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________________ 44 : श्रमण, वर्ष 63, अंक 1 / जनवरी-मार्च 2012 अरिष्टनेमि एक ऐसा महान् प्रभावी व्यक्तित्व था जिसने जैन, वैदिक एवं बौद्ध तीनों की संस्कृतियों को प्रभावित किया। पार्श्वनाथ भगवान् पार्श्वनाथ को पौर्वात्य और पाश्चात्य सभी इतिहासविदों ने ऐतिहासिक महापुरुष माना है। सर्वप्रथम प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् डॉ0 हर्मन याकोबी ने जैनागमों एवं बौद्ध पिटकों के प्रमाणों के प्रकाश में पार्श्व को ऐतिहासिक महापुरुष सिद्ध किया है। डॉ0 राधाकृष्णन आदि विद्वानों ने भी इसका समर्थन किया है। वे मानते हैं कि महावीर से पूर्व एक निर्ग्रन्थ सम्प्रदाय था उसके प्रधान भगवान् पार्श्वनाथ थे। डॉ0 बाशम के अभिमत में भगवान् महावीर को बौद्ध पिटकों में भगवान् बुद्ध के प्रतिस्पर्धी के रूप में अंकित किया गया है। एतदर्थ उनकी ऐतिहासिकता असंदिग्ध है। भगवान् पार्श्व ई0 पू0 आठवीं-नौवीं शताब्दी में भगवान् महावीर से दो सौ पचास वर्ष पूर्व हुए हैं। पार्श्व का जीवनकाल सौ वर्ष का था। दिगम्बराचार्य गुणभद्र के अनुसार भगवान् पार्श्व के परिनिर्वाण के दो सौ पचास वर्ष पश्चात् भगवान् महावीर का आविर्भाव हुआ। यदि इसे प्रामाणिक एवं यथार्थ मान लिया जाय तो पार्श्वनाथ की विद्यमानता ई0 पू0 नौवीं शती निश्चित होती है। शान्टियर ने लिखा है कि दो बातें स्मरण रहें कि जैनधर्म निश्चित रूप से महावीर से प्राचीन है भगवान् पार्श्व उनसे से भी पूर्व ऐतिहासिक पुरुष हैं। दूसरे जैन और बौद्ध दोनों परम्पराएँ उनसे प्रभावित रही हैं। तथागत बुद्ध के प्रमुख शिष्य सारिपुत्र ने कहा- मैं बोधिपूर्व दाढ़ी-मूछों का लुंचन करता था। मैं उकडू बैठकर खड़े रहकर हथेली पर भिक्षा लेकर खाता था। स्वस्थान पर आए हुए और अपने लिए तैयार किये हुए अन्न व निमंत्रण को स्वीकार नहीं करता था। सुप्रसिद्ध इतिहासकार डॉ0 राधाकुमुद मुखर्जी और श्रीमती रीज डेविड्स भी स्पष्ट कहती हैं कि बुद्ध पार्श्वनाथ के सिद्धान्तों से प्रभावित थे। श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों परम्पराओं के आधार ग्रन्थों से सिद्ध है कि भगवान् पार्श्व की जन्मभूमि सुप्रसिद्ध काशी राष्ट्र की राजधानी वाराणसी थी। काशीनरेश अश्वसेन पिता व वामा देवी माता थीं। पौष कृष्ण दशमी को जन्म हुआ। उस समय तापस परम्परा का प्राबल्य तथा अज्ञान तप को सत्य सही तप माना जाता था। पार्श्व ने गृहस्थाश्रम में ही पंचाग्नि तप करते हुए तापस कमठ को बोध दिया तथा जलते हुए सर्प युगल को नवकार महामंत्र का संक्षिप्त रूप सुनाकर उनका उद्धार किया। भावी तीर्थकर द्वारा गृहस्थाश्रम में इस प्रकार धर्मकान्ति का यह एक अद्वितीय उदाहरण है। संयम ग्रहण करने के पश्चात् उग्र साधना कर कैवल्य ज्ञान प्राप्त किया। कुरु,
SR No.525079
Book TitleSramana 2012 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSudarshanlal Jain
PublisherParshvanath Vidhyashram Varanasi
Publication Year2012
Total Pages98
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Sramana, & India
File Size12 MB
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