Book Title: Sirisiriwal Kaha Part 02
Author(s): Ratnashekharsuri, Bhanuchandravijay
Publisher: Yashendu Prakashan
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________________ बालकद्दा सिरिसिरि // 230 // - अस्त्र जं देसविरहरूवं सव्व विरइरूवयं च अणुकमसो। होइ गिहीण जईणं तं चरित्तं जए जयह // 1281 // नाणं पि दंसणं पि अ संपुण्णफलं फलंति जीवाणं / जेणं चिअ परिअरिया तं चारित्तं जए जयइ // 1282 // जं च जईर्ण जहुत्तरफलं सुसामाइयाइ पंचविहं / सुपसिद्धं जिणसमए तं चारित्तं जए जयइ // 1283 // जं पडिवन्नं परिपालियं च सम्मं परूवियं दिन्नं / अन्नेसिं च जिणेहि वि तं चारित्तं जए जयइ // 1284 // ज्ञानमपि दर्शनमपि च उभे अपि येन चारित्रेन 'परिकरिते 'परिवृते एव जीवानां सम्पूर्णफलं यथास्यात्तथा 'फलतः' फलं दत्तः, सम्पूर्णानि फलानि यत्र कर्मणि तत्तथेति क्रियाविशेषणं, तच्चारित्रंजगति जयति // 1281 // | च पुनर्यच्चारित्रं 'जिनसमये'-जिनसिद्धान्ते ' यतीनां साधूनां सुष्ठु-शोभनं सामायिकादि पंचविधं' | पश्चपकारं सुतराम्-अतिशयेन प्रसिद्धं वर्तते / यथोत्तरं ' उत्तरोत्तरधिकं फलं यस्य तत्तथा, तच्चरित्रं जगति जयति / / 1283 // जिनैरपि यच्चारित्रं 'प्रतिपन्नं' अङ्गीकृतं पुनः परिपालितं पुनः सम्यरु प्ररूपितं 1281 - स्पष्टम् ! 1282 - अनुप्रासः / 1283 - 1284 - स्पष्टे / OCERY // 230 //

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