Book Title: Shrutsagar 2014 07 Volume 01 02
Author(s): Kanubhai L Shah
Publisher: Acharya Kailassagarsuri Gyanmandir Koba
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श्रुतसागर
जुलाई - २०१४ मुख मोडइंनई मटका करइं, रंगरोल तंवोल वावरइं। देखाडइं परगट निज अंग, वांकी दष्टिं राखई रंग 1|४३ 11 एक चंदनस्युं चरचई अंगि, गाढो भीडई अंगोअंगि। एक रगणी रंगि राती रमई, नव नव रंग करती भमई ।।४४ ।। पाए लागी बोलावई एक, बोलई बोल विकार अनेक । दुखिणी आंसू पाडई रडई, दुख देखाडइनइं भुंइं पडई ।।४५।। मुखि मांडई एकदस आंगली, दीनवचन बोलई वलि-वलि । रवागी हवइं ग दाखो छेह, तुम साथि अह्मे मांड्यो नेह ।।४६।। एक दांतेस्युं तरणुं ग्रही, नयनबाण ताकीनई रही। एणी परि हाव-भाव बहु करी, विलविलती विलखी थई खरी ।।४७!। बहु शृंगार तणी ओरडी, थाकी ते आठई गोरडी। पतिव्रता ते आठई राही, दोय करजोडी आगलि रही ।।४८ | ! हवाइं ते पृथिवीचंद्र कुमार, निसुणी वयण अनेक अपार। वइरागी उपशम् भंडार, वलतो उत्तर भाखइं सार | ४९ ।। बूझो बूझो बूझो तहो, इंद्री वसि कीधा छई अहो। गोह राणी मति गूंको घणी, कषाय छंडो निजहित भणी ।।५० ।। भेद च्यार एहन छई प्रगट, एक एक पाइं ते विकट । क्रोध मांन मायानई लोभ, त्रिहुं जगनई उपजावई क्षोभ ।।५१।। सहजिं जीव सहू अतिविमल, ज्ञान दर्शन चारित्रई सकल | फटिकरत्न परि निर्मलजीव, कषाय च्यार पीड्यो करइं रीव ||५२ ।।
॥ पूराढाल । रे फरसराभ क्रोधइं करी, क्षत्री क्षय कीध। अनइं सभूमि बांभण हणी, नरग तणां फल लीध | ५३ ।। इम जाणी जीव जागीइं, तजीइं क्रोध कषाय। रागद्वेष वली टालीई, जिम शिवसुख थाय ।।५४ ।। ।।आंकणी।। रे हरिकेसी जति मद थकी, नीच कुलि अवतार | जाति विद्या कुल लाभ तणो, मद म करि गमार ।।५५।।
इम जाणी जीव...
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