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________________ यह खास बात नहीं है। खात बात यह है कि आप अपना जीवन कितनी मर्यादा और संयम से जी रहे हैं। मर्यादा : बंधन नहीं, शैली है मर्यादा जीवन का बंधन नहीं है अपितु निर्मल और व्यवस्थित रूप से जीवन जीने की शैली है। मर्यादा चाहे गृहस्थ की हो या संत की, चपरासी की हो या अधिकारी की, नेता की हो या प्रजा की, हर व्यक्ति तभी शोभा पाता है जब वह अपनी मर्यादाओं में जीता है। वह शोभाहीन हो जाता है जो अपने जीवन की मर्यादाओं को त्याग देता है। हमारा अतीत हमारे जीवन का आदर्श रहा है। भारत के इतिहास में ऐसे गौरवमय पुरुष हुए हैं जिनका नाम लेने से हृदय गर्व से भर जाता है और मस्तक ऊँचा उठ जाता है। हमारा अतीत गौरवशाली रहा पर देखें कि वर्तमान कैसा है? अतीत की गौरवमय गाथाओं को गाने के साथ उचित रहेगा कि हम अपना वर्तमान भी गौरवमय बनाने की कोशिश करें। प्राचीन समय में लोग मर्यादित जीवन जीने की कोशिश करते थे, लेकिन आज के समय में मैं देख रहा हूँ कि मर्यादाओं का हनन हो रहा है और उनका मखौल उड़ाया जाता है। हम खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल और आर्थिक संसाधनों में जिस तरह से मर्यादाओं को तिलांजलि देते जा रहे हैं उससे लगता है कि हमारा जो अतीत गर्व के काबिल था, वर्तमान कहीं थूकने के लायक न रह जाए। आज को देखते हुए अतीत का गौरव स्वप्न प्रतीत होता है। हमारे कलुषित वर्तमान ने अतीत के गौरव को धूमिल कर दिया है। ढोंग नहीं, ढंग से जिएं मनुष्य के जीवन में हर कार्य की सीमा निर्धारित की जाए। महावीर की पूजा बहुत सरलता से की जा सकती है लेकिन उनके आदर्श और संदेशों को ईमानदारी से जीवन में जीना कठिन हैं। राम की पूजा करना सरल है लेकिन राम की मर्यादाओं को जीवन में जीना बहुत मुश्किल है। कृष्ण की पूजा तो कर सकते हैं लेकिन उनके कर्मयोग को जीना दुष्कर है। बुद्ध की पूजा तो सहजता से कर सकते हैं लेकिन उनकी करुणा को जीवन में जीना सहज नहीं है। हम महावीर को मानते हैं, पर महावीर की नहीं मानते। व्यक्ति अपनी 122 Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003878
Book TitleKaise Sulzaye Man ki Ulzan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year2012
Total Pages146
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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