Book Title: Sramana 2012 01
Author(s): Sudarshanlal Jain
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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8 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 ___11. उपशान्तमोह, 12. क्षीणमोह, 13. सयोगकेवली और 14. अयोगकेवली। 7. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्धः। त. सू. 8-23 8. पंचास्तिकाय, 128-129 9. जैनेन्द्रसिद्धान्तकोश, भाग 1, पृ. 90 10. सच्छृद्धासंगतो बोधो दृष्टिरित्यभिधीयते।
असत्प्रवृत्तिव्याघातात्सत्प्रवृत्तिपदावहः।। योगदृष्टिसमुच्चय, 17 समेघामेघराज्यादौ सग्रहाद्यभ्रंकादिवत् ।
ओघदृष्टिरिह ज्ञेया मिथ्यादृष्टीतराश्रया ॥ योगदृष्टिसमुच्चय, 14 11. वही, 1 12. वही, 13 13. जैन योग का आलोचनात्मक अध्ययन, पृ. 204 14. योगदृष्टिसमुच्चय, 13-15 15. वही, 15 16. यमादियोगयुक्तानां खेदादिपरिहारतः।
अद्वेषादिगुणस्थानं क्रमेणैषा सतां मता॥ योगदृष्टिसमुच्चय 16, तथा देखें गाथा 16, पृ. 1 फुटनोट यमनियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहारधारणा-ध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि। खेदोद्वेगक्षेपोत्थान-भ्रान्त्यन्यमुद्रुगासंगैः । युक्तानि चिन्तानि प्रपंचतो वर्जयेन् मतिमान् ॥ अद्वेषो जिज्ञासा शुश्रूषा श्रवणबोधमीमांसाः । परिशुद्धा प्रतिपत्तिः प्रवृत्तिरष्टात्मिका तत्त्वे ।। 17. योग., 21-40 18. योग., 41-48 19. योग., 49-57 20. योग., 52 21. योग., 54 22. योग., 57-151 23. योग. तथा ताराद्वात्रिंशिका, 19 24. योग., 57 25. योग., 152-159 26. योग., 160-167 27. योग., 168-176 28. योग., 177-185

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