Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 02
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan

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Page 210
________________ सिरिसिरि // 220 // बालकाहा RESEARSACROMACRECAS आजम्मंपिहु जेसिं देहे चत्तारि अइसया हुँति / लोगच्छरयभूया ते अरिहंते पणिवयामि // 1221 // जे तिहुनाणसमग्गा खीख नाऊण भोगफलकम्मं / पडिवजंति चरितं ते अरिहंते पणिवयामि // 1222 // उवउत्ता अपमत्ता सिअझाणा खवगसेणियमोहा। पावंति केवलं जे ते अरिहंते पणिवयामि / / 1223 // पतामीति पूर्ववत् // 1220 // हु इति निश्चितं, येषां देहे-शरीरे आजन्मापि-जन्मत आरभ्यापि लोके आश्चर्यभूताश्चत्वारोऽतिशया भवन्ति, 'तेषां च देहोऽद्भुतरूपगन्ध' इत्यादयस्तानहतः प्रणिपतामि // 1221 // ये त्रिभिनि:-मतिश्रुतावधिभिः समग्राः-सम्पूर्णाः सन्तो भोगः फलं यस्य तद्भोगफलं कर्म क्षीणं ज्ञात्वा चारित्रं प्रतिपद्यन्ते-अङ्गीकुर्वन्ति तानहतः प्रणिपतानि // 1222 // ये उपयुक्ता-उपयोगयुताः पुनरप्रमत्ताःप्रमादरहिताः पुनः सितं-शुक्लं ध्यानं येषां ते सितध्यानाः अत एव क्षपकश्रेण्या इतो मोहो यैस्ते तथा, ईदृशाः सन्तः केवलज्ञान प्राप्नुवन्ति, तानहेतः प्रणिपतामि // 1223 // १२२१-१२२२-१२२३-स्पष्टानि / // 220 /

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