक प्रेम कर रहे हों वही हमें दगा दे जाए। बजाए इसके हम निरन्तर उन्हीं विचारों में जीते रहें, कोशिश करें उन बातों और निमित्तों को भूलने की। दुःखदायी विचार हमारे दुःखों को कम नहीं करते अपितु उनमें और भी अधिक बढ़ोतरी किया करते हैं। चाह और चिंता : चोली-दामन का रिश्ता चिंता के कारणों में एक है 'हमारी अति-महत्वाकांक्षा।' व्यक्ति आवश्यकताओं की पूर्ति करे वहाँ तक तो जीवन संयम के बाँध में बँधा रहता है लेकिन आकांक्षाओं के मकड़जाल में उलझ जाने के बाद उससे मुक्त हो पाना आदमी के लिए मुश्किल हो जाता है। सागर और आकाश का अंत हो सकता है, लेकिन मनुष्य की तृष्णा और आकांक्षा का कभी अंत नहीं हो सकता। और वे आकांक्षाएँ हमारे लिए चिंता का कारण बन जाती हैं। हम आकांक्षाएँ तो ढेर सारी बटोर लेते हैं लेकिन पूरी दो-चार भी नहीं कर पाते हैं। कुछ अति महत्वाकांक्षी व्यक्ति होते हैं जो रात-दिन योजनाएँ बनाते हैं और हर जगह हाथ मारने की कोशिश करते हैं। वे करते कम हैं और सोचते ज्यादा हैं, परिणामस्वरूप वे चिंताओं से बोझिल होते रहते हैं। 'चाह गई, चिंता मिटी, मनवा बेपरवाह।' चाह और चिंता में चोलीदामन का रिश्ता है। लगभग चालीस फीसदी चिंताओं का कारण हमारी महत्वाकांक्षा होती है, जो नहीं मिला है उसके लिए उधेड़बुन करने में है। व्यक्ति इसी में जीता रहता है और यही उधेड़बुन उसकी चिंता का मूल कारण बनती है। मैंने देखा है कि कुछ ऐसी प्रकृति के लोग होते हैं, जो जहाँ भी जाएँगे, जिस किसी देवी-देवता के मंदिर में भी तो उनकी संपूर्ण पूजा या 31 For Personal & Private Use Only Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उपासना में कोई-न-कोई चाह छिपी रहती है। जो मिला है, व्यक्ति उसका उपभोग नहीं कर पाता और जो नहीं मिला है उसके पीछे दौड़ता रहता है। आज अगर मंदिरों में भण्डार भर रहे हैं तो यह मत समझिएगा कि लोग भगवान को चढ़ा रहे हैं। वास्तव में वे लोग अपनी भविष्यनिधि की व्यवस्था कर रहे हैं। मनुष्य को धर्म के नाम पर यह समझाया गया है कि तुम्हें अगले जन्म में एक का सौ मिलेगा और सौ का लाख। हवा निकालें, हवाई कल्पनाओं की ___मनुष्य के मन में पलने वाली तृष्णा उसकी चिंता का मूल कारण है। तृष्णा हमारे संतोष को समाप्त करती है और असंतोष मानसिक तनाव का कारण बनता है। मुझे एक महानुभाव बताया करते थे कि उन्हें कई बार एक जैसा सपना आता है कि वे एक सोने के महल के सामने खड़े हैं। महल की खूबसूरत सीढ़ियों से चढ़कर वे महल की छत पर पहुँचते हैं। महल पर उनका राज्य है और वे महल की दीवारों पर टहल रहे हैं। लेकिन थोड़ी देर के बाद ही वे सपने में देखते हैं कि जिस दीवार पर वे खड़े हैं उसकी सारी ईंटें हिल रही हैं। उनका संतुलन बिगड़ने लगता है। वे दीवार से नीचे उतरने के लिए जैसेतैसे सीढ़ियों के पास पहुँचते हैं लेकिन सीढ़ियों के पास पहुँचते ही सीढ़ियाँ भी भर-भराकर नीचे गिर जाती हैं। वे भयभीत हो जाते हैं और सोने का महल उन्हें जानलेवा लगता है और घबराकर वे जोर से चीखते हैं और उनकी आँख खुल जाती है। आँख खुलने पर भी इतनी तेज घबराहट रहती है कि सारी रात वे बैचेन रहते हैं और नींद नहीं ले पाते। मैंने कहा कि जिस महल की एक ईंट भी हमने नहीं लगाई उसके ऊपर भला हम चढ़ें ही क्यों? जीवन में अगर महल पर चढ़ना है तो पहले परिश्रम करो, एक-एक ईंट का संयोजन कर मजबूती से महल बनाओ फिर अगर महल पर चढ़ोगे, तो न तो ईंटे हिलेंगी और न ही सीढ़ियाँ गिरेंगी। बाकी तो जीवन में सब लोग हवाई किले बनाते हैं किन्तु कल्पना के हवाई किलों की उम्र आखिर कितनी होती है? तृष्णा का मकड़जाल व्यक्ति खुद बुनता है और उसमें उलझ कर छटपटाता हुआ अनेक रोगों से घिर जाता है। बिना परिश्रम 32 For Personal & Private Use Only Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के केवल कल्पना के हवाई किलों का निर्माण करना हमारी तृष्णा का ही विकृत रूप है। अनन्त हैं तृष्णा के तीर तृष्णा का सबसे खतरनाक रूप है अपनी आवश्यकता से अधिक सुख-साधन और उपलब्धियों को पा लेने के बावजूद भी और अधिक धन, सम्पत्ति, यश, वैभव आदि को पाने की आकांक्षा। अर्थात् दूसरों की खुशियों की कब्र पर अपनी कामयाबी के झण्डे गाड़ देने की तृष्णा। तृष्णा का यह रूप या तो व्यक्ति को चिंताग्रस्त करके अधमरा कर देता है या फिर व्यक्ति को निरंकुश तानाशाह बना कर विकृत कार्य करने के लिए प्रोत्साहित कर देता है। सद्दाम हुसैन और उनके बेटे इसके सबसे ताजा नमूने हैं। हिटलर, नादिरशाह, सिकंदर, महमूद गजनवी, चंगेज खां जैसे पता नहीं कितने तानाशाह और स्वेच्छाचारी लोग हुए, जिन्होंने अपनी तृष्णा को शांत करने के लिए कितने ही बेगुनाह लोगों के खून से होली खेली और इतिहास के पन्नों को खून में डूबो दिया। तृष्णा के ये दोनों ही रूप खतरनाक हैं। पहली विकृति चिंता, तनाव, घुटन जहाँ स्वयं आदमी को नष्ट करती है वहीं दूसरी विकृति हिंसा, आतंक भी हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय ढाँचे को कमजोर करते है। ऐसे लोगों का अंत भी बड़ा दुःखद होता है। मुसोलिनी और उसकी पत्नी को लोगों ने मार कर चौराहे पर लटका दिया था। हिटलर ने विक्षिप्त होकर आत्महत्या कर ली थी। सिकंदर वापस अपनी धरती पर भी न पहुँच पाया था। दूसरी ओर माया की आपा-धापी में व्यक्ति इतना ज्यादा उलझ गया है कि स्वयं ही नष्ट हुआ जा रहा है। उसके पास आलीशान कोठी व बंगला है लेकिन घर की सौहार्दमयी संवेदना मर चुकी है। घूमने के लिए एक से बढ़कर एक लक्जरी कारें हैं लेकिन भागम-भाग ने मन की शांति छीन ली है। उसके पास अथाह सम्पत्ति है लेकिन वहाँ प्रेम नहीं अपितु अहंकार का प्रदर्शन है। जीवन में शांति के बजाय तृष्णा है, कुण्ठा है, तनाव, अवसाद और घुटन है। मैं एक महानुभाव को जानता हूँ जिन्हें जमीन और सम्पत्ति की इतनी 33 For Personal & Private Use Only Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ तृष्णा थी कि पूरे शहर की हर जमीन को वे अपनी ही सम्पत्ति मानते थे। जमीनों को पाने के लिए वे खोटे-खरे हर तरह के काम कर देते थे। धन आए मुट्ठी में, धर्म जाए भट्ठी में' वाली सोच के व्यक्ति थे। साम, दाम, दण्ड, भेद हर तरह की नीति-अनीति वे कर दिया करते थे। अरबों रुपये की जमीनें उन्होंने बटोर ली लेकिन खुद अकाल मौत मारे गए। उनके दो लड़के हैं, दोनों के दोदो लड़कियाँ हैं । बड़े लड़के की दोनों लड़कियाँ मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं और छोटे लड़के की दोनों लड़कियाँ किसी दुर्घटना में अपंग हो चुकी हैं। वे दोनों लड़के काफी सुरक्षा में जीते हैं और शायद सोचा करते हैं कि अगर उनके पास धन नहीं होता तो आज वे अपनी लड़कियों का इलाज कैसे करवाते? मैं सोचा करता हूँ, काश! दूसरों की जमीने हड़प कर उनकी बदुआएँ न ली होतीं तो बच्चियों के इलाज की आवश्यकता ही न पड़ती। है दुखों की खाई, व्यर्थ की सिरखपाई चिंता के कारणों में एक और कारण है- 'छोटी-छोटी बातों में सिर खपाई।' इससे परिवार का माहौल कलुषित होता है । सब लोग आपस में टूटते हैं और हर व्यक्ति तनाव और चिंता से ग्रस्त रहता है। कोई बड़ी बात हो और हम सिरखपाई करें तो बात जमती भी है लेकिन छोटी-छोटी बातों को सहजतापूर्वक न लेना और उन पर विपरीत टिप्पणियाँ करना परिवार में सिर फुटव्वल की नौबत लाना है। मुझे याद है, एक महिला अपनी बच्ची को छोटी-छोटी बातों में टोका करती थी और उसकी टोकने की आदत इतनी बढ़ गई कि दिन में पच्चीस-पच्चास बार तो वह उसे टोक ही देती। धीरे-धीरे बच्ची पर टोका-टोकी का प्रभाव कम होने लगा। वह न केवल चिड़चिड़ी हो गयी अपितु माँ की बातों पर ध्यान देना भी उसने बंद कर दिया। परिणामत: माँ इस बात को लेकर चिंताग्रस्त हो गयी कि आखिर मेरी बेटी मेरा कहना क्यों नहीं मानती? अभी कुछ दिन पूर्व एक महानुभाव मेरे पास चैन्नई से आए। अपनी व्यथा सुनाते हुए वे कहने लगे, 'शादी के साल-छ: महीने तक तो मेरी और मेरी पत्नी में काफी प्रेम बना रहा लेकिन उसके बाद पता नहीं क्या हुआ कि 34 For Personal & Private Use Only Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हमारी अन-बन बढ़ती गई जिसके कारण मैं चिंतामुक्त नहीं रहता हूँ। मुझे जिंदगी भार-भूत लगने लग गई है। जब मैंने उनकी पत्नी से बात की तो उसने बताया कि ये अपने ही कारण दुःखी हैं। छोटी-छोटी बातों पर इतनी ज्यादा सिर खपाई करते हैं कि खुद तो दु:खी होते ही हैं, पूरे घर को नरक बना देते कोई बड़ी बात हो जाय और हम अपनी ओर से कोई टिप्पणी करें तब तो बात शोभा भी देती है लेकिन छोटी-मोटी बातों पर सिरखपाई करते रहोगे या छोटी-मोटी बातों को समझ नहीं पाओगे तो निहायत खुद भी दुःखी हो जोओगे और औरों को भी दुःखी करोगे। कुल मिला कर निराशावादी दृष्टिकोण, हीनभावना, मन मैं बैठा हुआ भय, हर समय दुःखदायी विचारों में डूबे रहना, वैर की गाँठों को बाँधना अथवा छोटी-मोटी बातों को सही तरीके से नहीं समझना ही चिंता का मूल कारण है। याद रखें, किसी निश्चय/निष्कर्ष पर पहुँचना चिंतन का उद्देश्य है लेकिन निश्चय हो जाने के बाद भी उसी बिंदु पर सोचते रहना चिंता का मूल कारण बन जाता है। चिंता एक, रोग अनेक ऐसे कुछ उपाय हैं जिन्हें अपनाकर हम चिंता से मुक्त हो सकते हैं पर इसके लिए जरूरी है कि पहले हम यह समझें कि इसके कौन-कौन से गम्भीर दुष्परिणाम हो सकते हैं । चिंता से जीवन में कई सुनहरे अवसर हाथ से निकल जाते हैं और निजी जीवन कटुता से भर जाता है। चिंताग्रस्त व्यक्ति केवल एक ही काम कर सकता है और वह है- 'हर बात पर चिंता'। हमारी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को कमजोर कर चिंता हमें कर्महीन तो करती ही है, साथ ही साथ हमारे भीतर ऐसे हानिकारक भावावेग भी पैदा करती है जिनसे हमारा स्वास्थ्य खराब होता है। मनुष्य के भीतर मनोवेग अच्छे व बुरे विचारों से पैदा होता है। संतोष, सहनशीलता, प्रसन्नता, हँसी, मेल-मिलाप, साहस, सेवा और प्रेम आदि से हमारे भीतर अच्छे आवेग पैदा होते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं। भय, चिंता, घृणा, दंभ, निराशा, निंदा, 35 For Personal & Private Use Only Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ईर्ष्या, लड़ाई-झगड़े आदि से बुरे आवेग पैदा होते हैं जो हमारे स्वास्थ के लिए बड़े हानिकारक होते हैं। अच्छे आवेग जहाँ हमारे शरीर के लिए बहुत लाभदायक होते हैं वहीं बुरे आवेग हमें शारीरिक और मानसिक तौर पर पीड़ित करते रहते हैं । 1 प्रायः हम सोचा करते हैं कि चिंताग्रस्त रहने वाले लोगों में कोई न कोई प्राकृतिक कमी रहती होगी, पर ऐसी बात नहीं है । चिंतित अथवा तनाव ग्रस्त रहने वाले लोगों में किसी तरह की कमजोरी नहीं होती बल्कि उसके मूल में वह अशुभ वातावरण होता है जिसमें वे रहते हैं । मैंने कई चिंताग्रस्त लोगों को देखा है जो तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त होते हैं। कुछ मैंने ऐसे चिंतित लोगों को भी देखा है जिन्हें चिंता का दौरा आने पर उनका दिल तेजी से धड़कता है और हाथ पांव भी ठण्डे पड़ जाते हैं । ऐसे लागों को मानसिक, बैचेनी, सिर दुःखना और चक्कर आना आदि रोग लगने भी शुरू हो जाते हैं। सामान्यतया हम चार घंटा काम करके जितनी थकावट पाते हैं उससे चार गुना थकावट हमें चार घंटे की चिंता दे देती है । चिंताग्रस्त व्यक्ति थोड़ासा काम करने से ही स्वयं को थका हुआ महसूस करता है । चिंता और बुरे आवेग— ये दोनों एक दूजे के पर्याय हैं और इनसे शरीर में शुगर की मात्रा बढ़ती है और शरीर कमजोर पड़ना शुरू हो जाता है। अधिक चिंता अधिक थकान देती है जबकि कम चिंता कम थकान देती है । हकीकत तो यह है कि चिंताग्रस्त व्यक्ति सदैव ही थका हुआ रहता है क्योंकि मनुष्य की थकान प्रायः उसके मस्तिष्क में ही उत्पन्न होती है। यदि आप रात भर सोये हैं और इसके बावजूद सुबह आपकी थकान नहीं उतरी है तो इसका मुख्य कारण चिंता और मानसिक तनाव ही है । कार्य को समझें कर्तव्य मैंने देखा है कि कुछ लोग जब सुबह उठते हैं तो उसके एक-दो घंटे बाद ही वे स्वयं को थका हुआ महसूस करते हैं । मेरी नजर में इसका मुख्य कारण किसी प्रकार की चिंता है या ऊब है । दिन का आरम्भ होते ही जब व्यक्ति अपने कार्यों को व्यवस्थित क्रम नहीं दे पाता तो वह बार-बार दिनभर 36 For Personal & Private Use Only Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के कार्यों को याद करके बोझिल होता है और उस पर उन कार्यों की चिंता सवार हो जाती है अथवा एक ही कार्य को बार-बार करने से व्यक्ति ऊब जाया करता है। विशेषकर घरेलू काम-काज करने वाली महिलाएँ इस परिस्थिति से गुजरती हैं। वे घर के काम काज में इस वातावरण को समझ नहीं पाती अथवा कार्यों को व्यवस्थित सम्पादित नहीं कर पाती इसलिए वे ऊब जाया करती हैं। कई बार 'वर्क लोड' ज्यादा होने पर वे यही सोचने लगती हैं, क्या सारे कार्यों का ठेका मैंने ही ले रखा है.? यह सोच कर महिलाएँ कार्य को बेमन से करती हैं। परिणामस्वरूप वह कार्य भारभूत भी होता है और चिंता देने वाला भी। अच्छा होगा कि वे महिलाएँ घर के कार्य को अपना कर्त्तव्य समझते हुए बड़प्पन दिखाएँ और क्रमशः एक-एक कार्य को सम्पन्न करें। दिन में दो-तीन बार शरीर को आराम भी दें। दीपावली या अन्य किसी त्यौहार के मौके पर घर की सफाई के नाम पर एक साथ सारे काम हाथ में न उठाएँ। वे महिलाएं अपने घर में सदैव दीवाली मनाती हैं जो केवल दीवाली के मौके पर ही घर की साफ-सफाई नहीं करतीं अपितु बारहों महिने इसके प्रति सजग रहा करती हैं। भरोसा रखें भवितव्यता पर अगर लगे कि आप किसी बात को लेकर बार-बार तनावग्रस्त हो रहे हैं तो अच्छा होगा कि उसे आप भवितव्यता पर छोड़ दें और स्वयं को किसी भी सृजनात्मक कार्य में जोड़ दें क्योंकि खाली बैठने से हमारा मन व्यर्थ की चिंताओं के प्रति ज्यादा आकर्षित होता है। अपने द्वारा या परिवार के अन्य किसी सदस्य के द्वारा किसी प्रकार की गलती हो जाए या काम बिगड़ जाए तो उसको अधिक तूल न दें। माफी मांग लें, माफ कर दें और उसे भूलने की कोशिश करें। चिंता के शारीरिक रूप से भी जबरदस्त प्रभाव पड़ते हैं। हमारी मानसिक अवस्था और पाचन शक्ति का गहरा संबंध है। ज्यादा चिंता करने वाले व्यक्ति की पाचनशक्ति बिगड़ती है और भोजन हजम नहीं होता। चिंतातुर व्यक्ति का दिमाग ही तनावग्रस्त नहीं रहता अपितु पेट भी तनावग्रस्त रहता है। 37 For Personal & Private Use Only Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यदि मनुष्य चिंताग्रस्त है तो उसका पेट एक विशेष प्रकार की कसावट में आ जाता है। परिणामस्वरूप चिंतित व्यक्ति को भूख कम लगती है। भय और चिंता से पेट में अल्सर होने की संभावना भी रहती है। छोटी आंत, बड़ी आंत, आमाशय, किडनी सब कुछ प्रभावित होती हैं चिंता से। चिंता का दुष्परिणाम : सबकी नींद हराम आज की तारीख में चिंता ने जो सबसे गहरा दुष्परिणाम दिया है वह है- 'लोगों की नींद हराम करना।' पहले चिंता के कारण नींद नहीं आती और फिर नींद न आने की चिंता बढ़नी शुरू हो जाती है। हमारे यहाँ संबोधिसाधना शिविर में कई साधक ऐसे आते हैं जो अनिद्रा-रोग के शिकार होते हैं। वर्षों तक दवाइयाँ खा लेने के बावजूद वे इस रोग को मिटा नहीं पाते लेकिन सात दिन का साधना शिविर उन्हें आश्चर्यजनक परिणाम देता है और वे नींद की गोली खाये बगैर ही बेहद आराम से सोते हैं क्योंकि नींद न आने के जो भी कारण थे, वे साधना से स्वतः ही मिट जाते हैं। अनिद्रा के कई कारण हो सकते हैं पर सबसे बड़ा कारण है भय और चिंता। किसी डॉक्टर ने एक मेडिकल केस में कागजों की हेराफेरी कर दी। संयोग से अगले दिन अखबार में इस बात की हल्की-सी आशंका की न्युज आ गई। बस हो गयी. उसकी नींद हराम! कागजों को वापस सही करना उसके हाथ में नहीं था और मन में भय फँसा रहता था कि कहीं पुलिस को इस धोखाधड़ी की खबर न लग जाए। डॉक्टर जो अब तक लोगों का इलाज करता रहा, वह अपने ही मनोमस्तिष्क में पनपी हुई चिंता के कारण अनिद्रा का शिकार हो गया। एक बहिन ने मुझे बताया कि वह कई वर्षों से अनिद्रा की शिकार है। देश में कई मनोचिकित्सकों से वह अपना उपचार करवा चुकी है। स्पष्ट तौर पर उसके मन में किसी प्रकार की चिंता और तनाव भी नहीं है। उसके जीवन में सारी सुख-सुविधाएँ हैं। थोड़े दिन बाद मुझे ज्ञात हुआ कि उसकी जेठानी से उसकी काफी अनबन रही। दोनों वर्षों तक साथ रहीं लेकिन एक दूजे को तनाव देने के अलावा उन्होंने कुछ भी नहीं किया। वर्षों तक ऐसा ही चलता रहा। परिणामस्वरूप अलग हो जाने के बाद भी उसने मेरे साथ ऐसा क्यों 38 For Personal & Private Use Only Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किया, इन्हीं सब बातों के तनाव और चिंता के कारण उसकी अनिद्रा बढ़ती चली गई। ___ संबंधों में जब ज्यादा अपेक्षा पाल-ली जाती है और जब वे अपेक्षाएं पूर्ण नहीं होती हैं तो हम तनावग्रस्त हो जाते हैं। हमें प्रत्येक व्यक्ति और उसके व्यवहार को सहजता से लेना चाहिए, अगर कोई हमारे काम आए तब भी और न आए तब भी। मेरे सामने दो तरह की घटनाएँ हैं। एक बहिन अपनी देवरानी की यह कहकर जमकर आलोचना कर रही थी कि जब उसकी डिलेवरी हुई तो मैंने दो महीने तक पल-प्रतिपल उसकी सेवा की लेकिन वह इतनी खुदगर्ज निकली कि मैं कुछ दिनों के लिए पीहर चली गई तो वह दस दिन भी मेरे बच्चों को प्रेम से खाना नहीं खिला सकी। वहीं कल आगरा की एक बहिन बता रही थी कि उसके पाँव की हड्डी टूट गई थी पर उसकी देवरानी ने इतनी सार-संभाल की कि वह उसकी कर्जदार हो गयी। वह कहने लगी, 'मेरी बेटी भी ऐसी सेवा नहीं कर सकती जैसी उस देवरानी ने की।' मैंने देखा कि देवरानी की तारीफ करते-करते उस महिला की आँखें भर आई थीं। सावधान रहें! दुनिया में दोनों तरह के लोग होते हैं। कुछ आपके जीवन में मददगार बनते हैं तो कुछ आपके जीवन-विकास में बाधक भी होते हैं। जो आपके काम आए उससे तो प्रेम करें ही, पर उससे भी प्रेम करें जो आपके काम नहीं आ रहा है, शायद आपका प्रेम उसे काम आने लायक बना दे। दें, मन को विश्राम नींद लेने के लिए शांत वातावरण की जितनी जरूरत होती है उससे भी कहीं ज्यादा जरूरत मानसिक शांति की होती है अन्यथा वह वातावरण की शांति और अधिक मानसिक अशांति पैदा कर देती है। यदि आपको नींद नहीं आती है तो सीधे लेटे रहें। शरीर को ढीला छोड़ दें और जीवन की किसी अच्छी घटना या स्मृतियों के बारे में सोचें ताकि अन्य चिंताओं से उबर सकें। अनिद्रा से बचने के लिए आप सदैव शांत व प्रसन्नचित्त हृदय से 'बेडरूम' में जाएँ और सावधान रहें ! चिंता, भय और तनाव नींद के शत्रु होते हैं। बिस्तर पर जाने के बाद दिनभर के काम-काज के झमेले को याद न करें। जो लोग रात 39 For Personal & Private Use Only Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ को बिस्तर पर पड़े हुए भी कारोबार के बारे में सोचते रहते हैं, वे अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं। ध्यान रखें, नींद के लिए जबरन प्रयास न करें । इससे अनिद्रा और अधिक प्रभावी होती है । निद्रा की चिंता ही अनिद्रा को बढ़ाती है । इसलिए नींद की ज्यादा चिंता करने की बजाय शारीरिक और मानसिक आराम पर ज्यादा ध्यान दें । चक्कर आने की शिकायत का संबंध भी चिंता और तनाव से है क्योंकि इन हानिकारक मनोवेगों से मस्तिष्क की नाड़ियाँ सिकुड़ जाती हैं। परिणामतः रक्तसंचार प्रभावित होता है और हमें चक्कर आने शुरू होते हैं । जिन लोगों की गर्दन के पीछे दर्द की शिकायत रहती है वे लोग इसके लिए किसी डॉक्टर के पास जाने से पहले आत्मावलोकन कर लें कि आप कई दिन से किसी चिंता के शिकार तो नहीं हैं। चिंता के कारण गर्दन के पिछले भाग की मासपेशियों में खिंचाव आ जाता है और गर्दन का दर्द शुरू हो जाता है । अगर कभी परीक्षण करना हो तो आप कभी भी, कहीं कुर्सी पर बैठ जाएँ अथवा आराम से जमीन पर भी बैठ जाएँ और आधे घंटे तक आँखें बंद करके कोई गंभीर चिंता करनी शुरू कर दें। आप पायेंगे कि आधे घंटा बाद आपकी गर्दन अकड़ गई है और पीछे के भाग में दर्द होना शुरू हो गया है; साथ ही साथ सिरदर्द की शिकायत भी शुरू हो गई है। मनोचिकित्सकों के अनुसार पिच्यासी फीसदी लोगों के सिरदर्द का कारण चिंता है। सिरदर्द को मिटाने के लिए कोई दवा लेने से पहले आप उसे मिटायें जो उस सिरदर्द का मूल कारण है। जैसे ही चिंता हटेगी, सिर हल्का हो जाएगा और दर्द गायब हो जाएगा । चिंता करने से नख से शिखा तक का भाग प्रभावित होता है। कब्ज रहना और भूख न लगना तो चिंता करने वालों की आम शिकायत रहती है । कई लोग मेरे पास आते रहते हैं । उनकी शिकायत रहती है कि उनकी आँखों में हर समय खिंचाव रहता है। कई तरह की दवाइयों का उपयोग कर लेने के बावजूद भी उनके मन में चिंता ही बनी रहती है । आँखें शरीर का सबसे कोमल अंग है और उन पर चिंता का सबसे पहले प्रभाव पड़ता है । चिंता के 40 For Personal & Private Use Only Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कारण आँखों की मासपेशियाँ कस जाती हैं और आँखों में दर्द होना शुरू हो जाता है। कुछ दिन पूर्व संबोधि-धाम में आयोजित एक स्वास्थ्य संगोष्ठी में किसी डॉक्टर ने जिक्र किया था कि भय और चिंता के कारण कई बार मनुष्य की आँखें खराब हो जाती हैं। उसे दिखना कम हो जाता है और बोलने की शक्ति भी प्रभावित हो जाती है। उन्होंने एक मरीज का हाल सुनाया कि वह आर्थिक दृष्टि से काफी डाँवाडोल हो चुका था। कई तरह के संकटों में फँस जाने के कारण उसे चिंता ने घेर लिया था। परिणामस्वरूप कुछ ही दिनों में उसकी आँखें तेजी से झपकने लगी और उसकी बोलने की शक्ति भी कमजोर होने लगी। चिंताग्रस्त व्यक्ति कई प्रकार की मानसिक उलझनों में फँसा रहता है। अपनी बीमारी का परिचय वह स्वयं ही औरों को देता है। कभी कहता है कि 'मुझे किसी काम में रूचि नहीं रही और मेरा मूड हर समय खराब रहता है। जैसा मैं पहले था, वैसा अब न रहा। पता नहीं, मेरे मन को क्या हो गया है? वह हर बात में यही जिक्र करता है कि अब मैं जीने योग्य नहीं रहा और कभी भी मर सकता हूँ। ऐसा व्यक्ति बुज़दिल और चिड़चिड़े स्वभाव का तो होता ही है, साथ में वह अपने-आपको बहुत दुःखी अनुभव करता है। वह खुद तो परेशान रहता ही है, अपनी उपस्थिति से औरों को भी परेशान करता रहता है। अगर कोई आपको शिकायत करे कि मेरी याददाश्त कमजोर हो रही है तो समझलो कि जरूर वह किसी चिंता का शिकार हो चुका है। आखिर कैसे बचें चिंता से __ अगर उपाय किये जाएँ तो इसका उत्तर बड़ा सरल है अन्यथा यह बड़ा पेचीदा प्रश्न है। चिंतामुक्ति के लिए कुछ उपायों पर अमल किया जा सकता है जो हमें धीरे-धीरे इस भंवर से बाहर ला सकते हैं। जिएँ वर्तमान में यह समझें कि चिंता-मुक्ति के लिए यह बेहतरीन टॉनिक है। अतीत की स्मृतियाँ और भविष्य की कल्पनाएँ जहाँ हमारी चिंता और हमारे तनाव को बढ़ावा देती हैं वहीं वर्तमान का चिंतन हमें चिंता से छुटकारा दिला सकता है। 41 For Personal & Private Use Only Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैसे ही व्यक्ति वर्तमानजीवी होता है, वह ज्यादा सोचने की बजाय कुछ करने में विश्वास रखता है। जो बीत गया है उसे वापस लौटाया नहीं जा सकता और जो होने वाला है, होकर ही रहता है। फिर व्यर्थ का तनाव क्यों? मेरे पास एक ऐसे व्यक्ति को लाया गया जो पहले काफी सम्पन्न था लेकिन संयोग से उसके किसी पार्टनर ने उसे धोखा दे दिया और उसकी आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई। उसके बावजूद भी उसके जीवनयापन में कोई कमी नहीं थी फिर भी मैंने देखा कि दो वर्षों से वह निरन्तर कमजोर होता जा रहा था और उसका चेहरा बिल्कल रोगी की तरह हो गया था। बातचीत में खबर लगी कि उस व्यक्ति के मन में एक ही मलाल था कि मैंने उस व्यक्ति पर जीवन भर अहसान किया किन्तु उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया? बार-बार इसी तरह की बातें सोच-सोच कर और अपनी अतीत की बातों को याद कर वह व्यक्ति चिंताग्रस्त हो गया। मैंने समझाया कि बीता हआ समय कभी लौटाया नहीं जा सकता। इसलिए व्यर्थ के विकल्पों में गोते खाने की बजाय जैसी वर्तमान में स्थिति है उसे स्वीकार करो और वर्तमान को सुधारने का प्रयास करो। दुनिया में जितनी भी ध्यान की विधियाँ हैं, उनका मुख्य चिंतन वर्तमान से ही जुड़ा हुआ है क्योंकि अतीत का दर्शन चिंता है, पर वर्तमान का दर्शन चिंतन है। चिंताग्रस्त व्यक्ति को चाहिये, वह अकेला कम से कम रहे। चिंतनशील व्यक्ति अगर अकेला रहेगा तो बुद्ध बन जायेगा पर चिंताग्रस्त व्यक्ति के लिए एकाकीपन घातक है। अच्छा होगा निठल्ले बैठने की बजाय सदा कर्मयोग में लगे रहें। अकेलेपन में निरर्थक बैठने से चिंताओं का अम्बार लगता है, और ये प्रभावी होकर हम पर हावी होने लगती है। अगर किसी कारणवश चिंता के चक्रव्यूह में फंस गये हैं तो भीतर ही भीतर घुटने की बजाय अपने मन की बात अपने किसी मित्र को कह डालिये ताकि आपका मन हल्का हो जाएगा। नहीं तो ईश्वर को अपना सब कुछ मानकर किसी मंदिर में जाकर प्रतिमा के सामने अपना सब कुछ कह डालिये। अथवा किसी बगीचे में जाकर पेड़-पौधे को अपना मन का मीत मानकर सारी 42 For Personal & Private Use Only Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बात कह डालिये। पेड़ पौधों में एक खासियत होती है कि वे तुम्हारी सभी बातें प्रेम से पचा लेते हैं। परिणाम यह होगा कि तुम अपनी बात भी कह दोगे और तुम्हारी बात इधर-उधर भी न होगी। बीते कल की घटनाओं को ज्यादा याद मत कीजिये। और न ही भविष्य की अनहोनी आशंका की डरावनी छाया से डरिये। जीवन में हिम्मत और आत्मविश्वास हर पल जरूरी है। अगर समस्याओं ने आपको घेर लिया है तो धैर्य रखिये। समस्याओं के गट्ठड़ में से दो पतली लकड़ियों की समस्याओं को चुनिये और उन्हें तोड़कर अपनी समस्याओं के भार को कम कीजिये। ऐसा रोज कीजिये आप समस्या और चिंता से मुक्त हो जायेंगे। सदा याद रखें आपका जन्म किन्हीं महान उद्देश्यों को लेकर हुआ है। यों व्यर्थ तनाव चिंता में जीकर अपने-आपको अंधेरे में डालने की बजाय शांति और सफलता की ओर अपने कदम बढ़ाइये और जन्मदाता के सपने को साकार कीजिये। जीवन से निराशा और हताशा को हटाइए और प्रकाश के मालिक बनिये। मैं आपसे इतना ही चाहता हूँ, परम पिता परमेश्वर की भी आपके लिए ऐसी ही चाह है। 43 For Personal & Private Use Only Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ क्रोध पर कैसे काबू पाएँ ? सावधान ! दो मिनट का क्रोध भी हमारे मधुर सम्बन्धों में जहर घोल सकता है। मनुष्य के जीवन में दुःख के दो कारण होते हैं । पहला कारण है: अभाव, आपदा अथवा संयोग और दूसरा कारण है: व्यक्ति स्वयं । दूसरे के व्यवहार और स्वभाव के कारण उसके जीवन में जो दुःख आते हैं उनको रोक पाना मनुष्य के हाथ में कम है, लेकिन अपने ही व्यवहार और स्वभाव के कारण आने वाले दुःखों पर मनुष्य विजय प्राप्त कर सकता है । अपने ही व्यवहार और स्वभाव के कारण मनुष्य दुःखों को पाता है जिसमें मुख्य कारण है मनुष्य के व्यवहार और स्वभाव में पलने वाला क्रोध । क्षणिक संवेग है क्रोध क्रोध हमारे भीतर उठने वाला एक ऐसा संवेग है जो क्षणभर में जगता है और क्षणभर में शान्त हो जाता है । मनुष्य अपने होश- हवास खोकर कुछ समय के लिए एक ऐसी स्थिति में पहुँच जाता है । जहाँ वह क्रोध के वशीभूत होकर अपनों और परायों दोनों को नुकसान पहुँचाता है। मैंने इसे क्षणिक संवेग इसलिए कहा क्योंकि कई बार एक पल के लिए व्यक्ति आवेश और आक्रोश में आकर कोई भी निर्णय या कार्य कर बैठता है, पर कुछ पल के बाद ही आत्मविवेक जगने पर उसके हाथ में पश्चात्ताप के अलावा कुछ भी नहीं बचता । For Personal & Private Use Only Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ एक बहिन मुझे बता रही थी, 'जब भी मुझे गुस्सा आता है मैं सीधा अपने बच्चों पर हाथ उठाती हूँ और ताबड़तोड़ उनकी पिटाई कर देती हूँ।' मैंने पूछा, 'फिर क्या करती हो?' वह कहने लगी, उसके बाद मुझे अफसोस होता है और मैं रोती हूँ। रोज ही ऐसा होता है कि बच्चों की पिटाई और मेरा रोना दोनों एक साथ चलते हैं। वास्तव में यह क्षणिक संवेग है। बच्चों को पीटना क्रोध का प्रकटीकरण है जबकि उसके बाद रोना अपनी गलती का अहसास है। व्यक्ति ऐसी गलतियाँ बार-बार इसलिए करता है क्योंकि उसका स्वयं पर अंकुश नहीं है। सच तो यह है कि क्रोध तूफान की तरह आता है और हमें चारों ओर से घेर लेता है। हम विवेकशून्य होकर गाली-गलौच या हाथा-पाई भी कर लेते हैं और इस तरह हम क्रोध के तूफान में घिर जाते है। क्रोधी आदमी कीड़े, मकोड़े और बिच्छू तक को मार देता है, पर अपने ही भीतर पलने वाले क्रोध को क्यों नहीं मार पाता? मनुष्य अपने जीवन में मूलतः चार वृत्तियों में जीता है और वे हैं- काम, क्रोध, माया और लोभ । मेरे देखे इनमें से काम, माया और लोभ की वृत्तियाँ तो मनुष्य को आंशिक लाभ और सुख भी देती है लेकिन क्रोध एक ऐसी वृत्ति है जिसमें व्यक्ति खुद भी जलता है और दूसरों को भी जलाता है। हकीकत तो यह है कि क्रोधी व्यक्ति अपने भीतर और बाहर एक ऐसी आग लगाता है जिसमें वह औरों को जलाने की कोशिश करता है पर उसे बाद में पता चलता है कि इससे वह औरों को जला पाया या न जला पाया पर खुद तो पहले ही झुलस गया। क्रोध में जलना तो तूली की तरह है जिसे दूसरों को जलाने के लिए पहले स्वयं को जलना होता है। क्रोध एक : नुकसान अनेक मैं कई बार सोचा करता हूँ कि क्या धरती पर कोई ऐसा मनुष्य है जिसने अपनी जिन्दगी में कभी क्रोध न किया हो? ऐसे ब्रह्मचारी साधक तो मिल जाएँगे जिन्होंने कभी काम का सेवन नहीं किया हो पर 'क्रोध' तो 'काम' विजेताओं पर भी विजय प्राप्त कर लेता है। सच्चाई तो यह है कि जब आप क्रोध के नियंत्रण में होते हैं तो स्वयं का नियंत्रण खो देते हैं। सावधान ! एक पल का क्रोध आपके पूरे भविष्य को बिगाड़ सकता है। जिन संबंधों को 45 For Personal & Private Use Only Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मधुर बनाने में हमें दस वर्ष तक एक दूसरे को सेटिस्फाइड करना पड़ता है वहीं हमारा दस मिनट का गुस्सा उन संबंधों पर पानी फेर सकता है। सफलता के बढ़ते हुए कदमों में केले के छिलके का काम करता है हमारा गुस्सा । हमारा क्रोध हमें सफलता से हाथ धोने के लिए मजबूर कर देता है। 24 घंटे भोजन करके हम जो शक्ति अपने शरीर में पाते हैं, कुछ मिनट का गुस्सा उस शक्ति को क्षीण कर देता है । जो बच्चे बचपन में ज्यादा गुस्सा करते हैं, बड़े होने पर उनका दिमाग कमजोर हो जाता है । I क्रोध में व्यक्ति दो तरह का हिंसक हो जाता है । कभी वह औरों को नुकसान पहुँचाता है तो कभी स्वयं को । औरों को नुकसान पहुँचाने के लिए वह गाली-गलौच करता है, हाथापाई करता है अथवा किसी शस्त्र से प्रहार भी कर देता है। लेकिन कई बार व्यक्ति इसका उलटा भी कर लेता है । क्रोध में आकर वह अपना ही सिर दीवार से टकरा देता है। भोजन कर रहा है तो थाली को उठाकर फेंक देता है। बचपन में मैंने देखा है कि हमारे मौहल्ले में एक ऐसा लड़का रहता था जिसे गुस्सा बहुत आता था । एक दिन उसके घर में किसी ने उसे टोक दिया। उस लड़के को गुस्सा आ गया, संयोग से उस दिन उसे परीक्षा देने जाना था किंतु गुस्से में भरकर उसने निर्णय ले लिया कि मैं परीक्षा देने नहीं जाऊँगा। घर के सारे लोग उसे समझा कर हार गये लेकिन वह परीक्षा देने नहीं गया और इस तरह आवेश में आकर लिये गये निर्णय ने उसका पूरा वर्ष बेकार कर दिया। इस तरह के निर्णय लेने के कुछ समय बाद व्यक्ति को भले ही लगता हो कि उसका वह निर्णय गलत था लेकिन वह कुछ कर पाये, उससे पहले ही उसका क्रोध अपना गलत प्रभाव दिखा ही देता है, और ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपना अहित कर बैठता है । क्रोध के तीन भेद व्यक्ति तीन तरह का क्रोध करता है । अल्पकालीन क्रोध, अस्थाई क्रोध और स्थाई क्रोध । अल्पकालीन गुस्सा कुछ मिनट या घंटे तक का होता है और उससे माहौल बिगड़ता है। किसी कारण से हड़बड़ी में व्यक्ति कुछ भी कह देता है और कुछ मिनट बाद अफसोस करता है । मैं मध्य प्रदेश के एक शहर में था । मैंने देखा कि एक व्यक्ति जो वहाँ 46 For Personal & Private Use Only Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के समाज का अध्यक्ष था, उसका पता ही नहीं लगता कि बात-बात में उसे कब क्रोध आ जाता है? इतना ही नहीं, वह गुस्से में आकर माइक पर, मंच पर कुछ भी बोल देता था। पर वह था इतना निश्च्छल दिल का आदमी कि या तो दो मिनट बाद ही सामने वाले से माफी मांग लेता अथवा यह कहते हुए मधुर मुस्कान से बात खत्म कर देता कि मैंने कब गुस्सा किया। ___अल्पकालीन क्रोध करने वाले लोग किसी बात को ज्यादा लंबी नहीं खींचते। बस दो मिनट के लिए जैसे हवा में गुबार आया हो या पानी में बुलबुला उठा हो। ऐसा होता है उसका गुस्सा। ऐसे लोग कभी भावुक हो जाते हैं और कभी कठोर। जिसे मैं अस्थायी क्रोध कहना चाहता हूँ उन लोगों की प्रकृति ऐसी होती है कि वे किसी भी बात को दो दिन तक ढोते रहते हैं। बात छोटी-सी होगी पर उसे खुद ही बढ़ाएँगे और दो दिन तक रूठे रहेंगे। फिर यह प्रतीक्षा करेंगे कि कोई उन्हें मनाएं या 'सॉरी' कहे तो वे वापस पहले जैसे हो जाएँ। ऐसे लोग पाँच-सात दिन तक तो औरों से 'सॉरी' कहलवाने का इंतजार करते हैं, पर उसके बाद खुद ही सीधे और शांत हो जाते हैं। तीसरी प्रकृति होती है स्थायी क्रोध की। ऐसे लोग मरते दम तक किसी भी बात को ढोते रहते हैं। जैसे किसी ने चार लोगों के बीच अपमानजनक कोई बात कह दी अथवा किसी की शादी में जाने पर सामने वाला व्यक्ति सबसे तो घुलमिल कर बात करे पर उनसे बात करना भूल जाए, यदि परिवार के किसी सदस्य द्वारा सहजता में ही कोई व्यंग्यात्मक बात कह दी जाए तो उस श्रेणी के क्रोध में जीने वाले लोग उनकी गांठ बाँध लेते हैं और धीरे-धीरे अपने व्यवहार के द्वारा उस गांठ को और भी अधिक मजबूत करते रहते हैं। धीरे-धीरे यह गांठ जो पहले तो एक तरफी होती है पर फिर दो तरफी हो कर कई परिवार और समाज में विभाजन करा देती है। जैसे गन्ने की गांठ में एक बूंद भी रस नहीं होता वैसे ही जो लोग मन में गाँठे बांध कर रखते हैं, उनका भी जीवन नीरस हो जाता है। न बांधे वैर की गांठ हम एक शहर में थे। किसी महानुभाव ने तपाराधना के उपलक्ष्य में 47 For Personal & Private Use Only Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पूर्ण समाज के भोज का आयोजन किया। जिस दिन भोज का आयोजन था उस दिन समाज के कुछ वरिष्ठ व्यक्ति हमारे पास आए और कहने लगे कि 'जिस व्यक्ति के द्वारा आज सम्पूर्ण भोज का आयोजन है, वे दो भाई हैं लेकिन उनका दूसरा भाई व उसका परिवार इस भोज में नहीं आएगा। उन लोगों ने हमसे निवेदन किया कि, साहब, आप चलें और उसे समझाएँ । शायद आपके कहने से वह मान जाए।' उन लोगों के साथ मैं उस महानुभाव के घर गया। उसने मुझे सम्मानपूर्वक बैठाया। बात ही बात में मैंने कहा कि 'आज तो आप के परिवार की ओर से सम्पूर्ण समाज का भोज हैं।' उसने कहा, आप ऐसा न कहें क्योंकि वह मेरा नहीं बल्कि मेरे भाई के घर का है।' मैंने कहा, 'सो तो ठीक है लेकिन आप लोग तो आएंगे न!' वह तपाक से बोल पड़ा, 'किसी हालत में नहीं।' मैंने पूछा, 'क्यों ऐसी क्या बात है?' वह कहने लगा कि 'सोलह साल पहले भरे समाज में उसने मेरा अपमान किया था तब से आज तक मैंने उसके घर का पानी तक नहीं पीया है।' मैंने बड़ी सहजता से उस भाई से कहा – 'भाई, जरा सोलह साल पुराना कोई कलेण्डर लाना।' मेरी बात सुनकर वह चौंका। उसने कहा, 'आप भी कैसी मजाक करते हैं? सोलह साल पुराना कलेण्डर घर में थोड़े ही रखा जाता है। मैंने कहा - 'महीना बीतता है तो कलेण्डरं का पन्ना पलटा जाता है और वर्ष बीतने पर कलेण्डर को ही पलट दिया जाता है। जब सोलह साल पुराना कलेण्डर घर में नहीं है तो सोलह साल पुरानी बातों को क्यों ढो रहे हो।' मेरी समझाने से उसके दिमाग में मेरी बात थोड़ी-सी उतरी। मैंने दूसरे भाई को भी बुलवाया और दोनों को एक दूसरे के हाथ से मिश्री का टुकड़ा खिलाकर पारस्परिक प्रेम स्थापित किया। यह तो संयोग था कि ऐसा हो गया अन्यथा क्रोध और आवेश में तो बँधी हुई वैर की गांठों को कुछ ही लोग ऐसे होते हैं तो जीते जी वापस खोल पाते हैं। जीवन में इस तरह की स्थिति खड़ा करता है हमारे भीतर पलने वाला क्रोध। 48 For Personal & Private Use Only Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बाहर मुस्कान तो घर में क्रोध क्यों? ___ कुछ लोगों की कुछ विचित्र आदत होती है। वे बाजार में, ऑफिस में, दुकान में या दोस्तों के बीच सदा प्रसन्न और मुस्कुराते रहेंगे पर घर पहुँचते ही गंभीर और गुस्से से भरे हुए हो जाएँगे। वे छोटी-छोटी बातों पर घर में गुस्सा करेंगे और घर की शांति को भंग करेंगे। आप घर में बड़े हैं तो उसका अर्थ यह नहीं है कि हर समय आप हो-हल्ला करें या अपने बड़प्पन को जताने के लिए घर के वातावरण को कलुषित करें। आपकी बड़ाई इसमें है कि आप घर में अपने परिवार के सदस्यों को इतना प्रेम दें कि वे आपके जाने पर आपकी शीघ्र पुर्नवापसी की कामना करें। आप नहीं जानते कि आप बार-बार गुस्सा करके अपने खुशहाल घर को नरक बना देते हैं और परिवार का हर सदस्य भीतर ही भीतर आप से टूटा रहता है। फिर स्थिति यह होती है कि जब आप सामने होते हैं तो सबं लोग आपसे दबे रहते हैं और आपके बाहर जाने पर आपकी मज़ाक उड़ाई जाती है। पत्नी कहती है, 'छोड़ो, अब उनकी बातों पर कौन ध्यान दे क्योंकि 'हो-हल्ला' करना तो उनकी आदत ही बन गई है।' मुझे याद है, एक व्यक्ति जो गुस्सा बहुत किया करता था। पत्नी भी कम न थी। एक दिन पत्नी ने रात ग्यारह बजे अपने पति को नींद में से उठाया और हाथ में एक दूध का गिलास देते हुए कहा, 'लो दूध पी लो।' । पति ने कहा, 'आज क्या बात है, जीवन में कभी तूने रात को दूध नहीं पिलाया, आज अचानक प्रेम कैसे उमड़ आया।' पत्नी ने कहा, 'जी! छोड़ो प्रेम-रोम की बातें। अभी-अभी मैंने कलैण्डर देखा, आज नाग पंचमी है, तो रात को साँप कहाँ से लाऊँ दूध पिलाने। तो तुमको ही.....।' मुझे याद है कि एक व्यक्ति हर समय घर में गुस्से में ही रहता था। एक दिन उसने अपनी पत्नी से कहा, 'मैं पड़ौस के शहर में जा रहा हूँ। दो दिन में वापस लौट आऊँगा।' क्या आप बताएँगे कि उसके ऐसा कहने पर पत्नी ने मन में क्या सोचा होगा? तब शायद उसने सोचा होगा कि दो दिन नहीं बल्कि दस दिन बाद भी आओ तो भी कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि तुम जितने बाहर रहते हो, घर में उतनी ही शान्ति रहती है। 49 For Personal & Private Use Only Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यदि कोई शान्त स्वभाव वाला व्यक्ति अपनी पत्नी से दो दिन बाद वापिस आने का कहेगा तो पत्नी यही कहेगी कि हो सके तो जल्दी लौट के आना क्योंकि तुम्हारे जाने से घर सूनासूना हो जाता है। आप अपने ही क्रोधपूर्ण व्यवहार से घर को नरक बनाते हैं और शान्तिपूर्ण व्यवहार से घर को स्वर्ग। तिरुवल्लुवर कहा करते थे कि जो लोग आत्मरक्षा और मन की शान्ति चाहते हैं वे अपने जीवन में क्रोध से जरूर बचें। क्रोध करें, मगर सात्विक हमारा क्रोध तीन तरह का होता है सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। घर की मर्यादाओं को बनाए रखने के लिए अथवा औरों की भलाई के लिए किया जाने वाला क्रोध सात्त्विक क्रोध होता है। इसमें व्यक्ति औरों को सुधारना चाहता है पर किसी का नुकसान करके नहीं। व्यक्ति का दूसरा गुस्सा होता है राजसिक जो अहंकारमूलक क्रोध होता है। मैंने कहा और तुमने नहीं माना यानी आपके अहंकार की संतुष्टि नहीं हुई इसलिए आपको क्रोध आया है। कई बार देखा करता हूँ कि ऑफिस में बॉस ने अथवा किसी मैनेजर ने अपने अधीनस्थ कर्मचारी को कोई काम सौंपा। उस दिन उस कार्य की कोई खास जरूरत न थी और वह व्यक्ति उस कार्य को पूर्ण न कर पाया। सांझ को जब मैनेजर को खबर मिली तो उसे गुस्सा आ गया हालांकि उसे भी इस बात की खबर थी कि यह काम कोई खास जरूरी नहीं है। लेकिन वह गुस्सा केवल उस बात के लिए कर बैठा कि मैंने कहा और तुमने नजरअंदाज कर दिया। मेरे देखे घर के अभिभावकों को अधिकांश गुस्सा लगभग इसी कारण आता है। यह क्रोध होता है अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए। .. तीसरा क्रोध होता है तामसिक यानी ऐसा गुस्सा जो व्यक्ति केवल दूसरों को नीचा दिखाने के लिए करता है। इसमें व्यक्ति दस लोगों के बीच सामनेवाले को खरी-खोटी सुनाता है और उसकी दो कमजोरियों को भी सब लोगों के सामने व्यक्त करता है। — लाभ और हानि की दृष्टि से अगर हम गुस्से को देखते हैं तो उसकी हानियाँ ही ज्यादा नजर आती हैं। क्रोधी व्यक्ति हर ओर से नुकसान उठाता है 50 For Personal & Private Use Only Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ स्वास्थ्य से भी और संबंधों से भी। तीव्र क्रोध से जहाँ शरीर में अल्सर जैसे रोग पैदा हो जाते हैं, वहीं मानसिक तनाव भी पैदा हो जाता है। उच्च रक्तचाप का तो मूल कारण हमारा क्रोध ही होता है। होंठों की मुस्कान जहाँ हमारे चेहरे के सौन्दर्य को बढ़ाती है, वहीं क्रोध की रेखा सौन्दर्य को मिट्टी में मिला देती है। क्रोध हमारे दिमाग को कमजोर करने के साथ-साथ शरीर को भी कमजोर करता है इसलिए जब हमें कोई दुबला-पतला कमजोर शरीर वाला व्यक्ति मिलता है तो हम तत्काल पूछ लेते हैं - 'क्या बात है? गुस्सा बहुत करते हो क्या?' एक बच्चा भी जानता है कि गुस्सा आदमी के शरीर से रक्त को सोख लेता है। बुजुर्ग लोग तो यहाँ तक कहा करते थे कि गुस्से से भरी हुई महिला अगर अपने आंचल का दूध भी अपने बच्चे को पिलाती है तो वह ज़हर बन जाता है। मूर्खता से शुरुआत, पश्चाताप पर पूर्ण ___ गीता कहती है कि क्रोध मूर्खता को पैदा करता है। मूढ़ता से स्मृतिभ्रम होता है और स्मृतिभ्रम से बुद्धि का नाश होता है। जीवन भर याद रखें कि क्रोध की शुरूआत मूर्खता से होती है और उसका समापन पश्चाताप से। क्रोध में व्यक्ति अपना विवेक खो देता है। विवेक खोने के कारण व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है और कई बार क्रोधित व्यक्ति ऐसे कार्य भी कर देता है जिनका परिणाम बड़ा गम्भीर होता है। आदमी को यह पता नहीं लगता कि वह किसको क्या कह रहा है? गुस्से में भरा व्यक्ति अपनी ही संतान को सूअर की औलाद,' जैसी पता नहीं कितनी ही गालियाँ देता है। गुस्से में अपने आप को ही सूअर बना देता है। मुझे याद है: एक फिल्म हॉल में पति-पत्नी फिल्म देख रहे थे। अचानक पत्नी की गोद में सोया हुआ बच्चा रो पड़ा। वह मुश्किल से आठ-नौ महीने का होगा। उस व्यक्ति ने पत्नी से कहा, 'उसे दूध पिला दो, वह चुप हो जाएगा। दो मिनट बाद फिर भी बच्चा रोता रहा तो उसने कहा, 'मैंने कहा न, उसे दूध पिलाना शुरू कर दो सारी फिल्म का मज़ा किरकिरा हो रहा है।' पत्नी ने कहा- 'मैं बहुत कोशिश कर रही हूँ पर यह पी नहीं रहा है।' पति थोड़ा गुस्सैल प्रकृति का था। उसने कहा, 'एक थप्पड़ मारो यह क्या इसका 51 For Personal & Private Use Only Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बाप भी पीएगा।' इसीलिए गीता ने कहा कि क्रोध से स्मृतिभ्रम होता है और उससे बुद्धि का नाश होता है। क्रोध करना बुरा है, शायद क्रोध करने वाला हर व्यक्ति भी यही बात कहेगा। क्रोध पर विजय प्राप्त करने के कुछ सूत्रों को समझने से पूर्व यह जानना जरूरी है कि आदमी को गुस्सा आखिर क्यों आता है? आम तौर पर गुस्सा करने वाले लोगों से पूछा जाए तो उनका एक ही जवाब होता है- 'साहब, कोई झूठ बोले या गलती करे तो गुस्सा आता है। मेरे देखे यह जवाब थोड़ा गलत ही है। व्यक्ति को अगर गलतियों पर गुस्सा आए तो केवल औरों की गलतियों पर ही क्यों? खुद की गलतियों पर क्यों नहीं। सच तो यह है कि दूसरे की छोटी-सी गलती को भी हम बर्दाश्त नहीं कर पाते और अपने अहंकार की संतुष्टि के लिए गुस्सा कर बैठते हैं। अगर गलती पर गुस्सा आए तो औरों की गलती पर ही क्यों? खुद से गलती होने पर हम क्या करते हैं? हम सड़क पर चले जा रहे थे। पाँव पर ठोकर लगी और अंगूठे से खून बहने लगा। क्या आप मुझको बताएंगे कि उस वक्त आप किस पर गुस्सा करेंगे? भोजन कर रहे थे कि थोड़ी सी असावधानी के कारण गाल या जीभ दांत के नीचे आ गई। उस स्थिति में आप किस पर गुस्सा करेंगे? उपेक्षा : क्रोध की जननी जब व्यक्ति की अपेक्षा उपेक्षित होती है तो उसे क्रोध आता है। अपेक्षा और क्रोध का गहरा रिश्ता है। पता ही नहीं लगता कि थोड़ा-सा उपेक्षित होते ही व्यक्ति कितना विकराल रूप ले लेगा? पहले हम सम्बन्ध बढ़ाते हैं और फिर संबंधों में अपेक्षा पालते हैं। जब-जब अपेक्षा उपेक्षित होती है तब-तब व्यक्ति को बुरा लगता है। फिर संबंधों में दरार पड़नी शुरू हो जाती है। आप अपने खास दोस्त से यह अपेक्षा रखते हैं कि जब उसका जन्मदिन हो तो आपको याद करे और साथ ही यह भी अपेक्षा रखते हैं कि आप का जन्मदिन हो तो भी वह आपको शुभ कामना का संदेश देने का ध्यान रखे। अगर उस दिन किसी कारणवश वह भूल गया और तीन दिन बाद फोन पर आपको शुभकामना दी तो आपको लगेगा कि उसकी जिंदगी में आपका कोई मूल्य नहीं है और आप उपालम्भ दे बैठेंगे। 52 For Personal & Private Use Only Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लोगों की अपेक्षाएँ अलग-अलग तरह की होती हैं और यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति की अपेक्षाएँ पूरी कर दी जाएँ। एक ही व्यक्ति को कई लोगों से अलग-अलग अपेक्षाएँ हो सकती हैं। आदमी चाहता है कि मेरे अनुसार परिवार जिए, समाज जिए। जिस ट्रस्ट में मैं ट्रस्टी हूँ वहाँ मेरा ही दबदबा चले। अगर चार दोस्तों के बीच बैठा हूँ तो मेरी ही बात सुनी जाए। पत्नी को जैसा कहूँ, हू-ब-हू वह वैसा ही करे- पता नहीं ऐसी कितनी ही तरह की अपेक्षाएं होती हैं। हर व्यक्ति का सोचने का तरीका अलग होता है और व्यक्ति अपनी उसी सोच और धारणा के अनुसार निर्णय लेता है। एक छात्र जिसके परिवार को उससे पूरी अपेक्षा थी कि वह इस वर्ष परीक्षा की मेरिट लिस्ट में जरूर आएगा। संयोग से उसे इसके लिए जरूरत से दस अंक कम मिले तो इसके लिए परिवार में उसे डांट मिली और कहा गया कि तुमने पूरी मेहनत नहीं की होगी। वहीं दूसरी ओर उनके पड़ौसी का बेटा चालीस प्रतिशत अंक लेकर आया तो भी वे लोग मिठाई बाँट रहे थे। दरअसल उन्हें उसके पास होने की उम्मीद भी नहीं थी। अपेक्षा-उपेक्षा का मनोविज्ञान ___ अपेक्षा और उपेक्षा का भी अपना एक विज्ञान है। अगर आपने ध्यान दिया हो तो देखा होगा कि यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी उपेक्षा करे तो आपको गुस्सा नहीं आता पर अगर खास परिचित आदमी आपकी उपेक्षा करे तो आप तत्काल क्रोधित हो उठते हैं। हम लोग यह अपेक्षा पाल लेते हैं कि दिल्ली में हमारा रिश्तेदार है। हम तो जब भी दिल्ली जाएंगे, वह हमें पूरी दिल्ली जरूर घुमाएगा। संयोग से तुम उसके घर चले गए। घूमाना तो दूर की बात, वह आपके पास पूरा बैठ भी नहीं पाया क्योंकि वह अपने ऑफिस के कार्यों में उलझा हुआ था। उसके इस व्यवहार ने आपको दुःखी और क्रोधित कर दिया। उपेक्षित अपेक्षा हमेशा गुस्से का निमित्त बनती है। अच्छा होगा कि हम औरों से अपेक्षाएँ पालने की बजाय अपने आप से अपेक्षा पालें। अभी हम जयपुर में थे। एक महानुभाव अपनी पत्नी के साथ हमसे मिलने के लिए आए। बातचीत के दौरान उनसे भोजन करने के लिए आग्रह किया गया। उन्होंने कहा – 'साहब, मेरी पत्नी की बुआ का बेटा यहीं रहता 53 For Personal & Private Use Only Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है। हमें उनके यहाँ भी जाना है अगर उनके यहाँ खाना नहीं खाया तो उन्हें बुरा लगेगा।' मैंने कहा, 'जैसी आपकी मर्जी।' सांझ को वापस आए तो कहने लगे, 'साहब, हम भोजन यहीं करेंगे।' मैंने कहा, 'क्या मतलब?' थोड़े झल्लाते हुए, कहने लगे, 'साहब पता नहीं, कैसे आदमी हैं? खाने का तो उन्होंने पूछा ही नहीं, केवल चाय कॉफी की मनुहार करते रहे। मैंने देखा कि उनके मन में सामने वाले के प्रति थोड़ी सी खटास पैदा हो गई थी। मैंने बात को सँवारते हुए कहा, 'हो सकता है कि सामने वाले ने यह सोचा होगा कि गुरुजनों के यहाँ से आए हैं तो भोजन तो करके ही आए होंगे।' ___ कई बार व्यक्ति औरों की उपेक्षा का शिकार होकर अपने आपको अशांत कर लेता है और तनावग्रस्त हो जाता है। अगर हम किसी के द्वारा दिखाई दी गई उपेक्षा को सही अर्थ में लें तो वह हमें गुस्सा नहीं दिलाएगी अपितु हमारे स्वाभिमान को जाग्रत कर जीवन में कुछ कर गुजरने का मौका देगी। ईगो को कहें 'गो' व्यक्ति के अहंकार को जब चोट लगती है तो उसे गुस्सा आता है जब तक तुम्हारा अहंकार संतुष्ट होता रहेगा, तुम सामने वाले से खुश ही रहोगे किन्तु अहंकार को चोट लगते ही तुम गुस्सा कर बैठोगे। अहंकार क्रोध का पिता है। क्रोध का एक और भी कारण है और वह है 'आलोचना' । किसी ने अगर हमारे लिए विपरीत टिप्पणी कर दी तो हम तत्काल गुस्सा कर बैठेंगे। लोगों का तो काम है औरों पर अंगुलियाँ उठाना और दूसरों की बातें करना। जब भी दो-चार लोग आपस में बात करते हैं तो वे दूसरों के लिए हमेशा विपरीत टिप्पणी किया करते हैं। परिणामस्वरूप मामला सुलझने की बजाय और भी अधिक उलझ जाता है। अगर आठ लोग किसी बिंदु पर निर्णय करने के लिए एक जगह बैठे हैं और यदि वे पहले से ही सोच कर बैठे हैं कि हमें इस मामले को उलझाना है तो वे उसे कभी भी सुलझा नहीं सकेंगे। यदि वे पहले से ही उसे सुलझाने की सोचते हैं तो किसी भी बात को सुलझाने में दो मिनट लगते हैं । शांतिपूर्ण ढंग से समाधान करने पर समस्याओं को सुलझाया जा सकता है। साथ ही क्रोध से भी नष्ट होने वाले संबंधों को भी सुरक्षित रखा 54 For Personal & Private Use Only Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जा सकता है। सॉरी कहें, सुखी रहें अगर किसी कारणवश कभी झगड़ा भी हो जाए तो वह केवल विचारों के पारस्परिक टकराव से ही होता है और फिर वह विकराल रूप लेकर आपके जीवन को प्रभावित भी कर सकता है। ऐसी स्थिति में दो में से अगर एक व्यक्ति अपने मन के आवेग को नियन्त्रित रखे है तो मामला जल्दी शांत हो जाता है। आप झगड़े को टालने की कोशिश करें और यदि कोई छोटी-सी बात हो तो 'सॉरी' कहकर सलटा लें। अगर हमारे झुकने से मामला शांत हो रहा हो तो झुकना बुरी बात नहीं है। अगर सामने वाला हो-हल्ला कर भी रहा है तो भी आप शांति से जवाब दें। छोटी-सी बात को झगड़े का रूप कभी न दें क्योंकि कोई भी झगड़ा चिंगारी के रूप में शुरू होता है और दावानल बनकर खत्म होता है। पता नहीं गुस्से में व्यक्ति कैसे-कैसे काम कर बैठता है? आदमी गुस्से में आकर अपने बेटे को मार देता है। परिवार को तहस-नहस कर देता है। प्रेमी भी अपनी प्रेमिका पर तेजाब छिड़क देता है। और तो और मिट्टी का तेल डाल कर खुद के ही तुली लगा देता है। गुस्से में आदमी कौनसा अनर्थ नहीं कर बैठता? गुस्से को आप कभी भी आदत न बनने दें। अगर हम रोज-ब-रोज गुस्सा करेंगे तो हमारा गुस्सा प्रभावहीन होता जाएगा और धीरे-धीरे हमारे मित्र भी कम होते जाएँगे। आप कभी किसी गुस्सैल व्यक्ति को अपने सामने देख कर भले ही कुछ बोलें या न बोलें पर पीछे से उसका सब उपहास ही उड़ाते हैं। क्रोधी से तो वैसे ही लोग कन्नी काट कर रखते हैं। जिसको बोलने का विवेक नहीं, उससे भला कौन माथा लड़ाये? बैल के सींग में कौन जान बूझकर सिर मारे? छोटी-मोटी बातों को लेकर घर में महाभारत न मचायें। सबसे अपनी ओर से प्रेम से और मधुर वाणी से बोलें ताकि आपको जिंदगी में औरों से प्रेम मिल सके। जिस बात को आप गुस्से में भरकर कड़वे शब्दों में कह रहे हैं, दो पल ठहरें अपने हृदय को प्रेम से भरकर उसी बात को मधुर शब्दों में कहने की कोशिश करें। आपकी बात और अधिक प्रभावपूर्ण हो जाएगी। अगर सामने 55 For Personal & Private Use Only Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वाला व्यक्ति बहुत ज्यादा गुस्से में है तो आप विनम्रतापूर्वक शांत रहें। क्रोध के वातावरण में जितना मौन रखा जाए उतना ही लाभदायक है। पर ध्यान रखें कि आपका मौन इस तरह का भी न हो कि सामने वाला अपने आपको उपेक्षित समझे और उसका गुस्सा दुगुना हो जाए। जो क्रोध चिंगारी के रूप में पैदा होता है, उसे कभी भी दावानल न बनने दें। सहन करें, कड़वे बोल ____ औरों के द्वारा गलती करने पर उन्हें प्रेम से समझाने की कोशिश करें। अगर आप ऑफिस पहुँचे और पहुँचते ही किसी बात पर अपने कर्मचारियों पर झल्लाने लगते हैं तो कर्मचारी यही सोचेंगे कि 'लगता है 'बॉस' आज बीवी से लड़कर आए हैं।' अतः वहाँ न चली तो यहाँ चला रहे हैं। घर का गुस्सा ऑफिस में न ले जाएँ और ऑफिस का गुस्सा घर पर न उतारें। कई बार आपने किसी गुस्सैल व्यक्ति के लिए यह कहते हुए सुना होगा, पता नहीं यार, सुबह -सुबह किससे माथा लड़ गया कि उसने पूरा दिन ही खराब कर दिया।' दूसरों की छोटी-छोटी गलती को नजरअंदाज करें। भगवान महावीर जिनकी हम पूजा करते हैं उनके कान में कीलें ठोंकी गईं तब भी वे शांति से उन्हें सहन करते रहे। किन्तु हम उनके अनुयायी होकर भी किसी के दो कड़वे शब्दों को क्यों नहीं सहन कर सकते हैं? कहते हैं, जब शिशुपाल का जन्म हुआ तो आकाशवाणी हुई थी कि शिशपाल का वध कृष्ण के हाथों होगा। शिशुपाल की माँ भगवान कृष्ण के पास पहँची और उनसे वचन माँगा कि आप मेरे पुत्र का वध नहीं करेंगे। कृष्ण ने महानता दिखाई और कहा, 'मैं तुम्हें ऐसा वचन तो नहीं दे सकता, पर तम्हारे पत्र की निन्यानयवे गलतियों को माफ करने का वचन देता हूँ।' कृष्ण ने ऐसा ही किया। कृष्ण अगर किसी की निन्यानवे गलतियों को माफ कर सकते हैं तो हम किसी की नौ गलतियों को माफ करने की उदारता क्यों नहीं दिखा सकते? ___ 'कैसे बचें क्रोध से' इसके सूत्र तलाशने से पूर्व मैं एक बड़ी प्यारी सी घटना का जिक्र करना चाहूँगा। __घटना कुरान शरीफ़ की है। मोहम्मद साहब के नाती का नाम खलीफा हुसैन था। उस समय का जमाना गुलामों का था। मनुष्य खरीदे-बेचे जाते थे। 56 For Personal & Private Use Only Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ गुलामों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता था। तिस पर खलीफा हुसैन तो मानो क्रोध के अवतार ही थे। अगर वे किसी गुलाम से खफा हो जाते तो सिवा मौत के वे अन्य कोई सजा ही न देते। एक दिन खलीफा हुसैन अपने महल में नमाज अदा कर रहे थे। तभी एक गुलाम अपने हाथ के बर्तन में उबलता हुआ पानी लेकर उधर से निकला। अचानक उसे ठोकर लगी और बरतन हाथ से छूट गया और गरम पानी नीचे फैल गया। कुछ बूंदे नमाज पढ़ते हुए खलीफा हुसैन पर भी जा गिरी। वह चौंक गया और गुस्से से भर गया। चूँकि उस समय वह नमाज़ अदा कर रहा था अतः उठ नहीं सकता था। उधर गुलाम ने सोचा कि आज तो मौत का फरमान जारी होकर ही रहेगा। उसकी आँखों के सामने मौत नाचने लगी। तभी पास में रखी हुई पवित्र कुरान की पुस्तक उसने उठा ली। वह उसके पन्ने उलटने लगा और खुली पुस्तक हाथ में रख ली। वह सोचने लगा कि अब तो मरना ही है। मरने से पहले कुरान की कुछ आयतों का पाठ ही क्यों न कर लूं। कुरान के पन्नों पर जहाँ उसकी नजर पड़ी, उसने पहली आयत पढ़ी, 'जन्नत उनके लिए है जो अपने क्रोध पर काबू रखते हैं। खलीफा के कानों में ये शब्द पड़े और वह सचेत हो गया। उसने स्वयं को देखा कि उसके अंदर गुलाम के प्रति क्रोध उमड़ रहा है। वह पीछे मुड़ा और बोला, हाँ, हाँ मेरा गुस्सा मेरे काबू में है।' गुलाम ने सोचा कि कुरान की आयत काम कर रही है। एक सच्चा मुसलमान हर बात का इन्कार-तिरस्कार कर सकता है लेकिन कुरान के शब्द उसके लिए पत्थर की लकीर होते हैं। तभी गुलाम ने अगली आयत पढ़ी, 'जन्नत उनके लिए है जो गलती करने वालों को माफ कर देते हैं।' जब यह पवित्र वाक्य खलीफा हुसैन ने सुना तो वह फिर चौंका और सोचा कि वह आयत तो सिर्फ उसी के लिए कही गई है। उसने पुनः सिर ऊँचा किया और कहा, 'जा, मैंने तेरी गलतियों को माफ किया।' गुलाम तो खुश हो गया कि कुरान की दो आयतों ने कमाल कर दिया। तब उसने तीसरी आयत पढ़ी, 'खुदा उनसे प्यार करता है जो दयालु होते हैं।' अब तो खलीफा हुसैन की आत्मा काँप गई। वह स्वयं को रोक न पाया और नमाज़ अदा करते हुए बीच में से उठ आया। वह गुलाम के पास जा 57 For Personal & Private Use Only Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पहुँचा, उसे गले लगाया और दीनारों की थैली देते हुए कहा, 'जा, मैंने तुम्हें गुलामी से मुक्त किया।' गुलाम चला गया, खलीफा अपने काम में व्यस्त हो गया लेकिन कुरान की ये तीन आयतें मनुष्य-जाति के लिए वरदान बन गईं। मेरा खयाल है कि ये तीन सूत्र हमारे जीवन में उतर जाने चाहिए। तभी हम क्रोध को कैसे काबू कर सकते हैं यह सीख पायेंगे। ये शब्द किसी सुरीले संगीत की तरह हैं जो हमारे जीवन को सुखद बना सकते हैं। ले पवित्र शब्द हिमाचल की किसी चोटी को छूकर आई हुई किरण की ही तरह हैं जो जीवन को सतरंगा बना दे। ये आयतें हमारे अन्तर हृदय में उतर जानी चाहिये। सदा याद रखें- जन्नत यानी स्वर्ग उनके लिए है जो अपने गुस्से को काबू में रखते हैं, और जन्नत उनके लिए हैं जो गलती करने वालों को माफ कर दिया करते हैं, ईश्वर उन्हीं से प्रेम करता है जो दयालु और क्षमाशील होते हैं। ___ हमारी सबसे मैत्री हो, सबसे निकटता हो। आप नहीं जानते कि जिन संबंधों को वर्षों तक तराश कर बनाया जाता है, वे दस मिनिट के क्रोध से समाप्त हो जाते हैं। क्रोध से शरीर का भी क्षय होता है। क्रोधी व्यक्ति कभी हृष्ट-पुष्ट नहीं हो सकता। क्रोध उसके पुद्गल-परमाणुओं को जला देता है। जो ऊर्जा ऊर्ध्वगमन कर हमें शक्ति प्रदान कर सकती थी, वह क्रोध में जलकर नष्ट हो जाती है। काम की तरह क्रोध से भी शक्ति का नाश होता है। मैंने देखा है कि लोग क्रोध करना भी अपनी इज्जत समझते हैं। उनका मानना है कि क्रोध करने से दूसरे लोग उनकी बात मान जायेंगे। वे इसमें भी अपने अहंकार को पोषित करते हैं। अरे, क्या क्रोध किसी को इज्जत दे पाया है? उसमें तो अनादर का भाव ही भरा है। फिर हम क्रोध पर कैसे विजय पायें? इसके लिए मैं कुछ उपयोगी सुझाव देना चाहता हूँ। क्रोध-मुक्ति के टिप्स क्रोध मुक्ति के लिए पहला सूत्र है, कल पर टालो किसी की गलती या विपरीत टिप्पणी को।' आपको गुस्सा आ गया तो मैं कहूँगा कि आप अपने क्रोध को अवश्य प्रकट करें पर इसकी लपट कहीं आपको न जला बैठे, अतः आप अपने गुस्से को चौबीस घंटे के बाद व्यक्त करें। जब भी गुस्सा आए, तत्काल उस पर विवेक का अंकुश लगाएँ और उसे कल पर टाल दें। कम 58 For Personal & Private Use Only Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ से-कम आधा एक घंटे के लिए तो टाल ही दें। अन्यथा हो सकता है गलती किसी और ने की हो और आप सीमा से ज्यादा गुस्सा कर बैठें तो वह गलती का प्रायश्चित करें या न करें पर आपको गुस्से का प्रायश्चित करना पड़ सकता कल की बात है एक बहिन अपने दो बच्चों के साथ फेस्टिवेल मेला देखने गयी। एक बच्चा है दस साल का, दूसरा बारह का। छोटे वाले बच्चे ने किसी बात को लेकर मेले में थोड़ी-सी जिद पकड़ ली होगी। मम्मी पहले ही किसी बात को लेकर दिमाग से भारी थी, उसने आवेश में आकर बच्चे को जोर से चाँटा मार दिया। वैसे बच्चा समझदार था, अतः उसने अपनी जिद छोड़ दी। रात को सोते समय मम्मी को लगा कि बच्चे की सामान्य-सी गलती पर दस लोगों के बीच चाँटा मारकर उसने अच्छा नहीं किया और उसने अपने बच्चे से सॉरी कहा। गलती से ज्यादा गुस्सा करने पर सॉरी सामने वाले को नहीं आपको कहनी पड़ेगी। अतः तत्काल गुस्सा करने की बजाय अपनी गलती का अहसास स्वयं बच्चे को होने दें। क्रोध हमारी समझदारी को बाहर निकाल कर उस पर चिटकनी लगा देता है। जब आप चौबीस घंटे के बाद अपने गुस्से को व्यक्त करेंगे तो वह क्रोध भी होश और बोधपूर्वक होगा। फिर आप जब अपनी बात को व्यक्त भी करेंगे तो विपरीत वातावरण से बचेंगे। क्रोध करो मगर समझपूर्वक। स्वयं को अनुपस्थित समझें क्रोध से बचने के लिए दूसरे प्रयोग को भी अपनाया जा सकता है और वह है 'स्वयं को अनुपस्थित समझो।' जब भी विपरीत वातावरण पैदा हो, आप यह सोचें कि अगर मैं यहाँ नहीं होता तो उन सब बातों का जवाब कौन देता? आपका यह विवेक आपको क्रोध के वातावरण से बचा लेगा। जैसे आप मुझसे मिलकर अपने घर गए। खिड़की से आपने देखा कि आपकी पत्नी और उसका भाई बातचीत कर रहे हैं। आपने सुना कि आपकी पत्नी आपके बारे में ही कई तरह की उल्टी-सीधी बातें कर रही हैं। जैसे मेरे पति हाथखर्ची नहीं देते, मेरा ध्यान नहीं रखते, मेरे लिए उल्टी सीधी बातें करते हैं और भी पता नहीं बेसिरपैर की कितनी ही बातें वह कर रही है। स्वाभाविक है कि उस 59 For Personal & Private Use Only Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ समय आपको गुस्सा आएगा और आप अपने साले को सारी सच्ची बात बताना चाहेंगे। यदि थोड़ा-सा आप सावधान रहें तो आप क्रोध की भट्टी में गिरने से बच सकते हैं। अगर आप यह सोचें कि यदि मैं आधा घंटा विलम्ब से आता तो उनकी बातों को कौन सुनता और कौन जवाब देता? प्रयोग करें टेलिग्राम की भाषा क्रोध-मुक्ति के कई उपाय हैं और जिस समय जो उपाय याद बन पड़े, तत्काल उसे अपना लेना चाहिए क्योंकि इसमें किया गया विलम्ब काफी हानिकारक हो सकता है । क्रोध - मुक्ति के उपायों में एक और अच्छा सा उपाय यह है कि टेलिग्राम की भाषा में अपनी बात को व्यक्त करो। अगर आपको लगे कि वातावरण क्रोध का बन गया है और आपके बिना बोले मामला उलझ सकता है अथवा आपको बड़ा तेज गुस्सा आया हुआ है और आप उसे व्यक्त करना ही चाहतें हैं तो टेलिग्राम की भाषा में अर्थात् सीमित शब्दों में उसे व्यक्त करें। जैसे टेलिग्राम देते समय एक-एक शब्द को तोलकर लिखा जाता है वैसे ही क्रोध के वातावरण में कम शब्दों में बात कहकर चुप हो जाएं। इससे वातावरण कलुषित होने से बचेगा | अगर आप क्रोध के समय अपने विवेक को खोकर लगातार कुछ न कुछ बोले जा रहे हैं, तो हो सकता है कि ऐसे अवसर पर आप वह बात भी कह दें जो आपके भविष्य के लिए गलत परिणाम दे सकती है । याद करें परिणाम क्रोध - मुक्ति के लिए अगला उपाय है 'परिणाम को याद करो' क्योंकि पहले भी जब कलुषित वातावरण बना था तो आप चीखे चिल्लाये थे और बात बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी । और तो और, आप जिस पत्नी से आजीवन प्रेम निभाने की सोच रहे थे उससे आप तलाक लेने की सोचने लगे हैं। जिस प्रेमिका पर आप अपनी जान न्यौछावर कर रहे थे, उसी पर तेजाब बैठे। जिससे आप बात करने के लिए तरसते थे, आज उससे बात करने को तैयार नहीं है । जिसे घंटों निहारा करते थे आज वह फूटी आँख भी नहीं सुहाता है । हम रोज समाचार-पत्रों में पढ़ते रहते हैं कि गुस्से में किस आदमी ने कितना बड़ा अनर्थ कर दिया ? कभी पिता अपने पुत्र पर ही गोली चला देता 1 60 For Personal & Private Use Only Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है तो कभी पुत्र अपने पिता का कत्ल कर देता है। कभी कोई महिला खुद पर ही केरोसिन छिड़क कर आग लगा लेती है तो कभी कोई लड़की फाँसी पर लटक कर आत्महत्या कर लेती है । पता नहीं, ऐसी कितनी ही घटनाएँ रोज़ होती हैं। कभी औरों के घर में, कभी खुद के घर में | अगर व्यक्ति क्रोधजनित परिणामों को याद कर ले तो तनाव भरे माहौल में भी वह अपने आपको बचा सकता है। अगर आपको गुस्सा आया है तो आप सावधान हो जाइए। आप खड़े हैं तो तत्काल बैठ जाएं ताकि उसके बाद गुस्सा केवल जबान से ही व्यक्त होगा। बैठे हैं तो लेट जाएँ । अगर फिर भी लगता है कि तुम्हारा क्रोध शांत नहीं हो रहा है तो झट से फ्रिज खोल कर एक बोतल ठंडा पानी पी लें। आप अनुभव करेंगे कि ऐसा करके आप बड़ी हानि से बच गए हैं। गुस्सा करें, मगर प्यार से क्रोध - मुक्ति का एक और उपाय है : 'बोध पूर्वक बोलो और कार्य करो।' अगर आपको लगे कि बिना बोले काम नहीं चलेगा तो आप सावधानी से अपनी बात को व्यक्त करें । सामने वाला भले ही समझे कि आप गुस्सा कर रहे हैं पर आप भीतर से सचेत रहें । आपका गुस्सा किसी भी तरह से कोई नुकसान न कर बैठे। हम कई बार ट्रकों के पीछे लिखी हुई बड़ी अच्छी बातों को पढ़ा करते हैं। एक बात मैंने कई ट्रकों के पीछे पढ़ी है - ' देखो मगर प्यार से' । गुस्से के साथ भी उसी को जोड़ लो । गुस्सा भी करो तो प्यार से करो । जैसे ही अन्तर्मन में प्यार उभरेगा तो गुस्सा अपने आप गायब हो जाएगा । गुस्से से बचने के लिए एक और उपाय किया जा सकता है। किसी अन्य कार्य में लग जाएँ। लगे, गुस्से में बोलचाल तो बंद हो गई आप बाहर से नहीं बोल रहे हैं, मगर भीतर से उफान उभर रहा है तो तत्काल एक काम करेंकिसी अन्य कार्य से स्वयं को जोड़ दें। थोड़ी देर के लिए किसी आस-पड़ौस के घर में चले जाएँ अथवा किसी अन्य स्थान या व्यक्ति के पास चले जायें। जहाँ आपकी मनः स्थिति बदल सकती हो। सावधान रहें जब आप गुस्से में हों तो भोजन न करें। इससे मनोवेगों में उत्तेजना आती है और वह भोजन हमारे लिए हानिकारक हो जाता है । थोड़ी देर विश्राम करें फिर शांत मन से भोजन 61 For Personal & Private Use Only Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करें। ध्यान रखें, गुस्सा करने के बाद अगर आप भोजन कर रहे हैं, तो भोजन को थोड़ा ज्यादा चबा-चबा कर खायें ताकि आपके क्रोध की ऊर्जा चबाने में खर्च हो जाए और आपका क्रोध शांत हो जाए। कई बार परिस्थिति के अनुसार व्यक्ति को निर्णय करना पड़ता है कि कितनी मात्रा में क्रोध किया जाये अथवा न किया जाए। कभी-कभी क्रोध प्रकट करना आवश्यक भी हो जाता है और कभी-कभी बड़ा हानिकारक, पर लम्बे अर्से तक क्रोध को दबाकर रखना भी हानिकारक है। क्योंकि ऐसी स्थिति में क्रोध हमारे मानसिक संतुलन को बिगाड़ देता है। क्रोध को जीतें क्षमा से क्षमा और सहनशीलता का विकास करें, ये काफी लाभदायक सूत्र है। किसी के क्रोध का सामना सहनशीलता से करना और मौका पड़ जाए तो शालीनतापूर्वक क्रोध करना हमारे व्यक्तित्व की महानता है । क्षमा तो एक ऐसा मंत्र है जिसे हजारों वर्षों से अपनाया गया है। बड़े-बड़े महापुरुषों ने इसी शस्त्र से आत्म-विजय के संग्राम में सफलता प्राप्त की है। बड़ी से बड़ी विपरीत स्थिति या घटना हो जाने के बावजूद जब व्यक्ति क्षमा भाव से भरा होता है तो विपरीत वातावरण उस पर प्रभाव नहीं डाल सकता। अंग्रेजी का एक बड़ा प्यारा-सा शब्द है सॉरी-क्षमा कीजिए। मनुष्य जो दिन में पच्चास बार इस शब्द का प्रयोग करता है भला विपरीत वातावरण में इसका उपयोग क्यों नहीं करता है। क्षमा से बढ़कर कोई शस्त्र नहीं होता और शांति से बढ़कर कोई शक्ति नहीं होती। हम अपने जीवन में इन दोनों का विकास करें। अगर आप क्रोधी स्वभाव के हैं तो सप्ताह में क्रोध का एक व्रत अवश्य करें। जैसे हम कई देवी-देवताओं की आराधना के लिए, व्रत करने के लिए अलग-अलग वार का चयन करते हैं, ऐसे ही सप्ताह में एक दिन अपने मन की शांति के लिए एक व्रत करने का चयन करें और व्रत करें क्रोध-मुक्ति का। सुबह उठते ही नियम ले लें कि अब चौबीस घंटों के दौरान कैसा भी विपरीत वातावरण क्यों न बन जाए पर मैं किसी भी स्थिति में गुस्सा नहीं करूँगा। आप अनुभव करेंगे कि इससे आपके अन्तर्मन में एक विशेष प्रकार की शांति अनुभव हो रही है। 62 For Personal & Private Use Only Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैसे चौबीस घंटे के लिए भोजन का त्याग करना उपवास कहलाता है इसी तरह चौबीस घंटे तक क्रोध का त्याग करना भी उपवास ही है। यह एक अच्छा उपवास है जिससे हम स्वयं को एवं पूरे परिवार को एक दिन के लिए शांति का सुकून प्रदान कर सकते हैं। संभव है कि जिस दिन आपके क्रोध न करने का नियम लिया हुआ है उसी दिन संयोगवश कोई विपरीत टिप्पणी सुनने को मिल जाए तो उसे नजर अंदाज करने की कोशिश करें। हो सकता है हमारी शांति को कोई चुनौति मिले पर उसका सामना करने का पुरुषार्थ दिखाएँ। सहनशीलता से एक ओर जहाँ हमारे जीवन में गंभीरता आएगी वहीं हम आत्म संयमी बन सकेंगे। सहनशीलता औरों के क्रोध को ठण्डा भी तो कर देती हैं। जो लोग अपने जीवन में क्रोध से छुटकारा पाना चाहते हैं उन्हें प्रतिदिन मौन रखने का भी अभ्यास करना चाहिए। मौन जहाँ हमारी वाणी को विश्राम देता है वहीं विपरीत वातावरण में हमें तटस्थ रहने का अवसर प्रदान करता है। किसी भी व्यक्ति के लिए चार घंटे तक बोलना सरल होता है पर चार घंटा चुप रहना मुश्किल। विपरीत वातावरण में हमारा मौन हमारे लिए बचाव का काम कर सकता है। ऐसे अवसर पर किसी के चीखने-चिल्लाने पर भी हमारा मौन हमें आत्म विवेक का बोध देता रहता है। पेट्रोल नहीं : पानी बनें ये बिन्दु हुए स्वयं के क्रोध से बचने के लिए। कई बार दिक्कत यह खड़ी हो जाती है कि अगर दूसरा हम पर क्रोध कर रहा हो या हमारे साथ गलत व्यवहार कर रहा हो उस समय क्या किया जाय? मैं पहला संकेत देना चाहूँगा कि हर क्रोध का जवाब मुस्कान से दो। संभव है सामने वाला व्यक्ति आग बबुला बन कर आया है। अब यह आप पर निर्भर है कि आप किस रूप में हैं। उदाहरण के तौर पर हम समझ सकते हैं कि हमारे दो हाथों में दो पात्र हैं। एक पात्र में पानी है और एक में पेट्रोल। सामने वाला व्यक्ति दियासलाई जलाकर आपके सामने लाया है अगर आपने पानी का पात्र आगे बढ़ा दिया तो दियासलाई उसमें गिर कर बुझ जाएगी, पानी-पानी हो जायेगी और अगर भूल से तुमने पेट्रोल का पात्र आगे बढ़ा दिया तो वह दियासलाई भयंकर आग का 63 For Personal & Private Use Only Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रूप बन जाएगी। यह हम पर निर्भर करता है कि हम पानी हैं या पेट्रोल। डीजल हैं या दूध। मैंने सुना है एक व्यक्ति बीच बाजार में जलती हुई लकड़ी हाथ में थामें चले जा रहा था। चिल्ला रहा था मैं जाऊँगा और इस जलती हुई लकड़ी से तालाब में आग लगा दूँगा। लोग समझ गए यह गुस्से में है इसलिए ऐसा कह रहा है। पर इसे विवेक नहीं है कि तालाब में आग लगने की बजाय इसकी लकड़ी ही तालाब में जाकर बुझ जायेगी। अगर हम स्वयं को शांत सरोवर बना लेते हैं तो दुनिया का कोई भी अंगारा किसी सरोवर में आग नहीं लगा सकता है। क्रोध का जवाब दें मुस्कान से कोई हमारे प्रति गलत व्यवहार करे, हमारी उपेक्षा भी करे तो भी हम उसे मजाक में लेने की कोशिश करें। कहीं ऐसा न हो कि हमारे स्वभाव का स्वीच किसी दूसरे के हाथ में हो वह हमें जब चाहे तब शांत भी कर दे और क्रोधित भी कर दे। एक प्यारे संत हुए हैं- भीखण जी। कहते हैं एक बार वे कुछ भक्तों के बीच बैठ कर प्रवचन दे रहे थे। इसी दौरान एक युवक आया और संत के सिर पर ठोले मारने लगा। भक्तों को यह बर्दाश्त न हुआ। उन्होंने युवक को पकड़ लिया और उसकी पिटाई करने लगे। संत ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, 'इसे मारो मत शायद यह मुझे अपने गुरु बनाने आया है।' लोगों ने कहा, 'गुरु बनाने का यह कौनसा तरीका है। चोटी खिंचवा कर तो चेले बनाए जाते हैं पर यह ठोला मार कर गुरु बनाने का कौनसा तरीका।' संत ने मुस्कराते हुए कहा, 'निश्चित ही यह व्यक्ति मुझे गुरु बनाने आया होगा। अरे कोई व्यक्ति बाजार में दो रुपए का घड़ा भी खरीदता है तो भी उसे चारों तरफ से ठोक बजा कर देखता है कि घड़े में कोई छेद या दरार तो नहीं है। जब घड़े को भी ठोक बजा कर खरीदा जाता है तो शायद यह मुझे ठोक बजा कर देखता हो कि मैं गुरु बनाने लायक हूँ कि नहीं।' इसे कहते हैं क्रोध का जवाब मुस्कान से।। जहाँ तक संभव हो हर किसी व्यक्ति से प्रेम से बोलें, प्रेम से मिलें। 64 For Personal & Private Use Only Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आँख कभी लाल मत करो और जीभ से कभी कड़वा मत बोलो। स्वभाव में और भाषा में विनम्रता हो। दुनिया में वे लोग ज्यादा सम्मान पाते हैं जो सरल भी होते हैं और सहज भी। हम जन्म लेते हैं तो जीभ हमें जन्म के साथ मिलती है पर दाँत पीछे आते हैं। पर यह प्रकृति का सत्य है कि जीभ अंत तक हमारे साथ रहती है और दाँत पहले ही टूट जाते हैं। जो नरम है वह सबको प्रिय होता है और जो कठोर, वह अपने परिवार का भी प्रिय नहीं हो सकता है। प्रेम चाबी है और क्रोध हथोड़ा। ताले को खोलने के लिए दोनों का ही प्रयोग किया जा सकता है पर याद रखें चाबी से ताला खुलता है और हथोड़े से ताला टूटता है। चाबी से खुला ताला बार-बार काम आता है पर हथोड़े से टूटा ताला अंतिम बार । प्रेम से काम बनते हैं और क्रोध से बिगड़ते हैं। गुस्से में भरकर एक व्यक्ति ने भीड़ में खडे एस. पी. के मुँह पर थूक दिया। पास खड़े इंस्पेक्टर ने इसे एस. पी. का भंयकर अपमान समझा। झट से रिवाल्वर निकाली और उसकी छाती पर तान दी। एस. पी. क्षणभर में सहज हुआ उसने मुस्कान ली और इंस्पेक्टर के हाथ से रिवाल्वर लेते हुए कहा, 'तुम्हारे जेब में रूमाल है क्या?' इंस्पेक्टर से रूमाल लेकर एस. पी. ने अपने चेहरे पर लगा थूक पोंछा और मुस्कुराते हुए कहा, जो काम रूमाल से निपट सकता है उसके लिए रिवाल्वर क्यों चलायी जाये। जीवन को ही स्वर्ग बनाएं क्रोध करने का अर्थ है, दूसरों की गलतियों का प्रतिशोध स्वयं से लेना। गलती किसी और ने की और गुस्सा आपने किया। संभव है सामने वाला तो तुम्हारे गुस्से को झेल कर बाहर चला गया पर तुम अपने ही गुस्से में झुलसते रह गए। क्रोध एक अग्नि है। जो इसे वश में कर लेता है वो इसे बुझाने में समर्थ हो जाता है, और जो इसे वश में नहीं कर पाता वह इसमें जलने के लिए मजबूर हो जाता है। हम अपने क्रोध को वश में करें। अन्यथा एक दिन हम इसके वश में हो जाएँगे। जो महावत अपने हाथी पर अंकुश नहीं रख पाता वो सावधान रहे, वह हाथियों से कभी भी दबोचा जा सकता है। हर समय औरों को डांट-डपट की आदत छोड़ें। औरों की गलतियों को देखने की 65 For Personal & Private Use Only Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आदत बंद करें और अपने ही गिरेबाँ में झाँक कर देखने की कोशिश करें कि हम स्वयं कहाँ खड़े हैं। औरों की और एक अंगुली उठाने वाला व्यक्ति क्या अपनी और मुड़ रही तीन अंगुलियों पर नजर डालेगा। कोई तीली थोड़े से संघर्ष से इसलिए जल जाती है क्योंकि उसके ऊपर सिर तो होता है पर दिमाग नहीं, पर मनुष्य जिसके पास सिर भी है और दिमाग भी, वह भला थोड़े से संघर्ष से दियासलाई की तरह क्यों जल उठता है। व्यक्ति दो-चार महिने में एक बार घर के अनुशासन और मर्यादाओं को बरकरार रखने के लिए गुस्सा करता है तो वह वाजिब कहा जा सकता है, लेकिन रोज-ब-रोज अपने झूठे अहंकार के पोषण के लिए वह अपने बीबी बच्चों पर गुस्सा करता है तो ऐसा करके एक आलीशान बंगले में रहने वाले अपने परिवार को नरक बना देता है। मरने के बाद जो स्वर्ग मिला करता है उसे हमने देखा नहीं है और जिस नरक से बचना चाहते हैं हमने उसे भी नहीं देखा है पर सच तो यह है कि हम अपने ही निर्मल स्वभाव से अपने घर को स्वर्ग बनाते हैं और अपने ही उग्र स्वभाव से घर को नरक। प्रेम, शांति, दया, क्षमा, करुणा ये जीवन के स्वर्ग हैं। क्रोध, कषाय, चिंता, तनाव, घुटन, अवसाद, अहंकार ये जीवन के नरक हैं। क्या हम बुद्धिमानी का उपयोग करेंगे और अपने दो कदम स्वर्ग की ओर बढ़ाने की कोशिश करेंगे। उस स्वर्ग की ओर जिसे हम मरने के बाद पाना चाहते हैं, पर उसे जीते-जी पाया जा सकता है अगर हम ऐसा करते हैं तो स्वर्गीय होने से पहले ही अपने जीवन में स्वर्ग ईजाद कर सकते हैं। 66 For Personal & Private Use Only Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अहंकार : कितना जिएँ, कितना त्यागें ? अहंकार के हथौड़े से ताला टूटता है, पर विनम्रता की चाबी से वही खुल जाया करता है । महाशक्तिशाली बाहुबली ने संत - जीवन अंगीकार कर लिया और वे जंगल में जाकर साधना में लीन हो गए। माह पर माह ही नहीं, अपितु वर्ष पर वर्ष बीत गए, लेकिन बाहुबली अपनी साधना में ही रत रहे । इतने लंबे समय तक वे ध्यान में डूबे रहे कि उनके शरीर पर लताएँ लिपट गईं, पक्षियों ने घोंसले बना लिये और सर्प भी उनके शरीर से गुजरने लगे। ऐसी कठोर तपस्या तो शायद किसी ने भी न की होगी, जितनी कठोर तपस्या अपने पाँवों पर खड़े होकर बाहुबली कर रहे थे । अनेक वर्ष बीत जाने पर बाहुबली की बहनों ने अपने पिता ऋषभदेव से पूछा – प्रभु ! हमारा यह भाई इतने वर्षों से साधना कर रहा है पर क्या कारण है कि उन्हें परम ज्ञान, आत्म-ज्ञान उपलब्ध नहीं हो रहा है । मनोविकार की दीवार भगवान मुस्कुराए और कहने लगे, 'ब्राह्मी और सुंदरी ! आत्म-ज्ञान पाने के लिये व्यक्ति को न तो पाँवों पर खड़ा होना पड़ता है और न ही लम्बे समय तक तपस्या से गुजरना पड़ता है । आत्म-ज्ञान पाने के लिये तो मन के परिणामों को विशुद्ध करना पड़ता है और जब तक किसी व्यक्ति के मन के For Personal & Private Use Only Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परिणाम निर्मल नहीं हो जाते तब तक वह चाहे जितनी ध्यान-साधना करे, योग या तपस्या करे लेकिन मुक्ति और परमज्ञान उससे दूर ही रहा करते हैं । ' ब्राह्मी और सुंदरी ने कहा, 'हम समझ नहीं पा रही हैं कि आखिर बाहुबली के अन्तरमन में ऐसे कौनसे विकार और विकृतियाँ हैं जिनके कारण वे महान तपस्या करके भी अपने जीवन में मुक्ति को उपलब्ध नहीं कर पा रहे हैं ! ऋषभदेव ने कहा,‘बाहुबली ने जब संन्यास लिया तब उसके अन्तर्मन में यह विचार प्रकट हुआ कि पहले से ही मेरे छोटे भाइयों ने संन्यास ले लिया है और वे सारे संत भगवान के साथ हैं। अगर मैं भगवान के पास जाऊँगा तो संत मैं भी हूँ और मेरे छोटे भाई भी संत हैं लेकिन छोटे भाई पहले दीक्षित हो चुके हैं, अतः कहीं मुझे उन्हें प्रणाम न करना पड़े। बड़ा भाई होकर मैं अपने छोटे भाइयों के सामने जाकर झुकूं, यह कैसे हो सकता है? एक काम करता हूँ कि मैं स्वयं ही वन में जाकर आत्मसाधना करूँगा और परमज्ञान पाऊँगा, तत्पश्चात् ही अपने भाइयों के पास जाऊंगा ताकि वे मुझसे छोटे ही कहलाएँगे। ब्राह्मी - सुंदरी! याद रखो जब तक अन्तरमन में अहंकार का शूल चुभा हुआ और दबा हुआ है तब तक व्यक्ति अपने जीवन में मुक्ति का फूल खिलाने में कभी भी समर्थ नहीं हो सकता । जाओ, तुम लोग अपने भाई के पास जाओ और उसे आत्म-बोध दो कि वह अपने अहंकार को गिराये ताकि अपने जीवन में साधना के परिणाम को पा सके ।' उतरें, अहंकार के हाथी से अपने पिता से आदेश पाकर ब्राह्मी और सुंदरी बाहुबली के पास गईं । बाहुबली अपने ध्यान में लीन थे। उनकी सघन साधना देखकर ब्राह्मी - सुंदरी को लगा- 'ओह, ऐसी साधना तो दुनिया में किसी ने भी न की होगी' तब दोनों बहनों ने मंद-मंद स्वर में गीत गुनगुनाना शुरू किया 'वीरा म्हारा गज थकी ऊतरो, गज चढ्या केवळ नहीं होसी रे ।' - हे भाई! तुम हाथी से नीचे उतरो, हाथी पर बैठकर किसी को परमज्ञान उपलब्ध नहीं होता । जब बार-बार बाहुबली के कान शब्द गूँजने लगे तो बाहुबली की चेतना जाग्रत हुई। उनका ध्यान भंग हुआ और वे सोचने लगे,‘आवाज तो मेरी बहनों की है । ये मुझसे यह क्या कह रही हैं कि हाथी 1 68 For Personal & Private Use Only Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ से नीचे उतरो। अरे, मैं तो अपने पाँवों पर खड़ा हूँ, भला हाथी पर कहाँ बैठा हूँ।' बाहुबली अन्तर्मन में पुनः-पुनः चिंतन करने लगे और परिणामतः उनकी चेतना जागृत हुई। उन्होंने पाया कि उनकी बहनें सच कह रही हैं। मैं जब तक अहंकार के हाथी पर बैठा रहूँगा तब तक चाहे जीवन भर साधना करता रहूँ पर परमज्ञान प्राप्त नहीं कर पाउंगा। बाहुबली मन में विनय भाव लिये हुए अपने छोटे भाइयों को प्रणाम करने के लिये उद्यत हो गए और जैसे ही उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया कि उन्हें परमज्ञान और केवलज्ञान उपलब्ध हो गया है। जो कार्य बारह साल की साधना न कर पाई वह कार्य कुछ पलों की विनय भावना और नम्रता से हो गया। अहंकार के टूटने से हो गया। उन्होंने डग भरा और जीवन में भोर हो गई। मैं मानता हूँ कि यह घटना काफी पुरानी है, लेकिन यह न समझें कि अहंकार के कारण केवल बाहुबली की साधना ही अटकी थी बल्कि हमारे जीवन की साधना भी प्रभावित हो रही है, विकास अवरुद्ध हो रहा है, सम्बन्ध प्रभावित हो रहे हैं। ...तो आप यह जान लें कि कहीं न कहीं कोई अहंकार की धारा, अहंकार का बंधन और अहंकार का भाव विद्यमान है। दुनिया में शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा होगा जिसके भीतर लेशमात्र भी अहंकार न हो। ऐसा व्यक्ति खोजने से भी न मिलेगा। जिसके भीतर कम या ज्यादा अहंकार की रेखाएँ, भावनाएँ अथवा घमंड की सोच न हो। अहंकार के ग्राफ में थोड़ा-बहुत फर्क होता है। किसी का अहंकार बहुत ऊँचे स्तर का और किसी का सामान्य स्तर का होता है। अहंकार जीवन में तभी प्रविष्ट हो जाता है जब कोई व्यक्ति अपने जीवन की सोच सम्भालता है। वैसे तो समझ आते ही जीवन में चार ग्रंथियाँ जुड़ जाती हैं - क्रोध, मान, माया, लोभ। इनमें भी मान यानि अहंकार और क्रोध का परस्पर गहरा संबंध है। क्रोध और मान में चोली-दामन का रिश्ता है। जो गुस्सैल है, वह घमंडी भी जरूर होगा। यदि कोई घमंडी है तो आप यह मानकर चलें कि उसमें गुस्से की प्रवृत्ति अवश्य है। घमंड और गुस्सा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ये दोनों साथ-साथ चलते हैं। संसार में अधिकांश अत्याचार अहंकारवश हुए हैं। अहंकार के 69 For Personal & Private Use Only Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शब्दकोश में दया, प्रेम, करुणा और आत्मीयता जैसे शब्द नहीं होते। घृणा, क्रोध, ईर्ष्या, तनाव ये सब अहंकार की शाखाएं हैं। अहंकारी व्यक्ति के सम्बन्ध कमजोर होते हैं, परिवार के लोग उससे भय खा सकते हैं पर प्रेम नहीं कर सकते। उसके मुंह के सामने भले ही लोग प्रशंसा कर दे, पर पीठ पीछे तो उसकी मजाक ही उड़ाते हैं। सच्चाई तो यह है कि अहंकार में आदमी फूल सकता है, पर फैल नहीं सकता। __ अभिमानी के हाथ में, ज्ञान न करता धाम। फटी जेब में क्या कभी टिक सकते हैं दाम। अहंकार से उजड़े बगिया मैं देखा करता हूँ कि अगर समाज में, धर्म में, परिवार में कहीं विघटन हो रहा है, किसी प्रकार का विभाजन हो रहा है, किसी प्रकार की मानसिक दूरियाँ बढ़ रही हैं, तो इसमें सबसे प्रमुख भूमिका अहंकार की ही होती है। जब समाज में कुछ लोगों के अहंकार टकराते हैं तो समाज टूटता है। जब कुछ संतों के अहंकार टकराया करते हैं तो धर्म टूटता है। परिवार के कुछ लोगों के अहंकार टकराते हैं तो परिवार टूटता है। जब व्यक्ति अपने भीतर हर पल अहंकार को लेकर चलता है तो उसकी स्थिति सूखे तालाब में दरार पड़ी मिट्टी जैसी हो जाती है। कुछ लोग अपने भीतर इतने घटिया स्तर के अहंकार पालते हैं कि हँसी आती है। कुछ लोग अपने आप को इतना बड़ा मान लेते हैं कि जैसे उनसे ज्यादा कोई समझदार है ही नहीं। वे समझते हैं उनसे अधिक खूबसूरत, सम्पन्न, बुद्धिमान और कोई नहीं है। हर आदमी स्वयं को औरों से श्रेष्ठ मान रहा है, महान मान रहा है । हरेक को यही लगता है कि दूसरे में क्या बुद्धि है क्योंकि वही सबसे अधिक बुद्धिमान है। अहम् हटाएं, अर्हम् जगाएं। स्वयं को महान और बड़ा मानने की प्रवृत्ति और दूसरों को लघु या छोटा मानने की आदत ही अहंकार को पोषित करती है। परिवार का विघटन किसी अन्य कारण से नहीं बल्कि किन्हीं दो लोगों के अहंकार के टकराने के कारण होता है। फिर वह अहंकार सास-बहू का हो या बाप-बेटे का या भाई-भाई का हो। जब अहं जगता है तो अहम् सो जाता है। अहम् और 70 For Personal & Private Use Only Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अर्हम्, अहम् और सर्वम्, अहम् और शिवम् ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते। तुम्हारे भीतर एक ही रहेगा या तो अहम् रहेगा या शिवम्। अगर शिवम् को रखना है तो अहम् को हटाना पड़ेगा। अहम् अगर भीतर बैठा है तो शिवम् कभी साकार नहीं हो सकता। अहंकार हटेगा तो ही वह निराकार साकार बनेगा। अहंकार मानव एवं ईश्वर के बीच की मुख्य बाधा है। व्यक्ति साफसाफ निर्णय करे वह अपने भीतर शिवत्व चाहता है या अहंकार। अभिमान नहीं, स्वाभिमान अपनाएं अहंकार के दो रूप हैं - अभिमान और स्वाभिमान। अहंकार के कुछ बिंदु ऐसे हैं जिन्हें त्यागा जाना चाहिए लेकिन कुछ बिंदु ऐसे भी हैं जिन्हें जीया जाना चाहिए। शायद जिन्हें त्यागा जाना चाहिए, उन्हें तो हम जी रहे हैं और जिन्हें जीना चाहिए उनका हम त्याग किये हुए हैं। अभिमान मनुष्य को अकड़ और घमंड देता है और स्वाभिमान मनुष्य को आत्म-गौरव देता है। हर व्यक्ति में स्वाभिमान और आत्मगौरव तो होना ही चाहिए लेकिन किसी में भी अभिमान, अकड़ और नकारात्मक जीवन का दृष्टिकोण नहीं होना चाहिए। अभिमान, अकड़ और घमंड जीवन के लिये नकारात्मक दृष्टिकोण देते हैं। हम लोगों के भीतर प्रायः आत्मगौरव कम और आत्म-अभिमान अधिक होता है। स्वाभिमान कम और अहंकार तथा अभिमान ज्यादा होता है। आप जानते हैं कि रावण का अंत क्यों हुआ? इतिहास में सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं कि जहाँ व्यक्ति के झूठे दंभ, अनर्गल घमंड और व्यर्थ के अहंकार ने उसके जीवन को नष्ट किया है, उसकी सत्ता और सम्पति को नष्ट किया है। रावण उतना कामुक या कामांध नहीं था। उसका दोष उसके भीतर रहने वाली अहंकार की वृत्ति थी। वह कामांध कम, घमंडी ज्यादा था। रावण को कुंभकर्ण ने भी समझाया था कि वह सीता को वापस कर दे। और तो और, अंतिम पलों में इन्द्रजीत ने भी समझाया था कि सीता को वापस कर दे क्योंकि एक नारी के पीछे सोने की लंका और राक्षसवंश का अंत होने जा रहा था। शायद रावण की आत्मा ने भी कहा होगा कि सीता राम को लौटा दे, लेकिन सीता को लौटाने में रावण का अहंकार आड़े आ रहा था। रावण कामुक कम, अहंकारी ज्यादा था। सीता का अपहरण भी 11 For Personal & Private Use Only Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उसने कामवश कम, अहंकारवश ही किया था। क्योंकि जब उसकी बहन ने बताया कि उसके नाक-कान काट दिये गए हैं तब रावण का अहंकार जगा कि मेरी बहन की यह हालत ! अब राम की पत्नी की भी यही हालत कर दूंगा और उसने सीता का अपहरण किया अपने अहंकार के पोषण के लिये। अपने अंतिम क्षणों में भी अगर रावण अपना अहंकार छोड़ देता तो शायद न तो उसका वध होता और न ही आज तक रावण का दहन किया जाता। पत्थरों को तय हैं ठोकरें ___ अहंकार व्यक्ति के विनाश का कारण है। कंस को भी शायद उसके अंतिम पलों में यह महसूस हो गया था कि कृष्ण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। वह तो विष्णु का अवतार है और मेरा वध उसके हाथों निश्चित है। वर्ष भर तक निरन्तर रात में सोते, दिन में जागते, भोजन करते, राजसभा में बैठे हुए हर समय उसे अपनी मौत ही नजर आ रही थी। भले ही राजसभा में बैठकर उसने कृष्ण का अंत करने की योजनाएँ बनाईं पर मौत की काली परछाई तो कंस के सिर पर नाच रही थी। कंस का अहंकार ही उसके अंत का कारण बना। रावण हो या कंस, किसी का भी अहंकार टिका नहीं है। क्या होता है अहंकार का परिणाम, अगर देखना है तो, इस युग में सद्दाम हुसैन सबसे जीवंत उदाहरण है। याद रखें, दुनिया ने उसी को पूजा है जिसके भीतर नम्रता और सदाशयता रही है। जो अहंकार के पत्थर बन गए, उन्होंने ठोकरें ही खाई हैं। जिनके भीतर अहंकार की ग्रंथि होती है उनके चारों ओर 'मैं' का जाल बुना रहता है। उन्हें लगता है कि वे ही दुनियाभर के कार्यों को अंजाम दे रहे हैं। मैं सोचा करता हूँ कि ऐसे लोगों को उनका पूर्वजन्म तो आसानी से बताया जा सकता है जो हर समय 'मैं-मैं' करते रहते हैं। पिछले जन्म में वे जरूर बकरे रहे होंगे तभी तो मैं-मैं करने की आदत अपने साथ लेकर आये हैं। आप भी 'मैं' की वृत्ति को कम करें और 'हम' की वृत्ति को जीवित करें। मैंने ऐसा किया है और अब भी 'मैं' ऐसा ही कर रहा हूँ। 'मैं' कहने के बजाय अगर ऐसा कहें और करें कि 'हमने ऐसा किया है अथवा 'हम' ऐसा कर रहे हैं तो आप यह मानकर चलिए कि जहाँ पर 'हम' होता है, वहाँ सार्वभौमिकता होती है और जहाँ 'मैं' होता है वहाँ अहंकार की वृत्ति होती है। यह सब मैंने 72 For Personal & Private Use Only Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ किया है कहने की बजाय विनम्र भाषा का प्रयोग करें- 'यह हमारा विनम्र प्रयास है' ऐसा कहना और सुनना दोनों ही अच्छा लगेगा। नरक का द्वार- अहंकार स्वामी विवेकानंद एक बार अपने भक्तों के बीच बैठे हुए थे। वे लोग परस्पर बातचीत कर रहे थे। उनमें से एक युवक खड़ा हुआ और पूछने लगा'आप में से क्या कोई यह बता सकता है कि नरक कौन ले जाता है?' एक ने कहा, 'जुआ ले जाता है।' प्रश्नकर्ता ने कहा, 'मैं नहीं मानता।' दूसरे ने कहा, 'शायद, पराई स्त्री पर गलत नजर डालना नरक ले जाता है। उसने कहा, 'मैं नहीं मानता।' तीसरे ने कहा 'व्यसनों में जीना।' उसने फिर मानने से इन्कार कर दिया। चौथे ने कहा, 'मिलावट करना, खोटे धंधे करना'। इस तरह लोगों ने कई तरह की बातें बताई कि शायद ऐसा-ऐसा करने वाला आदमी नरक में जाता है लेकिन वह युवक हर बार यही कहता कि, 'मैं नहीं मानता।' विवेकानंद तो चर्चा में मशगूल थे। जब उनका ध्यान इस ओर गया तो उन्होंने पूछा, 'क्या बात है? आखिर आपका प्रश्न क्या है?' लोगों ने प्रश्न और उसके विभिन्न उत्तर उन्हें बताए और यह भी कहा कि वह युवक इन उत्तरों को स्वीकार नहीं कर रहा है। विवेकानंद ने कहा, 'तुम अगर जानना चाहो तो मैं बता सकता हूँ कि नरक में कौन ले जाता है। यह हमारा जो मैं' है, यही नरक में ले जाता है। मैं' का भाव अर्थात् अहंकार की वृत्ति ही हमें नरक की और धकेलती है।' सावधान हो जाएँ कि कहीं हमारे भीतर अहंकार के बीज तो नहीं पनप रहे हैं। सावधान हो जाएँ कि कहीं हमारे भीतर अहंकार का शूल तो नहीं उग रहा है। सावधान हो जाएँ कि कहीं हमारे भीतर अकड़ या घमंड की ग्रंथि तो नहीं पल रही है। आपके भीतर पनपने वाली अहंकार की वृत्ति ही आपके स्वभाव को विकृत कर देगी। हटाएँ अहंकार की दीवार अहंकार दो मनुष्यों के बीच मैत्री को दूर करने वाली सबसे बड़ी दीवार है। यह वह चट्टान है जो हमारे जीवन की राह को कठिन बनानी है ' और अगर यह चट्टान खंड़ित हो जाए तो जीवन में प्रेम का झरना फूट पड़ता 73 For Personal & Private Use Only Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है। किसी भी बात को तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने में अहंकार की सबसे बड़ी भूमिका होती है। कोई कितना भी समझाए पर आदमी अहंकार को छोड़ नहीं पाता और इसके चलते अपने जीवन के मधुर संबंधों में खटास डाल देता है। अच्छे मित्रों को खो देता है। मन की शांति को भंग करता ही है साथ ही अहंकारी व्यक्ति के हाथ में मानवीय मूल्य भी नहीं टिक पाते। वह अपनों के साथ तो जीना चाहता है परन्तु उन पर भी अपने अहंकार का आरोपण करने की कोशिश करता है और धीरे-धीरे वह स्वयं के जीवन का माधुर्य ही खो बैठता है। मेरे पास अभी कुछ दिन पहले एक महानुभाव आये। जिन्होंने स्वाभिमान के नाम पर कई थोथे अहंकार पाल रखे थे। कहने लगे, मेरे परिवार में सब लोग सम्पन्न हैं लेकिन मैं किसी का अहसान लेना नहीं चाहता, मेरी गरज न करे तो मैं अपने भाइयों के घर नहीं जाता। मैं अपनी माँ से अलग हुआ तो माँ ने एक मकान देना चाहा पर मैंने अपने स्वाभिमान को गिरने नहीं दिया और वह मकान नहीं लिया। उनकी पत्नी कहने लगी कि ये अपने स्वाभिमान के नाम पर किसी से भी मेलजोल नहीं बिठा पाते, इसी कारण सड़क पर आ गये हैं।' मैंने उन्हें समझाया कि स्वाभिमान के नाम पर ओढ़ रखे अहंकार के लिबास को उतार कर रखें और जीवन में सबसे घुलमिल कर विकास की मंजिल प्राप्त करें। ___मैंने देखा है, लोग अपनी साख को बढ़ाने के नाम पर खुद तो अहंकार में जीते हैं और दूसरों की विनम्रता को चमचागिरी समझते हैं। व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास और आत्मसम्मान की भावना तो होनी चाहिये पर अति-आत्मविश्वास और मिथ्यामान अहंकार का रूप धारण कर लेते हैं। आदमी को चाहिये कि वह स्वाभिमान, सम्मान और अभिमान के बीच एक संतुलन बनाए। केवल अपनी इमेज बनाए रखने के नाम पर टिपटॉप बने रहना और दोस्तों के बीच ऊँची-ऊँची बाते झाड़ते रहना किसी भी रूप में हमारे व्यक्तित्व का सद्गुण नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोग अपना अमूल्य समय, शक्ति और दिमाग को व्यर्थ ही गवाँया करते हैं। अहंकार व्यक्ति के व्यक्तित्व को कंजूस भी करता है। चाहे किसी से 74 For Personal & Private Use Only Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रेम करना हो या किसी की प्रशंसा, कृतज्ञता-ज्ञापन करना हो या मैत्री-भाव आदमी इन सब मामलों में कंजूस बना रहता है। अगर कोई अहंकारी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना चाहता है तो इसके लिए जरूरी है कि वह अपने जीवन में मानवीयता, सहृदयता, जैसे गुणों को धारण करे। मैं तो जब भी किसी शख्स से मिलता हूँ तो सोचता हूँ कि किसी न किसी बात में वह मुझसे बढ़कर है और मैं वह सद्गुण उससे पाने का प्रयास करता हूँ। अच्छा होगा आदमी अपनी जिंदगी के घर से अहंकार को अटाले की तरह बाहर फैंक दे ताकि वह एक बेहतर इंसान बन सके। हम लोग कहते हैं कि दूसरा कोई गलती करे तो हमें गुस्सा आता है लेकिन सच्चाई यह नहीं है। अगर गलती पर गुस्सा आए तो खुद की गलती पर भी गुस्सा आना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं होता। आप सड़क पर चल रहे थे, किसी पत्थर से आपके ठोकर लग गई और अंगूठे से खून बहने लगा। बताइये, अब आप किस पर गुस्सा करेंगे? आप चेहरे पर खुजली कर रहे थे कि अचानक नाखून आपकी आँख में गड़ गया। बताइये, अब आप किस पर गुस्सा करेंगे? आप भोजन कर रहे थे और जीभ दांत के बीच में आ गई, अब आप किस पर गुस्सा करेंगे? गलती पर आदमी को गुस्सा नहीं आता। गुस्सा तो तब आता है जब व्यक्ति के अहंकार को चोट लगती है। झुकता वही है, जिसमें जान है तुमने अपनी पत्नी से कहा कि आज ऐसा-ऐसा कर देना और अगर वह भूल गई तो तुम्हें गुस्सा आएगा क्योंकि तुमने कहा और उसने नहीं किया। इससे तुम्हारे अहंकार को चोट लगी और तुम उबल पड़े। व्यक्ति की अपेक्षा जब उपेक्षित होती है तब उसे गुस्सा आता है। व्यक्ति के अहंकार को चोट लगती है तो गुस्सा आता है। और तो और, जब उसका अहंकार असंतुलित होता है तब भी वह गुस्से से भर उठता है। याद रखें, ताला दो तरह से खुलता है - एक चोट से, दूसरा चाबी से। अहंकार और क्रोध हथौड़े हैं जो टक्कर मारते हैं और प्रेम रूपी ताले को तोड़ डालते हैं। आप अपने अहंकार और क्रोध से एक बार तो किसी से काम करवा सकते हैं लेकिन अन्ततः वह आपसे टूट जाएगा। 75 For Personal & Private Use Only Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दूसरा गुण है - प्रेम और विनम्रता - जिससे व्यक्ति जीवनभर अपने काम करवा सकता है। झुकता वही है जिसमें जान है। अरे, अकड़पन तो मुर्दे की पहचान है। जिनके जीवन से भीतर का सत्य निकल जाता है, वे लोग हमेशा अकड़े ही रहते हैं। याद रखें, अहंकार के हथौड़े से ताला टूटता है, वहीं प्रेम की चाबी से ताला खुलता है। जिसमें लघुता का भाव है, विनम्रता है, उसी में प्रभुता का बसेरा होता है। जिसमें अहंकार भरा है, वह चाहे जितनी पूजा, आराधना, तपस्या करता रहे परमात्मा उसके भीतर कभी साकार नहीं हो सकते। खाली घड़ा, पानी में चाहे जब तक पड़ा रहे, लेकिन वह तब तक नहीं भरता है जब तक वह झुकने को तैयार नहीं होता है। ज्ञान और अहंकार परस्पर दुश्मन हैं। जीवन में विनम्रता, सदाशयता लाएँ, तभी जीवन सुचारु ढंग से चल सकेगा। अपने जीवन की गाड़ी की धुरी में विनम्रता और सदाशयता का ग्रीस लगाएं ताकि गाड़ी बिना आवाज किये आराम से चल सके। जीवन की गाड़ी गति से चले इसलिये विनम्र बने रहें अन्यथा खटर-खटर की आवाज आती रहेगी। जीभ नरम रहती है, कोमल होती है अत: जन्म से मिलती है और मृत्यु तक रहती है, पर दाँत कठोर होते हैं अत: जन्म के बाद मिलते हैं और मृत्यु से पहले टूट जाते हैं। __विनम्रता के तीन लक्षण हैं- कड़वी बात का मधुर जवाब दें, क्रोध के वातावरण में चुप्पी साध लें और किसी गलती पर मन में क्षमा भाव को स्थान दें। शरीर में स्वास्थ्य रहे, मन में आनंद रहे, बुद्धि में सद्ज्ञान रहे और अहंकार में विनम्रता रहे। . वे लोग ही महानता उपलब्ध कर पाते हैं जो विनम्र हैं। उन्हीं की पूजा होती है जो विनम्र होते हैं। आप जितने बड़े हैं उतने ही छोटे काम करने को तत्पर रहिए। आपको याद होगा कि जब पांडवों ने राजसूय यज्ञ किया था तो श्री कृष्ण ने उनसे पूछा कि उन्हें क्या कार्य दिया जाएगा? पांडवों ने कहा, 'हम आपको क्या जवाबदारी सौंप सकते है? आप जो भी करना चाहें, खुद ही मांग लीजिए।' कृष्ण मुस्कुराए और बोले, 'ठीक है, अगर मुझे ही कार्य का चयन करना है तो मैं चाहूँगा कि यज्ञ में आए हुए सभी ऋषि, ब्राह्मण, और अतिथियों के चरण-प्रक्षालन मैं करूँ।' ___76 For Personal & Private Use Only Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ज्ञानी वही जो स्वीकारे अज्ञान भगवान् वे नहीं जो स्वयं को भगवान् मानते हैं बल्कि वे ही भगवान् होते हैं जो औरों को भगवान् होने का सम्मान देते हैं। जो खुद को महान् मान लेते हैं उनसे अधिक हीन दुनिया में अन्य कोई नहीं होता। जिसने अपने जीवन के अज्ञान का बोध पा लिया है वही ज्ञानी होने का अधिकारी है। सुकरात के समय में यूनान में ज्ञान की देवी 'डेल्फी' प्रकट हुई, जो भविष्यवाणी किया करती थी। लोगों ने पूछा कि दुनिया का सबसे अधिक ज्ञानी व्यक्ति कौन है? देवी ने कहा, 'आज की तारीख में दुनिया का सबसे बड़ा ज्ञानी व्यक्ति तुम लोगों के शहर में ही है।' सबमें उत्सुकता जगी कि 'कौन?' 'सुकरात', देवी ने उत्तर दिया। शहर के लोग सुकरात के पास गये और उन्हें कहा, 'देवी ने घोषणा की है कि आप दुनिया के सबसे महान् ज्ञानी व्यक्ति हैं।' सुकरात ने कहा, 'लगता है, देवी से घोषणा करने में कुछ भूल-चूक हो गई है। अरे, मैं तो दुनिया का सबसे बड़ा अज्ञानी हूँ।' लोग देवी के पास वापस आये और सुकरात ने जो कहा था वह बताते हुए पूछा कि, 'क्या सुकरात झूठ बोल रहे हैं? वे तो कहते हैं कि मैं तो दुनिया का सबसे बड़ा अज्ञानी हूँ।' देवी ने कहा, 'भक्तों, दुनिया में जिसे अपने अज्ञान का बोध हो गया है, वही तो सबसे बड़ा ज्ञानी है।' ___ एक घटना और है - शाक्य वंश के सात राजकुमार भगवान् बुद्ध का प्रवचन सुनने पहुँचे। भगवान् की गूढ, किन्तु सरल प्रवाहमयी वाणी सुनकर वे प्रभावित हुए और प्रवचन सुनते-सुनते वैराग्य से जुड़ गए। उन्होंने निश्चय किया कि वे भी भिक्षु बनेंगे। उन्होंने खड़े होकर निवेदन किया- 'भगवन्, हम भी आपके श्रीचरणों में दीक्षित, प्रव्रजित होना चाहते हैं। हम भिक्षु बनना चाहते हैं।' बुद्ध ने कहा, 'अगर तुम्हारे मन में प्रबल वैराग्य जगा है तो मैं तैयार हूँ।' राजकुमारों ने सोचा कि अगर माता-पिता के.पास आज्ञा लेने जाएँगे तो शायद वे तैयार न हों कि हम दीक्षा लें। अतः अच्छा तो यह होगा कि हम दीक्षित होकर ही अपने माता-पिता को सूचना भिजवा दें। ___ उन राजकुमारों के साथ उनका सेवक भी आया था। उस सेवक ने 77 For Personal & Private Use Only Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ता-उम्र उनकी सेवा की थी, हर प्रकार से उनका ध्यान रखा था अतः उन्होंने सोचा कि इसने हमेशा हमारी सेवा ही की है इसलिये अपने वस्त्र-आभूषण आदि सभी इसको ही दे देते हैं। राजकुमारों ने ऐसा ही किया। सेवक तो बहुत प्रसन्न हुआ क्योंकि जिसे जीवन में कभी सोने की अंगूठी भी न मिली थी, उसे अचानक इतने सारे आभूषण और वस्त्र मिल गए थे। उसने सब सामान तुरंतफुरंत इकट्ठे किये और दौड़ पड़ा अपने गृह नगर की ओर यह सोच कर कि कहीं राजकुमारों का मन न बदल जाए। राजकुमारों ने सेवक से कहा, 'तुम जाकर हमारे पिताजी महाराज को सूचना देना कि आपके सातों पुत्र राजकुमार संन्यासी हो गए हैं और उन्होंने आपसे क्षमा चाही है कि बिना आपकी अनुमति लिए उन्होंने संन्यास ले लिया है। सेवक ने चलते-चलते उनकी यह बात सुनी और वह तेजी से निकल गया। गहनों में नहीं बहना ____ आभूषणों की पोटली लेकर भागते हुए दो-तीन मील पहुँचा होगा कि एक पेड़ के नीचे विश्राम हेतु बैठ गया। बैठते ही उसे विचार आया कि अगर मैं राजा को सातों राजकुमारों के संन्यास लेने की खबर सुनाऊँगा तो राजा शायद विश्वास न करे और मेरे पास वस्त्र-आभूषणों को देखकर सोचने लगे कि कहीं मैंने ही तो उन राजकुमारों की हत्या नहीं कर दी है और माल लेकर आ गया हूँ। वह बार-बार गहनों को देखता और खुश होता लेकिन तभी उसके मन से एक आवाज और उठी, 'हे सेवक! तू बार-बार उन गहनों को देखकर प्रसन्न हो रहा है जिनका राजकुमारों ने त्याग कर दिया है। जरूर ही उन लोगों को इससे भी बड़ी कोई चीज मिली है जिसके लिये उन्होंने इन गहनों का त्याग कर दिया है। अरे, अब मैं घर जाकर क्या करूँगा? मैं भी उस रास्ते पर जाऊँगा जिस पर सातों राजकुमार गए हैं।' वह वापस बुद्ध के पास आ गया। यह मिटे, तो वह प्रकटे सातों राजकुमार मुंडित हो चुके थे। भिक्षु बनने के लिये काषाय वस्त्र भी पहन चुके थे। भगवान के सामने वे करबद्ध खड़े थे प्रव्रज्या का मंत्र सुनने के लिए। तभी सेवक वहाँ पहुँचा और बोला, 'हे राजकुमारों, तुम्हारे दिव्य 78 For Personal & Private Use Only Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ मार्ग को देखकर मेरा भी मन बदल गया है। मैं भी संन्यासी बनना चाहता हूँ।' उसने भी मुंडन करवा लिया और काषाय वस्त्र धारण कर लिये। बुद्ध जैसे ही प्रव्रज्या-मंत्र सुनाने को उद्यत हुए तो राजकुमारों ने कहा, 'भगवन्, हम चाहते हैं कि आप हमें संन्यास दें, इससे पूर्व हमारे इस सेवक को संन्यास देवें।' बुद्ध ने कहा, 'तुमसे पूर्व इसे संन्यास देने का अर्थ है कि तुम लोग इसे पहले प्रणाम करोगे और यह तुम लोगों से बड़ा हो जाएगा। तुम सातों राजकुमारों को इसके सामने झुकना पड़ेगा।' राजकुमारों ने कहा, 'हम यही तो चाहते हैं । हम क्षत्रिय वंश के राजकुमार हैं और हम जानते हैं कि संत बनने के बाद भी हम अपने अहंकार को नहीं मिटा पाएँगे इसलिए आप इसे पहले संन्यास दें ताकि जिसने जीवनभर हमारी सेवा की है उसे पहले प्रव्रजित देखकर हम उसकी सेवा कर सकें और उसे प्रणाम कर सकें।' .. जिन लोगों के भीतर इतनी विनम्रता होती है वे वास्तव में संन्यास के हकदार होते हैं। जिनका अहंकार गिरा और विनम्रता जगी, उनके भीतर साधना और मुक्ति प्रकट हो जाती है। __रजब रज ऊपर चढ़े, नरमाई ते जाण। रोड़ा ठोकर खात है, करड़ाई के जाण। हल्की और नरम धल सदा आसमान की ओर उठती है, वहीं कड़क पत्थर जीवन भर पाँवों की ठोकर खाते रहते हैं। ___ हम जब किसी के प्रणाम का जवाब आशीर्वाद की बजाय अभिवादन में देते हैं तो कुछ लोगों को अटपटा सा लगता है कि साधुओं को आशीर्वाद की बजाय प्रणाम करने की क्या जरूरत है? लेकिन हमारी सोच है कि एक गृहस्थ किसी संत के चरणों में अपना सिर झुका सकता है तो क्या एक संत इतना भी विनम्र नहीं हो सकता कि गृहस्थ के लिये अपने दोनों हाथ जोड़ सके? अहंकार में भरकर दिये गये आशीर्वाद से अधिक प्रभावकारी है विनम्रता से किया गया अभिवादन। जीवन में विनम्रता, सरलता, कोमलता, सहजता और समरसता हो तभी जीवन में शांति उतरती है। शरीर में हो स्वास्थ्य, मन में हो आनन्द, बुद्धि में हो ज्ञान और अहंकार की वृत्ति में हो विनम्रता का प्रवेश। गुजरात में कहावत है - जे नमे ते सहुने गमे अर्थात् जो झुकता है वह सबका 79 For Personal & Private Use Only Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रिय होता है। घर में रहने वाले लोगों का आपस में अहंकार टकराता रहता है लेकिन घर की एकता को वही कायम रख सकता है जो झुकने को तैयार है। दो में जो पहले झुकेगा वही महान् होगा। अकडू कभी महान् नहीं हो सकते। बुढ़ापे में कमर झुके इससे पहले हम युवावस्था में ही अपने मन और अहंकार को झुकाने की कोशिश करें। अहंकार के रूप अनेक अहंकार कई तरह का होता है। किसी को जाति और कुल का बड़ा अहंकार होता है। मैं उच्च कुल में पैदा हुआ, यह नीच कुल में पैदा हुआ, यह मेरे सामने कुर्सी पर कैसे बैठ गया, यह दूल्हा गांव में घोड़ी पर बैठकर कैसे निकल गया इत्यादि। व्यक्ति के भीतर जाति का मद होता है। अरे, किसकी जाति अजर-अमर रही है ! आज तुम जिस जाति से नफरत करते हो, पिछले जन्म में तुम उसी जाति के रहे होंगे। वस्तुतः जाति से नहीं बल्कि बड़प्पन से व्यक्ति ऊंचा होता है। जो अकड़ा हुआ रहता है उसे हम ढूंठ कहते हैं और जो फलों, पत्तों से लदा रहता है उसे पेड़ कहते हैं। दूसरा अहंकार लोगों को बल का अथवा शक्ति का होता है। दुर्जन लोग अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को पीड़ित करने के लिये करते हैं लेकिन सजन अपनी शक्ति का उपयोग औरों की पीड़ाओं को मिटाने के लिये करते हैं। उन्हीं की शक्ति सार्थक होती है जो दूसरों की पीड़ा कम करते हैं। बड़े से बड़ा पहलवान भी एक दिन बूढ़ा होता है, उसका शरीर कमजोर हो जाता है, उसके घुटने दर्द करने लगते हैं और चेहरे पर झुर्रियाँ भी पड़ जाती हैं। हर शक्तिशाली व्यक्ति एक दिन शक्तिहीन हो जाता है। रावण को भी अपनी शक्ति का अहंकार था और हम सभी जानते हैं कि यही अहंकार उसके विनाश का कारण बना। राख का रंग एक कई लोग अपने सौन्दर्य का अहंकार भी रखते हैं। जो जरा भी सुंदर हुआ कि उसका रंग-ढंग ही बदल जाता है और उसे अपनी सुंदरता का घमंड हो जाता है। जरा बताएँ कि किसका सौंदर्य आजीवन रहा है ! बचपन जवानी 80 For Personal & Private Use Only Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ की ओर आया है तो यह जवानी भी बुढ़ापे की ओर जाने वाली है। याद रखें कि बीती हुई जवानी कभी लौट कर नहीं आती और आया हुआ बुढ़ापा कभी लौटकर नहीं जाता। फिर कैसा अहंकार! गोरा रंग है तो अहंकार न हो और काला रंग है तो कोई हीनता न हो। श्मशान में जलने वाले हरेक इन्सान की राख का एक ही रंग होता है। गोरे की राख गोरी और काले की राख काली होती हो, ऐसी बात नहीं है। राख के स्तर पर सबका रंग एक हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति सुन्दर दिखने की कोशिश करता है लेकिन बाह्य सौंदर्य और रूप का कैसा अहंकार ! यह सुंदर शरीर एक दिन बुढ़ापे की ओर जाने वाला है. लम्बे काले बाल सफेद होने वाले हैं या झडने वाले हैं, दांत टूटने वाले हैं, दृष्टि कमजोर होने वाली है, झुर्रियाँ पड़ने वाली हैं फिर कैसा रूप और क्या सौंदर्य? चालीस साल पहले जिन अभिनेत्रियों के लोग दीवाने थे, आज वे अपने घर में अकेली पड़ी हैं और उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं है । हरेक का रूप ढल रहा है। आखिर मिट्टी की काया मिट्टी में ही मिलती है। मिट्टी का आदमी किस बात का अहंकार करे! - जब भी मेरे मन में अहंकार की छोटी-सी ग्रंथि भी जगती है तब मैं जमीन और आसमान को देखता हूँ। जमीन को देखकर मेरा मन कहता है - ललितप्रभ, तू किस बात का अहंकार कर रहा है? एक दिन तुझे भी इस जमीन में समा जाना है, मिट्टी में मिल जाना है और आकाश को देखता हूँ तो मन कहता है – 'बंदे, किस बात का अहंकार, एक दिन तुझे भी ऊपर उठ जाना है।' एक दिन हम जा रहे थे सैर को, इधर श्मसान था, उधर कब्रिस्तान था। एक हड्डी ने पाँव से लिपटकर यूँ कहा, अरे देखकर चल, मैं कभी इंसान था। यह जीवन का अटल सत्य है । इसलिये अपने सौंदर्य का अहंकार न करें बल्कि उसे सुरक्षित रखने के लिये औरों को मधुरता दें और मधुरता ही ग्रहण करें। जो भी अहंकार ग्रस्त हो रहा है वह यह जान ले कि उसका सौंदर्य ढलने वाला है और जिनके पास विनम्रता है, उनका सौंदर्य अक्षुण्ण है। 81 For Personal & Private Use Only Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ खुद को नहीं, औरों को सराहें मनुष्य अपने में तप-त्याग - ज्ञान-ध्यान का अहंकार भी पालकर रखता है । वह सोचता है - 'मुझसे बड़ा तपस्वी, जानकार और ज्ञानी कौन ? जब व्यक्ति को बुद्धि का अहंकार हो जाता है तब वह बुद्धिहीन हो जाता है। तुम भी तो लोगों के मध्य अपनी तारीफ करते रहते हो कि तुमने इतनी तपस्या की, यह शास्त्र पढ़ा, इतना दान दिया, बहुत सी बातों की तुम्हें जानकारी है । तुम अपनी तारीफ जिन लोगों के बीच करते हो, हो सकता है कि वे इसे सुनना पसंद ही न करें। ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हारे चले जाने के बाद वे लोग कहें- 'क्या बेकार की अपनी डींगें हांक रहा था, हमारा वक्त और खराब कर गया।' स्मरण रहे, कभी खुद की प्रशंसा न करें । हाँ, दूसरों की तारीफ करने में कभी कमी न रखें। सम्मान सदा औरों को देने के लिए होता है, इसे पाने का प्रयास मत कीजिये । प्रायः लोगों को सत्ता का भी अहंकार आ जाता है कि वे अमुक पद पर पहुँच गए हैं। मंत्री, केबीनेट सचिव, अध्यक्ष या ऐसे ही किसी ऊँचे पद पर सत्तासीन हो गए हैं। कृपया उन दिनों को याद कीजिए जब आप सत्ता में नहीं थे। भविष्य भी देख लें कि भूतपूर्व भी बनना है, फिर किस सत्ता का अहंकार कर रहे हैं? देखा करता हूँ लोगों को कि कल तक तो बड़े सामान्य थे लेकिन जैसे ही सत्ता मिली, मंत्री बने, लाल बत्ती की कार मिली कि उनके तेवर ही बदल जाते हैं । फिर उन लोगों से जब भी मेरा मिलना होता है जो आज भूतपूर्व हो गए हैं तो उनके सारे मिजाज ठंडे पड़ जाते हैं, सत्ता की अकड़ गायब हो जाती है। सत्ता तो दो दिन की है, यह तो आनी - जानी है। सत्ता में तुम किसी भी पद पर पहुँच जाओ, लेकिन अहंकार न करो । जब सत्ता अहंकार देने लगती है तो हमारे विनाश का कारण बन जाती है। जब-जब सत्तासीन लोगों ने स्वयं को प्रजा से बड़ा मान लिया है तब-तब प्रजा ने उन्हें सबक जरूर सिखाया है । किसकी सत्ता कब तक रही है ! देनहार कोई और है हमारे यहाँ गुप्तदान की महिमा है ताकि दान देकर लोग अहंकार न कर सकें। पर अब तो पट्ट पर नाम चाहिए इसलिए दान दिया जाता है । दान 82 For Personal & Private Use Only Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ देकर भी नाम की जबर्दस्त आकांक्षा है। दान देते हैं पचास हजार का और सम्मान पाने की इच्छा है पांच लाख की। मैं उन्हें प्रणाम करूँगा जो देते तो हैं लेकिन वापस पाने की आकांक्षा नहीं रखते। उन्हें भी प्रणाम है जो देते तो हैं पर पत्थर पर नाम लिखाने की चाह नहीं करते। जो समर्पण तो करते हैं लेकिन माला पहनने की कोशिश नहीं करते। याद है न- 'देनहार कोई और है, जो देवत है दिन रैन। लोग भरम हम पर करे, तासें नीचे नैन।' बात उस समय की है जब गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर को उनकी अमर कृति 'गीतांजलि' के लिये नोबेल पुरस्कार मिला था। इस खबर से पूरे देश में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। देश-विदेश से उन्हें बधाई-संदेश आने लगे। छोटे-बड़े, नामी, गिरामी सभी लोग उन्हें बधाई देने के लिए उनके घर आने 'लगे। दूर-दूर से लोग आ रहे थे, लेकिन एक व्यक्ति जो उनका पड़ोसी ही था, बधाई देना तो दूर, यह सब देख कर बेचैन हो रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि टैगोर ने ऐसा कौनसा तीर मार लिया कि लोग उमड़े चले आ रहे थे बधाई देने के लिये। लोग बधाई ही नहीं दे रहे हैं बल्कि टैगोर के पांव भी छू रहे हैं। वह पड़ोसी मन ही मन कुढ़ रहा था। रवीन्द्रनाथ को भी यह बात समझ नहीं आई कि उनका पड़ोसी उनसे मिलने क्यों नहीं आ रहा है? वह नाराज है या कोई और बात है। एक दिन जब वे सुबह टहल रहे थे तो उस पड़ोसी के घर पहुंच गए और झुककर उस व्यक्ति के चरण छूते हुए बोले- 'आशीर्वाद चाहूँगा।' गुरुदेव के व्यवहार से वह व्यक्ति आश्चर्य में पड़ गया कि वह व्यक्ति जिससे मिलने और जिसके पाँव छूने बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं, वह अपनी सफलता के लिए आशीर्वाद लेने के लिए पड़ोसी के घर आकर उसके पैर छुए। उसे आत्मग्लानि होने लगी। उसका गला भर आया, वह बोला- 'गुरुदेव, आप ही नोबेल पुरस्कार पाने के सर्वथा योग्य हैं। आप जैसे व्यवहार के धनी व्यक्ति को ही यह पुरस्कार मिलना चाहिए।' __ श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जो कुछ किया, उसे कहते हैं बड़प्पन। आदमी धन-दौलत या पद से बड़ा नहीं होता। वह बड़ा होता है व्यवहार से। जो धनवान, बलवान, गुणवान, ज्ञानवान होने के बाद भी अभिमान से दूर रहे वही 83 For Personal & Private Use Only Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सही अर्थों में बड़ा है। जो वक्त आने पर बड़प्पन दिखाये, वही बड़ा है। सच्चाई तो यह है हम उनसे प्रेम करते हैं जो हमारी प्रशंसा करते हैं, उनसे नहीं जिनकी हम प्रशंसा करते हैं। प्रभु से प्रार्थना करता हूँ वह हमारे जीवन से भले ही सब कुछ छीन ले पर हमारी विनम्रता को कभी भी न ले। क्योंकि यही वह ग्रीसं है जो हमारी जीवन की गाड़ी को गति देता है। लघुता में प्रभुता बसे, प्रभुता से प्रभु दूर। जो लघुता धारण करे, प्रभुता आप हजूर ॥ एक अहंकार और मनुष्य को होता है वह है 'ऐश्वर्य का अहंकार।' यह मेरी जमीन-जायदाद-कोठी-बंगला-गाड़ी-फैक्ट्री-ऑफिस-दुकान आदि आदि। अरे वाह, ऐसा खूबसूरत मकान जैसा मेरा है अन्य किसी का न होगा। यह जो अहंकार है वह तो सारी दुनिया को जीतने वाले सिकंदर का भी न रह सका। जब वह मर गया तो उसे दफनाने के लिये छ: फीट जमीन ही काम आई और ओढ़ने के लिये दो गज कफन का टुकड़ा। सम्पन्नता के साथ सादगी और विनम्रता भी हो। आप छोड़ना ही चाहते हैं तो जरूर छोड़ें उस अहंकार को जो आपके भीतर है। रखना चाहते हैं तो अपने आत्मगौरव को रखें, स्वाभिमान को रखें, सकारात्मक सोच को रखें। आपने सफलता पाई है तो उसका प्रचार न करें, उसे जीना सीखें, उसे पचाना सीखें। जीवन में जैसे-जैसे ऊपर उठते जाएँ विनम्रता और सदाशयता को ग्रहण करते जाएँ। महान् वही है जो विनम्र है, जिसके मन में सबके लिए समानता की भावना है। आप सभी अहंकार का त्याग करें और जीवन की ऊंचाइयों का स्पर्श करें। स्वयं को बड़ा और दूसरों को तुच्छ न मानें। भाग्य के खेल में किसका पासा कब पलटता है खबर नहीं लगती। अपने जीवन में पल रहे अहंकार रूपी भस्सासुर को भस्म कीजिये। आप शिवत्व को साधने में . सफल हो जाएंगे। इसी मंगल-भावना के साथ आप सभी की चेतना में विराजित परम पिता परमेश्वर को प्रणाम। 84 For Personal & Private Use Only Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ प्रतिशोध हटाएँ,प्रेम जगाएँ बड़े आदमी के क्रोध की बजाय छोटे आदमी की क्षमा अधिक महान होती है। ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों में मनुष्य सर्वाधिक बुद्धिमान माना जाता है। यद्यपि मनुष्य मछली की तरह हर समय पानी में नहीं रह सकता, न ही बाघ की तरह उसके नाखून नुकीले होते हैं, न ही तितली की तरह हवा में उड़ान भर सकता है और न ही बंदर की तरह छलांगें लगा सकता है, फिर भी दुनिया भर के सभी प्राणियों से मनुष्य कुछ हटकर है। कुछ जीव शारीरिक बल में मनुष्य से श्रेष्ठ हो सकते हैं पर बुद्धिमत्ता में कोई भी प्राणी मनुष्य की बराबरी नहीं कर सकता है, लेकिन यह बुद्धिमान आदमी कभी-कभी बुद्धू भी बन जाता है और हम जानते हैं कि कभी-कभी बुद्ध भी वे ही बनते हैं जो जरूरत से ज्यादा बुद्धिमान होते हैं। मनुष्य की आदत है कि वह दूसरों को देखता है, उनकी चर्चा करता है। उसकी सोच रहती है कि वह औरों के बारे में जाने, उनके जीवन में हस्तक्षेप करे, उनको चारित्रवान देखे। वह दूसरों को जितना जानना चाहता है उतना ही उनकी बातें भी सुनना चाहता है। पर दिक्कत यह है कि दूसरों के बारे में जिज्ञासा और दिलचस्पी लेने वाला व्यक्ति स्वयं के प्रति उदासीन रहता है। वह अपने भीतर की आवाज सुनने के लिये तैयार क्यों नहीं है? दूसरों की थोड़ी-सी बुराई हमारी आँखों में खटका करती है लेकिन अपनी बुराइयाँ, For Personal & Private Use Only Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपनी गलतियाँ सदा नजरअंदाज हो जाती हैं। जिसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए उसे व्यक्ति गहराई से देखता है और जिसे गहराई से देखना चाहिए उसकी उपेक्षा कर दी जाती है। बनें वीतद्वेष मनुष्य के जीवन में मैं दो प्रकार के रिश्ते देखता हूँ- दोस्ती का और दुश्मनी का। दोस्ती के रिश्ते को तो हम सभी जानते हैं कि हम अपने मित्रों, परिचितों, आत्मीयजनों को याद किया करते हैं लेकिन वास्तविकता तो यह है कि जितना संबंध दोस्तों से होता है उससे कहीं अधिक संबंध दुश्मनों से होता है। वह दोस्त को भले ही दिन में दो बार याद करे लेकिन अपने दुश्मन को सौ बार याद कर लेता है। इस तरह व्यक्ति के जीवन में दो भाव - दोस्ती और दुश्मनी के पलते हैं। एक राग, दूसरा द्वेष । यह संभव नहीं है कि व्यक्ति स्वयं को राग के दायरे से अलग कर ले, मन में व्याप्त जो मोह-माया की भावना, रागात्मक संबंध है, उनको छिटका दे। हर व्यक्ति वीतराग हो सके, यह संभव नहीं है। अपने परिवार, माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र-पुत्री के प्रति जो रागात्मकता है उसे मन से विलग नहीं किया जा सकता। आज जो बात मैं आपसे कहना चाहता हूँ वह जीवन से राग को मिटाने या हटाने की नहीं है आप शायद राग को न छोड़ पायें, लेकिन वैर, द्वेष, दुश्मनी से तो बच ही सकते हैं। कोई अपने जीवन में वीतराग बन सके या न बन सके, लेकिन हर व्यक्ति को वीतद्वेष अवश्य बन जाना चाहिए। आप अपने मोह को भले ही कम न कर सकें पर दूसरों के प्रति अपने विरोध को तो कम कर ही सकते हैं। आपका जिनके साथ राग और प्रेम है, उनसे आप दूर नहीं हट सकते तो जिनके साथ आपकी दुश्मनी है उनसे तो बचने की कोशिश कर ही सकते हैं। व्यक्ति अपने पुराने आघातों को याद करता है - 'ओह ! तो उसने मेरे साथ ऐसा किया था, उसने भरी सभा में मेरा पानी उतारा था, उसने मीटिंग में मेरी बात काटी थी, लोगों के बीच मेरे साथ दुर्व्यवहार किया था' - ऐसी बातों के प्रति उसके मन में उथल-पुथल चलती रहती है, और एक स्थिति वह आती है जब वह मानसिक रूप से तनाव ग्रस्त हो जाता है। वह निर्णय नहीं कर पाता कि जिसने मेरा अहित किया है उसके साथ मैं कैसा व्यवहार करूँ। 86 For Personal & Private Use Only Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सबको सन्मति दे भगवान! ___ अगर आपको लगता है कि अमुक व्यक्ति आपका दुश्मन है, उसके प्रति आपके मन में वैर-विरोध की भावना है, कटुता है, तो उसके लिए आप छ: महीने का एक प्रयोग करें। उससे माफी माँगने या उसके घर जाने की जरूरत नहीं है, न ही उसके बारे किसी से चर्चा करें। रोज सुबह जब आप भगवान् की प्रार्थना करें, पूजा-पाठ करें या ध्यान-साधना में बैठें तब केवल एक मिनट अन्तर्मन में यह कामना करें कि, "हे ईश्वर तू उसका कल्याण कर, उसका मार्ग प्रशस्त कर, उसको सद्बुद्धि दे और जीवन की अच्छी राहें दिखा।" अगर आप छ: महीने तक लगातार अपने किसी दुश्मन के लिये ऐसी प्रेमभरी प्रार्थना कर रहे हैं तो निश्चय ही छः माह बाद वह दुश्मन आपकी दहलीज पर होगा, यह तय है। हमारे विचार और हमारी मानसिकता ब्रह्माण्ड में फैलती है। आप यह न सोचें कि मेरी आवाज आप तक या आपके शहर तक ही सीमित है, मेरी आवाज ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर तक जाती है। जैसे आवाज जा रही है वैसे ही मेरे विचार भी जा रहे हैं। आप प्रयोग करें, उसका परिणाम सकारात्मक ही होगा। जब तमाम मंत्र, बातें और शास्त्र निष्फल हो जाते हैं तब मनुष्य के लिए एक दवा होती है - 'सकारात्मक सोच'। जब तक व्यक्ति सकारात्मक सोच के साथ चल रहा है, उसकी हर असफलता एक दिन अवश्य ही सफलता में तब्दील हो जाएगी। सकारात्मकता की सौरभ . क्या है यह सकारात्मकता? सकारात्मकता का मतलब यह नहीं कि किसी ने आपके साथ अच्छा किया तो आपने भी अच्छा कर दिया, आपको फूल दिए तो आपने भी फूल दे दिए, किसी ने आपकी बुराई की तो आपने भी बुराई कर दी, किसी ने आपको काँटे चुभाए तो आपने भी काँटे चुभा दिए। प्रेम के बदले प्रेम और कटुता के बदले कटुता देना सकारात्मकता नहीं है। सकारात्मकता वह है जिसमें आपको जिसने कटुता दी है उसे भी प्रेम दें, गाली देने वाले को भी गीत दें, जिसने आपकी बुराई की है उसकी भी तारीफ करें। विपरीत स्थिति आने के बावजूद जब व्यक्ति अपनी सोच को पोजिटिव बनाये 87 For Personal & Private Use Only Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रखता है, वही है सकारात्मक सोच। प्रतिशोध, वैर-विरोध और कटुता नकारात्मक सोच के कारण होती है। ईंट का जवाब पत्थर से देने वाले लोग प्रतिशोध की भावना में जीते हैं और ईंट का जवाब फूल से देने वाले लोग मैत्री की भावना में जीते हैं; वे प्रेम, अनुराग और आत्मीयता में जीते हैं। अगर आप महसूस करें कि अमुक व्यक्ति आपके लिए गलत सोच रहा है, गलत टिप्पणी कर रहा है तो जैसे ही वह मिले, आप उसे प्रेम से प्रणाम करें, चार लोगों के बीच उसकी तारीफ करें, आपके घर आ जाए तो प्रेम से मधुर मुस्कानपूर्वक उसका स्वागत करें। हमें पता चले कि हमारे यहाँ जो व्यक्ति आया है वह हमारी निन्दा करता है, अपशब्द बोलता है, मन में कटुता रखता है तो हम उसका दुगने प्रेम से स्वागत करते हैं, ताकि हमारा व्यवहार उसकी सोच को सुधारने में सहायक बने। हम मध्यप्रदेश के एक नगर में गये थे। एक व्यक्ति अकारण हम पहुँचे उससे पहले ही विरोधी हो गया था। हम नगर में पहुँचे तो उसने अपनी ओर से विपरीत टिप्पणियाँ करने में कमी नहीं रखी। हमने अपने व्यवहार को उसके प्रति पोजिटिव बनाया। और न केवल विचार में अपितु व्यवहार में भी उसके प्रति मधुर भाव में जीने लगे। धीरे-धीरे हमारे माधुर्य ने उसके मन के कल्मष को साफ किया, परिणाम स्वरूप जब हम उस नगर से रवाना हुए तो न केवल वह व्यक्ति हमारा प्रशंसक बन गया अपितु अपने किये के लिए उसकी आँखों में प्रायश्चित के आँसू भी थे। अगर तुम अपने दुश्मन को दोस्त में न बदल सके तो मैं कहूँगा कि तुम अपने व्यवहार को सुधारो। खोल दीजिए गांठें ____ जो पुरानी बातें, पुराने आघातों को याद करके प्रतिशोध की भावना रखता है, वह आत्मघाती है। वह दूसरों का नुकसान कर पाये या नहीं किन्तु अपना नुकसान जरूर करता है। बदला, वैर और प्रतिशोध की भावना व्यक्ति को तालाब की सूखी मिट्टी की तरह बना देती है। जब तालाब का पानी समाप्त हो जाता है तो मिट्टी सूख जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं वैसे ही मनुष्य का मन भी खंड-खंड हो जाता है। बीस वर्ष पुरानी अनर्गल बातें आपके मन में डेरा जमाए रहती हैं। यह आपका मानसिक दिवालियापन और आत्मघाती 88 For Personal & Private Use Only Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 1 मन है। बीस साल पुरानी गाँठों को भी आप खींच रहे हैं, उन्हें ढो रहे हैं । खींचने से गाँठें मजबूत होती जाती हैं और खुलने का नाम भी नहीं लेतीं । हम लोग एक शहर में थे । वहाँ एक व्यक्ति ने पन्द्रह दिन के उपवास किए। उपवास के उपलक्ष्य में उसने सम्पूर्ण समाज के लिए भोज का आयोजन किया। नगर में उस समाज के जितने भी लोग थे उन सबको उसने आमंत्रित किया। सुबह - सुबह समाज के चार-पांच वरिष्ठ लोग हमारे पास आये और कहने लगे- 'महाराजश्री, आज समाज के आठ-दस हजार लोग उस व्यक्ति द्वारा आयोजित भोज में आएँगे लेकिन उसका एकमात्र सगा भाई और उसका परिवार नहीं आएगा।' मैंने पूछा - 'क्यों?' वे कहने लगे- 'दोनों भाइयों में किसी बात को लेकर तनातनी हो गई थी जिसके कारण उनमें वैर-विरोध की भावना बढ़ती ही चली गई ।' स्मरण रखें- 'अगर कटुता को समय रहते मिटा लिया जाता है तो वह मिट जाती है लेकिन उसे भविष्य के लिये छोड़ दिया जाए तो समय बीतने के साथ-साथ वैर-विरोध, कटुता और वैमनस्य बढ़ते ही जाते हैं। समाज के लोगों ने मुझसे निवेदन किया- 'आप चलें उस व्यक्ति के घर और उसे समझाएँ। मैं सहमत हो गया कि अच्छा चलता हूँ । उन लोगों के साथ मैं उन महानुभाव के घर पहुँचा । वह दरवाजे पर स्वागत के लिए आया और मुझे भीतर ले गया। मैं उसके कहने के पूर्व ही आँगन में बैठ गया। मेरे बैठते ही वह भी सामने बैठ गया। मैंने कहा- 'आज तो तुम्हारे लिये बहुत खुशी और सौभाग्य की बात है कि आज तुम्हारे घर में पूरे समाज का भोजन है। उसने कहा, 'नहीं महाराज, मेरे घर में नहीं है । वह मेरा भाई लगता था किन्तु अब नहीं है। उसके घर में भोजन है।' मैंने कहा- 'अच्छा, तुम तो आओगे न ? उसने कहा- 'किसी हालत में नहीं, मर जाऊँगा तब भी नहीं । अरे, हमारे बेटेबेटियों की शादियाँ हो गईं । किन्तु मैं उसके घर नहीं गया और न वह मेरे घर आया। मैंने पूछा- ‘बात क्या है?' वह कहने लगा- 'अब आपसे क्या छिपाना । बीस-बाईस साल पहले उसने समाज में मेरा अपमान कर दिया था, अपशब्द कह दिये थे। फिर बात बढ़ती चली गई और हमने एक-दूसरे के घर आनाजाना और खाना-पीना सब बंद कर दिया ।' 1 89 For Personal & Private Use Only Page #99 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पन्ना पलटा, हम भी पलट लें 'सगे भाई!' मैंने चुटकी लेकर कहा- 'क्या बीस-बाईस साल पुराना कैलेण्डर है आपके घर में? जरा लाइए तो।' वह सकपकाया और कहने लगा- 'महाराज, आप भी क्या बात करते हैं? बीस साल पुराना कैलेण्डर घर में थोड़े ही होता है।' मैंने कहा- 'जब तुम दो साल पुराने कैलेण्डर को भी घर में नहीं रख सकते तो बीस साल पुरानी बात को अपने घर में या मन में क्यों रखे हुए हो? उसे निकालो, क्योंकि यह सब तुम्हारे दिमाग का कचरा है।' शायद नगरपालिका की कचरापेटी की सफाई रोज होती होगी लेकिन मनुष्य का दिमाग उस कचरापेटी से भी बदतर है क्योंकि उसने दिमाग में काम की बातें तो दो प्रतिशत किन्तु ऊल-जलूल इधर-उधर की बातों का संग्रह अट्ठानवें प्रतिशत कर रखा है। वैर-विरोध, वैमनस्य, प्रतिशोध की भावना वही व्यक्ति गालता है जिसने जीवन में क्षमा और प्रेम का आनन्द नहीं लिया है। जिसने अमृत का आनन्द नहीं लिया है वही समुद्र के खारे पानी को पीना चाहता है। तुम खारे पानी को पीने के आदी हो चुके हो और मीठे जल के स्वाद से वंचित हो। जलती हुई शाखा पर कोई भी पंछी अपना घोंसला नहीं बनाना चाहता है। गुस्सैल अथवा क्रोधी आदमी के पास उसका सगा भाई भी बैठना पसंद नहीं करता है। प्रतिशोध तो वह विष है जो मस्तिष्क की ग्रंथियों को कमजोर करता है और मन की शांति को भस्म कर देता है। अगर मनुष्य यह सोचता है कि वह वैर को वैर से, युद्ध को युद्ध से, हिंसा को हिंसा से काट देगा तो यह उसकी भूल है। वैर-विरोध और वैमनस्यता की स्याही से सना हुआ वस्त्र खून से नहीं बल्कि प्रेम आत्मीयता, क्षमा तथा मैत्री के साबुन से साफ किया जाता है। पुराने आघातों को याद करना मानसिक दिवालियापन है, बदला लेने की भावना क्रूरता है और प्रतिशोध की सोच आत्मघात है। यही है सनातन संदेश न हि वैरेण वैराणि समंन्तीध कदाचन। अवैरेण हि समन्ती-एस धम्मो सनंतनो ॥ वैर से वैर को मिटाया नहीं जाता और प्रतिशोध की आग कभी प्रतिशोध से बुझाई नहीं जाती। उसका केवल एक ही साधन है, प्रेम का 90 For Personal & Private Use Only Page #100 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साबुन और क्षमा का जल। आप जानते हैं कि महावीर के कान में कीलें क्यों ठोंकी गई थी? ऋषभदेव ने कौनसा पाप किया था कि बारह महीने तक उन्हें भूखा रहना पड़ा? रावण ने सीता का अपहरण क्यों किया था जबकि उसके मन में सीता के प्रति कोई पाप न था? इसका कारण कुछ और था। महावीर के कानों में कीलें ठोकी गईं क्योंकि गुस्से में आकर उन्होंने पूर्व जन्म में किसी के कानों में पिघलता हुआ शीशा डलवाया था। तुम मरते हो तो कीमती चूड़ियाँ, हीरों के हार, सुन्दर बदन, सुन्दर मकान, सुन्दर कपड़े और सुन्दर दुकान यहीं रह जाती है लेकिन मरने के बाद जन्म-जन्मान्तर तक वैरविरोध की गांठ चलती रहती है। इस गांठ को कमठ भी लेकर गया और मेघमाली के रूप में उसने पार्श्व पर उसका प्रयोग किया। रावण ने सीता का अपहरण किया क्योंकि उसकी बहिन शूर्पणखा ने उसके मन में राम के प्रति प्रतिशोध की भावना पैदा की थी। उसे ललकारते हुए कहा था- 'एक मनुष्य ने तुम्हारी बहिन की नाक काटी है, उसका अपमान किया है, क्या तुम उसके अपमान का बदला नहीं लोगे?' और इस तरह बहिन के प्रतिशोध का बदला लेने के लिए रावण ने राम की पत्नी सीता का अपहरण किया है। यह बात अलग है कि बात का प्रारम्भ छोटी-सी बात से होता है किन्तु आगे चलकर वही बात अहंकार का रूप धारण कर लेती है और फिर अहंकार 'काम' का रूप लेता है। शुरुआत में तो किसी वैर, प्रतिशोध की भावना ही होती है। जन्म न ले ले वैर की गंदी मछली वैर तो मनुष्य के मन रूपी सरोवर में रहने वाली एक ऐसी गंदी मछली है जो सारे सरोवर को गंदा कर देती है। अगर हमारे मन में वैर, कपट, कलह और कटुता है, प्रतिशोध की भावना है तो मैं कहूँगा कि हमने अपने मन के सरोवर में गंदी मछली को जन्म दे दिया है। जब तक यह गंदी मछली रहेगी तुम अपने जीवन में दुर्गंध से भरे रहोगे। वैर से वैर मिटता नहीं है। तुम अपने विरोधी को भी प्रेम दो, उसके प्रति भी दोस्ती के भाव रखो, तुम्हारी निंदा करने वाले व्यक्ति की भी तुम प्रशंसा करो तो तुम पाओगे कि एक दिन वह निंदक तुम्हारे पाँवो में गिर जाएगा। भगवान ने बहुत अच्छी बात कही है कि जो संत विग्रह और कलह में 91 For Personal & Private Use Only Page #101 -------------------------------------------------------------------------- ________________ विश्वास रखते हैं, वे जिस समाज में जाते हैं वहाँ उसके टुकड़े कराने की ही कोशिश करते हैं। जो वाकई में संत होता है वह टूटे हुए दिलों को आपस में जोड़ता है और जो जुड़े हुए दिलों को तोड़ता है, उसे हम 'असंत' कहते हैं। भगवान ने कहा कि जो लोग विग्रह और कलह में विश्वास रखते हैं, वे पाप श्रमण होते हैं। व्यक्ति को उनसे बचना चाहिए। जो संत समाज में आपसी दूरियाँ बढ़ाने की कोशिश करते हैं, वैर-विरोध की भावना पनपाते हैं, अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए मानसिक दूरियाँ बढ़ाते हैं, वे संत नहीं होते। मैंने देखा है. चार-पांच वर्ष पहले जैन सम्प्रदाय में दो संत अलग हए थे। वे अमुक-अमुक संत की परम्परा में चले गए। मैंने देखा, पिछले तीन वर्षों में उनके विरोध की भावना को। उफ्! शायद झोंपड़पट्टी में रहने वाले लोग जिन्हें हम नासमझ कहते हैं और जिन्हें हम धर्म और बुद्धि के विवेक से हीन समझते हैं, वे भी आपस में एक दूसरे का ऐसा विरोध नहीं करते होंगे जैसा उन संतों ने एक-दूसरे का विरोध किया था। मेरे पास, कभी अमुक परम्परा के लोग आते और अपने संत की तारीफ करते, कभी दूसरी परम्परा के लोग आते और अपने संत की प्रशंसा करते। मैं उनसे कहता, 'अभी तुम्हारे संत, संत कहाँ हुए हैं ! जो लोग अपने समाज में, अपने पंथ में वैर-विरोध और कटुता की भावना का पोषण करते हैं, क्या वे लोग संत कहलाने के भी योग्य हैं? संतों के मन में भी अगर संतों के प्रति वैर और विरोध है तो फिर मैं यह पूछना चाहूँगा कि प्रेम का बसेरा कहाँ होगा? प्रेम-सरोवर सूख न पाए मैंने एक राजस्थानी कहावत पढ़ी है- 'कुत्ता लडै दांतां सूं, मूरख लडै लातां सूं और संत लड़े बातां तूं।' सभी लड़ने में मशगूल हैं। धोबी धोबी से मिलता है तो राम-राम करता है, नाई-नाई से मिलता है तो राम-राम करता है, जो भी एक दूसरे से मिलते हैं तो नमस्कार-प्रणाम करते हैं, मगर दुर्भाग्य यह है कि अगर संत संत से मिलता है तो वह हाथ भी जोड़ने को तैयार नहीं होता। सोचें, वस्त्र बदलकर साधु तो हो गए हैं पर क्या मन से भी साधु हो पाए हैं? जिसके मन में कठोरता, कटुता, कलह और संघर्ष की भावना रहती है उसके चित्त में कभी किसी के प्रति प्रेम नहीं होता। उसके प्रेम के सरोवर का 92 For Personal & Private Use Only Page #102 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पानी सूख जाता है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। स्नेह की कमी से मेलजोल में कटौती होती है। वह स्वयं तो दुःखी रहता ही है किंतु अपनी उपस्थिति से आसपास के लोगों को भी दुःखी करता है। अपने क्रोध और अहंकार से स्वयं को तो दंडित करता ही है, दूसरों को भी दंडित करने की सोचता रहता है। इतिहास में खून की जो नदियाँ बहती रही हैं, उनका एकमात्र कारण प्रतिशोध और बदले की भावना रही है। चिरकाल तक मनुष्य के मन में प्रतिशोध की भावना लहराती है। आइये, हम जीवन का बोध जगाएँ, प्रतिशोध को हटाएँ और प्रेम की गंगा-यमुना को अपने हृदय में बहाएँ। वैर बिन, ये चार दिन एक बार हम अपने मन को टटोलें, किसी धार्मिक ग्रन्थ की तरह ईमानदारी से अपने मन को पढ़ें। अपनी विचारस्थिति को पढ़े कि कहीं उसके भीतर कोई वैर तो नहीं है। चार दिन की छोटी-सी जिंदगी में दो दिन तो बीत गए और शेष दो दिन भी बीत जाएँगे - फिर किस बात का वैर-विरोध! चार दिन की जिंदगी में, इतना न मचल के चल। दुनिया है चल-चलाव का रास्ता, जरा सँभल के चल॥ छोटी-सी जिंदगी में कैसा वैर-विरोध! मेरे प्रभु, छोटी-छोटी बातों की गांठें न बाँधे। जैसे गन्ने की गांठ में एक बूंद भी रस नहीं होता वैसे ही जिस आदमी के मन में गांठें बन जाती हैं, उसका जीवन भी नीरस हो जाता है। इतिहास की एक घटना है- काशी में ब्रह्मदत्त नाम के एक नरेश हुए। उनके पड़ोसी राज्य कोशल' के राजा थे दीर्धेती। एक दफा कोशलनरेश और काशीनरेश के मध्य युद्ध हुआ। कोशलनरेश अपनी रानी को लेकर पलायन कर गए, क्योंकि उन्हें पता लग चुका था कि उनकी पराजय तय है। जंगल में वे दोनों कुटिया बनाकर रहने लगे। उस समय रानी गर्भवती थी। कुटिया में ही उसने एक बच्चे को जन्म दिया। दीर्धेती ने उस बच्चे का नाम दीर्घायु रखा। दीर्धेती के मन में संशय था कि ब्रह्मदत्त, कभी भी, यहाँ पर हमला कर सकता है। यह सोचकर उसने दीर्घायु को विद्याध्ययन के लिये दूर भेज दिया। उधर ब्रह्मदत्त के सैनिकों ने दीर्धेती और उसकी पत्नी की हत्या कर दी। दीर्घायु ने जब यह समाचार सुना तो उसने संकल्प किया कि वह अपने 93 For Personal & Private Use Only Page #103 -------------------------------------------------------------------------- ________________ माता-पिता की हत्या का बदला जरूर लेगा। प्रतिशोध की आग से भरे हुए दीर्घायु ने काशीनरेश के यहाँ घुड़साल में नौकरी पा ली। वहाँ नौकरी करते हुए वह अपनी निपुणता से राजा का चहेता बन गया है। राजा ने उसे घुड़साल की नौकरी से हटाकर अपने निजी सहायक के रूप में नियुक्त कर लिया। मन में प्रतिशोध की भावना होने के बावजूद वह उसी के यहाँ काम कर रहा था। दिन, महीने, साल बीत गए। एक दिन राजा ब्रह्मदत्त दीर्घायु को साथ लेकर शिकार खेलने गया है। वह नहीं जानता था कि यह शत्रु का पुत्र है लेकिन दीर्घायु तो अपने पिता के हत्यारे को जानता था। दोनों घनघोर जंगल में पहुँच गये। राजा थक चुका था, अतः एक पेड़ की छाँव में दीर्घायु की गोद में सिर रखकर विश्राम करने लगा। थोड़ी देर में उसे नींद आ गई। बदले से बढ़कर क्षमा - दीर्घायु बार-बार राजा के चेहरे को देखता और सोचता- 'आज मौका है। यही वह व्यक्ति है जिसने मेरे पिता से युद्ध करके उन्हें पराजित किया था। यही है वह जिसने मेरे माता-पिता की हत्या करवाई। आज मुझे मौका मिला है, मैं अपने माता-पिता की हत्या का बदला लूँगा' - ऐसा सोचते हुए उसने अपनी तलवार म्यान से बाहर निकाली। वह ब्रह्मदत्त पर वार करने ही वाला था कि उसे पिता के वचन याद आए- 'बेटा, प्रतिशोध की भावना से भी महान् क्षमा होती है। महान् वे नहीं हैं जो प्रतिशोध की भावना को बलवती बनाए रखते हैं। महान् वे हैं जो अपने हृदय में क्षमा का सागर समेटे रखते हैं। दीर्घायु ने पिता के वचनों पर विचार किया। __उधर सोया हुआ ब्रह्मदत्त स्वप्न देखता है कि उसका अंगरक्षक उसकी हत्या करने के लिये कटार हाथ में ले चुका है। वह घबराकर जाग जाता है और दीर्घायु के हाथ में तलवार देखता है। वह पूछता है- 'तुम कौन हो?' दीर्घायु कहता है- 'तुम्हारे दुश्मन दीर्घती का पुत्र हूँ। मेरे मन में विकल्प आया था कि मैं अपने पिता के हत्यारे की हत्या करके बदला ले लूँ, लेकिन मुझे अपने पिता का कहा गया वह वचन याद आ गया कि प्रतिशोध से बढ़कर तो क्षमा होती है। यही विचारकर मैंने तुम पर तलवार नहीं चलाई। 94 For Personal & Private Use Only Page #104 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अपने शत्रु के हाथ में तलवार देखकर ब्रह्मदत्त काँप गया और क्षमा माँगने लगा। उसने कहा- 'मुझे क्षमा कर दो। मैं चाहता हूँ कि हम अपने वैर विरोध की भावना को यही समाप्त कर दें और परस्पर मैत्री के भाव स्थापित करें। तब ब्रह्मदत्त ने अपनी पुत्री का विवाह दीर्घायु के साथ कर दिया और दहेज में कोशल का राज्य वापस दे दिया। याद रखने की बात है कि प्रतिशोध और वैर से महान् क्षमा होती है और वैभव से ज्यादा महान् त्याग होता है। यह जीवन का अटल सत्य है जो सनातन है। यह कृष्ण, महावीर, बुद्ध, मोहम्मद, जीसस के समय जितना सत्य था आज भी उतना ही सत्य है हम सबके लिये। जीवन में से प्रतिशोध का नाला हटाएँ और प्रेम की गंगा-यमुना बहाएँ। एक बार व्यक्ति प्रेम में जीकर देखे तो उसे पता लगेगा कि प्रेम में जीने का क्या आनन्द और मजा है। प्रेम प्रभावी तो कौन हावी! औरों के वचनों से मन को प्रभावित न करें, औरों की टिप्पणी से मन को कुंठित न करें, अपने मन को विचलित न करें। बुद्ध किसी गाँव से जा रहे थे। गाँव के लोगों ने उनकी बहुत निंदा की, अपशब्द कहे। गाँव वाले जितना बुरा बोल सकते थे, बोले। जब वे चुप हो गए तो बुद्ध ने कहा - 'क्या अब मैं अगले गाँव चला जाऊँ?' लोग दंग रह गये कि हमने इन्हें इतना भला-बुरा कहा और ये जरा भी प्रभावित नहीं हुए बल्कि मधुर मुस्कान से पूछ रहे हैं कि क्या मैं अगले गाँव चला जाऊँ? लोगों ने पूछा, 'हमारी गालियों का क्या हुआ?' बुद्ध ने कहा – 'मैं जब पिछले गाँव में था तो लोग मेरे पास मिठाइयाँ लेकर आए थे। उन्होंने मुझे मिठाइयाँ देने की बहुत कोशिश की और तरहतरह के प्रयास भी किये लेकिन मैंने किसी की मिठाई स्वीकार नहीं की। आप मुझे बताएं कि वे मिठाइयाँ फिर किसके पास रहीं? लोगों ने कहा- 'यह तो बच्चा भी बता देगा कि मिठाइयाँ उन्हीं के पास रहीं।' बुद्ध ने कहा- 'तुम्हारी बात तुम्हें मुबारक! पीछे के गाँव वालों ने मिठाइयाँ दी, मैंने वे नहीं ली अत: वे उन्हीं के पास रहीं, वैसे ही आप लोगों ने मुझे गालियाँ दी और मैंने नहीं ली तो आप लोगों की चीज आप ही के पास रह गई।' 95 For Personal & Private Use Only Page #105 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिनके मन में प्रेम और शांति का निर्झर बहा करता है वे ही लोग अप्रियता, कलह, कटुता और विरोध का वातावरण बनने पर भी उसे प्रेम और क्षमा में ढाल लिया करते हैं। महात्मा गांधी पानी के जहाज पर यात्रा कर रहे थे। उस यात्रा में एक अंग्रेज यात्री भी था जो गांधी जी से नाराज था। उसने अपशब्दों से भरा एक पत्र गांधीजी को लिखा और सोचा कि जब मैं उसे गांधी को दूंगा तो वे नाराज होंगे, झल्लाएँगे, क्रोध करेंगे। और भी क्या-क्या करेंगे, यह देखूगा। गांधीजी के पास पत्र पहुँचा। सरसरी निगाह से उन्होंने पत्र देखा, पढ़ा, उसमें लगी आलपिन निकाली, उसे जेब में रखा और कागज पानी में फेंक दिया। गांधीजी के सहायक ने जब यह देखा तो उससे पूछे बिना न रहा गया कि उन्होंने पिन तो निकाल ली और पत्र क्यों फेंक दिया? गांधी जी ने कहा- 'उसमें पिन ही एक काम की चीज थी जो मैंने रख ली। बाकी सब बेकार की बातें थी, सो मैंने फेंक दी।' काम की बात हो तो उसे स्वीकार लो और बेकार की बातों को फेंक दें। जहाँ मौज, वहाँ ओज प्रसन्न रहो, हर हाल में खुश रहो। प्रसन्नता आपके सौन्दर्य को द्विगुणित करती है। आप प्रेम में, वात्सल्य में जीकर तो देखें। जितने आप जवानी में सुन्दर हैं उससे भी अधिक बुढ़ापे में सुन्दर दिखाई देंगे। क्या आपने गांधीजी का जवानी और बुढ़ापे का चित्र देखा है? तीस वर्ष की आयु में वे जैसे दिखते थे, सत्तर वर्ष की आयु में उससे कहीं अधिक सुन्दर दिखने लगे थे। जैसे-जैसे व्यक्ति के विचार सुन्दर होते जाते हैं उसका भीतरी सौन्दर्य चेहरे पर प्रकट होने लगता है। महावीर तो निर्वस्त्र रहते थे- हवा, धूप, पानी में भी। फिर भी उनका सौन्दर्य अप्रतिम था। आपने महर्षि अरविंद का वृद्धावस्था का चित्र देखा है? उनके चेहरे का ओज, तेज और सौन्दर्य कितना अधिक आकर्षक था? बुढ़ापे में उप्ती का चेहरा बदसूरत होता है जिसके विचार सुन्दर नहीं होते। जिसकी विचारदशा सुन्दर होती है, वह जैसे-जैसे बूढ़ा होता है, उसके चेहरे पर सौन्दर्य छलछलाने लगता है। किसी के कल्याण के लिये अपनी ओर से जो कुछ भी हो सके, कर दो। अगर नहीं कर सको तो सहज रहो, अपने मन को हमेशा निर्मल रखो। मैंने 96 For Personal & Private Use Only Page #106 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सुना है - अमेरिका में एक भिखारी था। जब वह मर गया तो पुलिस उसके शव को अन्त्येष्टि के लिये उठाने आई। वह सड़क के किनारे ही रहता था, अतः उसका सामान भी वहीं पड़ा था। पुलिस ने वहाँ दो थैले देखे। उनमें फटे-पुराने कपड़े थे और थी बैंक की एक पासबुक और एक चैकबुक। पासबुक में देखा तो पाया कि उसके नाम से बैंक में साढ़े तीन लाख डॉलर जमा थे और चेक बुक को टटोला तो उसमें एक ब्लैंक चेक पर साइन किए गए थे। चेकबुक पर एक नोट लिखा हुआ था कि मैंने भीख माँग-माँगकर ये पैसे जमा किए हैं, इनका उपयोग मेरे मरने के बाद, मुझ जैसे ही मांगने वाले लोगों के कल्याण के लिए किया जाए। जब मैंने इस घटना के बारे में जाना तो मेरे दिल ने कहा किसी को भी हो न सका उसके कद का अंदाज, वो आसमां था, पर सर झुका के जीवन भर बैठा रहा। आप इतने महान् भले ही न बन सकें पर इतनी विराटता जरूर दिखा सकते हैं कि अपने मन की कटुता, कलह, संघर्ष की भावना को कम करें। अगर आपके पाँव में काँटा चुभ जाए और आप चलते रहें तो वह आपको तकलीफ देता रहेगा लेकिन उस कांटे को निकाल दिया जाए तो आपको अवश्य ही राहत मिलेगी। इसी तरह आपके मन में जो काँटे चुभे हुए हैं, उन काँटों को बाहर निकाल दें तो आपको बहुत राहत मिलेगी। जिस दिन आपने उन काँटों को निकाल दिया तो मान लीजिए उस दिन संवत्सरी हो गई, क्षमापना हो गई, पर्युषण हो गए, आप वीतद्वेष हो गए। वीतराग होना हमारे हाथ में हो या न हो पर वीतद्वेष होना तो हमारे हाथ में ही है। प्रतिशोध को कैसे मिटाएँ? प्रतिशोध मिटाने का पहला उपाय है : अपने भीतर सहनशीलता का विकास करें। याद है न, जीसस क्राइस्ट को सूली पर लटकाने में उनके ही दो शिष्यों की प्रमुख भूमिका रही। क्रॉस पर लटकाते समय उनकी अंतिम इच्छा पूछी गई तो उन्होनें उन्हीं दो शिष्यों को अपने सामने बुलाने के लिये कहा। दोनों शिष्यों को जीसस के सामने लाया गया। वे दोनों थर-थर काँप रहे थे कि पता नहीं जीसस हमें क्या दुराशीष देंगे लेकिन जीसस ने एक पात्र में दूध और 97 For Personal & Private Use Only Page #107 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जल मंगवाया और उन दोनों शिष्यों को एक चौकी पर बिठाकर उस जल से उनके पाँवों का प्रक्षालन किया ताकि उनके स्वयं के मन में भी उन दोनों के प्रति किसी भी प्रकार की दुर्भावना न रह जाए। उनके अंदर इतनी सहनशीलता थी कि उन्होंने वह पात्र उठाया, दोनों गुरुद्रोही शिष्यों के पाँव धोये और उन्हें अपने बालों से पोंछा। फिर कहा – 'हे प्रभु, तू इन्हें माफ करना क्योंकि ये नहीं जानते हैं कि ये क्या कर रहें हैं?' जिसके भीतर इतनी सहनशीलता होती है वह प्रतिशोध और वैर का जवाब प्रेम से देता है, काँटो का जवाब फूलों से देता है। ___ हम अपने जीवन में उस सहनशीलता का विकास करें कि अगर कोई हमारे प्रति अन्याय करे तो भी हम अपने अन्तर्मन में न्याय की भावना ही रखें। दुश्मन के प्रति भी दोस्ती का भाव रखना ही सहनशीलता का विकास है। ___ प्रतिशोध मिटाने का दूसरा तरीका है -क्षमा का विकास। जब भी विपरीत स्थितियाँ और वातावरण निर्मित हो तब उनके प्रति अपने अन्तर्मन में क्षमा और प्रेम को जन्म दें। महावीर के कान में कीलें ठोकी गईं तो उन्होंने क्षमा को धारण किया। आपके कान में कड़वे शब्द पड़ें तो आप भी क्षमाशील बने । एक संत के जीवन में अगर कषाय जगता है तो वह उसे साँप बनाता है और अगर साँप के जीवन में क्षमा जगती है तो वह उसे देव बना देती है। यही क्षमा, अहिंसा और प्रेम जीवन जीने की कला है। क्षमा-प्रेम का स्वाद अनुपम वैर-विरोध और प्रतिशोध उसी को अच्छे लगते हैं जिसने अभी तक प्रेम और क्षमा का स्वाद नहीं चखा है। दुनिया में दो कठिन कार्य हैं- किसी से क्षमा मांगना या किसी को क्षमा करना। परन्तु ये दोनों ही कार्य आपको अनेक कठिनाईयों से मुक्ति दिलाते हैं। शुरू-शुरू में माफी मांगना हमें जहर पीने के समान लगता है परन्तु परिणाम में अमृत हो जाता है। क्षमा मांगना यदि प्रायश्चित का सुंदर व अच्छा रूप है तो क्षमा करना बड़प्पन का प्रतीक। इसमें आप न केवल मन की उलझन से मुक्त होंगे अपित अपनी शक्ति और शांति में बढ़ोतरी करने में भी सफल हो जाएंगे। - जब कोई व्यक्ति आपके प्रति गलती या अपराध कर देता है तो आपके मन में जलन या प्रतिशोध की भावना पैदा होती है। परिणामस्वरूप आप 98 For Personal & Private Use Only Page #108 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उचित-अनुचित का निर्णय नहीं कर पाते हैं। याद रखें क्रोध का तूफान आपके दिमाग के दीपक की लौ को बुझा देता है। किसी से माफी मांगकर या किसी को माफ कर आप उसके प्रति कोई उपकार नहीं करते। अपितु स्वयं पर ही उपकार करते हैं क्योंकि आप बदले की भावना और वैर विरोध जैसे नकारात्मक भावों से मुक्त होकर शांत और प्रसन्न होते हैं। . त्याग तभी जब त्यागा अहम् प्रतिशोध को हटाने का तीसरा उपाय है - अहंकार का समापन। अगर आपके भीतर 'मैं' का भाव है, तो कृपया उसे निकाल दें वैसे ही जैसे आप पांव में गड़े हुए कांटे को निकालते हैं। आप सभी बुद्धत्व की राह के राही हैं और इस मार्ग पर चलने की पहली सीढ़ी ही अहंकार का त्याग है। आपने सब कुछ त्याग दिया पर अहंकार को न त्याग सके तो आपके सभी त्याग व्यर्थ हैं। आप सबका सम्मान करें । एक व्यक्ति पत्नी से झगड़ा करके गुस्से से भरा हुआ किसी संत की कुटिया के पास पहुँचा। उसने वहाँ धक्का मारकर धड़ाम से दरवाजा खोला, जूते खोले और जाकर गुरु को प्रणाम किया और बोला- 'मुझे शांति का पाठ पढ़ाओ।' गुरु ने कहा- 'शांति और अशांति की बात बाद में करेंगे। पहले तुम जाकर उस दरवाजे से माफी मांगो, अपने जूतों से माफी मांगकर आओ।' उसने कहा - 'क्या मतलब? दरवाजे और जूतों से माफी मांगने का क्या तुक?' संत ने कहा- 'तुमने अभद्रता से दरवाजा खोला है और बेरहमी से जूते खोले हैं इसलिए दोनों से माफी मांगो, फिर आगे कोई बात करेंगे।' _ अगर व्यक्ति शांति चाहता है तो सबका सम्मान करे, हिंसा का बहिष्कार करे, दूसरों के कार्यों में सहयोग दे, बंधुत्व के भाव का स्वयं में संचार करे और समय-असमय दूसरों के काम आए। हम सभी प्रेम की दहलीज पर आए हैं, तो प्रेम से जिएँ, प्रेम का आचमन करें। यदि प्रेम में जीकर देखेंगे तो पता चलेगा कि प्रेम ने हमें क्याक्या दिया है। 99 For Personal & Private Use Only Page #109 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सदाबहार प्रसन्न रहने की कला ईश्वर हमें वह सब कुछ नहीं दे सकता जो हमें पसन्द हो। इसलिए जो ईश्वर दे उसी में राजी रहना सीखिए। परिवर्तन प्रकृति का खूबसूरत अवदान है। जो कल था वह आज नहीं है और जो आज है वह आने वाले कल में स्थायी नहीं रहेगा। प्रकृति की यह व्यवस्था है कि ब्रह्माण्ड में जो आज है वह कल नहीं रहता और जो कल था वह आज नहीं है। परिवर्तन प्रकृति का अखण्ड नियम है। गर्मी का मौसम हो या सर्दी का, सावन की ऋतु हो या पतझड़ की, सभी जानते हैं कि इनमें से कोई नहीं टिकते। गर्मी भी चली जाती है और सर्दी भी, सावन भी बीत जाता है और पतझड़ भी। परिवर्तन प्रकृति का धर्म है। कल तक हम जहाँ हरे पत्ते देख रहे थे, वे पीले पड़कर आज हवा में उड़ रहे हैं। जो परिवर्तन पेड़-पौधों, ऋतुओं, फूलों के साथ होता है वैसी ही व्यवस्था हमारे जीवन के साथ भी है। जैसे हम इन फूल-पत्ती, ऋतु और मौसम के परिवर्तन को स्वीकार करते हैं वैसे ही जीवन में होने वाले परिवर्तनों को भी हमें सहजता से स्वीकार कर लेना चाहिए। परिवर्तन अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं। गुमान नहीं, ग़म भी हैं ___ अगर सूर्योदय होता है तो सूर्यास्त भी होता है। कभी मनुष्य ऊपर उठता है तो कभी नीचे गिरता है इसे प्रकृति की व्यवस्था कह दें या भाग्य की For Personal & Private Use Only Page #110 -------------------------------------------------------------------------- ________________ उठापटक पर ऐसा होता है। हर किसी के जीवन में होता है। फिर ऊपर उठने में कैसा गुमान और नीचे गिरने में किस बात का ग़म । ग़म और गुमान व्यक्ति स्वयं उत्पन्न करता है। उठापटक तो जीवन की व्यवस्था है। जो कल तक गुमान कर रहा था, वह आज ग़म में डूबा है और जिस पर कल तक ग़म का साया था वह आज इतरा रहा है। सुख और दुःख तो हमारी सुविधाओं से आते हैं। ये तो उसी को प्रभावित करते हैं जो इनके निमित्तों से जुड़ा रहता है। जो सदाबहार शांत रहकर अपने मन की प्रसन्नता और आनन्द में जीता है वह सुख आने पर गुमान नहीं करता और दुःख आने पर ग़म नहीं करता। सुख और दुःख व्यक्ति को सुविधाओं और दुविधाओं के आधार पर बाहर से मिलते हैं लेकिन शांति, प्रसन्नता और आनन्द व्यक्ति के भीतर से फूटते हैं। बाहर हैं पल की खुशियां ___ जो बाहर से मिलते हैं उनमें परिवर्तन होता रहता है लेकिन जो भीतर से आता है वह स्थायी होता है। आप देखें कि बाहर के निमित्त व्यक्ति की भावदशा को कैसे प्रभावित करते हैं? एक व्यक्ति ने पांच रुपये का लॉटरी का टिकिट खरीदा। संयोग की बात, अगले दिन अखबार में देखा कि लॉटरी का पुरस्कार घोषित हो गया है और प्रथम पुरस्कार के टिकट का नंबर उसी के टिकट का है। वह बहुत खुश हो गया। उसके मन में प्रसन्नता समा नहीं रही थी। रविवार का दिन था। उसने अपने पड़ोसियों को, मित्रों को, रिश्तेदारों को सूचना दी कि शाम के समय सांध्य भोज का आयोजन कर रहा हूँ क्योंकि मेरे नाम पाँच लाख की लॉटरी खल गई है। शाम के समय उसने भोजन का प्रबंध किया, सभी आमंत्रितों को भोजन कराया और खुद बहुत ही खुश हो रहा था कि उसकी लॉटरी लग गई है। सभी उसके भाग्य की तारीफ कर रहे थे। वह भी जीवन में इतना खुश पहले कभी नहीं हआ था। सभी लोग भोजन करके चले गए। वह व्यक्ति घर में आकर पलंग पर लेट गया। उसे नींद भी न आई। वह ऊंचे-ऊंचे सपने देखने लगा। पांच लाख मिलेंगे तो सामान्य ही सही, एक कार जरूर खरीदूंगा, पचास हजार लगाकर घर भी सुधरवा लूँगा, अपना बुढ़ापा ठीक ढंग से गुजार सकूँ इसके लिए एक-डेढ़ लाख की एफ.डी. भी करवा दूंगा। पाँच-पाँच 101 For Personal & Private Use Only Page #111 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हजार अपने नाती-पोतों को भी दे दूंगा। वह रात भर ख्वाब देखता रहा कि यह करूँगा, वह करूँगा। सुबह उठा तो उसने अखबार देखा। कल जहाँ विज्ञापन था, आज उसी पृष्ठ पर एक और विज्ञापन था। भूल सुधार का। उसमें छपा था- कल जो लॉटरी का विज्ञापन था उसमें अंतिम अंक तीन के बजाय सात पढ़ा जाए। ___कल भी अखबार आया था और आज भी, कल भी विज्ञापन था आज भी,रुपये न कल हाथ में थे और न आज हाथ में है। उसके बावजूद कल का दिन खुशियों में डूबा था और आज का दिन ग़म में। __तभी तो मैंने कहा कि व्यक्ति सुख और दुःख भीतर से नहीं बल्कि बाहर के निमित्तों से पाता है। निमित्त बदलते रहते हैं। जो निमित्तों के प्रभाव में आकर जीवन जीते हैं उनके दिन कभी सुख भरे और रातें पीड़ा भरी, कभी दोपहर खुशी की और सांझ दुःख की हो जाती है। किसी को भी बिजली के बल्ब की तरह नहीं होना चाहिए जिसे जलाना और बुझाना दूसरे के हाथ में होता है। क्या हमारे जीवन की शांति, सुख, प्रसन्नता और आनंद किसी बल्ब की तरह तो नहीं है जो दूसरों से संचालित हो रहा है? किसी ने हमारी तारीफ की, हमारे मन के अनुकूल बात कही और हम प्रसन्न हो गए और किसी ने हमारे प्रतिकूल बात कही तो हम अप्रसन्न हो गए। ऐसी खुशियों, ऐसी शांति, सुख और आनंद हमारे अपने नहीं बल्कि किराए के हैं, उधार लिए हुए हैं। ऐसी प्रसन्नता की कोई उम्र नहीं होती। चित में खुश रहें और पट में भी जिंदगी में सदाबहार प्रसन्न और आनंदचित्त रहने के लिए न तो कार की जरूरत होती है, न ही सत्ता-सम्पत्ति की, न ही आलीशान मकान, दुकान, फैक्ट्री और ऑफिस की जरूरत होती है। ये सब सुविधाएँ दे सकते हैं, शांति नहीं। शांति और जीवन की खुशियाँ कहीं और छिपी हुई हैं। जब हम जानना चाहते हैं कि सदाबहार प्रसन्न कैसे रहें तो एक बात निश्चित समझ लें कि प्रसन्नता औरों से नहीं बल्कि अपने चित्त की चेतना से ही उपार्जित की जाती है। आज तो आदमी की जेब में ऐसा सिक्का है जिसके एक ओर खुशी और __102 For Personal & Private Use Only Page #112 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दूसरी ओर नाखुशी और नाउम्मीदी खुदी हुई है। व्यक्ति जब सिक्का निकालकर उसे देखता है तो उसे खुशी नजर आती है और वह खुश होता है और कभी वह जब सिक्के का दूसरा भाग देखता है तो उसे नाखुशी और नाउम्मीदी नजर आती हैं। वह दुःखी हो जाता है। अपनी जेब में ऐसा सदाबहार सिक्का रखो जिसके दोनों ओर खुशी ही खुदी हो। जब चित को देखो तो भी खुशी और पट को देखो तब भी खुशी। यह सिक्का सभी को जरूर रखना चाहिए। जब भी इसे देखो, तुम्हें शांति और खुशी ही मिलती रहे। प्रसन्नता और सुख का सम्बन्ध व्यक्ति के अन्तर्मन से है। आदमी खुशियों के लिये आयोजन करता है, अपने बच्चे का बर्थ-डे मनाता है। अपने यहाँ भोज का आयोजन करता है, सौ-दो सौ लोग आते हैं, पंडाल बँधता है, विविध प्रकार के पकवान बनते हैं। दो घंटे की खुशियाँ नजर आती हैं, लोग खाना खाकर चले जाते हैं और फिर वही सन्नाटा पसर आता है। खुशियों के समारोह अन्ततः सन्नाटा देकर ही जाते हैं। शांति चाहिए तो अशांति से बचिए अगर आप वाकई में प्रसन्नता और शांति पाना चाहते हैं तो मन को बदलें, मन की दिशा और परिणामों को बदलें। जीवन में जो मिले उसे प्रेम से स्वीकार करें। एक व्यक्ति मिठाई की दुकान पर गया और पूछा- 'तुम्हारे यहाँ सबसे अच्छी मिठाई कौनसी है? हलवाई ने अपने यहाँ की हर मिठाई को एक दूसरे से अच्छा बताया। उस व्यक्ति ने कहा – 'मैं तो यह जानना चाहता हूँ कि कौनसी मिठाई सबसे अच्छी है?' महाशय, मेरी दुकान की हर मिठाई सबसे अच्छी है' - हलवाई ने कहा। जिंदगी भी एक दुकान की तरह है जिसकी हर चीज अच्छी है। जो भी जैसा मिल रहा है उसमें कैसा गिला, कैसी शिकायत ! तुम दुःखी हो, क्योंकि तुम जो चाहते हो, पसंद करते हो वह तुम्हें नहीं मिल पा रहा है। प्रसन्न रहने की कला तो इसमें है कि जो तुम्हें मिल रहा है उसी को पसंद करना शुरू कर दो। ईश्वर हमें वह सब नहीं देता, जो हम चाहते हैं। जो ईश्वर ने दिया है, हम उसे पंसद करना शुरू कर दें। हम सदा खुश रहेंगे। सुख और दुःख दोनों का सम्मान करो। अगर आप अपने मन को इस दिशा में मोड़ने या बदलने में सफल हो जाते हैं तो प्रसन्नता अपने आप 103 For Personal & Private Use Only Page #113 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आएगी। प्रसन्नता उधार या किराए से नहीं मिलती। लोग हमारे पास आते हैं और कहते हैं - 'कोई ऐसा मंत्र बताइए कि जिससे मन को प्रसन्नता और शांति मिले।' मैं कहता हूँ- दुनिया में कोई भी ऐसा मंत्र नहीं है जिसको जपने से शांति पाई जा सके। शांति पाने का एक ही मार्ग है कि आप अशांति के निमित्तों से बचने की कोशिश करें। आपने अपने चारों ओर अशांति के इतने निमित्त खडे कर लिए हैं कि उनके बीच शांति दफन हो गई है। चेहरे की मुस्कान भी कृत्रिम हो गई है जिसके कारण बाहर से तो व्यक्ति सुखी नजर आता है लेकिन अन्तर्मन में वह दुःखी ही है। प्रसन्नता तो वह चंदन है जिसे तुम भी प्रतिदिन अपने शीष पर धारण करो और यदि कोई व्यक्ति तुम्हारे द्वारे आए तो उसका भी उसी चंदन से तिलक करो। प्रसन्नता तो परफ्यूम की तरह है जिसे रोज सुबह ही अपने ऊपर छिड़क लिया जाना चाहिए। प्रसन्नता तो सुन्दर साड़ी की तरह है जिसे पहनकर मन खुश हो जाए। . प्रकृति ने सभी को चेहरे दिए हैं किसी को काले तो किसी को गोरे। सभी को लगभग एक जैसे ही चेहरे दिये हैं - वही नाक, होंठ, कान, आँख, जिह्वा - लगभग एक से ही दिये हैं। लेकिन उन पर भाव हम ही दिया करते हैं। जैसी व्यक्ति की मनोदशा, भावदशा और सोच होती है वह उस व्यक्ति के चेहरे पर उभर जाती है। जीवन की सर्वोपरि शक्ति है व्यक्ति के अन्तर्मन में पलने वाली शांति और प्रसन्नता। जीवन की सबसे बड़ी, सम्पत्ति प्रसन्नता ही है। सर्दी की सुहानी धूप-सी खुशी हम सोचें कि प्रसन्नता हमें क्या देती है? कभी आप एक घंटे तक उदास रहकर देखें कि आपका चित्त कितना मलिन होता जा रहा है? आपके मस्तिष्क की कोशिकाएँ सुप्त होती जा रही हैं। बड़े से बड़ा ज्ञानी भी तब कुछ करने में असमर्थ हो जाता है जब उसके मन में नाउम्मीदी प्रवेश कर जाती है। समर्थ और शक्तिशाली भी शक्तिहीन और श्रीहीन हो जाता है। निराशा से घिरने पर याद करें कि वे दो भोजन, एक जो आपने उदासी के क्षणों में किया था और दूसरा जो आपने प्रसन्नता के पलों में किया था, उनके स्वाद में कितना 104 For Personal & Private Use Only Page #114 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अंतर था! आपकी पत्नी ने स्वादिष्ट भोजन तैयार किया था लेकिन आप चिंताग्रस्त थे, आप पर काम का दबाव और तनाव था अतः वह भोजन आपको फीका और बेकार लग रहा था। दूसरी बार आपकी खोई हुई वस्तु मिल गई थी तो आप बहुत खुश थे और भोजन करने में भी आपको स्वाद आ रहा था। भोजन न तो स्वादिष्ट होता है और न ही बेस्वाद। आपकी मनोदशाओं पर ही भोजन का स्वाद निर्भर है। प्रसन्नता तो शीत में सुहानी धूप जैसी है और गर्मी में शीतल छाया, शीतल बयार जैसी है। स्मरण रहे, जीवन में आने वाले निमित्त कभी एक जैसे नहीं रहते और न ही खुशियाँ एक जैसी रहती हैं। जीवन में मिले सुख और साधन भी एक जैसे नहीं रहते हैं। सूरज उगता है तो अस्त भी होता है, फूल खिलते हैं तो मुरझाते भी हैं। जब जवानी भी बुढ़ापे में तब्दील होती है तो जीवन की खुशियाँ कब तक रह सकती हैं? जीवन में आने वाले बदलाव को जो स्वीकार कर लेता है वही अपने जीवन को प्रसन्नता और शांति से जीने में सफल हो पाता है। जब तक आप पद पर थे तो जीवन में खुशियाँ थीं और आज भूतपूर्व हो गए हैं तब भी जीवन में खुशियाँ रखो। पद से प्रसन्नता को मत जोड़ो। किसी भी पद से भूतपूर्व होने पर भी आप प्रसन्न और शांत हैं तो अभूतपूर्व बने रहेंगे और यदि दुख और ग़म में डूब गये हैं तो भूत बनने से आपको कोई रोक न पाएगा। याद रखें, हर वर्तमान को भूतपूर्व होना है। यही है जीवन का सच ___ मुझे याद है - एक सम्राट को अभिलाषा थी कि वह जीवन के परम सत्य को जाने। इस हेतु उसने बड़े-बड़े पंडितों, ऋषियों, मुनियों व ज्ञानियों को बुलाया। वे लोग आते और अलग-अलग शास्त्रों की बातें बताकर चले जाते कि अमुक शास्त्र में यह कहा है, फलां पुस्तक में यह लिखा है। लेकिन किसी की बात से भी सम्राट् संतुष्ट न हुआ वे ज्ञानीजन जीवन के सत्य का प्रतिबोध राजा को न दे पाए। इस तरह वर्षों बीत गए। ___ एक दिन एक अस्सी वर्षीय वृद्ध संत आया और बोला – 'सम्राट, मैं तुम्हें जीवन का परम सत्य देने आया हूँ, वही सत्य जो मेरे गुरु ने मुझे दिया था।' – यह कहते हुए उसने अपनी भुजा पर बँधा हुआ ताबीज खोला और 105 For Personal & Private Use Only Page #115 -------------------------------------------------------------------------- ________________ राजा को दे दिया। राजा संत को देखने लगा। संत बोला – 'राजन्, जब मेरे गुरु का देह-विलय हुआ था तब उन्होंने मुझे यह ताबीज यह कहकर दिया कि इस ताबीज को तुम कभी मत खोलना, पर जिस दिन तुम्हें यह लगे कि जीवन में संकट का अंतिम दिन आ गया है और तुम इसका सामना करने में विफल हो गए हो तो उस दिन इस ताबीज को खोल लेना और यही तुम्हारे जीवन का परम सत्य होगा। सम्राट, आज तक मेरे जीवन में ऐसा मौका नहीं आया कि मैं इसे खोलूँ। अब मैं बूढ़ा हो चुका हूँ। पता नहीं कब चला जाऊँ इसलिये यह ताबीज मैं तुम्हें दे रहा हूँ। पर तुम भी याद रखना कि इस ताबीज को तुम भी तब ही खोलना जब तुम्हें लगे कि तुम्हारे जीवन में संकट का अंतिम पल आ गया है।' - यह कहकर वह संत चला गया। इधर सम्राट की रोज इच्छा होती थी कि ताबीज खोलकर देख ले लेकिन संत के वचन उसे ऐसा करने से रोक रहे थे। चार-पांच वर्ष बीत गए। वह ताबीज सम्राट की भुजा पर बँधा रहा। एक बार पड़ोसी राजा ने सम्राट के राज्य पर हमला कर दिया। युद्ध हुआ और सम्राट् हार गया। वह घोड़े पर बैठा और महल के पिछले दरवाजे से भाग छूटा। जब शत्रुसेना को पता चला कि सम्राट भाग गया है तो वे लोग भी जंगलों में उसे पकड़ने के लिये पीछे दौड़ पड़े। आगे सम्राट का घोड़ा और पीछे शत्रुसैनिकों के घोड़े। सम्राट को लगा कि अब शत्रु के सैनिक उसे पकड़ ही लेंगे। उसने और अधिक तेजी से घोड़ा दौड़ा दिया। सामने नदी आ गई। सम्राट को तैरना नहीं आता था। वह घोड़े से उतरा और छुपने की जगह खोजने लगा लेकिन आसपास ऐसा कुछ नहीं था जहाँ सम्राट् छिप सके। पीछे से घोड़ों के टापों की आवाज आ रही थी। सम्राट ने सोचा, 'यह मेरे जीवन के संकट का आखिरी पल है। फकीर ने कहा था - ऐसे पल में ताबीज को खोल लेना। उसने ताबीज तोड़ा, ढक्कन खोला तो देखा कि उसमें एक कागज था। सम्राट ने कागज खोला तो देखा उस पर लिखा था – 'यह भी बीत जाएगा। यही जीवन का सत्य है।' तभी उसने देखा कि घोड़ों के टापों की आवाज बन्द हो चुकी है। सैनिक मार्ग भटककर दूसरी दिशा में चले गए। राजा बार-बार उस कागज को पढ़ने लगा, यह भी बीत जाएगा। हाँ, यही जीवन का सच है - राजा सोचने . 106 For Personal & Private Use Only Page #116 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लगा। कुछ घंटे पहले मैं नगर का सम्राट् था, लेकिन वह बीत गया। कुछ देर पहले मैं शत्रुसैनिकों द्वारा पकड़ा जा सकता था लेकिन वे मार्ग भटक गए - यह भी बीत गया। आज मैं जंगल में अकेला पड़ा हूँ। मेरे पास शक्ति और सम्पत्ति नहीं है। अरे, जब वे दिन भी बीत गए तो ये दिन भी बीत जाएंगे। सम्राट ने बार-बार उस मंत्र को पढ़ा और अपने मनोबल को मजबूत करते हुए आसपास के गाँवो में जाकर अपने सैन्यबल को इकट्ठा करने की कोशिश की और धीरे-धीरे विशाल सैन्यबल का निर्माण कर अपने ही नगर पर हमला कर दिया। भयंकर युद्ध लड़ा गया। शत्रु के सैनिक और राजा मारे गए। सम्राट ने अपने ही नगर, राजमहल और राजगद्दी पर फिर कब्जा किया। सम्राट का पुनः राज्याभिषेक होने वाला था। नगर के श्रेष्ठि, मंत्री, सेनापति, राज-पुरोहित सभी राजा के सामने खड़े थे। राजपुरोहित ने मंत्र पढ़ना शुरू किया। राजा के सिर पर जैसे ही मुकुट रखा गया। राजा को कुछ याद आया और चेहरे पर उदासी छा गई। मंत्रियों और सेनापतियों ने पूछा – 'महाराज, यह क्या? आज तो हमारे लिए खुशियों का दिन है और आप इतने उदास?' राजा ने अपनी जेब से फकीर का दिया हुआ कागज निकाला - 'यह भी बीत जाएगा।' एक दिन मैं सम्राट् था लेकिन पराजितं होकर जंगल में अकेला पड़ा था, लेकिन आज फिर सम्राट् बन गया तो क्या हुआ – 'यह भी बीत जाएगा।' जो व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली हर चीज के लिए यह सोचता है कि 'यह भी बीत जाएगा' - वही शांत रहता है। कल अगर तुम करोड़पति थे तो गुमान मत करो क्योंकि यह भी बीत जाएगा' और आज 'रोड़पति' हो गए हो तो ग़मगीन मत होओ, क्योंकि यह भी बीत जाएगा। जो व्यक्ति अपने जीवन की प्रत्येक गतिविधि से अप्रभावित रहता है और जानता है कि यह सब बीत जाने वाला है, वही स्थायी शांति को उपलब्ध होता है और हमेशा प्रसन्न और आनंदित रहता है। बाहर से जो मिलते हैं वह सुख होते हैं और जो भीतर से मिलता है वह जीवन की शांति और प्रसन्नता होती है। नींद की गोली, न बनाएं इसे हमजोली हमारी बेलगाम इच्छाएं और तृष्णाएं न तो हमें सुख से खाने देती हैं, 107 For Personal & Private Use Only Page #117 -------------------------------------------------------------------------- ________________ न सुख से बैठने देती हैं और न ही चैन से सोने देती हैं। न तो हमारा नींद पर नियंत्रण है न ही जागरण पर। पहले आदमी दिन भर परिश्रम करता था। शाम को चैन की रोटी खाता था, रात को आराम की नींद लेता था। आज आदमी की हालत बड़ी जबरदस्त बिगड़ रही है। रात को ए.सी. रूम में सोता है, डनलप के गद्दों पर और सारी रात करवटें बदलता रहता है, फिर भी नींद नहीं आती है। अमेरिका को विकसित देश कहते हैं। वहाँ के लोगों को चैन की नींद नहीं। रात को साठ फीसदी लोग वहाँ नींद की गोलियाँ खा रहे हैं। आखिर यह कैसी जिंदगी है जिसमें रात को सोने के लिए गोली खानी पड़ रही है और सुबह जागरण के लिए अलार्म घड़ी की जरूरत पड़ रही है। दुनिया में सबसे सुखी इंसान कौन है, अगर मुझे पूछो तो कहूंगा वह इंसान सर्वथा सुखी है जिसे सोने के लिए नींद की गोली नहीं खानी पड़ती और जगने के लिए अलार्म की जरूरत नहीं पड़ती। वह सुखी है जो फर्ज निभाता है पर किसी का कर्जदार नहीं है। जो प्रतिकूल परिस्थितियों में मुस्कुराता है। दूसरों का हित करने के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करता है, भला उससे ज्यादा सुखी कौन होगा? वह व्यक्ति सुखी होगा जो मेहनत पर भरोसा रखता है। अपने कार्य स्वयं करें। देखता हूँ सम्पन्न घरों में लोगों को पानी पिलाने के लिए भी नौकर हैं, खाना बनाने के लिए नौकर हैं, झाड़ पोंछे के लिए अलग नौकर हैं, माँ बाप बूढ़े हो गये तो उनकी सेवा के लिए नौकर, छोटे बच्चों को माँ बाप का प्यार कहाँ मिलता है ! उनको पालने के लिए भी नौकर। सम्पन्न घरों में लोगों ने स्वयं को व्यस्त जताने के नाम पर हर काम के लिए नौकर रख रखे हैं। मुझे तो डर लगता है कल कहीं ऐसे दिन न आ जाये जब तुम बहुत ज्यादा व्यस्त हो जाओ तो पत्नी से प्यार करने के लिए भी नौकर रखना पड़े। खुशी : एक मुकम्मल दवा प्रसन्नता के परिणाम क्या हो सकते हैं? पहला देखें - 'स्वास्थ्यपरक परिणाम।' प्रसन्नता हमारे तनाव को काटती है, चिंता को भेदती है, हमें सहज करती है। प्रसन्नता तो प्रेशर कुकर में लगी सीटी की तरह है। जब कुकर में वाष्प का दबाव बढ़ जाता है तो प्रेशर रिलीज करने के लिये सीटी बज जाती 108 For Personal & Private Use Only Page #118 -------------------------------------------------------------------------- ________________ है। अगर सीटी में या ढक्कन में कुछ खराबी आ जाए तो अत्यधिक दबाव के कारण कुकर ही फट जाता है। मनुष्य के मन में भरी चिंता और अवसाद कुकर में भरे हुए प्रेशर की तरह ही हैं। अगर आप प्रसन्नता की एक सीटी बजा देंगे, तो आप महसूस करेंगे कि भीतर का तनाव कम हो रहा है। धीरे-धीरे तनाव के ढक्कन को खोल दो और प्रसन्नता को भरते रहो। अगर आप प्रसन्न रहते हैं तो आपका तनाव मिटता है। अगर आप रुग्ण हैं, आपके शरीर में कोई विकलांगता है तो स्वयं को हीन न समझें। मैं एक ऐसे व्यक्ति से मिला हूँ जिसका कंधे से नीचे का पूरा शरीर निष्क्रिय है, अंगूठे तक। उसे चाहे सूई चुभाओ या काट दो, उसे कुछ पता नहीं चलता है। मैं उसके पास पंद्रह मिनट तक रहा और मैंने अपने जीवन में उससे अधिक प्रसन्न रहने वाला आज तक किसी अन्य को नहीं पाया। हर पल हँसता, मुस्कुराता चेहरा। मैंने पाया कि वह अपने शरीर की विकलांगता पर विजय पाने में सफल हो गया है। जो व्यक्ति अपने जीवन में अपने शरीर पर आने वाले विपरीत धर्म और बीमारियों में भी अपनी प्रसन्नता को बनाये रखता है वही अपने रोग को परास्त करने में सफल हो जाता है। आप भले ही गंभीर से गंभीर बीमारी से ग्रस्त हों लेकिन पचास प्रतिशत ही सही, प्रसन्नता की दवा आपके काम जरूर करेगी। अगर आप निराशा से घिर गये और आपकी उम्मीद का फूल कुम्हला गया है तो निश्चय ही आप रोग पर विजय प्राप्त करने में असफल रहेंगे। एक खुशी, नफे हज़ार प्रसन्नता का दूसरा प्रभाव व्यक्ति की मानसिकता पर पड़ता है। प्रसन्न हृदय में सदा सकारात्मक विचार आते हैं और अप्रसन्न मन में नकारात्मक। अगर आप क्रोध करते हैं तो आपके चेहरे की छत्तीस नाड़ियाँ प्रभावित होती हैं और आपका चेहरा तमतमा उठता है जबकि एक पल की मुस्कान आपकी बत्तीस कोशिकाओं को जीवन प्रदान करती है। जब जहाँ, जिससे मिलो, मुस्कुराते हुए मिलो, यही तो एक बात है जो हमेशा हमारे हाथ में रहती है - मुस्कुराना। जो हमेशा प्रसन्न रहता है उसकी सोच भी सकारात्मक रहती है। प्रसन्नता का तीसरा परिणाम परिवार को मिलता है। जिस परिवार के 109 For Personal & Private Use Only Page #119 -------------------------------------------------------------------------- ________________ लोग हमेशा प्रसन्न रहते हैं वहाँ स्वर्ग बसता है। जिस परिवार में लोग खिन्न मन से रहते हैं वहाँ कभी शांति नहीं होती। हम मकान को गलीचे, अल्मारी, फर्नीचर से सजा सकते हैं लेकिन वह घर स्वर्ग तभी बनता है जब घर के सभी लोग प्रसन्न रहें। प्रसन्नता का चौथा प्रभाव है कि व्यक्ति के सम्बन्ध सभी के साथ मधुर रहते हैं। हो सकता है कि कोई आपसे खुशी-खुशी मिलने आया हो लेकिन आप भीतर से नाखुश थे अत: आपने उसकी खुशी का कोई जवाब नहीं दिया। उस समय सामने वाला व्यक्ति यही समझेगा कि आप उसे देखकर नाखुश हुए हैं। हमारी प्रसन्नता से हमारे सम्बन्धों में मधुरता आती है। अपने घर-परिवार में प्रसन्नता का ऐसा पेड़ लगाएँ जिसकी छाया पड़ौसी तक जाए ताकि हमारी प्रसन्नता का विस्तार पड़ौसी और समाज तक भी हो। बुझाएँ चिंता की चिंगारी __ चिंता हमारी प्रसन्नता में सबसे अधिक बाधक है। यह काम ऐसा क्यों हुआ, ऐसा कैसे हो गया, मेरे साथ ऐसा कैसे हो सकता है, मैं तो उल्टे-सीधे काम करता ही नहीं फिर मुझे ऐसा परिणाम कैसे मिला, व्यक्ति के मन की यही उधेड़बुन चिंता है। जब भी मन में इस प्रकार के विकल्प जगें, उन्हें सहज छोड़ दें। जो होना था सो हो गया, हम अपने मन की शांति को क्यों भंग करें? चिंता तो चिता से भी ज्यादा खतरनाक होती है। चिता तो मरने के बाद जलाती है लेकिन चिंता से व्यक्ति जीते जी जलता रहता है। चिंता भी ऐसी कि उसका कोई हल नहीं है। समय ही उसका सबसे बड़ा हल है। पुत्र है, अगर वह लायक निकल गया तो ठीक और यदि नालायक निकला तो कैसी चिंता? समय पर छोड़ दें। तुम्हारी चिंता का उस पर कोई असर नहीं होने वाला। जीवन में जब जो होना होता है, वह होता है अतः व्यक्ति व्यर्थ की चिंताएँ न पालें। जो चिंता से मुक्त रहता है और होनी को होनी मानकर स्वीकार कर लेता है, वही सदाबहार प्रसन्न रह सकता है। दूसरे फले, इसलिए न जलें ___ हमारी प्रसन्नता का दूसरा बाधक तत्त्व ईर्ष्या है। मैं कई दफा लोगों के 110 For Personal & Private Use Only Page #120 -------------------------------------------------------------------------- ________________ घरों में देखा करता हूँ कि बहुओं के चेहरे लटके हुए हैं और सास भी अलग उदास है। दो सुखी दिल को दुखी करती है एक ईर्ष्या । जब भी दूसरे के विकास को देखकर अन्तर्मन में थोड़ी सी भी ईर्ष्या जगती है तो यह ईर्ष्या जीवन की प्रसन्नता को छीन लेती है। दो सुखी जेठानी-देवरानी ईर्ष्या के कारण दुखी हो जाती है। दूसरा भले ही हमसे ईर्ष्या करे पर हम किसी से भी ईर्ष्या न करें। आप ईर्ष्या करके दो नुकसान उठाते हैं - एक तो आप अपना विकास नहीं कर पाते, सामने वाले के विकास को भी अवरुद्ध करने का प्रयास करते हैं। दूसरा यह कि ईर्ष्या के कारण आप हमेशा अवसाद, तनाव और घुटन से ग्रस्त हो जाते हैं। ईर्ष्या के चक्कर में पड़कर दूसरों का पानी उतारने का प्रयास रहता है। उसमें उसका कछ अहित हो या न हो, तम्हारा पानी जरूर उतर जाता है। ईर्ष्या मत करो। तुम्हें जो मिला है, तुम्हारे भाग्य का मिला है, जो दूसरे के भाग्य में है, वह उसे मिला है। फिर ईर्ष्याग्रस्त क्यों होते हो? हम दुःखी इसलिये नहीं हैं कि ईश्वर ने हमारे लिए कुछ कमी रखी है, हम दुःखी हैं उन्हें देखकर जो सुखी हैं। औरों का सुख हमारे दुःख का कारण बन रहा है अन्तर्हृदय में जगी हुई ईर्ष्या की भावना से व्यक्ति भीतर ही भीतर जलता है और नष्ट हो जाता है। क्रोध छीने बोध हमारी प्रसन्नता को छीनने वाला एक अन्य तत्त्व है - हमारा गुस्सा। दस मिनट का गुस्सा आपकी मानसिक शांति और प्रसन्नता को छीन लेता है। गुस्से में आकर आप गलत निर्णय ले लेते हैं। गुस्सैल व्यक्ति हर समय तनाव में अकड़ा हुआ और गंभीर दिखाई देता है। उसके चेहरे पर हँसी और मुस्कान कम ही आती है। गुस्सा करना बहुत महँगा है। उससे तुम अशांत तो होते ही हो अपने को द:खी भी करते हो और जीवन में जानबूझकर संकटों को आमंत्रण देते हो। अपने घर में प्रेम और शांति का माहौल रखो। घर में एक व्यक्ति गुस्सा कर रहा है तो दूसरा प्रसन्न रहे, शांति और धीरज रखे। यह तो ऊपर वाले को धन्यवाद है कि वह जब भी जोड़ी मिलाता है तो एक न एक को शांत 111 For Personal & Private Use Only Page #121 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बनाता है। अगर पत्नी गुस्सैल है तो पति शांत होता है और पति गुस्सैल है तो पत्नी शांत स्वभाव की होती है। कल्पना करें उस घर की जहाँ दोनों ही गुस्सैल होते हैं। क्या उस घर में कभी स्वर्ग की कल्पना भी की जा सकती है? क्या उनके घर में कभी शांति की बात सोची भी जा सकती है? मुझे याद है, एक कॉलोनी में एक दंपत्ति आकर रहने लगे। दो-चार दिन तक रहे। कॉलोनी वाले सोचते, गजब का घर है जहाँ से प्रायः हँसी की आवाजें ही आती हैं। दोनों बड़े प्रेम से रहते हैं। घरों में सास-बहू, पिता-पुत्र, पति-पत्नी के बीच कुछ न कुछ बोलचाल तो होती है तो आवाजें भी आती हैं, . रोने की, चिल्लाने की। पर इस घर से ऐसी आवाज नहीं आई। एक दिन, सांझ का समय था। कॉलोनी के लोग खड़े थे। संयोग से वह व्यक्ति उधर से निकला। लोगों ने उसे रोका और पूछा, 'क्या बात है भाई, तुम्हारा घर तो अद्भुत है। हमने जब भी सुना तुम्हारे घर से हँसने की आवाज ही आती है। तुम्हारे घर से कभी चीखने-चिल्लाने और रोने की आवाज क्यों नहीं आती?' उस व्यक्ति ने बताया – 'बात यह है कि मेरी पत्नी बड़ी गुस्सैल है। गुस्से में जो भी चीज इसके हाथ पड़ती है वह मुझ पर फेंक मारती है।''तो इसमें हँसने की क्या बात है?' - लोगों ने पूछा। 'अरे, यही तो राज की बात है कि जब उसका निशाना ठीक लगता है तो वह हँसती है और जब उसका निशाना चूक जाता है तो मैं हँसता हूँ' - उसने बताया। सामने वाला गुस्सा करे तो उसे सहन करने की आदत डालो, दूसरा गलती करे तो उसे नजर-अन्दाज करो। खुद से गलती हो जाए तो उसे सहज में स्वीकार करो। जीवन से चाहे जो चला जाए पर एक चीज न जाए और वह है, अपने अन्तर्मन की प्रसन्नता। क्रोध व आवेश के क्षणों में आपा खोना मनुष्य का स्वभाव है। पर इससे ऊपर है ज्ञात-अज्ञात में हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगना या सामने वाले को क्षमा करना। यह आपके व्यक्तित्व को तो ऊपर उठाती है आपको आत्मिक शांति का अहसास भी कराती है। पानी है प्रसन्नता तो... जीवन में सदाबहार प्रसन्न रहने का पहला सूत्र है - सुबह नींद खुलते ही एक मिनट तबीयत से मुस्कुराइए । हँसने - खिलखिलाने की जरूरत नहीं है 112 For Personal & Private Use Only Page #122 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पर अंग-अंग से मुस्कुराइए । यह वह टॉनिक है जिसे आप सुबह - सुबह लेंगे तो दिन भर प्रसन्न रहेंगे । यह एक मिनट की मुस्कान आपको भरपूर प्रसन्नता देगी। दूसरा सूत्र है - 'जीवन को सहजता से जिएं'। जो हो जाए, वह ठीक है - ऐसा होना था सो हो गया, कोई बात नहीं । अगर व्यापार-व्यवसाय में घाटा भी हो जाए तो यह सोच लें कि जाना था सो चला गया। मेरे इस मंत्र को जीवन भर याद रखना कि जो तुम्हारा है वह कभी जा नहीं सकता और जो चला गया वह तुम्हारा था ही नहीं। फिर असहजता कैसी ! जो जैसा जिस रूप में मिला है, उसे सहज रूप से स्वीकार करें। जीवन सहजता, प्रसन्नता का ही रूप है। प्रसन्नता का अमोघ अस्त्र है - 'प्रतिक्रियाओं से बचना ।' छोटी-मोटी घटनाओं को हँसी में टाले दें। गुरजिएफ ने अपने संस्मरणों में लिखा है - 'मेरे पिता मृत्युशैय्या पर थे तब उन्होंने मुझसे कहा, 'अभी तू बहुत छोटा है, मेरी बात नहीं समझ पाएगा लेकिन अमल में लाएगा तो समझने की जरूरत नहीं पड़ेगी।' फिर उन्होंने कहा कि 'कभी कोई ऐसी बात जिससे तुझे लगे कि इससे सामने वाले को या तुझे खुद दुःख होगा तो चौबीस घंटे ठहर जाना और फिर उस बात को कह देना ।' चौबीस घंटे तो क्या अगर आप चौबीस मिनट भी ठहर गए तो भी काफी है। प्रतिकूल वातावरण बने तो यही सोचो कि अगर तुम उस वक्त वहाँ नहीं होते तो उन बातों का जवाब कौन देता? जैसे ही आप प्रतिक्रिया से बचते हैं, जीवन में दुःखों से भी बच जाते हैं । प्रसन्न रहने का अन्य उपाय है 'अपने सभी कार्यों को प्रसन्नता से करें, तन्मयता से करें ।' किसी भी काम को बोझ न मानें। जब आप काम को बोझ मानते हैं तो वह दुगुना बोझ महसूस होता है और प्रसन्नता के साथ करते हैं तो काम हल्का हो जाता है । स्वीकार करें, प्रकृति का सान्निध्य जीवन में प्रकृति के सानिध्य में रहने की आदत डालें। हमने किसी एक ही व्यक्ति, वस्तु या स्थान से खुशियाँ जोड़ रखी थीं, संयोग से वह हमसे 113 For Personal & Private Use Only Page #123 -------------------------------------------------------------------------- ________________ दूर हो गया अथवा टूट गया। ऐसी स्थिति में हम अपना पूरा जीवन उसी की व्यथा में खोते रहेंगे? प्रकृति ने जीवन की खुशियों को पाने के लिए हमारे इर्दगिर्द हजारों उपाय किए हैं। प्रकृति अगर रंग बदलती है, मौसम बदलती है, तो इसके पीछे हमें खुशियाँ देना ही है ताकि हम एक ही रंग व मौसम को देखते हुए बोर न हो जाएँ। प्रकृति ने पानी में शीतलता दी है, फूलों में कोमलता और सुवास दी है, हरियाली में सुन्दरता दी है, तो इन सबके पीछे हमारे जीवन को विविधता और खुशियाँ देना ही रहा है। खास बात यह नहीं है कि हम क्या देख रहे हैं अपितु किस तरह से देख रहे हैं यह खास बात है। जितनी सहजता से प्रकृतिप्रदत सुविधाओं में हम जिएँगे वे हमारे लिए उतनी ही खुशियाँ दे सकेंगी। प्रकृति ने पहाड़, नदी, झरने, वृक्ष, हरियाली, चाँद-सितारे और सूरज सब कुछ हमारे जीवन के लिए ही तो दिए हैं। इनमें से कुछ भी हमसे नहीं छीना जाता है। फिर भी पता नहीं, क्यों हम छोटी-छोटी बातों को लेकर दुःखी हो जाते हैं। अशांत मन के राजा को जो सुख महलों में कभी नसीब नहीं होता शांत मन वाले व्यक्ति को वह सुख झोंपड़े में भी मिल जाया करता है। प्रकृति ने जीवन में खुशियों के इतने निमित्त भर दिये हैं कि यदि हम एक ढूढेंगे तो हमें हजार मिलेंगे। हमारे इर्द-गिर्द खुशियों से भरे हुए निमित्त हैं। जरूरत है उनको उनके सही नजरिये से देखने की। खुशियों के रूप अनेक मुझे याद है, मैं किसी गाँव में किसी कच्ची बस्ती से गुजर रहा था। किसी झोपड़ीनुमा कच्चे मकान में कोई राजस्थानी लोकगीत चल रहा था। घर के बाहर एक आठ-दस साल की बच्ची जिसके सामान्य से कपड़े पहने हुए थे, उस लोकगीत पर बड़ी तन्मयता से थिरक रही थी। मैंने देखा कि उस बच्ची के चेहरे पर संतोष और खुशी के भाव उमड़ रहे थे। सच! सहज प्रसन्नता के साथ उसका वह नृत्य मेरे मन को सुकून दे रहा था। काफी वर्ष पहले की बात है, मैं बैंगलोर में मुख्य मार्ग से गुजर रहा था। मैंने देखा कि चौराहे पर लाल बत्ती जल रही थी इसलिए काफी गाड़ियाँ 114 For Personal & Private Use Only Page #124 -------------------------------------------------------------------------- ________________ रुकी हुई थीं। गाड़ियों में बैठे लोगों के चेहरे पर अपने व्यवसाय-धंधे तथा और भी कई बातों की परेशानियाँ साफ झलक रही थीं। इतने में ही मेरे कानों में भूभू.......... पी पी' की आवाज आई। मैंने देखा कि उन वाहनों में एक व्यक्ति साइकिल लिए खड़ा था। साइकिल पर डण्डे पर लगी छोटी-सी सीट पर एक बच्चा बैठा था। आस-पास खड़ी गाड़ियों को देख कर वह बच्चा हाथ से स्टीरिंग को घूमाने का अभिनय कर रहा था और मुँह से गाड़ी को चलाने की आवाज निकाल रहा था। न केवल मुझे अपितु मेरे साथ चल रहे अन्य लोगों को भी उस बच्चे की इस हरकत को देख कर हँसी आ गई। मुझे लगा कि हमारे इर्द गिर्द कितनी खुशियों के माहौल होते हैं। अभी जयपुर से राजेन्द्र जी ओसवाल मेरे पास आए थे। सुलझे हुए विचार के सेवाभावी व्यक्ति हैं। वे कहने लगे कि उन्होंने गायों की चिकित्सा का शिविर लगाया था। एक गाय का बच्चा ऐसा लाया गया जिसकी दो टांगें टूटी हुई थीं। शिविर में उसका उपचार हुआ। जब वह बछड़ा शिविर में लाया गया तो पीड़ा से इतना कराह रहा था कि एक सैकेंड भी सुख से बैठ ही नहीं पा रहा था। लेकिन सात दिन उपचार के बाद वह अपने पाँवों से चलने लगा। वे बंधु मुझे कहने लगे कि मेरे घर बेटे के जन्म होने पर भी मुझे इतनी खुशी नहीं हुई होगी जितनी उस बछड़े को चलते हुए देख कर हुई। सेवा में सुख का सुकून रतलाम के एक महानुभाव हैं, शांतिलाल जी चौरड़िया। वे जीवदया प्रेमी हैं; एक बार हमारे साथ जोधपुर से नागौर की ओर पैदल चल रहे थे। सुबह के कोई सात बजे होंगे। उन महानुभाव के तीन दिन का उपवास था और साढे आठ-नौ बजे उसकी पूर्णता करनी थी। यकायक हमने देखा कि सड़क के किनारे एक गाय घायल पड़ी थी और उसके पाँव की हड्डियाँ टूट गयी थीं। उसके शरीर से खून बह रहा था। लगभग अर्द्ध मूर्छित जैसी थी वह । हमने आस-पास की ढाणी में रहने वाले लोगों से उसके उपचार के लिए कहा तो किसी ने कोई खास ध्यान नहीं दिया। हमें लगा कि यह अधमरी गाय पूरी ही मर जायेगी। अगर इसकी चिकित्सा न की गई तो कौए व गीध इसको नोच देंगे। 115 For Personal & Private Use Only Page #125 -------------------------------------------------------------------------- ________________ हमारे साथ चल रहे चौरड़िया जी ने हमारे मनोभावों को समझा और कहा, 'मैं इसको पास के शहर ले जाता हूँ ताकि पशु-चिकित्सालय में इसका इलाज करवाया जा सके।' काफी देर तक कोशिश करने के बाद एक व्यक्ति ने टाटा सूमो जैसी ही गाड़ी रोकी। गाड़ी में ड्राइवर के अलावा कोई न था। वह मुसलमान था पर गाय की ऐसी दशा देखकर वह झट से तैयार हो गया। वे लोग गाय को लेकर शहर में पहुँचे। पशु चिकित्सालय में डॉक्टरों ने तत्काल प्रभाव से चिकित्सा की। गाय को होश भी आ गया था। रतलाम के वे महानुभाव गाय को लेकर कई गौशालाओं में गए लेकिन कोई भी उस घायल गाय को रखने को तैयार नहीं हुआ। आखिर में उन्होंने किसी व्यक्ति को इस गाय की व्यवस्था का जिम्मा सौंपा और वह स्वस्थ न हो जाये तब तक पालन-पोषण की जवाबदारी दी। वे उसे आवश्यक रुपये देकर आ गए। शाम को वापस हमारे पास पहुँचे। चूँकि सूर्यास्त के बाद वे कुछ खाते पीते नहीं हैं अत: उस दिन भी उनके उपवास ही हुआ। पर उनके चेहरे पर गाय के उपचार कराने की खुशी ऐसे झलक रही थी कि मानो उन्होंने बहुत बड़ी उपलब्धि पा ली हो। हम उस शहर में पहुँचे। जहाँ गाय का उपचार हो रहा था हम वहाँ गए। उस गाय को अपने पाँवों पर धीरे-धीरे चलते हुए देखकर हमें हृदय में इतनी प्रसन्नता और खुशी मिली जिसकी कोई हद नहीं थी। आज की इस प्रतिस्पर्धा और तनाव भरी जिंदगी में जो और जैसा भी हमें मिला है, उसमें खुशियों को ढूँढना निहायत जरूरी हो गया है। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो आप यह मान कर चलें कि अनेक सुख-सुविधाएँ होने के बावजूद हम असंतुष्ट और दुःखी रहेंगे। अगर जीवन के इर्द-गिर्द घटने वाली घटनाओं में हम खुशी को ढूंढेंगे तो जीवन का पल-प्रतिपल खुशहाल होगा। स्वर्ग और नरक और कुछ नहीं है बल्कि हमारी मन की स्थिति से जुड़े हुए हैं। हमारा मन चाहे तो स्वर्ग को नरक बना सकता है और मन चाहे तो नरक को स्वर्ग। जीवन के हर तनावपूर्ण वातावरण में भी अन्तर्मन में सहज मुस्कान बनाए रखना प्रसन्नता के दो फूल खिलाने की तरह है। कैसा भी और कितना भी तनाव या काम का बोझ बढ़ जाए तब भी 116 For Personal & Private Use Only Page #126 -------------------------------------------------------------------------- ________________ खुद को खुश ही रखने का प्रयास करें। मैंने एक संस्था में देखा एक अधिकारी स्वयं को तो खुश रखते ही थे किन्तु अपने अधिनस्थ कर्मचारियों को भी खुश रखने का प्रयास करते रहते थे। यदि कोई आडा-टेढ़ा काम आ भी जाता तो वे मजाक के लहजे में कहते- 'अरे यह काम करना ज्यादा मुश्किल थोड़े ही है। तुम तो भिड़ जाओ इस काम को करने के लिए।' जीवन में कई बार नि:स्वार्थ कार्य करके भी व्यक्ति खुशियों को प्राप्त करता है। जैसे आपके बच्चे का जन्मदिन है, बजाय इसके कि आप अपने दोस्तों और परिचितों को इकट्ठा करके किसी होटल में जाकर पाँच हजार रुपये पानी करें, यदि किसी अनाथालय, सार्वजनिक अस्पताल अथवा ऐसे ही किसी स्थान पर इन रुपयों को खर्च करें तो आप चिरस्थायी खुशियाँ पा सकते हैं। मैं अपनी ओर से आपको नेक सलाह देना चाहूँगा कि यदि आपने पिछले वर्ष अपनी संतान के जन्मदिन पर घूमने-फिरने, खान-पान में दो हजार खर्च किये हैं तो इस वर्ष आप इन सब कार्यों में खर्च करने की बजाय अपने बच्चे को साथ लेकर किसी अनाथालय, कोढीखाना अथवा ऐसे ही किसी स्थान पर जाएँ और अपने बच्चे के हाथों से उन सबको भोजन करवाएँ। किसी झोंपड़पट्टी में जाकर आप जरूरतमंद बच्चों को कपड़े दें। उन्हें पढ़ने और लिखने के साधन दें और कुछ नहीं तो कम से कम किसी अस्पताल में ही चले जाएँ आप और किसी ऐसे रोगी की तलाश कर लें जिसको दवा की आवश्यकता हो पर आर्थिक अभाव में वह उसकी व्यवस्था न कर पा रहा हो। आप उसको अपने बेटे के हाथ से दवा दिलवाएँ। किसी गरीब व्यक्ति का अगर कोई ऑपरेशन होने वाला है और उसके पास आवश्यक व्यवस्था नहीं है तो आप अपने पुत्र के जन्मदिन पर वास्तविक खुशियाँ पा सकते हैं उसका ऑपरेशन अपनी ओर से करवा करके। आपकी दवा के बदले उस रोगी के द्वारा दी गई दुआएँ आपके पुत्र के जीवन-विकास में ईश्वर की कृपा बनकर संबल प्रदान करेगी। ___ आप इतना भी न कर सकें तो बाजार से पाँच किलो मौसंबी ले जाएँ और सरकारी अस्पताल में जाकर अपने या अपनी पत्नी के हाथ से मौसंबी का 117 For Personal & Private Use Only Page #127 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जूस निकलवाएँ और ऐसे रोगी को अपने पुत्र के हाथों पिलवाएँ जो उसकी व्यवस्था न कर पा रहा हो। आप उन पलों में अनुभव करेंगे कि उस रोगी के जूस पीते समय आपके मन को कितनी शांति मिली है ! अगर कर सकते हैं तो हजारों तरह के उपाय हैं जिनसे मानवता का कल्याण भी होता है और हमारा जीवन भी खुशियों से सराबोर हो जाता है। आप यह भी देख लें कि आपके गाँव या शहर में कोई विकलांग तो नहीं है। आप छोटा सा उपक्रम करें। आप उसके कृत्रिम पाँव लगवा दें। केवल हजार-दो हजार का ही खर्चा होगा, लेकिन अब तक जो आदमी स्वयं को घसीट कर चल रहा था, वह आपके इस सहयोग से पाँव पर खड़ा हो जाएगा। कल्पना करें उसे चलता हुआ देखकर तो आप कितने खुश होंगे। अभी हमने अपने जयपुर प्रवास के दौरान करीब सौ से अधिक विकलांग लोगों के कृत्रिम पाँव बनवाए थे। पता नहीं, प्रवास के दौरान कितने ही बड़े खर्च और समारोह हुए होंगे, पर जितनी खुशी हमें इस कार्य में मिली उतनी खुशी वहाँ आयोजित दशहरा मैदान की ऐतिहासिक प्रवचन-माला में भी न मिली होगी। __ प्रसन्न रहने का अंतिम मंत्र है - हर हाल में मस्त रहें। परिस्थिति कैसी भी हो अपनी मस्ती में कमी न आने दें। हर हाल में मस्त रहने से आपके जीवन में सदाबहार प्रसन्नता का अवतरण हो जाएगा। 118 For Personal & Private Use Only Page #128 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जीवन की मर्यादाएँ और हम मर्यादा जीवन का बंधन नहीं, निर्मल और व्यवस्थित रूप से जीवन जीने की शैली है। एक युवक के मन में जीवनपरक आन्तरिक समस्या उठी। उस समस्या का समाधान पाने के लिए वह कई जगह गया, लेकिन कोई भी समाधान उसे संतुष्ट नहीं कर पाया। उसके मन में यह प्रश्न था कि वह विवाह कर गृहस्थी बसाये या साधु बनकर संन्यास के मार्ग को जीवन में चरितार्थ करे। जिसके पास भी जाता, वह अपना ही मार्ग श्रेष्ठ बताता। संतजन कहते, संन्यासी बन जाओ, शादी करली तो बहुत दुख पाओगे।' और गृहस्थ कहते 'विवाह कर लो, गृहस्थी बसा लो, संन्यासी बन गये तो बड़े पछताओगे।' साधुता या शादी? ___ एक दिन वह किसी फकीर के पास पहुँचा और उनसे कहा - मैं अभी यह समझ नहीं पाया हूँ कि मैं क्या निर्णय करूँ? छब्बीस वर्ष की आयु हो गई है फिर भी अनिर्णय की स्थिति में हूँ कि विवाह करके घर बसाऊँ या संन्यास लेकर साधु का जीवन जीऊँ।' फकीर ने कहा, 'बैठो थोड़ी देर में जवाब मिल जाएगा।' थोड़ी देर बाद फकीर ने अपनी पत्नी से कहा - 'मैं बाहर जा रहा हूँ। दो-तीन घंटे बाद घूमकर आ जाऊँगा।' फकीर ने युवक को अपने साथ लिया और वे जंगल में जाकर एक पहाड़ी की तलहटी पर खड़े हुए। उन्होंने पहाड़ी के शिखर की ओर मुँह करके आवाज लगाई - 'ओ साधु बाबा, ओ साधु बाबा, नीचे आओ।' For Personal & Private Use Only Page #129 -------------------------------------------------------------------------- ________________ युवक ने देखा, फकीर की आवाज सुनकर पहाड़ी के शिखर पर गुफा में रहने वाला एक वृद्ध साधु बाहर आया और धीरे-धीरे लकड़ी के सहारे चलते हुए लगभग पन्द्रह मिनट में वह नीचे तलहटी में पहुँचा। उसने आकर पूछा - 'बोलो भैया, मुझे क्यों याद किया?' फकीर ने कहा – 'बस, यों ही आपके दर्शन की इच्छा थी तो आपको नीचे बुला लिया।' बूढ़े साधु बाबा ने आशीर्वाद देते हुए वापस पहाड़ी की चढ़ाई शुरू कर दी। पन्द्रह मिनट तक चलने के बाद वे अपनी गुफा में पहुंचे ही थे कि फिर आवाज आई - 'ओ साधु बाबा, ओ साधु बाबा, जरा नीचे आओ।' साधु बाबा फिर अपनी गुफा से बाहर निकले और लकड़ी के सहारे जैसे-तैसे नीचे पहुंचे। उन्होंने आकर पूछा - 'बोलो भैया, फिर कैसे याद किया?' फकीर ने कहा - 'कुछ नहीं बाबा, बस फिर आपके दर्शन की इच्छा हो गई।' बूढा साधु दो मिनट बात करने के बाद ऊपर चला गया और जैसे ही गुफा में बैठा कि फिर नीचे से आवाज आई - 'ओ साधु बाबा, ओ साधु बाबा, जरा नीचे आओ।' बूढ़ा साधु जिसकी कमर झुकी हुई थी, चेहरे पर झुर्रियाँ छा चुकी थीं, घुटनों में दर्द भी रहा होगा, तब भी लकड़ी का सहारा लेकर एक बार फिर धीरे-धीरे नीचे आया। नीचे आकर पूछा – 'बोलो भैया, फिर कैसे याद किया?' फकीर ने कहा - 'कुछ भी नहीं, फिर आपके दर्शन की इच्छा हो गई थी।' बूढ़ा साधु दुआएं देकर वापस ऊपर चला गया। फकीर अपने घर लौट आया। पीछे-पीछे युवक भी फकीर के साथ आ गया। मर्यादा ही मर्म दोपहर का समय था। चिलचिलाती धूप पड़ रही थी। घर पहुँचकर फकीर ने अपनी पत्नी को आवाज दी, 'अरे सुनो, जरा लालटेन जलाकर लाओ, मुझे कुछ कविताएँ लिखनी हैं।' पत्नी भीतर गई, लालटेन जलाकर लाई और बाहर चौकी पर रख दी। फकीर ने कविताएँ लिखनी शुरू कर दी। शाम होने आ गई। युवक से न रहा गया। वह पूछने लगा – 'फकीर साहब, मेरे प्रश्न का क्या हुआ?' फकीर ने कहा - 'मैंने तो जवाब दे दिया न्!' युवक ने कहा - 'मैं कुछ समझा नहीं, आपने तो कुछ भी जवाब नहीं दिया।' फकीर ने कहा - 120 For Personal & Private Use Only Page #130 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 'मैंने तुम्हें जवाब दे दिया है। तुम्हारा प्रश्न था कि तुम साधु बनो या शादी करो और तुम्हें इसका जवाब मिल गया है।' युवक ने कहा - 'मैं आपकी बात नहीं समझ पाया, कृपया स्पष्ट करें।' फकीर ने कहा - 'युवक, तुम साधु बनना चाहते हो तो जरूर बनो, लेकिन उस साधु की तरह जिसे मैंने तीन बार नीचे बुलाया, तब भी उसके चेहरे पर किसी प्रकार की शिकन या क्रोध की तरंग नहीं थी। उस वृद्ध साधु के मन में कोई विक्षोभ नहीं था। बार-बार नीचे आकर, ऊपर जाकर भी उसके अन्तर्मन में शांति और मेरे प्रति कितना प्रेम था! हाँ, अगर तुम शादी करना चाहते हो तो ऐसी पत्नी लेकर आना जिसे दोपहर में दो बजे कहो कि लालटेन जलाकर लाओ तो वह यह न पूछे कि सूरज की रोशनी में लालटेन का क्या करोगे? साधु बनना हो तो उस साधु की तरह बनो जहाँ मन में प्रश्न न उठे कि बार-बार नीचे आने-जाने की तकलीफ क्यों दी जा रही है ! यदि शादी करो तो पत्नी के मन में दिन में भी लालटेन मांगने के बाद प्रश्न न उठे कि लालटेन क्यों मांगी जा रही है !' जीवन जीने की स्पष्टत: दो व्यवस्थाएँ हैं और दोनों ही बेहतरीन हैं बशर्ते उन्हें बेहतरीन तरीके से जिया जाए, मर्यादित रूप में जिया जाए। जीवन जीने का पहला मार्ग गृहस्थ और दूसरा संन्यास है। साधुत्व और संसार ये दोनों जीवन जीने के दो मार्ग हैं । एक ओर संसार की और दूसरी ओर संन्यास की धारा है। मैं दोनों की तुलना नहीं करूँगा क्योंकि दोनों ही अपने आप में अच्छी हैं । हम एक को हीन और दूसरे को श्रेष्ठ नहीं कह सकते। संसार में भी व्यक्ति नियम, मर्यादा और विवेक के साथ जीता है तो संसार भी श्रेष्ठ और संन्यास को अगर अमर्यादित, अविवेकपूर्वक जिया जाए तो संन्यास भी त्याज्य है। सफेद कपड़े या काली पैंट, सफेद साड़ी या लाल साड़ी, उपाश्रय या घर महत्वपूर्ण नहीं हैं, महत्वपूर्ण यह है कि कौन किस तरीके से जी रहा है? कुछ गृहस्थ अपने जीवन को इतना निर्मल और पवित्र रूप से जीते हैं कि वे संत जीवन से भी श्रेष्ठतर जीवन जी जाते हैं। कुछ गृहस्थ संत से भी ज्यादा पवित्र जीवन जी लिया करते हैं और कुछ साधु ऐसे होते हैं जो गृहस्थ से भी निकृष्ट जीवन जीते हैं। आप गृहस्थी बसाकर घर में रहते हैं या संन्यास लेकर जंगल में चले गए है, पत्नी के साथ रहते हैं या पत्नी से विरक्त हो गए हैं, 121 For Personal & Private Use Only Page #131 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यह खास बात नहीं है। खात बात यह है कि आप अपना जीवन कितनी मर्यादा और संयम से जी रहे हैं। मर्यादा : बंधन नहीं, शैली है मर्यादा जीवन का बंधन नहीं है अपितु निर्मल और व्यवस्थित रूप से जीवन जीने की शैली है। मर्यादा चाहे गृहस्थ की हो या संत की, चपरासी की हो या अधिकारी की, नेता की हो या प्रजा की, हर व्यक्ति तभी शोभा पाता है जब वह अपनी मर्यादाओं में जीता है। वह शोभाहीन हो जाता है जो अपने जीवन की मर्यादाओं को त्याग देता है। हमारा अतीत हमारे जीवन का आदर्श रहा है। भारत के इतिहास में ऐसे गौरवमय पुरुष हुए हैं जिनका नाम लेने से हृदय गर्व से भर जाता है और मस्तक ऊँचा उठ जाता है। हमारा अतीत गौरवशाली रहा पर देखें कि वर्तमान कैसा है? अतीत की गौरवमय गाथाओं को गाने के साथ उचित रहेगा कि हम अपना वर्तमान भी गौरवमय बनाने की कोशिश करें। प्राचीन समय में लोग मर्यादित जीवन जीने की कोशिश करते थे, लेकिन आज के समय में मैं देख रहा हूँ कि मर्यादाओं का हनन हो रहा है और उनका मखौल उड़ाया जाता है। हम खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल और आर्थिक संसाधनों में जिस तरह से मर्यादाओं को तिलांजलि देते जा रहे हैं उससे लगता है कि हमारा जो अतीत गर्व के काबिल था, वर्तमान कहीं थूकने के लायक न रह जाए। आज को देखते हुए अतीत का गौरव स्वप्न प्रतीत होता है। हमारे कलुषित वर्तमान ने अतीत के गौरव को धूमिल कर दिया है। ढोंग नहीं, ढंग से जिएं मनुष्य के जीवन में हर कार्य की सीमा निर्धारित की जाए। महावीर की पूजा बहुत सरलता से की जा सकती है लेकिन उनके आदर्श और संदेशों को ईमानदारी से जीवन में जीना कठिन हैं। राम की पूजा करना सरल है लेकिन राम की मर्यादाओं को जीवन में जीना बहुत मुश्किल है। कृष्ण की पूजा तो कर सकते हैं लेकिन उनके कर्मयोग को जीना दुष्कर है। बुद्ध की पूजा तो सहजता से कर सकते हैं लेकिन उनकी करुणा को जीवन में जीना सहज नहीं है। हम महावीर को मानते हैं, पर महावीर की नहीं मानते। व्यक्ति अपनी 122 For Personal & Private Use Only Page #132 -------------------------------------------------------------------------- ________________ व्यवहारकुशलता, चापलूसी और चालबाजी से जीवन को ढोंग से जीना तो सीख लेता है, पर ढंग से जीना नहीं सीख पाता । मर्यादा जीवन को ढोंग से जीना नहीं, अपितु ढंग से जीना है । मर्यादा जीवन को सलीके से, व्यवस्थित ढंग से जीने की शैली है। अमर्यादित जीवन से जीवन विद्रूप हो जाता है। समुद्र अगर अपनी मर्यादा लाँघेगा तो पृथ्वी का विनाश ही होगा और सीता अपनी मर्यादा में लक्ष्मणरेखा का उल्लंघन करेगी तो उसका अपहरण ही होगा । जब-जब हम अपनी मर्यादाओं से बाहर गए हैं, जो अकरणीय था वह किया । जीवन का जो संयम था उसका अतिक्रमण किया तो संध्याकाल में इस अतिक्रमण की आलोचना लेते हैं - प्रतिक्रमण करते हैं । प्रतिक्रमण का अर्थ है वापस लौटना और अतिक्रमण है सीमा से बाहर चले जाना । जीवन जीने के लिए हमारी सामाजिक, धार्मिक व्यवस्थाएँ और मर्यादाएँ थीं लेकिन हमने उनका उल्लंघन किया और उल्लंघन से जब हम वापस लौटते हैं तो इस वापसी का नाम प्रतिक्रमण है । हमारा जीवन अगर निरंकुश, अमर्यादित, असंयमी और अविवेक से परिपूर्ण है तो हम दूसरे को कैसे जीत सकते हैं? जो स्वयं को ही न जीत सका वह दूसरे को क्या जीतेगा? जिसने अपनी इन्द्रियों को, तृष्णाओं को, लालसाओं को नहीं जीता वह भला दूसरों को क्या जीतेगा? आप चुनाव में बेशक जीत जाएँ, युद्ध में भी भले ही विजय प्राप्त कर लें लेकिन स्वयं पर विजय पाना बेहद मुश्किल है। विजेता वह नहीं जिसने चुनाव जीत लिया, विजेता वह है जिसने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया। हजारों योद्धाओं को परास्त कर जीतना भी कोई जीतना है अगर आप अपनी तृष्णाओं, वासनाओं, कामनाओं पर अंकुश लगाकर आत्म-विजेता न बन सकें । आत्मविजय ही सर्वोपरि विजय है । सीमाएँ सभी की मर्यादाएँ सन्त और गृहस्थ दोनों के लिए हैं । आप लोगों से क्षमा माँगते हुए मैं कहना चाहूँगा कि संत तो थोड़ी-बहुत मर्यादा पालन भी करते हैं लेकिन गृहस्थ जिस तरह से मर्यादाओं को यह कहकर तिलांजलि देता जा रहा है कि हम तो गृहस्थ हैं, हमारी कैसी सीमा, हम कुछ भी कर सकते हैं, सबको शर्मसार कर देता है । जितनी मर्यादाएँ साधु की हैं उतनी ही मर्यादाएँ श्रावक 123 For Personal & Private Use Only Page #133 -------------------------------------------------------------------------- ________________ और गृहस्थी की भी हैं। जो साधु मर्यादित जीवन नहीं जीता, क्या आप उसे साधु कहेंगे? मैं पूछना चाहूँगा कि जो गृहस्थ मर्यादा में नहीं जीता, क्या उसे गृहस्थ या सुश्रावक कहा जाए? पर मैं देखा करता हूँ कि व्यक्ति की बुरी आदत है औरों पर अंगुली उठाना, दूसरों पर तोहमत लगाना। दूसरा अगर जरा-सी भी मर्यादा भंग करता है तो व्यक्ति उस पर टिप्पणी करता है लेकिन स्वयं के अमर्यादित आचरण को नजरअंदाज कर देता है। पड़ौसी की बेटी जरा भी मर्यादा का उल्लंघन करे तो हम उसे चर्चा में ले आते हैं और हमारी बेटी कहाँ आ-जा रही है इसकी खबर ही नहीं रख पाते। औरों के ऊपर टिप्पणी करने की आदत, दूसरों की नुक्ताचीनी करने की आदत, औरों की ग़लतियाँ निकालने की आदत में हमें पता नहीं चलता कि हम अपनी ही कमियों पर टिप्पणी कर रहे हैं। जब हम दूसरों पर एक अंगुली उठाते हैं तो तीन अंगुलियाँ हमारी ओर ही मुड़ी होती हैं । हाँ, अगर हम उसकी अच्छाइयों की ओर अंगुली उठाते हैं तब यही प्रकट होता है कि जितना वह अच्छा है उससे 75 प्रतिशत हम भी अच्छे हैं क्योंकि तब भी तीन अंगुलियाँ हमारी ओर रहती हैं। दूसरों पर टिप्पणी करना, अंगुली उठाना और उनकी ईमानदारी पर प्रश्नचिह्न लगाना बहुत सरल होता है लेकिन स्वयं ईमानदारी से जीना बहुत मुश्किल होता है। तुम एक अधिकारी हो और कोई तुम्हें रिश्वत में मोटी रकम देना चाहता है, उस समय अगर तुम अपने मन पर संयम रखने में समर्थ हो सके तो तुम्हारे जीवन में साधुता है। आप जंगल में अकेले चले जा रहे हैं और एक अकेली सुंदर युवती भी वहीं से जा रही है, ऐसे में अगर आप अपने मन और आँखों को संयम में रख सकें तो पक्का जानिए कि आप साधु हैं। आप दुकान पर बैठे हैं कि एक ग्रामीण-सा, भोलाभाला-सा व्यक्ति आपकी दुकान पर आया। उसने सामान खरीदा और सौ की जगह पाँच सौ का नोट आपको दे दिया, ऐसे में आपके अंदर लोभ की वृत्ति न जगे और आप यह सोचें कि यह गलत है। मैं बेईमानी का धन घर में नहीं ले जाऊँगा। आपने उसे चार सौ रुपए वापस लौटा दिये, यह आपकी साधुता है। जब तुम्हें सड़क पर पांच का नोट मिलता है तो तुम 124 For Personal & Private Use Only Page #134 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सबको दिखाकर पूछते हो कि यह नोट किसका है? तुम्हारी साधुता तो इसमें है कि जब तुम्हें पाँच सौ का भी नोट मिले तब भी तुम सबसे पूछो कि यह किसका नोट है ? हम ईमानदार तभी तक हैं जब तक बेईमानी का मौका न मिले। बेइमानी का मौका मिलते ही ईमानदारी गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाती है। और तो और ऐसी पत्नी भी खोजना मुश्किल है जिसने कभी-नकभी अपने पति के जेब में से चुपके से रुपये गायब न किये हों । करोड़पति की पत्नी भी क्यों न हो पर उसने कभी-न-कभी पति की जेब जरूर साफ की होगी। आप बताएं आप में से कौन व्यक्ति ऐसा है जिसने बचपन में अपने पिता की जेब या मम्मी के पर्स में चुपके से पैसे निकालकर टाफी न खायी, आइसक्रीम न खायी हो। शायद मैंने भी कभी-न-कभी बचपन में ऐसा किया ही होगा । जिन्होंने बड़ी चोरियाँ की वे उद्योगपति कहलाने लगे। जिन्होंने छोटी-मोटी चोरियां की वे छोटे व्यापारी बन गये और जिन्हें बेईमानी का मौका भी न मिला वे सब मजबूरी में ईमानदार बन गये और अपनी पीठ थपथपाने लगे। हमारी ईमानदारी की हालत बड़ी दयनीय है । हमारी मर्यादाएं और मूल्य गिरते जा रहे हैं, न हम भ्रष्टाचार के भूत से डरते हैं और न ही चरित्रहीनता की चुडैल से । मेरी बात आपके मन का मनोरंजन कर देगी पर मैंने देखा, एक शहर में दीवार पर पोस्टर लगे थे, कांग्रेस को वोट दो, भाजपा को वोट दो, बसपा को वोट दो, इन्हीं चुनावी पोस्टरों के नीचे एक फिल्मी पोस्टर लगा था जिस पर लिखा था, हम सब चोर हैं । रूप-रंग से नहीं, अंग-अंग से बोले साधुता 1 साधुता का अर्थ केवल संन्यास में ही नहीं है । साधुता केवल वेश में नहीं अटकती हैं, साधुता स्थान से भी नहीं जुड़ती है, साधुता जीवन के अंगअंग से बोले । जहाँ-जहाँ लोभ की वृत्ति जगे, काम-वासना की वृत्ति जगे, अहंकार का निमित्त मिले और क्रोध के विकारों का निमित्त मिले, वहाँ-वहाँ व्यक्ति अपने मन पर संयम रखता है तो गृहस्थ होकर भी साधु है। पति-पत्नी साथ जी रहे हैं तो भी उनके मन में संयम के प्रति श्रद्धा हो । फिसलने का मौका मिले तब भी तुम अडिग खड़े हो तो तुम साधु बनने के लायक हो । दांत टूटने 125 For Personal & Private Use Only Page #135 -------------------------------------------------------------------------- ________________ के बाद अगर चने न खाने का नियम ले लिया तो कोई खास बात नहीं हुई। हाँ, दांत रहते हुए यदि किसी चीज के त्याग का नियम ले लिया तो वह त्याग कहलाता है। जब सामने निमित्त उपलब्ध हों, व्यवस्थाएँ मौजूद हों, इसके बावजूद यदि कोई अपना जीवन संयम और विवेकपूर्वक जीने का प्रयास करता है तो वह साधु है। पुराने जमाने में तो लोग गृहस्थ में भी पवित्रता और संयम को बरकरार रखते थे और आज तो शायद साधु भी उतनी निर्मलता से नहीं जी पाते होंगे। आपने विजय और विजया के जीवनप्रसंग के बारे शायद सुना हो । एक कन्या किसी संत गुरु के पास खड़ी है और उनके वचनों से प्रभावित होकर नियम लेती है कि वह शुक्ल पक्ष की एकम से पूर्णिमा तक आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेगी। वहीं, कहीं दूसरी जगह एक युवक अन्य संत गुरु के सान्निध्य में संकल्प लेता है कि वह कृष्ण पक्ष की एकम से अमावस्या तक आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करेगा। विधाता का विधान, प्रकृति का संयोग कि दोनों का परस्पर विवाह हो गया। इधर पत्नी का व्रत कि वह शुक्ल पक्ष में शीलव्रत का पालन करेगी उधर पति का नियम कि वह कृष्ण पक्ष में नियम का पालन करेगा। जब दोनों को नियमों का पता चला तब पत्नी ने पति से कहा कि वह दूसरा विवाह कर ले। पति ने भी पत्नी को सलाह दी कि वह दूसरी शादी कर ले। लेकिन आज हम उन्हें नमन करते हैं क्योंकि दोनों साथ-साथ रहे पर, दोनों ने मिलकर आजीवन अपने नियम की रक्षा की और वे शील-शिरोमणि हो गए। निभाओ लिया नियम, दिया वचन __ लिया हुआ नियम और दिया हुआ वचन मरकर भी निभाने की कोशिश करो। मैं कहना चाहता हूँ कि आप सोचें और देखें कि आपके जीवन की क्या मर्यादा है? आप देखें कि आप अपने जीवन में इन-इन बातों के प्रति ईमानदार हैं क्योंकि जिस शहर में आप जिस पद पर हैं वहाँ आपको कोई रिश्वत देने नहीं आ रहा है। आप इसलिए ईमानदार हैं कि कोई व्यक्ति आपको गलत धन देने के लिये तैयार नहीं है। बेईमानी का मौका मिले फिर भी आप जीवन में अपनी ईमानदारी को बरकरार रख सकें तभी पता चल सकेगा 126 For Personal & Private Use Only Page #136 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कि वाकई आप ईमानदार हैं। याद रखें, आप रिश्वत लेकर पत्नी के हाथों में हीरे की चूड़ियाँ पहना सकते हैं। आपके हाथों में इस जुल्म के कारण कभी हथकड़ियाँ आ गयी तो क्या करोगे। आज के युग में हरिश्चन्द्र की कथा वांचने की जरूरत नहीं है, जरूरत तो हरिश्चन्द्र के आदर्श को जीने की है। जीवन की मर्यादा लाओ, जीवन का बांध बनाओ, जीवन की सीमाएं बनाओ कि आप कहाँ, किस तरह उसे जीएंगे। जीवन को अनासक्तिपूर्वक जीने की व्यवस्था बनाई जाए। व्यक्ति संसार में रहे, संसार की धारा में रहे, संसार के साथ रहे लेकिन संसार के साथ बहे नहीं। उसके मन में संयम और मर्यादा के प्रति श्रद्धा हो। उसे विवेक रहे कि वह संसार में रहकर भी संसार की धारा में अनासक्त जीवन जीएगा। रात को देखे जाने वाले स्वप्न आँख खुलते ही टूट जाते हैं। दिन के स्वप्न भी तब टूट जाते हैं जब आँख बंद हो जाती है। सपनों के संसार में कैसी तृष्णा, वासना, विलासिता और कामना! । खंडों में भी अखंडता भारतीय परम्परा में जीवन जीने की व्यवस्था दी गई है। केवल अर्थोपार्जन की व्यवस्था नहीं, केवल कामसेवन की व्यवस्था नहीं, केवल दुनियादारी की व्यवस्था नहीं है बल्कि पूरे जीवन की व्यवस्था की गई है। जीवन का एक भाग शिक्षा-दीक्षा के लिए, दूसरा भाग धनोपार्जन, परिवार के पालन-पोषण और बच्चों की परवरिश के लिए. जीवन का तीसरे भाग घर में रहते हुए भी अनासक्त जीवन जीने के लिए और चौथा भाग मुक्ति और संन्यास के लिए है। इतिहास गवाह है कि जिन सम्राटों ने बुढापे की दहलीज पर आकर अपनी इच्छा से राजसिंहासन का त्याग करके वनवास ग्रहण किया, उन्होंने अपने बुढ़ापे को सुखी किया और जिन्होंने सत्ता की लिप्सा के चलते राजसिंहासन का त्याग नहीं किया वे अपनी ही संतानों के द्वारा या तो मारे गए या उन्होंने नानाविध यंत्रणाएँ भोगी। जो बुढ़ापे की दहलीज पर पहुँचकर भी अपनी मुक्ति को साधने का प्रयास नहीं करता वह फिर कब मुक्ति का प्रयास करेगा? कहते हैं- राजा दशरथ आईने के सामने खड़े अपना चेहरा निहार रहे 127 For Personal & Private Use Only Page #137 -------------------------------------------------------------------------- ________________ थे। उन्होंने देखा कि उनके सिर का एक बाल सफेद हो गया है। एक सफेद बाल को देखकर दशरथ की आत्मा आंदोलित हो गई। वे रनिवास में पहुँचे और बोले, 'आज के बाद संसार में मेरी कोई अनुरक्ति और आसक्ति नहीं रहेगी।' रानियाँ चौंक गई और बोली 'आज यह क्या हो गया? आपके मन में अचानक वैराग्य कैसे जग गया?' दशरथ ने कहा - 'देखो मेरे सिर का एक बाल सफेद हो गया है। अब जीवन को मुक्ति की ओर ले जाने की वेला आ गई है।' दशरथ ने सिर में एक सफेद बाल देखा और वैराग्य जग गया। जरा आईने में आप अपना चेहरा देखें। कइयों के सारे बाल सफेद हो गए हैं, फिर भी वही आसक्ति और अनुरक्ति बनी हुई है। व्यक्ति स्वयं को पकड़े, स्वयं में उतरे, स्वयं में जीए। बाहर की आसक्ति और अनुरक्ति के बजाय व्यक्ति स्वयं में उतरकर जीए। यह सारा संसार, यह सारी दुनिया बनी-बनायी बंधन की माया है। व्यक्ति ने स्वयं बंधन बाँधे हैं और स्वयं ही आसक्त हो रहा है। कोई किसी को बाँधता नहीं है, हम ही जानबूझकर बँधे और जुड़े हैं। रिजर्वेशन कुछ पल का आपको किसी गंतव्य स्थान पर जाना है और आपने रिजर्वेशन करा रखा है। नियत समय पर आप स्टेशन पहुँचे, ट्रेन में सवार हुए पर डिब्बे में आपने देखा कि आपकी रिजर्व सीट पर कोई दूसरा बैठा हुआ है। आप उससे कहते हैं, 'उठो भाई, यह मेरी सीट है।' वह भोला-भाला आदमी दूसरी जगह पर बैठ जाता है। आप अपने गंतव्य पर पहुँचकर उतरने लगते हैं कि तभी पीछे से आवाज आती है, ‘रुको!' आप पीछे मुड़कर देखते हैं कि यह वही व्यक्ति है जिसे आपने सीट से उठाया था। आप पूछते हैं - 'क्यों?' वह कहता है, 'अपनी सीट तो लेते जाओ, तुम कह रहे थे ना, कि यह सीट मेरी है।' याद रखें जिंदगी में की गई सारी व्यवस्थाएँ रिजर्वेशन की तरह हैं, किसी का आठ घंटे का रिजर्वेशन और किसी का चौबीस घंटे का। कुछ महीने और कुछ वर्षों के रिजर्वेशन पर हम चल रहे हैं। मालूम है, जिस ट्रेन में बैठे हो वह छोड़नी है, जिस डिब्बे में बैठे हो उसमें से उतरना है और जिस सीट पर बैठे हो उसके मोह का त्याग करना है, फिर आसक्ति कैसी? 128 For Personal & Private Use Only Page #138 -------------------------------------------------------------------------- ________________ चलती चक्की देख कर दिया कबीर रोय। दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोय॥ संसार की चक्की में हर कोई पिसता जा रहा है। आप जानते हैं कि चक्की में भी कुछ गेहूं के दाने बिना पीसे रह जाते हैं। आखिर क्यों? क्योंकि वे कील के आसपास रह जाते हैं। इसी तरह जिसने संयम, मर्यादा, विवेक की कील का सहारा पकड़ा है, वे संसार की चक्की में पिसकर भी अखंड रहते हैं बाकी तो गये चक्की में और आटा बन गए पिसकर। आइए, अब हम देखते हैं हमारे जीवन की क्या मर्यादा है, जिन्हें हम सरलता से जी सकते हैं। एक तो वह होता है जो दिन भर राम-राम जपता है और दूसरा वह है जो राम की मर्यादाओं को जीता है। जब तुम राम से पूछोगे कि इन दोनों में से कौन उन्हें प्रिय है तो नि:संदेह वे मर्यादाओं को जीने वाले का ही नाम लेंगे। महावीर की पूजा करने वाला महावीर को कितना पाएगा पता नहीं, लेकिन उनके आदर्श और नैतिक नियमों को जीने वाला महावीर के पास ही रहता है। जानें कम, जिएं ज्यादा मर्यादाओं से जुड़ी जीवन की बातें प्रायः हर व्यक्ति जानता है। वह जानता है कि क्या अपनाया जाना चाहिए और क्या छोड़ा जाना चाहिए, लेकिन प्रमाद या आदतवश हम अपने संयम और विवेक को नजरअंदाज करते रहते हैं। सभी जानते हैं कि दूसरे को नहीं सताना चाहिए। रिश्वत नहीं लेना चाहिए और गलत दृष्टि नहीं डालनी चाहिए। बुरे काम करने वाले भी जानते हैं कि ये काम नहीं करने चाहिए, फिर भी वह जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करता है। इसलिए मैं निवेदन कर रहा हूँ कि जानबूझकर अनजान बनने की बजाय ज्ञात सत्य को जीवन में जीने का प्रयास करना चाहिए। हमें इस बात की खुशी नहीं है कि यहाँ इतने हजार आदमी सत्संग सुन रहे हैं। सत्संग को सुनकर लोगों का जीवन बदल रहा है, जीवनशैली बदल रही है। व्यक्ति किसी भी गलत काम को करने से पहले एक बार सोच रहा है। व्यक्ति एक बार भीतर का स्नान करे, गंगा को उतारने जैसा अपने भीतर भागीरथी प्रयास करे ताकि वह अपने अन्तर्मन को भी निर्मल व पवित्र 129 For Personal & Private Use Only Page #139 -------------------------------------------------------------------------- ________________ कर सके। अंदर उतरें, करें रूपांतरण हजारों हजार संतों को सुनने का क्या लाभ अगर जीवन में रूपांतरण घटित न हो ! मुझे याद है, एक बूढ़े बुजुर्ग रोज किसी संत के सत्संग में जाया करते थे, भले ही वहाँ जाकर वे झपकियाँ ही लेते हों, पर सत्संग में जाते रोज थे। उनकी इच्छा थी कि उनका बेटा भी उनके साथ सत्संग में चला करे । वे रोज अपने बेटे से आग्रह करते और कहते 'बेटे, एक बार तो चलो, वहाँ देखो तो हजारों लोग आते हैं । एक दिन तो प्रवचन सुनने चलो।' पिता के बहुत आग्रह करने पर अन्ततः एक दिन बेटा चला ही आया । वहाँ उसने संत की वाणी सुनी। दया, करुणा, प्रेम पर संत उद्बोधन दे रहे थे । वे समझा रहे थे कि कोई घर के दरवाजे पर आ जाए तो उसे भूखा मत लौटाओ, भोजन दे दो, कुछ खाने को दे दो। इस तरह वे दया- दान की बातें बता रहे थे । 1 उस युवक ने सब सुना। अगले दिन की बात है । बेटा दुकान पर बैठा था और दादाजी सत्संग सुनने चले गए थे। जब वे सत्संग से दुकान की ओर लौटे तो देखा कि बेटा दुकान में बैठा है और बाहर जवार की बोरी खुली रखी है जिसको गाय बड़े मजे से खा रही थी । इतने में पिताजी पहुँचे और चिल्लाने लगे, 'अरे बुद्धू, तू देखता नहीं है, बाहर गाय धान खा रही है और तू आराम से बैठा है ।' उसने कहा - 'पिताजी, कल ही तो संतप्रवर ने कहा था कि घर पर कोई भूखा, दीन-दुःखी आ जाए तो उसे भोजन देना चाहिए। ठीक है, दस रुपये का धान खा भी लेगी तो क्या फर्क पड़ेगा? पिताजी ने कहा - ' अरे बेटा, एक दिन प्रवचन सुनने गया उसमें यह हालत ! अरे, तू इसी तरह करता रहा तो हमारा दिवाला ही निकल जाएगा। ये संतों की बातें सुनने के लिये होती हैं, जीने के लिये नहीं। अगर तेरी तरह मैं भी संतों की बातों को जीवन में लागू करना शुरू कर देता तो अभी तक कहाँ पहुँच जाता ! व्यक्ति मनोविनोद के लिये सुनना पसंद करता है। वह अपने मन के रूपान्तरण के लिये सुनना कहाँ पसंद करता है ! मैं जो जीवन की मर्यादाओं की बातें कह रहा हूँ वे मनोविनोद के लिये न हों, मन के रूपान्तरण के लिए हों, जीवन को बदलने के लिए हों । 130 For Personal & Private Use Only Page #140 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करें वरण, निर्मल आचरण मर्यादा के सम्बन्ध में जो पहली बात कह रहा हूँ वह है - 'आचरण की मर्यादा।' व्यक्ति का आचरण निर्मल होना चाहिए । अपना आचरण ऐसा रखो कि तुम्हें तो गर्व हो ही तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भी गर्वोन्नत हो सके। अपने द्वारा ऐसा आचरण कभी न करो कि तुम्हें भी मुँह छुपाना पड़े और तुम्हारी संतानों को भी औरों के सामने शर्मिन्दा होना पड़े। ऐसा काम कभी न करो जिसे करते वक्त तुम्हारी अन्तरात्मा तुम्हें कहे कि यह काम मत करो। आचरण की मर्यादा हो कि इस सीमा से उस सीमा तक जीवन जीएंगे। प्रभावना नैतिक आचरण की आचरण की मर्यादा में पहली है - 'रहन-सहन की मर्यादा।' जरा देख लें कि पहनावा कहीं ज्यादा भड़काऊ तो नहीं हो रहा है। कहीं पहनावा ऐसा तो नहीं है कि आपका पहनावा ही आपके प्रति गलत नजरिया बना रहा हो। फैशन के नाम पर आजकल पहनावा इतना बिगड़ गया है कि पूछिये मत। हम पाश्चात्य जगत से केवल उनका पहनावा सीख रहे हैं। लेकिन उनके ईमान और सत्य को नहीं सीख रहे हैं। जो सीख रहे हैं उससे देश गर्त में जा रहा है। छोटे नगर और शहर छोड़ भी दिये जाएँ तो महानगरों का पहनावा इतना विकृत हो गया है कि वहाँ के लोग वस्त्रों के नाम पर टुकड़े लपेटे हुए नजर आते हैं। ऊपर के कपड़े नीचे आ रहे हैं और नीचे के कपड़े ऊपर चढ़ते जा रहे हैं। आपके अपने शौक हो सकते हैं, इच्छाएँ और भावनाएँ भी हो सकती हैं लेकिन हर परिवार और समाज की भी अपनी मर्यादाएं होती हैं। अपने शौक, फैशन और इच्छाओं के पीछे घर की मर्यादाओं को नहीं तोड़ा जाना चाहिए। अगर आप तीव्र गति से कार चला रहे हैं और सामने से कोई गुजर रहा है। तभी कार के ब्रेक फेल हो जाएँ तो गंभीर दुर्घटना हो सकती है। आपके अमर्यादित ढंग से कार चलाने के कारण किसी की जान भी जा सकती है। इसी तरह अमर्यादित आचरण के साथ अगर आप अपने जीवन को जी रहे हैं तो जानबूझकर अपने को बिगाड़ रहे हैं, मटियामेट कर रहे हैं। हमारे यहाँ एक शब्द आता है 'प्रभावना' - क्या अर्थ है इसका? रुपये-पैसे, नारियल, लड्डू या अन्य कोई भी वस्तु बांट देना प्रभावना नहीं है। 131 For Personal & Private Use Only Page #141 -------------------------------------------------------------------------- ________________ वास्तविक प्रभावना वह है जहाँ व्यक्ति हमारे अच्छे चाल-चलन, आचारविचार और व्यवहार से प्रभावित हो जाए। दूसरा व्यक्ति तुम्हारे निर्मल आचरण को देखकर खुद भी निर्मल आचरण से जीने का संकल्प करे - यह है प्रभावना - नैतिक आचरण की प्रभावना। कहकर करवाने की बजाय स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत करें कि दूसरे भी स्वप्रेरणा से बेहतर आचरण करने लगें। भाषा में सुई हो, मगर धागे वाली दूसरी मर्यादा है भाषा की। अगर आप ठीक ढंग से, सलीके से अपनी बात नहीं कह सकते हैं तो कृपया चुप रहिए। एक व्यक्ति चार वर्ष की उम्र से ही बोलना सीख जाता है लेकिन वही चालीस साल तक बोलकर भी चुप रहना नहीं सीख पाता। चार घंटे लगातार बोलना सरल होता है पर चालीस मिनिट मौन रहना बहुत कठिन लगता है। बोलना अगर चाँदी है तो चुप रहना सोना है। हमारे यहाँ पांच समितियों का जिक्र आता है जिसमें एक है भाषा समिति । अपनी वाणी का विवेकपूर्वक उपयोग करना भी धर्म है। अगर आप अविवेक से गाली-गलौज के साथ भाषा का प्रयोग करते हैं, भले ही आप सामायिक-पूजा ही क्यों न करते हों, पर यह अधर्म है। हाँ, अगर आप विवेकपूर्वक, सलीके से भाषा का उच्चारण कर रहे हैं, वाणी का प्रयोग कर रहे हैं तो यह भी धर्म है। वाणी में सूई भले ही रखें पर उसमें धागा डालकर रखो ताकि सुई केवल छेद ही न करे, वह आपसे दूसरे को जोड़कर भी रखे। कब, कहाँ बोलना, कितना बोलना इसका भी आपको विवेक हो। महाभारत का युद्ध न तो दुःशासन, न दुर्योधन, न भीष्म, न धृतराष्ट्र और न ही युधिष्ठिर के कारण लड़ा गया बल्कि भाषा समिति का उपयोग न करने के कारण महाभारत का युद्ध हुआ। द्रौपदी ने दुर्योधन से कहा था कि अंधे के बच्चे अंधे ही होते हैं तो इतनी सी बात ने दुर्योधन के मन को बिगाड़ दिया और उसका परिणाम द्रौपदी के चीरहरण में बदल गया। अपनी भाषा पर अंकुश रखें। ज्यादा बोलने से न बोलना ही अच्छा होता है। ज्यादा बोलने वाला कभी फँस भी सकता है, लेकिन कम बोलने वाला कई उलझनों से बचा रहता है। ज्यादा बोलने वाले को 'सॉरी' भी कहना पड़ता है लेकिन कम 132 For Personal & Private Use Only Page #142 -------------------------------------------------------------------------- ________________ बोलने वाले को ऐसी स्थिति में ही नहीं आना पड़ता। जब जरूरत हो तब अपनी वाणी का उपयोग करें अन्यथा मौन रहना सर्वाधिक लाभकारी है। ___ किसी से बात करें तो मजाक उड़ाते हुए नहीं करें बल्कि सलीके के साथ, सभ्यता, विवेक और शिष्टता के साथ। हमारी भाषा शिष्ट, इष्ट और मिष्ट हो। भाषा पवित्र और निर्मल हो । व्यंग्यात्मकता से दूर रहने वाली हमारी भाषा सरल और सहज हो। कटाक्ष नहीं, मिठास हो अक्सर ऐसा होता है कि हम अनायास किसी अवसर पर बिना सोचेसमझे कुछ बोल देते हैं, जिस पर बाद में हमें आत्म-ग्लानि होती है और पछताने के सिवा कुछ नहीं रह जाता। हमारी यह कोशिश रहनी चाहिये कि हमारे संवाद ऐसे हों जो दूसरों को चोट न पहुँचाएं। कटाक्ष की बजाय संयम की भाषा का प्रयोग करें। अगर विपरीत वातावरण में थोड़ा-सा मौन रहने का अभ्यास रखें, तो आपके हित में होगा। मौन रहना दुष्कर तो है, पर यह एक तरह की दैवीय अनुभूति देता है। खान-पान की मर्यादा तीसरी मर्यादा है। कब कितना खाना, आप इसका भी विवेक रखें। जितनी भूख हो उससे कम खाएँ लेकिन यह भी देखें कि क्या खा रहे हैं? विवेक रखें कि कितनी सीमा तक खाना है? एक, दो, तीन, चार या और अधिक कितनी बार? या दिन भर ही मुँह चल रहा है। नियम से खायें - सुबह हल्का नाश्ता लें, दोपहर में खाना खाएँ फिर एक बार और हल्का-फुल्का नाश्ता कर सकते हैं और अंत में शाम को खाना लें। मेरे खयाल से इतना पर्याप्त है। अगर आप दिन में चार ही बार खाने की मर्यादा रखेंगे तो सड़क पर चलते हुए समोसे की गंध आपको ललचायेगी नहीं। माना कि मिठाई मुफ्त की है लेकिन पेट तो आपका अपना है। कैदी हैं या नेता? इन्द्रियों का उपयोग करो, लेकिन संयमपूर्वक। यह देख लो कि तुम इन्द्रियों के अनुसार चलते हो या इन्द्रियाँ तुम्हारे अनुसार चल रही हैं। मुझे याद है - एक व्यक्ति के आस-पास पांच पुलिसवाले चल रहे थे। किसी बच्चे ने यह दृश्य देखकर अपने पिता से पूछा, 'पिताजी, यह आदमी _133 For Personal & Private Use Only Page #143 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जो पुलिस वालों के साथ जा रहा है, यह कौन है?' पिता ने कहा - 'यह नेता है।' 'तो नेता वह होता है जिसके साथ पांच पुलिस वाले होते हैं,' बच्चे ने कहा, 'ठीक है,' बच्चा समझ गया। थोड़ी देर बाद बच्चे ने देखा कि एक अन्य आदमी के साथ भी पांच पुलिस वाले चल रहे थे। बच्चे ने पिता से पूछा, 'क्या यह भी नेता है?' पिता ने कहा, 'नहीं, यह नेता नहीं है, यह तो चोर है चोर।' 'समझ गया जिनके साथ पांच पुलिस वाले होते हैं वे चोर होते हैं', बच्चे ने कहा, पर मैं यह बात नहीं समझ सका कि पहले वाला नेता और यह दूसरा चोर कैसे हुआ?' तब पिता ने कहा, 'यही तो जीवन है। पहले वाले की सेवा में उसके अधीन पांच पुलिस वाले चल रहे थे और यह दूसरा वाला पुलिस के अधीन चल रहा था।' आप देख लें कि ईश्वर ने आपको भी पांच पुलिस वाले दिये हैं। कान, नाक, आँख, जीभ और स्पर्श का सुख ये पांच पुलिस वाले हैं। अगर आप इनके अधीन चल रहे हैं तो आप इनके गुलाम हैं और ये पांच आपके अधीन हैं तो आप नेता हो जाएंगे। अब आप पर निर्भर है कि आप क्या होना चाहते हैं, कैदी या नेता? जीभ का संयम न रखने के कारण मछली कांटे में फँसती है। आँख का संयम न रख पाने के कारण पतंगा दीपक में जल कर मरता है। शरीर पर संयम न रख पाने के कारण हाथी गड्ढे में जाकर गिरता है। नाक का संयम न रख पाने के कारण भंवरा फूल में बंद होने को मजबूर होता है और कान का संयम न रख पाने के कारण हिरण जाल में फँस जाया करता है। ये एक-एक प्राणी एक-एक इन्द्रिय के असंयम से फँसते हैं लेकिन जो मनुष्य पांचों ही इन्द्रियों में उलझा हुआ है, उसका क्या हाल होगा? प्रत्येक मानव को चाहिये कि वह अपनी इन्द्रियों पर मर्यादा का अंकुश अवश्य रखे। हम खाएं, पीएं, उठे बैठें, चले फिरें कुछ भी करें पर संयम की मर्यादा का साथ रहना श्रेष्ठ है। खाओ पिओ छको मत, बोलो चालो बको मत, देखो भालो तको मत और चालो फिरो थको मत। संयम की मर्यादा बंधन नहीं अपितु निर्मल और व्यवस्थित जीने की शैली है। निरंकुश जीवन व्यर्थ है। मर्यादा चाहे राम के युग में हो या आज, इसे जो भी जिये मर्यादा पुरुषोत्तम वही है। 134 For Personal & Private Use Only Page #144 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संसार का अनुपम तीर्थ संबोधि-धाम जहाँ ध्यान और आनंद ही नहीं, विश्वास और प्रेम भी गढ़ा जाता है... • आत्म-साधना हेतु साधना-सभागार • अष्टापद मंदिर एवं दादावाड़ी के दिव्य दर्शन • भगवान श्री पार्श्वनाथ एवं माँ सरस्वती की विश्व की सबसे बड़ी प्रतिमा के दर्शन • हरा-भरा नैसर्गिक वातावरण • कलामंदिर का भव्य दर्शन • मनमोहक मूर्तियाँ • झांकियों में उभरता हमारा सांस्कृतिक वैभव • जीवन-निर्माण के लिए साहित्य एवं श्रेष्ठ वीसीडी • प्यारा-सा सर्वधर्म मंदिर संबोधि-धाम, कायलाना रोड, जोधपुर (राज.) फोन : 2709812 For Personal & Private Use Only Page #145 -------------------------------------------------------------------------- ________________ करें आपकी जिंदगी को चार्ज संबोधि-टाइम्स मासिक पत्रिका संबोधि टाइम्स श्रेष्ठ ज्ञान और श्रेष्ठ चिंतन के प्रसार की पवित्र भावना से प्रकाशित, संपूर्णतः लाभ-निरपेक्ष पूज्य श्री ललितप्रमजी पूज्य श्री चन्द्रप्रभ जी सत्संग का महाकुंभ त्रिवार्षिक : 150/ आजीवन : 600/ सदस्यता ग्रहण करने हेतु मनीऑर्डर अथवा ड्राफ्ट निम्न पते पर भेजें - SRI JITYASHA SHREE FOUNDATION B-7, Anukampa || Phase, M. I. Road, Jaipur (Raj.) Ph. 0141-2364737 For Personal & Private Use Only Page #146 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भाललितप्रभ कैसे सुलझाएँ मन की उलझन कैसे सुलझाएँ मन की उलझन त.का . पाट से प्रस्तुत पुस्तक 'कैसे सुलझाएँ मन की उलझन' में मन की उलझनों को परत-दर-परत उघाड़ा गया है। इसमें तनाव, चिंता, क्रोध, अहंकार, प्रतिशोध और अवसाद जैसे मन के रोगों को न केवल पकड़ने की कोशिश की गई है, अपितु यह किताब उन रोगों का निदान भी करती है। इस किताब का हर पन्ना तनाव, घुटन और अवसाद से उबरने के लिए किसी टॉनिक का काम करता है / मधुर जीवन के लिए आवश्यक है कि हमारा मनोमस्तिष्क मधुर हो और मनुष्य ढोंग से जीने की बजाय ढंग से जीना सीख जाए। जीवन में तनाव और चिंता की चिता जला देनी चाहिए। ये हमारी शांति, सुख और सफलता के शत्रु हैं / महोपाध्याय श्री ललितप्रभ सागर महाराज आज देश के नामचीन विचारक संतों में हैं। प्रभावी व्यक्तित्व, बूंद-बूंद अमृतधुली आवाज, सरल विनम्र और विश्वास भरे व्यवहार के मालिक पूज्य गुरुदेव श्री ललितप्रभ मौलिक चिंतन और दिव्य ज्ञान के द्वारा लाखों लोगों का जीवन रूपांतरण कर रहे हैं। उनके ओजस्वी प्रवचन हमें उत्तम व्यक्ति बनने की समझ देते हैं। अपनी प्रभावी प्रवचन-शैली के लिए देश भर के हर कौम-पंथ-परम्परा में लोकप्रिय इस आत्मयोगी संत का शांत चेहरा, सहज भोलापन और रोम-रोम से छलकने वाली मधुर मुस्कान इनकी ज्ञानसम्पदा से भी ज्यादा प्रभावी है। | Rs.30/ Jain E U Personale ale ces only