Book Title: Veerstuti
Author(s): Kshemchandra Shravak
Publisher: Mahavir Jain Sangh

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Page 386
________________ ३६० ... वीरस्तुतिः। .. दर्भासनके अभावमें कंवलासन विछाना चाहिये । दर्भासनके ऊपर कवलासन विछाकर उसपर पद्मासनसे मन पसद आसन लगा कर तथा स्थिर होकर पूर्व या उत्तरमें मुख करके बैठना चाहिये। सूत्रोंमें पद्मासन लगाकर पूर्वमे मुख करना बताया है। "पुरत्थाभिमुहे सपलियंकनिसण्णे" पर्थ्यकामन या पद्मासनसे वैठकर पूर्वमें मुख रक्खे । पद्मासन लगाकर वायें हाथकी हथेलीपर दाहिना हाथ सीधा रखकर, कमर, गर्दन, मस्तकको एक पंक्तिमें रखकर बैठना चाहिये, और दाढ़ीको हंसलीसे चार तसुके अन्तरपर रहने दे । इस आसनसे सवेरे, सांझ या मध्याह्नमें तथा रात्रिके पहले और पिछले पहरमें सतत अभ्यास करना चाहिये । एक पहर यदि भारामसे स्थिर होकर बैठ सके तव समझो कि आसनपर विजय प्राप्तकर ली गई है। आमनपर विजय पानेके वाद प्राण और शरीर तथा दृष्टिपर विजय पाना चाहिये । परन्तु आसनपर विजय पाये विना योग सिद्ध नहीं हो सकता। इसके विना आत्म साक्षात्कार अर्थात् सम्यक्त्वकी प्राप्ति नहीं हो सकती। अत-सतत प्रयास द्वारा गुरुगमसे पाई हुई युक्तिके अनुसार आसनपर जय पा लेना चाहिये । आसनके जयमें यम और नियमपर जीत प्राप्त करनी चाहिये। 'आसनको जीतनेके पश्चात् साधकजन अनेक प्रकारकी क्रियाएँ सीख सकता है । परन्तु आसनको जीतकर दृष्टिको जीतनेकी पूर्ण आवश्यकता है। दृष्टि जयका पहला लक्षण आखका न मींचना है। उससे मेषोन्मेष दृष्टि हो जाती है। योग परिभाषामें इसे त्राटक कहा जाता है। सूत्रोंमें भी मेषो. न्मेष रहित होनेके कई जगह प्रमाण मिलते हैं। दृष्टिको जीतनेकेलिये या नाटकमुद्राको सिद्धकरनेकेलिये सवेरे और सांझमें साधकको यथेष्ट आसनपर बैठकर अपनेसे सवा हायके अन्तर पर किसी रूईकी गोलीको वनाकर रख देना चाहिये और उस चने जितनी गोलीपर दृष्टि जमाये रहो। अमुक समयके अनन्तर आखमें पानी आयगा। आरंममें आसू आनेपर त्राटक रोक देना चाहिये। चार या आठ दिन तक आसुओंको 'पोंछते रहना चाहिये, और त्राटक आरभ रखना चाहिये । प्रयास ऐसा करना चाहिये जिससे पलक वन्द न हो सके, और इस प्रयासमै शान्तिपूर्वक प्रति दिन वृद्धि रखना चाहिये। जब एक घडीसे अधिक पलकको जीत लोगे तब

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