Book Title: Sramana 2012 01
Author(s): Sudarshanlal Jain
Publisher: Parshvanath Vidhyashram Varanasi
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ISSN 0972-1002 श्रमण ŚRAMAŅA A Quarterly Research Journal of Jainology Vol. LXIII No.I Jan.-Mar.-2012 सूक्ष्मत्व सम्यक्त्व अनन्त अनन्त अनन्त मूलप्रकृति ८ कर्म-कार्य उत्तरप्रकृति १४८ कर्म-बन्ध कर्म-बन्ध हेतु माद मिथ्यात्व Karmavrkça depicting diversities in living beings पार्श्वनाथ वाराणसी Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी Established : 1937 अवा Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण ŚRAMAŅA (Since 1949) A Quarterly Research Journal of Jainology Vol. LXIII Vol. LXIII No. I_ Jan.- Mar. 2012 Jan.- Mar. 2012 Chief Editor Dr. Shugan C. Jain Editor Prof. Sudarshan Lal Jain Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi (Established: 1937) (Recognized by Banaras Hindu University as an External Research Centre) Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ ADVISORY BOARD Dr. Shugan C. Jain Prof. Ramjee Singh Chairman, New Delhi Bheekhampur, Bhagalpur Prof. Cromwell Crawford Prof. Sagarmal Jain Univ. of Hawaii Prachya Vidyapeeth, Shajapur Prof. K.C. Sogani Prof. Anne Vallely Chittaranjan Marg, Jaipur Univ. of Ottawa, Canada Prof. D.N. Bhargava Prof. Peter Flugel Bani Park, Jaipur SOAS, London Prof. Prakash C. Jain Prof. Christopher Key Chapple JNU, Delhi Univ. of Loyola, USA . EDITORIAL BOARD Prof. M.N.P. Tiwari Prof. Gary L. Francione B.H.U., Varanasi New York, USA Prof. K. K. Jain Prof. Viney Jain, Gurgaon B.H.U., Varanasi Dr.S.P. Pandey, PV, Varanasi Dr. A.P. Singh, Ballia ISSN: 0972-1002 SUBSCRIPTION Annual Membership Life Membership For Institutions : Rs. 500.00, $ 50 For Institutions : Rs. 5000.00, $ 250 For Individuals : Rs. 150.00, $ 30 For Individuals : Rs. 2000.00, $ 150 Per Issue Price : Rs. 50.00, $ 10 Membership fee & articles can be sent in favour of Parshwanath Vidyapeeth, I.T.I. Road, Karaundi, Varanasi-5 PUBLISHED BY Shri Indrabhooti Barar, for Parshwanath Vidyapeeth, I. T. I. Road, Karaundi, Varanasi-221005, Ph. 0542-2575890 Email: [email protected], [email protected] NOTE: The facts and views expressed in the Journal are those of authors only. (ufcat #yohalfta faar sit aeg teha 3741) Theme of the Cover : Karmavękșa depicting diversities in living beings Type Setting- Mr. Suraj Kumar Mishra, P.V., Varanasi Printed by- Mahaveer Press, Bhelupur, Varanasi Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Contents Our Contributors सम्पादकीय iv v-vi 1-9 आठ योगदृष्टियाँ (आचार्य हरिभद्रकृत योगदृष्टिसमुच्चय के आलोक में) प्रो0 सुदर्शन लाल जैन 10-28 भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण डॉ0 अशोक कुमार सिंह 29-38 3. यशस्तिलक चम्पू. में आयुर्वेद आचार्य राजकुमार जैन श्रमण-परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त 39-47 साध्वी संगीतश्री Multifaceted Symbiotic Philosophy of Jainism and its Contemporary Relevance and Significance 48-66 Prof. S. R. Bhatt "Ayurveda, Jainism and Medical Tourism - A Study in Interrelationship" 67-72 Partha Bhandari स्थायी स्तम्भ जिज्ञासा और समाधान (श्रावक एवं श्रमण प्रतिमाएँ) पार्श्वनाथ विद्यापीठ समाचार जैन जगत् साभार प्राप्ति 73-79 80-86 87-89 १० Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Our Contributors Prof. Sudarshan Lal Jain Director (Research), Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi221005 Dr. Ashok Kumar Singh Associate Professor, Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi221005 Acharya Raj Kumar Jain C/O Sri Subhash Jain, Suraj Gang, Second Cross Road, Itarsi-461111 (M.P.) Sadhvi SangeetSri Research Scholar, Department of Jainology and Comparative Philosophy, JVBU, Ladnun (Raj.) Prof. S. R. Bhatt Ex. Head of Department, Department of Philosophy, University of Delhi, New Delhi Partha Bhandari Research Scholar, Department of Tourism Management, Banaras Hindu University, Varanasi-221005 Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सम्पादकीय हम अपने जीवन में देखते हैं कि कोई व्यक्ति कठोर परिश्रम करके भी अच्छा फल प्राप्त नहीं करता है, कोई व्यक्ति अल्प परिश्रम करता है और बहुत लाभ प्राप्त करता है। किसी के पास सुख के अनेक साधन हैं परन्तु वह किसी न किसी कारण से दुःखी रहता है। किसी के पास सुख का कोई साधन नहीं हैं परन्तु वह मस्ती में गीत गाता है और सुख का अनुभव करता है। कोई बहुत अच्छे कार्य करता है परन्तु उसे यश के स्थान पर अपयश की प्राप्ति होती है। कोई चालबाजी से गलत कार्य करता है और उसे यश की प्राप्ति होती है। किसी के जीवन, में सभी प्रकार की अनुकूलताएँ हैं फिर भी वह सफल नहीं होता है। किसी के जीवन में प्रतिकूलताएँ ही प्रतिकूलताएँ हैं फिर भी अचानक उसे यश, पद, धन आदि की प्राप्ति हो जाती है। कोई व्यक्ति चाहता है कि हम धार्मिक कार्य, आत्म-चिन्तन तथा दूसरों की भलाई के कार्यों को करें, परन्तु वह कर नहीं पाता है। कोई सोचता है कि नारी का शरीर हाड़-मांस का घिनौना रूप है तथा इसमें कोई रस नहीं है फिर भी जब वह किसी सुन्दर स्त्री को देखता है तो उसके प्रति आकर्षित होकर कामासक्त हो जाता है। ऐसा क्यों होता है? अधि कतर लोगों का कहना है "हरि-इच्छा या ईश्वर-इच्छा"। इस तरह वह अपना सब कुछ परमपिता परमात्मा पर छोड़ देता है और वह सोचता है कि हम परमपिता की कठपुतली हैं और वह जैसा हमें नचाता है, हम वैसा नाचते हैं। इस तरह वह अपने अपराध को परमपिता पर मढ़ देता है। कुछ विचारक ऐसे भी हैं जो यह कहते हैं कि यह तो हमारा भाग्य है, हम इसमें कुछ नहीं कर सकते हैं। यदि उपादान में शक्ति होती है तो निमित्त अपने आप आ जाते हैं। इस तरह वह नियतिवादी होकर पुरुषार्थ से किनारा कर लेता है जबकि सत्य तो यह है कि व्यक्ति स्वयं अपना कर्ता और विकर्ता है। इसमें कोई दूसरा हेतु नहीं है। जैन दर्शन में इसका हेतु कर्म बतलाया गया है। कर्म स्वोपार्जित बन्धन है जिसके कारण विभिन्न प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। कर्म-बन्धन के पांच हेतु बतलाये गए हैं- मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग। इनेमें मिथ्यात्व और कषाय की भूमिका बलवती है। इनके वशीभूत होकर जब हम मन-वचन-काय की क्रिया करते हैं तो राग-द्वेष का निमित्त पाकर कर्म आत्मा के साथ बँध जाते हैं। यदि राग-द्वेष का अभाव होता है तो कर्म-पुद्गल आत्मा के पास आते अवश्य हैं परन्तु बन्ध को प्राप्त नहीं होते हैं। हमारे राग-द्वेष की तीव्रता, मंदता आदि के आधार पर कर्मों का प्रकृति-बन्ध, प्रदेश-बन्ध, स्थिति-बन्ध और अनुभाग-बन्ध Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ vi : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 होता है। जैसे हमारे द्वारा किये गए भोजन का परिपाक होने पर वह वीर्य, मज्जा, हड्डी आदि के रूप में परिणमित हो जाता है वैसे ही हमारे द्वारा किया गया कर्म प्रमुख रूप से सात या आठ रूपों में विभक्त हो जाता है और अवान्तर भेदों के साथ 148 रूपों में विभक्त हो जाता है। देवता के मुख पर पड़े हुए वस्त्र की तरह ज्ञान गुण का प्रतिबन्धक ज्ञानावरणीय कर्म 5 प्रकार का है। राजद्वार पर स्थित प्रतिहारी की तरह दर्शन गुण-बन्धक दर्शनावरणीय कर्म 9 प्रकार का है। मधुलिप्त असिधारा की तरह सुख-दुःख का वेदक वेदनीय कर्म 2 प्रकार का है। मदिरापान की तरह हिताहित के विवेक का प्रतिबन्धक मोहनीय कर्म 28 प्रकार का है। श्रृंखला-बन्धन की तरह जीवन का मापक आयु कर्म 4 प्रकार का है। चित्रकार की तरह नाना प्रकार के शरीरादि की रचना में कारणभूत नाम कर्म 93 प्रकार का है। कुम्भकार के छोटे-बड़े बर्तनों की तरह उच्च-नीच कुल का ज्ञापक गोत्र कर्म 2 प्रकार का है। कोषाध्यक्ष की तरह सब कुछ ठीक होने पर भी लाभादि में प्रतिबन्धक अन्तराय कर्म 5 प्रकार का है। इन आठों प्रकार के कर्मों का विस्तार से विचार जैनदर्शन के कर्मग्रन्थों में किया गया है। इन कर्म-बन्धनों के हट जोर पर आत्मा में आठ विशेष गुण प्रकट होते हैं- अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त सुख, सम्यक्त्व, अवगाहनत्व, सूक्ष्मत्व, अगुरुलघुत्व और अनन्तवीर्य। इन आठों कर्मों में सबसे प्रधान मोहनीय कर्म है जिसके नष्ट हो जाने पर शेष कर्मबन्धन शिथिल होकर टूट जाते हैं। श्रमण के मुख पृष्ठ पर चित्रित कर्मवृक्ष के द्वारा संसारी जीवों की विविध परिस्थितियों की विविधता बतलायी गई है। यहाँ वृक्ष की शाखा से पृथक् फल बतलाने का कारण है 'उस कर्म-अभावजन्य परिणाम'। इस अंक में स्थायी स्तम्भ के अतिरिक्त छः आलेख दिये गए हैं। पूर्व की अपेक्षा इस अंक का आकार थोड़ा छोटा किया गया है ताकि हम इसके स्तर को उन्नत बना सकें और वेबसाइट पर प्रसारित कर सकें। आगे के अंकों में जो लेख प्रकाशित किये जाएंगे उनकी प्रकाशनपूर्व तत्-तत् विषय के विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा कराई जाएगी। इस अंक का संशोधन डॉ० श्री प्रकाश पाण्डेय, संयुक्त निदेशक तथा डॉ0 नवीन कुमार श्रीवास्तव, रिसर्च एसोसिएट के द्वारा किया गया है जिसके लिये वे धन्यवाद के पात्र हैं। श्री सूरज कुमार मिश्रा, कार्यालय सहायक तथा वर्द्धमान मुद्रणालय दोनों क्रमशः कम्पोजिंग तथा सत्वर मुद्रण हेतु धन्यवाद के पात्र हैं। प्रो० सुदर्शन लाल जैन Page #8 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आठ योगदृष्टियाँ (आचार्य हरिभद्रकृत योगदृष्टिसमुच्चय के आलोक में) प्रो0 सुदर्शन लाल जैन आचार्य हरिभद्रसूरि (ई0 सन् 757-827) जैन श्वेताम्बर परम्परा के एक महनीय विद्वान् हैं जिन्होंने जैन परम्परा में प्रचलित 'योग' शब्द का अर्थ मन, वचन और काय की प्रवृत्तियों के अतिरिक्त आध्यात्मिक अर्थ में भी किया है। संवर, ध्यान, तप आदि शब्द जो जैन आगमों में मिलते हैं वे इसी आध्यात्मिक योग के बोध क हैं। आज दोनों अर्थ (1. मन, वचन और काय की प्रवृत्ति तथा 2. मन, वचन और काय की प्रवृत्ति को रोककर किसी एक विषय पर केन्द्रित करना अथवा अन्तर्मुखी होकर आत्मलीन होना) जैन परम्परा में प्रचलित हैं। आचार्य हरिभद्रसूरि ने यहाँ द्वितीय अर्थ को दृष्टि में रखकर 'योग' शब्द का प्रयोग किया है और योग-विषयक छः ग्रन्थों की रचना की है- 1. योगशतक, 2. योगविशिका, 3. ब्रह्मसिद्धान्तसार, 4. योगदृष्टिसमुच्चय, 5. योगबिन्दु और 6. षोडशक। इनमें से प्रथम दो प्राकृत भाषा में हैं और शेष चार संस्कृत में। अन्य आचार्यों की रचनाओं में भी अध्यात्म-ध्यान योग विषयक सामग्री का अवलोकन किया जा सकता है। अध्यात्म योग के लिए आवश्यक है मन को संयमित करना क्योंकि इन्द्रियों की चंचलता में कारण है 'मन'। मन की चंचलता ही आत्मध्यान में बाधक है तथा एकाग्रता में भटकाव की जननी है। मन की अस्थिरता के कारण ही राग-द्वेष आदि कषायभाव पैदा होते हैं जो कर्मबन्ध में कारण बनते हैं। योग-साधना में मन पर नियंत्रण आवश्यक है। अतः योगदर्शन में पतंजलि ने चित्तवृत्तिनिरोध को योग कहा है। आचार्य हरिभद्र ने योगदृष्टिसमुच्चय में पातंजल अष्टांगयोग को माध्यम बनाकर आठ प्रकार की योगदृष्टियों (आत्म-विकास की भूमिकाएँ) का वर्णन करते हुए उनकी गुणस्थानों में योजना की है। आत्मशक्ति का विकास या स्वरूपोपलब्धि ही जैन साधना-पद्धति का लक्ष्य है। आत्मशक्ति की अविकसित और विकसित अवस्थाओं की क्रमिक योजना इन्हीं चौदह गुणस्थानों में की गई संसार-परिभ्रमण का मुख्य कारण है 'कर्मबन्ध' और कर्मबन्ध का मुख्य कारण है 'राग-द्वेष रूप कषायें"। कर्मबन्ध के कारण ही शरीर-इन्द्रियों आदि की प्राप्ति होती है और पश्चात् राग-द्वेषवश विषय-भोगों का ग्रहण और पुनः कर्मबन्धा' Page #9 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 2 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 कर्म आठ प्रकार के हैं- 1. ज्ञानावरण, 2. दर्शनावरण, 3. वेदनीय, 4. मोहनीय, 5. आयु, 6. नाम, 7. गोत्र और 8. अन्तराय। इनमें चार (1, 2, 4 और 8) घातिया (आत्म-स्वरूप प्रतिबन्धक) और शेष चार (3, 5, 6, 7) अघातिया (साक्षात् प्रतिबन्धक नहीं) हैं। इन आठों कर्मों में सबसे प्रधान है 'मोहनीय कर्म' जो आत्म-विकास का प्रबल प्रतिबन्धक है। जैसे-जैसे मोहनीय की शक्ति घटती जाती है जीव आत्म-विकास करते हुए ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता जाता है। इसके पूर्णतः नष्ट होने पर सर्वज्ञ, केवली, अर्हन्त, योगी और जीवन्मुक्त हो जाता है। आयु पूर्ण होने पर अशरीरी होकर सिद्ध-मुक्त (परमात्मा) हो जाता है। आचार्य हरिभद्र ने गुणस्थानों तथा अष्टांगयोग को ध्यान में रखकर आत्मविकास की आठ योग-दृष्टियाँ बतलायी हैं। ओघदृष्टि और योगदृष्टि- दृष्टि (बोध) सामान्यतः दो प्रकार की है1. ओघदृष्टि (असदृष्टि) और 2. योगदृष्टि (सदृष्टि)। ओघदृष्टि विवेकशून्य तथा अन्धकाराच्छन्न दृष्टि है। सामान्य जनसमुदाय द्वारा परम्परागत मान्यताओं का बिना विचार किए स्वीकार करना ओघदृष्टि है। योगदृष्टि विवेकदृष्टि है। यदि समीचीन श्रद्धायुक्त बोध हो और असत् प्रवृत्तियों से रहित सत्प्रवृत्तियों में प्रवृत्ति हो तो उसे योगदृष्टि कहते हैं।" ये योगदृष्टियाँ यद्यपि आवरण-अपाय के कारण अनेक हैं परन्तु सामान्य से आठ हैं- 1. मित्रा, 2. तारा, 3. बला, 4. दीप्रा, 5. स्थिरा, 6. कान्ता, 7. प्रभा और 8. परा। इन आठ योगदृष्टियों में से प्रथम चार योगदृष्टियाँ प्रतिपाती हैं जो मिथ्यादृष्टियों और सम्यग्दृष्टियों दोनों को हो सकती हैं। अन्तिम चार योगदृष्टियाँ अप्रतिपाती (वेद्यसंवेद्यपद या स्थिर) हैं तथा सम्यग्दृष्टियों को ही होती हैं। यहाँ डॉ. अर्हद्दास वन्डोवा दिगे का यह कथन कि प्रथम चार दृष्टियाँ ओघदृष्टियाँ हैं, अनुचित है क्योंकि ये प्रतिपाती (अवेद्य-संवेद्यपद या अस्थिर) तथा मिथ्यादृष्टियों को होने मात्र से ओघदृष्टियों नहीं हैं। आचार्य हरिभद्र ने स्वयं ओघ और योगदृष्टियों में अन्तर करते हुए आठों को योगदृष्टियाँ कहा है जो उचित भी है क्योंकि ये सत्संगति आदि से प्रगतिपथ पर ले जाती हैं। इन आठ योगदृष्टियों में जीव को किस प्रकार का बोध प्राप्त होता है उसे क्रमशः आठ दृष्टान्तों के द्वारा बतलाया गया है।5- 1. तृणाग्नि कण, 2. गोमयाग्नि कण = कंडे की अग्नि, 3. काष्ठाग्नि, 4. दीपप्रभा, 5. रत्नप्रभा, 6. ताराप्रभा, 7. सूर्यप्रभा और 8. चन्द्रप्रभा। जैसे इन तृणाग्नि आदि की कान्तियाँ उत्तरोत्तर स्पष्टता और स्थिरता लिये हुए हैं उसी प्रकार योगदृष्टियाँ बोध की स्पष्टता और स्थिरता लिये हुए हैं। सूर्यप्रभा की अपेक्षा जो चन्द्रप्रभा को उत्कृष्ट बतलाया है उसका कारण चन्द्रमा की शीतलता Page #10 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आठ योगदृष्टियाँ : 3 और शान्ति-जनकता है जबकि सूर्य में तीव्र उष्णता है जो समस्त कर्मों को भस्म करने में समर्थ है। इन योगदृष्टियों को पातंजलयोगदर्शन के आलोक में क्रमशः यम-नियमादि अष्टांगयोगों के साथ तथा खेदादि आठ दोषों के परिहारक रूप में भी आचार्य हरिभद्र ने बतलाया है। इनसे अद्वेष आदि गुणों की क्रमशः प्राप्ति भी बतलाई है। योगदृष्टियों का विवरण इस प्रकार है1. मित्रादष्टि7- इसे 'योगबीज' कहा गया है क्योंकि यहाँ बीज रूप में सदृष्टि की प्राप्ति होती है जिससे साधक अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन पाँच यमों (व्रतों) के पालन करने की इच्छा करता है परन्तु पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण व्रतों का पालन नहीं कर पाता है। सर्वज्ञ को नमस्कार करता है, आचार्य आदि की यथोचित सेवा करता है, स्वाध्याय, पूजा आदि भी करता है। यह मित्रादृष्टि तृणाग्नि-कण की तरह अल्प-स्थायी तथा मंद है। साधक अनुचित कार्य करने वालों से द्वेष (क्रोध) नहीं करता है और शुभकार्य करने में खेद का अनुभव नहीं करता है। अतः इस दृष्टि वाले में 'अखेद' और 'अद्वेष' गुण पाए जाते हैं। 'यथाप्रवृत्तिकरण' द्वारा ग्रन्थिभेद की ओर अग्रसर होता है। यद्यपि इसका प्रथम गुणस्थान माना गया है परन्तु सामान्य ओघदृष्टि वाले मिथ्यादृष्टि से इसका उन्नत स्वभाव होता है। 2. तारादृष्टि - इसमें शौच (शारीरिक-मानसिक शुद्धि), संतोष (आवश्यक आहारादि को छोड़कर संतोषवृत्ति), तप (कष्ट-सहिष्णुता), ईश्वर-प्रणिधान (परमात्म-चिन्तन) रूप नियमों का पालन करते हुए आत्महित के कार्य करने में उद्वेग (अरुचि) नहीं होता है तथा तत्त्व-चिन्तन की जिज्ञासा बलवती होती है। योगियों की कथा सुनने में प्रीति होती है। सम्यग्ज्ञान के अभाव में सत कार्यों को करते हुए भी राग-द्वेष आदि में प्रवृत्त रहता है। इतना अवश्य है कि मित्रादृष्टि की अपेक्षा इसका राग-द्वेष कुछ कम होता है और चारित्रिक-विकास उससे उन्नत होता है। यह योगबीज के अंकुरण के पूर्व की अवस्था है। इसका ओज कंडे की अग्निवत् होता है। 3. बलादृष्टि'- इस योगदृष्टि में मन की स्थिरता पूर्व की अपेक्षा अधिक सुदृढ़ हो जाती है। चारित्र-पालन का अभ्यास करते-करते चित्तवृत्तियों को एकाग्र करने की सामर्थ्य (बल) प्राप्त हो जाती है। फलस्वरूप पद्मासन आदि विविध सुखासनों का आश्रय लेकर आलस्य न करते हुए चारित्र का विकास करता है। जैसे युवक और युवती एक दूसरे में दत्तचित्त होकर आनन्द का अनुभव करते हैं वैसे ही बलादृष्टि वाला साधक शास्त्र-श्रवण, देव-पूजा आदि में आनन्द का Page #11 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 4 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 अनुभव करता है।20 पौद्गलिक विषयों की तृष्णा शान्त हो जाती है। कंडे की अग्नि के ओज की अपेक्षा इसका ओज काष्ठ-अग्नि की तरह अधिक बलवान् होता है। योग-बीज का अंकुरण इसमें होने लगता है। 'शुश्रूषा-शक्ति' प्रकट हो जाती है। शास्त्र-श्रवण न मिलने पर भी शुभभाव के कारण कर्मक्षय करता है। शुभ कार्य में प्रायः विघ्न नहीं आते। यदि विघ्न आते भी हैं तो दूर हो जाते हैं अर्थात् 'क्षेपदोष' (विघ्न-आना) नहीं रहता है। 4. दीप्रा दृष्टि- इस योगदृष्टि में आध्यात्मिक या भाव-प्राणायाम आवश्यक होता है। आध्यात्मिक या भाव प्राणायाम में रेचक (बाह्य-परिग्रहादि के ममत्व को बाहर निकालना), पूरक (आन्तरिक आत्म-विवेक भाव अन्दर भरना) और कुम्भक (आत्मभावों को अन्दर स्थिर करना) अवस्थाएँ होती हैं। यहाँ योगी तत्त्वश्रवण से संयुक्त होकर 'उत्थान' (चित्त की अशान्ति) नामक दोष से रहित होता है। दीपक के प्रकाश की तरह इसमें स्थिरता तो होती है परन्तु जैसे दीपक हवा से बुझ जाता है वैसे ही तीव्र मिथ्यात्व के उदय होने पर सच्चारित्र नष्ट हो जाता है। जैसे दीपक अपने प्रकाश के लिए पर (तेल) पर आश्रित है वैसे ही यहाँ परावलम्बिता (आत्मा से भिन्न पदार्थ पर आश्रित) है। इसमें पूर्ववर्ती शुश्रूषा गुण 'श्रवण गुण' में परिवर्तित हो जाता है। बोध की स्पष्टता तो होती है परन्तु सत्यासत्य आदि का सूक्ष्मबोध नहीं हो पाता। आसक्ति की विद्यमानता होने से 'अवेद्यसंवेद्यपद' (पूरी परीक्षा किये बिना स्व-अभिनिवेशवश सत्य मानकर अनुसरण करना) की स्थिति है। इसीलिए इस दृष्टि तक प्रतिपात (पतन) स्वीकार किया गया है। यम-नियमादि व्रतों का पालन करने तथा शान्त, विनीत, मृदु, सदाचारी होने पर भी इन चारों दृष्टियों का अन्तर्भाव मिथ्यात्व अवस्था में किया गया है। वस्तुतः यह सम्यक्त्व-प्राप्ति के पूर्व की अभ्यास-अवस्था अथवा सम्यक्त्व से पतन के बाद की अवस्था है। यह अवस्था एक प्रकार से उपशान्त कषाय जैसी है परन्तु 'यहाँ से पतन निश्चित होगा' ऐसा नियम नहीं है, योगी सम्यग्दृष्टि होकर आगे भी बढ़ सकता है। इसीलिए यहाँ सम्यक्त्व को भजनीय कहा जा सकता है। 5. स्थिरादृष्टि- इस अवस्था में ग्रन्थिभेद से क्षायिक सम्यग्दर्शन होता है जो नित्य है। विषय-विकार-त्यागरूप प्रत्याहार की यह अवस्था है। 'सूक्ष्मबोध' गुण की प्राप्ति होती है। अचंचलता, निरोगता, अकठोरता, मलादि-विषयक अल्पता, सुस्वरता आदि के कारण परमात्म-दर्शन की ओर इन्द्रियों का झुकाव हो जाता है। इस दृष्टि की उपमा रत्न-प्रभा से दी गई है जो सौम्यता प्रदान करती है। इसे Page #12 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आठ योगदृष्टियाँ : 5 'वेद्यसंवेद्यपद' (सत्य की परीक्षा करके तदनुरूप आचरण करना) प्राप्ति भी कहा जाता है। यहाँ भ्रमदोष (शंका) नहीं रहता है। 6. कान्तादृष्टि26- इस दृष्टि में धारणा (किसी पदार्थ के किसी एक भाग पर चित्त को स्थिर करना) के संयोग से सुस्थिरता आती है। तारागणों के आलोक के समान इसका स्थिर आभामण्डल होता है। पूर्व की दृष्टियों में जहाँ योगी कर्मग्रन्थियों को छेदने में प्रयत्नशील रहता है वह यहाँ आकर अपूर्वता का अनुभव करता है। पूर्ण क्षमाशील बन जाता है। सर्वत्र उसका आदर-सत्कार होता है। परम आनंदानुभूति होती है। स्व-पर वस्तु का सम्यक् बोध हो जाता है। यह दृष्टि आगे की दृष्टियों की आधारशिला होती है। प्रमादजन्य अतिचार-रहित अवस्था है। सूक्ष्मबोध के बाद 'मीमांसा' (चिन्तन-मनन) गुण विशेष रूप से जागृत होता है। 7. प्रभादृष्टि7- इसमें सूर्य की प्रभा के समान अत्यन्त स्पष्ट बोध होने लगता है। योगी आत्मसुख की प्राप्ति में तल्लीन हो जाता है। रोगादि क्लेशों से पीड़ित नहीं होता है। असंगानुष्ठान (समता) उदित होता है। असंगानुष्ठान के चार प्रकार हैं- (क) प्रीति (कषायमुक्त रागभाव), (ख) भक्ति (आचारादि क्रियाओं में स्नेह), (ग) वचन (शास्त्र-वचन) तथा (घ) प्रवृत्ति (वचनानुष्ठान में स्वाभाविक प्रवृत्ति)। यहाँ योगी को सच्चे सुख की अनुभूति होती है। केवलज्ञान-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। चित्त-एकाग्रतारूप ध्यान इसमें प्रवाहरूप और दीर्घकालिक होता है जबकि कान्तादृष्टि में अल्पकालिक और एकदेशीय होता है। प्रतिपत्ति गुण (समाधि) की प्राप्ति होती है। कान्तादृष्टि में मीमासित तत्त्व का इसमें अमल प्रारम्भ हो जाता है। अपूर्व शान्ति मिलती है। कर्ममल क्षीणप्राय हो जाता है। 8. परादृष्टि8- इसमें आत्म-प्रवृत्ति गुण (प्रतिपत्ति गुण की पूर्णता) की प्राप्ति होती है। इसे चन्द्रमा की कान्ति की तरह शान्त और सौम्य अवस्था कहा है। अखण्ड आनन्द मिलता है। प्रभादृष्टि में ध्येय का आलम्बन होता है परन्तु परादृष्टि में ध्याता, ध्येय और ध्यान का भेद नहीं रहता है। समस्त दोषों (मोहनीय कर्मो) के नष्ट होने से अनेक लब्धियों की प्राप्ति होती है। इसमें समाधि की सम्प्राप्ति होती है। धारणा से प्राप्त होने वाली एकाग्रता ध्यानावस्था को पार करती हुई समाधि में पर्यवसित होती है। धारणा में अप्रवाह रूप एकाग्रता है, ध्यान में प्रवाह है परन्तु सातत्य नहीं जबकि समाधि में अविच्छिन्न एकाग्रता होती है। कालसीमा अधिकतम अन्तर्मुहूर्त है। यहाँ परभाव में रंचमात्र भी आसक्ति न होने से 'आसंगदोष' नहीं रहता। आत्मसमाधि की अथवा जीवन्मुक्त की यह अवस्था है। निर्वाण-प्राप्ति हेतु अयोग-केवली होकर साधक योग-संन्यास लेता है और Page #13 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 6 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 योगदृष्टिबोधक तालिका (उत्तरोत्तर उत्कृष्टता ) योगदृष्टि योगांग गुणप्राप्ति दोषाभाव बोधसादृश्य गुणस्थानं मुख्यलक्षण अद्वेष, 1 मित्रा यम अद्वेष अखेदभाव 2 तारा नियम जिज्ञासा 3 बला आसन शुश्रूषा 4 दीप्रा प्राणायाम श्रवण 5 स्थिरा प्रत्याहार सूक्ष्मबोध 6 कान्ता धारणा मीमांसा 8 परा खेदत्याग तृणाग्निकण प्रथम (अखेद) उद्वेगाभाव कंडे का (अनुद्वेग) अग्निकण क्षेप = काष्ठ अग्नि प्रथम विघ्नाभाव उत्थान (चित्तअशान्ति) अभाव दीपकप्रभा प्रथम प्रथम भ्रमाभाव रत्नप्रभा 4,5,6 अन्य- ताराप्रभा मुदाभाव (स्वानुभवमोद) 7 प्रभा - ध्यान तत्त्वप्रतिपत्ति रुक्-त्याग सूर्यप्रभा (परिशुद्ध (राग-द्वेष परिपत्ति) व्याधित्याग) समाधि आत्मस्वभाव असंगाभाव चन्द्रप्रभा में प्रवृत्ति (पूर्णता) 7,8 धर्मकथा में रुचि 8-14 शास्त्रश्रवण, देवपूजादि में आनन्द आसक्तियुक्त सदाचरण 4,5,6, पदार्थ पर अलोलुपता, सम्यक्त्व ग्रन्थिभेद चित्त-स्थिरता प्रवाह - हीन अपूर्व शान्ति, विच्छिन्न प्रवाही ध्यान अविच्छिन्न प्रवाही ध्यान, मुक्ति लाभ Page #14 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आठ योगदृष्टियाँ : 7 अन्तिम समय में पाँच हस्वाक्षरों के उच्चारण मात्र काल में शेष अघातिया कर्मों को नष्ट करके मोक्ष (सिद्धावस्था) प्राप्त कर लेता है। गुणस्थान विवेचन की दृष्टि से आचार्य हरिभद्र ने प्रथम चार दृष्टियों का समावेश प्रथम मिथ्यात्व गुणस्थान में किया है। पंचम स्थिरा और छठी कान्तादृष्टि का समावेश चतुर्थ, पंचम और षष्ठ इन तीन गुणस्थानों में किया है। प्रभा नामक सातवीं दृष्टि का समावेश सातवें और आठवें गुणस्थान में किया है। परा नामक आठवीं दृष्टि का समावेश आठवें से चौदहवें गुणस्थान में किया है। अर्थात् उन-उन गुणस्थानों में यथाकथित योगदृष्टियाँ सम्भव हैं। यदि कथंचित् अपेक्षाभेद से प्रथम चार गुणस्थानों तक प्रथम चार योगदृष्टियों की सम्भावना स्वीकार की जाए तो अनुचित न होगा, ऐसा मेरा विचार है। प्रथम चार योग-दृष्टियों से दर्शन-मोहनीय का क्षय करके सम्यग्दर्शन की प्राप्ति तथा अन्तिम चार से चारित्र-मोहनीय का क्षय करके केवलज्ञान एवं मोक्ष-प्राप्ति होती है। ये आठों योगदृष्टियाँ आत्मविकास और वीतरागता की ओर ले जाने में सोपानवत् हैं। सन्दर्भ 1. कायवाङ्मनःकर्मयोगः। स आश्रवः। तत्त्वार्थसूत्र 6.1-2 सयोग-केवली और अयोग-केवली में भी यही अर्थ है। 2. भगवतीआराधना (गाथा 21 की अपराजितसूरि की विजयोदया टीका में 'जोग-परिकम्म' को स्पष्ट करते हुए योग के अनेक अर्थ बतलाते हुए कहा है- योगशब्दोऽनेकार्थः। 'योग-निमित्तं ग्रहणं' इत्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दं त्रिविध-वर्गणासहायमाचष्टे। क्वचित्सम्बन्ध मात्र वचनः 'अस्त्यानेन योग' इति। क्वचिद्धयानवचनः यथा 'योगस्थित' इति। इहायं परिगृहीतः। ततो ध्यानपरिकरं करोतीति यावत्। रागद्वेषमिथ्यात्वासंश्लिष्टमर्थयाथात्म्यस्पर्शि -प्रतिनिवृत्तिविषयान्तरसंचारं ज्ञानं ध्यानमुच्यते। 3. तत्त्वार्थसूत्र, समाधितन्त्र, इष्टोपदेश, समाधिशतक, ध्यानशतक, मोक्षपाहुड, परमात्मप्रकाश, योगसार, आत्मानुशासन, योगसारप्राभृत, ज्ञानसार, तत्त्वानुशासन, ज्ञानार्णव, अध्यात्मसार, पातंजलयोगसूत्र एवं योगविंशिका, योगप्रदीप, अध्यात्मकल्पद्रुम आदि। 4. योगश्चित्तवित्तिनिरोधः। पातंजलयोगसूत्र, 1.2 5. योगदृष्टिसमुच्चय में 227 संस्कृत पद्य हैं जिस पर 1175 श्लोकप्रमाण स्वोपज्ञवृत्ति भी है। 6. चौदह गुणस्थान कमशः इस प्रकार हैं- 1. मिथ्यात्व, 2. सासादन, 3. मिश्र, 4. अविरतसम्यक्त्व, 5. देशविरत, 6. प्रमत्तसंयत, 7. अप्रमत्तसंयत, 8. अपूर्वकरण, 9. अनिवृत्तिकरण या निवृत्तिबादर, 10. सूक्ष्मसाम्पराय, Page #15 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 8 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 ___11. उपशान्तमोह, 12. क्षीणमोह, 13. सयोगकेवली और 14. अयोगकेवली। 7. सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते स बन्धः। त. सू. 8-23 8. पंचास्तिकाय, 128-129 9. जैनेन्द्रसिद्धान्तकोश, भाग 1, पृ. 90 10. सच्छृद्धासंगतो बोधो दृष्टिरित्यभिधीयते। असत्प्रवृत्तिव्याघातात्सत्प्रवृत्तिपदावहः।। योगदृष्टिसमुच्चय, 17 समेघामेघराज्यादौ सग्रहाद्यभ्रंकादिवत् । ओघदृष्टिरिह ज्ञेया मिथ्यादृष्टीतराश्रया ॥ योगदृष्टिसमुच्चय, 14 11. वही, 1 12. वही, 13 13. जैन योग का आलोचनात्मक अध्ययन, पृ. 204 14. योगदृष्टिसमुच्चय, 13-15 15. वही, 15 16. यमादियोगयुक्तानां खेदादिपरिहारतः। अद्वेषादिगुणस्थानं क्रमेणैषा सतां मता॥ योगदृष्टिसमुच्चय 16, तथा देखें गाथा 16, पृ. 1 फुटनोट यमनियमासन-प्राणायाम-प्रत्याहारधारणा-ध्यानसमाधयोऽष्टावंगानि। खेदोद्वेगक्षेपोत्थान-भ्रान्त्यन्यमुद्रुगासंगैः । युक्तानि चिन्तानि प्रपंचतो वर्जयेन् मतिमान् ॥ अद्वेषो जिज्ञासा शुश्रूषा श्रवणबोधमीमांसाः । परिशुद्धा प्रतिपत्तिः प्रवृत्तिरष्टात्मिका तत्त्वे ।। 17. योग., 21-40 18. योग., 41-48 19. योग., 49-57 20. योग., 52 21. योग., 54 22. योग., 57-151 23. योग. तथा ताराद्वात्रिंशिका, 19 24. योग., 57 25. योग., 152-159 26. योग., 160-167 27. योग., 168-176 28. योग., 177-185 Page #16 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आठ योगदृष्टियाँ : 9 29. समापत्ति (ध्यान या समाधि) के चार प्रकार हैं- सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार। इन चारों का समावेश सम्प्रज्ञात-समाधि (सविकल्प-समाधि या सबीज-समाधि) में हो जाता है। निर्विचार-समापत्ति की निर्मलता से अध्यात्मप्रसाद और 'ऋतम्भराप्रज्ञा' प्राप्त होती है। इसके बाद असंप्रज्ञात-समाधि (निर्विकल्प या निर्बीज-समाधि) और तदनन्तर कैवल्य (केवलज्ञान) की प्राप्ति होती है। पतंजलि के अनुसार समाधि के दो भेद हैं- सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात। सम्प्रज्ञात समाधि को सबीज समाधि भी कहते हैं क्योंकि इसमें चित्त-संस्कार पूर्णत: नष्ट नहीं होते हैं। इसके चार प्रकार हैं- वितर्कानुगत, विचारानुगत, आनन्दानुगत और अस्मितानुगत। यह सम्प्रज्ञात समाधि असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति में कारणभूत है। देखें, योगदर्शन 1.17, 18, 46, 511 *** Page #17 -------------------------------------------------------------------------- ________________ परम पूज्य श्रमण संघीय आचार्य डा. शिवमुनि जी महाराज द्वारा घोषित श्रावकवीतरागतावर्ष (2012) के उपलक्ष में विशेष लेख भेदविज्ञान द्वारा श्रावक - लोभसंवरण डॉ. अशोक कुमार सिंह अनुपम पराक्रम के धारक - क्रोधादि कषायों के उच्छेदक तीर्थकर 'द्वारा प्रवर्तित चातुर्वर्ण संघ रूप तीर्थ' - श्रावक, श्राविका, श्रमण, श्रमणी में से प्रथम दो आगारी हैं। आध्यात्मिक के साथ-साथ सामाजिक दायित्व का निर्वहन इनका परम पुनीत धर्म है। इन आगारियों का मूल बारह व्रत - पालन में निहित है। यह भी सुज्ञात है कि आत्मा के स्वाभाविक गुणों के विघातक और भवबन्धन की श्रृंखला बढ़ाने वाले कर्म-बन्धन के प्रमुख कारण कषाय हैं। श्रावक के सम्यक् आचरण और सामाजिक दायित्व-निर्वाह की बाधाओं में क्रोधादि चार कषायों में लोभ प्रमुख है। लोभ पर विजय नितान्त आवश्यक है। विना लोभ से निवृत्ति और वात्सल्यगुण के सद्भाव के लोकोपकार की आधार भित्ति और श्रावक के मूल दो कर्त्तव्यों में से एक दान में प्रवृत्ति कदापि सम्भव नहीं है। वात्सल्य गुण परोपकार का आध र है । सन्तोष-वृत्ति लोभ पर विजय का प्रमुख कारण है। सांसारिक परिग्रहों में अनासक्ति का भाव रखने से वीतरागता उत्पन्न होती है । परन्तु स्व- पर विवेकरूप भेद - ज्ञान इसका सर्वजनसुलभ, सहज एवं अमोघ उपाय है। इसी आलोक में प्रस्तुत आलेख 'भेदविज्ञान द्वारा श्रावक - लोभसंवरण' प्रस्तुत है। इस लेख में श्रावक का लक्षण, बारहव्रत पालन के कारण श्रावक कहे जाने वाले श्रावक का व्यावहारिक स्वरूप, पूजा और दानरूप दो मूल कर्त्तव्यों वाले श्रावक के सामाजिक कर्त्तव्य, दान का महत्त्व, कषाय-सामान्य का लक्षण, कषाय के दुर्गुण, लोभ का स्वरूप, लोभ के पर्यायवाची, लोभ के दुर्गुण, लोभ - कषाय पर विजय की अनिवार्यता, लोभ- कषाय-विजय हेतु शास्त्र - प्रतिपादित उपाय, वात्सल्यगुण, वीतरागता, लोभ ही नहीं समस्त आसक्तियों को दूर करने के अचूक उपाय रूप भेदज्ञान का स्वरूप, भेदज्ञान साधना की विधि, भेदज्ञान के आलम्बन, भेदज्ञान-आलम्बनों के सतत् अभ्यास की आवश्यकता, भेदज्ञानसाधना का परिणाम आदि विषयों का प्रसंगवश क्रमानुसार विवेचन किया गया है। श्र धातु से सुनने अर्थ में ण्वुल् प्रत्यय होकर श्रावक शब्द की निष्पत्ति होती है जिसका अर्थ होता है सुनने वाला । उपासक और श्राद्ध इसके अन्य पर्यायवाची Page #18 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक - लोभसंवरण: 11 हैं। श्रावक लक्षण में बारह व्रत - पालन आधार - भित्ति है। पंचपरमेष्ठि की भक्ति दान और भेदज्ञान रूपी अमृत की पिपासा से युक्त श्रावक होता है। आचार्य हरिभद्र के अनुसार श्रावक की पहचान बारह व्रत ही हैं। इन व्रतों का पालक चाहे ब्राह्मण हो या शूद्र हो श्रावक है। श्रावक के सिर पर कोई मणि नहीं होती । पं. आशाधर के अनुसार पंचपरमेष्ठि का भक्त, प्रधानता से दान और पूजन करने वाला, भेदज्ञान रूपी अमृतपान का इच्छुक तथा मूलगुणों और उत्तरगुणों का पालन करने वाला व्यक्ति श्रावक होता है । 1 श्रावक का व्यावहारिक स्वरूप बताते हुए पं. आशाधर ने कहा है- न्यायपूर्वक धनार्जन करने वाला, गुणों, गुरुजनों तथा गुणों श्रेष्ठ व्यक्तियों का पूजक, हित-मित और प्रियभाषी, धर्म, अर्थ और काम का परस्पर विरोध रहित सेवनकर्त्ता, शास्त्र के अनुकूल आहार और विहार करने वाला, लज्जावान, सदाचारियों की संगति करने वाला, विवेकी, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय,, धर्मविधि का श्रोता, दयावान और पापभीरु व्यक्ति श्रावक धर्म का पालक हो सकता है | S श्रावक के कर्त्तव्य श्रावक द्वारा धर्मनिष्ठ और सदाचारी होकर निज कर्त्तव्य के पालन में ही लोभ से निवृत्ति का मर्म छिपा हुआ है। जैनाचार्यो द्वारा धर्म की परिभाषा बताते हुए अहिंसा, दान दया और करुणा को धर्म कहा गया है-- अहिंसादिलक्षणो धर्म:', अहिंसा परमो धर्म:', धर्मस्तु... . दानशीलतपोभावनामयः, धम्म दया विशुद्धो', धम्मो दया पहाणो " धर्मो नाम कृपा मूल: ", सर्वप्राणिदयालक्ष्मो...... रत्नत्रयमयोधर्मः । तृप्ति - संतोष वृत्ति का भाव, दया-प्राणियों के प्रति करुणा भाव, भद्रा - कल्याणजन्य भावना, रक्षा - प्राणियों के बचाने का भाव, संयम- जीवरक्षा का भाव, यज्ञ - जीवरक्षा के प्रति यज्ञ, आशवास- समस्त प्राणियों को जीवन दान देना आदि अनेक अर्थों में । प्रश्नव्याकरणसूत्र 3 में अहिंसा के साठ (60) गुणनिष्पन्न पर्यायवाची दिये गये हैं। निश्चय ही यदि कोई धर्मनिष्ठ और सदाचारी श्रावक धर्म के इन गुणों से ओत-प्रोत हो जाये, मनसा, वाचा, कर्मणा, कृत, कारित, अनुमोदित धर्म के उक्त लक्षणों का पालन करे तो उसके हृदय में लोभ के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा । श्रावक के कर्त्तव्य में प्रमुखता दान और पूजा ( जिनदेव, शास्त्र, गुरु) की है। आचार्य कुन्दकुन्द 14 के अनुसार इनके विना वह श्रावक भी नहीं है। सागारधर्मामृत'' में इस (दान और पूजा) के साथ शील और उपवास को जोड़कर श्रावक के चार कर्त्तव्य बताये गये हैं। कुरलकाव्य " में श्रावकों के पांच कर्त्तव्य बताये गये हैं- यहाँ देवपूजन और आत्मोन्नति के साथ पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा Page #19 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 12 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 बन्धु-बान्धवों की सहायता एवं अतिथि सत्कार को सम्मिलित किया गया है चारित्रसार" के अनुसार जिनपूजा, गुरुसेवा, स्वाध्याय, संयम, तप और दान- ये छः कर्म गृहस्थों के आर्य कर्म कहलाते हैं। संयम, स्वाध्याय, उपवास, व्रतों में लीनता, धर्मात्मा लोगों पर प्रेम, विपत्तिग्रस्त लोगों पर करुणाबुद्धि, पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा, बन्धु-बान्धवों की सहायता, लोगों के दु:ख दूर करना, आत्मोन्नति आदि विभिन्न शास्त्रों में श्रावक के कर्त्तव्य गिनाये गये हैं। इस प्रकार स्व अर्थात् आत्म के साथ-साथ परिवार, समाज एवं राष्ट्र के प्रति भी श्रावक का कर्त्तव्य है। श्रावक का आचरण नीतियुक्त, न्याययुक्त, समाजोपयोगी, राष्ट्रपोषक एवं सात्त्विक प्रवृत्ति से युक्त होना चाहिए। समाज के कल्याण के लिए दान आवश्यक है। इस कलियुग में मानव के कल्याण के लिए दान को सबसे सुगम साधन बताया गया है। राजर्षि मनु ने दान की महिमा बताते हुए कहा है कि सत्य युग में तपस्या, त्रेता में ज्ञान, द्वापर में यज्ञ तथा कलियुग में मात्र दान का ही महत्त्व है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी कहा हैप्रगट चारि पद धर्म के कलिमहुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ।। 7.103(ख) श्रावक को सबकी रक्षा के भाव से दयाभाव रखना चाहिए। जब प्राणिमात्र के प्रति हित की भावना तथा परपीड़ा से करुणाविगलित हृदय में त्यागभाव आयेगा तो उससे दान देने की प्रवृत्ति हो जायेगी। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अकाल, अतिवृष्टि भूकम्प, अग्निप्रकोप, रोगादि का प्रकोप, भूखा, रोगी, अतिवृद्ध आदि को अन्न जल, औषध, आवास आदि का दान करना चाहिए। सम्पत्ति की सार्थकता उसके परहित में उपयोग में है। परहित में दान विश्वकल्याण के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। महाभारत में पृथ्वी सात स्तम्भों के सहारे टिकी बताई गई है उनमें दानदाता भी एक हैगोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः। अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धार्यते मही।।। दान का महत्त्व बताते हुए कहा गया है1- धन का संग्रह करने से गौरव नहीं बढ़ता है। दान देने से गौरव बढ़ता है। जल देने वाले मेघ का स्थान ऊंचा है परन्तु जल का संचय करने वाला सागर नीचे ही रहता हैगौरवं प्राप्यते दानान्न न तु वित्तस्य संचयात्। स्थितिरुच्चैः पयोदानां पयोधीनामधः स्थितिः।। Page #20 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक - लोभसंवरण: 13 कवि रहीम 22 ने दान के महत्त्व के सम्बन्ध में कहा है- यदि नाव में पानी बढ़ जाय और घर में धन बढ़ जाय तो पानी और धन दोनों को दोनों हाथ से बाहर निकालना ही बुद्धिमान का कर्त्तव्य हैपानी बाढ़े नाव में, घर में बाढ़े दाम । दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम ।। इस प्रकार दान करना गृहस्थ के लिए आवश्यक बताया गया है। " डॉ. पुष्पा गर्ग 23 ने अपने लेख 'आध्यात्मिक उन्नति में दान की साधनरूपता' में वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दान के भेदों पर विचार किया है, वे हैं - 1. द्रव्यदान, 2. अन्नदान, 3. मधुर वचनों का दान 4. आश्वासन दान, 5. आजिविका दान, 6. आश्रय दान, 7. जल दान, 8. श्रमदान, 9. विविध दान, 10. विद्या दान, 11. मानदान, 12. रक्त दान, 13. पुण्यदान और जप दान। वास्तव में ये सभी प्रकार के दान मानव जीवन के कर्त्तव्य रूप में आध्यात्मिक उन्नति के साधन तो हैं ही इनका सामाजिक महत्त्व और भी अधिक है। जैन आगमों में भी श्रावक के सामाजिक दायित्व की चर्चा की गई है। स्थानांगसूत्र 24 में धार्मिक कर्त्तव्यों के साथ-साथ सामाजिक कर्त्तव्यों की भी प्ररूपणा की गई है। वहां दस धर्म या कर्त्तव्य, 1. ग्रामधर्म, 2. नगरधर्म, 3. राष्ट्रधर्म, 4. पाखण्डधर्म, 5. कुलधर्म, 6. गणधर्म, 7. संघधर्म, 8. श्रुतधर्म, 9. चारित्रधर्म और 10. अस्तिकायधर्म वर्णित हैं। इनमें से ग्रामधर्म, नगरधर्म, राष्ट्रधर्म, कुलधर्म, गण धर्म और संघ धर्म पूर्णतया सामाजिक दायित्व हैं। ग्राम का अर्थ व्यक्तियों के कुलों का समूह है। ग्रामधर्म का तात्पर्य है जिस ग्राम में निवास है उस ग्राम की व्यवस्थाओं, मर्यादाओं एवं नियमों के अनुरूप कार्य करना। नगर से तात्पर्य है ग्रामों के मध्य में स्थित एक केन्द्रीय ग्राम, जो उनका व्यावसायिक केन्द्र होता है, नगर कहा जाता है । सामान्यतः ग्रामधर्म और नगरध र्म में विशेष अन्तर नहीं है। राष्ट्र धर्म का तात्पर्य है- राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना अथवा जीवन की विशिष्ट प्रणाली को सजीव बनाये रखना। राष्ट्रीय विधिविधान, नियमों एवं मर्यादाओं का पालन करना ही राष्ट्रधर्म है। कुलधर्म - परिवार अथवा वंश-परम्परा के रीति-रिवाजों एवं मर्यादाओं का पालन करना कुल धर्म है। जैन परम्परा में गृहस्थ एवं मुनि दोनों के लिए कुल धर्म का पालन आवश्यक है । यद्यपि मुनि का कुल उसके पिता के आधार पर नहीं, वरन् गुरु के आधार पर बनता है। गणधर्म - गण का अर्थ समान आचार एवं विचार के व्यक्तियों का समूह है। गण दो माने गये हैं- लौकिक और लोकोत्तर । महावीर के समय में हमें गणराज्यों का उल्लेख मिलता है। मधुकर मुनि 25 ने गणधर्म का अभिप्राय गणतन्त्र Page #21 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 14 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 राज्यों की परम्परा या व्यवस्था का पालन करना बताया है। साधुओं के भी गण होते हैं जिन्हें गच्छ कहा जाता है। गण के नियमों के अनुसार आचरण करना गणधर्म है। संघधर्म-साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका चारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संघ के नियमों का पालन करें। इसी प्रसंग में स्थानांगसूत्र के स्थविर सूत्र का उल्लेख किया जाना युक्तिसंगत होगा। इस सूत्र के अनुसार ग्रामस्थविर-ग्राम का व्यवस्थापक, नगर स्थविर-नगर का व्यवस्थापक, राष्ट्रस्थविर-राष्ट्र का व्यवस्थापक, कुलस्थविर-कुल का व्यवस्थापक, गणस्थविर-गण का व्यवस्थापक और संघस्थविर-संघ का व्यवस्थापक होता था। अतः इनके आदेशों या इनके द्वारा निर्मित नियमों का पालन भी नागरिकों एवं साधु-साध्वियों के लिए आवश्यक होता था। इस प्रकार श्रावकों के सामाजिक दायित्व का सम्यक् विचार स्वयं भगवान् महावीर ने भी अपने उपदेशों में किया था। प्रो. सागरमल जैन द्वारा उपासकदशांग, आचार्य समन्तभद्र कृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार और आचार्य हेमचन्द्रकृत योगशास्त्र में वर्णित श्रावक के गुणों, बारह व्रतों एवं उनके अतिचारों के विवरण के आधार पर पर प्रदत्त श्रावक के सामाजिक दायित्वों में से कुछ को यहाँ प्रस्तुत किया जा सकता है1. किसी निर्दोष प्राणी को बन्दी मत बनाओ अर्थात् सामान्य जनों की स्वतन्त्रता में बाधक मत बनो। 2. किसी की आजीविका में बाधक मत बनो। 3. स्वार्थ-सिद्धि हेतु असत्य वचन मत बोलो। 4. न्यायनीति से धन उपार्जन करो। 5. न स्वयं चोरी करो, न चोर को सहयोग दो और न चोरी का माल खरीदो। 6. व्यवसाय के क्षेत्र में नाप-तौल में प्रामाणिकता रखो और वस्तुओं में मिलावट मत करो। 7. राजकीय नियमों का उल्लंघन और राज्य के करों का अपवंचन मत करो। 8 वर्जित व्यवसाय मत करो। 9. आय के अनुसार व्यय करो। 10. यथासम्भव अतिथियों, सन्तजनों, पीड़ित एवं असहाय व्यक्तियों की सेवा, अन्न, वस्त्र, आवास, औषध आदि के द्वारा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करो। 11. प्रसिद्ध देशाचार का पालन करो, सदाचारी पुरुषों की संगति करो। 12. जिनके पालन-पोषण का भार अपने ऊपर हो उनका पालन-पोषण करो। 13. देश और काल के प्रतिकूल आचरण मत करो। 14. अपने प्रति किये हुए उपकार को नम्रतापूर्वक स्वीकार करो। Page #22 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 15 इसी प्रकार बहुत से आचार नियम हैं जो जैन नीति की सामाजिक- सार्थकता को स्पष्ट करते हैं। आज यह आवश्यक हो गया है कि वर्तमान सन्दर्भ में उनकी व्याख्या एवं समीक्षा कर उन्हें युगानुकूल बनाकर प्रस्तुत किया जाय।28 वात्सल्यगुण श्रावक में वात्सल्य गुण का होना अनिवार्य है। श्रावक का वात्सल्य दो प्रकार का है- धार्मिक और सामाजिक। धार्मिक दृष्टि से साधुओं के मोक्षमार्ग, जिनप्रणीत धर्म और जिनागम में प्रीति1 वात्सल्य है। सामाजिक दृष्टि से वात्सल्य का मुख्य सम्बन्ध साधर्मिकों से है- वात्सल्यं सधर्मणि स्नेहः। चारित्रसार" में कहा गया है- जिस प्रकार सद्यःप्रसूता गाय अपने बछड़े पर अत्यधिक प्रेम करती है उसी प्रकार श्रावक को चतुर्विधसंघ पर स्वाभाविक प्रेम करना चाहिए। मूलाचार में कहा गया है कि कायिक, वाचिक, मानसिक अनुष्ठानों के द्वारा, सभी प्रयत्नों से उपकरण, औषध, आहार, अवकाश, शास्त्रादि दानों से संघ के प्रति वात्सल्य करना चाहिये। कुरल काव्य में वात्सल्यरहित धर्म को निरर्थक बताया गया है। जिस प्रकार सूर्य हाड़-मांस से रहित कीड़े को जला डालता है उसी प्रकार चतुर्विधसंघ पर वात्सल्य से रहित श्रावक को धर्म रूपी सूर्य जला डालता है। वात्सल्य गुण की महत्ता बताते हुए कहा गया है इस अकेले गुण से ही तीर्थकर नाम कर्म का बन्ध हो जाता है।35 आज के परिप्रेक्ष्य में वात्सल्य मात्र स्वमतावलम्बियों तक ही सीमित नहीं है इसका क्षेत्र समस्त मानव जाति ही नहीं, समस्त पशु-पक्षी ही नहीं अपितु समस्त वनस्पतियां, भूमि, जल, वायु अग्नि आदि भी इसकी परिधि में आती हैं। इन सबका भी संरक्षण आवश्यक है। श्रावक समस्त चराचर जगत् का तीन योग और तीन करण से संरक्षक है। वीतरागता श्रावक के लक्षण, गुण और कर्त्तव्य पर प्रकाश डालने के पश्चात् जैन शास्त्रों में वर्णित वीतरागता के स्वरूप पर किंचित प्रकाश डाला जाता है। धवला के अनुसार मोहनीय कर्म के क्षय से जीव राग-द्वेष से रहित वीतराग हो जाता है। जैन शास्त्रों में समता, माध्यस्थ भाव, शुद्धभाव, वीतरागता, चारित्र, धर्म, स्वभाव की आराधना- ये एकार्थक बताये गये हैं। प्रवचनसार-टीका के अनुसार भेदज्ञान की उत्कृष्ट भावना से निर्विकार आत्मस्वरूप को जो प्रकट करने वाला है वह वीतराग है। भेदज्ञान को यहां विवेक भावना भी कहा गया है। श्रावक के सम्बन्ध में वीतरागता से अभिप्राय होगा भेदज्ञान के आलम्बन एवं अभ्यास से समस्त आत्मेतर परपदार्थों के पृथक्त्व की भावना को निरन्तर दृढ़ करते जाना। Page #23 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 16 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 वीतरागता का आधार भाव है रागी जीवों को वन में रहते हुए भी दोष विद्यमान रहते हैं परन्तु जो राग से विमुक्त हैं उनके लिए घर भी तपोवन हैं क्योंकि वे घर में भी पांचों इन्द्रियों के निग्रह रूप तप करते हैं और अकुत्सित भावनाओं का वर्तन करते हैं। कषाय-कर्म बन्धन का प्रमुख कारण होने से जैनाचार्यों ने कषाय के स्वरूप पर विस्तार से विचार किया है। जैन साहित्य में कषाय शब्द सात अर्थों में प्रयोग में आया है- 1. क्रोध, मान, माया और लोभ, 2. रसविशेष कसैला, 3. वर्ण-विशेष, लाल-पीला रंग, 4. क्वाथ, काढ़ा (पेय), 5. कसैला स्वाद वाला, 6. कषाय रंग और 7. सुगन्धी, खुशबूदार। क्रोध आदि के अर्थ के रूप में प्रयुक्त कषाय की व्युत्पत्ति बताते हुए आचार्य हरिभद ने कहा है-कष गतौ इति कष शब्देन कर्माभिधीयते भवो वा, कषस्य आया लाभाः प्राप्तयः कषायाः क्रोधादयः। पंचसंग्रह की स्वोपज्ञवृत्ति में भी आचार्य हरिभद्र ने कहा है- कष अर्थात् संसार उसको प्राप्त कराने वाला कषाय है। धवला' में कहा गया है- सुख और दुख रूपी बहु फसलों वाले कर्म रूपी खेत को जोतते हैं अतः कषाय हैं। जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण"ने कषाय का स्वरूप स्पष्ट करते हुए कहा कि कर्म अथवा संसार को कष कहा जाता है। इस प्रकार कष अर्थात् कर्म या संसार को जो प्राप्त कराते हैं वे कषाय हैं। कषाय चार हैं- क्रोध, मान, माया और लोभ।। कषाय-शमन-भगवती आराधना और आचारसार" में इन कषायों के शमन का उपाय बताते हुए कहा गया है कि भावों की विशुद्धि का नाम कषाय सल्लेखना है। सद्ध्यान से कषायविषयक सल्ल नाम कषाय सल्लेखना है। सद्ध्यान से कषायविषयक सल्लेखना श्रेयस्कर है। ये कषाय आत्मा के गुणों का ही विघात नहीं करते बल्कि सामाजिक जीवन में भी विषमता उत्पन्न करने के कारण हैं। लोभ या संग्रह की मनोवृत्ति के कारण शोषण, अप्रामाणिकता, स्वार्थपूर्ण व्यवहार, क्रूर व्यवहार, विश्वासघात आदि की दुष्प्रवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। क्रोध आवेश आदि दुष्प्रवृत्तियाँ संघर्ष, कलह, वैमनस्य, आक्रमण, हत्या आदि का कारण बनती हैं। मान या गर्व क्रूर और घृणा पूर्ण व्यवहार का कारण बनता है। माया के कारण अविश्वास या अमैत्रीपूर्ण व्यवहार उत्पन्न होता है। इस प्रकार सामाजिक जीवन दूषित करने में कषाय बहुत बड़े कारण हैं। लोभ-कषाय का स्वरूप Page #24 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 17 धवला"के अनुसार 'बाह्य पदार्थों में यह मेरा है' इस प्रकार की बुद्धि, आचार्य सोमदेवसूरि के नीतिवाक्यामृतम्' और आचार्य हेमचन्द्र के योगशास्त्र के अनुसार सत्पात्र को धन न देना अथवा दूसरे के धन को ग्रहण करना तो आचार्य अमृतचन्द्रसूरि के अनुसार उपयुक्त स्थल पर धन व्यय न करना लोभ है। जैनाचार्यों ने लोभ और उससे सम्बद्ध अन्य मनोवृत्तियों का भी चित्रण किया है जो इस प्रकार हैं:लोभ- संग्रह करने की वृत्ति, इच्छा- अभिलाषा, मूर्छा- तीव्रतम संग्रह वृत्ति, कांक्षा- प्राप्त करने की आशा, गृद्धि- प्राप्त वस्तु में आसक्ति होना, तृष्णासंग्रह की इच्छा, वितरण की विरोध वृति, मिथ्या-विषयों का ध्यान, अभिध्यानिश्चय से विचलित हो जाना, आशंसना- इष्ट-प्राप्ति की इच्छा रखना, प्रार्थना- अर्थ आदि की याचना, लालपनता- चाटुकारिता, कामाशा- विषय की इच्छा, भोगाशा- भोग्य पदार्थों की इच्छा, जीविताशा- जीवन की कामना, मरणाशा- मृत्यु की कामना और नन्दिराग- प्राप्त सम्पत्ति में अनुराग।। यह भी विचारणीय है कि हमारे ऋषियों ने धन की आकांक्षा और यश की कामना दोनों को समान बताया है और इनसे दूर रहने का उपदेश दिया है। ऋषिभाषित' के याज्ञवल्क्य अध्ययन में वित्तैषणा और लोकैषणा दोनों को समान बताया गया है। जबतक लोकैषणा है तब तक वित्तैषणा है अतः दोनों को जानकर इनमें संयम का पालन आवश्यक है। ख्याति, प्रसिद्धि की भावना भी लोभ है। बृहदारण्यक उपनिष में ऋषि याज्ञवल्क्य का यह संवाद प्राप्त होता है- 'उस इस आत्मा को ही जानकर ब्राह्मण, पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा से अलग हटकर भिक्षाचर्या से विचरते हैं। जो भी पुत्रैषणा है, वही वित्तषणा है और जो वित्तैषणा है वही लोकैषणा है।' आचार्य गुणभद्र विरचित आत्मानुशासन के अनुसार यदि दानादि पुण्य कार्य यश के उद्देश्य से किया जाता है तो वह निरर्थक है। परन्तु वर्तमान परिवेश में यश की कामना सामाजिक कार्य में प्रवृत्ति का बहुत बड़ा कारक है। अतः दान आदि कृत्य मुख्य हैं। भले ही वे यश की कामना से किये गये हों, पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा और उसमें वृद्धि भी श्रावक का कर्तव्य लोभ का सबसे बड़ा दुर्गुण इसकी अतृप्तता है। लोभी व्यक्ति कभी तृप्त नहीं हो सकता है। उत्तराध्ययनसूत्र में लोभ की अतृप्तता का वर्णन करते हुए कहा गया है- रजत और स्वर्ण के कैलाश पर्वत के समान विशाल एवं असंख्य पर्वत भी यदि लोभी के पास हों तो भी लोभी मानव की तृप्ति के लिए वे कुछ भी नहीं हैं क्योंकि इच्छा आकाश के समान अनन्त है। इसमें यह भी वर्णन है कि Page #25 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 18 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 जैसे- जैसे इच्छा की पूर्ति होती जाती है, वैसे-वैसे लोभ भी निरन्तर बढ़ता जाता है। जहां लाभ होता है वहीं लोभ होता है। अर्थात् जैसे-जैसे लाभ बढ़ता जाता है वैसे-वैसे लोभ वृद्धि को प्राप्त होता है। उत्तराध्ययन में दृष्टान्त दिया गया है कि इस संसार में धन-धान्य आदि से परिपूर्ण लोक के दाता से भी लोभ वृत्ति संतुष्ट नही होती । मुझे इतना दे दिया फिर भी वह सन्तुष्ट नहीं होता है वैसे ही व्यक्ति सबकुछ प्राप्त करने पर भी तृप्त नहीं होता है।। जैन आगमों में भी लोभ के प्रकारों और उनसे होने वाले भयंकर दुष्परिणामों का वर्णन मिलता है। स्थानांगसूत्र में लोभ के चार प्रकारों को चार वर्णों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है-कृमिरागरक्त, कर्दमरागरक्त, खञ्जनरागरक्त एवं हरिद्वारागरक्त। कृमिरागरक्त अर्थात् कृमियों के रक्त से रंगे हुए वस्त्र के समान अत्यन्त कठिनाई से छूटने वाला अनन्तानुबन्धी लोभ। कर्दमरागरक्त- कीचड़ से मलिनता को प्राप्त वस्त्र की भाति कठिनाई से स्वच्छ होने वाला अप्रत्याख्यानावरण लोभ। खजनरागरक्त अर्थात् काजल के रंग से रंगे हुए वस्त्र के समान थोड़ी कठिनाई से छूटने वाला प्रत्याख्यानावरण लोभ। हरिद्रारागरक्त- हल्दी के राग से रंगे हुए वस्त्र के समान सरलता से छूटने वाला संज्वलन लोभ। उक्त चारों प्रकार के लोभ वश जीव क्रमशः नारक, तिर्यच, मनुष्य और देव योनि में उत्पन्न होता है। लोभ-कषाय के दुर्गुण लोभ के उत्पन्न होते ही व्यक्ति सद्-असद् विवेक को खो देता है। आचारांगसूत्र में आशा, तृष्णा, रति और इच्छा को काम भोग में परिगणित किया गया है -कामा दुरतिक्कमा अर्थात् काम या इच्छा दुर्लध्य है। जब व्यक्ति कामना करता है, परितृप्त नहीं होने पर शोक करता है। जिससे शरीर सूख जाता है, आंसू बहते हैं, अनन्त पीड़ा और परिताप भी उत्पन्न होता है। स्थानांग के अनुसार मजीठे के रंग के समान जीवन में कभी नहीं छूटने वाला लोभ आत्मा को नरक गति की ओर ले जाता है। आचारांग' में कहा गया है कि लोभी व्यक्ति लोभ के प्रसंग में झूठ का आश्रय ग्रहण कर लेता है। दशवैकालिकसूत्र में लोभ को सभी गुणों के विनाश का कारण भी कहा गया है। अमरुक ने कहा है कि यदि व्यक्ति के मन में लोभ है तो सारे गुण व्यर्थ हैं उसे दुर्गुणों की क्या आवश्यकता है अर्थात् अकेले लोभ समस्त दुर्गुणों को निष्प्रभावी बनाने के लिए पर्याप्त है। लोभ के कारण मतिभ्रष्ट व्यक्ति माता, पिता, पुत्र, सहोदर या स्वामी सबको मार डालता है। विभिन्न जैन ग्रन्थों में लोभ क कारण होने वाले दुष्प्रभावों का वर्णन किया गया Page #26 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 19 1. लोभेणासाधत्ता- लोभ के कारण मनुष्य आशा से ग्रस्त होता है। यह वस्तु मेरी होगी इस प्रयोजन से नाना प्रकार के पाप करता है। 2. लोभेणं णरो ण विगणेदि2- लोभ के कारण व्यक्ति स्वयं को एवं अपने आप को भी कुछ नहीं गिनता है। 3. लोभो तणे वि जादा-तृण मात्र पर भी लोभ विविध पाप का कारण बनता है। 4. तेलोक्केण वि चित्तस्स णित्वुदी णत्थि-लोभी का चित्त तीनों लोकों की सम्पदा प्राप्त करने पर भी तृप्त नहीं होता। 5. सव्वे वि गंथदोसा-सभी प्रकार के ग्रन्थ-दोष लोभ के कारण ही उत्पन्न होते हैं। लोभ से ही मनुष्य मैथुन, हिंसा, झूठ और चोरी जैसे कार्य को करता है। सभी पापनन्य क्रियायें लोभ से ही होती हैं। जमदग्नि के पुत्र परशुराम की गायों को ग्रहण करने के कारण राजा कार्तवीर्य लोभदोष से समस्त परिवार और सेना के साथ मृत्यु को प्राप्त हुआ। परशुराम ने सबको मार डाला। 6. लोभपत्तेलोभी -लोभ की उपस्थिति होने पर असत्यवचन से ही व्यक्ति अपनी सत्य की क्रियायें करता है। 7. लोभो सव्वविणासणो'-लोभ सभी सद्गुणों का विनाश करने वाला होता है। लोभ या तृष्णा-निवारण की अनिवार्यता आचार्य शुभचन्द्र ने ज्ञानार्णव में कहा है कि मनुष्य की आशा का जैसे-जैसे शरीर और परिग्रह में विस्तार होता है वैसे-वैसे मोह कर्म की गांठ दृढ़ होती है। इस आशा या तृष्णा को निरन्तर रोका नहीं जाये तो यह निरन्तर समस्त लोक पर्यन्त विकसित होती रहती है और इससे इसका मूल दृढ़ होता है फिर इसका काटना आवश्यक होता है। लोभ-संवरण का माहात्म्य ज्ञानार्णव' में कहा गया है कि जो पुरुष समस्त तृष्णाओं का निराकरण करके तृष्णा रहितत्व का अवलम्बन करता है उसका मन किसी भी परिग्रह रूपी कर्दम से नहीं लिप्त होता है। जिस पुरुष की आशा या तृष्णा नष्ट हो गई है उसके इस लोक में क्या-क्या मनोवांछित सिद्ध नहीं हुए अर्थात् सभी मनोवांछित सिद्ध हुए। तृष्णा बहुत दुःखदायी है। प्रत्येक प्राणी के सामने तृष्णा रूपी गर्त खुदा हुआ है जिसमें समस्त संसार अणु के समान है फिर किसके लिये कितना प्राप्त हो सकता है? अर्थात् सबकी मनोभिलाषा पूर्ण नहीं हो सकती है इसलिए हे संसारी प्राणियों तुम्हारी इच्छा करना व्यर्थ है। आचार्य कुन्दकुन्द विरचित बोधपाहुड' की Page #27 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 20 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 टीका में कहा गया है- जिसने आशा को दासी बना लिया है उसने सम्पूर्ण जगत् को दास बना लिया है परन्तु जो आशा का दास है वह सभी जीवों का दास है। इस प्रकार निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि लोभ आदि को उत्पन्न करने वाला जो कोई पदार्थ है उनका त्याग करने से लोभ पर विजय प्राप्त होती है। इन बाह्य वस्तुओं का त्याग लोभादि निवृत्ति है। अतः अवश्य ही बाह्य वस्तुओं का परित्याग करना चाहिए। निर्लोभता के उपाय लोभ को जीतने का सबसे महत्त्वपूर्ण उपाय है- सन्तोष। दशवैकालिक" में कहा गया है- लोभ को सन्तोष से जीतना चाहिये। लोभ के जीतने से व्यक्ति निर्भीक एवं स्वतन्त्र बनता है। आचारांगसूत्र में कहा गया है अलोभ से लोभ को पराजित करता हुआ साधक काम-विषयों के प्राप्त होने पर भी उनका सेवन नहीं करता। अर्थात् आत्मा को अपने स्वाभाविक गुण सन्तोष के द्वारा लोभ पर विजय प्राप्त करना चाहिए साथ ही श्रावक के लिए यह आवश्यक है कि धर्मपूर्वक अपनी आजीविका ग्रहण करे। सूत्रकृतांग में कहा भी गया है- निश्चितरूप से धर्मपूर्वक अपनी आजीविका ग्रहण करने वाला सद्गृहस्थ होता है। धर्मपूर्वक आजीविका ग्रहण करने से समस्त प्राणियों के प्रति समभाव उत्पन्न होता है। सूत्रकृतांग73 में ही यह भी कहा गया है कि संसार के समस्त जीवों के प्रति समता की भावना रखने वाले की लोभ की प्रवृत्ति कम होती है तथा आत्म रूपी तुला पर सभी को रखने से समभाव की दृष्टि उत्पन्न होती है तथा तृष्णा भाव की समाप्ति भी होती है। उत्तराध्ययनसूत्र के अनुसार लोभ को नष्ट करने के लिए मोह को नष्ट करना चाहिए। जिसके मोह नहीं उसने दुःख को नष्ट कर दिया, जिसके तृष्णा नहीं उसने मोह को नष्ट कर दिया। जिसके लोभ नहीं उसने तृष्णा को नष्ट कर दिया जिसके पास कुछ भी नही है उसने लोभ को नष्ट कर दिया। उत्तराध्ययन में कहा गया है कि छन्द अर्थात् इच्छा के निरोध से मुक्ति होती है इसलिए इच्छाओं पर नियन्त्रण आवश्यक है। इस प्रसंग में यह भी विचारणीय है कि आत्मा के स्वाभाविक गुण क्या हैं और विभाव या परभाव क्या हैं। स्वभाव एवं विभाव का पृथक्त्व की भेदज्ञान ही साधना का मूल है। धवला” में कहा गया है कि ज्ञान, दर्शन, संयम, सम्यक्त्व, क्षमा, मृदुता, आर्जव, सन्तोष और विरामादि जीव के स्वभाव हैं। इसके विपरीत कषाय, प्रमाद, असंयम, अज्ञान, मिथ्यात्व, जीव के गुण नहीं हैं इनका विवेक होना चाहिए। अनादि काल से जीव संसार रूपी आवर्त में फंसकर दुःख उठा रहा है। मिथ्यात्ववश जीव तत्त्व-स्वरूप Page #28 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 21 को वास्तविक अर्थ में नहीं जानता। जो जड़ अनात्मा है, उसे आत्मा मान लेते हैं। आत्मा और शरीरादि दोनों अनादि काल से साथ-साथ रह रहे हैं। यह शरीर भी जड़ है। परन्तु अज्ञानवश इस शरीर को ही आत्मा मानकर हमारी सारी प्रवृत्तियां हो रही हैं। शरीर के रोग कष्ट, सुख-दुःख को जीव आत्मा का या अपना कष्ट मान ले रहा है। डा. सागरमल जैन के अनुसार जैसे उष्ण जल में रही हुई उष्णता, जल में रहते हुए भी जल का स्वरूप नहीं है क्योंकि वह अग्नि के संयोग के कारण है। वैसे ही लोभ-कषायादि भाव आत्मा में होते हुए भी आत्मा का स्वरूप नहीं है। यह अनुभूति ही जैन-साधना का सार है। पर पदार्थों आदि से अपने को भिन्न मान लेना ही भेदविज्ञान है। इस प्रसंग में आचारांग का कथन है- जो स्व से अन्यत्र दृष्टि नहीं रखता वह स्व से अन्यत्र रमता भी नहीं है और जो स्व से अन्यत्र रमता नहीं है वह स्व से अन्यत्र दृष्टि भी नहीं रखता है। आत्म और अनात्म विवेक ही भेदविज्ञान है। इस भेदविज्ञान के प्राप्त होते ही पर पौद्गलिक जड़ वस्तुओं में जीव की आसक्ति नहीं रहती। शरीर, ध न, कुटुम्ब सभी से अपने को भिन्न अनुभव करने लगता है। सांसारिक वस्तुएं मेरी हैं ही नहीं भ्रमवश उन्हें अपना मान लिया है। आचारांगसूत्र में कहा गया है- विषयार्थी पुरुष मेरी माता, मेरे पिता, मेरे भाई, मेरे बहन, मेरी पत्नी, मेरी पुत्री, मेरी पुत्रवधू, मेरा सखा, स्वजन- सम्बन्धी आदि हैं- इस प्रकार मानकर विषयों में आसक्त होता है। चैतन्यस्वरूप, अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र और अनन्तवीर्य स्वभाववाली आत्मा इन सबसे भिन्न है। इस तरह की भेदज्ञान की अन्तर्दृष्टि के निरन्तर अभ्यास से आत्मा का पर से ममत्व दूर हो जाता है। वह अपनी आत्मा को केवल, ज्ञाता-द्रष्टा समझने लगता है। कविवर बनारसीदास ने भेदविज्ञान की प्राप्ति में धोबी के वस्त्र का दृष्टान्त दिया हैजैसे कोई मनुष्य धोबी के घर जावे और दूसरे का वस्त्र धारण कर उसे अपना मानने लगे परन्तु उस वस्त्र का स्वामी देखकर कहे कि यह तो मेरा वस्त्र है। तब वह मनुष्य अपने वस्त्र का चिह्म देखकर वस्त्र के त्याग की बुद्धि करता है। उसी प्रकार कर्म संयोगी जीव परिग्रह के ममत्व से विभाव में रहता है अर्थात् शरीर आदि को अपना मानता है। परन्तु भेद विज्ञान होने पर जब स्व-पर का विवेक हो जाता है तो रागादि भावों से भिन्न अपने निज स्वभाव को ग्रहण करता श्रमणसंघीय आचार्य पूज्य डा. शिवमुनि जी 2 का यह मूलमन्त्र 'खुली आंखों से भेदज्ञान बन्द आंखों से गहरा ध्यान' श्रावक की वीतरागता का अचूक अस्त्र है। Page #29 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 22 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 भेदविज्ञान की साधना के लिए अन्तर मन में यहां तक कि खुली आंखों से भी सदैव यह चिन्तन करना चाहिए कि मैं शुद्ध आत्मा हूँ, नाम, पद, प्रतिष्ठा, सांसारिक सम्बन्ध- ये सभी शरीर के हैं । बन्द आंखों से गहरा ध्यान। मैं कौन हूं, मेरा स्वरूप क्या है? आत्मा के स्वाभाविक गुण क्या हैं? मेरे जीवन का लक्ष्य क्या है? इन शाश्वत प्रश्नों का समाधान ध्यान के द्वारा प्राप्त होता है। पूज्य आचार्य डॉ. शिवमुनि83 जी के शब्दों में, आनन्द हमारा स्वभाव है, शान्ति हमारे भीतर है, ज्ञान हम स्वयं हैं, फिर भी आज का मनुष्य क्यों दुःख एवं विषाद के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है? इसका समाधान यही है कि हम प्रत्येक श्वांस में भेद ज्ञान को जीयेगें। आचार्य कुन्दकुन्द विरचित नियमसार के परमार्थ प्रतिक्रमण अधिकार की पांच गाथाओं पंचरत्न' में भेदज्ञान का स्वरूप वर्णित किया गया है। ये गाथाये हैंणाहं नारय भावो, तिरियत्थो मणुवदेवपज्जावो। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता व कत्तीण।।77।। णाहं मग्गण ठाणो, णाहं गुणठाण जीवट्ठाणो य। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता णेव कत्तीणं।।78।। णाहं बालो बुड्ढो, ण चेव तरुणो ण कारणं तेसिं। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता णेव कत्तीण।।79।। णाहं रागो दोज़ो, ण चेव मोहो ण कारणं तेसिं। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता व कत्तीण।।80।। णाहं कोधो माणो, ण चेव माया ण होमि लोहो हं। कत्ता ण हि कारइदा, अणुमंता णेव कत्तीण।।81।। इन गाथाओं का अभिप्राय यह है कि मैं नारक पर्याय, तिर्यच पर्याय, मनुष्य पर्याय अथवा देव पर्याय नहीं हूँ। मैं मार्गणा स्थान नहीं हूँ, गुणस्थानरूप अथवा जीवसमास रूप नहीं हूँ। मैं बालक नहीं हूँ, वृद्ध नहीं हूँ, तरुण रूप नहीं हूँ और उनका कारण भी नहीं हूँ। मैं रागरूप नहीं हूँ, द्वेषरूप नहीं हूँ, मोहरूप नहीं हूँ और उनका कारण भी नहीं हूं। मैं क्रोधरूप नहीं हूँ, मानरूप नहीं हूँ, मैं माया रूप नहीं हूँ और मैं लोभरूप नहीं हूँ। मैं इनका करने वाला, कराने वाला और करते हुए का अनुमोदन करने वाला नहीं हूँ। वृत्तिकार के अनुसार इन गाथाओं में आचार्य ने शुद्ध आत्मा के सम्पूर्ण कर्तृत्व के अभाव का प्रतिपादन किया है। इन गाथाओं को पंचरत्न की संज्ञा दी गई है क्योंकि इन गाथाओं में प्रतिपादित भेद विज्ञान के द्वारा ही साधक सम्पूर्ण विषय कषायों से छूट सकते हैं और अपनी आत्मा में अपने को स्थिर कर सकते हैं। Page #30 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक - लोभसंवरण: 23 इसी भेदज्ञान के सतत अभ्यास से ही जीव को आत्मा से पर पदार्थों का भेद ज्ञात होता है। कविवर बनारसीदास "ने समयसार नाटक में यह कहा है कि भेदविज्ञान का आलम्बन जीव को सांसारिक पदार्थों से ऐसे पृथक् कर देता है जैसे अग्नि स्वर्ण को किट्टका से पृथक् कर देती है। इष्टोपदेश 7 के अनुसार स्व-पर पदार्थों के भेद - ज्ञान के निरन्तर अभ्यास से जैसे-जैसे आत्मा का स्वरूप विकसित होता जाता है वैसे- वैसे ही सहज प्राप्त रमणीय पंचेन्द्रिय विषय भी अरुचिकर प्रतीत होते हैं। यदि श्रावक आचार्य कुन्दकुन्द विरचित नियमसार की वृत्ति में निर्दिष्ट उपदेशों का अनुसरण करे, सदैव इनका अवलम्बन करे- मैं राग रूप नहीं हूँ, द्वेष रूप नहीं हूँ, मोह रूप नहीं हूँ। क्रोध रूप नहीं हूँ। माया रूप नहीं हूँ। मैं विविध विकल्पों - भेदों से व्याप्त सभी विभाव पर्याय का निश्चय नय से करने वाला नहीं हूँ और करने वाले पुद्गल कर्मों का अनुमोदन करने वाला नही हूँ। मैं तो चित्-चैतन्य स्वरूप अपनी शुद्धात्मा का ही अनुभव करने वाला हूँ। इस प्रकार चिन्तन करते-करते सारे परभाव नष्ट हो जायेंगे । आचार्य गुणभद्र ने आत्मानुशासन में कहा है कि विवेकी जीव को चिर काल से परिचित इस शरीर में भी अत्यन्त निस्पृह होकर सुख-दुःख एवं जीवन-मरण आदि में सम होकर निरन्तर सद्ध्यान द्वारा परभावों का शमन करना चाहिए । जिसने ऐश्वर्य, पद-प्रतिष्ठा एवं सभी परिग्रहों को पर के रूप में जान लिया उसके लिए ममत्व या राग का कोई प्रयोजन नहीं है। भेद ज्ञान के परिणाम के सम्बन्ध में प्रो. सागरमल जैन" का यह मन्तव्य युक्तिसंगत है कि ज्ञान के स्तर पर तो स्व-पर का ज्ञान कठिन नहीं है। किन्तु अनुभूति के स्तर पर स्व- पर की भिन्नता स्थापित करना सरल नहीं है। प्रो. जैन के शब्दों में शरीर से, मनोवृत्तियों से और स्वयं के रागादि भावों से अपनी भिन्नता का बोध कराना अपेक्षाकृत कठिन से कठिनतर हो जाता है। मोक्ष एवं मोक्ष साधनों के प्रति राग कथंचित् इष्टआत्मानुशासन" के अनुसार अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट कर देने वाले प्राणी के जो तप और शास्त्रविषयक अनुराग होता है वह सूर्य की प्रभातकालीन लालिमा के समान उसके अभ्युदय के लिए होता है। योगीन्दुदेव ने परमात्मप्रकाश में कहा है- तू परमपवित्र मोक्ष मार्ग में प्रीतिकर - सिव पहि णिम्मलि करहि रह । भेदज्ञान की महत्ता बताते हुए आचार्य अमृतचन्द्रसूरि ने कहा है कि जो कोई कर्म से बंधे हैं वे इसी भेदविज्ञान के अभाव में । Page #31 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 24 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी - मार्च 2012 अतः श्रावक की वीतरागता का मूल है भेदविज्ञान । कविवर बनारसीदास का कथन यहां अत्यन्त प्रासंगिक है कि भेदविज्ञानरूपी वृक्ष जैसे ही सम्यक्त्व की धरती पर उगता है वैसे ही भेदविज्ञानी का यश स्वभावतः चारों दिशाओं में फैल जाता है। दया, वत्सलता, सुजनता, आत्म-निन्दा, समता, धर्मराग, मनप्रभावना, त्याग, धैर्य, प्रवीणता आदि अनेक गुण गुणमंजरी से गुथे रहते हैं साथ ही विरागता भी उत्पन्न होती है। बाह्य वस्तुओं में आसक्ति तोड़ने का सर्वसुलभ अमोघ उपाय है श्रावक द्वारा भेदज्ञान का अभ्यास । प्रत्येकं श्रावक का अन्ततः लक्ष्य योगीन्दुदेव'" द्वारा परमात्मप्रकाश में कथित यह उपदेश होना चाहिए - घरु परियणु लघु छंडि अर्थात् घर और परिजनों का शीघ्र त्याग करो । इस प्रकार लोभ जो सभी दुर्गुणों की जननी है पर सन्तोष से विजय प्राप्त करनी चाहिए | श्रावक के मन में जीवमात्र के प्रति वात्सल्य और करुणा होनी आवश्यक है। करुणा के अभाव में धर्म से श्रावक निष्ठुर हो जाता है। निश्चय ही यदि श्रावक भेदविज्ञान रूपी अन्तर्चक्षु से आत्मा और पर पदार्थों में भेद का अभ्यास आरम्भ कर दे तो वह व्यक्तिगत ही नहीं पूरे समाज और राष्ट्र के कल्याण में प्रभावकारी भूमिका निभा सकेगा । सन्दर्भ 1. तित्थयरे भगवंते अणुत्तरपरक्कमे अमियनाणी - गाथा 80, आवश्यकनिर्युक्ति, भद्रबाहु, निर्युक्तिसंग्रहः, सम्पा. विजयामृतसूरी, हर्षपुष्पामृत जैन ग्रन्थमाला 189, लाखाबावल, शान्तिपुरी, महाराष्ट्र, 1989, पृ09 2. तीर्थनामचातुर्वर्णः श्रमणसंघ :- आवश्यकनिर्युक्तिमलयगिरिवृत्ति, गाथा 233, पृ. 202 3. एहु धम्मु जो आयरइ बंभणु सदृदु वि कोइ । सो सावउ किंसावयह अण्णु किं सिरि मणि होइ । - सावयधम्मपण्णत्ती, 761, द्रष्टव्य, जैन लक्षणावली भाग 3, वीर सेवा मन्दिर, दरियागंज, दिल्ली 1973, पृ. 1069, 4. मूलोत्तरगुणनिष्ठाधितिष्ठन् पंचगुरुपदशरण्यः । दान- यजनप्रधानो ज्ञान- सुधां श्रावकः पिपासुः स्यात् । अधिकार 1 श्लोक 15, धर्मामृत (सागार), पं. आशाधर, सम्पा. एवं अनु. पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला, संस्कृत ग्रन्थांक 70, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, दिल्ली 1944, 5. न्यायोपात्तधनो यजन् गुणगुरून् सद्गीतिस्त्रिवर्ग भजन्नन्योन्यानुगुणंतवर्हगृहिणीस्थानालयो ह्रीमय: । - अधिकार 1, श्लोक 11, वही, 1 6. तत्त्वार्थवार्तिक, भट्ट अकलंकदेव, सम्पा. प्रो. महेन्द्रकुमार जैन, ज्ञानपीठमूर्ति देवी जैन ग्रन्थमाला सं. 11, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1944, 6, 135 Page #32 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 25 7. लाटीसंहिता, पं. राजमल्ल कवि, माणेकचन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला, मुम्बई 1927, 2.1 8. ललितविस्तरा, हरिभद्रसूरि, जैनपुस्तकोद्धार संस्था, मुम्बई, 1915, पृ. 16 १. बोधपाहुड, आचार्य कुन्दकुन्द, प्र. सम्पा. धर्मचन्द शास्त्री, भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत्परिषद्, पुष्प सं 10, 1995, गाथा 25, 10. कार्तिकेयानुप्रेक्षा, स्वामि कार्तिकेय, सम्पा. डा. आ. नेमि. उपाध्याय,श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम,अगास, 1960, 97, 11. धर्मो नाम कृपामूलः सा तु जीवानुकम्पनम् । अशरण्यशरण्यत्वमतो धार्मिकलक्षणम्।। लम्ब5, सूत्र 35, क्षत्रचूडामणि, वादीभसिंह, अनु. एवं सम्पा. ब्र. यशपाल जैन, अखिल भारतवर्षीय दिगम्बर जैन विद्वत् परिषद् ट्रस्ट,जयपुर 2001, 12. जम्बूस्वामिचरित, पं. राजमल्ल, मानेकचन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला, मुम्बई 1927, 12. 3.151 13. प्रश्नव्याकरणसूत्र, सम्पा. पं. अमरमुनि जी महा., सन्मति ज्ञानपीठ, आगरा 1973, छठां अध्ययन, अहिंसा संवर, पृ. 517-520, 14. दाणं पूजा मुक्खं सावयधम्मे ण सावया तेण विणा। झाणाज्झयणं मुक्खं जइधम्मे तं विणा तहा सोवि-गाथा 11, रयणसार ,आचार्य कुन्दकुन्द, श्री रामचन्द्र स्वाध्याय मन्दिर, अहमदाबाद 1979, 15. दानशीलोपवासार्चाभेदादापि चतुर्विध:17.51 -धर्मामृत, पं. आशाधर, सम्पा. एवं अनु. पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री, ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला, संस्कृत ग्रन्थांक 70,भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन. दिल्ली 1944. 16. गृहिणः पंच कर्माणि स्वोन्नतिर्देवपूजनम्। बन्धुसाहाय्यमातिथ्यं पूर्वेषां कीतिरक्षणम्।गृहिण: पंचकर्माणि स्वोन्नतिर्देवपूजनम्ाबन्धुसाहाय्यमातिथ्यं पूर्वेषां कीर्तिरक्षणम्।।-परिच्छेद 5, श्लोक 3 कुरलकाव्य, पं. गोविन्दराज जैन शास्त्री, झाँसी 1953 ,। 17. चारित्रसार, चामुण्डराय, माणेक चन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला,मुम्बई17, 43.1 18. मनुस्मृति, 1,86, द्रष्टव्य, दान दिव्य अनुष्ठान, श्रीमती मृदुला त्रिवेदी एवं श्री टी. पी. त्रिवेदी, कल्याण, दानमहिमा- अंक, सं. 1,गीताप्रेस, गोरखपुर, जनवरी 2011, पृ. 230-232, 19. रामचरितमानस, 7.103(ख) द्रष्टव्य, दान दिव्य अनुष्ठान, पृ. 230-232, 20.महाभारत, द्रष्टव्य, वही, 21. कल्याण, द्रष्टव्य, वही, 22. कवि रहीम, कल्याण, द्रष्टव्य, वही, Page #33 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 26 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 23. डा. पुष्पा गर्ग 'आध्यात्मिक उन्नति में दान की साधनरूपता' कल्याण, दानमहिमा- अंक, गीता प्रेस, गोरखपुर, वर्ष 85, संख्या 1, जनवरी 2011, पृ. 477-480 24. स्थानांगसूत्र, सम्पा. मधुकरमुनि, आगम प्रकाशन समिति, व्यावर (राज.)स्थान 10, सूत्र 135, 25. स्थानांगसूत्र, सम्पा. मधुकरमुनि, आगम प्रकाशन समिति, व्यावर (राज.)स्थान 10, सूत्र 135, 26. वही, स्थान 10, सूत्र 136, 27. प्रो. सागरमल जैन, भारतीय आचार-दर्शन-एक तुलनात्मक अध्ययन, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर एवं प्राच्य विद्यापीठ, शाजापुर, 2010, पृ. 283- 2851 28. वही, पृ. 283- 2851 29.समयप्राभृत, गाथा 253, आचार्य कुन्दकुन्द, भारतवर्षीय दिगम्बर जैन प्रकाशिनी संस्था, काशी 19151 30. जिनप्रणीत धर्मामृते नित्यानुरागता वात्सल्यम् -6,24,1 ,तत्त्वार्थवार्त्तिक, अकलंकदेव,भारतीय ज्ञानपीठ,काशी 1953, 31. आचारसार, वीरनन्दि, माणेक चन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला, मुम्बई 1917, 3. 64-65 32. चारित्रसार, चामुण्डराय, मुम्बई 1917, 43.1, 33. चादुव्वण्णे संघे चदुगदिसंसारणित्थरणभूदे । वच्छल्लं कादव्वं वन्दे गावी जहा गिद्धी।। अधिकार 5, गाथा 66,मूलाचार, आचार्य वट्टकर, सम्पा. डा. फूलचन्द्र जैन प्रेमी एवं डा. मुन्नी जैन, भारतवर्षीय अनेकान्त जैन परिषद् 1996, 34. अस्थि हीनं यथा कीटं सूर्यो दहति तेजसा, ___ तथा दहति धर्मश्च प्रेमशून्यं नृकीटकम्।। परिच्छेद 8, श्लोक,7, कुरलकाव्य, झाँसी 1953, 35. मतेनैकेनापि तीर्थकरनामकर्मबन्धो भवति।- 57.1,चारित्रसार,चामुण्डराय, 36. मोहणीयक्खएण वीयराओ-धवला पु. 9, वीरसेन, सम्पा. डा. हीरा लाल जैन, जैन साहित्योद्धारक फण्ड कार्यालय, अमरावती,1939,पृ. 118, 37. प्रवचनसार, आचार्य कुन्दकुन्द, सम्पा. आ. नेमिनाथ उपाध्ये,परमश्रुत प्रभावक मण्डल, श्रीमद्राजचन्द्र आश्रम, अगास (मुज.), 1984, गाथा 89 की 90 वृत्ति। 38. पाइअसहमहण्णवो, प्राकृत टेक्स्ट सोसाइटी, वाराणसी, पृ. 235, 39. आवश्यकहारिभद्रीयवृत्ति, हरिभद्र, आगमोदय समिति, मेहसाना 1917, 109, पृ. 77, 40. पंचसंग्रह-स्वोपज्ञवृत्ति, भारतीय ज्ञानपीठ, काशी, 1960 2-123, पृ. 25, Page #34 -------------------------------------------------------------------------- ________________ भेदविज्ञान द्वारा श्रावक-लोभसंवरण : 27 41. सुख-दुखबहुशस्यं कर्मक्षेत्रं कृषन्तिीति कषायाः। कषन्तीति कषायाः-धवला, वीरसेन, सम्पा. डा. हीरा लाल जैन, जैन साहित्योद्धारक फण्ड कार्यालय, अमरावती,1939 पुस्तक1, पृ. 141, 42. कम्मं कसभवो वा कसमाओ सिंजओ कसाया तो। कसमाययंतिव जओ गमयंति कसंकसायत्ति।। गाथा 3545,विशेषावश्यकभाष्य, जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण, सम्पा. वज्रसेनविजयगणि, भद्रंकर प्रकाशन, अहमदाबाद तृ. सं. 1996, भाग 2, पृ. 549, 43. अज्झवसाणविसुद्धी कसायसंल्लेहणा भणिदा-गाथा 261 भगवती आराधना, आचार्य शिवार्य, सम्पा. एवं अनु. जैन संस्कृति संरक्षक संघ, शोलापुर, तृ. सं. 2006, 44. सद्ध्यानप्रकरैः कषायविषया सल्लेखना श्रेयसी10-10, आचारसार वीरनन्दि, माणेक चन्द दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला, मुम्बई 1917, 45. भारतीय आचार दर्शन: एक तुलनात्मक अध्ययन, भाग दो, डॉ. सागरमल जैन, प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर एवं प्राच्य विद्यापीठ, शाजापुर, 2010, पृ. 46. धवला, वीरसेन, सम्पा. डा. हीरा लाल जैन, जैन साहित्योद्धारक फण्ड कार्यालय, अमरावती,1949,पुस्तक9, पृ. 141, 47. दानाहेषु स्वधनाप्रदानं परधनग्रहणं वा लोभः- समुद्देश 4,श्लोक 4, नीतिवाक्यामृतम्, आचार्य सोमदेवसूरि, अनु., सम्पा. एवं प्रकाशक सुन्दरलाल शास्त्री, 1976, 48. दानाहेषु स्वधनाप्रदानं निष्कारणं परग्रहणं च लोभ:-1.56 योगशास्त्र, आचार्य हेमचन्द्र, मोती लाल बनारसीदास, दिल्ली, 49. स्थले धनव्ययाभावो लोभः-135, नियमसारवृत्ति, अमृतचन्द्रसूरि 50. डा. मुनि भुवनेश, जैन आगमों के आचार दर्शन और पर्यावरण संरक्षण का मूल्यांकन, सर्जना प्रकाशन जयपुर 1998, पृ. 259, 51. इसिभासियाइं (ऋषिभाषितानि), प्र. सम्पा. आचार्य महाप्रज्ञ, सम्पा. एवं अनु. डॉ. समणी कुसुम प्रज्ञा, जैन विश्व भारती, लाडनूं, 2011, पृ. 113 52. बृहदारण्यकोपनिषद् (सानुवाद शांकरभाष्यसहित), गीताप्रेस, गोरखपुर, नवम सं., 2001 3.5.1 53. आत्मानुशासन, आचार्य गुणभद्र 54. उत्तराध्ययनसूत्र, मधुकर मुनि, ब्यावर 1984, 9.48 एवं 8.17 55. स्थानांगसूत्र, मधुकर मुनि, ब्यावर 1981, स्थान 4, उद्दे. 2, सू. 284, 56. आचारांगसूत्र,मधुकर मुनि, 1.2.31, 57. वही, 58. लोभो सव्वविणासणो-8.38,दशवकालिकसूत्र, मधुकर मुनि, 59. अमरुक उद्धृत, सुभाषितरत्नभाण्डागारम् , निर्णय सागर प्रेस, बम्बई 1911, 72.4 60. सुभाषितरत्नभाण्डागारम्,बम्बई 1911, 72.4 Page #35 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 28 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 61. भगवती आराधना, पूर्वोक्त, शोलापुर, तृ. सं. 2006,गाथा 138362. वही, 63. वही, 64. वही, गाथा 1383, 65. वही 66. आचारांगसूत्र, मधुकर मुनि, 2.3.15.2 67. लोभो सव्वविणासणो-8.38, दशवैकालिकसूत्र, मधुकर मुनि, 68. ज्ञानार्णव, शुभचन्द्र,परमश्रुत प्रभावक मण्डल, बम्बई,1927, 69. आशागतः प्रतिप्राणि यस्मिन् विश्वमणूपमम्। कस्य किम् कियदायाति वृष वो विषयैषिता।। -ज्ञानार्णव, शुभचन्द्र, 70. आशादासीकृता येन तेन दासीकृता जगत्। आशाया यो भवेद्दासः स दासः सर्वदेहिनाम्।। -अष्टपाहुड, आचार्य कुन्दकुन्द, हिन्दी अनु. पं. पन्नालाल साहित्याचार्य, भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत्परिषद् पुष्प सं. 10, प्रथम संस्करण 1995, पृ. गाथा सं. 49 की वृत्ति पृ. 217-218, 71. लोभं संतोषओ जिणे , दशवैकालिकसूत्र, मधुकर मुनि, 8.38 72. आचारांगसूत्र, मधुकर मुनि, 72. धम्मेण चेव वित्तिं कप्पेमाणा विहरति- सूत्रकृतांग, मधुकर मुनि, 2.2.36, 73. सव्वं जगं तु समयाणुपेही। सूत्रकृतांग, मधुकर मुनि, 1.9.7, 74. आय तुले पयासु, सूत्रकृतांग, मधुकर मुनि, 1.11.3, 75. उत्तराध्ययनसूत्र, मधुकर मुनि, 4.8, 76. उत्तराध्ययनसूत्र, मधुकर मुनि, 32. 8, 77. धवला, पूर्वोक्त, अमरावती,1939, पृ. 118, 78. डा. सागरमल जैन, पूर्वोक्त, वाराणसी, पृ. 417, 79. आचारांगसूत्र, मधुकर मुनि, 3.2 80. आचारांगसूत्र, मधुकर मुनि, 3.3, 81. कविवर बनारसीदास, सत्साहित्य प्रकाशन, कुन्दकुन्द कहान दिगम्बर जैन तीर्थ सुरक्षा ट्रस्ट, षष्ठ संस्करण 1988, जीवद्वार 32, *** Page #36 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेद आचार्य राजकुमार जैन यशस्तिलक चम्पू जैन साहित्य का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है जो गद्य और पद्यमय शैली में संस्कृत भाषा में रचित है। इसकी रचना सोमदेव सूरि ने की है और इसमें महाराज यशोधर के जीवन चरित्र को आधार बनाया गया है। यह ग्रन्थ जैन साहित्य का ही नहीं, अपितु संस्कृत साहित्य की अमूल्य निधि है। सम्पूर्ण ग्रन्थ में दो हजार तीन सौ ग्यारह पद्य तथा शेष गद्य हैं। सोमदेव ने गद्य और पद्य दोनों मिलाकर आठ हजार श्लोक प्रमाण बतलाया है। यशस्तिलक चम्पू की पुष्पिका में यह उल्लिखित है कि चैत्र शुक्ला 13 शक संवत् 881 (1016 वि0सं0- 959 ई0) में श्री कृष्णराज देव पाण्ड्य के सामन्त एवं चालुक्यवंशीय अरिकेशरी के प्रथम पुत्र वट्दिगराज की राजधानी गंगधारा में सोमदेव ने इस ग्रन्थ की रचना पूर्ण की थी। राष्ट्रकूट के अमोघवर्ष के तृतीय पुत्र कृष्णराजदेव (जिनका दूसरा नाम अकाल वर्ष भी था) का राज्यकाल 867 से 894 सम्वत् तक रहा। इस दृष्टि से सोमदेव का स्थिति काल और उनकी कृति यशस्तिलक चम्पू का रचनाकाल सुस्पष्ट है। सोमदेव एक समन्वयवादी विचारधारा के उदारचेता विद्वान् थे। यही कारण है कि जैमिनि, कपिल, चार्वाक, कणाद आदि के शास्त्रों पर भी उनका समान भाव से आदर था। उनके इस उदार दृष्टिकोण का आभास उनके ग्रन्थों का अध्ययन करके सहज ही हो जाता है। उन्हें व्याकरण, कला, छन्द, अलंकार आदि विषयों पर पाण्डित्यपूर्ण अधिकार था। यही कारण है कि ये विषय उनकी कृतियों में पर्याप्त रूप से मुखरित हुए हैं। इसके साथ ही यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि आयुर्वेदशास्त्र और उसके मौलिक सिद्धान्तों का पर्याप्त ज्ञान उन्हें था। उन्होंने यशस्तिलक चम्पू में पर्याप्त रूप से इन विषयों की विवेचना की है तथा साधिकार उनका प्रतिपादन किया है जो आयुर्वेद की दृष्टि से निश्चय ही महत्त्वपूर्ण है। आयुर्वेद के अनुसार उचित मात्रा और परिणाम में सेवन किया गया आहार अमृत तुल्य होता है, जबकि अधिक मात्रा में सेवित हितकारी पदार्थ भी विषतुल्य हो जाते हैं। सोमदेव ने जल का सेवन इसी प्रकार अमृत और विष की भांति बतलाया है। अर्थात् उचित समय पर उचित मात्रा में पिया गया जल अमृत है और अनुचित समय में अव्यवस्थित रूप से पिया गया जल विष की भांति Page #37 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 30 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी - मार्च 2012 हानिकारक है। अतः खान-पान में समय, मात्रा आदि का ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है। वे लिखते हैं अमृतं विषमिति चेतत् सलिलं निगदन्ति विदिततत्त्वार्थः । युक्त्या सेवितममृतं विषमेतदयुक्तितः पीतम् ।।' सेवन योग्य पथ्यजल और त्याज्यजल का निर्देश करते हुए ग्रन्थकार ने जल सम्बन्धी अपने परिष्कृत ज्ञान का परिचय दो श्लोकों में निम्न प्रकार से दिया है2अव्यक्तरसगन्ध यत्स्वच्छं वातातपाहतम्। प्रकृत्येनाम्बु तत्पथ्यमन्यत्र क्वथितं पिबेत् || 371 वारि सूर्येन्दुससिद्धमहोरात्रात्परं त्यजेत् । दिवासिद्धं निशि त्याज्यं निशि सिद्धं दिवा त्यजेत् 113721 अर्थात् जिसका रस व गन्ध अव्यक्त प्रकट रूप से नहीं जाना जाता हो, जो स्वच्छ हो, वायु और आतप (धूप) से आहत हो वह जल स्वभाव से ही पथ्य होता है। इसके विपरीत अर्थात् व्यक्तरस और गन्ध वाला, मलिन तथा वायु में आतप नहीं लगाया गया जल उबालकर पीना चाहिए। इसी प्रकार दिन में उबाला हुआ जल रात्रि में नहीं पीना चाहिए। केवल दिन में ही पीना चाहिए और रात्रि में उबाला हुआ जल दिन में नहीं पीना चाहिए, केवल रात्रि में ही पीना चाहिए । यहाँ पर एक विशेष प्रकार के जल का उल्लेख किया गया है जो "सूर्येन्दु संसिद्ध जल" कहलाता है। इसकी विधि यह है कि जल से भरा हुआ घड़ा पहले दिनभर धूप में खुला हुआ रखना चाहिए और पश्चात् रातभर चन्द्रकिरणों में खुला रखना चाहिए। इसी प्रकार सूर्य की किरणों से संतप्त और रात्रि में चन्द्र की किरणों से शीतल जल " सूर्येन्दु संसिद्ध जल" कहलाता है। इस जल का सेवन अगले दिन रात-भर करना चाहिए। उसके पश्चात् वह त्याज्य है। आयुर्वेद शास्त्र में इस जल को " हंसोदक" जल कहा गया है और यह केवल शरद ऋतु में ही सिद्धि योग्य एवं सेवनीय होता है। इस जल के विषय में महर्षि चरक का निम्न कथन द्रष्टव्य हैदिवासूर्याशुसंतप्तं निशिं चन्द्रांशुशीतलम् । कालेन पक्वं निर्दोषमगस्त्येनाविषी कृतम् ॥ हंसोदकमिति ख्यातं शारदं विमलं शुचिः । स्नानपानावगाहेषु शस्यते तद्यथा मृतम् ॥ अर्थात् दिन में सूर्य की किरणों से संतप्त और रात्रि में चन्द्रमा की किरणों से शीतल किया हुआ, काल स्वभाव से परिपक्व, अतः दोषरहित और अगस्त्य नक्षत्र के प्रभाव से विष रहित किया गया जल "हंसोदक" के नाम से जाना Page #38 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेद : 31 जाता है जो शारदीय, विमल और पवित्र होता है। यह हंसोदक स्नान, पान-अवगाहन में अमृतवत् प्रशस्त होता है। महर्षि चरक के इस हंसोदक जल तथा आचार्य वाग्भटोक्त' हंसोदक जल की निर्माण विधि का अनुसरण करते हुए ही आचार्य सोमदेव ने "सूर्येन्दु संसिद्ध जल" का कथन किया है। अतः दोनों में केवल नाम का अन्तर समझना चाहिए, निर्माण विधि आदि में कोई अन्तर नहीं है। इस सन्दर्भ में इतना अवश्य ध्यान देने योग्य है कि आयुर्वेदीय ग्रन्थों में हंसोदक जल के सेवन का उल्लेख मात्र शरद ऋतु में है जबकि यशस्तिलक में " सूर्येन्दु संसिद्ध जल" के सेवन के लिए किसी ऋतु विशेष का उल्लेख नहीं है। आयुर्वेदशास्त्र में प्रतिपादित है कि वात-पित्त-कफ ये तीन दोष मानव शरीर के लिए अति महत्त्वपूर्ण हैं और इनसे मनुष्य की प्रकृति का निर्माण होता है । शरीर में ऋतुओं के अनुसार इन दोषों का संचय, प्रकोप और प्रशमन स्वत: ही होता रहता है। यशस्तिलक में इनका सुन्दर विवेचन किया गया है जो निम्न प्रकार हैशिशिर सुरभिघर्मेस्वतपाम्भः शरत्सु क्षितिपजल शरदहेमन्तकालेषु क्षैते । कफपवनहुताशाः संचयं च प्रकोपं प्रशममिह भजन्ते जन्मभाजां क्रमेण । । * उपर्युक्त श्लोक का सारांश निम्न प्रकार से समझा जा सकता है दोष संचय प्रकोप कफ शिशिर ग्रीष्म वर्षा वसन्त वर्षा प्रशमन ग्रीष्म वात शरद पित्त शरद हेमन्त वातादि दोषों के उपर्युक्त प्रकार से संचय, प्रकोप और प्रशमन को ध्यान में रखते हुए लोगों को अपने खान-पान की व्यवस्था करनी चाहिए और उसपर पूरा ध्यान देना चाहिए। अतः किस ऋतु में किस प्रकार का आहार उचित है - इसका निर्देश भी यशस्तिलक' में सुन्दर ढंग से किया गया है जो निम्न प्रकार हैखाद्य-पेय रस ऋतु शरद- स्वादु (मधुर) तिक्त, कषाय रस प्रधान आहार । वर्षा - मधुर, अम्ल, लवण रस प्रधान आहार । वसन्त- तीक्ष्ण, तिक्त, कषाय रस प्रधान आहार । ग्रीष्म- प्रशम रस वाला आहार । इसी प्रकार ऋतु के अनुसार खाद्य-पेय सामग्री का निर्देश भी सोमदेव ने बड़े अच्छे ढंग से किया है। Page #39 -------------------------------------------------------------------------- ________________ शरद 32 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 ऋतु खाद्य-पेय सामग्री शिशिर ताजा भोजन, खीर, उड़द, इक्षु, दधि, घृत और तेल से बने पदार्थ पुरन्ध्री। वसन्त जौ और गेहूँ से बना प्रायः रुक्ष भोजन। ग्रीष्म सुगन्धित चावलों का भात, घी डली हुई मूंग की दाल, विष (कमल नाल), किसलय (मधुर पल्लव), कन्द, सत्तू, पानक (ठंडई), आम, नारियल का पानी तथा चीनी मिश्रित दूध या पानी। वर्षा पुराने चावल, जौ तथा गेहूँ से बने पदार्थ। घृत, मूंग, शालि, लप्सी, दूध से निर्मित पदार्थ खीर आदि परवल, दाख (अंगूर), ऑवला, ठंडी छाया, मधुर रस वाले पदार्थ, कन्द, कौंपल, रात्रि में चन्द्र किरण आदि। उपर्युक्त विवेचन के पश्चात् सोमदेव ने ऋतुओं के अनुसार रसों का सेवन कम-ज्यादा मात्रा में करने का निर्देश दिया है। उनके अनुसार वैसे छहो रसों का व्यवहार सर्वदा सुखकर होता है।' भोजन के विषय में और भी अनेक प्रकार की ज्ञातव्य बातों का उल्लेख यशस्तिलक में किया गया है जिनका अतिसपेक्षतः यहाँ उल्लेख किया जा रहा है। मूल ग्रंथ में पृ0 510 पर श्लोक 330 से 344 तक विशद् रूप से इसका विवेचन किया गया है। आहार, निद्रा और मलोत्सर्ग के समय शक्ति तथा बांधायुक्त मन होने पर अनेक प्रकार के बड़े-बड़े रोग हो जाते हैं।' भोजन करते समय उच्छिष्ट भोजी, दुष्टप्रवृत्ति, रोगी, भूखा तथा निन्दनीय व्यक्ति पास में नहीं होना चाहिए। विवर्ण, अपक्व, सड़ा, गला, विगन्ध, विरस, अतिजीर्ण, अहितकर तथा अशुद्ध अन्न नहीं खाना चाहिए।' हितकारी, परिमित, पक्व, क्षेत्र, नासा तथा रसना इन्द्रिय को प्रिय लगने वाला. सुपरीक्षित भोजन न जल्दी-जल्दी और न धीरे-धीरे अर्थात् मध्यम गति से करना चाहिए। विषयुक्त भोजन को देखकर कौआ और कोयल विकृत शब्द करने लगते हैं, नकुल और मयूर आनन्दित होते हैं, क्रौन्च पक्षी अलसाने लगता है, ताम्रचूड़ मुर्गा रोने लगता है, तोता वमन करने लगता है, बन्दर मलत्याग कर देता है, चकोर के नेत्र लाल हो जाते हैं, हंस की चाल डगमगाने लगती है और भोजन पर Page #40 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेद : 33 मक्खियाँ नहीं बैठती। जिस प्रकार नमक डालने से अग्नि चटचटाती है उसी प्रकार विषयुक्त अन्न के सम्पर्क से भी अग्नि चटचटाने लगती है।" पुनः गर्म किया हुआ भोजन, अंकुर निकला हुआ अन्न तथा दस दिन तक काँसे के बर्तन में रखा गया घी नहीं खाना चाहिए। दही व छाछ के साथ केला, दूध के साथ नमक, कांजी के साथ कचौड़ी-जलेबी, गुड़, पीपल, मधु तथा मिर्च के साथ काकमाची (मकोय), मूली के साथ उड़द की दाल, दही की तरह गाढ़ा सत्तू तथा रात्रि में कोई भी तिल विकार (तिल से बने पदार्थ) नहीं खाना चाहिए।12 . घृत एवं जल को छोड़कर रात्रि में बने हुए पदार्थ, केश या कीटयुक्त पदार्थ तथा फिर से गरम किया हुआ भोजन नहीं करना चाहिए। अत्यशन, लघ्वशन, समशन और अध्यशन नहीं करना चाहिए। प्रत्युत बल और जीवन प्रदान करने वाला उचित भोजन करना चाहिए। अत्यशन- भूख से अधिक खाना। लघ्वशन- भूख से कम खाना। समशन- पथ्य और अपथ्य दोनों खाना। अध्यशन- खाये हुए भोजन पर पुनः भोजन करना। इन चारो अशन का त्याग करना अभीष्ट रहता है। इसके पश्चात् सज्जन नामक वैद्य द्वारा यशोधर महाराज को उपदेश दिया गया कि भोजन के उपरान्त मनुष्य को कौन से कार्य नहीं करने चाहिए। यथाकामकोपातपायासयानवाहनवह्नयः। भोजनान्नतरं सेव्या न जातु हितमिच्छिता ।।14 अर्थात् स्वास्थ्य हित की इच्छा रखने वाले मनुष्य को भोजन करने के उपरान्त कभी भी स्त्री-सेवन, क्रोध, धूप सेवन, परिश्रम करने वाले कार्य, शीघ्रगमन, घोड़े, गाड़ी आदि की सवारी और आग तापना- ये कार्य नहीं करना चाहिए। आयुर्वेदशास्त्र में भी इन्हीं कार्यों का निषेध किया गया है। आचार्य वाग्भट्ट ने भोजन के बाद निम्न कार्य करने का निषेध किया है-15 सर्वश्च भाराध्वशयनं त्यजेत्। पीत्वा, भुक्त्वा तपं वहिनं यानं प्लवनवाहनम्।।-अष्टांग हृदय, सूत्रस्थान, 8/54 अर्थात् सभी स्वस्थ या रोगी मनुष्य अनुपान पीकर बोलना, मुसाफिरी और शयन करना छोड़ देवें। भोजन करके, भोजन के बाद धूपसेवन, अग्नितापन, शीघ्रगमन, तैरना और वाहन की सवारी करना छोड़ देवें। Page #41 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 34 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 स्वास्थ्य हित की दृष्टि से भोजन के पश्चात् उपर्युक्त सावधानी का निर्देश करते . हुए श्रीमत्सोमदेव ने मनुष्य के वैयक्तिक स्वास्थ्य के प्रति जिस सजगता का परिचय दिया है वह उनके मानसिक एवं बौद्धिक चिन्तन का परिणाम है। क्योंकि भोजन में और भोजन के पश्चात् यदि अपेक्षित सावधानी नहीं बरती जाती है और निरन्तर अपथ्य का आचरण किया जाता है तो कालान्तर में गम्भीर विकारोत्पत्ति रूप परिणाम भुगतना पड़ सकता है जो स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नहीं होने से अपाय कारक है। रात्रि-शयन या निद्रा सोमदेव ने सुखपूर्वक पर्याप्त निद्रा को स्वास्थ्य के लिए अत्यावश्यक एवं उपयोगी बतलाया है। उनके अनुसार सुख की नींद सोकर जगने पर मन और इन्द्रियाँ प्रसन्न हो जाती हैं, पेट हल्का हो जाता है और पाचन क्रिया ठीक रहती है। यथाअधिगतसुखनिद्रः सुप्रसन्नेन्द्रियात्मा सुलधुजठरवृत्ति भुक्तपक्तिं दधानः। इसी भॉति जिस प्रकार खुली स्थाली (पाक पात्र) में अन्न ठीक से नहीं पकता उसी प्रकार पर्याप्त नींद लिये बिना और व्यायामहीन मनुष्य के भोजन का सम्यक् परिपाक नहीं होता। यथास्थाल्यां यथा नावरणाननायामपहितायां च न साधुपाकः । अनाप्तनिद्रस्य तथा नरेन्द्र व्यायामही नत्थ च नान्नपाकः।।" वेगावरोध का परिणाम शौच या मूत्र-विसर्जन की बाधा होने पर उसकी निवृत्ति शीघ्र कर लेनी चाहिए। मल और मूत्र का वेग रोकने से भगन्दर व्याधि उत्पन्न हो जाती है। यथाभगन्दरी स्थन्दविबन्धकाले।" अभ्यंग और उद्वर्तन प्राचीन काल में शरीर की तेल से मालिश करने के लिए अभ्यंग शब्द का व्यवहार किया जाता था। आयुर्वेद में भी अभ्यंग शब्द ही प्रयुक्त किया गया है। सोमदेव के अनुसार अभ्यंग श्रम और वायु को दूर करता है, बल को बढ़ाता है तथा शरीर की दृढ़ता को दूर करता है। यथाअभ्यंगः श्रमवातहः बलकरः कायस्थ दादर्यावहः।" उद्वर्तन या उबटन शरीर में कान्ति बढ़ाता है, भेद, कफ व आलस्य को दूर करता है- स्यादुद्वर्तनमंगकान्तिकरणं भेदः कफालस्यजित्।३० Page #42 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेद : 35 स्नानसोमदेव ने स्नान की उपयोगिता प्रतिपादित करते हुए उससे होने वाले लाभ और उसके गुणों का सुन्दर वर्णन किया है जो आयुर्वेद में प्रतिपादित सिद्धान्तों से पूर्ण मेल खाता है। यथाआयुष्यं हृदयप्रसादि वपुषः कण्डूक्लमच्छेदि च। स्नानं देव यथर्तुसेवितमिदं शीतैरशीतैर्जलैः।। अर्थात् ऋतु के अनुसार ठंडे या गरम जल से किया गया स्नान आयु को बढ़ाता है, हृदय को प्रसन्न करता है तथा शरीर की खुजली और थकावट को दूर करता श्रमद्यमार्तदेहानामाकुलेन्द्रियचेतसाम् । तव देवद्विषां सन्तु स्नानपानाशनक्रियाः।। अर्थात् परिश्रम और धूप से पीड़ित शरीर वाले इन्द्रिय व चित्त की व्याकुलता वाले आपके शत्रुओं के स्नान, खान, पान की क्रिया हों। अभिप्राय यह है कि जो शारीरिक श्रम व धूप से पीड़ित एवं जिनकी इन्द्रियों एवं मन व्याकुल हों उन्हें स्नान, खान, पान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर अनेक उपद्रव हो सकते हैं, जो निम्न प्रकार हैंदूग्मान्ध भागात्तपितोऽम्बुसेवी श्रान्तः कश्ताशी वमनज्वराईः । भगन्दरी स्यन्दविबन्धकाले गुल्मी जिहत्सुविहिताशनश्च॥ अर्थात् धूप में से आकर तत्काल पानी पीने वाला इष्टिमांथ से पीड़ित होता है, परिश्रम के कारण थका हुआ व्यक्ति यदि तत्काल भोजन करता है तो वमन और ज्वर के योग्य होता है। मल-मूत्र के वेग को रोकने वाला भगन्दर और गुल्म रोग से पीड़ित होता है। विधिपूर्वक स्नान करना और तत्पश्चात् करणीय कार्यों की सुन्दर विवेचना सोमदेव द्वारा यशस्तिलक में की गई है। देखिएस्नानं विधाय विधिवत्कश्तदेव कार्यः संतर्पितोऽतिथिजलः सुमनाः सुवेषः। आप्रवृतो रहसि भोजनकृतथा स्यात् सायं यथा भवति भुक्तिकरोऽभिलाषः।। अर्थात् स्नान करने के पश्चात् विधिपूर्वक देवपूजा आदि कार्य करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और प्रसन्न मन से अतिथि सत्कार करके आप्त विश्वस्त व्यक्तियों के साथ उतना भोजन करें जिससे सायंकाल फिर भूख लग जाय। (इससे रात्रिभोजन का निषेध होता है।) सोमदेव ने यशस्तिलक चम्पू में अजीर्ण चार प्रकार का बतलाया है। यथा1. जौ इत्यादि हल्के पदार्थों के खाने से उत्पन्न। Page #43 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 36 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 2. गेहँ आदि पदार्थों के खाने से उत्पन्न। 3. दाल आदि दो दल वाले पदार्थों के सेवन से उत्पन्न। 4. घृत आदि स्निग्ध पदार्थों के सेवन से उत्पन्न। इस चार प्रकार के अजीर्ण को दूर करने के लिए चार उपायों का प्रतिपादन भी यशस्तिलक में किया गया है जो निम्न प्रकार है1. जौ आदि से उत्पन्न अजीर्ण को दूर करने के लिए ठंडा पानी पीना चाहिए। 2. गेहूँ आदि से उत्पन्न अजीर्ण को दूर करने के लिए क्वथित जल (गरम जल) पीना चाहिए। 3. दाल आदि द्विदल पदार्थों के सेवन से उत्पन्न अजीर्ण को दूर करने के लिए अवन्तिसोम (कांजी) पीना चाहिए। 4. घृत आदि के सेवन से उत्पन्न अजीर्ण के लिए कालसेय (तक्र) पीना चाहिए। इसी को सोमदेव ने निम्न प्रकार से निबद्ध किया है-25 यवसमिथविदाहिष्वम्बुशीतं निषेव्यं, क्वथितमिदमुपास्यं दुर्जरेऽन्ने च पिषटे। भवति विदलकालेऽवन्तिसोमस्य पानं, घृतविकृतिषु पेयं कालसेयं सदैव ।। इस प्रकार यशस्तिलक चम्पू काव्य के तृतीय आश्वास में श्लोक संख्या 322 से 374 तक विविध छन्दों में स्वास्थ्य सम्बन्धी हिताहित विवेक का प्रतिपादन प्रांजल भाषा के माध्यम से जिस रूप में किया गया है उससे जहाँ ग्रन्थ की प्रांजलता लक्षित होती है वहीं ग्रन्थकर्ता के आयुर्वेद विषयक परिपूर्ण एवं परिपक्व ज्ञान का आभास सहज ही हो जाता है। क्योंकि यह सम्पूर्ण वर्णन आयुर्वेद के स्वास्थ्य सम्बन्धी मौलिक सिद्धान्तों पर आधारित है। आयुर्वेद शास्त्र मात्र चिकित्सा विज्ञान या वैद्यक शास्त्र ही नहीं है, अपितु वह सम्पूर्ण जीवन विज्ञान शास्त्र है जिसमें मानव जीवन की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं नैतिक प्रवृत्तियों की विवेचना सूक्ष्मता एवं गम्भीरतापूर्वक की गई है। मानव जीवन के प्रत्येक क्षण की प्रवृत्तियाँ आयुर्वेदशास्त्र में प्रतिपादित हैं। अतः यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि वह आयुर्वेदशास्त्र मानव जीवन के सर्वाधिक निकट है। महाकवि सोमदेव ने इस विषय को जिस प्रांजलता एवं प्रौढ़ता के साथ अपने काव्य में निबद्ध किया है वह उनके भाषा ज्ञान की प्रौढ़ता का द्योतक है। प्रस्तुत चम्पूकाव्य में लोकहित की भावना को दृष्टिगत रखते हुए ही सम्भवतः आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त की इस प्रकार की प्रस्तुति की गई है। इस प्रस्तुति में कवि ने अपनी जिस मौलिक काव्य प्रतिभा एवं सारगर्भिता का परिचय दिया है वह Page #44 -------------------------------------------------------------------------- ________________ यशस्तिलक चम्पू में आयुर्वेद सम्बन्धी विषय : 37 विलक्षण है। क्योंकि स्वास्थ्य सम्बन्धी जो सिद्धान्त आयुर्वेदशास्त्र में जिस रूप में प्रतिपादित हैं उनमें से अधिकांश प्रस्तुत काव्य में प्रतिपादित किये गए हैं, किन्तु विशेषता यह है कि कवि ने अपने काव्य-सौष्ठव एवं पदलालित्य के द्वारा विषय को अधिक सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है। आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त जैसे रुक्ष एवं गम्भीर विषय को अलंकारों की विविधता, रसों की प्रासंगिकता तथा छन्दों की सरस निबद्धता के साथ जिस प्रकार प्रस्तुत किया है उससे विषय की दुरूहता तो समाप्त हुई ही है, उसकी रोचकता में अपेक्षित वृद्धि हुई है। ग्रन्थकर्ता की काव्य-प्रतिभा का वैशिष्ट्य इसी से जाना जाता है कि यह गम्भीर और रुक्ष विषय को कितनी रोचकता एवं सरसता के साथ प्रस्तुत करता है। कविवर सोमदेव ने आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त-प्रतिपादन में जाति, यथासंख्य, अतिशय आदि अलंकारों का आधार लेकर ग्रन्थ के काव्य सौन्दर्य में निश्चय ही वृद्धि की है। इसी प्रकार छन्दों में अनुष्टुप, इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा, मालिनी, वसन्ततिलका, शार्दूलविक्रीडित, वंशस्थ आदि के द्वारा न केवल लालित्य और सरसता को द्विगुणित किया है, अपितु काव्य और काव्य में प्रतिपादित विषय को सजीव बनाने के प्रयास में मानों प्राण संचार ही किया है। इस प्रकार काव्य रचना प्रवण ग्रन्थकर्ता ने रस, छन्द और अलंकार की त्रिवेणी प्रवाहित कर जिस अद्भुत् काव्य रचना कौशल का परिचय दिया है वह अपने आप में अद्वितीय है। प्रस्तुत काव्य में आयुर्वेद की दृष्टि से विषय-प्रतिपादन और काव्य की दृष्टि से छन्द, अलंकार आदि का प्रयोग इन दोनों का मेल उनके पाण्डित्य, मर्मज्ञता एवं रसज्ञता के अद्भुत् सामंजस्य का संकेत करता है जो विरले ही व्यक्ति में पाया जाता है। इस सभी दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि यशस्तिलक चम्पू एक ऐसा सरस एवं मनोहारी काव्य ग्रन्थ है जिसमें आयुर्वेदीय स्वस्थवृत्त का प्रतिपादन अत्यन्त व्यवस्थित ढंग से किया गया है जो ग्रन्थ की मौलिक विशेषता है। निश्चय ही आयुर्वेद के स्वस्थवृत्त जैसे विषय को काव्य रूप प्रदान कर ग्रन्थकार ने आयुर्वेद के प्रति अपना अद्वितीय योगदान किया है। इससे एक ओर जहाँ आयुर्वेद को गौरव प्राप्त हुआ है दूसरी ओर वहाँ जैनाचार्यों की आयुर्वेदज्ञता प्रमाणित हुई है। प्रस्तुत काव्यग्रन्थ में विविध विषयों का प्रामाणिक वर्णन कर श्रीमत्सोमदेव ने अपने बुद्धि-वैशिष्ट्य एवं बहुश्रुतता को निश्चय ही प्रमाणित किया है। सन्दर्भ 1. यशस्तिलकचम्पू, भारतवर्षीय अनेकान्त विद्वत् परिषद्, 3/368 2. वही, श्लोक 3/371-372 Page #45 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 38 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 3. तप्तं तप्तांशुकिरणैः शीतं शीतांशुर शिमभिः। समन्तादप्यहोरात्रमगस्त्योदयनिर्विषम्।। शुचि हंसोदकं नाम निर्मलं मलविज्जलम्। नाभिष्यन्दि न वा रूक्षं पानादिष्वमृतोपमम्॥ -अष्टांगहृदयम्, वाग्भट्ट, सूत्रस्थान 3/51-52 4. यश., पृ. 514, श्लोक 348 5. वही, पृ. 514, श्लोक 349 6. वही, पृ. 509, श्लोक 328-329 7. वही, पृ. 509, श्लोक 328-329 8. वही, पृ. 510, श्लोक 335 १. वही, पृ. 510, श्लोक 336 10. वही, पृ. 520, श्लोक 337 ' 11. वही, पृ. 510, श्लोक 338-40 12. वही, पृ. 510, श्लोक 341-344 13. वही, पृ. 513, श्लोक 345 14. वही, श्लोक 374 15. अष्टांगहृदयम्, सूत्रस्थान, 8/54 16. वही, पृ. 507 17. वही 18. वही, पृ. 509 19. वही, पृ. 508 20. वही 21. वही 22. वही 23. वही, पृ. 509 24. वही 25. वही *** Page #46 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त साध्वी संगीत श्री जैन संस्कृति भगवान् ऋषभदेव को इस अवसर्पिणी का आद्य व्यवस्थापक, कर्मभूमि प्रवर्तक, प्रथम राजा, प्रथम मुनि, 'जिन केवली', प्रथम तीर्थकर और धर्म का आद्य प्रवर्तक मानती है। जगत् आपको ऋषभ, वृषभ, आदिनाथ, इन्द्र, विष्णु, ब्रह्म, शिवशंकर, हिरण्यगर्भ, शम्भू आदि एक हजार से अधिक नामों से पुकारता है। दशवैकालिक चूर्णि में काश्यप नाम भी दिया गया है। आचार्य समन्तभद्र और आचार्य जिनसेन ने प्रजापति एवं विश्वकर्मा, सृष्टा, विधाता नाम दिया है।' आदिपुराण में कौशलिक नाम भी है। भगवान् ऋषभ ने अपने युग की समस्या पर चिन्तन किया और कलह के मूल कारणों की खोजकर प्रजा को असि, मसि, कृषि आदि रोजगार के षट्कर्मों की शिक्षा दी। आपका ही एक अन्य नाम सिखाने के कारण जातवेद पड़ गया। विश्रृंखलित मानव समुदाय को तीन वर्णों क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र में व्यवस्थापित किया तथा आद्य संस्कृति का प्रारम्भ किया। इसे ऋषभ संस्कृति भी कह सकते हैं। आद्य नरेश ऋषभ प्रथम शिक्षक व गुरु भी हैं। उन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियों को समुचित शिक्षा के साथ ही साथ समग्र प्रजा को भी शिक्षित किया। आपने अपनी पुत्रियों को अंक (गणित एवं संगीत) तथा अक्षर (ब्राह्मी, लिपि आदि) की शिक्षा दी। आपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को बहत्तर कलाओं एवं द्वितीय पुत्र बाहुबलि को प्राणिशास्त्र विज्ञान में पारंगत किया। प्रथम राजा वृषभदेव के प्रथम उत्तराधिकारी प्रथम चक्रवर्ती भरत के नाम पर ही जम्बूद्वीप के इस आर्यावर्त का नाम भारतवर्ष पड़ गया। श्रीमद्भागवतपुराण में ऋषभपुत्र भरत को विष्णु व नारायण बतलाया गया है। अपने 98 पुत्रों को वैराग्य एवं त्यागमय उपदेश के कारण आप प्रथम उपदेष्टा भी कहे जाते हैं। अपनी अन्तः प्रेरणा से संसार, शरीर तथा भोगों से निर्विण्ण होकर संयम एवं स्वाधीनता पथ के प्रथम पथिक बन चैत्र कृष्णा अष्टमी को उत्तराषाढा नक्षत्र में प्रव्रजित हुए भगवान् ऋषभ प्रथम मुनि, यति एवं व्रात्य नामों से प्रसिद्ध हुए।' भगवान् ऋषभ के साथ दीक्षित हुए अन्य चार हजार श्रमण उन जैसी कठोर त्यागवृत्ति नहीं अपना पाये और उन्होंने तापसी जीवन अंगीकार कर लिया। कोई वल्कलचीरि बन गए, कोई पत्र आदि का आहार करने लगे, किसी ने नग्नत्व स्वीकार किया, कोई मासोपवासी बन गए। तभी से 363 पाखण्ड (मत) प्रचलित हुए जिन्हें जैनागमों में चार प्रमुख विभागों- क्रियावाद, अक्रियावाद, Page #47 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 40 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 अज्ञानवाद और विनयवाद में वर्गीकृत किया गया है। जैन साहित्य में तो वे प्राग्-ऐतिहासिक महापुरुष सिद्ध हैं ही किन्तु वैदिक साहित्य में भी भगवान् ऋषभदेव के सम्बन्ध में पर्याप्त उल्लेख है। प्राचीन ग्रन्थ ऋगवेद के अनुसार ऋषभ महान पराक्रमी थे। युद्ध में अजेय थे। ऋगवेद की ऋचा में उनकी (ऋषभ) स्तुति की गई है ।" यजुर्वेद में सूर्यवत, तेजस्वी, अज्ञानादि से दूर माना है।" अथर्ववेद के नवम काण्ड का चतुर्थ सूक्त ऋषभसूक्त है, जिसके 25 मंत्र ऋषभदेव की अलौकिक महत्ता का गुणगान करते हैं।" श्रीमद्भागवत 2 में और सम्भवतः उसी के आधार पर महाकवि सूरदास के काव्य में वेदों के ऋषभ और इन्द्र सम्बन्धी प्रसंगों का मनोरंजक वर्णन प्राप्त होता है। 13 इन उपर्युक्त साक्ष्यों के आधार पर यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि तीर्थकर ऋषभदेव ही मानव संस्कृति के आद्य प्रतिष्ठापक हैं। उनका उज्ज्वल प्रभावक व्यक्तित्व जन-जन में प्रतिष्ठित था । जैन साहित्य में ऋषभदेव जैनागम साहित्य में ऋषभदेव के माता-पिता, पुत्रों - पुत्रियों आदि से सम्बन्धित विवरण यत्र-तत्र प्रकीर्ण हैं। स्थानांगसूत्र में भरतचक्रवर्ती व मरुदेव का दृष्टान्त रूप में उल्लेख है।“ समवायांगसूत्र'" में ब्राह्मीलिपि को नमस्कार किया गया है । " प्रज्ञापनासूत्र” में भी 18 लिपियों का निर्देश है। जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति में ऋषभदेव का अपेक्षाकृत विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है। इसमें 15 कुलकरों का नाम - निर्देश, इनकी दण्डनीतियों का वर्णन है। इसमें द्वितीय वक्षस्कार में उनका पूरा जीवन, तृतीय वक्षस्कार में भरतचक्रवर्ती और भारतवर्ष नामकरण के हेतु का विस्तृत वर्णन है। उत्तराध्ययनसूत्र के 18वें अध्ययन में भरतचक्रवर्ती के दीक्षा का उल्लेख है 19, 23वें में ऋषभ के श्रमणों के स्वभाव का चित्रण है। 20 उन्हें धर्मों का मुख काश्य ऋषभदेव कहा गया है । 21 कल्पसूत्र में प्रसंगवश 22 24 तीर्थकरों के वर्णन के क्रम में इनके 5 कल्याणक, शिष्य-सम्पदा का भी वर्णन है। ऋषभदेव के पूर्वभवों का वर्णन कल्पसूत्र में नहीं परन्तु इनकी वृत्तियों में आया है। आचार्य शीलांकविरचित चउपन्नमहापुरिसचरिय23 में जैन परम्परा के 64 शलाकापुरुषों के चरित-वर्णन के क्रम में ऋषभ से सम्बन्धित 20 बातों का उल्लेख है। इसमें पंचमुष्टि केश - लुंचन का उल्लेख है। वर्धमानाचार्य रचित आदिनाहचरिय, सिरिउसहनाहचरिय", कहावलि आदि प्राकृत कृतियों में ऋषभचरित का विस्तार से वर्णन है। जैन संस्कृत कृतियों में जिनसेन विरचित महापुराण 25, हरिवंशपुराण 26, आचार्य हेमचन्द्राचार्य लिखित त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित 27 ऋषभदेवचरित भगवान् Page #48 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त : 41 ऋषभदेव के चरित का विस्तार से वर्णन करते हैं। इसके अतिरिक्त 24 तीर्थकरों से सम्बन्धित अन्य कृतियों में भी ऋषभदेव का वर्णन प्राप्त होता है। ऋषभदेव का वर्णन स्तोत्र साहित्य में भी प्राप्त होता है। भावप्रभसूरि विरचित 'भक्तामर समस्यापूर्तिस्तोत्र', मेघविजय उपाध्यायकृत 'भक्तामरटीका', गुणाकररचित 'भक्तामर स्तोत्रवृत्ति', जिनवल्लभसूरिकृत 'ऋषभजिनस्तुति', जिनप्रभसूरिकृत 'ऋषभजिनस्तवन', पं. आशाधर विरचित 'भरतेश्वर अभ्युदय' आदि का उल्लेख इस दृष्टि से किया जा सकता है। आधुनिक जैन साहित्य में पं. सुखलाल संघवी के 'चार तीर्थकर १, पं. कैलाश चन्द्र शास्त्री लिखित 'जैन साहित्य का इतिहास'30, आचार्य हस्तिमल्ल रचित ' जैनधर्म का मौलिक इतिहास31, डॉ0 धर्मचन्द्र जैन के 'प्रागैतिहासिक जैन परम्परा'32, 'भरत और भारत' का उल्लेख किया जा सकता है। इस प्रकार ऋषभदेव पर प्राकृत, संस्कृत, हिन्दी और गुजराती में प्रचुर साहित्य का प्रणयन किया गया है। ऋषभदेव आधुनिक विद्वानों की दृष्टि में स्वर्गीय डॉ0 रामधारी सिंह 'दिनकर' का कथन है कि मोहनजोदड़ो की खुदाई में प्राप्त मुहरों में से एक मुहर में वृषभ तथा दूसरी तरफ ध्यानस्थ योगी जो जैनधर्म के आदि तीर्थकर ऋषभदेव थे दिखाया गया है। उनके साथ भी योग की परम्परा इसी प्रकार सम्बद्ध है तथा बाद में शिव के साथ समन्वित हो गई। अतः कई जैन विद्वानों के अभिमत में ऋषभदेव वेदोल्लिखित होने पर भी वेदपूर्व हैं। डॉ0 फूहरर ने राजा कनिष्क और हुविस्क शासनकाल के (2 हजार वर्ष पूर्व) मथुरा संग्रहालय से उपलब्ध शिलालेखों का गम्भीर अध्ययन कर अभिमत दिया कि प्राचीन युग में ऋषभदेव का अत्यधिक महत्त्व था व जनता दिल से अर्चना करती थी। सिन्धु घाटी की आर्येत्तर सभ्यता के ध्वंसावशेष तथा उत्खननों से सिद्ध होता है कि जैनधर्म के आदि संस्थापक ऋषभदेव थे। ऋग्वेद हम्मुराबी (ई0पू0 2123-2018) के अभिलेखों, सिन्धु सभ्यता, सुमेरु सभ्यता एवं ईरान में वृषभ को देव रूप में पूजा गया। भारत की आर्येत्तर सिन्धु सभ्यता में बैल की मृण्मय मूर्तियाँ एवं मुद्रांकित श्रेष्ठ आकृतियों से ऋषभ देव की महत्ता सर्वविदित है। इस प्रकार विशिष्ट महापुरुष ऋषभ के चरणों में जैन, बौद्ध, वैदिक, आधुनिक तथा पाश्चात्य विद्वानों ने समुचित साक्ष्यों के आधार पर अपनी अनन्त आस्था के सुमन समर्पित किये हैं। Page #49 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 42 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 ऋग्वेद में रूद्र के स्थान पर वृषभ का प्रयोग पाँच बार किया गया है। तैत्तिरीय आरण्यक में भगवान् ऋषभदेव के शिष्यों को वातरशना ऋषि और ऊर्ध्वमयी कहा गया है। शिवपुराण' में शिव का आदि तीर्थकर वृषभदेव के रूप में अवतार लेने का उल्लेख है। भागवत में भी ऋषभावतार का चित्रण है। मनुस्मृति में कहा है- अढ़सठ तीर्थों में यात्रा करने से जितने फल की प्राप्ति होती है. उतना फल आदिनाथ के स्मरण से होता है। लिंगपुराण", शिवपुराण, ब्रह्माण्डपुराण", विष्णुपुराण", कूर्मपुराण, नारदपुराण", वाराहपुराण, स्कन्धपुराण, आदि पुराणों में केवल नामोल्लेख ही नहीं ऋषभदेव भगवान् के जीवन-प्रसंग भी उल्लिखित हैं। जैनधर्म के अन्य तीर्थकर द्वितीय तीर्थकर भगवान् अजितनाथ का समय पूर्णतया चतुर्थ सुषमा-दुषमा काल है। वे श्रीराम-लक्ष्मण से बहुत पहले हुए हैं। महाभारत में अजित और शिव को एक ही बतलाया गया है। महाभारत और पुराणों के कर्ता जिन्हें असुर नायक बतलाते हैं वे सुमति (पाँचवें), सुपार्श्व (सातवें) और चन्द्रप्रभ (आठवें) जैन तीर्थकर हैं। पाश्चात्य विद्वान् सोरेन्सन भी यही मानते हैं। शुब्रिग महोदय वेदों में विशेषकर यजुर्वेद में ऋषभदेव के साथ ही साथ सुमति, अनन्त, अरिष्टनेमि एवं महावीर के नामोल्लेख को स्वीकार करते हैं। भारतीय ऐतिहासिक एवं दार्शनिक विद्वान् डॉ० राधाकृष्णन् एवं पं. कैलाशचन्द्र शास्त्री के मतानुसार यजुर्वेद में ऋषभ, अजित और अरिष्टनेमि का उल्लेख मात्र ही प्राप्त होता है। विष्णुसहस्रनाम (महाभारत) में श्रेयस्, अनन्त, धर्म, शान्ति और सम्भव पद मिलते हैं। जैनधर्म में सम्भव तृतीय तीर्थकर हैं तथा श्रेयस् या श्रेयांस (ग्यारहवें), अनन्त (चौदहवें), धर्म और शान्ति (15-16वें) तीर्थकर हैं। संघदासगणिकृत वसुदेवहिण्डी और आचार्य हेमचन्द्र रचित त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित० में एक घटना का उल्लेख है जो 16वें तीर्थकर शान्तिनाथ और उनके पूर्वभव से सम्बन्धित है। यहाँ उल्लिखित है कि उन्होंने उनके मेघरथ (जन्म) के रूप में अपना मांस देकर एक कबूतर के प्राणों की रक्षा की थी। यही घटना शिविराजा के उपाख्यान के रूप में महाभारत में जीमूतवाहन और बौद्धग्रन्थ चरियापिटकरी में बोधिसत्व शिवि के रूप में उल्लेखित मिलती है। नामों की भिन्नता को छोड़कर पौराणिक घटना का साम्य तो स्पष्ट ही है। रसगंगाधरकार पण्डितराज जगन्नाथ ने भी इस घटना को भिन्न रूप में उद्धृत किया है। कुंथु एवं अरहनाथ शान्तिनाथ की तरह पहले चक्रवर्ती सम्राट हुए तदनन्तर चार घातियाकर्मों का विनाश कर तीर्थकर हुए। इनकी विशिष्ट जानकारी वैदिक ग्रन्थों में अधिक मिलती। अरह का अर्थ है पापरहित जो बौद्ध निकाय ग्रन्थों विशेषकर विसुद्धिमग्ग Page #50 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त : 43 में प्रयुक्त अरह, अहित का वाचक है। अर्हत्, अरहन्त या अरिहन्त समानार्थक हैं। अरहनाथ जैन तीर्थकर महाभारत के प्रमुख नायक श्रीकृष्ण से बहुत पहले हुए हैं, यह स्पष्ट जानना चाहिए। उन्नीसवें तीर्थकर मल्लिनाथ महाराज जनक के पूर्व वंशज हैं। जबकि मुनि सुव्रतनाथ जैन परम्परानुसार पुरुषोत्तम राम-लक्ष्मण के समकालीन हुए हैं। ध्यातव्य है कि एक समय में एक ही अरिहन्त तीर्थकर केवली होता है तथा एक ही बलभद्र, एक नारायण और एक प्रतिनारायण होगा। नमिनाथ महाराजा जनक के ही कुल में उत्पन्न हुए थे जो 21वें तीर्थकर हुए हैं, वे श्रीकृष्ण से पूर्ववर्ती हैं।52 इतिहासविद् डॉ0 ज्योतिप्रसाद जैन का अभिमत है कि उपनिषदों में वर्णित ब्रह्म या आत्मविद्या के मूल पुरस्कर्ता नमिनाथ ही हैं। बाईसवें जैन तीर्थकर नेमिनाथ अपर नाम अरिष्टनेमि निर्विवाद ऐतिहासिक महापुरुष सिद्ध हैं कारण कि वे श्रीकृष्ण के ही वंश में उत्पन्न चचेरे भाई और वसुदेव के ज्येष्ठ भ्राता समुद्रविजय के सुयोग्य पुत्र थे। वेदों में इनका तार्क्ष्य अरिष्टनेमि के रूप में नामोल्लेख किया गया है। महाभारत में आपको ही सर्वशास्त्रविदोवर और कुशल महारथी बताया गया है। आपके संन्यास जीवन का सुन्दर चित्रण महाभारत के निम्न श्लोक में स्पष्ट मिलता हैयुगे युगे महापुण्यं दृश्यते द्वारिकापुरी। अवतीर्णो हरिर्यत्र प्रभास शशिभूषणः।। रेवताद्रौ जिनो नेमियुगादि विमलाचले। ऋषीणामाश्रमादेव मुक्तिमार्गस्य कारणम्।। विदेषी विद्वान् कर्नल टाड अपने आलेख में लिखते हैं कि संसार में चार बुद्धया मेधावी महापुरुष हुए हैं। उनमें पहले आदिनाथ हैं तो दूसरे नेमिनाथ। नेमिनाथ ही स्केण्डीनेवियावासियों के प्रथम ओडिन हैं और वे ही नेमिनाथ चीनियों के प्रथम 'फो' देवता हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में इन्हें ही घोर आंगिरस ऋषि बतलाया गया है। डॉ0 धर्मानन्द कौशाम्बी और विश्वम्भरनाथ उपाध्याय भी इसका समर्थन करते हैं। जैनेतर धर्मावलम्बी नेमिनाथ को विष्णु का अवतार दत्तात्रेय मानते हैं। डॉ0 नगेन्द्रनाथ वसु, पुरातत्त्ववेत्ता डॉ0 फ्यूहरर, प्रोफेसर वार्नेट, मिस्टर करवा, डॉ० हरिदत्त और डॉ० प्राणनाथ प्रभृति विद्वान् नेमिनाथ को ऐतिहासिक महापुरुष स्वीकार करते हैं। इस प्रकार ऐतिहासिक सन्दर्भो, साक्ष्यों व विद्वानों के अभिमतों की ओर ध्यान दिया जाय तो यह स्पष्ट झलकता है कि तीर्थकर नेमिनाथ अपने युग के एक ऐतिहासिक महापुरुष थे। साथ ही यह भी निर्विवाद सिद्ध है कि Page #51 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 44 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 अरिष्टनेमि एक ऐसा महान् प्रभावी व्यक्तित्व था जिसने जैन, वैदिक एवं बौद्ध तीनों की संस्कृतियों को प्रभावित किया। पार्श्वनाथ भगवान् पार्श्वनाथ को पौर्वात्य और पाश्चात्य सभी इतिहासविदों ने ऐतिहासिक महापुरुष माना है। सर्वप्रथम प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ0 हर्मन याकोबी ने जैनागमों एवं बौद्ध पिटकों के प्रमाणों के प्रकाश में पार्श्व को ऐतिहासिक महापुरुष सिद्ध किया है। डॉ0 राधाकृष्णन आदि विद्वानों ने भी इसका समर्थन किया है। वे मानते हैं कि महावीर से पूर्व एक निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय था उसके प्रधान भगवान् पार्श्वनाथ थे। डॉ0 बाशम के अभिमत में भगवान् महावीर को बौद्ध पिटकों में भगवान् बुद्ध के प्रतिस्पर्धी के रूप में अंकित किया गया है। एतदर्थ उनकी ऐतिहासिकता असंदिग्ध है। भगवान् पार्श्व ई0 पू0 आठवीं-नौवीं शताब्दी में भगवान् महावीर से दो सौ पचास वर्ष पूर्व हुए हैं। पार्श्व का जीवनकाल सौ वर्ष का था। दिगम्बराचार्य गुणभद्र के अनुसार भगवान् पार्श्व के परिनिर्वाण के दो सौ पचास वर्ष पश्चात् भगवान् महावीर का आविर्भाव हुआ। यदि इसे प्रामाणिक एवं यथार्थ मान लिया जाय तो पार्श्वनाथ की विद्यमानता ई0 पू0 नौवीं शती निश्चित होती है। शान्टियर ने लिखा है कि दो बातें स्मरण रहें कि जैनधर्म निश्चित रूप से महावीर से प्राचीन है भगवान् पार्श्व उनसे से भी पूर्व ऐतिहासिक पुरुष हैं। दूसरे जैन और बौद्ध दोनों परम्पराएँ उनसे प्रभावित रही हैं। तथागत बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्र ने कहा- मैं बोधिपूर्व दाढ़ी-मूछों का लुंचन करता था। मैं उकडू बैठकर खड़े रहकर हथेली पर भिक्षा लेकर खाता था। स्वस्थान पर आए हुए और अपने लिए तैयार किये हुए अन्न व निमंत्रण को स्वीकार नहीं करता था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ0 राधाकुमुद मुखर्जी और श्रीमती रीज डेविड्स भी स्पष्ट कहती हैं कि बुद्ध पार्श्वनाथ के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं के आधार ग्रन्थों से सिद्ध है कि भगवान् पार्श्व की जन्मभूमि सुप्रसिद्ध काशी राष्ट्र की राजधानी वाराणसी थी। काशीनरेश अश्वसेन पिता व वामा देवी माता थीं। पौष कृष्ण दशमी को जन्म हुआ। उस समय तापस परम्परा का प्राबल्य तथा अज्ञान तप को सत्य सही तप माना जाता था। पार्श्व ने गृहस्थाश्रम में ही पंचाग्नि तप करते हुए तापस कमठ को बोध दिया तथा जलते हुए सर्प युगल को नवकार महामंत्र का संक्षिप्त रूप सुनाकर उनका उद्धार किया। भावी तीर्थकर द्वारा गृहस्थाश्रम में इस प्रकार धर्मकान्ति का यह एक अद्वितीय उदाहरण है। संयम ग्रहण करने के पश्चात् उग्र साधना कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया। कुरु, Page #52 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त : 45 कौशल, काशी, सुम्ह, अवन्ती, पुण्डमालव आदि प्रदेशों में भ्रमण कर विवेकमूलक धर्मसाधना के मार्ग को बताया। पार्श्वनाथ के आत्मा, व्रत्यादि तात्त्विक विषयों का जनमानस पर इतना अधिक प्रभाव पड़ा कि वैदिक संस्कृति के उपासकों ने भी इसे अपनाया। पार्श्वनाथ के उपदेशों की स्पष्ट झाँकी उपनिषदों में प्राप्त होती है। प्राचीनतम उपनिषद् भी पार्श्व के उत्तरवर्ती हैं। सन्दर्भ 1. आवश्यकचूर्णि, भाग एक, पृ. 156 2. आवश्यकचूर्णि, भाग एक, पृ. 154 3. आवश्यक नियुक्ति, गाथा 213 4. महापुराण, 190/16/363, वृहत्स्वयम्भूस्तोत्र, 5. श्रीमद्भागवत, श्रीधरी टीका, पृ. 1272, 11/2/17 6.(.क) सूत्रकृतांगसूत्र, 1/2/1 (ख) श्रीमद्भागवत, 5/5/1-27 7. श्रीमद्भागवत, 5/5/28-29 8. ऋग्वेद, 6/26/4 १. वही, 10/166/1, 10. यजुर्वेद, मण्डल 10, सूक्त 166, श्लोक 1 11. अथर्ववेद, पृ. 9/4/1-24 12. श्रीमद्भागवत, 5/4/4 13. सूरसागर काव्य का 5वॉ स्कन्ध, पृ. 52, देखें सूरदास प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा, लोक भारती प्रकाशन, 15-ए, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद 14. स्थानांगसूत्र, स्थान 4, सूत्र 235 15. समवायांग, समवाय, 18 16. भगवतीसूत्र, 20/8/69 17. प्रज्ञापनासूत्र, मुनि पुण्यविजय द्वारा सम्पादित 18. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति 19. उत्तराध्ययनसूत्र, अध्ययन 18/34 20. वही, 23/26-27 21. वही, 25/16-17 22. कल्पसूत्र Page #53 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 46 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 23. चउपन्नमहापुरिसचरिय, शीलांक, प्राकृत टेक्स्ट सोसायटी, वाराणसी, 1916 24. सिरिउसहणाह चरियं, श्री विजय कस्तूर सूरीश्वर, सम्पा. चन्द्रोदय विजयगणि, नेमविज्ञान कस्तूर, सूरि ज्ञान मन्दिर सूरत, 1968 25. आदिपुराण, आ. जिनसेन, सम्पा. पन्नालाल जैन साहित्याचार्य, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, 1931 26. हरिवंशपुराण, आचार्य जिनसेन, भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन, काशी, 1962 27. त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित्र, आचार्य हेमचन्द्र, आत्मानन्द सभा, भावनगर, 1936 28. जैन स्तोत्रसमुच्चय, मुनि चतुरविजय, निर्णयसागर प्रेस, बम्बई, 1948, 8-26 29. पं. सुखलाल संघवी, चार तीर्थकर, जैन संस्कृति संशोधान मण्डल, बनारस, 1953 30. पं. कैलाश चन्द्र शास्त्री, जैन साहित्य का इतिहास, गणेश प्रसाद वर्णी ग्रन्थमाला, वाराणसी, 1962 31. आचार्य हस्तिमल, जैनधर्म का मौलिक इतिहास, जैन इतिहास प्रकाशन समिति, जयपुर 32. डॉ. धर्मचन्द्र जैन, प्रागैतिहासिक जैन परम्परा, शंका चैरिटेबल ट्रस्ट, भारत जैन महामण्डल, बम्बई, 1963 33. भरत और भारत, प्रेम सागर जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली 34. आजकल, मार्च 1962, पृ. 8 35. एव वभ्रो वृषभ चेकितान यथा देव न हणीज़ न हंसि। ऋग्वेद, 2/33/15 36. वातरशना हवा ऋषयः श्रमणा ऊर्ध्वमन्धिनो बभूवुः। तैत्तिरीय आरण्यक, 2/7/1 37. इत्थं प्रभवऋषभोऽवतारः श्रोतव्यं च प्रयलतः। शिवपुराण, 4/47-48 38. अष्टषष्टिजु तीर्थेषुस्मरणेनापि तद् भवेत्। मनुस्मृति 39. लिंगपुराण, 48/19-23 40. शिवपुराण, 52/85 आग्नेयपुराण, 10/11-12 41. ब्रह्माण्डपुराण, 14/53। 42. विष्णुपुराण, द्वितीयांश, अध्याय 1, 26-27 43. हिमा हययं द्वयद्वर्ष पुत्रं भरतं पृथिविपत्ति, कूर्मपुराण, 41/37-38। 44. नारदपुराण, पूर्वखण्ड, अध्याय 48 45. जैन साहित्य का बृहद् इतिहास, भाग 1, प्रस्तावना, पृ. 26 46. वही, प्रस्तावना, पृ. 26 47. वसुदेवहिण्डी संघदास गणि, लम्भक 29 48. त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित, 5/4 Page #54 -------------------------------------------------------------------------- ________________ श्रमण परम्परा : भगवान् ऋषभदेव से पार्श्वनाथ पर्यन्त : 47 49. अंगुत्तरनिकाय, भाग 3, सम्पा. भिक्षु जगदीश कश्यप, पालि परिमल प्रकाशन मण्डल, बिहार, पृ. 256 50. नेमिनाथ ने श्रीकृष्ण को आत्मयज्ञ की शिक्षा दी थी। 51.(क) मज्झिमनिकाय - भाग 2 महासिंह नाद सुत्त (12), 1/12/15, पृ. 163-165 (ख) भगवान् बुद्ध जीवन और दर्शन, धर्मानन्द कौशाम्बी, लोकभारती, इलाहाबाद 1993 52. राधाकुमुद मुखर्जी, हिन्दू सभ्यता, अनुवादक डॉ. वी. एस. अग्रवाल, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 1955, पृ. 239 53. रीज डेविड्स, गौतम द मैन, पृ. 22-25 *** Page #55 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of Jainism and its contemporary relevance and significance Prof.S. R. Bhatt Since times immemorial Indian culture has been characterized by the pursuit of two broad views of reality and ways of living. They are known as the Brāhmaṇic and the śramanic. Both have coexisted with crisscrossing and with mutual give and take. Both tried to understand the nature of reality for the betterment of human existence. The Brāhmaṇic view exhorted to took resort to suprahuman trans-worldly forces also along with human endeavour, the forces which were believed to be operating in the universe. The supreme source of all powers was named as Brāhmana and such cognate terms. The human infirmities and weaknesses gave impetus to this view. In the beginning the emphasis was on this worldly life and its prosperity but later on more emphasis was laid on supramundane life. The Śramaņic tradition however insisted on selfreliance, self-discipline and self-help to realize the goal of life. However, in later times devotion to divine beings was also incorporated as an incentive to human endeavour. It laid stress on trans-worldly life. The śramanic tradition has two schools, viz.,' Jainism and Buddhism. Both the schools interacted between them and also with Brāhmaṇic tradition. We have references to both these traditions in the Vedic literature. In subsequent literature also such references abound. Buddhist texts refer to Jaina thinkers and vice-versa. The ancient Jaina work Isibhāsiyāim and the Buddhist Tripitakas mention such interactions and cordiality among the Brāhmanic, Jaina and Buddhist traditions. Many scholars have dwelt on the references to the śramaņic tradition in the Vedas, the Upanişads, and in the Bhagavadgītā and the Purāņas. The two traditions not only co-existed bụt also interacted closely assimilating and absorbing immensely from each other. It is only in the later Page #56 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 49 period that the differences got widened. Different schools of thought in India developed by way of mutual exchanges known as vāda or vārtā. The Jaina writers are known for their faithful presentations of non-Jaina positions in their writings. The name of Haribhadra, for example, is notable in this regard. II Jainism has been an important part of Śramaņa tradition with very ancient history. The spirit of the Sramana tradition has been strictly and rigorously adhered to by Jainism. Jainism as a philosophy and culture, as a view of reality and a way of life, has made immense contribution to world thought and culture which is of universal and perennial significance and value provided in, it is properly understood and adequately practiced. It is at once ancient in terms of origin and contemporary in terms of relevance. If its basic tenets, doctrines and practices are appropriately reinterpreted as per modern human psyche and its needs and aspirations and expressed in present day idioms and phraseology and sincerely practiced by individuals, sociocultural organizations and world forums, they may provide not only succor and solace to distracted humanity but also pave way for cosmic peace and universal happiness apart from spiritual enhancement. As a part of Indian cultural tradition Jainism advocates equality of all living beings (samatva), and loving kindness to all and respect and care for all. It prescribes various rules and regulations for harmonious, peaceful and integrated living in individual, societal and cosmic spheres. Jainism is essentially a principled mode of living based on right understanding of the nature of reality and meaning of life. Through correct attitude and mental make up (samyak-drsti) proper knowledge (samyak-jñāna) can be acquired and based on that alone proper mode of living (samyak-cāritra) is possible. The codes of conduct prescribed here are situational. The 'Five principles 2 of nonviolence, truth, non-stealing, non- possessiveness, celibacy and moderate living ensure respect for nature, vegetarianism, restrained Page #57 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 50: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 life, cosmic harmony and world peace. They provide a good model for social, political, economic, business and commerce, health, science and technology and all other types of planning and management. The theory of puruṣārtha put forth in Jainism provides a pattern of planned, purposive, methodological and conscious endeavour for a rational, free and responsible human agent to realize the goals of life by proper management of modes of knowing, end, means, modalities and fruits of actions. It also involves regulation of will and effort. It is hoped that the noble ideals and virtuous practices enshrined in the Jaina tradition get spread and permeated all over the world as they are meant for the entire human kind. III Jainism as a 'darśana' has strong theoretical foundation in the multifaceted non-absolutistic understanding of the nature of reality (anekānta) which is unitary as well as variegated. This theoretical base provides ground for the doctrine of naya3 (standpoints) which stands for perspectival and situational adherence to the norms of moral conduct and pious living. Thus, Jainism advocates democratic mode of thinking and way of living. There are three facets of the Śramanic tradition derived from three formulations of the word ' Śramana', viz., śama, s'ama and s'rama. A Śramana is one who has equanimity of mind and who treats all beings as equal. Such a person is known as 'sāmāyika',i.e., one who practices samatvam. In the Ṛgveda and the Bhagavadgita there is great emphasis on samatva. The 'sthitaprajña' of the Gītā is 'samadarsi'. A śramana is also one who practices self-control. He has to lead a disciplined life. Ethical rules and regulations prescribed in the Śramana tradition are very rigorous. Though for the householder there are relaxations and they are a little moderate but for the monks and nuns they are very hard. It is ordained that without strict moral conduct there cannot be spiritual realization. Spirituality has been the backbone and orientation of Indian culture at all the times. Practice of equality and self-control have been the hallmarks Page #58 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 51 of Indian understanding of spirituality. This feature is shared both by Vedic and Śramanic traditions. The third facet of Śramanic tradition is self-reliance. Both for the empirical and trans-empirical life one has to be self-dependent, without aspiring for any help from transcendental forces. The Śramana tradition rejected the idea of a Creator-God who can be propitiated and who can descend down to assist human beings. To realize perfection is the summum bonum of life and through self-effort alone one can realize it. In the Brāhmaṇic tradition also some schools did not accept the notion of CreatorGod and rejected the idea of divine help. The doctrine of puruṣārtha is common to all and it will be discussed in the sequel. The doctrines of triratna and ananta catuṣṭaya, anekāntavāda and syadvāda along with saptabhangīnaya, the distinction between pramāna and naya, between dravya and guna, between dravya and paryāya, between guna and paryāya, between jīva and jīva, between jīva and ajīva, between ajīva and ajīva, between samvara and nirjarā, between dharmavidhi and caritrācāra, between mahāvrata and aṇuvrata etc., the doctrine of guṇasthānas and several such theories, doctrines and concepts are a few among the innumerable contributions which have universal and eternal appeal and utility at the theoretical and practical levels. If Jainism is properly understood and practiced, to repeat, it may not only provide solace and succor to the distracted and suffering humanity but also pave the way for cosmic harmony and world peace along with its spiritual enhancement and perfection. IV Jainism is essentially a way of life, but it is a way of life based on a proper view of life and reality. Unless there is a correct understanding of the nature of life and reality through proper attitude and mental make-up, i.e., samyak-dṛṣṭi and proper knowledge, i.e., samyakjñāna, there can be no proper mode of living, i.e., samyak-cāritra. Samyak-drṣti, samyak-jñāna and samyak-caritra thus constitute the Page #59 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 52: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 three jewels which a human being must adorn in one's life*. They are therefore known as triratnas or ratnatrayas. Right knowledge (samyak-jñāna) and right conduct (samyak-cāritra) are the two foundations of the ethico-spiritual religion of Jainism. These two are grounded in right attitude of mind (samyak drsti). All the three together are the three jewels a human being must adorn. Such a person is called 'Ratnatrayadhārī". The concept of sarvajñātā (omniscience) plays an important role in Jaina theory of knowledge. It stands for the most heightened state of right knowledge which is available to a kevalin (self-realized person). This concept is available in Buddhist and Vedic tradition as well. If rightly understood it avoids the pitfalls of fatalism, harmonizes causal determinism with freewill and provides scope for individual initiative and self-effort. It knows the inner essence and true nature of reality in all its forms, facets and perspectives. Only a kevalin is sarvajña as he alone is ātmajña. It is said that one who knows self knows each and every thing else and vice-versa. V In Jainism great emphasis is laid on right knowledge (samyakjñāna). Knowledge is the only and surest way to spiritual perfection. The Jaina scriptures therefore emphasize that we must draw a clear distinction between samyak-jñāna and mithyā jñāna. Mithyā jñāna entangles us in the vicissitudes of worldly life. It is bewitching and bewildering and it springs from avidyā or ignorance. In order to have right knowledge, right attitude or right mental make-up is necessary. This is samyak-dṛṣṭi. Opposed to this is mithya drsti with which we generally suffer. Samyak-dṛṣṭi leads to samyak-jñāna and the latter alone is the path way to mokṣa. Mithya dṛṣṭi and mithyā jñāna do not serve any genuine purpose and hence they must be discarded. For an aspirant of mokṣa/mukti only samyak dṛṣṭi and jñāna are helpful. This is the main theme of the teachings of the Āgamas. Samyak-jñāna always leads to samyak-cāritra. The value and purpose of knowledge is not theoretical but necessarily practical. Page #60 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 53 Right conduct ensues only from right knowledge. Conduct without knowledge is blind and knowledge without conduct is lame. The two are complimentary to each other. And therefore knowledge has to lead to the corresponding conduct. Without right conduct deliverance from worldly miseries, trials and tribulations is impossible and without complete deliverance from these no permanent happiness can be achieved. As said earlier, these are the three jewels of life which every human being must wear. But this wearing is not decoration but actual practice and concrete realization. However this is not easy to achieve. It requires tapas and sādhanā, a rigorous control of body, will and mind. So knowledge without conduct is useless. Merely listening to the discourses is wastage of time and is futile. It does not help us in any way. What is needed is the ensuing conduct. But unfortunately most of us forget this. We listen to the sermons of the spiritual persons but do not practice them. We take it as a pass time or a matter of routine of life. Our knowledge remains mere information at the mental level. The Daśavaikālika Sūtras compares a person having knowledge without practice to a donkey who carries burden of sandal wood without knowing its value or utility. As the donkey bears the burden of sandal wood but has no share in the wealth of his load, similarly a person without practice merely bears the burden of his knowledge. He can not enjoy spiritual progress which is the real fruit of knowledge. Instead he indulges in evanescent and fleeting worldly pleasures which invariably end up in pain and suffering or mental unhappiness or a feeling of vanity of life. The Āvasyakaniryukti also avers the same that knowledge is useless without conduct and conduct is useless without knowledge. In Indian culture, philosophy and religion, view and way, theory and practice, are not divorced and segregated. Darśana is not mere reflection upon the nature of reality but also a quest for and a realization of values. Basically it is a mokṣa śāstra. There is a definite purpose in life and reality if we care to know and a definite goal to achieve if we have a will to do Page #61 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 54: śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 so. Our existence is not meaningless. It has a value and significance. But we must first of all know what we are, what is the nature and purpose of life, what we should be in our life and how we can be so etc. The aim of human existence should be spiritual perfection through material progress. But material progress is only a means and not an end. The end is self-realization which is achieved through the removal of karmic matter and liberation from samsāra. There is potential divinity in human being and there must be effort for divinization. This is the ultimate teaching of all Jaina scriptures (Āgamas). We must know the nature of reality, the jīva and the asīva, and also their interrelation. We must know the nature and the role of karma and the ways for the cessation of the karmic flow. We must know the distinction between samvara and nirjarā along with their respective role, utility and practice. We must know how and when to practice cāritrācāra and dharmavidhi. We must know the requirements of the practice of a house-holder and a renunciation. The spiritual progress is a gradual and graded realization with gradual purification of soul from decreasing sinfulness to increasing purity and therefore the theory of gunasthānas should also be properly understood so that we may march on this path smoothly and without fall. But all this is not a bookish knowledge which some of us do possess by our readings of the Āgamas either fully or partly. Knowledge pertains to the real. The real, according to Jaina view, is multifaceted and multidimensional. It has infinite properties (ananta dharma) and therefore it can be approached in infinite ways. This is the anekānta drsti which is the base of samyak-jñāna. This is Jaina perspective at the levels of reality, thought and language. As there are many aspects of reality there can be multiple approaches to reality. Each one is true in itself but it is only partially true. It is true from a particular perspective. From another perspective it may not be true. We may have a total or holistic perspective and it is known as pramāņa. But if we have a partial perspective it is known as naya. Both pramāṇa and naya are true and valuable. Page #62 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 55 И The real has three phases of existence. In it something endures, something originates and something passes away. So it is both permanent and changing. But we must know what is permanent and what is changing. We have to attend to both in proper proportion and in proper perspective. More often than not we do not do so under the spell of ignorance and sway of passion. The Tirtharkaras, who are Jinas, have shown the way to us which is the right path to be emulated by us. Proper knowledge, proper will and proper effort on our part alone can yield the desired result. The concept of dravya is the crux of the Jaina metaphysics. It stands for the totality of things. It is the locus of guņas (attributes) and paryāyas (modifications). The gunas constitute the essential nature of dravya. A dravya possesses multiple guņas. Paryāya stands for the mode in which a dravya and its guņas appear. The most significant and singular contribution of the Jaina school in the field of metaphysics is introducing the concept of paryāya. Though the reality has substantial and adjectival aspects, both substances and attributes exist in a particular form or mode at a particular time under particular conditions. This conditioned mode of existence of substance and attributes is known as paryāya. The point is that substances and attributes are conceived to exist not in an absolute or isolated way but in relation to other reals. So this non absolutistic or relativistic view of reality leads the Jaina thinkers to postulate paryāya. This rich concept of paryāya is a unique contribution which is highly valuable in the spheres of thought and action. It provides a strong base for relativism, perspectivalism and situationalism which are needed for pluralistic worldly life. It helps in avoiding the pitfalls of absolutism, dogmatism, obscurantism, ego-centricity and narrowness of all types. It provides foundation to Anekāntavāda as a theory of reality and ahiņsā as a way of life. It alone can ensure a participatory, conciliatory and democratic mode of life which is the aspiration of humankind. Thus we find that the introduction of the Page #63 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 56: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 concept of paryāya brings about a tremendous modification in the Jaina metaphysics and epistemology, the like of which we do not find in the metaphysics of other schools. The implications of this concept are deep and far-reaching in the fields of ethics, logic, mathematics, statistics and linguistic analysis. Its tremendous implications are yet to be brought to the fore by the saints and scholars. Many of such elements have been worked out and developed by the Jaina thinkers, but many more are yet to be brought out. For example, the qualitative dimension of the theory of the probability is a unique idea of Jainism which is only in an embryonic form and if its details are fully worked out, it is sure to result in a Copernican revolution in the methodology of natural and social sciences. It is a challenging task for the scholars of Jainology which, I think, should be highlighted and earnestly taken up. This can be achieved if interdisciplinary and multi-disciplinary approaches are made to these areas of potential studies and whatever literature exists in this respect is made available in a language intelligible. VII According to the Jaina thinkers, thus, no reality, whether in the form of substance or in the form of attribute, exists as such but only in a specific mode of existence. There are infinite ways or modes in which reals can exist and this idea paves the way for the advocacy of Anekāntavāda, the central thesis of Jainism. Likewise, in the field of knowledge, to know a thing is to know its substantial and adjectival aspects in a particular mode or form. A particular mode appears only in a particular set of conditions. With the changed conditions there will be another mode of existence of that thing. So, all our knowledge of a thing at a particular spatiotemporal locus is conditional and relative to the circumstances. Of course, the possibility of absolute knowledge is all the while there. Naya has double function. It is experience of object in a particular mode and its verbal expression in that mode. This is the Nayavāda or the relativistic theory of knowledge. Since all knowledge is relative, the Page #64 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 57 judgmental and linguistic expression of it has also to contain the relations and the conditions which characterize such knowledge. This is the theory of Syādvāda which means that every judgment is based on four types of apekṣās (perspectives) of dravya (substance), kşetra (place), kāla (time) and bhāva (nature). This theory is further formalized in the form of Sapta-bhangi, a doctrine of seven-fold predication. It implies that the knowledge of real can be described in sevėn ways. These are combination of affirmation and negation: (1) Syāt asti (predication of existence), (2) Syāt nāsti (predication of non-existence), (3) Syāt asti-nāsti ca (successive predication of existence and non-existence), (4) Syāt avaktavyam (simultaneous predication of existence and non-predication and therefore indescribable), (5) Syāt asti ca avaktavyam (predication of existence and of indescribability or indescribability as qualified by existence (Dr. D.S.Kothari's usage), (6) Syāt nāsti ca avaktavyam (predication of non-existence and indescribability) and (7) Syāt asti-năsti avaktavyam ca (predication of existence, non-existence and indescribability). Dr D. S. Kothari states that Syādvāda asserts that knowledge of reality is possible only by denying the absolutistic attitude. Syādvāda asserts that a thing is “A”, and it is also "not-A”, and both “A and not-A”, and so on. It is an exhortation to investigate reality from all different possible viewpoints. It is not a doctrine of indifference or passive acceptance of statements and also their negatives. It is just the contrary. It demands our ascertaining the conditions, the coordinate frames as it were, under which a thing is “A”, the different conditions under which it is not-A, conditions under which it can be both “A” and “not-A”, and so on. He further opines that the superimposition principle of quantum mechanics provides an illuminating example of Syādvāda mode of description. Here it should be clarified that Syādvāda is not at all a system of logic-two-valued or multi-valued or fuzzy—in the western sense as it is generally misunderstood and evaluated. It is a theory of Page #65 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 58: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 expression or speech and states that each statement is true in its specific universe of discourse. It rejects exclusive particularity of reality, thought and language. VII The theory of Anekānta is the corner stone of Jaina view of reality and life. It is described as heart of Jainism. It is a direct corollary of samatva. It is rather application of samatva. It is a dynamics of thought which ensures conciliation, concord, harmony and synthesis. It stands for catholicity of outlook and accommodation of different viewpoints in the holistic understanding. It is organismic view of life and reality. It takes into account both the whole (sakala) and the parts (vikala). In the field of knowledge therefore it draws a distinction between pramāṇa and naya to bring home this truth. This type of understanding leads to mutual complementarities, mutual cooperation, mutual trust, co-existence and above all to ahimsā which is the highest truth and highest virtue in Jainism. Anekāntavāda alone can lead to ahimsā and ahimsā in turn alone can guarantee peace, progress, prosperity and perfection in the world. That is why ahimsā is regarded as 'paramo dharmaḥ'. Anekāntavāda, with its corollary of Syādvāda, provides for democracy in ideas and in living. It inculcates the spirit of peaceful co-existence, tolerance and mutual support. This alone can ensure universal peace, solidarity, friendship and harmony. It is a unique contribution of Jainism which is noble and sublime deep and subtle. It is not very easy to understand it and to practice it. But if this can be achieved the world will be an ideal place to live in and to realize spiritual perfection. Another significant implication of Anekāntavāda is practice of health care through vegetarianism and environmental protection which are the dire needs of the day. Every thing in the world is interrelated and interdependent. Every thing has its unique existence and value. So nothing should be destroyed by the human being for his selfish ends. The Jaina ethics not only regulates human conduct in relation to one's own self and in relation to other human Page #66 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 59 beings but goes a step further to bring in human conduct in relation to all living beings and natural environment. Every existence has intrinsic worth and it must be given due respect. In case there happens some misconduct due to ignorance or negligence or even willfully there is a provision for forgiveness and repentance. Following the Śramaņa tradition Jainism advocates selfsameness (samatva) in all existence in spite of their inherent differences. It thus has the unique feature of synthesizing quantitative and qualitative monism and pluralism, monadic uniqueness and modal dependence. In fact Anekāntavāda is the cardinal tenet of Jainism and it is impregnated with immense possibilities of drawing out newer and newer implications and corollaries for cosmic well-being. But this should not be mere intellectual exercise. It must involve programmatic action at the corporate level on a cosmic scale. This may not be easy but not impossible. Ahimsā is a corollary of samatva, and it can also be regarded as extension of Anekāntavāda. It enjoins equal respect and mutual dependence of all existences. Ahimsā is the highest virtue because it alone can lead to spiritual realization. Anekānta is at the level of thought and ahimsā is at the level of practice. The two are thus complimentary. In the Rgveda we find tremendous emphasis on these two. There are two significant dimensions of ahimsā. One is to treat all existences, living as well as non-living as of equal worth. This gives rise to a conducive and healthy environmental consciousness. Nature is as valuable as our own existence and therefore nature is to be respected. In Jainism we find both surface ecology of external environment and depth ecology of inner environment. It is the inner which affects the outer and must therefore first to be attended to. The other dimension is treating all living beings as equal. This leads to vegetarianism. Samatva along with s'amatva has led to two very important concepts of asteya and aparigraha. Asteya means not to deprive others from Page #67 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 60: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 their legitimate belongings. Every one is a part and parcel of this vast universe and every one has to have its existence and sustenance in the world. It is the duty and obligation of each one to ensure that the existence and living of every one is safeguarded and not endangered. But we have only to satisfy our legitimate needs and should not cater to our greed. So the principles of aparigraha enjoins to stock only that much which we need. The principles of asteya and aparigraha guarantee intra-generational and inter-generational justice respectively. Equality and justice go hand in hand. They are the two pillars of Indian theory of management along with two other pillars of yoga and kṣema. These four are the most desirable prerequisites of sustainable development and environment stewardship. VIII Jainism as a part of Śramana tradition puts forth puruṣārtha or selfhelp as a basic principle of authentic life, without looking for any help from supra-human agency. It is to be svastha, i.e., situated in one's own self (Svasmi tiṣṭhati). It is to remain confined to svabhāvaparyāya or svaparyāya and to be free from vibhāvaparyāya or paraparyaya as far as possible. In the worldly life it is very difficult to be so, but this is put forth as an ideal. The jīva (self) has to be unaffected by ajīva. This is the state of Mokṣa. But we are worldly beings and we have to be in association with and dependent upon other beings and entities. So mutual affection and consequent affliction is unavoidable. All living beings are mutually dependent (Parasparopagraho jīvānām)1o, says the Tattvärthasūtra. Likewise the non-living entities also help us for our sustenance. So we have a collective living (samgha jīvana). The cosmos is a vast and subtle networking of multiple and multifaceted but interrelated and interdependent existences characterized by both permanence and change. The cosmic set up is not mechanical or blind interplay of existences. It is teleological, purposive and goal-oriented. All happenings are causal happenings and not accidents or chance Page #68 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 61 occurrences. In this cosmic process every existence has a specific nature, place, role and function. But in the total set up human being has a unique and privileged position. He/she is endowed with the capacity to know the true nature of things, to act freely within some bonds and to be responsible for one's actions. He/she is partly free and partly determined but the determinations are also one's own making due to our karmas. Thus Jainism takes into cognizance conducive or detrimental effects of the past actions and exhorts for management of actions and fruits of actions in terms of virtuous conduct and austere living.. In the causal happenings brought about by human agency there are five causal factors the integrated conglomeration (samavāya) of which gives rise to an event. They are svabhāva consisting of dravya, ksetra and kāla. They constitute material cause. The second is puruṣārtha (present human endeavour out of free will). The third is daiva or niyati or prārabdha (accumulated past karmas of the agent which have not so far fructified), kālalabdhi" (proper time conducive for production) and bhavitavyatā (possibility of production or productibility of action). Among these, five puruşārtha plays a dominant and significant role in so far as other factors are beyond human control but puruşārtha is solely dependent upon human free will and it can be planned and managed. There is no incompatibility among these five factors and that is why their integration is possible and it is known as pañcasamavāya. Samantabhadra in Āptamīmāmsā advocates complementary character of daiva and puruṣārtha and rejects lop-sided view of relying on any one. This is the anaikāntika drsti. Another notable thing is that in this enterprise there is scope for divine inspiration but there is no room for divine help. There is no God who is a savior. The divine beings are there who can serve as catalysts or as ideals to emulate. Puruşārtha or self-effort is the only means available to us for self-realization. The daiva is also our own making and through virtuous conduct we can minimize or neutralize its effect. That is why practices of samvara and nirjarā Page #69 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 62: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 are recommended. Thus the Jaina theory of puruşārtha puts forth a pattern of planned, purposive and methodical endeavour for a rational, free and responsible human agent with proper management of modes of knowing and living and adequate regulation of will and effort. Karma or puruṣārtha determinés entire individual and social set up of a person. Effects of karmas are different upon different individuals and different karmas have different effects on the same individual in accordance with nature (prakṣti), duration (sthiti), intensity of fruition (anubhāga), and quantity (pradeśa) 12. The three pillars of Śramana tradition, viz., sama, s'ama and s'rama. are intimately involved in the theory of puruşārtha. In the worldly life all existences are equally valuable and significant (sama). This feeling leads to cultivation of ahimsā which is a foundation of collective and corporate peaceful living, a life of mutual caring and sharing, of interrelatedness and reciprocity. But this presupposes a well regulated life with legitimate controls which should be self generated (s'ama). This partaking calls for corporate and cooperative efforts (s'rama) and just distribution and enjoyment of the fruits (asteya and aparigraha). So the Jaina tradition shares the general Indian view of four-fold puruşārthas, viz. dharma, artha, kāma and mokşa. In this world every creature has to earn one's living. This is more meaningful for the rational, ratiocinative and responsible human being. He/she has to plan the performance purposefully. Then only it is authentic living. All social, economic and political organizations are established and aimed at this requirement. They serve human needs and requirements but are to be properly managed to serve the purposes for which they are established. For this the Jaina theory of puruşārtha provides broad guiding principles. There are two broad stages of human enterprises. They are production, and thereafter distribution and enjoyment. The guiding principles of production are kşema and yoga. Ksema means to use the resources judiciously so that they are protected for further use and not depleted. Further Page #70 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 63 usability is natural and their depletion is unnatural. Yoga means augmentation of resources and generation of newer and newer resources. This is what is meant by sustainable development. Environmental stewardship and eco-friendliness is a part of this strategy. But real ecology is mental ecology as it is the mind which generates good or perverted human endeavour. A symbiosis of s'ama and s'rama is called for here. This is professional ethics or ethics in production. It is an efficient management of end, means and modalities. After production comes distribution and use. For this the guiding principles are asteya and aparigraha. Fair and just distribution and legitimate use or enjoyment both are needed for intra-generational and inter-generational justice. The policy of corporate living, of caring and sharing, implies that we have to care for the present generation as well as for the future generations to come. But ultimately all human endeavours and enterprises should be a means to and directed towards the realization of cosmic wellbeing which is the summum bonum of life. It is a state of freedom in which infinitude of the self is restored. Here also sama, s’ama and s'rama have relevance. So puruşārtha is needed here. All individual selves in their pure form share the four infinite virtues. But in empirical state they differ from one another. These distinctions are due to beginning-less subtle material coverings known as karma. It has physical and psychical aspects known as dravya karma and bhāva karma respectively. Though of varied nature karma has been broadly classified into eight types13. They are 1. Knowledge-obscuring—(jñānāvaranīya) 2. Intuition-obscuring—(Darsanāvaranīya) 3. Feeling-producing (Vedanīya) 4. Delusion-producing—(Mohanīya) 5. Longevity-determining-(Ayu) 6. Body-making—(Nāma) 7. Status-determining—(Gotra), and 8. Obstruction-generating—(Antarāya) Page #71 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 64 : Śramana, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 The summum bonum of life is realization of four infinites (ananta catustayas). This is known as moksa or mukti. The best and surest means of it is yoga. The technique of yoga symbolizes the core of Indian spiritual sādhanā. The term yoga' has three etymological derivations, viz., yujir yoge, yuj samyamane and yuj samādhau. In the Jainism all the three find due place and role. It is union with pure or impure, it is self-control, and it is concentration of mind. Further, in Jainism we find a happy symbiosis of jñānayoga and karmayoga. The Jaina tradition emphasizes the principle of permanence-inchange which means that permanence inheres in change or change is embedded in permanence. This position presents a fine synthesis of the basic positions of Vedānta and Buddhism on the one hand and Sāmkhya and Vaiseșika on the other, all of which get their enunciation in the Vedas and the Upanişads. The Indian culture is an integral whole in which different strands are interwoven with remarkable symmetry but one should have the sense of apprehending them. It is for us to see the differences and discords or organic unity. The healthy and positive approach is to see the underlying commonality which nourishes diversity as its richness. At the present juncture of time humanity is passing through turmoil and facing a crisis which is manifold and multi-dimensional. Humanity is stationed at a cross road. On the one hand there are marvels of science and technology, on the other there are valueerosions, moral degeneration, and different types of deprivations leading to tensions, strife and suffering. Besides this problems arising out of globalization are also compelling the ratiocinative human mind to seek for new philosophy of life. With the emergence of global society in which we are interacting with people of different ideas and ideals, cultures and traditions, religious and moral norms there arises the increasing need for a global ethics of mutuality and interdependence and inter-cultural dialogue for new set of appropriate interpersonal relationships. The ideas of global ethics and inter Page #72 -------------------------------------------------------------------------- ________________ Multifaceted symbiotic philosophy of ..... : 65 cultural dialogues unfold themselves in the compassionate, rational and symbiotic Jaina ethics of tolerance, interconnectivity and reciprocity and in the basic non-absolutistic postulates which preserve unity and diversity without undermining the identity of either of the two. The Jaina tradition emphasizing Anekānta (multi-dimensional approach to truth), Syādvāda (contextual and situational approach to reality and knowledge) and icchā-parimāņa (limitations of wants, possessions and consumption), is an important tributary of this mainstream idea which found sanctuary in the heritage of India and which is the main motif in the mosaic of Indian culture. The philosophy of aņuvrata highlighted by contemporary Jaina thinkers presents a model of ideal human living. It is a practice of samatva. The method of preksādhyāna is a practical exercise to mould life according to that model. It is a psycho-physical transformation of an individual. On that basis the art of living known as jīvana vijñāna has been developed. Thus Jaina philosophy offers worthwhile perspectives on individual and collective life, social organization, political governance, economic order, globalization and international relations, scientific and technological policies, environmental protection and moral and spiritual progress. Refrences: 1. See Meri Bhāvanā, Yugal Kishor Mukhtar 2. Tattvārthasūtra, 7/2-3 and its commentries, Parshwanath Vidyapeeth, Varanasi, 1993 3. Ibid, 1/34-35 4. Samyagdarśana-jñāna-cāritrāņi mokşamārgah, Ibid, 1/1 5. Daśavaikālikasūtra, IV 6. Jahā karo candanabhāravāhī, Bhārassa bhāgi na hu candaņassa evam khu nāņi caraņeņa hīņo, nāṇassa bhāgi na hu soggale, Avasyakaniryukti, 1/2/100, Shri Harsha Puspamrita Jain Granthamala, Lakhabaval, Shantipuri, Saurastra Page #73 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 66: Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 7. Syādvādamañjarī, Verse 23, Shri Paramshrut Prabhavak Mandal, Agas, 1992, p.209-211 8. Some Thoughts on Science and Religion, p.43 9. Parasparopagraho Jivānām, Tattvärthasūtra, 5/21, Op. chit., Varanasi 10. Ibid 11. See Jainendra Siddhanta Kosa, p. 613 for detail 12. Tattvārthasūtra, 8/4, Op. Chit., Varanasi 13. Ibid, 8/5 *** Page #74 -------------------------------------------------------------------------- ________________ "Ayurveda, Jainism amd Medical Tourism - A Study in Interrelationship" Partha Bhandari Tourism, in its different forms has been one of the most vital and essential human activities, which promotes mutual understanding and social harmony, in the true spirit of "Vasudhaiva kutumbakam” i.e. the world is a family. Tourism starts with travel and travel brings movement and socio-cultural interactions. Through the promotion of tourism we can move forward to achieve the goal of World Peace and Wellness of all. In Indian context in every social and religious activity like marriage, pilgrimage and performance of rituals, including Samskāras, we can easily find the spirit of tourism and inherent healthcare both, mental and physical. Today, tourism is well defined human activity, which imbibes the spirit of socio-cultural interaction, wellness and healthcare of the masses through different means of tourism based on the choices and destinations. The indirect benefit to the health predominates every act of tourism. When a person or group of persons of the same or different interest and component moves out of their usual place of residence for visiting either historical places, heritage sites, hill stations, sea beach areas, rural places, health is always one of the prime concern. From ancient times people used to travel for acquiring or sustaining good health. Ayurveda or Prāṇāvāya (the science of life and longevity) in Jainism has been a potent way of therapy for the diagnosis, prevention and also medical treatment of various ailments and if needed, undertaking surgery as well. It deals not only with the physical well being of a person but also with spiritual, mental and social health of individuals - a concept now established and accepted even by modern medicine. We have both the tradition and history of Ayurveda in the literary works including those of Caraka in Caraka Samhitā and Suśruta in Suśruta Samhita of Kuṣāna-Gupta period. Page #75 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 68 : Śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 The present paper endeavours to look into both the direct and indirect bearing of tourism in the context of wellness and healthcare, better known as medical tourism today in 21s century. Medical Tourism is a new term but old phenomenon. For this we shall take brief note of Ayurveda or Prāņāvāya which has been the main ancient way of treatment and health care. Like the Brahmanical tradition, in Jain tradition also we come across a number of Jain Ācāryas who, besides writing on different aspects of philosophy, spirituality and religion, wrote basic texts on Ayurveda or Prāņāvāya which are both general and specialized ones. These texts deal with different diseases, their symptoms, prevention and cure through the medicines and rarely through the surgery. In Jainism because of special stress on non-violence, they were disinclined towards surgery and also towards taking such food even for health sake which involve meat, honey and liquor'. The exclusive work by Dr. Rajendra Prakash Bhatnagar under the title “Jaina Ayurveda kā Itihāsa" deals exhaustively with different aspects of Ayurveda as discussed or propounded by Jain Ācāryas and monks. However the title of the book is ambiguous since Ayurveda is an Indian and traditional way of treatment which could never be termed as Hindu, Buddhist or Jain. Jain Ācāryas have always shown keen interest in the healthcare and wellness of the people (not merely for Jainas) which includes both the physical and mental healthcare in all its dimensions from the beginning of the Common Era. Jain inscriptions of Kuşāņa period of Mathura referring to the installation of Jaina images invariably mentioned that it was done for the welfare and happiness of all (Sarvajana hitaya) which includes the spirit of wellness and that too not only for Jainas but for all human beings." The Jainas had a well established tradition of medicine that was known as Pränavdya" . It deals with dietetics, drugs and mental disciplines which covered all the eight angas i.e.. Page #76 -------------------------------------------------------------------------- ________________ "Āyurveda, Jainism and Medical Tourism..... : 69 1. Internal Medicine -Kāya-cikitsa 2. Paediatrics -Kaumārbhstya 3. Psychiatry-Bhūtavidyā 4. Otorhinolaryngology and Ophthalmology-śālākya 5. Surgery and Midwifery-Salya 6. Toxicology -Agada or Jangala 7. Geriatrics or Longevity-Rasāyana 8. Eugenics and Aphrodisiacology/Rejuvenation -Vājīkaraņa . The Jaina saints looked after their health and their sickness themselves. In the field of medicine the Jainas were very strict and had forbidden alcohol, honey and meat and as a result the Jaina physicians had to adjust the formulations accordingly. The Jaina physicians used plants and minerals mainly as a source of drugs. Also the dead body dissection has been termed as demerited act. This resulted in poor knowledge in anatomical and surgical fields without much development. These physicians were very practical and believed in curing the diseases with tried and tested medicines rather than going into beliefs and fundamental doctrines. Some important texts dealing with Ayurveda or Prāņāvāya are: The Uttarādhyayana Sūtraó accepted sickness as one of the troubles. An account of eye disease and fever is mentioned in the text, but in the form of a story. Different methods of treatment like spells, emetics, purgatives, fumigation, anointing of the eye are also mentioned in details. Plants are classified as vrkșa, gaccha, gulma, latā, valli and tyna. Use of inorganic substances such as metals, except mercury, stones, mica, and sulphur are mentioned. The Sūtrakstānga Sūtra’ is another text which specified certain substances used in cosmetics and some domestic devices. Different parts of plant like bulb, stem, root, branches, twigs, leaves, flowers, fruits and seeds are also mentioned. Sthänănga Sutra is the first book mentioning about the four basic units of ancient medical system. They are (1) Physicians, (11) Patients, Page #77 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 70: śramaņa, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 (iii)Nurses and the (iv)Medicines. A fifth unit of community and preventive medicine was added to these four suggesting public health consciousness of Jaina scholars more than two thousand years ago. These are also the basic units of medical establishment today. The Kalyāņakāraka'' is the only authoritative text available on the Prāṇāvāya tradition of medicine. It was composed by Ugrādityācārya who was contemporary of Amoghavarşa I, the Rāştrakūta king and disciple of Srinandi. The text includes many chapters. The chapters based on the basic concepts, deal with food and drink, topics related to personal hygiene, groundwork related to medicines, arrangements in the hospital and patient's examination. Kāyacikitsā begins from the eighth chapter. The middle chapters cover topics associated with vātaroga, pittaroga and kapharoga. Other later chapters deal with diseases, śālākya, Pañcakarma, Mercury and its processing are described in detail. The last chapter is based on Kalpas. According to the author, there is no penance greater than Cikitsā. He says, "Cikitsā is for destroying sins and promoting virtues”. Here again comes the social objective of medical care and wellness which must have attracted the common people towards Jainism. Since the Jaina Ācāryas and monks themselves were having good knowledge and experience of plants, their medical properties, diseases and their symptoms and also the cure, it can easily be surmised that the common people, besides their religion and spiritual aspirations, must be visiting to the Jain Ācārya and monks for health and wellness. Thus we can visualize the very existence of MedicoSpiritual tourism in Jain context. One of earliest Jain texts the Kalpasūtra" of the early century of Common Era and also later texts make reference to an interesting point which testifies to the advance knowledge of Medical Science to the Jainas. The texts say that the foetus of the 24th Tirthankara Mahāvīra first came in the womb of Brāhmaṇi Devānandā , but subsequently at the command of Indra, Naigameşin , the commander of the army of the Gods and presiding god of the childbirth, transferred the foetus of Mahāvīra Page #78 -------------------------------------------------------------------------- ________________ "Āyurveda, Jainism and Medical Tourism..... : 71 from the womb of Devānandā to the womb of Kastriyāni Trišalā . The main Jaina Ācāryas and 6 who directly or indirectly contributed towards healthcare and wellness of the people are as follows: Samantabhadra, Pūjyapāda, Ugrādityācārya, Pātrakeśarī, Siddhasena, Meghanāda, Daśaratha Muni etc. The Jain Ācāryas and Munis (Monks) who were always living in the ambience of nature were fully aware of the medical properties available in different vegetation and plants, and also knew the way how to extract them and use for the wellness of the humanity. The Jaina Ācāryas and Monks were never stationary, rather they were moving from one place to another. At a later stage from about Gupta period, the Bhattāraka and Yatis used to stay at a place which is known as Upāśraya. This change brought forth the masses to visit the Upāśrayas for listening the preaching for meditation and also for their treatment of physical and mental problems. The Upāśrayas were usually away from the residential areas and therefore the people had to walk for the fulfillment of their spiritual and health requirements. In present fixed definition of tourism it may not come as the act of tourism and the people visiting Upāśraya may not be termed as tourist, yet their movement definitely was indicative of purposeful movement involving healthcare. This is a living practice even today. References 1. Rajavarttika-1, Akalanka Bhatta, p. 77, 2. Bhatnagar, Rajendra Prakash, Jaina Ayurveda kā Itihāsa, Surya Prakashan, Udaipur, 1984, 3. This information was given by my supervisor Prof. Maruti Nandan Prasad Tiwari, Banaras Hindu University, Varanasi, 4. Sthānārga Sūtra, Edited Yuvācārya Mahāprajña, p. 855, 5. Kalyānakāraka (intro), Ugrāditya, Sakharama Granthamala, Sholapur, 1940, p. 38, Page #79 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 72: śramana, Vol 63, No. 1, Jan.-Mar. 2012 6. Uttarādhyayana Sūtra, 7. Sūtrakstānga, 8. Sthānārga, Edited Yuvācārya Mahāprajña, p.850, p. 920-921, 9. Jīvājīvābhigama-1, Jaina Shastroddhara Samiti, Rajkot, 1973, p.669, 10. Kalyānakāraka, Ugrāditya, Sakharama Granthamala, Sholapur, 1940, 11. Kalpasūtra, Sūtra 20-23, Page #80 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान जिज्ञासा- उपासक (श्रावक या गृहस्थ) की ग्यारह और श्रमण (मुनि या भिक्षु या साधु या अनगार) की बारह प्रतिमाओं का उल्लेख जैन आगमों में मिलता है। इन्हें समझाने का कष्ट करें। श्रीमती सोना जैन समाधान- उपासक और श्रमण दोनों की प्रतिमाओं का उल्लेख हमें श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं में मिलता है।' 'प्रतिमा' शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त है- प्रतिज्ञा-विशेष, व्रत-विशेष, अभिग्रह-विशेष, मूर्ति, प्रतिकृति, बिम्ब, प्रतिबिम्ब, छाया, प्रतिच्छाया आदि। प्रस्तुत प्रसंग में 'प्रतिमा' शब्द तप-विशेष या वीतरागता-वर्धक-साधना पद्धति की भूमिकाओं (सोपानों) के अर्थ में लेना चाहिए। इन्हें प्रतिमा-योगसाधना भी कह सकते हैं। प्रतिमाधारी उपासक (गृहस्थ या सागार या श्रावक) श्रमणसदृश या श्रमण-जीवन की प्रतिकृति रूप हो जाता है। दिगम्बर परम्परा में परवर्ती प्रतिमाओं में स्थित श्रावक को पूर्ववर्ती प्रतिमाओं का पालन करना आवश्यक है परन्तु श्वेताम्बर परम्परा में समयसीमा का निर्धारण होने से जीवनपर्यन्त धारण करना आवश्यक है, ऐसा प्रतीत नहीं होता है। श्रमण की प्रतिमाएँ तप-विशेष हैं जिन्हें क्रमशः किया जाता है। उपासक (श्रावक) प्रतिमाएँ- श्रावक के तीन प्रकार बतलाये गए हैं जो उत्तरोत्तर उत्कृष्ट हैं- 1. पाक्षिक (प्रारम्भिक अवस्था वाला), 2. नैष्ठिक (प्रतिमाधारक) और 3. साधक (समाधिमरणधारी)। पाक्षिक श्रावक- पाक्षिक श्रावक वह है जो पाँच अणुव्रतों (स्थूल अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह) का पालन करता है। मद्य, मांस और मधु (शहद) का सेवन नहीं करता है। जुआ, वेश्यागमन, परस्त्रीगमन, शिकार आदि से भी दूर रहता है। पीपल, वट, पिलखन, गूलर और काक- इन पाँच क्षीरी फलों या उदुम्बर फलों (जन्तुफल या हेमदुग्धक) का भी सेवन नहीं करता है। जिन वृक्षों से दूध जैसे पीले रंग का पदार्थ निकलता है वे क्षीरीफल कहे जाते हैं। इसमें त्रसजीवों की सत्ता नग्न आँखों से देखी जा सकती है। उपासक त्रस-हिंसात्यागी होता है। रात्रिभोजन न करना, छना पानी पीना, गुरुसेवा करना, सुपात्रों को दान देना आदि कार्य पाक्षिक श्रावक के लक्षण हैं। पाक्षिक श्रावक नैष्ठिक श्रावक बनने की तैयारी में होता है। यह पाँच अणुव्रतों के साथ सात शीलों का भी पालन करता है। सात शील (3 गुणव्रत तथा 4 शिक्षाव्रत) हैंदिग्व्रत, देशावकाशिक (देशव्रत), अनर्थदण्ड-विरत, सामायिक, Page #81 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 74 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी - मार्च 2012 भोगोपभोग - परिमाण, पोषधोपवास और अतिथि संविभाग। दोनों परम्पराओं में इनके क्रम में अन्तर है। साधक श्रावक - मरणकाल के सन्निकट आने पर साधक श्रावक चारों प्रकार के आहार का त्याग करके संथारा या सल्लेखना या समाधिमरण लेता है। इसे कब ले सकते है, कब नहीं? विधि क्या है? उस समय कैसे विचार हों ? आदि का विचार शास्त्रों में किया गया है। यह मरण न तो आत्महत्या है और न ही इच्छामृत्यु | नैष्ठिक श्रावक - पाक्षिक श्रावक जब नैष्ठिक श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं के माध्यम से वीतरागता की ओर बढ़ना चाहता है तो उसे क्रमशः इन प्रतिमाओं को धारण करना पड़ता है। पाक्षिक श्रावक जिन नियमों को अभ्यास के रूप में पालन करता था उन्हें ही यहाँ नियमपूर्वक अतिचार - रहित पालन करना होता है। श्वेताम्बरों में प्रतिमा - ग्रहण की कालसीमा भी बतलायी है जबकि दिगम्बरों में जीवनपर्यन्त पालने का नियम है। इनके क्रम के विषय में तथा नाम के विषय में श्वेताम्बरों और दिगम्बरों में थोड़ा अन्तर है, जो नगण्य है। श्वेताम्बर परम्परा के उपासकदशांगसूत्र में आनन्द श्रावक के प्रसंग में उसके द्वारा धारण की गई ग्यारह प्रतिमाओं के कथन हैं जो इस प्रकार हैं- 1. दर्शन, 2. व्रत, 3. सामायिक, 4. पोषध, 5. कायोत्सर्ग, 6. ब्रह्मचर्य, 7. सचित्ताहार वर्जन, 8. स्वयं आरम्भवर्जन, 9. भृत्य - प्रेष्यारम्भवर्जन, 10. उद्दिष्टवर्जन और 11. श्रमणभूत । दिगम्बर परम्परा के रत्नकरण्ड श्रावकाचार आदि ग्रन्थों में श्रावक की प्रतिमाए 1. दर्शन, 2. व्रत, 3. सामायिक, 4. पोषध, 5. सचित्तत्याग, 6 रात्रिभुक्तित्याग, 7. ब्रह्मचर्य, 8. आरम्भत्याग, 9. परिग्रहत्याग, 10. अनुमतित्याग और 11. उद्दिष्टत्याग। ( श्रमणवत् इसके दो भेद हैं- क्षुल्लक और ऐलक । ) इस तरह प्रथम चार प्रतिमाओं के नाम और क्रम में कोई अन्तर नहीं है । श्वेताम्बरों की पाँचवीं नियम प्रतिमा में दिगम्बरों की छठी स्वतंत्र रात्रिभुक्तित्याग प्रतिमा समाहित है। ब्रह्मचर्य प्रतिमा श्वेताम्बरों में छठी है और दिगम्बरों में सातवीं है। सचित्तत्याग प्रतिमा श्वेताम्बरों में सातवीं और दिगम्बरों में पाँचवीं है। श्वेताम्बरों की नौवीं भृत्य-प्रेष्यारम्भत्याग परिग्रहत्याग ही है। दिगम्बरों की दसवीं अनुमतित्याग का समावेश श्वेताम्बरों के उद्दिष्टत्याग में माना गया है। दिगम्बरों की ग्यारहवीं उद्दिष्टत्याग प्रतिमा श्वेताम्बरों की ग्यारहवीं श्रमणभूत प्रतिमा है। दोनों परम्पराओं में श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं का विवरण निम्न हैसमय - मर्यादा केवल श्वेताम्बर परम्परा में है, दिगम्बर परम्परा में नहीं क्योंकि वहाँ प्रत्येक प्रतिमा जीवनपर्यन्त ली जाती है। Page #82 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान : 75 श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएँ 1. दर्शन प्रतिमा- यहाँ दर्शन शब्द का अर्थ है 'सम्यक् श्रद्धा'। अतः शंका आदि दोषों से रहित जिनवचन में दृढ़ आस्था (प्रगाढ़ श्रद्धा) रखना । क्षायोपशमिक सम्यग्दृष्टि इस प्रतिमा को धारण करता है। वह अपने अणुव्रतों का निरतिचार पालन करता है। न्यायपूर्वक आजीविका चलाता है। चर्मपात्र में रखे घी, तेल आदि का उपयोग नहीं करता है। संकल्पी हिंसा नहीं करता है। अपने र-विचार को शुद्ध रखता है। प्रलोभनों से विचलित नहीं होता है। श्वेताम्बरों में इसकी आराधना का काल एक मास है । आचार 2. व्रत प्रतिमा- पाँच अणुव्रतों और सात शीलव्रतों (3 गुणव्रतों और 4 शिक्षाव्रतों) का जिन्हें पाक्षिक श्रावक पालन करता था उनका दृढ़तापूर्वक निरतिचार पालन करना व्रत प्रतिमा है। यहाँ वह सामायिक और देशावकाशिक व्रत को अभ्यासरूप में करता है। अनुकम्पागुण से युक्त होता है। किसी के बारे में अनिष्ट नहीं सोचता । श्वेताम्बरों में इसका आराधनाकाल दो मास है । 3. सामायिक प्रतिमा- प्रतिदिन नियम से तीन बार सामायिक (मन-वचन-काय की एकाग्रता) करना। इसमें वह सामायिक और देशावकाशिक ( देशव्रत) का भी निरतिचार पालन करता है। पोषधोपवास को अभ्यासरूप में करता है। श्वेताम्बरों में इसका आराधना काल तीन मास है। 4. पोषध प्रतिमा- अष्टमी, चतुर्दशी तथा पर्व - तिथियों में पोषध (उपवास) व्रत का नियमतः पालन करना पोषध प्रतिमा है। पूर्णिमा, अमावस्या आदि विशिष्ट तिथियों में भी यथाशक्य पोषध करना चाहिए। श्वेताम्बरों में इसका आराधनाकाल चार मास है। 5. नियम या कायोत्सर्ग प्रतिमा- शरीर के साथ ममत्व छोड़कर आत्मचिन्तन में लगना कायोत्सर्ग (ध्यान) है। अष्टमी तथा चतुर्दशी को रात-दिन का कायोत्सर्ग करना। इसे नियम प्रतिमा भी कहते हैं क्योंकि इसमें पाँच नियमों का पालन करना होता है- 1. स्नान न करना, 2. रात्रिभोजन त्याग, 3. धोती की लांग न लगाना, 4. दिन में ब्रह्मचर्य और रात्रि में मर्यादा और 5 माह में एक रात्रि कायोत्सर्ग। श्वेताम्बरों में इसका आराधनाकाल 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन, से लेकर पाँच मास तक है। दिगम्बर परम्परा में इसके स्थान पर रात्रिभोजनत्याग और दिवा-मैथुनविरत नाम मिलते हैं। 6. ब्रह्मचर्य प्रतिमा - पूर्णरूपेण काम - चेष्टाओं से विरक्ति ब्रह्मचर्य प्रतिमा है ।। स्त्रियों / पुरुषों से अनावश्यक मेल-जोल, श्रृंगारिक चेष्टाओं का अवलोकन, कामवर्धक संगीत श्रवण आदि वर्जित है। स्वयं भी श्रृंगारिक वेश-१ - भूषा धारण Page #83 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 76 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 करना, गरिष्ठ कामवर्धक भोजनपान करना आदि भी वर्जित है। पाँचों इन्द्रियों का संयम जरूरी है। श्वेताम्बरों में इसका आराधनाकाल 1 दिन, 2 दिन, 3 दिन तथा छह मास है। जीवन-पर्यन्त का भी विधान है। 7. सचित्ताहारवर्जन प्रतिमा- सचित्त (सजीव या हरी) वनस्पति का तब तक आहार न करना जब तक वह अचित्त (जीव-रहित) न हो जाए। पकाकर या सुखाकर सचित्त को अचित्त करने पर प्राणि-संयम तो नहीं होता परन्तु इन्द्रिय-संयम होता है। कुछ वनस्पतियाँ सप्रतिष्ठ (अगणित-अनन्तकाय जीव वाली) होती हैं और कुछ अप्रतिष्ठ (एक जीव वाली) होती हैं। जिन्हें तोड़ने पर समान रूप से दो भाग हो जाएँ उन्हें सप्रतिष्ठ कहते हैं। इनका छिलका मोटा उतरता है तथा ऊपर की धारियाँ (शिराएँ) स्पष्ट नहीं होती। अप्रतिष्ठ वनस्पतियाँ वे हैं जो तोड़ने पर टेढ़ी-मेढ़ी टूटें, छिलका पतला हो, धारियाँ स्पष्ट हों तथा अलग-अलग फाँकें हों। इस प्रतिमा का साधक खेती आदि आरम्भ-क्रियाओं का त्याग नहीं करता है। श्वेताम्बरों में इसकी आराधना का उत्कृष्ट काल 7 मास 8. स्वयं आरम्भवर्जन प्रतिमा (आरम्भत्याग)- प्रतिमाधारी इसमें बच्चों के बड़े हो जाने पर आजीविका हेतु खेती, व्यापार आदि क्रियाएँ स्वयं नहीं करता परन्तु दूसरों से करा सकता है। संपत्ति पर अपना अधिकार रखता है। श्वेताम्बरों में इसकी आराधना-अवधि एक दिन से लेकर 8 मास है। १. भृत्यप्रेष्य आरम्भवर्जन प्रतिमा (प्रेष्य-परित्याग या परिग्रह-त्याग)इसका साधक दूसरों से भी आरम्भ क्रियाएँ नहीं कराता। आरम्भ होने की अनुमति का त्याग न होने से उसके उद्देश्य से बनाये गए आहार को ले सकता है। यहाँ वह मोह छोड़कर परिग्रहत्यागी हो जाता है। सलाह मांगने पर उचित सलाह दे सकता है। श्वेताम्बरों में इसका आराधनाकाल एक दिन से लेकर 9 मास तक है। 10. उद्दिष्ट-भक्तवर्जन प्रतिमा- इसमें अपने लिए तैयार भोजन आदि का साधक (उपासक) त्याग कर देता है। लौकिक कार्यों से पूर्ण विरत हो जाता है, सलाह भी नहीं देता है। उस्तरे से बाल मुण्डित करा सकता है। चोटी रख सकता है। इसकी अवधि एक दिन से लेकर 10 मास तक है। दिगम्बर परम्परा में इस प्रतिमा का नाम अनुमतित्याग है और इस प्रतिमा का धारी लौकिक कार्यों की सलाह देना भी बन्द कर देता है। प्रायः मन्दिर या उपाश्रय में रहता है। निमंत्रण स्वीकार कर सकता है। Page #84 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान : 77 11. श्रमणभूत प्रतिमा- साधक अपने को श्रमण जैसा बना लेता है। श्रमण जैसी वेशभूषा, पात्र तथा उपकरण रखता है। सहिष्णुता होने पर केशलुंचन करता है। भिक्षाचर्या से जीवन-यापन करता है। श्रमण किसी के भी घर भिक्षाचर्या हेतु जाता है जबकि श्रमणभूत प्रतिमा वाला प्रायः अपने सम्बन्धियों के घरों में जाता है। इसका काल एक दिन से लेकर ग्यारह मास है। दिगम्बर परम्परा में इसका नाम उद्दिष्टत्याग प्रतिमा है। अपने उद्देश्य से बनाये गए आहार आदि को नहीं लेता। निमंत्रण स्वीकार नहीं करता। बालों को कैंची या छुरे से बनाता है। इसके दो भेद हैं- 1. क्षुल्लक- यह एक लंगोटी और एक सफेद चादर रखता है। कई घरों से या एक घर से पात्र में भिक्षा लेता है। जूठे बर्तन स्वयं धोता है। मुनियों के साथ रहकर उनकी वैयावृत्ति करता है। 2. ऐलक- केशलोंच करता है। केवल एक लंगोटी होती है। मयूरपंख की पीछी रखता है। मुनिवत् आहार हाथ में लेकर करता है। श्रमण (भिक्षु) की बारह प्रतिमाएँ श्रावक की प्रतिमाओं की तरह श्रमण (भिक्षु) की भी विशिष्ट-साधना-भूमिका रूप बारह प्रतिमाएँ हैं। इन प्रतिमाओं अथवा प्रतिमायोग की साधना में श्रमण मन-वचन-काय तीनों योगों को नियंत्रित करता है। प्रथम सात प्रतिमाएँ विशेषरूप से आहार-नियमन से सम्बन्धित हैं और बाद की पाँच प्रतिमाएँ आसन-विशेषरूप-कायोत्सर्ग से सम्बन्धित हैं। इनका विशेष विवरण निम्न प्रकार श्वेताम्बर मान्यता 1. मासिकी- इस प्रतिमा को धारण करने वाला श्रमण एक मास तक प्रतिदिन एक दत्ति अन्न की और एक दत्ति जल की ग्रहण करता है। एक दत्ति का अर्थ है एक अखण्ड धारा के रूप में जो आहार या जल साधु के पात्र में दाता श्रावक देता है, उतना ही लेकर संतोष करना। विशिष्ट नियम (अभिग्रह) लेकर (जैसे दाता का एक पैर देहली के बाहर हो) दिन में एक बार ही भिक्षार्थ जाता है। यदि विधि के अनुकूल आहार नहीं मिलता तो उपवास करता है। गर्भवती तथा स्तनपान कराने वाली स्त्रियों के लिए निर्मित आहार नहीं लेता। समागत सभी कष्टों को समताभाव से सहन करता है। उपसर्ग करने वाले पर द्वेष न करके उसे अपना उपकारी समझकर कर्म-निर्जरा करता है। एक गाँव में दो रात्रि से अधिक नहीं ठहरता और सूर्यास्त होने पर जैसा भी स्थान होता है रुक जाता है। 2. द्विमासिकी- दो मास तक दिन में दो दत्ति अन्न की और दो दत्ति जल की लेता है। शेष प्रथम प्रतिमावत् है। यद्यपि यहाँ दो दत्तियाँ आहार की मिल रही Page #85 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 78 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 हैं फिर भी प्रथम से द्वितीय प्रतिमा कठिन है क्योंकि इसकी समय-सीमा अधि : क है तथा आहारविधि के नियम कठोर होते हैं। 3. त्रिमासिकी- इसमें तीन मास तक तीन दत्तियाँ ली जाती हैं। 4. चतुर्मासिकी- इसमें चार दत्तियाँ चार मास तक ली जाती हैं। 5. पंचमासिकी- इसमें पाँच दत्तियाँ पाँच मास तक ली जाती हैं। 6. षड्मासिकी- इसमें छः दत्तियाँ छः मास तक ली जाती हैं। 7. सप्तमासिकी- इसमें सात दत्तियाँ सात मास तक ली जाती हैं। 8. प्रथम सप्त अहोरात्रिकी- इसमें श्रमण एक दिन का निर्जल उपवास (चतुर्भक्त) करके नगर के बाहर जाकर उत्तानासन, पाश्र्वासन या निषद्यासन द्वारा सात दिन-रात का कायोत्सर्ग करता है। मल-मूत्र की बाधा होने पर उसे विसर्जित कर पुनः उसी स्थान पर उसी आसन से बैठ सकता है। अन्य किसी भी प्रकार की बाधा या उपसर्ग होने पर ध्यान से विचलित नहीं होता है। १. द्वितीय सप्त अहोरात्रिकी- यह भी पूर्ववत् सात दिन-रात की है। इसमें दण्डासन, लकुटासन अथवा उत्कटुकासन से कायोत्सर्ग ध्यान किया जाता है। 10. तृतीय सप्त अहोरात्रिकी- यह भी सात दिन-रात की है। इसमें गोदोहनिकासन, वीरासन अथवा आम्रकुब्जासन से कायोत्सर्ग (आत्म-ध्यान), किया जाता है। 11. अहोरात्रिकी- यह एक अहोरात्रिकी (24 घण्टे = सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक) की प्रतिमा है। इसमें साधक दो दिन तक निर्जल उपवास (षष्ठभक्त = बेला) करके नगर के बाहर चौबीस घण्टे तक खड्गासन (दोनों पैरों को संकुचित करके तथा दोनों भुजाओं को जानु-पर्यन्त जांघ तक लम्बी करके) से ध्यान लगाता है। 12. रात्रिकी- इस प्रतिमा का प्रारम्भ अष्टम भक्त (तीन दिन तक चारों प्रकार के आहार का त्याग रूप तेला) तप से किया जाता है। पूर्ववत् खड्गासन से नगर के बाहर कायोत्सर्ग (ध्यान) करता है। इसमें शरीर को थोड़ा सा आगे झुकाकर किसी एक पुद्गल द्रव्य पर अनिमेष दृष्टि लगाता है और अपनी इन्द्रियों को भी गुप्त कर लेता है। इस ध्यान (निर्विकल्प समाधि) में ध्याता और ध्येय दोनों एकाकार हो जाते हैं। यह अति कठिन ध्यान है। इसमें असावधानी बरतने पर बहुत अनिष्ट (पागलपन, भयंकर रोग, धर्मच्युति) होता है और यदि सम्यक् साध न कर लेता है तो क्रमशः अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान की प्राप्ति होती है। इस तरह साधु का यह प्रतिमायोग आयारदसा की छठी दसा में बतलाया गया है। यही श्वेताम्बर मान्यता है। Page #86 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जिज्ञासा और समाधान : 79 दिगम्बर मान्यता दिगम्बर परम्परा में भी इन्हीं नामों वाली साधु की बारह प्रतिमाएँ मिलती हैं। सल्लेखना के प्रकरण में कहा गया है कि यदि साधु की आयु एवं शरीर की शक्ति अधिक शेष है तो उसे शास्त्रोक्त बारह प्रतिमाओं को धारण करके क्रमशः आहार का त्याग करना चाहिए। महासत्त्वशाली, परीषहजयी तथा उत्तम संहनन वाला क्षपक साधु इन प्रतिमाओं को धारण करता है तथा धर्मध्यान और शुक्लध्यान को करते हुए क्रमशः अवधिज्ञान, मन:पर्ययज्ञान और केवलज्ञान को प्राप्त करता है। इस प्रकार ये सभी प्रतिमाएँ उत्तरोत्तर कठिन एवं श्रेष्ठ हैं। 1. मासिकी - दुर्लभ आहार - ग्रहण सम्बन्धी विधि लेकर नियम करता है - 'यदि एक मास में ऐसा आहार मिला तो आहार लूँगा अन्यथा नहीं'। मास के अन्तिम दिन वह प्रतिमायोग धारण कर लेता है। इसी तरह अग्रिम प्रतिमाओं में आहार विधि के कठोर नियम लेकर पूर्ववत् आहार न मिलने पर प्रतिमायोग धारण करता है। 2. द्विमासिकी, 3. त्रिमासिकी, 4. चतुर्मासिकी, 5. पंचमासिकी, 6. षड्मासिकी और 7. सप्तमासिकी। 8-10 सप्त- सप्त दिवसीय तीन प्रतिमाएँ भी पूर्ववत् सौ-सौ गुना अधिक कठिन विधि पूर्वक होती हैं। इनमें क्रमश: 3, 2 और 1 ग्रास आहार लिया जाता है। 11 अहोरात्रिकी तथा 12 रात्रिकी- इन दो प्रतिमाओं में अनागार क्रमशः चौबीस तथा बारह घण्टों का प्रतिमायोग (कायोत्सर्ग - आत्मध्यान) करता है। फलस्वरूप सूर्योदय होने पर केवलज्ञान प्राप्त कर लेता है। पश्चात् अन्तिम प्रतिमायोग करके सिद्धत्व को प्राप्त कर लेता है। इस तरह दोनों परम्पराओं में श्रमण- प्रतिमाओं में थोड़ा सा अन्तर है। वस्तुतः ये वीतरागता -प्राप्ति के सोपान हैं। इनकी अवधि दोनों परम्पराओं में (उपवास आदि की अवधि न जोड़ने पर ) 28 मास साढ़े 22 दिन होती है। सन्दर्भ 1. देखें, आयारदसा छह और सात दशायें । समन्तभद्रकृत रत्नकरण्ड श्रावकाचार । जैनेन्द्रसिद्धान्तकोश। 2. प्रतिमा प्रतिज्ञा - अभिग्रहः । स्थानांगवृत्ति, पत्र 184 3. पं. आशाधर प्रणीत मूलाराधनादर्पण, गाथा 25 जैनेन्द्रसिद्धान्त कोश, पृ. 392-393 *** प्रो० सुदर्शन लाल जैन Page #87 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार्श्वनाथ विद्यापीठ समाचार 1. 'Jainism How and Why' विषयक व्याख्यान सम्पन्न दिनांक 3 जनवरी 2012 को पार्श्वनाथ विद्यापीठ के सभागार में प्रो. फिलिप क्लेटोन, अध्यक्ष, क्लेरमाण्ट यूनिवर्सिटी, अमेरिका एवं संकाय अध्यक्ष क्लेरमाण्ट स्कूल ऑफ थियालॉजी द्वारा 'Jainism How and Why' विषय पर एक व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। प्रो. फिलिप ने बताया कि आज की जो वर्तमान परिस्थिति है उसमें धर्म अपनी प्रासंगिकता खो रहा है। विशेषकर युवा वर्ग अपनी जीवनशैली में धर्म को स्थान नहीं देना चाहते हैं। प्रत्येक धर्म में मानवोपयोगी तत्त्व निहित हैं। इस कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि थे महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. पृथ्वीश नाग। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. डी. एन. तिवारी, अध्यक्ष, दर्शन एवं धर्म विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी, तथा प्रो. एम. एन. पी. तिवारी, पूर्व अध्यक्ष, कला एवं इतिहास विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। इस अवसर पर तीन पुस्तकों प्राकृत-हिन्दी कोश, जैनकुमारसंभव एवं कर्मग्रन्थ-5 (शतक) तथा श्रमण के अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अंक का विमोचन हुआ। संस्थान के निदेशक प्रो. सुदर्शन लाल जैन ने संस्थान का परिचय, विमोचित कृतियों का परिचय एवं अतिथियों का स्वागत वक्तव्य दिया। कार्यक्रम का संचालन संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार सिंह तथा धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय ने किया। 2. '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा अपनी स्थापना (1937) के 75 वर्ष पूर्ण होने पर कौस्तुभ जयन्ती वर्ष 2012 के उपलक्ष्य में '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन दिनांक 24-25 फरवरी 2012 को किया गया। इस अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र (24 फरवरी 2012) के मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. बी. एम. शुक्ला, पूर्व कुलपति, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर ने कहा कि किसी भी संस्था के लिए कौस्तुभ जयन्ती मनाना महत्त्वपूर्ण है। यह आयोजन इस बात का संकेत करता है कि संस्था अपनी स्थापना से लेकर आज तक शोध एवं प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय रही है और इससे सम्बद्ध लोग प्रशंसा के पात्र हैं। समारोह के अध्यक्ष प्रो. के. डी. त्रिपाठी, इमेरिटस प्रोफेसर, धर्मविज्ञान संकाय, काशी हिन्दू Page #88 -------------------------------------------------------------------------- ________________ CTOR पार्श्वनाथ विद्यापीठ समाचार : 81 विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि निश्चित रूप से नग्न भौतिकवाद के इस काल में धर्म में निहित लोक कल्याणकारी सिद्धान्तों पर विद्वत्- चिन्तन समय की मांग है। समारोह के आरम्भ में विद्यापीठ के प्रबन्ध समिति के अध्यक्ष डॉ. शुगन चन्द जैन ने पार्श्वनाथ विद्यापीठ के इतिहास एवं इसकी भावी योजनाओं पर प्रकाश डाला साथ ही जैन सिद्धान्तों की वर्तमान में प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डाला। संस्थान के निदेशक प्रो. सुदर्शन लाल जैन ने संगोष्ठी का विषय प्रवर्तन किया तथा संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अशोक कुमार सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर, पार्श्वनाथ विद्यापीठ ने किया। ANAT VE NAUGURAL FUNCTION & Book H Consult संगोष्ठी के समापन सत्र (25 फरवरी 2012) के मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. पंजाब सिंह, पूर्व कुलपति, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने कहा कि आज सबसे बड़ी आवश्यकता व्यक्ति को स्वयं में सुधार लाने की है। व्यक्ति स्वयं को सुधार ले तो समाज स्वयं ही सुधर जाएगा। समारोह की विशिष्ट अतिथि प्रो. चारित्र प्रज्ञा, कुलपति, जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय, लाडनूँ, राजस्थान ने कहा कि हम श्रमण शब्द के निहितार्थ को जीवन में उतार सकें जिसका शाब्दिक अर्थ है 'समता', तो हम समाज में एकरूपता एवं समरसता ला सकते हैं। हमारे तीर्थकरों द्वारा उपदिष्ट सिद्धान्त विश्वशान्ति और विकास के लिए आज भी बहुत उपयोगी हैं। इस समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. ए. के. जैन, संकायाध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने किया। संगोष्ठी के समापन सत्र में कार्यक्रम का संचालन संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार सिंह ने किया। संस्थान का परिचय डॉ. राहुल कुमार सिंह, रिसर्च एसोसिएट एवं धन्यवाद ज्ञापन श्री ओमप्रकाश सिंह, पुस्तकालयाध्यक्ष ने किया। इस द्विदिवसीय संगोष्ठी में 56 शोध-पत्रों का वाचन हुआ। संगोष्ठी में पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी तथा प्राकृत भारती अकादमी, जयपुर के संयुक्त तत्त्वावधान में प्रकाशित पुस्तकों 'कान्सेप्ट ऑफ मैटर इन जैन Page #89 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 82 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 फिलासॉफी' (डॉ. जे. सी. सिकदर) एवं 'उत्तराध्ययनसूत्र : एक परिशीलन' (डॉ. सुदर्शन लाल जैन) का विमोचन हुआ। इसके अतिरिक्त पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी से प्रकाशित पुस्तक 'महावीरकालीन समाज एवं संस्कृति की वर्तमान में प्रासंगिकता' (डॉ. नरेन्द्र कुमार पाण्डेय) का भी विमोचन हुआ। 3. पार्श्वनाथ विद्यापीठ दिल्ली शाखा में वीतरागता पर एक दिवसीय संगोष्ठी दिनांक 3 मार्च 2012 को अपराह्न दो बजे आत्मध्यान के प्रवर्तक युगप्रधान श्रमणसंघीय आचार्य डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की पावन निश्रा में पार्श्वनाथ विद्यापीठ दिल्ली शाखा, रामा विहार में संस्था की कौस्तुभ जयन्ती (प्लेटिनम जूबली) के उपलक्ष्य में व्यवहार में श्रावक वीतरागता विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारम्भ परम विदुषी साध्वी डॉ. सरिता जी म.सा. एवं उनकी अन्तेवासी साध्वियों के मंगलाचरण से हुआ। पार्श्वनाथ विद्यापीठ की गतिविधियों का परिचय देते हुए पार्श्वनाथ विद्यापीठ के अध्यक्ष डॉ. शुगन चन्द जैन ने आए हुए अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने अमेरिका से पधारे डॉ. सुलेखचन्द जैन को उनके 75वें जन्म दिवस पर बधाई दी। मंच पर पूज्य आचार्यश्री जी के साथ श्रमणसंघीय मंत्री पूज्य श्री शिरीष मुनि जी म.सा., श्री शुभम् मुनि जी म.सा. एवं श्री सुव्रत मुनि जी उपस्थित थे। Detachment (Vilar डॉ. शुगन चन्द जैन ने अपने लेख में अहिंसा, संयम, स्वाध्याय और सामायिक का सम्यक् पालन करने हेतु बल दिया। गुड़गांव से पधारे डॉ. विनेय जैन ने प्रेक्टिस ऑफ वीतरागता इन मार्डन साइन्सेस, दिल्ली के श्री सतीश कुमार जैन ने आत्मचेतना का वीतरामता की ओर क्रमिक विकास, वाराणसी से पधारे डॉ. अशोक कुमार सिंह ने श्रावक वीतरागता एवं लोभ कषाय संवरण तथा डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय, संयुक्त निदेशक पार्श्वनाथ विद्यापीठ ने दस धर्म Page #90 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार्श्वनाथ विद्यापीठ समाचार : 83 और वीतरागता विषयक अपने व्याख्यान दिए । अमेरिका से पधारे डॉ. सुलेखचन्द जैन ने वीतरागता पर एक सारगर्भित व्याख्यान दिया । इस अवसर पर पार्श्वनाथ विद्यापीठ, दिल्ली शाखा से प्रारम्भ होने वाले सर्टिफिकेट और डिप्लोमा पाठ्यक्रम की विवरणिका एवं प्रो. सुदर्शन लाल जैन निदेशक पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा लिखित " उत्तराध्ययन सूत्र : एक परिशीलन", जिसे प्रो. जैन ने आचार्यश्री को समर्पित किया था, का विमोचन पूज्य आचार्यश्री जी के कर-कमलों द्वारा किया गया। आचार्य भगवन् ने अपने विशेष उद्बोधन में कहा कि भगवान् महावीर ने भेद विज्ञान का उपदेश दिया है। आत्मा स्व है, शरीर, विचार सभी पदार्थ पर हैं। धन, वैभव, ऐश्वर्य सब मिथ्या हैं। एक मात्र सत्य आत्मा है। अन्तर्दृष्टि प्राप्त होने पर आत्मानुभूति उसी प्रकार बिना किसी विलम्ब के हो सकती है जिस प्रकार मिश्री खाने पर व्यक्ति को तुरन्त मिठास का अनुभव होता है। इसलिए भेद विज्ञान की साधना 24 घंटे की जा सकती है। बस इस बात का चिन्तन करने की जरूरत है कि सभी सांसारिक सम्बन्ध पर हैं और केवल एक तत्त्व आत्मा सत्य है। इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय की पूर्व प्राध्यापिका डॉ. कमला जैन, डॉ. वी. के. जैन, श्री राजकुमार जैन, फरीदाबाद, जैन श्रमण संघीय श्रावक समिति के सभी माननीय सदस्य - श्री सतीश कुमार जैन, श्री रविन्द्र जैन, श्री राजप जैन, श्री अनिल जैन, श्री विद्यासागर जैन, श्री संजीव जैन, श्री मोहिन्दर जैन तथा दिल्ली जैन समाज के अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। संगोष्ठी में परम साधिका पन्ना बहन ( महाविदेह क्षेत्र) की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही। कार्यक्रम का संचालन पार्श्वनाथ विद्यापीठ दिल्ली शाखा के कार्यालय मंत्री श्री मोहिन्दर जैन धन्यवाद ज्ञापन डॉ. शुगन चन्द जैन ने किया । आहार आदि की समुचित व्यवस्था शिवाचार्य समवसरण समिति के सौजन्य से की गयी। 4. पाण्डुलिपि एवं पुरालिपिशास्त्र पर कार्यशाला का आयोजन दिनांक 15 मार्च 2012 को इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के द्वारा पार्श्वनाथ विद्यापीठ में 'पाण्डुलिपि एवं पुरालिपिशास्त्र' विषय पर 15 दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन हुआ। 5. नेत्र परीक्षण शिविर का आयोजन पार्श्वनाथ विद्यापीठ, करौंदी, वाराणसी के प्रांगण में प. पू. आचार्य प्रशमरतिविजयजी महाराज की प्रेरणा से दिनांक 25 मार्च 2012 दिन रविवार को एक नेत्र परीक्षण Page #91 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 84 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 शिविर का आयोजन किया गया। इस परीक्षण शिविर में सौ व्यक्तियों का नेत्र परीक्षण किया गया। यह शिविर वाराणसी के प्रतिष्ठित नेत्र चिकित्सक डॉ. सुनील शाह (शाह क्लिनिक, बुलानाला) की देखरेख में सम्पन्न हुआ। इसमें जैन समाज के गणमान्य व्यक्तियों का विशेषकर श्रीमती मोनिका सिंह का प्रयास सराहनीय रहा। विद्यापीठ-सदस्यों द्वारा विभिन्न संगोष्ठियों में पत्र-वाचन एवं व्याख्यान 1. प्रो. सुदर्शन लाल जैन इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के द्वारा 'पाण्डुलिपि एवं पुरालिपिशास्त्र' विषयक 15 दिवसीय कार्यशाला में संस्थान के निदेशक प्रो. सुदर्शन लाल जैन ने दिनांक 16 मार्च 2012 को प्राकृत भाषा तथा अप्रकाशित जैन आगमों में उपलब्ध सूत्रों पर व्याख्यान दिया। 2. डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय आत्मध्यान के प्रवर्तक युगप्रधान श्रमणसंघीय आचार्य डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की पावन निश्रा में पार्श्वनाथ विद्यापीठ, दिल्ली शाखा, रामा विहार में संस्था की कौस्तुभ जयन्ती के उपलक्ष्य में 'व्यवहार में श्रावक वीतरागता' विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 3 मार्च 2012 को संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. श्रीप्रकाश पाण्डेय ने 'दस धर्म और वीतरागता' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। 3. डॉ. अशोक कुमार सिंह (क) पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा आयोजित '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 25 फरवरी 2012 को संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार सिंह ने 'जैन परम्परा का अध्यात्म को अनुपम देन : भेदविज्ञान' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। (ख) आत्मध्यान के प्रवर्तक युगप्रधान श्रमणसंघीय आचार्य डॉ. शिवमुनि जी म. सा. की पावन निश्रा में पार्श्वनाथ विद्यापीठ, दिल्ली शाखा, रामा विहार में संस्था की कौस्तुभ जयन्ती (प्लेटिनम जुबली) के उपलक्ष्य में 'व्यवहार में श्रावक वीतरागता' विषयक एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 3 मार्च 2012 को आपने 'श्रावक वीतरागता एवं लोभ कषाय संवरण' विषय पर अपना शोधपत्र प्रस्तुत किया। Page #92 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पार्श्वनाथ विद्यापीठ समाचार : 85 (ग) इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के द्वारा आयोजित 'पाण्डुलिपि एवं पुरालिपिशास्त्र' विषयक 15 दिवसीय कार्यशाला में संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अशोक कुमार सिंह ने दिनांक 24 मार्च 2012 को 'अवतरणों की प्रकृति- जैन व्याख्या साहित्य के विशेष सन्दर्भ में' तथा 'पाठभेद : एक विश्लेषण (समवायांगसूत्र के आलोक में)' विषय पर व्याख्यान दिया। 4. डॉ. राहुल कुमार सिंह। (क) पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा आयोजित '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 25 फरवरी 2012 को संस्थान के रिसर्च एसोसिएट डॉ. राहुल कुमार सिंह ने 'जैनदर्शन का अप्रतिम सिद्धान्त अनेकान्तवाद एवं इसकी प्रासंगिकता' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। (ख) चाणक्य इन्स्टीच्यूट ऑफ पब्लिक लीडरशिप, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई द्वारा दर्शन एवं धर्म विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में आयोजित KautiliyaArthashastra And Good Governance विषयक एकदिवसीय कार्यशाला में दिनांक 27 फरवरी 2012 को संस्थान के रिसर्च एसोसिएट डॉ. राहुल कुमार सिंह ने 'कौटिलीय अर्थशास्त्र में वर्णित नेतृत्व-गुण विचार एवं उनकी वर्तमान उपयोगिता' विषय पर व्याख्यान दिया। 5. डॉ. नवीन कुमार श्रीवास्तव (क) श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय, वेरावल (गुजरात) द्वारा आयोजित अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के 56वें अधिवेशन (5-7 फरवरी 2012) में संस्थान के रिसर्च एसोसिएट डॉ. नबीन कुमार श्रीवास्तव ने दिनांक 6 फरवरी 2012 को 'आगमों में प्रतिपादित षड्जीव-अहिंसा विषयक अवधारणा' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। (ख) पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा आयोजित '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 25 फरवरी 2012 को संस्थान के रिसर्च एसोसिएट डॉ. नवीन कुमार श्रीवास्तव ने 'विश्वशान्ति में अहिंसा एवं अनेकान्त की अपरिहार्यता' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। 6. श्री ओम प्रकाश सिंह पार्श्वनाथ विद्यापीठ द्वारा आयोजित '21वीं सदी में श्रमण संस्कृति की प्रासंगिकता' विषयक द्विदिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में दिनांक 25 फरवरी Page #93 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 86 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 2012 को संस्थान के पुस्तकालयाध्यक्ष श्री ओम प्रकाश सिंह ने 'जैन परम्परा और वनस्पति संरक्षण' विषय पर शोधपत्र प्रस्तुत किया। विशिष्ट व्यक्तियों का आगमन प्रो. निर्माल्य नारायण चक्रवर्ती दिनांक 21 मार्च, 2012 को भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के मेम्बर सेक्रेटरी प्रो. निर्माल्य नारायण चक्रवर्ती का विद्यापीठ के प्रांगण में आगमन हुआ। संस्थान की तरफ से उनका स्वागत डॉ. अशोक कुमार सिंह, एसोसिएट प्रोफेसर तथा श्री राजेश कुमार चौबे, प्रशासक ने किया। प्रो. चक्रवर्ती ने पुस्तकालय, शोध-गतिविधियों एवं प्रकाशन का अवलोकन कर इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने संस्थान के अकादमिक सदस्यों के साथ एक बैठक की एवं भविष्य में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् की ओर से विद्यापीठ को हरसम्भव मदद का आश्वासन दिया। *** Page #94 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन जगत् 1. 'जैन दार्शनिकों का भारतीय दर्शन को अवदान' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी शाजापुर (म.प्र.) में सम्पन्न प्राच्य विद्यापीठ, शाजापुर (म.प्र.) में डॉ. सागरमल जैन के निर्देशन में 30-31 दिसम्बर, 2011 एवं 1 जनवरी, 2012 को भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के आर्थिक सहयोग से 'जैन दार्शनिकों का भारतीय दर्शन को अवदान' विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। इस संगोष्ठी में देश के विभिन्न स्थानों से आये हुए विभिन्न विद्वानों एवं विदुषियों ने अपने शोधालेख प्रस्तुत किये जिनमें डॉ. फूलचन्द जैन 'प्रेमी', नई दिल्ली, डॉ. सुषमा संघवी, जयपुर, डॉ. धर्मचन्द जैन, जोधपुर आदि विद्वान् प्रमुख थे। इस अवसर पर डॉ. सागरमल जैन जी के अस्सी वर्ष पूरे होने पर अमृत-महोत्सव का आयोजन भी किया गया जिसमें सभी विद्वानों के साथ समाज ने उनका भव्य सम्मान किया। डॉ. सागरमल जी के परिवार ने भी समागत सभी लोगों का भव्य सम्मान किया। 2. साध्वी श्री प्रमुदिताश्री जी एवं कुमारी तृप्ति जैन को पी-एच. डी. की उपाधि प्राच्य विद्यापीठ, शाजापुर के निदेशक डॉ. सागरमल जैन के निर्देशन में जैन विश्वभारती विश्वविद्यालय, लाडन (राज.) द्वारा साध्वी श्री प्रमुदिता श्री जी को उनके शोध-प्रबन्ध 'जैन दर्शन में संज्ञा (व्यवहार के प्रेरक तत्त्व) की अवधारणा' एवं कुमारी तृप्ति जैन को उनके शोध-प्रबन्ध 'जैन धर्म-दर्शन में तनाव प्रबन्धन' (Stress Management) विषय पर पी-एच. डी. की उपाधि प्रदान की गई। पार्श्वनाथ विद्यापीठ की ओर से मंगलकामना। 3. अर्हत्वचन पुरस्कार वर्ष 23 (2011) की घोषणा कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर द्वारा मौलिक एवं शोधपूर्ण आलेखों के सृजन को प्रोत्साहन देने एवं शोधार्थियों के श्रम को सम्मानित करने के क्रम में वर्ष 2011 के अर्हत्वचन पुरस्कार की घोषणा की गई जिसमें प्रो. प्रभात कुमार जैन, गाजियाबाद (उ.प्र.) को प्रथम, प्रो. रज्जन कुमार, बरेली (उ.प्र.) को द्वितीय एवं डॉ. देवराज जैन, जमशेदपुर (झारखण्ड) को तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। पार्श्वनाथ विद्यापीठ की ओर से विजेताओं को बधाई। Page #95 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 88 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 4. परमात्म भक्ति स्वरूप पंचाह्निका महामहोत्सव प. पू. आचार्य देव श्री राजयशसूरीश्वर जी म. सा. के पावन निश्रा में परमात्म भक्ति स्वरूप पंचाहिनका महामहोत्सव के मांगलिक कार्यक्रम दिनांक 25-4-2012 से 29-4-2012 तक चलेंगे। पार्श्वनाथ विद्यापीठ की ओर से मंगलकामना। 5. जैनों के सर्वमान्य ग्रन्थ प्रकाशन की आवश्यकता की अपील हिन्दुओं की गीता, ईसाईयों की बाइबिल, मुसलमानों का कुरान, बौद्धों का धम्मपद, सिक्खों का गुरुग्रन्थ साहब जिस प्रकार तत्-तत् धर्म के सर्वमान्य ग्रन्थ स्वीकार किये जाते हैं उसी प्रकार जैनधर्म का भी एक सर्वमान्य ग्रन्थ श्रमण मनीषियों ने संयुक्त रूप से विचार-विमर्श के बाद 'समणसुत्तं' तैयार किया जिसका प्रकाशन ई. 1974 में किया गया। आशा थी कि यह ग्रन्थ सभी सम्प्रदायों में लोकप्रिय होगा परन्तु व्यवहार में गीता, बाइबिल आदि की तरह इसने जन-लोकप्रियता नहीं प्राप्त की है। जैनियों का सर्वमान्य ग्रन्थ कौन होगा इस पर कई मनीषियों ने कई ग्रन्थ लिखे हैं परन्तु वे सब इस यक्ष प्रश्न का समाधान नहीं कर सके। इस दिशा में पुनः सभी को प्रयत्न करना चाहिए। श्री दुलीचन्द जैन साहित्यरत्न, चेन्नई ने इस दिशा में मनीषियों से जो अपील की है वह स्वागतयोग्य है। 6. प्रज्ञापुरुषोत्तम आचार्य श्री योगेन्द्र सागर जी महाराज का समाधिमरण प. पू. 108 वरिष्ठ पट्टाधीश आचार्य प्रज्ञापुरुषोत्तम श्री योगेन्द्र सागर जी महाराज की समाधि दिनांक 18 मार्च को प्रातः हो गई। आचार्य श्री गुजराती, मराठी, कन्नड़, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा के विद्वान् थे। उन्होंने 150 ग्रन्थों की रचना के साथ ही 1200 श्लोक संस्कृत में तथा 3500 दोहों की रचना हिन्दी में की थी। आपने 850 भजन, 200 खण्डकाव्य, 500 से अधिक छन्द एवं 650 मुक्तक की रचना भी की थी। माँ जिनवाणी के इस दिव्य सुपुत्र को पार्श्वनाथ विद्यापीठ परिवार की तरफ से कोटिशः प्रणति निवेदन करते हुए हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 7. डॉ. महेन्द्र कुमार जैन न्यायाचार्य का जन्म-शताब्दी समारोह सम्पन्न जैन न्यायशास्त्र के अद्वितीय विद्वान् न्यायाचार्य डॉ. महेन्द्र कुमार जैन का जन्म-शताब्दी समारोह दिनांक 24 मार्च 2012 को दमोह (म.प्र.) में उनके परिवार द्वारा मनाया गया। इसके प्रमुख वक्ता थे प्रो. भागचन्द्र जैन 'भागेन्दु'। डॉ. Page #96 -------------------------------------------------------------------------- ________________ जैन जगत् : 89 महेन्द्र जी ने 48 वर्ष की अल्प आयु में वह काल कर दिखाया जो 100 वर्षों में भी नहीं किया जा सकता। अकलंक ग्रन्थत्रय से प्रारम्भ करके अकलंक के मूल ग्रन्थों का टीका के साथ जो सम्पादन किया है वह उन्हें अमर बनाया है। आपने इस थोड़ी ही आयु में अकलंक ग्रन्थत्रय आदि दर्जनों संस्कृत के प्रौढ़ ग्रन्थों की भूमिका लिखी तथा उनका वैज्ञानिक दृष्टि से समीक्षात्मक सम्पादन भी किया। 650 पृष्ठों का जैनदर्शन उनके दार्शनिक ज्ञान की परिपक्वता का परिचायक है। इनके पुत्र श्री पद्मचन्द जैन ने उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्रों के लिए दो स्वर्ण पदकों की व्यवस्था कीएक इन्जीनियरिंग कालेज में और दूसरा जैन-बौद्ध विभाग में। पं. दलसुख मालवणिया, स्वस्ति श्री भट्टारक चारुकीर्ति स्वामी जी, मूडबिद्री, महापण्डित श्री राहुल सांस्कृत्यायन, पं. बलभद्र जैन, डॉ. रतन पहाड़ी, सिद्धान्ताचार्य पं. फूलचन्द जैन शास्त्री, प्रज्ञाचक्षु पं. सुखलाल संघवी, डॉ. सागरमल जैन, प्रो. सुदर्शन लाल जैन आदि विद्वानों ने आपकी विद्वत्ता का लोहा स्वीकार किया है। आपके इस जन्मशताब्दी वर्ष पर पार्श्वनाथ विद्यापीठ का समस्त परिवार अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि व्यक्त करता है। *** Page #97 -------------------------------------------------------------------------- ________________ साभार प्राप्ति पार्श्वनाथ विद्यापीठ को निम्न पुस्तकें साभार प्राप्त हुई-... 1. पाइअविन्नाणकहा (भाग 1-2) कर्ता-प्राकृत विशारद धर्मराजा प. पू. आचार्य श्री विजयकस्तूरसूरि जी म. सा. सम्पा.- आचार्य श्री विजय सोमचन्द्रसूरिजी म. सा. प्रका.- श्री रांदेररोड़ श्वे. मू. पू. जैन संघ, अडाजण, पाटीया, सूरत। 2. वाराणसी के जैन तीर्थ एवं मन्दिर लेखक- ललित चन्द जैन, प्रका. लाभेन्दु प्रकाशन, 5, गोपाल विहार, महमूरगंज, वाराणसी-221010, मूल्य- 20/3. षड्दर्शन-सूत्रसंग्रह एवं षड्दर्शन-विषयक कृतयः संकलनकार- प. पू. श्री संयमकीर्तिविजय जी म. सा. प्रकाशक- सन्मार्ग प्रकाशन, अहमदाबाद, मूल्य 250/इनके अतिरिक्त संस्थान को गुरुश्री- रामचन्द्र प्रकाशन समिति, भीनमाल (राज.) द्वारा निम्न पुस्तकें भी साभार प्राप्त हुई1. योगशास्त्र (स्वोपज्ञ व्याख्या सहित) मूल लेखक- कलिकाल सर्वज्ञ श्री हेमचन्द्राचार्य, अनुवादक- आचार्य श्री पद्मसूरिजी, सम्पा. मुनि श्री जयानन्द विजयजी। 2. श्री कामघटकथानकम् मूल लेखक- श्री राजेन्द्रसूरीश्वर जी, सम्पा. मुनिराज श्री जयानन्द विजयादि मुनि मण्डल। 3. श्री चन्द्रराजचरित्रम् मूल लेखक- श्रीमद्विजयजी भूपेन्द्रसूरिजी म. सा., सम्पा. मुनिराजश्री जयानन्द विजयादिमुनि मण्डल। *** Page #98 -------------------------------------------------------------------------- ________________ OUR IMPORTANT PUBLICATIONS 1. Prakrit - Hindi Kosa Edited by Dr. K.R. Chandra 1200.00 2. Encyclopaedia of Jaina Studies Vol. I (Art & Architecture) *4000.00, $ 100.00 3. Jaina Kumara Sambhavam Dr. Neelam Rani Shrivastava * 300.00 4. Jaina Sahitya Ka Brhad Itihasa, Vol. I -Vol. VII, *1430.00 5. Hindi Jaina Sahitya Ka Brhad Itihasa, Vol. 1-Vol. III Dr. Shitikanth Mishra *1270.00 6. Jaina Pratima Vijnana Prof. M.N.P. Tiwari * 300.00 Jaina Dharma Darsana Dr. Mohanlal Mehta *200.00 8. Sthanakavasi Jaina Parampara Ka Itihasa Dr.S.M. Jain & Dr. Vijaya Kumar * 500.00 9. Studies in Jaina Philosophy Dr. Nathmal Tatia 200.00 10. Theaory of Reality in Jaina Philosophy Dr. J.C. Sikdar *300.00 11. Doctrine of Karma in Jaina Philosophy H.V.Glasenapp * 150.00 12. Jainism: The Oldest Living Religion Dr. Jyoti Prasad Jain * 40.00 13. Scientific Contents in Prakrit Canons Dr. N.L. Jain *400.00 14. Pearls of Jaina Wisdom Editors: Dr. S. M. Jain & Dr.S.P. Pandey *120.00 15. Studies in Jaina Art Dr. U.P.Shah *300.00 16. Dr. C. 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